जैन-धर्म की प्राचीनता - जैन स्वाध्याय सामग्री | Jain Dhrm ki Prachinata

पृष्ठभूमि

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अनुक्रमणिका

पृष्ठभूमि

कविवर व्यास की तरह यदि जैनदर्शन का सार दो शब्दों में कहना हो तो कहा जा सकता है कि -
‘रत्नत्रय ही मुक्ति का मार्ग है’
रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र तीनों की एकरूपता ही मोक्षमार्ग है।
मोक्षमार्ग अर्थात् दुःखों से मुक्ति का उपाय, विकारों से मुक्ति का उपाय। प्रत्येक संसारी जीव दुःखी है और सुखी होना चाहता है, निराकुलरूप सुख मोक्ष में है पर उसे सच्चा मोक्षमार्ग ज्ञात न होने से वह उसे प्राप्त नहीं कर पाता; अतः मोक्षमार्ग बतलाने का प्रयत्न ही समस्त जैनागम में किया गया है।
जीव व पुद्गल (कर्म और शरीर) अनादिकाल से एकमेक हो रहे हैं। ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मों के उदय में जीव के मोह-राग-द्वेषरूप परिणाम (भावकर्म) होते हैं और मोह-राग-द्वेष होने पर आत्मा का द्रव्यकर्मों से संबंध होता है, उसके फलस्वरूप देहादि की स्थिति बनती रहती है और आत्मा मोहादिभावों से दुःखी हुआ करता है। जीव की इसी दुःखान्धता का नाम ही ‘संसार’ है और दुःखों से मुक्त पूर्ण सुखी हो जाने का नाम है ‘मोक्ष’। दुःखों से छूटने के उपाय का कहते हैं ‘मोक्षमार्ग’।
जैनागमों के उपदेशों का केन्द्र बिन्दु ‘आत्मा’ है; अतः आत्मतत्त्व के प्रतिपादन के लिए परद्रव्यों का जितना और जो कथन आवश्यक है, उतना

  1. अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
    परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम्।।
  2. तत्त्वार्थसूत्रः आचार्य उमास्वामी; अध्याय - 1, सूत्र - 1

ही करना सम्यग्दर्शन, विपरीताभिनिवेश रहित आत्मस्वरूप का ज्ञान सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान रहित आत्मस्वरूप में लीनता सम्यक्चारित्र है।

रत्नत्रय साक्षात् मोक्ष का कारण है, मोक्षरूप ही है। यह कर्मबंध का कारण कभी भी नहीं हो सकता; क्योंकि बंध के कारणभूत मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग का रत्नत्रय में अभाव है; अतः ‘रत्नत्रय मुक्ति का ही कारण है’ तथा मुक्ति की प्राप्ति रत्नत्रय से ही होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं; अतः ‘रत्नत्रय ही मुक्ति का कारण है।’
समस्त जैनागम मोक्ष और मोक्षमार्ग के प्रतिपादन में ही समर्पित है; क्योंकि संसारी प्राणियों को मुक्ति का उपाय बताना ही जैनागम की रचना का मूल उद्देश्य रहा है।
जैनागम में प्रतिपादित विषयवस्तु एवं अनेक दार्शनिक विचारों को हम निम्नानुसार वर्गीकृत कर सकते हैं -

मोक्षमार्ग

रत्नत्रय
सम्यग्दर्शन
(द्रव्य व्यवस्था)
सम्यग्ज्ञान
(प्रमाण व्यवस्था)
सम्यक्चारित्र
(आचरण व्यवस्था)
देशचारित्र
सकलचारित्र
षड्द्रव्य
(द्रव्य व्यवस्था)
सात तत्त्व और नौ पदार्थ
(तत्त्व व्यवस्था)

और नहीं कथन जैनागमों में मुख्यरूप से वर्णित है। उनमें जीव का प्रतिपादन तो जीव के समझने के लिए ही है, किन्तु अजीव द्रव्यों का प्रतिपादन भी जीव (आत्मा) को समझने के लिए ही है; क्योंकि आत्मा का हित तो आत्मा के जानने में है। अतः आत्मा को सुख-शांति प्राप्त कराने वाला जैन तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित धर्म मात्र ‘धर्म’ नहीं, ‘आत्मधर्म’ है; यही आत्मधर्म मोक्ष का मार्ग है, दुःखों से छूटने का उपाय है।
जैनागमअनुसार वस्तु का स्वभाव तो सदा विद्यमान ही है, उसे क्या छोड़ना और क्या पाना? उसे तो जानना है, समझना है। अज्ञानी ने आज तक उसे समझा नहीं, उसकी श्रद्धा नहीं की, उसका अनुभव नहीं किया। अतः आत्मस्वभाव का साक्षात्कार करना ही एकमात्र कर्तव्य है। स्वभाव के साक्षात्कार से जो स्वभाव पर्याय प्रकट होती है, वही परमार्थ धर्म है, उसे ही पाना है। आत्मसन्मुख होकर आत्मा को मानना, जानना और उसी में रम जाना धर्म है, जिसे क्रमशः सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र कहते हैं; रत्नत्रय धर्म कहते हैं। इन तीनों की एकता ही मुक्ति का मार्ग है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र - तीनों पृथक्-पृथक् मुक्ति के मार्ग नहीं हैं; अपितु तीनों की एकतारूप रत्नत्रय ही मुक्ति का मार्ग है; अतः जैनागमअनुसार मुक्तिमार्ग तीन नहीं, एक है।
श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र आत्मा के तीन गुण हैं। इनका स्वभाव परिणमन क्रमशः सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है। स्वभाव के अनुकूल परिणमन होने से ये धर्म हैं, सुख के कारण हैं और सुखरूप हैं।
मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र क्रमशः उन्हीं गुणों के विपरीत परिणमन हैं; अतः वे अधर्म हैं, दुःख के कारण हैं और दुःखरूप हैं।
आत्मा अथवा सात तत्त्व संबंधी विपरीत मान्यता (श्रद्धान) को मिथ्यादर्शन, तत्त्वसंबंधी विपरीत ज्ञान अथवा मिथ्यादर्शन सहित ज्ञान को मिथ्याज्ञान और मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान से युक्त कषाय एवं पंचेंद्रिय विषय रूप प्रवृत्ति को मिथ्याचारित्र कहते हैं। इसके विपरीत आत्मा अथवा सम तत्त्वों के स्वरूप का विपरीताभिनिवेश रहित सम्यग्दर्शन

प्रथम अध्याय

जैनदर्शन के अनुसार जैनधर्म अनादि-अनंत है। इसके अनुसार वर्तमान चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर ने तो जैनधर्म की स्थापना की ही नहीं, प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव ने भी जैनधर्म की स्थापना नहीं की। उन्होंने तो धर्म का उपदेश किया है, प्रचार किया है। उन्होंने धर्म में धर्म नहीं, धर्म में खोई आस्था को स्थापित किया है। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह सदा से है, सनातन है।
जैनधर्म के अनुसार भगवान् धर्म की स्थापना नहीं करते; क्योंकि धर्म तो वस्तु के स्वभाव को कहते हैं तथा वस्तु का स्वभाव बनाया नहीं जा सकता। जो बनाया जा सके वह स्वभाव कैसा? वह तो जाना जाना है। जैनदर्शन के अनुसार भगवान् महावीर भी वस्तुस्वरूप को जानते हैं, बताते हैं, बनाते नहीं; क्योंकि तीर्थंकर भगवान् जगत् के तत्त्वज्ञ ज्ञाता-दृष्टा होते हैं, कर्ता-धर्ता नहीं।
तीर्थंकर भगवान् महावीर ने भी कोई नया धर्म नहीं चलाया, न ही कुछ संशोधन किए; अपितु पूर्व परम्परा से चले आ रहे मुक्तिमार्ग पर वे स्वयं चले एवं उन्होंने समस्त जीवों को मुक्ति का उपाय बताया; अतः बौद्ध धर्म के संस्थापक बुद्ध के समान महावीर को जैनधर्म का संस्थापक मानना बहुत बड़ी भूल है। भगवान् महावीर ने धर्म की स्थापना नहीं की, उसका प्रचार व प्रसार किया है।
इस संदर्भ में ‘जैनिज्म इन बिहार’ नामक पुस्तक के पृष्ठ पर श्रीमान् पी.सी. राय चौधरी का निम्न वक्तव्य दृष्टव्य है -
"कुछ आधुनिक लेखकों ने यह लिखकर साधारण भूल की है कि ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध असंतोष की भावनाएँ फैल जाने के कारण जैनधर्म की उत्पत्ति हुई। इस गलत धारणा का सूत्रपात इसलिए हुआ कि उन्होंने वर्धमान

महावीर को जैनधर्म का प्रवर्तक मान लिया। यह तथ्य ठीक नहीं है।
— जैनधर्म की उत्पत्ति एवं प्रसार पहिले से ही हो चुका था और महावीर ने इसका अत्यधिक प्रचार किया था और यही कारण है कि इसप्रकार की गलत धारणा कोई ख्याति प्राप्त विद्वानों से हो गई।"
इसप्रकार हम कह सकते हैं कि जैनमतानुयायी अपने मत के संस्थापक या प्रवर्तक के रूप में किसी एक व्यक्ति विशेष को तो स्वीकार करते ही नहीं हैं; अपितु तीर्थंकरों को भी वे धर्मप्रवर्तक नहीं, धर्मप्रचारक के रूप में ही स्वीकार करते हैं।
भारतवर्ष में इस युग के आदि तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव थे तथा तीर्थंकर भगवान् महावीर चौबीसवें एवं अंतिम तीर्थंकर थे।
सद्गुरुओं व सर्वज्ञों की अपेक्षा तीर्थंकर भगवान् भी अनन्त होते हैं। तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव से भी पहिले अनन्त तीर्थंकर भगवान् हो गए हैं एवं सिंहादि अन्य क्षेत्रों में होते रहते हैं। इस सबको समझने के लिए जैनधर्म में प्रतिपादित कालचक्र को समझना होगा।

कालचक्र

जैनधर्म के अनुसार प्रत्येक कालचक्र में अलग-अलग क्षेत्र में एक निश्चित संख्या में क्रमशः तीर्थंकर होते रहते हैं और उनके द्वारा धर्म का प्रचार-प्रसार होता है। जैन ग्रन्थों में कालचक्र का वर्णन निम्नप्रकार मिलता है।
"समय अपने को दुहराता है, यह एक प्राकृतिक नियम व वैज्ञानिक व्यवस्था है। जिसप्रकार दिन-रात, पक्ष-मास, ऋतुएँ और वर्ष अपने को दुहराते हैं, उसीप्रकार शताब्दियाँ, सहस्राब्दियाँ आदि तथा संख्यातीत काल भी किन्हीं प्राकृतिक नियमों के द्वारा अपने को दुहराते हैं।
कालचक्र के इस परिवर्तन में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आते हैं, जिन्हें जैन परिभाषा में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के नाम से जाना जाता है।

