जैन पाठशाला
मैं तो अपने आप से
मैं तो अपने आप से अनजान हो गया,
रत्नत्रय सा प्यारा प्यारा धन खो गया,
सच्चा धरम अच्छा धरम जिन धरम छोड़ के,
मिथ्या धरम मान लिया गुरु से नाता तोड़ के,
मैं खाता हूँ, मैं गाता हूँ, मैं ही जीता खेल में,
उल्टी बातें मान के पहुंचा चतुर्गति जेल में,
महापुण्य से अब आया मैं जिन मंदिर के द्वार पे,
वीतराग सर्वज्ञ को निरखा दो नयनों के द्वार से,
माँ जिनवाणी सुनकर के उद्धार हो गया,
मुझे अपने रत्नों का भांडार मिल गया,
मैं तो अपने आप से निहाल हो गया,
सम्यक् दर्शन करके मैं खुशहाल हो गया।
काया की काठी आत्मा का घोडा
काया की काठी आत्मा का घोडा,
आत्मा पे मारा जो ज्ञान का हथोडा,
दौड़ा दौड़ा दौड़ा चेतन मुनि शरण में दौड़ा.
गुरुवर गुरुवर गुरुवर गुरुवर
मिले गुरु ज्ञानी बोले मृदु वाणी,
सत्य अहिंसा पालन कर जीवों पर तू दया कर,
सत्यम् सत्यम् सत्यम् सत्यम् ।।१।।
काया की काठी…
प्रभु देना शक्ति, करू तुम्हारी भक्ति,
जिन मंदिर में जाऊंगा, प्रभु को शीश झुकाउंगा,
अरिहंत अरिहंत अरिहंत अरिहंत ।।२।।
अरिहंत बोलो आत्मा, सिद्ध बोलो आत्मा
काया की काठी…
जैन श्रावक महिमा
प्रभु दर्शन नित करते, रात्रि भोजन तजते,
पियें छानकर पानी, सुने सदा जिनवाणी ।।१।।
कभी अभक्ष्य न खाते, जीव दया चित लाते,
सप्त व्यसन के त्यागी, संयम से अनुरागी ।।२।।
वस्तुस्वरुप समझते, शुद्धतम को भजते.
जायत प्रज्ञा छैनी, वे ही सच्चे जैनी ।।३।।
सोचो जरा कहता क्या है जैन धर्म
सोचो जरा कहता क्या है जैन धर्म,
बड़ी मुश्किल से पाया है मानुष जनम,
सिद्ध सी सभी की आत्मा -२
।।धृ।।
पाया मानुष जनम तो. क्यों इसको तू गवाता है?
उठकर सबेरे रोज तू, मंदिर क्यों नहीं जाता है?
रोज तू मंदिर को जा प्रभु के दर्शन को पा
अपना कल्याण कर तत्व की पहचान कर ।।१।।
सिद्ध सी सभी की आत्मा -२
रात्रि भोजन त्याग कर, पानी पीना छान कर,
जीवों पर तू दया कर, दुख से बेडा पार कर,
हिंसा को त्याग कर, अहिंसा को पाल कर,
प्राणी को उपदेश दो, जियो और जीने दो ।।२।।
सिद्ध सी सभी की आत्मा -२
सोचो जरा कहता क्या है जैन धर्म…
पाँच व्रत
त्याग मोह सम्यक प्रगटावे, ये संकल्प हमारा है।
हिंसा छोड़, अहिंसा पाले, यह कर्तव्य हमारा है ||१||
सत्य निष्ठ हो रहे प्रामाणिक, यह व्यवहार हमारा है।
चोरी छोड़ अचौर्य सु पाले, यह आचार हमारा है ||२॥
विषय भोग तज ब्रम्हचर्य धारें, ये ही हमको प्यारा है।
परिगृह तज संतोषी रहना, यह कर्तव्य हमारा है ||३||
वह मेरा भगवान हैं
जिसने रागद्वेष को जीता, वह मेरा भगवान हैं,
जिसने लोकालोक को जाना, वह मेरा भगवान हैं,
जिसने हित उपदेश दिया, वह मेरा भगवान हैं,
चाहे जो भी नाम हो उसका, वह मेरा भगवान हैं।
छह द्रव्य संख्या
जीव द्रव्य हैं अनंत, पुद्गल अनंतानंत,
धर्म अधर्म आकाश, एक एक जानिए ।।१।।
कहे जिन आगम में, समझो सुयुक्ति से,
काल द्रव्य असंख्यात, लोक प्रमाण मानिए ।।२।।
विश्व है इन्ही छह द्रव्यों का मेला,
चेतना स्वरुप जीव सदा है अकेला ।।३।।
सदा है अकेला किन्तु नहीं अधूरा,
प्रभु हैं स्वाभाव से ही सदा काल पूरा ।।४।।
निजस्तुती
देख तेरे पर्याय की हालत क्या हो गई भगवान
तु तो गुण अनंत की खान ।
चिदानन्द चैतन्यराज क्यों अपने से अनजान
तुझमें वैभव भरा महान ।। १।।
बडा पुण्य अवसर यह आया, श्री जिनवरके दर्शन पाया
भने निज को निजमें ध्याया, शाश्वत सुखमय वैभव पाया
सिलिए श्री जिन कहते है, कर लो भेद विज्ञान ।।१।।
न चेतन को भिन्न पिछानो, रत्नत्रयकी महिमा जानो।
को निज परको पर जानो, रागभाव से मुक्ति न मानो।
सप्ततत्त्व की यहि प्रतीति, देगी मुक्ति महान ।।२।।
मोक्ष के प्रेमी
मोक्ष के प्रेमी हमने कर्मों से लडते देखे
मखमल पर सोनेवाले भूमि पर पडते देखे ।।धृ.।।
सरसों का दाना जिनके बिस्तर पर चूभता था
काया की सुध नाही गीधड तन भखते देखे ।।१।।
अर्जुन व भीम जिनके बल का न पार था
आत्मोन्नति के कारण अग्निमें जलते देखे ।।२।।
सेठ सुदर्शन प्यारा रानि ने फंदा डाला
शील को नाहीं छोडा सूली पर चढते देखे ।।३।।
बौद्धों का जोर था जब निकलंक देव देखे
धर्मोन्नती के लिए मस्तक तक कटते देखे १।४।।
हे पारसनाथ स्वामी, तद्भव मोक्षगामी
कर्मोंने नाही छोडा, पत्थर तक पडते देखे ।।५।।
भोगोंको त्याग चेतन, जीवन है बीता जाये
तृष्णा ना पूरी हुी, अर्थीपर चढते देखे ।।६।।
कला बहात्तर जीवकी तामें दो सरदार
एक जीव की जीविका दूजा जीवोद्धार
मनुष जनम
मनुष जनम अनमोल है, माटी में ना घोल रे
अब के मिला है फिर न मिलेगा कभी नही.. ३
तू बुलबुला है पानीका, मत कर मान जवानी का
नेक कमाई करले बंदे, पता नहीं जिंदगानी का
मीठी वाणी बोल रे माटी में ना घोल रे…।।१।।
तू सतसंग में जाया कर, गीत प्रभु के गाया कर
सौज सवेरे बैठ के बंदे, ध्यान उन्हीं का लगाया कर
दाव बडा अनमोल रे माटी में ना घोल रे…।।२।।
