जैन नैतिक शिक्षा प्रथम-भाग
जैन नैतिक शिक्षा
(JAIN MORAL EDUCATION)
प्रथम-भाग
(PART-I)
लेखक एवं सम्पादक
डॉ. बी. सी. जैन, जयपुर
प्रकाशक
जैन पाठशाला समिति, जयपुर
संस्करण : द्वितीय 2000 प्रतियाँ (18-अप्रैल-2018)
कृति : जैन नैतिक शिक्षा (प्रथम-भाग)
लेखक एवं सम्पादक : डॉ. बी. सी. जैन
मूल्य : ₹ 10/-
प्रकाशक : जैन पाठशाला समिति, जयपुर
केन्द्रीय कार्यालय : 164/267, हल्दी घाटी, मार्ग
प्रताप नगर, जयपुर - 302033
फोन- 0141-2796595, मो.8955872717,
www.jainpathshala.in
Printed by : Pixel 2 Print, Jaipur (Hemant Jain)
Cell : 9509529502, [email protected]
विषय सूची
- देव-स्तुति 5
- णमोकार महामंत्र 6
- चत्तारिमंगल 9
- तीर्थंकर भगवान 11
- जिन-दर्शन 15
- जीव-अजीव 19
- भगवान आदिनाथ 21
आभार
इस कृति में जिन आचार्यों, विद्वानों की रचनाओं का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से
समावेश किया गया है, उनका हृदय से आभार ज्ञापित करते हैं। - सम्पादक
प्रकाशकीय
जैन धर्म विश्व का एक मात्र वैज्ञानिक धर्म है जिसके सिद्धान्त वस्तु स्वरूप का सम्यक् प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। जैन धर्म के मूल सिद्धान्तों को सरल, सुबोध, रोचक शैली में समझाने के उद्देश्य से जैन नैतिक शिक्षा भागों को क्रमबद्ध श्रृंखला प्रकाशित कर रहे हैं। भौतिकवादी युग में भोग-विलासवादी पाश्चात्य संस्कृति ने न केवल जैनों को अपितु सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति को अपने प्रभाव में ले लिया है जिसके परिणाम स्वरूप शाकाहारी व्यक्ति अपना शुद्ध भोजन छोड़कर अभक्ष्य भक्षण कर रहे हैं। बच्चे एवं युवा धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं, कम्प्यूटर एवं मोबाईल ने मानसिक शांति भंग कर दी है, प्रतिस्पर्द्धा की इस अंधी दौड़ में हम अपने अस्तित्व को नष्ट करते जा रहे हैं।
बच्चे हमारा भविष्य हैं अतः उनमें धार्मिक संस्कारों को बीजारोपित करना हमारा कर्तव्य है। जैन पाठशाला समिति ने इस कार्य की महत्ता को समझते हुए शिखर व्याख्यानमाला, धार्मिक शिक्षण शिविर तथा राष्ट्रीय स्तर पर जैन पाठशालाओं का संचालन कर ज्ञान की अलख जगाने का प्रयास किया है।
शिक्षण शिविरों, जैन विद्यालयों एवं जैन पाठशालाओं में अध्ययन कराने के उद्देश्य से जैन नैतिक शिक्षा पाठ्य पुस्तक अपनी पाठ्य सामग्री और रोचक प्रस्तुतिकरण के कारण सभी को प्रभावित करेगी। आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए प्रत्येक भाग के पाठों के विषयों को कम्प्यूटर के माध्यम से एनिमेशन के रूप में प्रस्तुत किया गया है साथ ही हमारी वेबसाईट पर भी उपलब्ध है।
समिति के मंत्री तथा जैन पाठशाला के निदेशक, जैन दर्शन एवं भाषा के तलस्पर्शी युवा विद्वान डॉ. बी.सी. जैन ने अथक प्रयास कर इन पुस्तकों को मूर्तरूप दिया है। श्रीमती प्रज्ञा जैन ने अपना बहुमूल्य समय देकर भागों के निर्माण में योगदान दिया। पिक्सल् 2 प्रिंट के श्री हेमन्त जैन ने भागों के प्रकाशनार्थ जो अथक प्रयास किया उसके लिये धन्यवाद देता हूँ। आप सभी सुधी पाठकों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं।
अध्यक्ष
जैन पाठशाला समिति
हमारे दैनिक कर्त्तव्य
- अभिवादन में जय जिनेन्द्र ही बोलें।
- सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोड़ने के बाद तथा सायं सोने से पूर्व एवं खाने से पूर्व नौ बार णमोकार मंत्र अवश्य बोलना चाहिए, इससे मन शुद्धि होती है।
- प्रतिदिन देव-दर्शन (मन्दिर जी) करना चाहिए।
- अभक्ष्य पदार्थ (पिज्जा, बर्गर, पेस्ट्री, केक, कोल्ड ड्रिंक्स, आलू, बेकर्स, आईसक्रीम, चॉकलेट, आलू, प्याज आदि) नहीं खाने चाहिए।
- इससे हिंसा से बचते हैं तथा स्वस्थ रहते हैं।
- रात्रि में भोजन नहीं करना तथा पानी छान कर पीना चाहिए।
- सभी से शिष्टाचार पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।
- हमें हमेशा हित-मित-प्रिय मधुर वचन बोलना चाहिए।
- सभी लोगों का यथायोग्य सम्मान करना चाहिए।
- पाप (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह) तथा कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) को त्याग कर जीवन पवित्र बनाना चाहिए।
- हमेशा मन लगाकर पढ़ना चाहिए।
- जिनवाणी को कण्ठस्थ करना चाहिए इससे बुद्धि का विकास होता है।
- वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी कुदेववाद को नमस्कार नहीं करना चाहिए। इससे जैन धर्म में दृढ़ता आती है।
