जैन नैतिक शिक्षा द्वितीय-भाग — जैन स्वाध्याय सामग्री | Jain Naitik Siksha Dwitiy-Bhag

जैन नैतिक शिक्षा द्वितीय-भाग

जैन नैतिक शिक्षा

(JAIN MORAL EDUCATION)

द्वितीय-भाग
(PART-II)

लेखक एवं सम्पादक
डॉ. बी. सी. जैन, जयपुर

प्रकाशक
जैन पाठशाला समिति, जयपुर

संस्करण

द्वितीय 1000 प्रतियाँ (18-अप्रैल-2018)
कृति : जैन नैतिक शिक्षा (द्वितीय-भाग)
लेखक एवं सम्पादक : डॉ. बी. सी. जैन
मूल्य : ₹ 10/-
प्रकाशक : जैन पाठशाला समिति, जयपुर
केन्द्रीय कार्यालय : 164/267, हल्दी घाटी, मार्ग
प्रताप नगर, जयपुर - 302033
फोन- 0141-2796595, मो.8955872717,
www.jainpathshala.in

Printed by : Pixel 2 Print, Jaipur (Hemant Jain)
Cell : 9509529502, [email protected]

विषय सूची

  1. देव-स्तुति 5
  2. षट् आवश्यक 6
  3. पाप 8
  4. कषाय 10
  5. जीव-अजीव 12
  6. भक्ष्य-अभक्ष्य 15
  7. द्रव्य 17
  8. भगवान महावीर 20
  9. अमूल्य तत्त्व विचार 23

आभार

इस कृति में जिन आचार्यों, विद्वानों की रचनाओं का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से
समावेश किया गया है, उनका हृदय से आभार ज्ञापित करते हैं। - सम्पादक

प्रकाशकीय

जैन धर्म विश्व का एक मात्र वैज्ञानिक धर्म है जिसके सिद्धान्त वस्तु स्वरूप का सम्यक् प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। जैन धर्म के मूल सिद्धान्तों को सरल, सुबोध, रोचक शैली में समझाने के उद्देश्य से जैन नैतिक शिक्षा भागों की क्रमबद्ध श्रृंखला प्रकाशित कर रहे हैं। भौतिकवादी युग में भोग-विलासिवादी पाश्चात्य संस्कृति ने न केवल जैनों को अपितु सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति को अपने प्रभाव में ले लिया है जिसके परिणाम स्वरूप शाकाहारी व्यक्ति अपना शुद्ध भोजन छोड़कर अभक्ष्य भक्षण कर रहे हैं। बच्चे एवं युवा धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं, कम्प्यूटर एवं मोबाईल ने मानसिक शांति भंग कर दी है, प्रतिस्पर्द्धा की इस अंधी दौड़ में हम अपने अस्तित्व को नष्ट करते जा रहे हैं।
बच्चे हमारा भविष्य हैं अतः उनमें धार्मिक संस्कारों को बीजारोपित करना हमारा कर्तव्य है। जैन पाठशाला समिति ने इस कार्य की महत्ता को समझते हुए शिखर व्याख्यानमाला, धार्मिक शिक्षण शिविर तथा राष्ट्रीय स्तर पर जैन पाठशालाओं का संचालन कर ज्ञान की अलख जगाने का प्रयास किया है।
शिक्षण शिविरों, जैन विद्यालयों एवं जैन पाठशालाओं में अध्ययन कराने के उद्देश्य से जैन नैतिक शिक्षा पाठ्य पुस्तक अपनी पाठ्य सामग्री और रोचक प्रस्तुतिकरण के कारण सभी को प्रभावित करेगी। आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए प्रत्येक भाग के पाठों के विषयों को कम्प्यूटर के माध्यम से एनिमेशन के रूप में प्रस्तुत किया गया है साथ ही हमारी वेबसाईट पर भी उपलब्ध है।
समिति के मंत्री तथा जैन पाठशाला के निदेशक, जैन दर्शन एवं भाषा के तलस्पर्शी युवा विद्वान डॉ. बी.सी. जैन ने अथक प्रयास कर इन पुस्तकों को मूर्तरूप दिया है। श्रीमती प्रज्ञा जैन ने अपना बहुमूल्य समय देकर भागों के निर्माण में योगदान दिया। पिक्सल 2 प्रिंट के श्री हेमन्त जैन ने भागों के प्रकाशनार्थ जो अथक प्रयास किया उसके लिये धन्यवाद देता हूँ। आप सभी सुधी पाठकों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं।

अध्यक्ष
जैन पाठशाला समिति

हमारे दैनिक कर्तव्य

  • अभिवादन में जय जिनेन्द्र ही बोलें।
  • सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोड़ने के बाद तथा सायं सोने से पूर्व एवं खाने से पूर्व नौ बार णमोकार मंत्र अवश्य बोलना चाहिए, इससे मन शुद्धि होती है।
  • प्रतिदिन देव-दर्शन (मन्दिर जी) करना चाहिए।
  • अभक्ष्य पदार्थ (पिज्जा, बर्गर, पेस्ट्री, केक, कोल्ड ड्रिंक्स, आलू, ब्रैडफर्स, आईसक्रीम, चॉकलेट, आलू, प्याज आदि) नहीं खाने चाहिए। इससे हिंसा से बचते हैं तथा स्वस्थ रहते हैं।
  • रात्रि में भोजन नहीं करना तथा पानी छान कर पीना चाहिए!
  • सभी से शिष्टाचार पूर्वक व्यवहार करना चाहिए!
  • हमें हमेशा हित-मित-प्रिय मधुर वचन बोलना चाहिए!
  • सभी लोगों का यथायोग्य सम्मान करना चाहिए!
  • पाप (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह) तथा कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) को त्याग कर जीवन पवित्र बनाना चाहिए!
  • हमेशा मन लगाकर पढ़ना चाहिए!
  • जिनवाणी को कण्ठस्थ करना चाहिए इससे बुद्धि का विकास होता है!
  • वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी कुदेववादि को नमस्कार नहीं करना चाहिए। इससे जैन धर्म में दृढ़ता आती है!
  • मैं कौन हूँ? भगवान कौन हैं? तथा मैं भगवान कैसे बन सकता हूँ, इसका चिंतन प्रतिदिन करना चाहिए!
  • भगवान से हमें कोई लौकिक भोग सामग्री प्राप्ति की इच्छा नहीं करनी चाहिए, इससे पाप बन्ध होता है!