स्वारथ का संसार है, मत कर इसका ऐतबार है
सोच समझकर देखले बंदे, फूल नही अंगार है
मन की आँखे खोल रे, माटी में ना घोल रे … ।।३।।
आया कहाँ से
आया कहाँ से कहाँ है जाना
ढूँढ ले ठिकाना चेतन हुँढ ले ठिकाना
सब कुछ तो जाना, निज को जाना
कैसा ज्ञान धारी तूने आपा ना पहिचाना ।।धृ.।।
एक दिन तेरा गोरा तन ये मिट्टी में मिल जायेगा
कुटुंब कबीला खंडा रहेगा कोई बचा ना पायेगा
नहीं चलेगा कोई बहाना ।।१।।
बाहर सुख को खोज रहा है बनता क्यों दिवाना रे
आतम ही सुखधाम है चेतन, निज को भूल न जाना रे
सारे सुखों का ये है खजाना …।।२।।
जब तक तनमें सांसे चलती सब तुझको अपनायेंगे
जब न रहेंगे प्राण ही तनमें, देख तुझे घबरायेंगे
कहीं तो तुझको पडेगा जाना …।।३।।
धन दौलत और रूप खजाना, यही धरा रह जायेगा,
दौलत के दिवानों सुन लो, कुछ भी साथ न जायेगा,
आया अकेला, अकेला ही जाना…।।४।।
सद्गुरु जगा रहे है चेतन, सुन भवसे तर जायेगा
सम्यकदर्शन ज्ञान से चेतन, दुःख सारा मिट जायेगा
सच्चे सुखोंका ये है खजाना …।।५।।
भील की कहानी
एक भील रहता था बनमें । डुबा रहता था चिंतन में ।
इक मुनिवर के दर्शन पाये । दर्शन करके खुश हो जाये ।
मुनिवरसे बोला कुछ नियम दिला दो ।
सच्चे धर्म की राह बता दो ।
मुनिवर ने इक नियम दिलाया, सुनकर मनमें अति हर्षाया
कौवे का न खाना मांस । फिर चाहे चली जाये श्वास ।
एक बार भील हो गया बीमार ।
वैद्यराज ने फिर किया विचार।
कौवे का यदि मांस खाओ । अपने प्राण अभी बचाओ ।
नियम पर था पूरा विश्वास । कौवे का न खाया मांस ।
भील ने भर ली अंतिम सांस । सभी हो गये मनमें उदास।
मर कर भील ने सुरगति पाई ।
एक नियम की महिमा छायी।
गिनती
एक आत्मा होती है कौन ? - मैं
दो जीव होते है कौनसे ? - संसारी, मुक्त
दो भाव होते है कौनसे ? - शुद्ध, अशुद्ध
दो भेद होते है कौनसे ? - शुभ, अशुभ
तीन रत्न होते है कौनसे ? - सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र
तीन गुप्ति होती है कौनसी? मन, वचन, काय
तीन योग होते है कौनसे ? मन, वचन, काय
तीन काल होते है कौनसे ? - भूत, वर्तमान, भविष्य
तीन लोक होते है कौनसे ? - उर्ध्व, मध्य, अधो
चार कषाय होती है कौनसी?- क्रोध, मान, माया, लोभ
बार मंगल होते है कौनसे ? अरिहंत, सिद्ध, साधू,
केवली भगवान के द्वारा बताया गया वीतराग धर्म
चार उत्तम होते है कौनसे? - अरिहंत, सिद्ध, साधू,
केवली भगवान के द्वारा बताया गया वीतराग धर्म
बार शरण होते है कौनसे? - अरिहंत, सिद्ध, साधू,
केवली भगवान के द्वारा बताया गया वीतराग धर्म
चार अनुयोग होते है कौनसे ?- प्रथमानुयोग, करणानुयोग,
चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग
बार गतियाँ होती है कौनसी?- देव, मनुष्य, नरक, तिर्यंच
पाँच परमेष्ठी होते है कौनसे ?- अरिहंत, सिद्ध, आचार्य,
उपाध्याय, साधू
पाँच पाप होते है कौनसे ?- हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील,
परिग्रह
पाँच इंद्रियाँ होती है कौनसी? स्पर्श, रसना, प्राण,
चक्षु, कर्ण
पाँच परमागम होते है कौनसे ?- समवसार, नियमसार,
प्रवचनसार, पंचास्तिकाय,
अष्टपाहूड
पाँच कल्याणक होते है कौनसे ? गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,
निर्वाण
छह द्रव्य होते है कौनसे ? जीव, पुद्गल, धर्म,
अधर्म, आकाश, काल
छह आवश्यक होते है कौनसे ? - देवपूजा, गुरुपास्ति,
स्वाध्याय, संयम, तप, दान
छह लेश्या होती है कौनसी? - कृष्ण, नील, कापोत,
पीत, पद्म, शुक्ल
सात तत्त्व होते है कौनसे ? जीव, अजीव, आस्त्रव,
बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष
सात व्यसन होते है कौनसे? - जुआ, मांस, मदिरा,
वेश्यासेवन, शिकार, चोरी, परस्त्रीसेवन।
आठ पूजा के द्रव्य होते है कौनसे ?- जल, चंदन,
अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल
आठ कर्म होते है कौनसे ? - ज्ञानावरण, दर्शनावरण,
मोहनीय अंतराय, वेदनीय, आयु, नाम, गोत्र
आठ मुलगुण होते है कौनसे? - मद्य, मांस, मधु, बड,
पिपल, पाकर, उमर, कुटुंबर
आठ सम्यकदर्शन के अंग होते है कौनसे? - निःशंकित,
निकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टि,
उपगूहन, स्थितीकरण, वात्सल्य, प्रभावना
नौ पदार्थ होते है कौनसे ? जीव, अजीव, आस्त्रव,
पुण्य, पाप, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष
दश धर्म होते है कौनसे ?- क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य,
शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य
टन टन टन टन टेलिफोन सिद्ध प्रभु का आया फोन ।
यह दुनिया है अजब निराली, चार गति में दुःख है भारी।
इन दुःखोंकी बात सुने तो, चेतन हो गया बिल्कुल मौन।
चार गतिमें अब न रहूँगा, सम्यक् दर्शन अभी करूँगा।
सिद्ध प्रभु सच्चे साथी है, इस दुनिया में अपना कौन?