- मैं कौन हूँ? भगवान कौन है? तथा मैं भगवान कैसे बन सकता हूँ, इसका चिन्तन प्रतिदिन करना चाहिए।
- भगवान से हमें कोई लौकिक भोग सामग्री प्राप्ति की इच्छा नहीं करनी चाहिए, इससे पाप बन्ध होता है।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम-भाग / 4
पाठ-1
देव-स्तुति
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, भवविजन की अब पूरो आस।
ज्ञान-भानु का उदय करो, मम मिथ्यातम का होय विनाश।।
जीवों की हम करुणा पालें, झूठ वचन नहिं कहें कदा।
परधन कबहुँ न हरहूँ स्वामी, ब्रह्मचर्य व्रत रखें सदा।।
तृष्णा लोभ बढ़े न हमारा, तोष सुधा नित पिया करें।
श्री जिनधर्म हमारा प्यारा, तिस की सेवा किया करें।।
दूर भगावें बुरी रीतियाँ, सुखद रीति का करें प्रचार।
मेल-मिलाप बढ़ावें हम सब, धर्मोन्नति का करें प्रसार।।
सुख-दुःख में हम समता धारें, रहें अचल जिमि सदा अटल।
न्यायमार्ग को लेश न त्यागें, वृद्धि करें निज आत्मबल।।
अष्ट कर्म जो दुःख हेतु हैं, तिनके क्षय का करें उपाय।
नाम आपका जपें निरन्तर, विघ्न-शोक सब ही टल जाय।।
आत्म शुद्ध हमारा होवे, पाप-मैल् नहीं चढ़े कदा।
विद्या की हो उन्नति हम में, धर्म ज्ञान हूँ बढ़े सदा।।
हाथ जोड़कर शीश नवावें, तुमको भवविजन खड़े-खड़े।
यह सब पूरो आस हमारी, चरण शरण में आन पड़े।।
शब्दार्थः
वीतराग- रागद्वेष से रहित, सर्वज्ञ- लोकालोक को जानने वाले, भानु- सूर्य,
क्षय- नष्ट होना, तृष्णा – इच्छा, विघ्न- बाधाएँ, सुधा- अमृत।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम-भाग / 5
पाठ - 2
णमोकार महामंत्र
णमो अरहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आइरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं।।
अरहंतों को नमस्कार, सिद्धों को सादर वंदन।
आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को है वंदन।।
और लोक के सर्व साधुओं को, है विनय सहित वंदन।
पंच परम परमेष्ठी प्रभु को, बार-बार मेरा वंदन।।
अर्थ - लोक के सब अरहंतों को नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो,
आचार्यों को नमस्कार हो, सब उपाध्यायों को नमस्कार हो और सर्व साधुओं को
नमस्कार हो।
अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पाँच परमेष्ठी हैं। इसलिए
इस मंत्र को पंच नमस्कार मंत्र भी कहते हैं।
अनादि निधन मंत्र
इसकी रचना किसी ने नहीं की है क्योंकि पाँचों
परमेष्ठी अनादिकाल से हैं और अनंतकाल तक रहेंगे। आचार्य धरसेन के शिष्य
भूतबलि तथा पुष्पदन्त ने षट्खण्डागम नामक ग्रन्थ में इसको मंगलाचरण के रूप
में प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध किया है।
णमोकार मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर तथा 58 मात्राएँ हैं। णमोकार मंत्र में अरहन्त
और सिद्ध भगवान हैं तथा आचार्य, उपाध्याय एवं साधु ये तीन साधु हैं।
णमोकार मंत्र का महत्त्व -
एसो पंच णमोयारो, सव्व पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं होई मंगलं।।
यह पंच नमस्कार मंत्र, सब पापों का क्षय कारक।
मंगल में सबसे पहला, प्रथम सुमंगल सुखकारक।।
शब्दार्थ
एसो = यह, पंच = पाँच, णमोयारो = नमस्कार मंत्र, सव्व
पावप्पणासणो = सभी पापों का नाश करने वाला है, च = और, मंगलाणं =
मंगलों में, सव्वेसिं = सबसे, पढमं = पहला, मंगलं = मंगल, होई = है।
अर्थ - यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब
मंगलों में पहला मंगल है। इसलिये हर शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरूर
बोलना चाहिए।
मंगल - जो पापों को नष्ट कर सच्चा सुख प्रदान करे उसे मंगल कहते हैं।
परमेष्ठी का लक्षण -
जो परम (उत्कृष्ट) पद में स्थित हैं उन्हें परमेष्ठी कहते हैं। परमेष्ठी पाँच होते
हैं। अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु।
लाभ - संसार में जितने भी मंत्रों का प्रचलन है उनमें णमोकार महामंत्र सबसे महान् है।
दुःखें सुखें भयस्थाने, पथि दुर्गे रणोऽपि वा।
श्री पंचगुरु मंत्रस्य, पाठः कार्यः पदे-पदे।।
सुख में, दुःख में भय, वीरान, कठिन मार्ग हो या हो युद्ध स्थान।
सभी कार्यों में नित प्रति, पंच परमेष्ठी का रहे ध्यान।।
अर्थ
दुःख में, सुख में, भय-स्थान में, कठिन मार्ग में, युद्ध के मैदान में,
कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।
(दो मित्रों के बीच वार्तालाप)
ज्ञापक : क्या णमोकार मंत्र पढ़ने से सभी पाप नष्ट होते हैं?