  1. महावीर जयन्ती स्मारिका 1968, पृष्ठ - 128

जहाँ उत्सर्पिणी क्रमंशः विकास की प्रक्रिया है, वहाँ अवसर्पिणी क्रमशः ह्रास की प्रक्रिया है। उत्सर्पिणी में प्राणियों के बल, आयु और शरीरादि का प्रमाण क्रमशः बढ़ता जाता है और अवसर्पिणी में उसी क्रम से घटता जाता है। इसप्रकार यदि उत्सर्पिणी बढ़ने का नाम है तो अवसर्पिणी घटने का। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी दोनों में प्रत्येक का काल दस-दस कोड़ा-कोड़ी सागर का।

इसप्रकार कुल मिलाकर बीस कोड़ा-कोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है। प्रत्येक कल्पकाल में तीर्थंकरों की दो चौबीसी होती है।

अवसर्पिणी काल के छः भेद हैं - 1. सुषमा-सुषमा, 2. सुषमा, 3. सुषमा-दुषमा, 4. दुषमा-सुषमा, 5. दुषमा, 6. दुषमा-दुषमा।

इसीप्रकार उत्सर्पिणी भी छह प्रकार का होता है - 6. दुषमा-दुषमा, 5. दुषमा, 4. दुषमा-सुषमा, 3. सुषमा-दुषमा, 2. सुषमा, 1. सुषमा-सुषमा।

उक्त कालों में सुख-दुःख की स्थिति उनके नामानुसार ही होती है। यहाँ सुख शब्द लौकिक सुख (भोग) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तृतीय काल तक भोग की ही प्रधानता रहती है। यहाँ तक कि आध्यात्मिक उन्नति के तो अवसर ही प्राप्त नहीं होते।

तीर्थंकरों की उत्पत्ति चतुर्थकाल में ही होती है और मुक्तिमार्ग भी चतुर्थकाल में ही चलता है। इस दृष्टि से चतुर्थकाल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

तृतीय काल के अन्त में चौदह कुलकर होते हैं और चतुर्थ काल में श्रेयांस शलाका के महापुरुष। श्रेयांस शलाका के महापुरुष निम्नानुसार हैं - 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण, 9 बलभद्र।

वर्तमान अवसर्पिणी काल का पंचमकाल चल रहा है। इसमें न तो कुलकर ही होते हैं और न श्रेयांस शलाका महापुरुषों की उत्पत्ति ही होती है। किसी को मुक्ति की प्राप्ति भी नहीं होती। चतुर्थकाल में जो श्रेयांस शलाका के महापुरुष हुए हैं, विशेषकर उनके चरित्रों का वर्णन ही जैनपुराणों का कथ्य है।

इसप्रकार अनन्त कल्पकाल बीत चुके हैं और भविष्य में अनन्त होंगे। तदनुसार तीर्थंकरों की अनन्त चौबीसियाँ इस भरतक्षेत्र में हो चुकी हैं और भविष्य में अनन्त और होंगी। ऐसी ही व्यवस्था ऐरावत क्षेत्र की है। विदेहक्षेत्र की व्यवस्था इससे कुछ भिन्न प्रकार की है। वहाँ सदा चतुर्थकाल जैसी स्थिति रहती है।‘’

जैनमतानुसार महाविदेह क्षेत्र में सदैव तीर्थंकरों की उपस्थिति रहती है; क्योंकि जिस समय वर्तमान तीर्थंकर निर्वाण प्राप्त करते हैं, उसी समय उसी नाम से दूसरे तीर्थंकर कैवल्य प्राप्त कर तीर्थंकर पद प्राप्त कर लेते हैं। इसप्रकार तीर्थंकरों का क्रम सदा चलता रहता है।

अढ़ाई द्वीप (मनुष्य लोक) में अधिकतम 170 और न्यूनतम 20 तीर्थंकर सदैव विद्यमान रहते हैं। इन न्यूनतम और अधिकतम संख्या का अतिक्रमण नहीं होता। एक तीर्थंकर का दूसरे तीर्थंकर से कभी मिलाप नहीं होता।

जैन भूगोल के अनुसार मनुष्यलोक में विद्यमान असंख्यात द्वीप-समुद्रों में से ढाई-द्वीप में ही मानवों की उत्पत्ति होती है; अतः तीर्थंकर भी ढाई-द्वीप में ही उत्पन्न होते हैं।

प्रथम, द्वितीय, तृतीय काल में क्रमशः उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है, उसमें भोगों की ही प्रधानता रहती है। सबको सभी प्रकार की भोगसामग्री कल्पवृक्षों के माध्यम से सहज उपलब्ध रहती है। जीवन लौकिक दृष्टि से आनन्दमय होने पर भी आध्यात्मिक दृष्टि से उनके विकास का मार्ग एक प्रकार से अवरुद्ध ही रहता है। चतुर्थकाल में कर्मभूमि का आरम्भ होता है। भोगों की सहज उपलब्धि क्रमशः समाप्त होने लगती है और आजीविका प्रयत्नसाध्य एवं क्रमशः श्रमसाध्य होती जाती है, किन्तु आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुल जाता है। तृतीय काल के अन्त में होने वाले चौदह कुलकर जनसाधारण को कर्मभूमि की व्यवस्था में

  1. डॉ. हुकमचन्द भारिल्लः तीर्थंकर भगवान् महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, पृष्ठ 7-8

प्रशिक्षित करते हैं। इस अवसर्पिणी काल के चौदहवें कुलकर राजा नाभिराय थे। इन तक आते-आते तृतीय काल समाप्तप्रायः था और भोगभूमि क्रमशः कर्मभूमि के रूप में व्यवस्थित होने लगी थी।

चौदहवें कुलकर राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी के गर्भ से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। राजा नाभिराय के बाद वे राजगद्दी पर बैठे। उन्होंने अपने राजकाल में अनेक जनोपयोगी कार्यों के साथ-साथ प्रजा को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन षट्कर्मों से आजीविका करना सिखाया। क्योंकि उस समय भोगभूमि समाप्त हो जाने से कल्पवृक्षों के अभाव के कारण आजीविका सहज नहीं रह गई थी। आजीविका श्रमसाध्य हो जाने से संघर्ष की स्थिति टालने के लिए व्यवस्था आवश्यक हो गई थी। कर्मभूमि के आरंभ होने में तत्संबंधी समस्त व्यवस्था आरंभ में राजा ऋषभदेव के द्वारा स्थापित हुई। यही कारण है कि उन्हें प्रजापति, ब्रह्मा, विधाता, आदिशुद्ध आदि नामों से भी पुकारा गया है।

इसप्रकार कुशलतापूर्वक अनेक वर्षों तक राज्य करने के पश्चात् राजा ऋषभदेव दीक्षा धारण कर मुनिराज ऋषभदेव बन गए। मुनिराज ऋषभदेव एक हजार वर्ष तक बराबर मौन आत्म साधनापर अनवरोध घोर तपश्चरण करते रहे। एक दिन आत्मोन्नति की दशा में उन्हें केवलज्ञान (पूर्णज्ञान) की प्राप्ति हुई और वे मुनिराज ऋषभदेव से भगवान् ऋषभदेव बन गए। इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर होने से उन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है।

इस अवसर्पिणी काल की दृष्टि से भरतक्षेत्र के तीर्थंकर भगवान् आदिनाथ प्रथम व महावीर चौबीसवें व अन्तिम तीर्थंकर हैं।

उक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैन मान्यतानुसार जन्म से कोई भगवान् नहीं होता। भगवान् जन्मते नहीं, बनते हैं। ऋषभदेव से वर्द्धमान पर्यंत

  1. प्रजापतीनां प्रथमं जिजीविषुः शशास कृष्यादिसु कर्मसु प्रजा ।। स्वयंभू स्तोत्र

सभी तीर्थंकर जन्म से तो हम-तुम जैसे ही थे; भगवान् तो वे बाद में बने, जब उन्होंने अपने को जीता। मोह-राग-द्वेष को जीतना ही अपने को जीतना है। भगवान् तो उन्हें कहते हैं जो पूर्ण वीतरागी व सर्वज्ञ हों। सभी तीर्थंकर जन्म से न तो पूर्ण वीतरागी थे और न सर्वज्ञ ही। पूर्ण वीतरागता व सर्वज्ञता तो सभी ने बाद में तप प्राप्त की, जब वे राज्यादि परिग्रह एवं तत्संबंधी राग त्यागकर साधु बने एवं अन्तर्मन हो उन्होंने सम्पूर्ण राग-द्वेष और अल्पज्ञता का पूर्ण अभाव कर डाला।

अतः जैनों का कहना है कि सर्वज्ञता व पूर्ण वीतरागता की प्राप्ति के पूर्व जहाँ भी तीर्थंकरों की पूर्व अवस्था के साथ ‘भगवान्’ विशेषण का प्रयोग हो, उसे उपचारित कथन ही जानना चाहिए। ‘भविष्य में भगवान् बनेंगे’ - इस आधार पर ही वैसा कहा जाता है। इस बात को समझने के लिए जैन-दर्शन की कथन पद्धति अनेकान्त और स्याद्वाद को समझना चाहिए। जिसका वर्णन आगे किया जाएगा।

इसप्रकार हम देखते हैं कि जैनों के अनुसार भगवान् आदिनाथ या महावीर किसी ने भी कोई नया धर्म नहीं चलाया, न ही वे इसके संस्थापक हैं। उन्होंने धर्म की स्थापना नहीं, उसका अनुसंधान किया है।

जैनमतानुसार प्रत्येक तीर्थंकर का धर्मोपदेश भी समान ही होता है। प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने जो उपदेश दिया, वही आदिनाथ से लेकर पार्श्वनाथ से होकर अंतिम तीर्थंकर महावीर पर्यंत ज्यों-का-त्यों चला आ रहा है। तीर्थंकरों के उस भव के जीवन्तत्व में अन्तर हो सकता है, होता ही है; किन्तु तीर्थंकरों के उपदेशों में रंचमात्र भी अन्तर नहीं होता है; क्योंकि वीतरागता व सर्वज्ञता - ये दो लक्षण समस्त तीर्थंकर भगवन्तों के समान रूप से ही पाए जाते हैं; अतः समस्त तीर्थंकरों द्वारा मोक्ष एवं मोक्षमार्ग का स्वरूप समान ही बताया गया है। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह सदा से है, सनातन है, अनादि है।

कालचक्र के उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैनमान्यतानुसार तीर्थंकरों की परम्परा अनादि-अनन्त है। इस अवसर्पिणीकाल के प्रथम तीर्थंकर

ऋषभदेव के पूर्व भी अनन्त तीर्थंकर हो चुके हैं और महावीर के बाद भी इसी भारत भूमि पर उत्सर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर महापद्म होने वाले हैं व तीर्थंकरों की यह परम्परा अनंतकाल तक चलने वाली है।