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु ने यह संदेश सुनाया है।
जो होना है निश्चित है, वस्तुस्वभाव में आया है।
आतम स्वयं भगवान है
चिंतामणी सम स्वयं का, चेतन तत्व महान है।
निज का करूँ मैं चिंतवन, निज का करूँ श्रद्धान मैं ।।
शुद्धात्मा ही देव हैं, जो गुण अनंत निधान है ।
मैं स्वानुभव में देख लूँ, आतम स्वयं भगवान है ।।
आत्मभावना
आत्मा का ज्ञान हो, और आत्मा का ध्यान हो ।
आत्मा से ही मेरी, संसार में पहचान हो ।।
आत्मा में दिन उदय हो, आत्मा में रात हो ।
आत्मा अनुभव में आवे, आत्मा की बात हो ।।
आत्मा की भावना में, ही मेरा अवसान हो ।
आत्मा के ध्यान में ही मेरा, पुनरुत्थान हो ।।
सम्यक दर्शन प्राप्त करेंगे
सम्यक दर्शन प्राप्त करेंगे, सप्त भयोंसे नहीं डरेंगे ।
सप्त तत्व का ज्ञान करेंगे, जीव अजीव पहचान करेंगे ।।
स्व पर भेद विज्ञान करेंगे, निजानंद का पान करेंगे ।
पंच प्रभु का ध्यान धरेंगे, गुरुजन का सम्मान करेंगे ।।
जिनवाणी का श्रवण करेंगे, पठन करेंगे, मनन करेंगे ।
रात्री भोजन नहीं करेंगे, बिना छना जल काम न लेंगे ।।
निज स्वभाव को प्राप्त करेंगे, मोह भाव का नाश करेंगे ।
राग द्वेष का त्याग करेंगे, भक्त नहीं भगवान बनेंगे ।।
अनुभव मोक्ष स्वरूप
जे स्वरूप समझ्या विना, पाम्यो दुःख अनंत ।
समझाऊँ ते पद नर्मू, श्री सद्गुरु भगवंत ।।
वस्तु विचारत ध्यावते, मन पावे विश्राम।
रस स्वादत सुख उपजे, अनुभव याको नाम ।।
अनुभव चिंतामणी रतन, अनुभव है रसकुप ।
अनुभव मारग मोक्षको, अनुभव मोक्ष स्वरूप ।।
आज रविवार है, छुट्टी का त्योहार है।
जिन मंदिर में जाना है, पूजा पाठ रचाना है ।।
पाठशालाको जाना है, ज्ञान खजाना पाना है।
खुद पर निर्भर रहो
कब चिंटी किससे कहती है, दाना पानी लाओ ।
कब चिडिया किससे कहती है, अनाज मुझे दे जाओ ।।
कहाँ नौकरी अजगर करता, किसका भरता पानी ।
बादल कब किससे कहता है, ला दो भरकर पानी ।।
कीट पतंगे जंतु अनगिनत, किसपर निर्भर रहते ।
अपना काम सभी है करते, खुद पर निर्भर रहते ।।
गिनती
नंबर इज द वन, तू सत्यवादी बन ।
नंबर इज द टू, तू आत्मा को छू ।
नंबर इज द थ्री, तू पाप से हो जा फ्री ।
नंबर इज द फोर, तू मत बन चोर ।
नंबर इज द फाइव्ह, मस्त बनाओ लाइफ ।
नंबर इज द सिक्स, पाठशाला टाइम फिक्स ।
नंबर इज द सेव्हन, मुक्ति का मार्ग ए वन ।
नंबर इज द एट, अब खोलो मोक्ष का गेट ।
नंबर इज द नाइन, जिनवर की मुद्रा फाईन ।
नंबर इज द टेन, हम बनेंगे सच्चे जैन ।
ध्यान
मैं हूँ आत्मा, परमात्मा ।
मुझमें राग नहीं, मुझमें द्वेष नहीं ।
मैं तो आनंद का, आनंद का, आनंद का धाम ।
अपना स्वरूप
शुद्धात्म स्वरूपोऽहं परमार्थ स्वरूपोऽहं ।
सहजात्म स्वरूपोऽहं सत्यार्थ स्वरूपोऽहं ।
अविकार स्वरूपोऽहं भूतार्थ स्वरूपोऽहं ।
निर्धार स्वरूपोऽहं पुरषार्थ स्वरूपोऽहं ।
अध्यात्म स्वरूपोऽहं तत्त्वार्थ स्वरूपोऽहं ।
परमात्म स्वरूपोऽहं भव्यार्थ स्वरूपोऽहं ।
चिन्मय चिद्रूपोऽहम् अरहंत स्वरूपोऽहं ।
भगवान स्वरूपोऽहं सर्वज्ञ स्वरूपोऽहं ।
प्रभु सिद्ध स्वरूपोऽहं आत्मज्ञ स्वरूपोऽहं ।
आतमा हमारा
आतमा हमारा हुआ है क्यों काला?
राग से है मैला हुआ है झमेला ।
दौड़ा दौड़ा दौड़ा चेतन चार गति में दौडा ॥धृ॥
मनुष्य गति में पहुंचा, दुनिया को जब देखा,
मान में गवायाँ जीवन भटक गयी फिर नौका ।
मान करोगे? नहीं नहीं,
राग करोगे? नहीं नहीं.
दौड़ा दौड़ा दौड़ा चेतन मुक्तिपुरी में दौड़ा ||१||
तिर्यंच गति में पहुंचा, दुनिया को जब देखा,
माया में गवायाँ जीवन भटक गयी फिर नौका ।
माया करोगे? नहीं नहीं,
छल करोगे? नहीं नहीं.