सर्वज्ञ : ऐसा नहीं है, पाप नष्ट होने का अर्थ है इस मंत्र के ध्यान से जीव पाप से
हटकर शुभ कार्य में लीन होता है तथा बाद में शुद्ध उपयोग में लीन
होकर समस्त पापों का नाश कर स्वयं भगवान बन जाता है।
ज्ञापक : कायोत्सर्ग किसे कहते हैं?
सर्वज्ञ : काया अर्थात् शरीर के उत्सर्ग अर्थात् ममत्व छोड़ना शरीर से एकत्व
ममत्व छोड़कर पंच परमेष्ठी और आत्मा में ध्यान लगाना कायोत्सर्ग
कहलाता है।
अभ्यास
मौखिक -
नीचे दिये गये प्रश्नों के विकल्पों में से सही उत्तर चुनकर लिखिए।
- णमोकार मंत्र में … भगवान हैं। (दो / तीन / पांच)
- अशरीरी … भगवान हैं। (अरहन्त / सिद्ध / आचार्य)
- णमोकार मंत्र … भाषा में लिखा गया है। (संस्कृत / प्राकृत / पाली)
- णमोकार मंत्र … नामक ग्रंथ का मंगलाचरण है। (समयसार / षट्खण्डागम)
लिखित -
प्रश्न 1. णमोकार मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है?
प्रश्न 2. परमेष्ठी किसे कहते हैं?
प्रश्न 3. पंच परमेष्ठी के नाम बताइये?
प्रश्न 4. णमोकार मंत्र में कितने पद, अक्षर एवं मात्राएँ हैं?
प्रश्न 5. षट्खण्डागम की रचना किसने की है?
प्रश्न 6. णमोकार मंत्र पढ़ने से हमें क्या लाभ है?
प्रश्न 7. मंगल किसे कहते हैं?
चत्तारिमंगल
चत्तारि मंगलं, अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं,
साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा,
साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरहंते सरणं पव्वज्जामि,
सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि,
केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।
मंगल चार, चार हैं उत्तम, चार शरण में जाऊँ मैं।
मन-वच-काय त्रियोग पूर्वक, शुद्ध भावना भाऊँ मैं।।
श्री अरहंत देव मंगल हैं, श्री सिद्ध प्रभु हैं मंगल।
श्री साधु मुनि मंगल हैं, है केवली कथित धर्म मंगल।।
श्री अरहंत लोक में उत्तम, सिद्ध लोक में हैं उत्तम।
साधु लोक में उत्तम हैं, है केवली कथित धर्म उत्तम।।
श्री अरिहंत शरण में जाऊँ, सिद्ध शरण में मैं जाऊँ।
साधु शरण में जाऊँ, केवली धर्म कथित धर्म शरण जाऊँ।।
अर्थ
लोक में चार मंगल होते हैं, अरहंत भगवान मंगल हैं, सिद्ध भगवान मंगल
हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय एवं साधु ) मंगल हैं तथा केवली भगवान द्वारा
बताया गया वीतराग धर्म मंगल है।
लोक में चार उत्तम हैं, अरहंत भगवान उत्तम हैं, सिद्ध भगवान उत्तम हैं, साधु
उत्तम हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया गया वीतराग धर्म उत्तम है।
मैं चारों की शरण में जाता हूँ। अरहंत भगवान की शरण में जाता हूँ, सिद्ध
भगवान की शरण में जाता हूँ, साधुओं की शरण में जाता हूँ तथा केवली भगवान
द्वारा बताये गये वीतराग धर्म की शरण में जाता हूँ।
मंगल - जो मोह-राग-द्वेष रूपी पापों एवं कषायों को नष्ट कर सच्चा सुख उत्पन्न
करे उसे मंगल कहते हैं।
उत्तम - लोक में जो सर्वश्रेष्ठ हो उसे उत्तम कहते हैं।
शरण - शरण सहारे को कहते हैं। हमें इन चारों की शरण लेना चाहिए।
आत्मा की शरण - पंच परमेष्ठी द्वारा बताये गये मार्ग पर चलकर अपनी आत्मा
की शरण लेना ही पंचपरमेष्ठी की शरण है।
अभ्यास
मौखिक
प्रश्न 1. जो लोक में महान् हो … कहते हैं। (शरण/मंगल/उत्तम)
प्रश्न 2. लोक में मंगल … होते हैं। (तीन/चार/पाँच)
प्रश्न 3. लोक में … को उत्तम कहते हैं। (सर्वश्रेष्ठ/निकृष्ट/अधम)
प्रश्न 4. सहारे को … कहते हैं। (शरण/उत्तम/मंगल)
लिखित
प्रश्न 1. शरण किसे कहते हैं? प्रश्न 2. केवलिपण्णत्तो का अर्थ क्या है?