देव स्तुति

प्रभु पतित पावन, मैं अपावन, चरन आयो सरन जी।
यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन-मरन जी।।
तुम ना पिछान्यो आन मान्यो, देव विविध प्रकार जी।
या बुद्धिसेंती निज न जान्यो, भ्रम गिन्यो हितकार जी।।
भव विकट वन में करम बैरी, ज्ञान धन मेरो हरयो।
तब इष्ट भुल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट गति धरतो फिरयो।।
धन घड़ी यो धन दिवस यों हो, धन जनम मेरो भयो।
अब भाग्य मेरो उदय आयो, दरश प्रभु जी को लख लयो।।
छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासा पै धरें।
वसु प्रातिहार्य अनन्त गुण जुत, कोटि रविछवि को हरें।।
मिट गयो तिमिर मिथ्यात मेरो, उदय रवि आतम भयो।
मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लयो।।
मैं हाथ जोड़ नवाव मस्तक, वीनऊँ तुव चरन जी।
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारन-तरन जी।।
जाचूँ नहीं सुरवास पुनि, नरराज परिजन साथ जी।
‘बुध’ जाचूँ तुव भक्ति भव-भव, दीजिये शिवनाथ जी।।

पाठ - 1

षट् आवश्यक

महान पुण्योदय से मनुष्य जीवन मिला है। इसमें भी जैन कुल, निरोगी काया आदि उत्तम निमित्त मिलने पर जो दान, पूजादि षट् आवश्यक कार्यों को नहीं करता है, उसे आचार्यों ने पशु के समान कहाँ है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को षट् आवश्यक कार्यों को प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए। आचार्य पद्मनन्दि ने पंचविंशति में लिखा है—
देवपूजा गुरुपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः।
दानं चेति गृहस्थानां, षट्कर्माणि दिने दिने॥
षट् आवश्यक इस प्रकार हैं—

  1. देवपूजा - मन-वचन-काय से जिनेन्द्र भगवान के गुणों का चिन्तन-मनन करना देवपूजा कहलाती है। देवपूजा दो प्रकार की होती है- भावपूजा एवं द्रव्य पूजा। गुणों का स्तवन करना भावपूजा है तथा अष्ट द्रव्य की सामग्री से पूजन करना द्रव्य पूजा है।
    सर्वप्रथम छने हुए जल से स्नान कर, शुद्ध धुले हुये वस्त्र पहनकर मंदिरजी आना चाहिए। (देवदर्शन विधि पूर्व में पढ़ चुके हैं।) प्रासुक जल से जिनेन्द्र देव का अभिषेक करके, विनय पूर्वक, णमोकार मंत्र, स्वस्ति मंगल पाठ बोलकर विधि पूर्वक देव-शास्त्र-गुरु आदि की आह्वान-स्थापना-सन्निधिकरण करते हुये क्रमशः जल, चन्दन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल (त्रस जीव को हिंसा से रहित अष्ट द्रव्य) से पूजन करनी चाहिए। तत्पश्चात् शेष अर्घ चढ़ाने के बाद शान्ति पाठ व विसर्जन पाठ बोलना चाहिए।
  2. गुरु उपासना - समस्त परिग्रह रहित निग्रन्थ वीतरागी 28 मूलगुणधारी दिगम्बर मुनिराज को मन-वचन-काय पूर्वक वन्दन करना चाहिए यथा योग्य भक्ति पूर्वक आहारचर्या भी कराना तथा उनके जैसा बनने का भाव भाना ही गुरु उपासना है।

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 6

  1. स्वाध्याय - जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे हुए और गणधरों द्वारा निरूपित तथा आचार्यों द्वारा लिखे हुए आगम शास्त्रों को पढ़ना-पढाना, चिन्तन करना ही स्वाध्याय है। स्वाध्याय के पाँच भेद हैं- वांचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्म उपदेश।
  2. संयम - मन और इन्द्रियों को संयमित करना ही संयम कहलाता है। संयम दो प्रकार का होता है- इन्द्रिय संयम तथा प्राणी संयम। पाँचों इन्द्रियों और मन को वश में करना इन्द्रिय संयम कहलाता है। पाँच स्थावर और त्रस जीवों का घात नहीं करना प्राणी संयम कहलाता है।
  3. तप - इच्छाओं का निरोध करना तप कहलाता है। छह अन्तरंग और छह बहिरंग की अपेक्षा तप के बारह भेद होते हैं। इनको अपनी शक्ति अनुसार नित्य करना चाहिए।
  4. दान - मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका को निज और पर के कल्याण के लिये उपयोगी वस्तु को देना दान कहलाता है। दीन-दुखियों की भी आवश्यकतानुसार सहायता करना करुणा दान कहलाता है। दान के चार भेद हैं- (1) आहार दान (2) ज्ञान दान (3) औषधि दान (4) अभय दान।
    शब्दार्थ : प्रासुक जल - गर्म पानी, त्रस जीव - 2-5 इन्द्रिय तक के जीव त्रस जीव कहलाते हैं, स्थावर - एकेन्द्रिय जीव स्थावर कहलाते हैं।