दौड़ा दौड़ा दौड़ा चेतन मुक्तिपुरी में दौड़ा ||२||
नरक गति में पहुंचा, वहां के दुःख को देखा,
क्रोध में गवायों जीवन भटक गयी फिर नौका ।
क्रोध करोगे? नहीं नहीं,
गुस्सा करोगे? नहीं नहीं,
दौड़ा दौड़ा दौड़ा चेतन मुक्तिपुरी में दौड़ा ||३||
देव गति में पहुंचा, देवों को जब देखा,
लोभ में गवायाँ जीवन भटक गयी फिर नौका ।
लोभ करोगे? नहीं नहीं,
लालच करोगे? नहीं नहीं,
दौड़ा दौड़ा दौड़ा चेतन, मुक्तिपुरी में दौड़ा ||५||
वे ही कर्म के मूल
जो रागादी जीव के तो कहूँ मूल स्वभाव ।
तो होते शिवलोक में देख चतुर कर ध्यान ॥
रागादिक सी जिन जब जीव भयो जिकाल ।
तबहिं पायी मुक्तिपद, तरी कर्म के जाल ॥
ये ही कर्म के मूल हैं रागद्वेष परिणाम ।
इन ही से सब होने हैं कर्म बंध के नाम ॥
भैया भगवती दास
करनी का फल
इस जनम में नहीं मिले पर भव में मिलता है।
अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है ॥ धृ ॥
एक फूल वो है जो माथेपर सजता है।
एक फूल वो है जो अर्थीपर चढ़ता है ।।
फूल दोनों एक ही बगिया में खिलते हैं।
अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है ||१||
एक पत्थर वो है जो सड़कों पे बिछता है।
एक पत्थर वो है जिसकी मूरत बनती है ||
पत्थर दोनों एक ही खानसे निकले है।
अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है ॥२॥
एक भाई वो है जो भोगों में रमता है।
एक भाई वो है जो मुनीराज बनता है ।।
भाई दोनों एक ही माता से जन्मे है।
अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है ॥३॥
मैं ही सिद्ध परमात्मा
मैं ही सिद्ध परमात्मा, मैं ही आतमराम ।
मैं ही जाता ज्ञेय को, चेतन मेरो नाम ||१||
मोही बांधत कर्म को, निर्मोही छुट जाय।
ताते गाढ़ प्रयत्न से, निर्ममता उपजाय ||२||
काहे को भटकल फिरे, सिद्ध होने के काज ।
रागद्वेष को त्याग दे, भैया सुगम इलाज ||३||
रागद्वेष के त्याग बिन, परमातम पद नहीं ।
कोटी कोटी जप तप करो, सब ही अकारथ जाय ||४||
लाख पते की बात यह, कोटि ग्रंथ का सार ।
जो चाहे सुख भ्रांत तो, आतम अनुभव धार ||५||
पांच पाप
हिंसा छोड़ो झूट छोड़ो, चोरी कुशील परिग्रह छोड़ो।
जग विषयोंसे मुख को मोड़ो, मुक्ति मार्ग में परिणति जोड़ो ||
छोड़ो छोड़ो पांचो पाप, करते हैं वे महा संताप ।
तब ही होगा मेरा कल्याण, कहते है वीर भगवान ||
अपना स्वरुप
शुद्धात्म स्वरुपोहं । सहजात्म स्वरूपोहं ||
अविकार स्वरूपोहं । निर्भार स्वरूपोहं ||
अध्यात्म स्वरूपोहं । परमात्म स्वरूपोहं ||
चिन्मय चिद्रुपोहं । भगवान स्वरुपोहं ||
प्रभु सिद्ध स्वरूपोहं । परमार्थ स्वरूपोहं ||
सत्यार्थ स्वरूपोहं । भुतार्थ स्वरूपोहं ||
पुरुषार्थ स्वरूपोहं । तत्वार्थ स्वरूपोहं ||
भव्यार्थ स्वरूपोहं । अरहंत स्वरूपोहं ||
सर्वज्ञ स्वरूपोहं । आत्मज्ञ स्वरूपोहं ||
जय जिनेन्द्र
जैन पाठशाला
अच्छे बच्चे
अच्छे बच्चे वे होते है. प्रातः सवेरे उठते हैं।
प्रतिदिन मंदिरजी जाकर ही. भोजन अपना करते हैं।
माता पिता की सेवा करते, जी लगाकर पढ़ते हैं।
चीज किसीकी नहीं चुराते, झूठ कभी नहीं कहते हैं।
रात्रि में भोजन नहीं करते, जल्दी ही सो जाते हैं।
नहीं झगड़ते कभी किसीसे, आदर सबका करते हैं।
चेतन
एक था चेतन गतियाँ चार, दुःख का देखा कभी न पार।
नरक से निकले, तिर्यंच में आये, नर सुर गति में भी दुःख पाये।
चारों गति से थककर आये, जिनवाणी के वचन सुहाए।
हमने देखा है जग सारा, भगवान आत्मा सबसे प्यारा।
चेतन राजा
चेतन राजा कहाँ गए थे? देह में छिपकर सो रहे थे।
चार गति में रो रहे थे, मोक्ष में जाके हंस रहे थे।
मंदिरजी में आना तुम, परमातम सम ध्याना तुमा
रत्नत्रय को पाना तुम, मुनिराज बन जाना तुमा
जंगल में चले जाना तुम, आतम ध्यान लगाना तुम।
अष्टकर्म को नाश के, मोक्षपुरी में जाना तुम।
चेतन राजा जाना तुम, मोक्षपुरी में जाना तुम।
बारह भावना
जग है अनित्य लामें, शरण न वस्तु कोय।
त्ताते दुःख रासी, भव वास को निहारिये ||
एक चिद् चिन्ह भिन्त, सदा परद्रव्य निते।
अशुचि शरीर में न, आपा बुद्धि धारिये ||
रागादिक भाव करें, कर्म को बढ़ावे ताते।
सवर स्वरुप होय, कर्म बंध टारिये ||
तीन लोक माही. जिन धर्म एक दुर्लभ है।
ताते जिन धर्म को न, छिनहूँ बिसारिये ||