प्रश्न 3. लोक में कितने मंगल एवं शरण हैं? प्रश्न 4. उत्तम किसे कहते हैं?
तीर्थंकर भगवान
जो धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करते हैं वे तीर्थंकर कहलाते हैं। तीर्थंकरों के
केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद समवशरण की रचना होती है और जीवों के
हितार्थ उपदेश (दिव्य ध्वनि) देते हैं। तीर्थंकर अरहंतों के पाँच कल्याणक होते
हैं- गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, तप कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और मोक्ष
कल्याणक। सभी तीर्थंकर भगवान होते हैं, लेकिन सभी भगवान तीर्थंकर नहीं
होते। वर्तमान चौबीस तीर्थंकरों के नाम व चिह्न -
- श्री ऋषभनाथ जी
बैल - श्री अजितनाथ जी
हाथी - श्री सम्भवनाथ जी
घोड़ा - श्री अभिनन्दननाथ जी
बन्दर - श्री सुमतिनाथ जी
चक्रवा - श्री पद्मप्रभ जी
कमल - श्री सुपार्श्वनाथ जी
स्वस्तिक - श्री चन्द्रप्रभ जी
चन्द्रमा - श्री पुष्पदन्त जी
मगरमच्छ
10. शीतलनाथ
करपृक्ष
11. श्रेयांसनाथ
गैंडा
12. वासुपूज्य
भैंसा
13. श्री विमलनाथ जी
शूकर
14. श्री अनंतनाथ जी
सेही
15. श्री धर्मनाथ जी
वज्रदण्ड
16. श्री शांतिनाथ जी
हिरण
17. श्री कुन्थुनाथ जी
बकरा
18. श्री अरनाथ जी
मछली
19. श्री मल्लिनाथ जी
कलश
20. श्री मुनिसुव्रतनाथ जी
कछुआ
21. श्री नमिनाथ जी
नील कमल
22. श्री नेमिनाथ जी
शंख
23. श्री पार्श्वनाथ जी
सर्प
24. श्री महावीर जी
सिंह
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम-भाग / 12
अनेक नाम वाले तीर्थंकर
ऋषभदेव : आदिनाथ, पुष्पदन्त : सुविधिनाथ
महावीर : वीर, अतिवीर, सन्मति और वर्धमान
छंद रूप में तीर्थंकरों के नाम
ऋषभ, अजित, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्म, सुपार्श्व जिनराय।
चंद्र, पष्प, शीतल, श्रेयांस जिन, वासुपूज्य, पूजित सुरराय।।
विमल, अनंत, धर्म जस उज्ज्वल, शांति, कुंथु, अर, मल्लि मनाय।
मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पार्श्व प्रभु, वर्धमान पद पुष्प चढ़ाय।।
चिह्न रखने का समय और कारण
जन्म कल्याणक के समय सुमेरु पर्वत पर बालक का अभिषेक करते समय सौधर्म इन्द्र को दाहिने पैर के अंगूठे पर जो चिह्न दिखता है, उन भगवान का वही चिह्न निश्चित कर देता है।
यदि चिह्न नहीं रखा जायेगा तो यह मालूम नहीं हो सकेगा कि यह कौन से तीर्थंकर की मूर्ति है। चिह्न के माध्यम से ही तीर्थंकर की पहचान करते हैं। चिह्न प्रकृति संरक्षण का सन्देश भी देते हैं।
लाभ - तीर्थंकरों द्वारा बताये हुये मार्ग पर चलकर हम भी भगवान बन सकते हैं।
अभ्यास
मौखिक
उचित विकल्प द्वारा रिक्त स्थान पूर्ति कीजिए-
- तीर्थंकर अरहंत के … कल्याणक होते हैं। (चार/पाँच)
- तेहरवें तीर्थंकर … हैं। (वासुपूज्य / विमलनाथ)
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम-भाग / 13
- शांतिनाथ का चिह्न … है। (हिरण / बकरा)
- पुष्पदन्त का दूसरा नाम … है। (सुमतिनाथ / सुविधिनाथ)
लिखित
प्रश्न 1. भगवान किसे कहते हैं? प्रश्न 2. तीर्थंकर किसे कहते हैं?