अभ्यास

मौखिक

  1. तप के … प्रकार होते हैं। (10/12)
  2. दान … प्रकार का होता है। (4/5)
  3. पूजा … प्रकार की है। (दो / तीन)
  4. दिगम्बर साधु के … मूलगुण होते हैं। (28/30)

लिखित

प्रश्न 1. श्रावक के षट् आवश्यक कौन-से हैं?
प्रश्न 2. स्वाध्याय का क्या अर्थ है, भेद लिखिए?
प्रश्न 3. तप किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार के हैं?
प्रश्न 4. दान कितने प्रकार का है?
प्रश्न 5. संयम किसे कहते हैं? यह कितने प्रकार का है?

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 7

पाठ - 2

पाप

संसार में जीव अच्छे और बुरे दो प्रकार के कार्य हमेशा करता है जिसे पुण्य एवं पाप कहते हैं।
पाप - बुरे कार्यों का करना पाप कहलाता है। पाप पाँच प्रकार के होते हैं -
हिंसा - किसी जीव को मारना, सताना, उसका दिल दुःखाना आदि की हिंसा कहते हैं। हिंसा दो प्रकार की होती है - द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा। मारने के भाव करना भाव हिंसा है तथा किसी जीव को शारीरिक कष्ट देना द्रव्य हिंसा है।
झूठ - जिस बात या जिस वस्तु को जैसा देखा या सुना हो वैसा न कहना झूठ है; जैसे- किसी ने अपने सामने चोरी की तो भी पूछने पर कहना कि इसने चोरी नहीं की।
चोरी - किसी की गिरी, रखी या भूली हुई वस्तु को ग्रहण करना अथवा उठाकर किसी अन्य को दे देना अथवा ग्रहण करने का भाव करना चोरी है; जैसे- रास्ते में पड़े हुये या वस्तु उठा लेना या उठाकर दूसरे को दे देना।
कुशील - बुरे कार्य करना कुशील है; जैसे- गन्दी पिक्चर देखना, बुरे वचन बोलना आदि।
परिग्रह - जमीन, मकान, धन, धान्य, गाय, बैल, वाहन आदि से मोह रखना। सांसारिक वस्तुओं की इकट्ठा करने में लालसा रखना परिग्रह है; जैसे- अनावश्यक बहुत कपड़े और जेवरों का इकट्ठा करना।
पाप का सेवन करने वाला पापी व्यक्ति कहलाता है। पापी व्यक्ति को समाज में बुरी दृष्टि से देखा जाता है तथा कुगति के बन्ध का कारण है। पाप के समान पुण्य भी संसार बन्ध का कारण है लेकिन पाप की अपेक्षा पुण्य को श्रेष्ठ कहा है तथा दोनों से उपयोग हटाकर आत्मा में लगाना मोक्ष सुख का कारण है।

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 8

अभ्यास

मौखिक

  1. बुरे कार्य को … कहते हैं। (पाप/प्रमाद)
  2. पाप … होते हैं। (पांच/चार)
  3. किसी की पड़ी हुई वस्तु को उठाने की इच्छा … है। (चोरी/कुशील)
  4. हिंसा … प्रकार की होती है। (दो/तीन)

लिखित

प्रश्न 1. पाप किसे कहते हैं? भेद लिखिए।
प्रश्न 2. हिंसा किसे कहते हैं? भेद लिखिए।
प्रश्न 3. पापी किसे कहते हैं?
प्रश्न 4. पाप से बचने के उपाय लिखिये?
प्रश्न 6. हमें झूठ क्यों नहीं बोलना चाहिए?

जिनवाणी स्तुति

मिथ्यातम नाशयवे को, ज्ञान के प्रकाशवे को।
आपा-पर भासयवे को, भानुसी बखानी है।।
छहों द्रव्य जानवे को, बन्ध विधि भानवे को।
स्व-पर पिछानवे को, परम प्रमानी है।।
अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को।
काहु ना सतायवे को, भव्य उर आनी है।।
जहाँ तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को।
सुख विस्तारवे को, यही जिनवाणी है।।
हे जिनवाणी भारती! तोहे जपू दिन रैन।
जो तेरी शरणा गहे, सो पावे सुख चैन।।
जा वाणी के ज्ञान तैं, सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक नवो, सदा देत हो ढोक।।

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 9

पाठ - 3

कषाय

जो आत्मा को कसे अर्थात् दुःख दे या पराधीन करे उसे कषाय कहते हैं
अथवा जो आत्मा के चारित्र गुण को प्रकट नहीं होने दे उसे कषाय कहते हैं। ये
चार प्रकार की होती है-

  1. क्रोध - गुस्सा करने को क्रोध कहते हैं; जैसे- मित्र या भाई-बहिन ने
    अपनी वस्तु हमें नहीं दी तो हमें गुस्सा आना। यह क्रोध कषाय हुई।
  2. मान - अहंकार, घमण्ड (अभिमान) को मान कहते हैं; जैसे - ज्ञायक
    अपने धन, ज्ञान और रूप का घमण्ड करता है तो उसे मान कषाय हुई।
  3. माया - छल-कपट करने को माया कहते हैं; जैसे- श्रुति हमेशा टी.वी.
    पर कार्टून देखती रहती है, किन्तु माँ के आने पर उन्हें धोखा देने को पुस्तक पढ़ने
    लगती है तो उसके माया कषाय हुई।
  4. लोभ - लालच या तृष्णा को लोभ कषाय कहते हैं; जैसे- अंकित व्यर्थ में
    बहुत सी वस्तुएँ इकट्ठी करता है, वह लोभी हुआ।