पीड़ा
पीड़ा अच्छी नहीं लगे तो, किसी को पीडा न देना।
झगडा अच्छा नहीं लगे तो, किसीसे झगडा नहीं करना।
निंदा खुद की सुन न सको तो, निंदा किसीकी न करना।
गाली अच्छी कभी न होती. तुम भी गाली न देना।
भूखे प्यासे रह न सको तो. सब मिलकर खाना पीना।
चोरी अच्छी कभी न होती, तुम भी चोरी न करना।
झूठ बोलना बुरी बात है. झूठ कभी न कहना।
झूठा भोजन कर न सको तो, झूठा किसीको न देना।
प्रार्थना
सब विकार भावों को जीता, जाने तीनो लोकों को।
मोक्षमार्ग के हित उपदेशक, वंदन बारम्बार अहो।
नहीं इन्द्रिय विषयों की इच्छा, नहीं आरंभ परिग्रह हो।
जान ध्यान तप में रत रहते. सद् गुरु सद् वंदन हो।
सत्य अहिंसा अनेकांतमय, वस्तु स्वभाव धर्म जय हो।
नित प्रति चिंतन मनन करू प्रभु, मेरे भव दुःख का क्षय हो।
हिंसा झूट विभाव न होवे, परवस्तु पर न दृष्टि हो।
ब्रम्हचर्य मय जीवन होवे, न भोगों की मुर्छा हो।
गुस्सा न हो परिणामों में, अहंकार का भाव न हो।
योगों में सदा सरलला, संतोष सदा जीवन में हो।
अरहंत प्रभु के द्रव्य गुणों, और पर्यायों का चितवन हो।
वीतराग प्रभु की भक्ति का, वीतरागतामय फल हो।
षट् आवश्यक
जिनवर पुजा मंगलकारी, गुरु उपासना आनंदकारी।
स्वाध्याय सत् ज्ञान प्रकाशे, संयम से सब दुःख विनाशे।
तप सब कर्म नशावन हारा, उत्तम दान सर्व सुखकारा
षट् आवश्यक नित पलिजे, धर्म आराधन में चित दीजिये।
धर्म के दश लक्षण
सम्यक दर्शन ज्ञान संहित हैं, यही धर्म के लक्षण।
क्षमा मार्दव आर्जव सत्य शौच संयम ||१||
तप त्याग अकिंचन ब्रम्हचर्य सुखकर हैं।
इनको धरो जीवन में, होगा बेडा पार हैं।।२।।
पांच पाप पांच परमेष्ठी
सुनो सुनो भाई पांच पाप हैं। परमेष्ठी भगवान् पांच हैं।।
पांच पाप को तजना हैं। परमेष्ठी को भजना हैं।।
इनसे ही दुःख नशता हैं। सुख का मारग मिलता है।।
होने योग्य सहज ही होता। स्वाश्रय से ही शिवसुख होता।।
नरतन पाया बड़े भाग्य से
नरतन पाया बड़े भाग्य से, अब तो सुन लो जिनवाणी।
काहे मोह में पड़े हुए हो, बीत रही हैं जिंदगानी ||
करो मनन तुम शुद्धातम का, संयम तप और दान करो।
सत् संगतिसे धर्म के द्वारा, तुम अपना कल्याण करो ||
चार कषाय
क्रोध मान अरु माया लोभा त्यागे से जीवन की शोभा।
दर्शन जान चरित्र तप भाई आराधन है शिव सुख दायी ||
चार कषायों को झट त्यागो, आराधन में चित को पागो।
तभी तुम्हारा दुःख मिटेगा तभी निराकुल सुख मिलेगा ||
एक गाँव में ग्वाला था
एक गाँव में ग्वाला था, वो तो भोला भाला था.
गया एक दिन वन की ओर, आग लगी थी चारो ओर,
उसने देखी अद्भुत चीज, हरा पेड़ था आग के बीच,
जाकर पास उसने देखा, पेड़ में छोटा कोटर था,
महिमामयी ग्रंथ पाया, फिर उसका मन्न हर्षाया,
खुशी खुशी से आया घर, उचित स्थान विराजितकर,
सोचा मैं तो बुद्ध हूँ, महान ग्रंथ यह किसको दूँ,
एक दिवस मुनि को वन में, अरे देख सोचा मन में,
यह तो कोई भगवान है, लगते ये महान जन हैं,
लाकर ग्रंथ प्रदान किया, महान शास्त्र का दान दिया,
उसको जो उपदेश मिला, उससे सत् संस्कार पड़ा.
उन सत् के संस्कारों से, कुंदकुंद यह बना अरे,
भव्य जर्नी अब हम सब भी, जो है सत् संस्कार सभी,
उनको आदर्श बनाये हम, जीवन में अपनाये हम,
ज्ञान संस्कारों को पाकर, कुंदकुंद बन जाये हम।
अन्तरंग सात व्यसन
पुण्य लाभप्रद पाप हानिप्रद अरे! जुआ का व्यसन यहीं।
मांसल तन में मोहित रहना, मांसाहार कहा यह ही।।
स्वपर भेद विज्ञान न होना, भ्रम मदिरा का पीना है।
मिथ्यातम का सेवन करना, वेश्या सेवन करना है।।
राग द्वेष कर भाव प्राण की, हिंसा यही शिकार अरे।
पर द्रव्यों को अपना कहता, वह चोरी का पाप अरे ।।
जो आसक्त परिग्रह में वह, पर नारी सेवन करता।
ग करो ये सात व्यसन तुम, अगर पाप से डर लगता।।
एक था मेंढक फूल लिए
एक था मेंढक फूल लिए, कुआँ किनारे सोच रहे.
प्रभु दर्शन को जाना है, फुदक फुदक कर जाते थे,
नर नारी सब जाते थे, बच्चे भी मुस्काते थे,
हाथी ऊपर बैठ कर, राजाजी एक जाते थे,
कोई न देखे भीड़ में, मेंढक दब गया भीड़ में,
प्रभु पूजा के भाव से, मेंढक पहुंचा स्वर्ग में,
समवशरण की आन में, वीर प्रभु के सामने,
राजाजी से पहले आया, सम्यक्दर्शन उसने पाया।
उठे सबके कदम
उठे सबके कदम मंदिर की तरफ, जिनवाणी को पढ़ा करो.
