श्री जैन नाटकीय रामायण | Jain Natakiya Ramayan — श्री पद्मपुराण आधारित मंचन योग्य जैन रामायण नाटक (अंश)

आचार्य श्री रविषेण कृत श्री पद्मपुराणजी के आधार पर रचित मंचन-योग्य जैन रामायण नाटक — पाँच भागों में विभक्त एक विस्तृत नाट्य-रचना (लेखक — ‘विमल’)। इसमें रावण का जन्म व राज्य, कैलाश पर्वत उठाना, यज्ञों की उत्पत्ति, हनुमान का जन्म व रावण से सम्बन्ध, जनक की राजधानी पर म्लेच्छों का आक्रमण, लव-कुश का जन्म व सीता की अग्नि परीक्षा आदि प्रसंग जैन परम्परा अनुसार नाट्य-रूप में हैं। पूरे पात्र-संवाद (केकई, बाली, सुग्रीव, सूर्यजस आदि), दृश्य-विभाजन, गाने व मंच-निर्देश सहित। :red_circle: यह ग्रन्थ लगभग ३१२ पृष्ठों का व स्कैन रूप में है — यहाँ केवल प्रारंभिक दृश्यों का अंश प्रस्तुत है।

A staged Jain Ramayan natak based on Acharya Ravishena’s Padmapurana — an extensive five-part dramatic work presenting the Ramayan per Jain tradition (Ravan’s birth & reign, lifting of Kailash, origin of yajnas, Hanuman’s birth, Lav-Kush, Sita’s fire-test, etc.) with full characters, scenes, songs & stage directions. The source is a ~312-page scan; only the opening scenes excerpt is reproduced here.


श्री जैन नाटकीय रामायण

(श्री रविषेणाचार्य कृत श्री पद्मपुराणजी का निचोड़ — पाँच भागों में रचित मंचन-योग्य नाटक)

नोट: यह ग्रन्थ लगभग ३१२ पृष्ठों का है व स्कैन रूप में है — नीचे केवल प्रारंभिक दृश्य का अंश दिया गया है।


प्रथम-भाग ।

एकत्र होकर मुँहले युद्ध करें तो हार ही मान कर जायेंगे । किन्तु हमारे कुल में पहले विद्या साधने की रीति चली आई है। इस लिये पहले मैं विद्या साधने के लिये दोनों भाइयों को साथ लेकर वन में जाता हूँ ।

केकईः—जाओ, पुत्र तुम सबसे पहले अपने कुल की रीत निभाओ।

( तीनों पुत्र माता को नमस्कार करके जाते हैं )

आओ बेटी चन्द्रनखा तुम्हारे पिता के पास चलें ।

( दोनों चली जाती हैं। )

दृश्य समाप्त ।

अँक प्रथम–दृश्य छटा

( भयानक वनमें तीनों भाई ध्यान में लीन हैं। नाना प्रकार के डरावने शब्द हो रहे हैं। भूत पिशाच आदि आ आ कर नाचते हैं। उनका ध्यान नहीं डिगता । फिर एक देव अपनी दो स्त्रियों सहित आता है। )

१ स्त्री—अहा ! ये क्या ही सुन्दर युवक हैं। इनकी ये अवस्था खेल कूद के योग्य है। वन में बैठकर तप करने योग्य नहीं है ।

२ स्त्री—इनके माता पिता कैसे निर्दई हैं जो उन्होंने ऐसे युवकों को वनमें जाकर तप करने की आज्ञा दी।

१ स्त्री—( पास में जाकर ) हे युवकों ! ये अवस्था तुम्हारे लिये तप करने की नहीं है। उठो ! अभी कुछ नहीं बिगाडा है, तुम लोग अपने घर जाओ ।

२ स्त्री—क्यों तुम लोग अपने इन कोमल शरीरों को कष्ट दे रहे हो, बोलो ?