कषाय से हानि - कषाय से आत्मा का कुगति में पतन, कर्म का बन्ध, पापों
में प्रवृत्ति, लोक में अपयश और दुःख होता है।

अभ्यास

मौखिक

  1. अहंकार को … कहते हैं। (क्रोध/मान)
  2. लालच या तृष्णा को … कहते हैं। (लोभ/माया)
  3. क्रोधी व्यक्ति हमेशा … रहता है। (दुःखी/सुखी)
  4. जो आत्मा के चारित्र गुण को प्रकट न होने दे … वह है। (पाप/कषाय)

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 10

लिखित

प्रश्न 1. कषाय किसे कहते हैं? भेद लिखिए।
प्रश्न 2. क्रोध करने से क्या हानि होती है ?
प्रश्न 3. लोभ किसे कहते हैं?
प्रश्न 4. कषाय का फल बताइए ?
प्रश्न 5. कषाय को छोड़ने के उपाय लिखिए ?

आत्म ज्ञान

आत्म ज्ञान को प्राप्त करेंगे।
पंच प्रभु का ध्यान धरेंगे।।1।।
रात्रि भोजन नहीं करेंगे।
अभक्ष्य भक्षण नहीं करेंगे।।2।।
बिना छना जल काम न लेंगे।
बुरा किसी को नहीं कहेंगे।।3।।
सभी बड़ों का सम्मान करेंगे।
पाप कषाय का त्याग करेंगे।।4।।
जिन दर्शन नित्य करेंगे।
व्रत नियमों का पालन करेंगे।।5।।
जिनवाणी का पठन करेंगे।
रत्नत्रय को प्राप्त करेंगे।।6।।

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 11

पाठ - 4

जीव-अजीव

(जीव-अजीव का सामान्य ज्ञान पूर्व में कर चुके हैं, यहाँ विशेष ज्ञान करेंगे।)
जीव - जो जानता है सुख-दुःख का अनुभव करता है, उसे जीव कहते हैं;
जैसे - आत्मा जीव है।

जीव

संसारी
मुक्ति
स्थावर
गस
जल
दो इन्द्रिय
अग्नि
तीन इन्द्रिय
वायु
चार इन्द्रिय
वनस्पति
पांच इन्द्रिय
पृथ्वी
संगी
असंगी
सकल परमात्मा
(अरहंत)
निकल परमात्मा
(सिद्ध)

अजीव - जो जानता देखता नहीं है सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता, उसे अजीव कहते हैं; जैसे - शरीर अजीव है।
मुक्त - जो संसार के जन्म-मरण से मुक्त हो गये है, उन्हें मुक्त जीव कहते हैं; मुक्त जीव दो प्रकार के हैं -

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 12

1. सकल परमात्मा -

जो शरीर सहित है जिन्होंने चार घातिया कर्मों को नष्ट कर दिया है उन्हें सकल परमात्मा (अरहंत) कहते हैं।

2. निकल परमात्मा -

जो शरीर रहित है अर्थात् जिनके आठों कर्म नष्ट हो गये हैं और लोक के अग्रभाग में विराजमान है, वे निकल परमात्मा (सिद्ध) हैं।
संसारी - जो जीव संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं, उन्हें संसारी जीव कहते हैं। यह दो प्रकार के हैं - स्थावर एवं त्रस।

1. स्थावर -

वे जीव जिनका स्थावर नाम कर्म का उदय है, उन्हें स्थावर जीव कहते हैं। इन जीवों के एक स्पर्शन इन्द्रिय होती है। स्थावर पाँच प्रकार के होते हैं -
जलकायिक - जल ही जिनका शरीर है उन्हें जलकायिक जीव कहते हैं।
अग्निकायिक - अग्नि ही जिनका शरीर है वह अग्निकायिक जीव होते हैं।
वायुकायिक - वायु ही जिनका शरीर है उन्हें वायुकायिक जीव कहते हैं।
वनस्पतिकायिक - वनस्पति ही जिनका शरीर है वह वनस्पतिकायिक जीव कहलाते हैं; जैसे- पेड़-पौधे।
पृथ्वीकायिक - पृथ्वी ही जिनका शरीर है वे पृथ्वीकायिक जीव कहलाते हैं।

2. त्रस -

जिन जीवों के त्रस नाम कर्म का उदय होता है, वे त्रस जीव कहलाते हैं। दो इन्द्रिय से लेकर पांच इन्द्रिय तक के जीव त्रस कहलाते हैं।
दो इन्द्रिय - वे जीव जिनके स्पर्शन और रसना दो इन्द्रियाँ होती हैं वे दो इन्द्रिय जीव कहलाते हैं; जैसे - शंख, लट, केंचुआ आदि।
तीन इन्द्रिय - जिन जीवों के स्पर्शन, रसना एवं घ्राण तीन इन्द्रियाँ होती हैं; वे तीन इन्द्रिय जीव हैं; जैसे- चींटी, जूँ, खटमल आदि।
चार इन्द्रिय - जिन जीवों के स्पर्शन, रसना, घ्राण तथा चक्षु इन्द्रियाँ होती हैं;