इसप्रकार जैनमान्यतानुसार भगवान् महावीर के पूर्व भी जैनदर्शन की एक पूर्ण विकसित परम्परा विद्यमान थी। तीर्थंकर महावीर भरत क्षेत्र में अब तक हुए तीर्थंकरों की अंतिम कड़ी हैं, प्रारंभिक नहीं।

जैनधर्म की उक्त मान्यता का समर्थन जैनेतर साहित्य एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर भी होता है।

जैनेतर साहित्य एवं पुरातात्विक साक्ष्य

जैनधर्म व तीर्थंकरों की परम्परा की प्राचीनता को वैदिक संस्कृति के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों व वैदिक पुराणों में प्राप्त कतिपय उल्लेखों से सिद्ध कर दिया है।

ऋग्वेद में एक स्थान पर ऋषभदेव को ज्ञान का आगार तथा क्रोधादि शत्रुओं का विध्वंसक बताते हुए कहा गया है कि -

अमृत्युवो वृषभो ज्यायनिभा, अस्य शुरुधः संतिपूर्वीः।
दिवो न पाता विद्धस्धीभिः क्षत्रं राजाना प्रतिवोदधाथे।।’

जिसप्रकार जल से भरा हुआ मेघ वर्षा का मुख्य स्रोत है और पृथ्वी की प्यास बुझा देता है; उसीप्रकार पूर्वी अर्थात् ज्ञान के प्रतिपादक ऋषभ महान् हैं, उनका शासन वर दे। उनके शासन में ऋषि परंपरा से प्राप्त पूर्व का ज्ञान आत्मा के क्रोधादि शत्रुओं का विध्वंसक हो। दोनों (संसारी और सिद्ध) आत्माएँ अपने ही आत्मगुणों से चमकती हैं। अतः वही राजा हैं, वे पूर्व ज्ञान के आगार हैं और आत्म पतन नहीं होने देते।

ऋग्वेद में ही एक अन्य स्थान पर ऋषभदेव को मन-वचन-काय से संयत कहा गया है

त्रिधावद्धो वृषभो रोरवीति महादेवो मर्त्यानाविवेश²

  1. ऋषभ सौरभ पृ. 14
  2. ऋषभ सौरभ पृष्ठ. 14

अर्थात् मन, वचन, काय से बद्ध (संयत) ऋषभदेव ने घोषणा की - महादेव मर्यो में निवास करता है।

ऋग्वेद में जो वातरसना मुनियों और श्रमणों की साधना का चित्रण मिलता है, उसका संबंध जैन मुनियों से ही है

मुनयो वातरशनाः पिशंगाः वसते मला।
वातस्यानु घ्राजिं यंति यद्दवासो अविक्षत।।
उन्मदिता मौनेयेन वातां आतस्थिमा वयम्।
शरीरादेस्माकं यूयं मर्तासो अभि पस्सथ।।’

अतींद्रियार्थदर्शी वातरसना मुनि मल धारण करते हैं, जिससे वे पिंगल वर्ण दिखाई पड़ते हैं। जब वे वायु की गति को प्राणोपासना द्वारा धारण कर लेते हैं अर्थात् वे रोक लेते हैं, तब वे अपने तप की महिमा से दीप्तिमान होकर देवता स्वरूप प्राप्त हो जाते हैं। सर्वलौकिक व्यवहार को छोड़कर वे मौनेय की अनुभूति में कहते हैं “मुनिभाव से प्रमुदित होकर हम वायु भाव में स्थित हो गए। मर्यो! तुम हमारा बाह्य शरीर मात्र देखते हो, हमारे अभ्यंतर शरीर को नहीं देख पाते।”

तैत्तरीयाण्यक 7.1 में इन्हीं वातरशना मुनियों को ‘श्रमण’ और ‘ऊर्ध्वमंथी’ भी कहा है। साथ ही उसमें ऋषभदेव का भी उल्लेख है -

वातरशना हवा ऋषभः श्रमणा ऊर्ध्वमंथिनो बभूवुः।

श्रीमद्भागवत में भी श्रमणों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि जो वातरशना ऊर्ध्वमंथी श्रमण मुनि हैं, वे शांत, निर्मल, संपूर्ण परिग्रह से संयत ब्रह्मचर्य को प्राप्त करते हैं। वातरशना मुनियों का संबंध दिगम्बर श्रमणों से ही है, इसलिए भिक्षु की भूषण टीका में श्रमण शब्द की व्याख्या इस रूप में की है -

श्रमणो दिगम्बराः श्रमणा वातरसनाः।

भागवत 11/2 में उपर्युक्त व्याख्या का समर्थन इसीप्रकार करते हुए कहा गया है -

  1. ऋग्वेद 10, 136, 2-3

श्रमणा वातरसना आत्मविद्या विशारदाः।
श्रमण दिगम्बर मुनि का ही नामांतर है। आचार्य जिनसेन ने आदि पुराण में वातरसना शब्द का अर्थ निग्रंथ, निरंबर, दिगंबर करते हुए कहा है -
दिग्वासां वातरसना निर्ग्रथेशो निरंबरः।
इसीप्रकार ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर केशी, अर्हन्, यति और व्रात्यों का उल्लेख आया है। विद्वानों के अनुसार उनका संबंध भी जैनसंस्कृति से ही है। ऋग्वेद के गवेषणात्मक अध्ययन के आधार पर डॉ. सागरमल जैन ने ऋग्वेद में ‘अर्हत और ऋषभवाची ऋचाएँ’ नामक लेख में लिखा है -
“ऋग्वेद में न केवल सामान्य रूप से श्रमण परंपरा और विशेष रूप से जैन परंपरा से संबंधित अर्हत, अर्हत, व्रात्य, वातरसना मुनि, श्रमण आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है; अपितु अर्हत परंपरा के उपास्य वृषभ का भी उल्लेख शताधिक बार मिलता है। मुझे ऋग्वेद में वृषभवाची 112 ऋचाएँ प्राप्त हुई हैं। संभवतः कुछ और ऋचाएँ भी मिल सकती हैं।”
नाभिपुत्र ऋषभ और ऋषभ पुत्र भरत की चर्चा प्रायः सभी हिन्दू पुराणों में आती है। मार्कण्डेय पु. अ. 90, कर्म पु. अ. 41, आ. पु. अ. 10, वायु पुराण अ. 33, गरुण पुराण अ. 1, ब्रह्माण्ड पु. अ. 14, वाराह पु. अ. 74, लिंग पुराण अ. 47, विष्णु पु. अ. 1 और स्कन्ध पुराण वुभार खण्ड अ. 37 में ऋषभदेव का वर्णन आता है। इन सभी में ऋषभ को नाभि और मरुदेवी का पुत्र कहा है। ऋषभ से सौ पुत्र उत्पन्न हुए, उनमें से बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर ऋषभ ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इसी भरत से इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यथा -
नाभि स्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महाद्युतिः।
ऋषभं पार्थिव श्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशतोशुजः
हिमानं दक्षिणं वर्ष तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।
उक्त श्लोक थोड़े से शब्दभेद के साथ प्रायः उक्त सभी पुराणों में पाये जाते हैं। श्रीमद्भागवत में तो ऋषभनाथ का पूरा वर्णन है, और उन्हीं के उपदेश से जैनधर्म की उत्पत्ति बतलाई है। यथा -
बह्वीनि तस्मिन्ने विष्णुतत्त्वान् भगवन् परमर्षिभिः प्रसादितो नामः
प्रियव्रतक्रिया तदवरोधेन भगवद्धर्मो यमनेमिभिर्विशकायो
वातरसनानां श्रमणानाम पोणामधर्मोयत्नां शुश्रूषया।
उक्त कथन में वातरशन (नग्न) श्रमणों के धर्म से स्पष्ट ही जैनधर्म का अभिप्राय है; क्योंकि आगे ऋषभदेव के उपदेश से ही आर्हत धर्म (जैन धर्म) की उत्पत्ति बतलाई है।
भागवत पुराण में भी ऋषभदेव का उल्लेख बड़े ही सम्मान के साथ हुआ है - “ऋषभदेव ने पृथ्वी का पालन करने के लिए भरत को राजगद्दी पर बैठाया और स्वयं उपशमशील, निवृत्तिपरायण महामुनियों के भक्ति ज्ञान और वैराग्यमय परमहितकारी धर्म की शिक्षा देने के लिए बिल्कुल विरक्त हो गए। केवल शरीर मात्र का परिग्रह रखा।”
इसीप्रकार इसके पाँचवें स्कन्ध के, अध्याय 2-6 में ऋषभदेव का सुन्दर वर्णन है, जो जैन साहित्य के वर्णन से कुछ अंश में मिलता-जुलता हुआ है। उसमें लिखा है कि 'नाभि ने मरुदेवी से विवाह किया और उससे ऋषभदेव उत्पन्न हुए। ऋषभदेव ने इन्द्र के द्वारा दी गई जयन्ती नाम की भार्या से सौ पुत्र उत्पन्न किये, और बड़े पुत्र भरत का राज्याभिषेक करके संन्यास ले लिया। उस समय केवल शरीर मात्र उनके पास था और वे दिगम्बर वेष में नग्न विचरण करते थे। मौन से रहते थे, कोई डाँटे, मारें, ऊपर थूकें, पत्थर फेंकें, मूत्रविष्ठा फेंके तो इन सबकी ओर ध्यान नहीं देते थे। वह शरीर ध्वस्त पदार्थों का घर है - ऐसा समझकर अहंकार ममकार का त्याग करके अकेले भ्रमण करते थे। उनका कामदेव के समान सुन्दर शरीर मलिन हो गया था।

  1. तत्त्वभूतान 20’ स्कं. पु. अ. 31
  2. श्रीमद्भागवत 95/5/28

श्रीमद्भागवत के उक्त कथनों से यह ध्वनित होता है कि ऋषभदेव ने ही जैनधर्म का उपदेश दिया था; क्योंकि जैन तीर्थंकर ही केवलज्ञान को प्राप्त कर लेने पर ‘जिन’, ‘अर्हत्’ आदि नामों से पुजते जाते हैं और उसी अवस्था में धर्मोपदेश करते हैं जो कि उनकी उस अवस्था के नाम पर जैनधर्म या आर्हत धर्म कहलाता है।
श्रीमद्भागवत के समान अन्य हिन्दू पुराणों में भी जैनधर्म की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रायः इसी प्रकार का वर्णन पाया जाता है। ऐसा एक भी ग्रन्थ अभी तक देखने में नहीं आया, जिसमें अर्हत्मान या पार्श्वनाथ से जैनधर्म की उत्पत्ति बतलाई गई हो। यद्यपि उपलब्ध पुराण साहित्य प्रायः महावीर के बाद का ही है, फिर भी उसमें जैनधर्म की चर्चा होते हुए भी महावीर या पार्श्वनाथ का नाम तक नहीं पाया जाता। इसमें भी इसी बात की पुष्टि होती है कि हिन्दू परम्परा भी इस विषय में एकमत है कि जैनधर्म के संस्थापक ये दोनों नहीं हैं।
उन संदर्भ में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् स्वर्गीय डॉ. हर्मन याकोबी का मत उल्लेखनीय है। डॉ. याकोबी लिखते हैं -
“इसमें कोई भी सबूत नहीं है कि पार्श्वनाथ जैनधर्म के संस्थापक थे। जैन परम्परा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को जैनधर्म का संस्थापक मानने में एकमत हैं। इस मान्यता में ऐतिहासिक सत्य की सम्भावना है।”
उत्तराध्ययन सूत्र के प्राक्कथन में डॉ. चार्पेन्टर लिखते हैं -
“हमें स्मरण रखना चाहिए कि जैनधर्म भगवान् महावीर से प्राचीन है और महावीर के आदरणीय पूर्वज पार्श्वनाथ निश्चित रूप से एक वास्तविक व्यक्ति के रूप में वर्तमान थे। अतः जैनधर्म के मूल सिद्धान्त भगवान् महावीर से बहुत पहले निर्धारित हो चुके थे।”

  1. There is nothing to prove that Parshva was the founder of Jainism. Jain Tradition is unanimous making Rishabha the first Tirthankara (as its founder) there may be something historical in the tradition which makes him the first Tirthankara Indian Antiquary Vol. IX P. 163.