१ स्त्री—अरे, यह तो बिल्कुल पत्थर की शिलाके समान अचल हैं ।

२ स्त्री—क्या किसी कारीगरने लकडी के खिलौने बना कर तो नहीं रख दिये जिनसे स्त्रियां आयें और इन्हों पर मुग्ध हों।

देव—नहीं ये रत्नश्रवा के तीनों पुत्र हैं। यहां पर विद्या साधने के लिये आये हुवे हैं। ये मूर्ख हैं। इनकी बालक बुद्धि है। मैं अभी अपने सेवकों को बुलाकर इन्हों का ध्यान डिगाता हूँ।

( ताली बजाता है, कुछ दैत्य आकर उपस्थित होते हैं। )

देखो जिस प्रकार भी बने तुम इन्हों का ध्यान डिगाओ।

राक्षस—जो आज्ञा महाराज ।

( देव अपनी दोनों स्त्रियों सहित एक ओर खड़ा होजाता है। वह तीनों निश्चल बैठे हैं। देव लोग नाना प्रकार की क्रीड़ा करते हैं। उनके कानों में बहुत भंय़ावने

बाप—लेकिन राजमल तो बहुत छोटा है वह तो अभी चौदह का ही है। और उसके पास जाते भी शर्माता है।

माँ—बस एकही बात पकडली, आज कल के छोरेआसमान से बातें करते हैं। आपके सामने वह ऐसा ढोंग बनाता है जिससे आप उसे सीधा समझें। वैसे वह बड़ा गुन्डा है। तुम्हारे हमारे सब के कान काटले ।

बाप—काटता होगा, मुझे तो ताज्जुब होता है कि गर्भ कैसे रह गया। अरे याद आया, गर्भ नहीं होगा। वैसे ही पेट में खराबी होगई होगी सो महावारी बन्द होगई है। किसी को दिखाया भी ?

माँ—तुम्हें तो सिवाय बहम के और ताज्जुब के दूसरा काम ही नहीं, दिखाया कैसे नहीं, दाईने तीन महीने का बताया है।

बाप—अच्छा जाओ ( इतने लोगों के सामने मत कहो वरना ये हंसी उडायेंगे )

( चली जाती है )

राजमल—( आकर ) पिताजी, क्या सोच रहे हो, खुशी मनाओ। अबतो बहू के छोरा होगा ! मैं उसे खूब खिलाया करूँगा।

बाप—( चपत मार कर ) छोरा होगा २ दगाई, चौदह बरस का बैल हो गया अभी तक खाक की भी अकल नहीं आई।

भाग प्रथम।

( राजमल रोता है। बाप मनाता है। राजमल उठ जाता है। चुप हो जाता है )

राजमल—आपने मुझे क्यों मारा ?

बाप—बेटा मैंने कोई दूसरा समझा था। अच्छा तुम अब गेंद नहीं खेलते ? खूब खेला करो खाया करो, तुम्हें यहां किस बात की कमी है।

राजमल—आप मुझे नई गेंद लिखा देना, तब मैं म्युनिसिपल्टी के ग्राउन्ड में खेलने जाया करूँगा।

बाप—वहां जाने की क्या जरूरत है, तुम्हारे बैल खाने की जमीन ही गेंद खेलने को काफी है।

राजमल—नहीं पिताजी यहां नहीं। यहां तो मेरी गेंद उडन छू होजाती है।

बाप—बेटा, उड़न छू किसे कहते हैं।

राजमल—नाइ, पिताजी आप उड़न छू का भी मतलब नहीं समझते ।

बाप—नहीं बेटा तू बतलादे क्या बात है।

राजमल—देखो पिताजी सुनो, एक दिन मैं गेंद खेल रहा था सो, वह दूसरी तरफ जाकर गुस की कोठरी में जा पड़ी, जब मैं वहां पर लेने गया तो बहूजी और कल्लू वहां पड़े हुवे थे। मैंने कल्लू से पूछा कि यहां गेंद आई है ? उसने कहा कि

यहां गेंद नहीं आई। अगर आती भी है तो उड़न छू होजाती है। इस लिये अब कभी भी यहां गेंद लेने न आना। इस लिये पिताजी यहां पर खेलकर कौन अपना नुकसान करे।

पिताजी—( आश्चर्य से ) कौन कल्लू !

राजमल—वही काला कल्लू जो बैलोंको खुस खिलाता है।

पिताजी—अच्छी बात है। मैं अभी जाकर उसे अपने घर से निकालता हूँ।

( चला जाता है, राजमल रह जाता है )

राजमल—महाजी अब तो गेंद आयगी।

बहू—( आकर ) प्राणनाथ !

राजमल—जाजा, फिर गेंद का नाम सुनकर उडन छू करने आगई।

बहू—नहीं मैं गेंद उडन छू नहीं करूँगी। मैं तुमसे प्यार करूँगी।

राजमल—अच्छा प्यार करेगी तो पहले मुझे गोदी चढालो ।

बहू—अब तुम बड़े हो गये। अब मैं गोदी नहीं चढाती.