प्रश्न 3. तीर्थंकर और भगवान में क्या अंतर है?
प्रश्न 4. तीर्थंकर कितने होते हैं? नाम सहित बताइये।
प्रश्न 5. चौबीसों तीर्थंकरों के नाम चिह्न सहित सुनाइए?
प्रश्न 6. एक से अधिक नाम किन-किन तीर्थंकरों के हैं?
आत्म-ज्ञान
आत्म-ज्ञान को प्राप्त करेंगे।
पंच प्रभु का ध्यान धरेंगे।।1।।
रात्रि भोजन नहीं करेंगे।
अभक्ष्य भक्षण नहीं करेंगे।।2।।
बिना छना जल काम न लेंगे।
बुरा किसी को नहीं कहेंगे।।3।।
सभी बड़ों का सम्मान करेंगे।
पाप कषाय का त्याग करेंगे।।4।।
जिन -दर्शन नित्य करेंगे।
व्रत-नियमों का पालन करेंगे।।5।।
जिनवाणी का पठन करेंगे।
रत्नत्रय को प्राप्त करेंगे।।6।।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम-भाग / 14
पाठ - 5
जिन - दर्शन
ज्ञाता : जय जिनेन्द्र भव्य! सुबह-सुबह कहाँ भागे जा रहे हो?
भव्य : जय जिनेन्द्र ज्ञाता! मैं जिन मन्दिर जा रहा हूँ।
ज्ञाता : मैं तुम्हें जब भी मन्दिर चलने के लिए बोलता था तब तुम कोई न कोई बहाना बना देते थे पर आज यह उल्टी गंगा कैसे बह रही है?
भव्य : आज स्कूल में मेरी परीक्षा है। इसीलिए भगवान से आशीर्वाद लेने जा रहा हूँ, ताकि अच्छे अंकों से पास हो सकूँ।
ज्ञाता : वाह भाई! एक दिन दर्शन करने से भगवान अच्छे अंक देते होते तो पढ़ने से क्या फायदा? तुम्हें पता नहीं कि वीतरागी देव किसी को कुछ लेते-देते नहीं हैं।
भव्य : मैं स्कूल के लिए लेट हो रहा हूँ, तुम भी साथ में मन्दिरजी चलो और रास्ते में सभी ज्ञान की बातें बता देना।
- (दोनों साथ-साथ मन्दिर जी में प्रवेश करते हुए) *
ज्ञाता : अरे मित्र! हाथ-पैर धोए बिना ही तुम मन्दिरजी में प्रवेश कर रहे हो? क्या तुम्हें जिन दर्शन की विधि मालूम नहीं है?
भव्य : नहीं, मैं तुम्हारे जैसे पाठशाला थोड़े ही पढ़ता हूँ, जो मुझे जिन-दर्शन की विधि मालूम होगी। अब तुम्हीं बताओ?
ज्ञाता : ध्यान से सुनना मैं तुम्हें जिन-दर्शन की विधि सुनाता हूँ। - (देव-दर्शन विधि) *
प्रातःकाल दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के पश्चात् छने हुए पानी से नहा धोकर, स्वच्छ वस्त्रों को पहनकर हाथ में अक्षत (सफेद चावल)
लेकर आत्मशान्ति (आत्म कल्याण) की भावना के उद्देश्य से जिनमन्दिर जाना चाहिए। रास्ते में किसी से भी बातचीत नहीं करना चाहिए तथा अन्य किसी कार्य के लिए कहीं पर भी रुकना नहीं चाहिए।
जूते, मोजे चमड़े (लेदर) के पर्स, बेल्ट (चमड़े से बनी हुई वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।) आदि बाहर खोलकर पानी से हाथ-पैर धोकर तीन बार निःसही, निःसही बोलकर भगवान की जय-जयकार करते हुए मन्दिर जी में प्रवेश करना चाहिए।
भव्य : निःसही का अर्थ क्या है?
ज्ञाता : निःसही का अर्थ है सर्व सांसारिक कार्यों का निषेध अर्थात् बाहर की सारी अच्छी-बुरी बातों का त्याग कर देना।
भव्य : इसके बाद क्या करना चाहिए?