मेजर जनरल जे.सी. आर. फर्लांग महोदय अपनी The Short Study in Science of Comparative Religion नाम की पुस्तक में लिखते हैं -
“ईसा से अगणित वर्ष पहले से जैनधर्म भारत में फैला हुआ था। आर्य लोग जब मध्यभारत आये तब यहाँ जैन लोग मौजूद थे।”
महाभारत शांतिपर्व में भी ऋषभदेव का उल्लेख है। ऐसा कहा जाता है कि अड़सठ तीर्थों की यात्रा करने से जो फल प्राप्त होता है, उतना फल भगवान् आदिनाथ के स्मरण मात्र से ही मिल जाता है -
अष्टषष्टित्यु तीर्थेषु यात्रायां यत्फलं भवेत।
श्री आदिनाथस्य देवस्य स्मरणेनापि तद्‌भवेत।।
इसप्रकार हिन्दु पुराणों में मार्कण्डेय पुराण, कर्मपुराण, अग्निपुराण, वायुपुराण, गरुडपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, विष्णुपुराण, स्कन्धपुराण और श्रीमद्भागवत में जो ऋषभदेव का वर्णन उपलब्ध होता है, उससे इतना तो निश्चित ही सिद्ध हो जाता है कि ऋषभदेव निश्चित ही एक ऐतिहासिक पुरुष रहे हैं।
डॉ. बुद्धप्रकाश, डी. लिट् ने अपने ग्रंथ ‘भारतीय धर्म एवं संस्कृति’ में लिखा है - “महाभारत में विष्णु के सहस्र नामों में श्रेयांस, अनन्त, धर्म, शान्ति और संभव नाम आते हैं और शिव के नामों में ऋषभ, अजित, अनन्त और धर्म मिलते हैं। विष्णु और शिव दोनों का एक नाम सुव्रत दिया गया है। ये सब नाम तीर्थंकरों के हैं। लगता है कि महाभारत के समन्वयपूर्ण वातावरण में तीर्थंकरों को विष्णु और शिव के रूप में सिद्ध कर धार्मिक एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया गया। इससे तीर्थंकरों की परम्परा प्राचीन सिद्ध होती है।”
भारत के राष्ट्रपति प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वानडॉ. राधाकृष्णन कुछ विशेष जोर देकर लिखते हैं कि -
"जैन परम्परा ऋषभदेव से अपने धर्म की उत्पत्ति होने का कथन करती है, जो बहुत-सी शताब्दियों पूर्व हुए हैं। इस बात के प्रमाण पाये जाते हैं कि

  1. तीर्थंकर वर्धमान, पृष्ट - 15

ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की पूजा होती थी। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जैनधर्म भी वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी पहले प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ और अरिष्टनेमि इन तीन तीर्थङ्करों के नामों का निर्देश है। भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता है कि ऋषभदेव जैनधर्म के संस्थापक थे।"
जैनेतर साहित्य में प्राप्त जैनधर्म संबंधी अनेक उद्धरणों से जैनधर्म की समीचीनता व प्राचीनता सिद्ध करने के लिए जैन विद्वान् ‘आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी’ ने अपने ग्रन्थ मोक्षमार्ग प्रकाशक में बड़ा योगवासिष्ठ, दक्षिणामूर्ति-सहस्रनाम, वैशम्पायन सहस्र नाम, महिम्नस्तोत्र, हनुमन्नाटक, रुद्रयामलतंत्र, गणेशपुराण, व्यासकृत सूत्र, भगवत्, दशावतार, काशी खंड प्रभासपुराण, नगरपुराण, मनुस्मृति, ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि अनेक ग्रन्थों के उद्धरण देकर अंत में कहा है ‘इसप्रकार अन्यमत के ग्रन्थों की साक्षी से भी जिनमत की उत्तमता और प्राचीनता दृढ़ हुई।’
इसीप्रकार अन्यमतों के ग्रन्थोद्धरणों की समीक्षा कर डॉ. भागचन्द्र भास्कर अपनी पुस्तक ‘जैनदर्शन व संस्कृति के इतिहास’ में लिखते हैं कि
"… इसप्रकार ऋषभदेव का प्राचीन इतिहास जैन, वैदिक और बौद्ध तीनों साहित्यों में मिलता है। — यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जैनों के चौबीस तीर्थंकरों का अनुकरण कर वैदिक परम्परा ने चौबीस अवतारों की कल्पना की और बुद्ध परम्परा ने चौबीस बुद्ध बना लिए। अवतारों व बुद्धों की संख्या में यथासमय वृद्धि भी होती रही; पर जैनों के तीर्थंकर चौबीस से पच्चीस नहीं हुए और न चौबीस से तेबीस। इससे जैनपरम्परा की वास्तविकता और मौलिकता का आभास होता है।

  1. "There is evidence to show what so far back as the first century B.C. There were people were worshipping Rishabhadeva, the first Tirthankara. There is no doubt that Jainism prevailed even before Vardhamana or Parshvanath. The Yajurveda mentions the names of three Tirthankaras & Rishabha. Ajitanath and Aristanemi. The Bhagavata Puran endorses the view that Rishabha was the founder of Jainism-Indian Philosophy, Vol. I P. 287.
  2. मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृष्ठ - 143

बौद्धपरम्परा में ऋषभदेव के साथ ही अन्य तीर्थंकरों का भी उल्लेख हुआ है। उसने उन तीर्थंकरों के नामों का उपयोग अपने बुद्धों, प्रत्येकबुद्धों और बोधिसत्त्वों के नामों की अवधारणा में किया है।"
आगे उन्होंने पुनः लिखा है कि 'प्राचीन जैनेतर साहित्य में जैनधर्म संबंधी उद्धरण काफी मिला करते थे पर धीरे-धीरे सम्प्रदायाभिनिवेश से उनका लोप कर दिया गया। पंडित टोडरमलजी ने ‘मनुस्मृति’ और ‘यजुर्वेद’ से निम्नलिखित उद्धरणों को उद्धृत किया है -
कुलादि बीजं सर्वेषां प्रथमो विमल वाहनः।
चक्षुष्मान् यशस्वी नाभिचन्द्रोऽथ प्रसेनजित्।।
मरुदेवी च नाभिश्च भरते कुल सत्तमाः।
अष्टमो मरुदेव्यां तु नाभेजाति उरुक्रमः।।
दर्शयन वर्म वीराणां सुरासुरनमस्कृतः।
नीतित्रितयकर्ता यो युगादौ प्रथमो जिनः।। (मनुस्मृति)
ॐ नमो अर्हतो ऋषभाय। ॐ ऋषभपवित्रं पुरुहूतमध्वज्ञं यज्ञेषु नग्नं परमं माहसंस्तुतं वरं शत्रु जयंतं पशुरिद्र-माहतिरिति स्वाहा। ओऽम
त्रातारमिद्रं ऋषभं वदन्ति। अमृतारमिंद्रं हवे सुगतं सुपार्श्वमिंद्र हवे
शक्रमर्जितं तद्वर्द्धमानपुरुहूतमिंद्रमाहरिति स्वाहा। ओऽम् नग्नं सुधीरं दिग्वाससं ब्रह्मगर्भ सनातनं उपैमि वीरं पुरुषमर्हतमादित्यवर्ण तमसः परस्तात् स्वाहा। ओऽम् स्वस्तिन इन्द्रो वृद्धस्रवा स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः स्वस्तिनस्तार्थ्यो अरिष्टनेमि स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु दीर्घायुसत्वायुलायुर्वा शुभजातायु ओऽम् रक्ष रक्ष अरिष्टनेमिः स्वाहा।
दीर्घायुस्त्वत्सुखायुं शुभमस्तु। ॐ खं खं खं ऋषभेशः स्वाहा।
वामस्य शमनार्थ्य - मुनिबुद्धिर्धत्ते सोऽजमादिः अरिष्टनेमिः स्वाहा।
(यजुर्वेद)।
इन उद्धरणों में उल्लिखित तीर्थंकरों के नाम और उनके प्रति अभिव्यक्त सन्मान दृष्टव्य है। पर आश्चर्य की बात है कि आज ये उद्धरण मनुस्मृति और यजुर्वेद के संस्करणों में क्यों व कैसे लुप्त हो गए, यह विचारणीय है।

  1. जैनदर्शन व संस्कृति का इतिहास, पृष्ठ - 15

मूल वैशम्पायन सहस्रनाम में ‘कालनेमिर्महावीरः शूरः शौरिजिनेश्वरः’ कहा गया है; पर आधुनिक संस्करणों में ‘जिनेश्वर’ के स्थान पर ‘जनेश्वर’ रख दिया गया है - ‘कालनेमि महावीरः शौरिशूरः जनेश्वरः।’
टोडरमलजी ने भतृहरि के ‘वैराग्य शतक’ से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है -
एको रागिषु राजते प्रियतमा देहार्द्धधारी हरो,
नीरागेषु जिनो विमुक्तललना सङ्गो न यस्मात्परः।
दुर्वारस्मरवागपन्नगविषव्यासक्तमुग्धां जनः,
शेषः कामविउंवितो हि विषयान् भोक्तुं न मोक्तुं क्षमः।।
रागियों में महादेव और वीतरागियों में जिनदेव की बात कहनेवाले इस श्लोक को आज संस्करणों में या तो रखा ही नहीं या कुछ संस्करणों में रखा भी गया तो वह कुछ परिवर्तन के साथ रखा गया।
एको रागिषु राजते प्रियतमा देहार्द्धधारी हरो,
नीरागेष्वपि यो विमुक्तललनासङ्गो न यस्मात्परः।।
दुर्वारस्मरवाणपन्नगविषज्वालावलीठो जनः,
शेषः काम विडंवितोतोहि विषयान् भोक्तुं च मोक्तुं क्षमः।।
इसीप्रकार ‘अमरकोष’ में बुद्ध के बाद जिनके भी नाम दिये गए हैं, वर्तमान संस्करणों में वह भाग लुप्त हो गया। पण्डित मिलापचन्द कटारियाजी ने उस लुप्त भाग को इसप्रकार खोज निकाला -
“सर्वज्ञो वीतरागोऽर्हन् केवली तीर्थकृज्जिनः।
स्याद्वादवादी निलोक निर्ग्रन्थाधिप इत्यपि।।”
इसप्रकार के अनेक जैनेतर उद्धरण प्राचीन जैन साहित्य में मिलते हैं; जिनसे जैनधर्म की प्राचीनता और लोकप्रियता का पता चलता है; पर