कभी ज्ञान कभी ध्यान, कभी ध्यान कभी ज्ञान,
कभी तत्वों की चर्चा करो ॥धृ॥
मेरे अच्छे अच्छे दादा, मेरी प्यारी प्यारी दादी,
रोज कहानी सुनाया करो,
कभी मैना कभी सुंदरी, कभी राम कभी सीता,
कभी मुनिवर की सुनाया करो ।।१।।
उठे सबके कदम…
मेरे अच्छे अच्छे पापा, मेरी प्यारी प्यारी मम्मी,
कभी चौका लगाया करो,
कभी मुनि कभी आर्यिका, कभी ऐलक कभी क्षुल्लक,
कभी दोनों पड़गाया करो ।।२।।
उठे सबके कदम…
मेरे अच्छे अच्छे भैया, मेरी प्यारी प्यारी बहना,
पाठशाला रोज आया करो,
कभी भाग कभी ढाल, कभी सूत्र कभी पाठ,
कभी दोनों पढाया करो ।।३।।
उठे सबके कदम…
मेरे अच्छे अच्छे चाचा, मेरी प्यारी प्यारी चाची,
कभी तीरथ कर आया करो,
कभी मांगी कभी तुंगी, कभी ऊन कभी पावा,
कभी शिखरजी कर आया करो ।।४।।
उठे सबके कदम…
मेरे अच्छे अच्छे भैया, मेरी प्यारी प्यारी भाभी,
रोज मंदिरजी जाया करो,
कभी दर्शन कभी अभिषेक, कभी पूजन कभी स्वाध्याय,
कभी दोनों कर आया करो ।।५।।
उठे सबके कदम…
क्रोध बड़ा शैतान है
क्रोध बड़ा शैतान है, खाता सारा जान है,
क्रोध शांति का दुश्मन है, रखता घर में अनबन है,
क्रोध दया से मिटता है, क्रोधी मानव पिटता है,
क्रोध बढे तो चुप रहो, अपने में ही गुप्प रहो।
जय जिनेन्द्र
साँची प्यारी बात कहूँगा
निंदा चुगली नहीं करूँगा
नहीं किसी की हँसी उडाऊँ
सुंदर भजन गीत मैं गाऊँ
आदर और विनय से बोलूँ
सोच समझ अपना मुख खोलू।
हाथोंसे
हाथोंसे आशिर्वाद दूँ
हाथोंसे ही स्नेह दूँ ।
हाथ उठाकर करूँ समर्थन
सत्कार्यों का सदा समर्थन
हाथ उठाऊँ नहीं कभी मैं
सज्जन अथवा असमर्थों पर
हाथ बटाऊँ उत्साहित हो
उठता जाएँ जीवन उपर
कान से
गंदी बातें नहीं सुनूँगा
निंदा चुगली नहीं सुनूँगा
सदा बडों की बात सुनूँगा
दुखियोंकी पुकार सुनूँगा
गुरूओंका उपदेश सुनूँगा
अवसरपर ललकार सुनूँगा
अच्छे अच्छे काम करूँगा
नहीं कभी फटकार सुनूँगा
पैरोंसे
धर्मकार्यमें दौडा जाऊँ
सेवा करने दौडा जाऊँ
बडे पुकारे जल्दी जाऊँ
दुःखी पुकारे जल्दी जाऊँ
नहीं किसी को ठोकर मारूँ
नहीं चलूँगा टेढी चाल
कोई प्राणी दुःख न पावें
पाव रखूँगा सदा सम्हाल
हाथ जोडकर विनय करूँगा
सेवा और सहयोग करूँगा
हर्ष सहित मैं दान करूँगा
आवश्यक श्रमदान करूँगा
अरे गंदगी साफ करूँगा
अवसर पर हथियार उठाकर
विघ्न अरक्षा दूर करूँगा
रखकर हाथ पे हाथ अहो मैं
प्रभुसम आतम ध्यान करूँगा ।
आँखोंसे
भक्ति से भगवान को देखें
आदर से गुरूओं को देखें
छोटों को स्नेह से देखें
दुखियों को करूणा से देखें
परवस्तु को पर ही देखें
लडकों को भाई सम देखें
हर लडकी को बहन बराबर
बुरे भावसे कभी न देखें
बैठ कभी अंतर में देखें
अपने परमातम को देखें
मनसे
सदा करूँगा तत्व विचार
सदा करूँगा श्रेष्ठ विचार
हिंसा का नहीं करूँ विचार
चोरी का नहीं करूँ विचार
शीलवान हो संतोषी हो
सादा जीवन उच्च विचार
नेक बनूँगा शिष्ट बनूँगा
दूर करूँगा भ्रष्टाचार
चेतनसे
ओऽ रे चेतन बावरे
तू पर को मत अपनाना रे
तू है ज्ञानानंद स्वभावी
तू है सहजानंद स्वभावी
निज स्वभाव में आना रे
ज्ञाता दृष्टा रहना रे ।।
प्रश्नोत्तरी
१) धर्म किसे कहते है?
वस्तु के स्वभाव को धर्म कहते है।
२) वस्तु का स्वभाव क्या है?
जिसके बिना वस्तु रह नहीं सकती, वही वस्तु का स्वभाव है। जैसे शक्कर-मिठास।
३) रत्नत्रय किसे कहते है?
सम्यकदर्शन, ज्ञान, चारित्र को रत्नत्रय कहते है।
४) दशधर्म कौन कौन से है?
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य,
उत्तम ब्रह्मचर्य।
५) दशधर्म अलग अलग है?
नहीं, उपरोक्त दशधर्म एक आत्म स्वभाव के दशलक्षण है।
६) उत्तम क्षमा किसे कहते है?
आत्मा में क्रोधकी उत्पत्ती न होना, समता स्वभावमें रहना, इसे उत्तम क्षमा कहते है।
७) उत्तम मार्दव किसे कहते है?
आत्मा में मान की उत्पत्ती न होना, कषाय नहीं करना, इसे उत्तम मार्दव कहते है।
८) उत्तम आर्जव किसे कहते है?
आत्मामें कुटील परिणाम उत्पन्न न होना, सरलता रखना, इसे उत्तम आर्जव कहते है।
९) उत्तम सत्य किसे कहते है?
असत्य भाषण का त्याग करना, हमेशा सत्य बोलना, इसे उत्तम सत्य कहते है।
१०) उत्तम शौच किसे कहते है?
आत्मामें लोभ भाव की उत्पत्ती न होना, निर्लोभ रहना, इसे उत्तम शौच कहते है।
११) उत्तम संयम किसे कहते है?
छह काय के जीवों की रक्षा करना, इंद्रिय और मन को वशमें करना, इसे उत्तम संयम कहते है।
१२) उत्तम तप किसे कहते है?
सांसारिक विषयोंकी इच्छा को रोकना, इसे उत्तम तप कहते है।
१३) उत्तम त्याग किसे कहते है?
पंचइंद्रिय के विषयोंकी आशाओं का त्याग तथा बाह्य अभ्यंतर परिग्रह छोडना, इसे उत्तम त्याग कहते है।
१४) उत्तम आकिंचन्य किसे कहते है?
आत्मामें किंचित मात्र भी अन्य पदार्थ नहीं, ऐसे भावको उत्तम आकिंचन्य कहते है।
१५) उत्तम ब्रह्मचर्य किसे कहते है?