ज्ञाता : तत्पश्चात्, ऊँ जय-जय-जय, णमोऽस्तु-णमोऽस्तु-णमोऽस्तु बोलते हुए मन्दिर जी में प्रवेश करना चाहिए तथा मंदिर में लगे घण्टे को मंद-मंद ध्वनि में बजाना चाहिए। सर्वप्रथम हाथ जोड़कर णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं बोलना चाहिए। उसके बाद चत्तारि मंगल पाठ तथा चौबीस तीर्थंकर का छंद ऋषभ, अजित, संभव… बोलकर दायें हाथ से अक्षत वेदी के ऊपर चढ़ा देना चाहिए। वेदी में विराजमान प्रतिमाओं के भी अलग-अलग अर्घ्य चढ़ाना चाहिए।
इसके बाद साष्टांग नमस्कार करके कोई भी एक स्तुति बोलते हुए तीन प्रदक्षिणा (परिक्रमा) लगाकर वेदी के बगल में खड़े होकर नौ बार णमोकार मंत्र की जाप करना चाहिए। यदि हमारे पास पर्याप्त समय है तो अष्ट द्रव्य से पूजन करनी चाहिए तथा स्वाध्याय (शास्त्रों को पढ़ना) एवं माला भी जपनी चाहिए। टेबिल पर रखे गन्धोदक को
लगाने के लिए सर्वप्रथम शुद्ध जल से हाथ धोना चाहिए। तत्पश्चात् गन्धोदक पात्र में चम्मच या हाथ से लेकर मस्तक पर लगाना चाहिए। ध्यान रहे गन्धोदक लगाते समय वह नीचे जमीन पर न गिरे एवं मस्तक के अलावा शरीर के अन्य किसी भी अंग पर गन्धोदक न लगाये। गन्धोदक लगाते समय निम्न श्लोक पढ़ना चाहिए -
निर्मलं निर्मलीकरणं, पवित्रं पाप नाशनम्।
जिनगन्धोदकं वन्दे, अष्टकर्म विनाशनम्॥
इसके बाद धार्मिक ग्रंथ का क्रमशः नियमित स्वाध्याय करना चाहिए। स्वाध्याय में जो पढ़ा हो उसका चिन्तन करना चाहिए।
भव्य : वेदी के चारों तरफ तीन परिक्रमा क्यों लगाते हैं?
ज्ञाता : मन्दिरजी में वेदी समवशरण का प्रतीक होती है। समवशरण में चारों तरफ भगवान के मुख के ही दर्शन होते हैं। पीठ नहीं दिखती इसीलिए चारों तरफ से दर्शन की भावना के कारण परिक्रमा लगाते हैं। सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र की प्राप्ति की भावना से हम भी तीन परिक्रमा लगाते हैं।
भव्य : भगवान से हमें कुछ माँगना चाहिए या नहीं?
ज्ञाता : जिनेन्द्र देव वीतरागी हैं, समस्त राग एवं द्वेष से रहित हैं। इसीलिए वे जगत के कर्ता-धर्ता नहीं। न ही किसी को कुछ देते हैं और न ही किसी से कुछ लेते हैं। (अज्ञानी लोग भगवान को जगत का कर्ता मानते हैं जो कि मिथ्यात्व है।) बस यही भावना रखना चाहिए कि हे प्रभु! हम आपके समान कर्मों को नष्ट कर अपने आत्मा के गुणों को प्रकट कर आप जैसे बन जायँ।
भव्य : चलो अब चलते हैं मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है। आज जो तुमने मुझे देवदर्शन की विधि बताई बहुत अच्छा लगा कल से मैं इसी विधि के अनुसार दर्शन करूँगा एवं नियमित पाठशाला भी आया करूँगा।
- (दोनों चले जाते हैं) *
अभ्यास
मौखिक -
सही उत्तर चुनकर लिखिए -
- परिक्रमा … लगाते हैं। (तीन / चार / पाँच)
- कायोत्सर्ग में णमोकार मंत्र … बार पढ़ना चाहिए। (नौ/सात/पाँच)
- जिनेंद्र देव … हैं। (सरागी/वीतरागी)
- पूजन … द्रव्य से की जाती है। (अष्ट / पंच / सप्त)
लिखित
प्रश्न 1. हम मन्दिर क्यों जाते हैं?
प्रश्न 2. क्या भगवान हमें कुछ दे सकते हैं?
प्रश्न 3. भगवान के समक्ष किसका चिन्तन करना चाहिए?
प्रश्न 4. चमड़े की बनी हुई वस्तुओं का उपयोग क्यों नहीं करना चाहिए?
प्रश्न 5. नि:सही का क्या अर्थ है?
प्रश्न 6. देव दर्शन की विधि संक्षिप्त में अपने शब्दों में लिखिए।
जोर से बोलो …
- महावीर का क्या संदेश - जियो और जीनो दो।
- जैन धर्म किसका - जो पाले उसका।
- ज्ञाता-दृष्टा आत्मा- बन जाओ परमात्मा।
- राग-द्वेष तो कर्म है - वीतरागता धर्म है।
- एक-दो-तीन-चार - जैन धर्म की जय जयकार।
- घर घर से निकले आवाज - सत्य-अहिंसा-शाकाहार।
- चिदानंद ध्रुवधाम की - जय हो सिद्ध भगवान की।
- कुन्दकुन्द ने क्या दिया - भगवान आत्मा बता दिया।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम-भाग / 18
पाठ - 6
जीव-अजीव
(दो बच्चे आपस में वार्तालाप करते हुए)
सिद्धिका : जय जिनेंद्र स्वाति! तुम जीव हो या अजीव?
स्वाति : जय जिनेंद्र सिद्धिका! यह जीव-अजीव क्या होता है?
सिद्धिका : जो जानता देखता है, सुख-दुःख का अनुभव करता है, जिसमें ज्ञान होता है, वह जीव कहलाता है; जैसे - मनुष्य, पशु, पक्षी आदि।
स्वाति : और अजीव क्या है?