  1. महाभारत अनुशासन पर्व, 148, 82
  2. महाभारत (गोरखपुर), 1958 पृष्ठ - 6043
  3. श्रृंगार शतक, निर्णयसागर प्रेस, मुंबई, 1818, चुतर्थ संस्करण (सं. कृष्ण शास्त्री)
  4. अजैन साहित्य में जैन उल्लेख और सांप्रदायिता की संकीर्णता से उनका लोप व महावीर जयन्ती स्मारिका, 1970 पृ. 57-65

धीरे-धीरे वैदिक विद्वानों ने अपनी संकीर्णतावश उनको अलग कर दिया अथवा तोड़-मरोड़कर उपस्थित किया। टोडरमलजी ने ‘भवानी सहस्रनाम’, ‘गणेशपुराण’, ‘प्रभासपुराण’, ‘नगरपुराण’ आदि ग्रन्थों से भी अनेक उद्धरण दिए हैं, पर वे प्रायः अब मिलते नहीं। शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में यह व्यामोह उचित नहीं कहा जा सकता।’
वेदों में प्राप्त उपर्युक्त उल्लेखों के आधार पर निःसंकोच कहा जा सकता है कि वैदिक संस्कृति के विकास के पूर्व से ही जैनदर्शन के प्रचारक तीर्थंकरों की परंपरा विद्यामान थी; अतः यह कहना हास्यास्पद ही होगा कि वैदिक संस्कृति के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप बौद्धों के समान ही जैनदर्शन की भी उत्पत्ति हुई।
बौद्ध साहित्य में भी ऋषभदेव का उल्लेख मिलता है। धम्म पद में उन्हें ‘प्रवर वीर’ कहा है (उस पवरं वीरं-)। मंजुश्री मूल कल्प में उनको निग्रंथ तीर्थंकर और आप्त देव के रूप में उल्लिखित किया गया है। ‘न्याय विंदु’ अध्याय तीन में ऋषभ (वृषभ) और वर्द्धमान को सर्वज्ञ अर्थात् केवलज्ञानी तीर्थंकर लिखा है। ‘धर्मोत्तर प्रदीप’ पृष्ठ 286 में भी उनका स्मरण किया गया है।
इसप्रकार ऋषभदेव का उल्लेख प्राचीन इतिहास जैन, वैदिक, बौद्ध तीनों साहित्यों में मिलता है।
स्व. डॉ. हर्मान जैकोबी ने अपनी जैन सूत्रों की प्रस्तावना में इस पर विस्तृत विचार किया है। वे लिखते हैं - "इस बात से अब हम सहमत हैं कि नातपुत्त, जो महावीर अथवा वर्धमान के नाम से प्रसिद्ध हैं, बुद्ध के समकालीन थे। बौद्ध-ग्रन्थों में मिलने वाले उल्लेख हमारे इस विचार को दृढ़ करते हैं कि नातपुत्त से पहले भी निर्ग्रन्थों का जो आज जैन अथवा अर्हत के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, अस्तित्व था। जब बौद्ध धर्म उत्पन्न हुआ तो निर्ग्रन्थों का सम्प्रदाय एक बड़े सम्प्रदाय के रूप में गिना जाता

  1. जैनदर्शन व संस्कृति का इतिहास : डॉ. भागचन्द्र भास्कर, पृ. 23 व 24

होगा। बौद्ध पिटकों में कुछ निर्ग्रन्थों का बुद्ध और उसके शिष्यों के विरोधी के रूप में और कुछ का बुद्ध के अनुयायी बन जाने के रूप में वर्णन आता है। उसके ऊपर से हम उक्त बात का अनुमान कर सकते हैं। इसके विपरीत इन ग्रन्थों में किसी भी स्थान पर ऐसा कोई उल्लेख या सूचक वाक्य देखने में नहीं आता कि निर्ग्रन्थों का सम्प्रदाय एक नवीन सम्प्रदाय है और नातपुत्त उसके संस्थापक हैं। इसके ऊपर से हम अनुमान कर सकते हैं कि बुद्ध के जन्म से पहले अतिप्राचीन काल से निर्ग्रन्थों का अस्तित्व चला आता है।’
डॉ. जैकोबी ने बौद्ध साहित्य के उल्लेखों के आधार पर निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय का अस्तित्व प्रमाणित करते हुए लिखा है कि - "बौद्ध निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय को एक प्रमुख सम्प्रदाय मानते थे, किन्तु निर्ग्रन्थ अपने प्रतिद्वन्दी अर्थात् बौद्धों की उपेक्षा करते थे। इससे हम निर्णय पर पहुँचते हैं कि बुद्ध के समय निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय कोई नवीन स्थापित सम्प्रदाय नहीं था। यही मत पिटकों का भी जान पड़ता है।’
डॉ. विंसेण्ट ए. स्मिथ का कहना है कि ‘मथुरा से प्राप्त सामग्री लिखित जैन परम्परा के समर्थन में विस्तृत प्रकाश डालती है और जैनधर्म की प्राचीनता के विषय में अकाट्य प्रमाण उपस्थित करती है तथा यह बतलाती है कि प्राचीन समय में भी वह अपने इसी रूप में मौजूद था। ईस्वी सन् के प्रारम्भ में भी अपने विशेष चिह्नों के साथ चौबीस तीर्थंकरों की मान्यताओं में दृढ़ विश्वास था।’
इन शिलालेखों से भी प्राचीन और महत्वपूर्ण शिलालेख खण्डगिरि उदयगिरि (उड़ीसा) की हाथी गुफा से प्राप्त हुआ है, जो जैन सम्राट खारवेल ने लिखाया था। इस 2100 वर्ष प्राचीन जैन शिलालेख से स्पष्ट

  1. Indian Antiquary, Vol. 9th, Page, 160
  2. The discoveries have to a very large extent supplied corroboration to the written Jain tradition and they offer tangible incontrovertible proof of the antiquity of the Jain religion and of its early existence very much in its present form, the series twentyfour profittis (Tirthankaras), each with his distinctive emblem, was evidently firmly believed in at the beginning of the Christian era-The Jain Stupa…Mathura Intro, P.6

पता चलता है कि मगधाधिपति पुष्यमित्र का पूर्वाधिकारी राजा नन्द कलिंग जीतकर भगवान् श्री ऋषभदेव की मूर्ति, जो कलिंग राजाओं की कुलक्रमागत बहुमूल्य सम्पत्ति थी, जयचिह्न स्वरूप ले गया था। वह प्रतिमा खारवेल ने नन्द राजा के तीन सौ वर्ष बाद पुष्यमित्र से प्राप्त की। जब खारवेल ने मगध पर चढ़ाई की और उसे जीत लिया तो मगधाधिपति पुष्यमित्र ने खारवेल को वह प्रतिमा लौटाकर राजी कर लिया। यदि जैनधर्म का आरम्भ भगवान् पार्श्वनाथ से द्वारा हुआ होता तो उसने कुछ ही समय बाद की या उनके समय की प्रतिमा उन्हीं की होती। परन्तु जब ऐसे प्राचीन शिलालेख में आदि तीर्थंकर की प्रतिमा का स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख इतिहास के साथ मिलता है तो मानना पड़ता है कि ऋषभदेव के प्रथम जैन तीर्थंकर होने की मान्यता में तथ्य अवश्य है।
इसप्रकार हड़प्पा की खुदाई से एक नग्न मानव धड़ मिला है। नग्न मुद्रा के कायोत्सर्ग मुद्रा है। केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के तत्कालीन महानिदेशक टी.एन. रामचंद्रन ने उस पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने अपने हड़प्पा एंड जैनिज्म नामक शोधपूर्ण पुस्तक में उस मूर्ति को ऋषभदेव की प्रामाणित करते हुए लिखा है - हड़प्पा की कायोत्सर्ग मुद्रा में उत्कीर्ण मूर्ति पूर्ण रूप से जैनमूर्ति है, उनके मुख पर जैनधर्म का साम्यभाव दूर से झलकता है।’
हड़प्पा की संस्कृति को विद्वानों ने ईसा पूर्व 3000 से 3000 का माना है। इससे स्पष्ट होता है कि आज से चार-पाँच हजार वर्ष पूर्व भी तीर्थंकरों का अस्तित्व था और उनकी पूजा अर्चना होती थी। इन सब आधारों से अनेक विद्वानों ने यह स्वीकार किया है कि सिंधु घाटी की सभ्यता जैन संस्कृति से संबद्ध थी।
श्री पी.आर. देशमुख ने अपनी पुस्तक इंडस सिविलाइजेशन ऋग्वेद एंड हिन्दू कल्चर में लिखा है -

  1. The Harappan Statuette being exactly in the above specified Prose. We may notbe wrong in identifying, that The God represented as a Tirthankara or a Jaina ascetic of accredited fame and penance. P-1