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 13

जैसे - मच्छर, मक्खी, भौंरा आदि।
पांच इन्द्रिय - जिन जीवों के स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु तथा श्रोत (कर्ण) ये पांच इन्द्रियाँ होती है वे पंचेन्द्रिय जीव कहलाते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं - संगी और असंगी।
संगी - मन सहित को संगी कहते हैं अर्थात् जिनमें सोचने समझने की शक्ति है, वे संगी जीव कहलाते हैं; जैसे - मनुष्य, नारकी, देव, हाथी, घोड़ा आदि।
असंगी - वे जीव जिनमें मन नहीं होता है, अर्थात् जिनमें सोचने समझने की शक्ति नहीं होती है वे असंगी पंचेन्द्रिय जीव कहलाते हैं; जैसे - जल में रहने वाला सांप।

जीव - अजीव की पहचान से लाभ

जीव-अजीव के स्वरूप को पहचानकर कर हम अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं तथा जीवों के प्रति दया (अहिंसा) भाव धारण कर सुखी हो सकते हैं।

अभ्यास

मौखिक

  1. स्थावर जीव के … भेद हैं। (पांच/चार)
  2. शंख और केंचुआ … इन्द्रिय जीव हैं। (दो/चार)
  3. जिनमें मन नहीं होता है उन्हें … कहते हैं। (संगी/असंगी)
  4. शरीर रहित को … परमात्मा कहते हैं। (अरहंत/सिद्ध)

लिखित

प्रश्न 1. जीव किसे कहते हैं? भेद सहित लिखिए।
प्रश्न 2. अजीव किसे कहते हैं?
प्रश्न 3. जीव-अजीव की पहचान से क्या लाभ है?
प्रश्न 4. 10 जीव द्रव्यों तथा 10 अजीव द्रव्यों के नाम लिखिए।
प्रश्न 5. पंचेन्द्रिय जीव किसे कहते हैं? भेद सहित लिखिए।

जैन नैतिक शिक्षा : द्वितीय-भाग / 14

पाठ - 5

भक्ष्य - अभक्ष्य

(दो मित्र आपस में वार्तालाप करते हैं।)

ध्रुव : जय-जिनेन्द्र भव्य!
भव्य : जय-जिनेन्द्र! और सुनाओ क्या हाल हैं?
ध्रुव : मित्र! कल मैंने टी.वी. पर रात्रि भोजन से संबंधित एक न्यूज देखी जो तुम्हें बताना चाहता हूँ।
भव्य : जल्दी बताओ।
ध्रुव : अपने शहर में एक जगह रात्रि में पार्टी चल रही थी। वहाँ लोगों के लिए रात में भोजन बन रहा था। अँधेरे में किसी ने देख नहीं पाया और खाने में एक जहरीला कीड़ा गिर गया। रात में ही भोज हुआ, सभी ने भोजन किया पर कुछ जैनी श्रावक बोले कि हम तो रात में नहीं खाएँगे, सबने उनको खूब हँसी उड़ाई। यह बड़े धर्मात्मा बनने फिरते हैं, रात में नहीं खायेंगे तो सीधे स्वर्ग जायेंगे। पर हुआ यह कि भोजन करते ही सभी बेहोश होने लगे। दूसरों को स्वर्ग भेजने वाले स्वयं स्वर्ग जाने की तैयारी करने लगे। पर जल्दी ही उन व्यक्तियों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। वहाँ मुश्किल से आधे लोगों को ही बचाया जा सका। यदि वे भी रात में खाते तो एक भी व्यक्ति नहीं बचता। इसलिए किसी को भी रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।
भव्य : रात्रि भोजन में क्या-क्या दोष हैं?
ध्रुव : यह तो मैंने रात्रि भोजन से होने वाली, प्रत्यक्ष (सामने) दिखने वाली हानि की ओर संकेत किया है, पर वास्तव में रात्रि में गृद्धता (आसक्ति) अधिक होने से राग की तीव्रता अधिक रहती है, अतः जीव हिंसा के साथ आत्म साधना में भी बाधक है।

भव्य : आपने बड़ी अच्छी बात बताई। हम सबको यह नियम कर लेना चाहिए कि आज से रात में भोजन नहीं करेंगे।
सम्यक : पानी छान कर क्यों पीते हैं?
ध्रुव : वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि एक बूँद पानी में हजारों (लगभग 36450) जीव होते हैं। जो आँख से दिखाई नहीं देते हैं। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चलता है। अतः हमेशा पानी छानकर ही पीना चाहिए तथा आलू, प्याज, लहसुन, फास्ट फूड, केक आदि अभक्ष्य में भी हिंसा होती है। इसलिए उनका भी त्याग कर देना चाहिए।
भव्य : मित्र, आज आपने बहुत अच्छी बात बताई, मैं तो इन सब का त्याग करता हूँ और लोगों को भी त्याग करने के लिए प्रेरित करूँगा।

अभ्यास

मौखिक

  1. रात्रि भोजन करने से … होता है। (पुण्य / पाप)
  2. 36450 जीव … पानी में होते हैं। (एक बूँद/एक लीटर)
  3. जो खाने योग्य पदार्थ नहीं हैं उन्हें … कहते हैं। (अभक्ष्य / भक्ष्य)
  4. आलू प्याज आदि … हैं। (जमीकंद/ऊपरी कंद)

लिखित

प्रश्न 1. पानी छानकर क्यों पीना चाहिए?
प्रश्न 2. रात्रि भोजन से हमें क्या हानि है?
प्रश्न 3. अभक्ष्य क्यों नहीं खाना चाहिए?
प्रश्न 4. सदाचार पर अनुच्छेद लिखिए?
प्रश्न 5. भक्ष्य और अभक्ष्य किसे कहते हैं?