सिद्धिका : जो जानता देखता नहीं है, सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता जिसमें ज्ञान नहीं होता, वह अजीव कहलाता है; जैसे - टेबिल, कुर्सी आदि।
स्वाति : अब समझ में आया कि जैसे आँख देखती है तो वह भी जीव हुई।
सिद्धिका : नहीं, हमारा शरीर अजीव है, आत्मा जीव है। आत्मा ही जानने देखने का काम करता है। मरने के बाद आँख और नाक कान रहते हैं पर देखते, सुनते नहीं हैं।
स्वाति : अब समझ में आया कि हमारा शरीर अजीव है लेकिन आत्मा जीव है; जैसे- हाथी का शरीर अजीव है लेकिन आत्मा जीव है।
सिद्धिका : घोड़ा जीव है या अजीव?
स्वाति : हमारे शरीर के जैसे ही घोड़े का शरीर भी अजीव है, परन्तु आत्मा जीव है। जीव-अजीव पढ़ने से हमें क्या लाभ है?
सिद्धिका : जीव-अजीव के ज्ञान के बिना आत्मा की पहचान नहीं हो सकती। सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए सुखी होने के लिए जीव-अजीव का ज्ञान होना आवश्यक है।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम भाग / 19
जीव
संसारी
स्थावर
जल
अग्नि
वायु
वनस्पति
पृथ्वी
त्रस
दो इन्द्रिय
तीन इन्द्रिय
चार इन्द्रिय
पाँच इन्द्रिय
संज्ञी
(मन सहित)
असंज्ञी
(मन रहित)
मुक्त
सकल परमात्मा
(अरहन्त)
निकल परमात्मा
(सिद्ध)
मौखिक -
सही उत्तर चुनकर लिखिए-
- कुत्ते का शरीर … है। (जीव / अजीव / मिश्र)
- अरहंत … परमात्मा हैं। (सकल / निकल / साधु)
- पंचेन्द्रिय जीव … प्रकार के हैं। (दो / तीन / चार)
- जीव अजीव के ज्ञान से … की पहचान होती है। (आत्मा/अनात्मा)
लिखित -
प्रश्न 1. शरीर जीव है या अजीव? तर्क सहित लिखिए।
प्रश्न 2. जीव-अजीव की पहचान से क्या लाभ है?
प्रश्न 3. 10 जीव द्रव्यों तथा 10 अजीव द्रव्यों के नाम बताइये।
प्रश्न 4. हम सुखी कैसे हो सकते हैं?
प्रश्न 5. जीव के भेद लिखिए।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम भाग / 20
पाठ - 7
भगवान आदिनाथ
शिक्षिका : जय जिनेंद्र बच्चों! आपने चौबीस तीर्थंकरों के नाम तो याद कर लिए होंगे?
आर्जव : मैडम जी! मैंने तो याद कर लिए हैं, सुनाऊँ क्या?
शिक्षिका : तो बताओ प्रथम तीर्थंकर का क्या नाम है?
आर्जव : आदिनाथ या ऋषभदेव।
शिक्षिका : श्रुति! भगवान आदिनाथ का चिह्न क्या है?
श्रुति : बैल।
शिक्षिका : बच्चों! आज हम भगवान आदिनाथ के बारे में पढ़ेंगे।
सभी छात्र : हाँ, हाँ, बताइए। हम सभी जानना चाहते हैं।
शिक्षिका : तृतीयकाल के अन्त में अयोध्या नगरी के राजा नाभिराय और उनकी रानी मरुदेवी के यहाँ चैत्र कृष्ण नवमी के दिन बालक आदिकुमार का जन्म हुआ था। जन्म से ही वे तीन ज्ञान (मति, श्रुत और अवधि) के धारी थे तथा देवता बालक का रूप धारण कर उनके साथ खेलते थे। उनकी दो शादियाँ हुईं, पहली पत्नी का नाम नन्दा एवं दूसरी पत्नी का नाम सुनन्दा था। नन्दा से भरतचक्रवर्ती आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी नामक पुत्री उत्पन्न हुई तथा सुनन्दा से बाहुबली नामक पुत्र एवं सुन्दरी नामक पुत्री उत्पन्न हुई।
विपुल : राजा ऋषभदेव ने दीक्षा कब ली?
शिक्षिका : एक दिन राजा ऋषभदेव प्रतिदिन की भाँति राजसभा में नीलांजना का नृत्य देख रहे थे। नृत्य के बीच में ही नीलांजना की मृत्यु हो गई। यह देख उन्हें संसार की असारता का ज्ञान हुआ और उन्होंने दिगम्बर दीक्षा ले ली।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम भाग / 21
छह माह तक तपस्या की और उसके बाद छह माह तक आहार की विधि नहीं मिली। इस प्रकार एक वर्ष बाद अक्षय तृतीया के दिन मुनि आदिनाथ का प्रथम आहार राजा श्रेयांस के यहाँ इक्षुरस (गन्ने का रस) से हुआ। इसी दिन से अक्षय तृतीया पर्व चल पड़ा।
श्रुति : उन्होंने उपदेश कब दिया।
शिक्षिका : एक हजार वर्ष तक आत्म साधना करने के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ और वे वीतरागी सर्वज्ञ हो गये। तभी से उनकी दिव्यदेशना सुनकर जीव आत्म कल्याण करने लगे।
आर्जव : भगवान आदिनाथ को निर्वाण कब और कहाँ से हुआ?