जैनों के पहले तीर्थंकर सिन्धु सभ्यता से ही थे। सिंधु जनों के देव नग्न होते थे। जैन लोगों ने उस सभ्यता/संस्कृति को बनाए रखा और नग्न तीर्थंकरों की पूजा की।
इतिहासकारों और पुरातात्ववेत्ताओं की यह मान्यता है कि वैदिक आर्यों के आगमन से पूर्व भारत में जो सभ्यता थी, वह अत्यन्त समृद्ध और समुन्नत थी। विद्वानों ने उसे श्रमण संस्कृति से संबद्ध किया है। सन् 1922 से 1927 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा सिंधु घाटी के हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से कई नए तथ्य प्रकाश में आए हैं, जिनसे जैन धर्म की प्राचीनता के साथ-साथ उनकी प्राग्वैदिकता भी सिद्ध होती है। इन दोनों स्थानों में जिस संस्कृति की खोज हुई, वह सिंधु घाटी की सभ्यता कही जाती है। विद्वानों के अनुसार वह लगभग 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति है।
मोहनजोदड़ो से कुछ नग्न कायोत्सर्ग योगी मुद्राएँ मिली हैं, उनका संबंध जैनसंस्कृति से है। इसे प्रमाणित करते हुए स्व. रायबहादुर, प्रो. रामप्रसाद चंद्रा ने अपने शोधपूर्ण लेख में लिखा है -
"सिंधु मुहरों में से कुछ मुहरों पर उत्कीर्ण देवमूर्तियाँ न केवल योग मुद्रा में अवस्थित हैं, वरन् उन प्राचीन युग में सिंधु घाटी में प्रचलित योग प्रकारों का द्योत है। उन मुहरों में खड़े हुए देवता योग की खड़ी मुद्रा भी प्रकट करते हैं और यह भी कि कायोत्सर्ग मुद्रा आश्चर्यजनक रूप से जैनों से संबंधित है। यह मुद्रा बैठकर ध्यान करने की न होकर खड़े होकर ध्यान करने की है। आदिपुराण से प्राप्त अनुभव में ऋषभ अथवा वृषभ की तपस्या के सिलसिले में कायोत्सर्ग मुद्रा का वर्णन किया गया है। मथुरा के कुषाण पुरातत्व संग्रहालय में एक शिला फलक पर जैन ऋषभ की कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ी हुई चार प्रतिमाएँ मिलती हैं, जो ईसा की द्वितीय शताब्दी की निश्चित की गई हैं। मथुरा की यह मूर्ति संख्या 12 में प्रतिबिंबित है। प्राचीन राजवंशों के काल की भित्ति स्थापत्य में कुछ ऐसी प्रतिमाएँ मिलती हैं, जिनकी भुजाएँ दोनों ओर लटकी हुई हैं। यद्यपि ये मूर्ति प्रायः उसी मुद्रा में मिलती

है, किन्तु उनमें वैराग्य की वह झलक नहीं है जो सिन्धुघाटी की इन खड़ी मूर्तियों या जैनों की कायोत्सर्ग प्रतिमाओं में मिलती है। ऋषभ का अर्थ होता है वृषभ (बैल) और वृषभ जिन वृषभ का चिह्न है।’
इसी बात की पुष्टि करते हुए प्रसिद्ध विद्वान् राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं -
"मोहनजोदड़ो की खुदाई में योग के प्रमाण मिले हैं और जैन मार्ग के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव थे। जिनके साथ योग और वैराग्य की परंपरा उसी प्रकार लिपटी हुई है जैसे कालान्तर में शिव के साथ सन्निहित हो गई। इस दृष्टि से जैन विद्वानों का यह मानना अयुक्तिसूचक नहीं दिखता कि ऋषभदेव वेदोल्लिखित होने पर भी वेद पूर्व हैं।’
जैनधर्म प्रागैतिहासिक और प्राग्वैदिक धर्म है। इस बात की पुष्टि करते हुए डॉ. विशुद्धानंद पाठक और पं. जयशंकर मिश्र लिखते हैं -
"विद्वानों का अभिमत है कि यह धर्म प्रागैतिहासिक और प्राग्वैदिक है। सिंधु घाटी की सभ्यता से मिली योग मूर्ति तथा ऋग्वेद के कतिपय मंत्रों में ऋषभ तथा अरिष्ट नेमि जैसे तीर्थंकरों के नाम इस विचार के मुख्य आधार है। भागवत् और विष्णु पुराण में मिलने वाली जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की कथा भी जैनधर्म की प्राचीनता व्यक्त करती है।’
श्री नीलकंठ शास्त्री ने ‘उड़ीसा में जैनधर्म’ नामक पुस्तक में जैनधर्म को संसार का मूलधर्म बताते हुए द्रविड़ों को जैनों से संबद्ध किया है। वे लिखते हैं -
"जैनधर्म संसार का मूल अध्यात्म धर्म है। इस देश में वैदिक धर्म के आने से बहुत पहले से ही यहाँ जैनधर्म प्रचलित था।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक काल में जैनों के तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर महावीर की परम्परा प्रचलित थी।

  1. मार्डन रिव्यु अगस्त 1932 पृ. 156-60
  2. संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 62
  3. भारतीय इतिहास और संस्कृति पृ. 199-200

जैनमत में कहे गए 21वें तीर्थंकर भगवान् नमिनाथ, 22वें तीर्थंकर भगवान् नेमिनाथ और 23वें तीर्थंकर भगवान् पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर भगवान् महावीर को तो एक ऐतिहासिक महापुरुष स्वीकार कर ही लिया गया है।

इसप्रकार ऐतिहासिक खोजों, शिलालेखीय अन्वेषणों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों एवं प्राचीन साक्ष्यों एवं प्राचीन साहित्य के अनुशीलन से आदि तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव के साथ-साथ जैनधर्म की प्राचीनता दर्पणवत् स्पष्ट हो जाती है।

उक्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखने पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि जैनधर्म भारत का प्राचीनतम धर्म रहा है।

शास्त्र स्वयं तो बोलते नहीं। उनका मर्म बड़ी सावधानी से समझना चाहिए। स्वयं समझ में न आवे तो ज्ञानियों से उनका मर्म समझने का प्रयत्न करना चाहिए। समस्त शास्त्रों का तात्पर्य एक मात्र वीतरागता है, क्योंकि वीतराग की वाणी के आधार पर ही तो शास्त्रों का निर्माण हुआ है। वीतराग की वाणी वीतरागता की ही पोषक होती है। जो राग को धर्म बताये, राग-द्वेष का पोषण करें, वह वीतराग की वाणी नहीं हो सकती। जिन शास्त्रों में मांसादि-भक्षण और राग-द्वेषादि भावों का पोषण हो वे शास्त्र नहीं, शस्त्र हैं।

  • सत्य की खोज, पृष्ठ-78

द्वितीय अध्याय

परमात्मा का स्वरूप

धर्मप्रचार करनेवाले सर्वोच्च पद के लिए जैनपरम्परा में सामान्यतया अरहंत, जिन, परमात्मा, परमेष्ठी, केवली, भगवान् व तीर्थंकर – इन शब्दों का प्रयोग होता रहा है। इनमें से तीर्थंकरों को छोड़कर शेष सब पर्यायवाची ही हैं।

परमात्मदशा को प्राप्त करना ही सम्पूर्ण जैनागम का उद्देश्य है। जैनधर्म तो आत्मा को परमात्मा के रूप में विकसित करने की एक कला है, परमात्मदशा की प्राप्ति ही जैनसाधना का एकमात्र साध्य है। जैनमतानुसार जो वीतरागी और सर्वज्ञ होते हैं, उन्हें परमात्मा कहते हैं। जो राग¹-द्वेष² रहित होते हैं, उन्हें वीतरागी कहते हैं। तथा जो तीन लोक व तीन काल की समस्त बातों को एक साथ जानते हैं, उन्हें सर्वज्ञ कहते हैं।

जैनधर्म में इस परमात्म दशा को मुख्यतया दो भागों में बाँटा गया है - 1. निकल परमात्मा 2. सकल परमात्मा।

  1. निकल परमात्मा (सिद्ध) - कल का अर्थ होता है शरीर और निः का अर्थ होता है रहित; अतः शरीर रहित होने के कारण सिद्ध भगवान् को निकल परमात्मा कहते हैं।

जो गृहस्थावस्था का त्यागकर, मुनिधर्म साधन द्वारा चार घातिकर्मों का नाश होने पर अनंत चतुष्टय³ प्राप्त करके कुछ समय बाद अघाति कर्मों के नाश होने पर समस्त अन्य द्रव्यों का संबंध छूट जाने पर पूर्ण मुक्त हो गए हैं; लोक के अग्रभाग में किंचित् न्यून पुरुषाकार विराजमान हो गए हैं; जिनके 1. किसी को भला जानकर चाहना राग है।

  1. किसी को बुरा जानकर दूर करना चाहना द्वेष है।

  2. अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख और अनंतवीर्य को अनंतचतुष्ट्य कहते हैं। जैनदर्शनसार

द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म का अभाव होने से समस्त आत्मिक गुण प्रकट हो गए हैं, वे सिद्ध हैं। उनके आठ गुण कहे गए हैं

समकित दर्शन ज्ञान, अगुरुलघु अवगाहना ।

सूक्षम वीरज वान, निराबाध गुण सिद्ध के ।।

  1. क्षायिक सम्यक्त्व, 2. अनंतदर्शन, 3. अनंतज्ञान, 4. अगुरुलघुत्व, 5. अवगाहनत्व, 6. सूक्ष्मत्व, 7. अनंतवीर्य, 8. अव्याबाध (अनंत सुख)।

सिद्ध भगवान् गुणस्थानातीत होते हैं। उनके परमशुद्ध, कार्यपरमात्मा, लोकाग्रवासी, संसारातीत, निरंजन, निष्काम, साध्य परमात्मा, परमसुखी, ज्ञानाकारी, ज्ञानशरीरी, अशरीरी आदि अनेक नाम हैं। इन्हें देहमुक्त भी कहते हैं।

एक बार पूर्ण मुक्त हो जाने के पश्चात् जीव पुनः शरीर धारण नहीं करता है अर्थात् जैनमतानुसार आत्मा तो परमात्मा बनता है; संसारी तो मुक्त होता है; किन्तु मुक्त जीव पुनः बंधन को प्राप्त नहीं होते, सिद्ध जीव पुनः संसार में नहीं लौटते । सिद्ध अवस्था का प्रारंभ होता है, नाश कभी नहीं; अतः सर्वसिद्ध भगवान् नियम से सादि-अनंत ही हैं।

जैनदर्शन में जीव जन्म-मरण का नाश कर भगवान् बनते हैं; अतः भगवान् के पुनर्जन्म या अवतार का प्रश्न ही नहीं उठता । सिद्ध अवस्था के अतिरिक्त अन्य कोई उत्कृष्ट अवस्था नहीं है।

  1. सकल परमात्मा (अरहन्त) - अरहन्त अवस्था जीवनमुक्त

अवस्था है। यद्यपि सिद्धावस्था की प्राप्ति ही जैनधर्म का लक्ष्य है, फिर भी इसके पूर्व प्रत्येक साधक को अरहन्त अवस्था प्राप्त होती है। शरीर सहित होने के कारण अरहन्त भगवान् को सकल परमात्मा कहते हैं।

जो गृहस्थपना त्यागकर, मुनिधर्म अंगीकार कर, निजस्वभाव

साधन द्वारा चार घातिकर्मों का क्षय करके, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करते हैं, केवलज्ञान प्राप्त कर वीतरागी व सर्वज्ञ होते हैं - वे समस्त भगवान् अरहन्त कहलाते हैं।

परमात्मा का स्वरूप

इन्द्रियों को जीतने की अपेक्षा उन्हें ‘जिन’ भी कहते हैं। योग- सहित होने के कारण इन्हें ही ‘सयोगी जिन’ कहते हैं। केवलज्ञान प्राप्त करने की अपेक्षा उन्हें ही ‘केवली’ कहते हैं। वीतरागी व सर्वज्ञ होने के कारण वे ‘भगवान्’ कहलाते हैं तथा मोह-राग-द्वेषरूपी शत्रुओं को नष्ट करने की अपेक्षा उन्हें ही ‘अरिहन्त’ कहा गया है।