पाठ - 6

द्रव्य

(दो मित्र आपस में चर्चा करते हुए।)

जिनम : जय जिनेन्द्र आगम! मित्र क्या तुम विश्व के बारे में जानते हो?
आगम : जय जिनेन्द्र जिनम! हाँ, मैं जानता हूँ। हम स्कूल में भूगोल में पढ़ते हैं कि एशिया, अफ्रीका आदि सात महाद्वीप के समूह को विश्व कहते हैं।
जिनम : अगर सात महाद्वीपों का नाम विश्व है तो सौर मंडल (सूर्य, चन्द्रमा आदि) किसमें आयेंगे?
आगम : हाँ, तुम बात तो सही कह रहे हो, लेकिन हमने इतना विस्तार से ना तो पढ़ा है और ना ही सोचा है।
जिनम : कल हमने जैन पाठशाला में विश्व के बारे में पढ़ा था।
आगम : मित्र मुझे भी बताओ।
जिनम : तत्त्वार्थसूत्र में आचार्य उमास्वामी ने ‘छह द्रव्यों’ के समूह को विश्व कहा है।
आगम : द्रव्य क्या है?
जिनम : गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं।
आगम : द्रव्य कितने होते हैं? विस्तार से बताओ।
जिनम : जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

जीव द्रव्य

चेतन लक्षण वाले को जीव कहते हैं; (इसके बारे में पूर्व में विस्तार से जान चुके हैं।) जैसे - आत्मा।

पुद्गल द्रव्य

जिसमें रूप, रस, गन्ध और स्पर्श पाया जाता है, वह

परिभाषा

पुद्गल कहलाता है; जैसे - टेबल, कुर्सी आदि।
धर्म द्रव्य : जो चलते हुए जीव और पुद्गल को चलाने में सहायक हो उसे धर्म द्रव्य कहते हैं; जैसे - पानी मछली को चलाने में सहायक है।
अधर्म द्रव्य : ठहरे (रुके) हुए जीव और पुद्गल को ठहरने में सहायक हो, उसे अधर्म द्रव्य कहते हैं; जैसे - रुके हुए राहगीर को पेड़ की छाया।
आकाश द्रव्य : जो सभी द्रव्यों को अवगाहन (जगह) देता है, उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। यह दो प्रकार का है -
लोकाकाश - तीन लोक प्रमाण फैला हुआ है, इसमें अन्य पांच द्रव्य भी हैं।
अलोकाकाश - तीन लोक के बाहर केवल आकाश ही है उसे हम अलोकाकाश कहते हैं।
काल द्रव्य : पांचों द्रव्यों के परिणमन (परिवर्तन) में जो सहायक हो उसे काल द्रव्य कहते हैं। निश्चयकाल एवं व्यवहारकाल के भेद से यह दो प्रकार का होता है।

आगम : द्रव्य छह ही क्यों होते हैं?
जिनम : लोक की वस्तु व्यवस्था छह प्रकार से ही चलती है। अतः इनकी संख्या छह ही है।

आगम : जब सारा काम छह द्रव्यों से ही चलता है तो फिर हम क्या करते हैं?
जिनम : मित्र, बहुत सुन्दर प्रश्न किया आपने। यही विषय समझने के लिए द्रव्यों का ज्ञान किया है। प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है, कोई द्रव्य किसी का कर्ता-धर्ता नहीं है। यह विश्व अनादिनिधन है विश्व को किसी ने भी नहीं बनाया तथा कभी भी इसका नाश नहीं होगा। भगवान जगत का कर्ता नहीं मात्र ज्ञाता-द्रष्टा है। प्रत्येक जीव अपने अकर्ता स्वभाव को समझ

ले तो शीघ्र ही अरहंत, सिद्ध पद प्राप्त कर अनन्त सुखी हो सकता है।
आगम : जिनवाणी में कहा गया द्रव्य का स्वरूप तो समझ में आ गया, लेकिन इसके जानने से वर्तमान जीवन में क्या लाभ है?
जिनम : प्रतिदिन छोटी-छोटी बातों में जो हम सुखी-दुःखी होकर आकुल-व्याकुल होते हैं, एक-दूसरे का भला-बुरा करने का भाव करते हैं, जबकि इसके कर्ता हम नहीं हैं। द्रव्यों का स्वरूप समझने से लौकिक एवं पारलौकिक शांति प्राप्त होगी।

अभ्यास

मौखिक

  1. गुणों के समूह को … कहते हैं। (तत्व / द्रव्य)
  2. आकाश द्रव्य … प्रकार का होता है। (दो / तीन)
  3. द्रव्यों के परिणमन में जो सहायक है उसे … कहते हैं। (धर्म द्रव्य /काल द्रव्य)
  4. चलते हुए जीव और पुद्गलों को … द्रव्य चलाता है। (धर्म / अधर्म)

लिखित

प्रश्न 1. द्रव्य किसे कहते हैं नाम बताइये?
प्रश्न 2. धर्म एवं अधर्म द्रव्य को स्पष्ट कीजिए?
प्रश्न 3. आकाश द्रव्य क्या कार्य करता है? इसके कितने भेद हैं?
प्रश्न 4. विश्व किसे कहते हैं? इसका निर्माण किसने किया है?
प्रश्न 5. द्रव्य को समझने से क्या लाभ है?
प्रश्न 6. किसी जीव को कोई सुखी-दुःखी कर सकता है क्या? स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 7. क्या भगवान हमें सुखी-दुःखी करते हैं? अपने शब्दों में लिखिए।