ब्रह्म यानि आत्मा, आत्मामें स्थिर रहना ब्रह्मचर्य है।
एक दोन तीन चार - सात तत्त्व का करो विचार
पाँच छे सात आठ - सम्यक दर्शन पहला पाठ
नौ दस ग्यारा बारा - भगवान आत्मा सबसे प्यारा
तेरा चौदा पंद्रह सोलह - जैन धर्म का बच्चा बोला
सतरह अठारह उन्नीस बीस - भगवान आत्मा मेरी चीज
गुरु स्तवन
निःसंग है जो वायु सम निर्लेप है आकाश से
निज आत्म में ही विहरते जीवन न पर की आस से
जिनके निकट सिंहादि पशु भी भूल जाते क्रूरता
उन दिव्य पुरुषों की अहो कैसी अलौकिक शूरता
आज रविवार है
आज रविवार है
छुट्टी का त्योहार है।
जिन मंदिरमें जाना है
पूजा पाठ रचाना है
पाठशाला को जाना है
ज्ञान खजाना पाना है ।
पाठशाला
कितनी सुंदर कितनी प्यारी
हमारी यह पाठशाला
सबसे न्यारी सबसे प्यारी
अपनी यह पाठशाला
जिनवाणी के गीत सुनाती
सबके मनको भाती
सदाचार हमको सिखलाती
पापों से हमें बचाती ।
अन्य क्षेत्रेकृतं पापं
धर्मक्षेत्रे विनष्यती
धर्मक्षेत्रे कृतं पापं
वज्रलेपो भविष्यती
महावीर कह गये सभी से
जैनी वह कहलायेगा
दिनमें भोजन छान के पानी
नित्य जिनालय जायेगा।
A for Arihant
A for Adinath
कभी न भूलना
B for Bhagwan
इन्ही पूजते रहना
C for Chocolate
चॉकलेट कभी भी नहीं खाना
D for Darshan
एवं नित्य हमें है करना
E for Eating
इटिंग अच्छे कभी न करना
F for False
माने झूठ कभी नहीं कहना
G for God, God is great
उन्हें कभी नहीं भूलना
H for Honest & Happy
Happy सदा ही रहना
I for Intelligent
ज्ञानी हमें है बनना
J for Jeev
जियो और जीने दो
K for Karma
अच्छे कर्म हमें है करना
L for Lakshya
मोक्ष का लक्ष्य हमें है रखना
M for Mokshya
मोक्ष हमें है पाना
N for Nation
देशाभिमानी हमेशा रहना
मेरा भारत महान
ही शुद्ध स्वरूपी, अविनाशी मैं आत्मस्वरूप
काशी ज्ञान हमारा, चिदानंद घन प्राण हमारा
होती सुख धाम हमारा, रहे अटल यह ध्यान हमारा
रे श्री अरिहंत, गुरू हमारे निग्रंथ संत
सदा जयवंत रहो, गुरूदेव सदा जयवंत रहो
ही सदा जयवंत रहो, चैतन्य सदा जयवंत रहो
भले में नहीं मरता, अजर अमर मैं आत्मस्वरूप ।।
O for Out
Out of control कभी नहीं होना,
हमेशा कंट्रोल में रहना
P for Purity
शुद्ध चीजो से ही है करना
Q for Quiet
क्रोध में हमें शांत ही रहना
R for Right
सच्ची संपती में हमे है रहना
S for Swadhaya
स्वाध्याय हमें रोज है करना
T for True
हमेशा सत्यही कहना
U for Unity
हमेशा मिलजुलके रहना
V for Value
Time की Value सदा है करना
W for Watch
आँखे हमेशा खुली ही रखना
बुराईयोसे बचके रहना
X for Xerox माने copy
भगवान की कॉपी हमें है बनना
Y for Yes माने हाँ
हमेशा पॉझिटिव्ह सोचना
Z for Zig-Zag
टेढी चाल कभी नहीं चलना
धर्म के मार्ग पर हमें है चलना
जैन धर्म की रक्षा करना
रक्षा करना, रक्षा करना
मेरा भारत महान
एक चिडिया के बच्चे चार
घर से निकले पंख पसार
पूरब से पश्चिम को जाय
उत्तर से दक्षिण को जाय
वापस अपने घरको आय
मम्मी को ये वचन सुनाय
देख लिया है जग तो सारा
अपना घर है सबसे प्यारा
मेरा भारत महान
ऐसा काम करो
प्रति दिन ऐसा काम करो,
जिसमें रात की नींद सुखमय हो।
आठ महिने ऐसा काम करो,
चातुर्मास धर्ममय हो ।
युवा अवस्था में ऐसा व्यापार करो,
की बुढापा सुख शांतीमय हो ।
आजीवन ऐसा काम करो,
अगला भव अंतिम भव हो ।
जय जिनेंद्र
जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र बोलीये ।
जय जिनेंद्र की ध्वनिसे अपना मौन खोलिए ।
जय जिनेंद्र जय बोलो, जय जिनेंद्र जय ।।धृ।।
जय जिनेंद्र ही हमारा एकमात्र मंत्र हो ।
जय जिनेंद्र बोलने को हर मनुष्य स्वतंत्र हो ।
जय जिनेंद्र बोल बोल खुद जिनेंद्र हो लिए ।।१।।
हे जिनेंद्र ज्ञान दो, मोक्ष का वरदान दो।
कर रहे है प्रार्थना, प्रार्थना पे ध्यान दो ।
राग छोड धर्म जोड खुद जिनेंद्र हो लिए ॥२॥
पाप छोड पुण्य छोड हे जिनेंद्र देशना ।
अष्ट कर्म को मरोड हे जिनेंद्र देशना।
जाग जाग जाग चेतन बहुत काल सो लिए ।।३।।
सिद्धोंके दरबार में
हमको भी बुलवालो स्वामी सिद्धोंके दरबार में
गस्थान की सैर करेंगे उर्ध्वगमन रफ्तार में ।।५।।
जीवादिक सातों तत्त्वोंकी, सच्ची श्रद्धा हो जाए
भेदज्ञानसे हमको भी प्रभु, सम्यक्दर्शन हो जाए
मातम के कारण स्वामी, हम डूबे संसार में ।॥१॥
द्रव्य का ज्ञान करें हम, निज स्वभाव में आ जाए
मात्रय की नाव बैठकर, मोक्ष भवन को पा जाए
पर्यायों की चकाचौंधसे, बहते है मझधारमें ॥२॥
होनहार टलती नहीं मुरख मनवा रोय/होय ।
निज कर्तव्य करते चलो होनी हो सो होय ।।
मंगल तंत्र
ॐ नमः शुद्धाय ॐ शुद्धं चिदस्मि
मैं ज्ञानमात्र हूँ मेरे स्वरूपमें अन्य का प्रवेश नहीं
अतः निर्धार हूँ ।