इसप्रकार जैनमान्यतानुसार सकल परमात्मा के अरहन्त, अरिहन्त, अरुहन्त, केवली, सयोगकेवली, जिन, सयोगी जिन, परमज्योति, आप्त, सर्वज्ञ और जिनेन्द्रदेव आदि एक हजार आठ नाम कहे गए हैं।

जैनशास्त्रों में अरहन्त के 46 गुणों (विशेषणों) का वर्णन है, उनमें से कुछ विशेषण तो आत्मा से संबंध रखते हैं और कुछ शरीर से ।

अनन्तचतुष्टय (अनन्त दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख व अनन्त वीर्य) आत्मा से संबंध रखने वाले गुण हैं; अतः वे प्रत्येक अरहन्त के होते हैं। निश्चय से ये ही अरहन्त के गुण हैं। शेष 42 गुण तीर्थंकर अरहन्तों के ही होते हैं, सब अरहन्तों के नहीं। इन्हीं तीर्थंकर अरहन्त परमात्मा की प्रतिमाएँ जिनमंदिरों में विराजमान की जाती हैं।

यद्यपि अरहन्त तो एक ही प्रकार के होते हैं; किन्तु बाह्य संयोगों की अपेक्षा पुण्य-पाप के संयोगों के अनुसार उनके अनेक प्रकार हो जाते हैं - तीर्थंकर अरहन्त, सामान्य अरहन्त आदि । इन्हें तीर्थंकर केवली व सामान्य केवली भी कहते हैं।

तीर्थंकर अरहंत (केवली)

जो धर्मतीर्थ का उपदेश देते हैं, समवशरण आदि विभूति से युक्त होते हैं, जिनके तीर्थंकर नामकर्म नामक विशेष पुण्य का उदय होता है’, जिनके कल्याणक महोत्सव मनाए जाते हैं, वे अरहंत तीर्थंकर कहलाते हैं। तीर्थंकर अरहंतों के 46 गुण होते हैं। जिनमें अनन्त चतुष्टय को छोड़कर शेष 42 गुणों में 10 तो जन्म के अतिशय हैं, जो शरीर से संबंध रखते हैं। 1. सम्यग्दृष्टि जीव को जब ऐसी भावना होती है कि जो तत्त्व मैंने समझा है, वह सभी जीवों को समझा सकूँ; तब उसको ऐसे तीव्र पुण्य कर्म का बंध होता है कि वह जो बोलता है, वह सभी जीव अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं।

जैनदर्शनसार

10 केवलज्ञान के अतिशय हैं, वे बाह्य पुण्य सामग्री से संबंधित हैं, तथा 14 देवकृत अतिशय देवों द्वारा किए हुए होते हैं। 8 प्रतिहार्य भी बाह्य विभूति हैं।

भरत क्षेत्र में दश कोड़ाकोड़ी सागर में तीर्थंकर 24 ही होते हैं। जैनों की स्पष्ट मान्यता है कि तीर्थंकर भगवान् दूसरों को संसार समुद्र से पार नहीं करते साधना में सहयोग नहीं करते; अपितु संसार समुद्र से पार होने का रास्ता बताते हैं, मार्गदर्शन करते हैं। जैन तीर्थंकर भगवान् अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए दुष्टों का दमन तो करते ही नहीं हैं, अपितु वे अपने ऊपर आए हुए उपसर्ग (कष्टों) को भी दूर करने का प्रयास नहीं करते । वे मित्रों पर प्रसन्न व शत्रुओं पर नाराज नहीं होते, क्रोध नहीं करते, शाप नहीं देते; अपितु दोनों अवस्थाओं में साम्यभाव रखते हैं। तीर्थंकर अरहन्तों का उपदेश इच्छारहित होता है; अतः उन्हें किसी को प्रेरणा देने का विकल्प नहीं होता। उनके उपदेश को सुनकर भव्यजीव स्वयं प्रेरित होकर तदनुसार आचरण कर स्वयं ही भगवान् बनते हैं। सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विक्रिया के द्वारा सभी तीर्थंकरों की धर्मसभा अर्थात् समवशरण को विशेष प्रकार से रचता है।

इसकी रचना कुबेर इसप्रकार करता है कि तीव्र रुचि वाले व्यक्ति ही इसमें प्रवेश कर पाते हैं; क्योंकि प्रारंभ की सात भूमियों में पुष्प वाटिकायें, वापियाँ, चैत्यवृक्ष, नाट्यशालाएँ आदि होती हैं; जिनमें देवांगनाएँ नृत्य करती रहती हैं; मिथ्यादृष्टि अभव्यजन अधिकतर इसी के देखने में उलझ जाते हैं।

समवशरण की सामान्य भूमि गोल होती है। उसकी प्रत्येक दिशा में आकाश में स्थित 20-20 हजार सीढ़ियाँ होती हैं।

समवशरण में चार कोट, पाँच वेदियाँ, इनके बीच में आठ भूमियाँ और सर्वत्र अन्तर भाग में तीन-तीन पीठ होते हैं। अन्तिम भूमि में 16 दीवारें व उनके बीच 12 कोठे होते हैं। जिनमें क्रमशः गणधर, मुनिराज, कल्पवासी देवियाँ, आर्यिकाएँ, श्राविकाएँ, ज्योतिषी देवियाँ, व्यन्तर देवियाँ, परमात्मा का स्वरूप

भवनवासी देवियाँ, भवनवासी देव, व्यन्तर देव, ज्योतिष देव, कल्पवासी देव, मनुष्य व तिर्यंच बैठते हैं।

पंचमवेदी के द्वितीय पीठ के ऊपर गंधकुटी’ होती है। गंधकुटी के मध्यभाग में पादपीठ सहित सिंहासन होता है; जिस पर भगवान् चार अंगुल के अंतराल से आकाश में स्थित रहते हैं ।

तीर्थंकरों द्वारा समवशरण में जो उपदेश दिया जाता है, उसे दिव्यध्वनि कहते हैं। जैनमतानुसार अरहंत भगवान् के सर्वांग से एक विचित्र गर्जनारूप ॐकारध्वनि खिरती है, जिसे दिव्यध्वनि कहते हैं। यह धर्मोपदेश स्वाभाविक प्रयत्न बिना ही होता है। जिस समय दिव्यध्वनि खिरती है, उस समय भगवान् का मुख बंद रहता है। उनकी दिव्यध्वनि तालु, दन्त ओष्ठ तथा कण्ठ के हलन चलन रूप व्यापार से रहित होती है।

दिव्यध्वनि में छः द्रव्य, नौ पदार्थ, पाँच अस्तिकाय और सात तत्त्वों का नाना हेतुओं द्वारा निरूपण होता है। जिसप्रकार आकाश से बरसा पानी एकरूप होता है, परन्तु पृथ्वी पर पड़ते ही वह नानारूप दिखाई देने लगता है; उसीप्रकार भगवान् की वाणी यद्यपि एकरूप होती है, तथापि सभा में सब जीव अपनी-अपनी भाषा में उसका भाव पूर्णतः समझते हैं। दिव्यध्वनि खिरने के लिए गणधर की उपस्थिति आवश्यक है।

गणधर तीर्थंकर के प्रमुख श्रोता होते हैं। एक तीर्थंकर के अनेक गणधर हो सकते हैं, जो तीर्थंकर द्वारा दी गई समस्त देशना को यथावत ग्रहण करते हैं। अतः उनकी अनुपस्थिति में दिव्यध्वनि नहीं खिरती है। जैसे कि गौतम गणधर की अनुपस्थिति के कारण तीर्थंकर भगवान् महावीर की 66 दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी। जैनमान्यतानुसार तीर्थंकर भगवान् महावीर के निर्वाण के पश्चात् उसी दिन सायंकाल गौतम गणधर को केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई।

कल्याणक महोत्सव

सभी तीर्थंकरों के कल्याणक महोत्सव मनाए जाते हैं।

  1. समवशरण के मध्य भगवान् के बैठने के स्थान को गंधकुटी कहते हैं। जैनदर्शनसार

जैनागम में भरतक्षेत्र के प्रत्येक तीर्थंकरों के जीवनकाल की पाँच प्रमुख घटनाओं का तिथि व स्थान सहित उल्लेख मिलता है, जिन्हें पंचकल्याणक के नाम से कहा जाता है; क्योंकि वे अवसर जगत् के लिए अत्यन्त कल्याणकारी व मंगलकारी होते हैं।

तीर्थंकरप्रकृति के अभाव में साधारण साधकों को ये नहीं होते। तीर्थंकर हुए बिना भी अरहन्त भगवान् बना जा सकता है। सभी

अरहन्त (भगवान्) तीर्थंकर अरहन्तों जैसे ही पूज्य हैं, उनकी पूज्यता में कोई अन्तर नहीं है। जैसे बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे, फिर भी सर्वज्ञ व वीतरागी होने से पूर्णतः पूज्य हैं, उनकी पाषाण प्रतिमाएँ आदिनाथ और महावीर जैसी ही पूजी जाती हैं; क्योंकि वीतरागता व सर्वज्ञता – ये दो लक्षण तीर्थंकर भगवान् व शेष अरहन्त भगवानों में समान रूप से पाए जाते हैं।

इन्हीं पंचकल्याणकों के आधार पर नवनिर्मित जिनबिम्ब की शुद्धि करने के लिए जैनमतानुयायी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव करते हैं, जोकि मूल पंचकल्याणक की ही कल्पना है। जैन विद्वान् इसे असली पंचकल्याणक की असल नकल (सत्य प्रतिलिपि) कहते हैं, जिसमें आरोप द्वारा प्रतिमा में तीर्थंकर भगवानों की स्थापना होती है। जैनमान्यतानुसार पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति (जिनबिम्ब) ही पूजनीय हैं।

इनमें जो जीव जन्म से ही तीर्थंकर प्रकृति लेकर उत्पन्न होते हैं, उनके ही पाँच कल्याणक होते हैं; परन्तु जिसने अन्तिम भव में ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया हो, उसको यथासंभव तीन व दो कल्याणक ही होते हैं। कल्याणक महोत्सव की अपेक्षा तीर्थंकर तीन प्रकार के होते हैं - पाँच कल्याणक वाले, तीन कल्याणक वाले और दो कल्याणक वाले- (i) पाँच कल्याणक वाले तीर्थंकर :- जिन सयोगकेवली तीर्थंकर परमात्माओं ने पूर्वभव में तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का बंध किया हो, उनके ही गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, तपकल्याणक, केवलज्ञानकल्याणक और निर्वाणकल्याणक - इस प्रकार पाँच कल्याणक होते हैं।

परमात्मा का स्वरूप

(ii) तीन कल्याणक वाले तीर्थंकर :- जिन जीवों ने अपने वर्तमान मनुष्य भव के चौथे (अविरत सम्यक्त्व) या पाँचवें (देशविरत) गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति का बंध प्रारंभ किया है; उनके तप, केवलज्ञान और निर्वाण ह्न ऐसे तीन ही कल्याणक होते हैं।