पाठ - 7

भगवान महावीर

(चौबीस तीर्थंकरों के नाम व चिह्न हम पूर्व में पढ़ चुके हैं यहाँ चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के बारे में पढ़ेंगे।)

शिक्षक : जय जिनेंद्र छात्रों! कल महावीर जयंती महोत्सव है। कल सुबह शहर में महावीर जयंती की शोभायात्रा निकलेगी तथा शाम को मंदिर जी में भगवान महावीर के सिद्धांतों पर विद्वान सभा में अपने विचार व्यक्त करेंगे अतः सभी छात्र समय पर पहुँचकर धर्मलाभ लें।
भाविक : जय जिनेंद्र गुरुजी! आप ही बताइये भगवान महावीर कौन थे? कहाँ जन्मे थे?
शिक्षक : बच्चों! जैनधर्म में भगवान जन्मते नहीं, बनते हैं। जन्म तो आज से करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन बालक वर्द्धमान का हुआ था। बाद में वह बालक ही आत्म-साधना कर भगवान महावीर बना।
सर्वज्ञ : इससे यह ज्ञात होता है कि कोई भी आत्म-साधना कर भगवान बन सकता है। तो क्या बालक वर्द्धमान जन्म के समय हमारे जैसे ही थे?
शिक्षक : और नहीं तो क्या? यह बात अलग है कि वे जन्म से ही प्रतिभाशाली, आत्मज्ञानी, विचारावान, स्वस्थ और विवेकी बालक थे। साहस तो उनमें अपूर्व था, किसी से डरता तो उन्होंने सीखा ही नहीं था। अतः बालक उन्हें बचपन से ही अतिवीर कहने लगे।
भाविक : उन्हें सन्मति क्यों कहते हैं?
शिक्षक : महावीर ने अपने आत्म-ज्ञान का विकास कर पूर्ण ज्ञान (केवलज्ञान) प्राप्त किया कर लिया तब वे सन्मति भी कहलाने लगे। सबसे प्रबल रागद्वेष रूपी शत्रुओं को जीता था, अतः महावीर कहलाते हैं। उनके पाँच नाम प्रसिद्ध हैं - वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान और महावीर।
भाविक : उनके जन्म के समय तो उत्सव मनाया गया होगा? इसीलिए हम आज

परिभाषा

शिक्षक : भी उत्सव मनाते हैं क्या?
शिक्षक : हाँ, वे नाथवंशी क्षत्रिय राजकुमार थे, उनके पिता का नाम सिद्धार्थ व माता का नाम त्रिशला था। माता-पिता के साथ ही सारी प्रजा ने तथा स्वर्ग के देव तथा इन्द्र-इन्द्रणियों ने भी जन्मोत्सव मनाया था।
सर्वज्ञ : चौबीस तीर्थंकरों का ही जन्मोत्सव क्यों मनाया जाता है? औरों का क्यों नहीं?
शिक्षक : तीर्थंकरों का यह अन्तिम जन्म होता है, इसके बाद वे जन्म-मरण का नाश कर वीतराग और सर्वज्ञ बन जाते हैं। जन्म लेना अच्छी बात नहीं है। पर जिस जन्म से जन्म-मरण का नाश कर भगवान बना जा सके, वही जन्म सार्थक है।
भाविक : अच्छा तो आज जन्म मरण का नाश करने वाले का जन्मोत्सव है?
सर्वज्ञ : आचार्य जी! आपने उनके माता-पिता का नाम बताया, पर पत्नी और बच्चों का नाम तो बताया ही नहीं।
शिक्षक : उन्होंने शादी ही नहीं की थी, अतः पत्नी और बच्चों का प्रश्न ही नहीं उठता। उनके माता-पिता कोशिश करके हार गये, पर उन्हें शादी करने को राजी नहीं कर सके।
आदित्य : तो क्या वे साधु हो गये थे?
शिक्षक : और नहीं तो क्या? दिगम्बर साधु बिना ही कोई भगवान बन सकता है क्या? उन्होंने तीस वर्ष की युवा अवस्था में नग्न दिगम्बर दीक्षा लेकर घोर तपश्चरण किया था। लगातार बारह वर्ष की आत्म साधना के बाद उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई।
भाविक : इसका मतलब यह हुआ कि वे 42 वर्ष की उम्र में केवलज्ञानी अरहन्त बन गये थे।
शिक्षक : हाँ, फिर लगातार तीस वर्ष तक सारे भारत वर्ष में समवशरण सहित विहार तथा दिव्य ध्वनि द्वारा तत्व का उपदेश होता रहा, अंत में पावापुर में आत्म ध्यान में लीन होकर, 72 वर्ष की आयु में दीपावली (कार्तिक कृष्ण अमावस्या) के दिन निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
आदित्य : तो दीपावली भी उनकी मोक्ष की खुशी में मनाई जाती है?
शिक्षक : हाँ! हाँ!! दीपावली कहो चाहे महावीर निर्वाण उत्सव एक ही बात है। उस दिन उनके प्रमुख शिष्य इन्द्रभूति गौतम को केवलज्ञान भी प्राप्त हुआ था, वे गौतम गणधर के नाम से भी जाने जाते हैं।