शिक्षिका : माघ कृष्णा चतुर्दशी के दिन सम्पूर्ण कर्मों को नष्ट कर कैलाश पर्वत से मोक्ष (निर्वाण) को पधारे और अरहंत से सिद्ध हो गये।
अभ्यास
मौखिक -
- बालक आदिकुमार के पिता … थे। (श्रेयांस / नाभिराय)
- आदिकुमार जन्म से … ज्ञान के धारी थे। (पाँच / तीन)
- राजा ऋषभदेव की … पुत्रियाँ थीं। (दो / तीन)
- भगवान आदिनाथ … से मोक्ष पधारे। (पावापुरी / कैलाश)
लिखित -
प्रश्न 1. भगवान आदिनाथ का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखिए?
प्रश्न 2. राजा ऋषभदेव को वैराग्य कैसे हुआ?
प्रश्न 3. मुनि आदिनाथ का प्रथम आहार कब और किसके यहाँ हुआ?
प्रश्न 4. भगवान आदिनाथ को निर्वाण कब और कहाँ से हुआ था?
प्रश्न 5. भक्तामर में किसकी स्तुति की गई है?
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम भाग / 22
वे हैं मेरे आदिनाथ
नाभिराय हैं पिता जिनके - वे हैं मेरे आदिनाथ।
मरुदेवी हैं माता जिनकी - वे हैं मेरे आदिनाथ।
ऋषभदेव है जिनका नाम - वे हैं मेरे आदिनाथ।
ब्राह्मी-सुंदरी बेटी जिनकी - वे हैं मेरे आदिनाथ।
भरत बाहुबली से बेटे जिनके - वे हैं मेरे आदिनाथ।
नीलांजना की मृत्यु देख दीक्षा धारी - वे हैं मेरे आदिनाथ।
राजा श्रेयांश ने आहार दिया - वे हैं मेरे आदिनाथ।
अक्षय तृतीया को किया पारणा - वे हैं मेरे आदिनाथ।
एक हजार वर्ष बाद बने केवली - वे हैं मेरे आदिनाथ।
कैलाश पर्वत से मोक्ष पधारे - वे हैं मेरे आदिनाथ।
चेतन राजा
एक था चेतन गतियाँ चार, दुःख का देखा कभी ना पार।
नरक से तिर्यंच में आये, नर सुर गति में भी दुःख पाये।।
चारों गतियों में थक कर आये, जिनवाणी के वचन सुहाय।
हमने देखा है जग सारा, भगवान आत्मा सबसे प्यारा।
जैन नैतिक शिक्षा : प्रथम भाग / 23
उद्देश्य एवं गतिविधियाँ
वर्तमान में समिति द्वारा निम्न गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है -
- जैन पाठशालाओं का सम्पूर्ण देश में संचालन करना।
- प्रतिवर्ष विशिष्ट विद्वानों का आमंत्रित कर शिखर व्याख्यानमाला का आयोजन।
- प्रतिभावान छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करना।
- धार्मिक सत् साहित्य का प्रकाशन।
- धार्मिक, सामाजिक गतिविधियों का संचालन।
- पाण्डुलिपियों का संरक्षण।
- आचार्यों के मूल ग्रंथों पर शोधकार्य करवाना।
- धार्मिक शिक्षण शिविर आयोजित करना।
- सामाजिक, सांस्कृतिक चेतना के कार्यक्रम।
संजय सेठी
अध्यक्ष
मो. 9314134934
डॉ. बी. सी. जैन
मंत्री
मो. 9414769937
जय जिनेंद्र
जय जिनेंद्र जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र बोलिए।
जय जिनेंद्र की ध्वनि से, अपना मौन खोलिए॥
जय जिनेंद्र ही हमारा, एक माप मंत्र हो।
जय जिनेंद्र बोलने को, हर मनुज स्वतंत्र हो॥
जय जिनेंद्र बोल-बोल, खुद जिनेंद्र हो लिए।
जय जिनेंद्र जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र बोलिए॥
हे जिनेंद्र! तान दो, माँ का वरदान दो।
कर रहे हम प्रार्थना, मम प्रार्थना पर ध्यान दो॥
जय जिनेंद्र बोल-बोल, हृदय के द्वार खोलिए।
जय जिनेंद्र जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र बोलिए॥
पाप छोड़ धर्म जोड़, है जिनेंद्र देशना।
अष्ट कर्म को मरोड़, है जिनेंद्र देशना॥
जाग-जाग-जग चेतन, बहुकाल सो लिए।
जय जिनेंद्र जय जिनेंद्र, जय जिनेंद्र बोलिए॥
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3008.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है