राजमल—बडा मैं ही थोडे ही हो गया तू भी तो हो गई। और तेरे तो अब छोरा होगा, मुझे खिलाने को दिया करेगी ?

प्रथम भाग ।

बहू—खिलाने को क्या वह तो तुम्हारा ही होगा।

राजमल—कहीं लडकों के भी छोरे होते हैं ? बावली कहीं की।

बहू—प्राणनाथ, आप नाराज न हों, मैं तो आपकी सती स्त्री हूँ।

राजमल—जैसी सीता सती थी वैसी ही है ?

बहू—इसमें क्या कुछ संदेह है ?

राजमल—ठीक रामचन्द्रजी का लेथे ! उनकी स्त्री सीता सती थी। लक्ष्मण उनका सेवा किया करते थे। ऐसे ही हमारे यहां कल्लू है उसकी सी तुम हो। और तुम अपने को सती कहती हो, तब तो मुझे तुम्हारी पूजा करनी चाहिये। क्यों कि किताबों में लिखा है कि सती की सेवा करना परम धर्म है।

बहू—तुम तो मेरी हँसी उड़ाते हो ! कैसा कल्लू ! कल्लू को मैं क्या जानूं ।

राजमल—पिताजी कल्लू को घर से निकाल रहे हैं तुम्हें भी उनका बन क लिये साथ करना चाहिये। मैं तो उसी के साथ जाउँगा।

( चला जाता है। बहू को सोच होजाता है )

बहू—हाय मेरे माता पिता ने मुझे इसाते ब्याह कर मेरी तकदीर फोड दी। मेरी बहन शान्ती को सगाई की थी, उसका

दूल्हा उससे चार बरस बडा था। वह खूब से अपने पती के साथ प्रेम पूर्वक रहती है। यहां पर आकर बेचारे कल्लू का सहारा था। उसको भी अब ये निकाल रहे हैं। अब मैं अपनी बाकी उमर किसके संग बिताऊँगी ।

गाना

बाली उमर नादान, छोटासा मेरा बालमा ।
रंग नहीं जानत, ढंग नहीं जानत, ठंग नहीं जानत।
प्रेम का है अनजान, नन्हा सा मेरा बालभा ॥बा०॥
जोवन मेरा छल छल छलके, छल छल छलके ।
पीया मिलनको जीया ललके, जीया ललके ।
तड़फत हूं हैरान, आवे ना मेरा बालमा ॥बाली०॥

( सामने से रामू को आते देख कर )

बहू—रामू आरहा है, ( रोने लगती है )

रामू—बहूजी क्या बात है ? कहिये तबियत तो ठीक है।

बहू—हां जरा पैर में दर्द है।

रामू—अगर सरकार का हुकम हो तो पैर दबा दूँ ?

बहू—हां जरा दरद जाता रहेगा।

( रामू पैर दबाता है। वो फिर रोने लगती है )

रामू—क्यों बहूजी अब कहां दर्द है।

प्रथम भाग,।

गाना

श्री इन्द्र देव महाराजा, बज रहा खुशी का बाजा।
हां गायो, हां गायो, हर्षित होकर यश गायो ॥
जिनकी महिमा अगणित है, सबही में जिनका हित है।
हां गायो, हां गायो, हर्षित होकर यश गायो ॥

( पटा क्षेप ) दृश्य समाप्त

अँक द्वितीय–दृश्य छटा

( वानर वंशी महाराजा सूर्यजस्का किष्किन्धा में दर्बार। ) ( पास में ही उनके दोनों पुत्र बाली और सुग्रीव बैठे हैं। )

सूर्यजस—पुत्र बाली, तुम राज कार्य में सर्वथा योग्य हो। मैं अब वृद्ध होगया हूँ। यह संसार महा दुख दाई है। नहीं मालूम में कितनी बार चौरासी लाख योनियों में भ्रमा हूँ। मैंने यह मनुष्य जन्म पाया है। इसको सफल करना चाहिये। तुम इस राज्य सिंहासन के स्वामी बनो मैं वन में जाकर तपस्या करूँगा। और कर्मों को काटने का उपाय करुंगा।

बाली—महाराज, मैं यद्यपि इस कार्य के लिये सर्वथा अयोग्य हूँ किन्तु आपकी आज्ञा का उलंघण करने में सर्वथा असमर्थ हूँ।


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।

प्रूफरीडिंग बाकी है