भगवान महावीर की शिक्षाएँ

  • सभी आत्माएँ बराबर हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं है।
  • भगवान कोई अलग नहीं होते, जो जीव पुरुषार्थ करे, वही भगवान बन सकता है।
  • भगवान जगत का किसी भी वस्तु के कर्ता-धर्ता नहीं हैं, मात्र ज्ञाता-द्रष्टा ही हैं।
  • हमारी आत्मा का स्वभाव जानना देखना है, कषाय आदि करना नहीं है।
  • कभी किसी का दिल दुखाने का भाव मत करो।
  • झूठ बोलना और झूठ बोलने का भाव करना पाप है।
  • चोरी करना और चोरी करने का भाव करना बुरा काम है।
  • संयम से रहो, क्रोध से दूर रहो और अभिमानी न बनो।
  • छल-कपट करना और भावों में कुटिलता रखना बहुत बुरी बात है।
  • लोभी व्यक्ति सदा दुःखी रहता है।
  • हम अपनी ही गलती से दुःखी हैं और अपनी भूल सुधार कर सुखी हो सकते हैं।
  • दीपावली अहिंसा का पर्व है, इस दिन आतिशबाजी जलाकर हिंसा और पाप का कार्य न करें।

अभ्यास

प्रश्न 1. भगवान महावीर का संक्षिप्त जीवन परिचय दीजिए?
प्रश्न 2. भगवान महावीर की पाँच शिक्षाएँ लिखिए?
प्रश्न 3. संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए - दीपावली और महावीर जयन्ती।
प्रश्न 4. भगवान महावीर के कितने नाम थे? प्रत्येक की सार्थकता बताइये।
प्रश्न 5. भगवान महावीर का ही जन्म दिवस क्यों मनाया जाता है?

अमूल्य तत्व विचार

बहु पुण्य-पुंज प्रसंग से, शुभ देह मानव का मिला।
तो भी अरे! भव चक्र का, फेरा न एक भी टला।।
सुख प्राप्ति हेतु प्रयत्न करते, सुख्ख जाता दूर है।
तू क्यों भयंकर भाव-मरण, प्रवाह में चकचूर है।।1।।
लक्ष्मी बड़ी अधिकार भी, पर बढ़ गया क्या बोलिये।
परिवार और कुटुम्ब है क्या? बुद्धिजन्य पर तोलिये।।
संसार का बहना अरे! नर देह की यह हार है।
नहीं एक क्षण तुझको अरे! इसका विवेक विचार है।।2।।
निर्दोश सुख निर्दोश आनन्द, लो जहाँ भी प्राप्त हो।
यह दिव्य अन्तस्तत्व जिससे, बन्धनों से मुक्त हो।।
पर वस्तु में मूर्छित न हो, इसकी रहे मुझको दया।
वह सुख सदा ही त्याज्य रे! पश्चात् जिसके दुःख भरा।।3।।
मैं कौन हूँ? आया कहाँ से? और मेरा रूप क्या?
सम्बन्ध दुःखमय कौन है? स्वीकृत करूँ परिहार क्या।।
इसका विचार विवेकपूर्वक, शान्त होकर कीजिये।
तो सर्व आत्मिकज्ञान के, सिद्धान्त का रस पीजिये।।4।।
किसका वचन उस तत्व को, उपलब्धि में शिवभूत है।
निर्दोश नर का वचन रे! वह स्वानुभूति प्रसूत है।।
तारो अरे! तारो निजआत्मा, शीघ्र अनुभव कीजिये।
सर्वात्म में समदृष्टि दो, यह वचन हृदय लख लीजिये।।5।।

शिखर श्रुत संवर्धन समिति

164/267, हल्दी घाटी, मार्ग, प्रताप नगर, जयपुर - 302033
मो. 89555872717, [email protected]

उद्देश्य एवं गतिविधियाँ

वर्तमान में समिति द्वारा निम्न गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है -

  • जैन पाठशालाओं का सम्पूर्ण देश में संचालन करना।
  • प्रतिवर्ष विशिष्ट विद्वानों का आमंत्रित कर शिखर व्याख्यानमाला का आयोजन।
  • प्रतिभावान छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करना।
  • धार्मिक सत्साहित्य का प्रकाशन।
  • धार्मिक, सामाजिक गतिविधियों का संचालन।
  • पाण्डुलिपियों का संरक्षण।
  • आचार्यों के मूल ग्रंथों पर शोधकार्य करवाना।
  • धार्मिक शिक्षण शिविर आयोजित करना।
  • सामाजिक, सांस्कृतिक चेतना के कार्यक्रम।

संजय सेठी
अध्यक्ष
मो. 9314134934

डॉ. बी. सी. जैन
मंत्री
मो. 9414769937

काव्य

मैं तानानंद स्वभावी हूँ

मैं तानानंद स्वभावी हूँ॥टेक॥
मैं हूँ अपने में स्वयं पूर्णा, पर की मुझमें कुछ गड़ा नहीं।
मैं अरस अरूपी अस्पर्शी, पर से कुछ भी सम्बद्ध नहीं॥1॥

मैं रंग-राग से भिन्न भेद से, भी मैं भिन्न निराला हूँ।
मैं हूँ अखण्ड चैतन्य पिण्ड, निज रस में रमने वाला हूँ॥2॥

मैं ही मेरा कर्ता धर्ता, मुझमें पर का कुछ काम नहीं।
मैं मुझमें में रमने वाला हूँ, पर में मेरा विश्राम नहीं॥3॥

मैं शुद्ध-बुद्ध-अविरुद्ध एक, पर परागति से अप्रभावी हूँ।
आत्मानुभूति से प्राप्त तपश्च, मैं तानानंद स्वभावी हूँ॥4॥


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3009.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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