मैं सहज ज्ञानमय हूँ मेरे स्वरूप में अपूर्णता नहीं
अतः कृतार्थ हूँ।
मैं सहज आनंदमय हूँ मेरे स्वरूप में कष्ट नहीं
अतः स्वयं तृप्त हूँ ।
ॐ नमः शुद्धाय ॐ शुद्धं चिदस्मि
निज स्तुती
देख तेरे पर्याय की हालत क्या हो गयी भगवान
तू तो गुण अनंत की खान ।
चिदानंद चैतन्य राज क्यों अपने से अनजान
तुझमें वैभव भरा महान ॥धृ॥
बडा पुण्य अवसर यह आया, श्री जिनवर के दर्शन पाया
जिनने निज को निज में ध्याया, शाश्वत सुखमय वैभव पाया
इसीलिए श्री जिन कहते है, कर लो भेद विज्ञान ॥१॥
तन चेतन को भिन्न पिछानो, रत्नत्रय की महिमा जानो ।
निज को निज पर को पर जानो, राग भाव से मुक्ति न मानो
साप्म तत्त्व की यही प्रतीति, देगी मुक्ति महान ।॥२॥
छोडो पर की बातें
छोडो पर की बातें, पर की बात पुरानी ।
निज आतम से शुरु करेंगे, हम तो नयी कहानी ।
मत कर हैरानी, तब दे नादानी ।
हम आतम ज्ञानी हम भेद विज्ञानी ।।५।।
आओ आतम के आनंद की खान बतायें ।
रापत्रय से सजा हुआ भगवान दिखाए ।
निज आतम ही परमातम है, सुख की यही हैं खानी ।।१।।
कमों और पापों की झंझट अब तो छोडो ।
निज की दृष्टि में मुक्तिसे नाता जोडो ।
समयसार है नियमसार है और है माँ जिनवाणी ॥२॥
निज प्रभुता को भूल जगत में, अबतक रोये ।
जिन शासन पाकर यह अवसर अब क्यों खोये ।
गुन अनंत है सुख अनंत है आनंदमय जिंदगानी ।।३।।
जिन मंदिर में जाकर, आतम ध्यान लगाये ।
निज में निज को ध्याकर, परमातम हो जायें ।
यही रीति है यही नीति है, अंतिम लक्ष्य बखानी ।।४।।
आदिनाथ वंदना
तीन लोक के दुःख हरण, करनेवाले हे तुम्हे नमन ।
भूमंडलके निर्मल भूषण, आदिजिनेश्वर तुम्हे नमन ।
हे त्रिभुवन के अखिलेश्वर हो, तुमको बारंबार नमन ।
भवसागर के शोषक, पोषक भव्यजनों के तुम्हे नमन ।।
पाठशाला जाना
चाहे अंधियारा हो, या दूर किनारा हो
आवाज हमें देना, हम दौडे आयेंगे ।
चाहे सर्दी गर्मी हो, या बिजली चमकती हो।
आवाज हमें देना, हम दौडे दौडे आयेंगे ।
हम मंदिर जायेंगे, पूजा रचायेंगे ।
जिनवाणी सुनने को, हम दौडे आयेंगे।
हम पाठशाला जायेंगे, अज्ञान भगाऐंगे ।
जिनवाणी पढने को हम दौडे आयेंगे ।
हम मुनि बन जाऐंगे और ध्यान लगायेंगे ।
आवाज नही देना, हम अभी नहीं आयेंगे ।
हम मुक्तिमें जायेंगे और सिद्ध बन जायेंगे ।
हम चाँद सितारोंसे भी उपर जायेंगे।
आवाज नही देना, हम कभी नहीं आयेंगे ।
दो घडी निज नाथके
दो घडी निज नाथके नजदीक में आओ
अपनी प्रभुता देख लो बाहर ना भरमाओ ।।धृ।।
प्रभुता को ही देखते समकित कहाते
प्रभुता को जो भोगते वो सिद्ध कहाते
प्रभुता की ही बात की श्रद्धा तनिक लाओ ।।१।।
देहादि में रहते हुए भी प्रभुता नहीं जाती
सब कर्मों में रहते हुए भी नहीं हीनता आती
प्रभुता से संपन्न हूँ ऐसा अनुभव लाओ ।।२।।
प्रभुता को ही भूलकर, भव भव में भ्रमाते
दीनता अनुभवनेसे ही दीन कहाते
प्रभुता का अनुभव करो और प्रभुता प्रकटाओ ।।३।।
हरिश्चंद्र की कहानी
हरिश्चंद्र जो बच्चा था, मन का सीधा सच्चा था।
गया बनारस जब पढ्ने, रखे पास रुपये उसने ।।
मिले राहमें कुछ डाकू, उसको पकड दिखा चाकू ।
कहे कहासे आया तू, क्या क्या चीजें लाया तू?
सच बतलाया बालकने, लाये पाचसौ रुपये मैने ।
डाकू सोचे यह बच्चा, झूठ बोलता है अच्छा ।।
रखे सामने जब पैसे, डाकू बोले तब ऐसे ।
डाकू कहलाते है हम, ले लेंगे तेरा यह घन ।।
करना जो करलो तुमको, माँ ने बतलाया हमको ।
चाहे दुख से तुम रो लो, पर ना झूठ कभी बोलो ।।
सही बात डाकू सुनकर, डाका चोरी सब त्यजकर
बच्चेसे शिक्षा पायी, सत्य वोलना सुखदायी ।।
जिनवाणी स्तुती
जिन देव आपके पावन मुख में, खिरती जो ॐ कार छ
सबको शिवपथ दिखलाती है, अतः बनी माँ जिनवार्ण
जिनवाणी माँ तेरी कृपा से, मिले हमें भी मोक्ष सदन
इसीलिए हम मन वच तन से, करते माँ नित तुम्हे नमा
हम नन्हे मुन्हे बच्चे
हम नन्हे मुन्हे बच्चे है, दात हमारे कच्चे है।
झूठ कभी ना बोलेंगे, दिल ना किसीका दुखायेंगे
जिन दर्शन को जायेंगे, निज स्वभाव को पायेंगे
अब तो जल्दी करेंगे, हम तो मुनि बनेंगे ।।
बच्चे बोले मं मं मं …
बच्चे बोले में मं मं, धरम करेंगे हम हम हम ।
मम्मी बोली सुन सुन सुन, सब सिद्धोंको नम नम नम
जैनी बच्चे सच्चे हम, नहीं किसीसे डरते हम ।
रात्री भोज ना करते हम, छान के पानी पिते हम ।।
जिनवर दर्शन करते हम, पाठशाला पढने आते हम ।
सिद्ध प्रभु से हम ना कम, भगवान बनने जन्मे हम ।।
छोटी सी है जिंदगी, बडे बडे अरमान ।
पूरे न हो पायेंगे, निकल जान
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1683.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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