(iii) दो कल्याणक वाले तीर्थंकर :- जिन चरमशरीरी भव्य

आत्माओं ने वर्तमान मनुष्य भव में ही छठवें या सातवें गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है, उनके मात्र केवलज्ञान और निर्वाण कल्याणक – ऐसे दो ही कल्याणक होते हैं।

तीन कल्याणक और दो कल्याणक वाले तीर्थंकर महाविदेह क्षेत्र में ही होते हैं तथा वे महाविदेह के जिस क्षेत्र में दूसरे तीर्थंकर न हों वहाँ ही होते हैं। महाविदेह क्षेत्र के अलावा भरत-ऐरावत क्षेत्रों में जो तीर्थंकर होते हैं; उन सभी को नियम से पांच कल्याणक होते हैं।

जिसप्रकार सभी मॉनीटर कक्षा के छात्र होते हैं, पर कक्षा के सभी छात्र मॉनीटर नहीं होते; उसीप्रकार सभी तीर्थंकर अरहन्त भगवान् तो नियम से होते हैं; किन्तु सभी अरहन्त भगवान् तीर्थंकर नहीं होते । सामान्य अरहन्त (केवली)

तीर्थंकरों के अलावा शेष सब सामान्य अरहंत या सामान्य केवली कहलाते हैं। केवली अनन्त हो सकते हैं। बाह्य कारणों की अपेक्षा केवली भी अनेक प्रकार के होते हैं -

(i) सातिशय केवली :- गंधुकटी से युक्त होते हैं, कदाचित् उपदेश भी देते हैं।

(ii) मूक केवली : - इनका उपदेश नहीं होता ।

(iii) उपसर्ग केवली :- मुनि अवस्था में उपसर्ग हो, उसी उपसर्ग अवस्था में जिन्हें केवलज्ञान प्राप्त होता है; उन्हें उपसर्ग केवली कहते हैं। (iv) अन्तःकृत केवली :- ध्यानारूढ़ अवस्था में विराजमान जिन मुनिराजों को पूर्व भव या इस भव का वैरी देव अथवा विद्याधरादि उठाकर आकाश में ले जाते हैं और ऊपर से समुद्र या अग्नि में अथवा पहाड़ पर फेंक देते हैं। ऐसे अत्यन्त प्रतिकूल अवसरों पर आकाश से नीचे समुद्र या अग्नि में गिरने से पहिले अथवा पहाड़ से टकराने के पहले ही सयोगकेवली होकर अंतर्मुहूर्त में सिद्धपद प्राप्त कर लेते हैं, उन्हें अंतःकृत जैनदर्शनसार

केवली कहते हैं, अर्थात् जिन्होंने अंतर्मुहूर्त में ही संसार का अंत कर दिया है, आठों कर्मों का अंत कर दिया है; वे अंतःकृत केवली कहलाते हैं। अंतर्मुहूर्त में ही सयोगकेवली, अयोगकेवली दशा पार कर सिद्धकेवली बनने के कारण इनके भी उपदेशादि का प्रसंग बन ही नहीं सकता । (v) समुद्घातकेवली :- जिन सयोगी जिनेंद्र परमात्मा के आयुकर्म की स्थिति कम हो और वेदनीयादि तीन अघाति कर्मों की स्थिति अधिक हो तो उन्हें आयुकर्म की स्थिति के बराबर करने को केवली समुद्घात कहते हैं। ऐसे समुद्घात को करनेवाले तेरहवें गुणस्थानवर्ती जिनेन्द्र को समुद्घातगत केवली कहते हैं।

गुणस्थान अपेक्षा भेद ह्र

सभी सकल परमात्माओं की दो अवस्थायें होती हैं – अर्थात् गुणस्थान अपेक्षा इनके दो भेद हैं -

(i) सयोग केवली और (ii) अयोग केवली

(i) सयोग केवली :- योग सहित होने के कारण 13वें गुणस्थानवर्ती समस्त अरहन्त (तीर्थंकर, अरहंत व केवली) सयोग केवली कहलाते हैं। सयोग केवली अरहंतों का इच्छा रहित उपदेश होता है। समस्त अरहंत भगवानों के विहार, उपदेशादि क्रियाएँ इसी गुणस्थान में होती हैं। सयोग केवली सिद्ध होने से पूर्व नियम से अयोग केवली होते हैं। इस गुणस्थान से ही मुनिराज को परमात्मा कहा जाता है।

(ii) अयोग केवली :- सयोग केवली परमात्मा ही शरीर में रहते हुए भी योग-निरोध के कारण अयोग केवली कहलाने लगते हैं। योग- निरोध होने से मन-वचन-काय के निमित्त से होनेवाला आत्मप्रदेशों का कंपन रुक जाता है; अतः आत्मा और शरीर का एकक्षेत्रावगाह संबंध पूर्ववत् होने पर भी निमित्त-नैमित्तिक संबंध का अभाव हो जाता है। पूर्ण संवर व पूर्ण निर्जरा अयोग केवली को ही होती है। अयोग केवली गुणस्थान सकल परमात्मा का ही है। यह अंतिम गुणस्थान है। अयोग केवली गुणस्थान से सिद्धदशा में ही गमन होता है।

इसप्रकार हम देखते हैं कि जैनदर्शन में 13वें व 14वें गुणस्थानवर्ती परमात्मा का स्वरूप

भगवान् को ही परमात्मा, जिन, केवली, अरहंत, तीर्थंकर आदि अलग- अलग नामों से अलग-अलग अपेक्षाओं से कहा गया है।

वस्तुतः तो परमात्मा की दो ही अवस्थाएँ हैं – चारघातिकर्मों रहित, शरीर सहित अरहंत व अष्टकर्म रहित शरीर रहित सिद्ध ।

सभी अरहंत चाहे वे सामान्य केवली हों या तीर्थंकर केवली हों; अंत में सिद्धपद को ही प्राप्त होते हैं।

परमात्मा के भेद-प्रभेदों को निम्न चार्ट द्वारा समझा जा सकता है। परमात्मा

निकल परमात्मा

शरीर रहित

पूर्ण मुक्त

सिद्ध

सकल परमात्मा

शरीर सहित

जीवन-मुक्त

अरहंत

तीर्थंकर अर्हन्त (केवली) सामान्य अर्हन्त (केवली)

पांच कल्याणक युक्त

दो कल्याणक युक्त

तीन कल्याणक युक्त सातिशय मूक केवली अन्तःकृत केवली

केवली

उपसर्ग केवली

सयोग केवली

अयोग केवली

सिद्ध केवली

समुद्घातगत

केवली

उक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैन मान्यतानुसार अरहंत भगवान् तो अनन्त हो सकते हैं, पर भरतक्षेत्र में एक युग में तीर्थंकर चौबीस ही होते हैं।

तृतीय अध्याय

सम्यग्दर्शन

मुक्ति के मार्ग में सम्यग्दर्शन का स्थान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इसके बिना ज्ञान, चारित्र, व्रत, तप आदि सब वृथा हैं। सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान व चारित्र मिथ्याचारित्र कहलाता है। अतः सम्यग्दर्शन के बिना नियम से सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र नहीं होते। जिनागम में स्पष्ट कहा है कि - जिसप्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलागम संभव नहीं है; उसीप्रकार सम्यग्दर्शन के बिना सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलागम (मोक्ष) होना संभव नहीं है। सम्यग्दर्शन तो धर्म का मूल है। यदि जीव एक बार भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर ले तो उसका संसार सीमित हो जाता है, उसके अनन्त भव नहीं रहते।

सम्यग्दर्शन चारों ही गतियों में संज्ञी (मनसहित) पर्याप्तक’ भव्यजीवों को ही होता है, असंज्ञी व अपर्याप्तक व अभव्यों को नहीं। मनुष्य गति में 8 वर्ष की उम्र के पश्चात् ही सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता होती है। 1. सभी जीव शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने पर पर्याप्तक कहलाते हैं। पर्याप्ति छह होती हैं - आहार, शरीर, श्वास, इन्द्रिय, भाषा और मन।

जिन जीवों को शरीर पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती वे जीव अपर्याप्तक कहलाते हैं। अपर्याप्तक जीव दो प्रकार के होते हैं -

(अ) निवृत्ति अपर्याप्तक (ब) लब्धि अपर्याप्तक

(अ) जिन जीवों को शरीर पर्याप्ति वर्तमान में पूर्ण नहीं हुई हैं; पर भविष्य में पूर्ण हो जावेंगी, वे जीव निवृत्ति अपर्याप्तक कहलाते हैं।

(ब) जिन जीवों को शरीर पर्याप्ति कभी पूर्ण नहीं होती अर्थात् जो शरीर पर्याप्ति पूर्ण किए बिना ही मर जाते हैं, वे जीव लब्धि अपर्याप्तक कहलाते हैं।

छहों पर्याप्तियों का प्रारंभ युगपत होता हैं; क्योंकि जन्मसमय से ही इनका अस्तित्व पाया जाता है। परन्तु पूर्णता क्रम से ही होती है। छहों पर्याप्तियों की शक्ति की पूर्णता एक अंर्तमुहुर्त में हो जाती है।

सम्यग्दर्शन

सम्यग्दर्शन में ‘दर्शन’ शब्द श्रद्धान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है और सम्यक् पद विपरीताभिनिवेश (उल्टा अभिप्राय) के निषेध के लिए दिया गया है। अतः विपरीत अभिनिवेश रहित जीवादि तत्त्वों का श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है। जीव-अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष - ये सात तत्त्व कहे गए हैं।’ इनका स्वरूप - ‘ऐसा ही है, अन्यथा नहीं है’ - ऐसा प्रतीति भाव ही तत्त्वार्थ श्रद्धान है, सम्यग्दर्शन है। ‘तत्त्वार्थ’ शब्द में ‘तत्त्व’ शब्द भाववाची है और ‘अर्थ’ वस्तुवाची। वस्तु और भाव दोनों का श्रद्धान अपेक्षित होने से ‘तत्त्वार्थ’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

विपरीताभिनिवेश रहित आत्मश्रद्धान निश्चय सम्यग्दर्शन है और विपरीताभिनिवेश रहित तत्त्वार्थश्रद्धान व देव-गुरु-धर्मादिक का श्रद्धान व्यवहार सम्यग्दर्शन है। ये दोनों सम्यक्त्व एक ही काल में पाए जाते हैं। जैनमतानुसार सम्यग्दर्शन होने से पूर्व पाँच लब्धियाँ होती हैं। लब्धियाँ

ज्ञान आदि शक्ति विशेष को लब्धि कहते हैं। ये पाँच होती हैं ह्र (i) क्षयोपशम लब्धि (ii) विशुद्धिलब्धि (iii) देशनालब्धि (iv) प्रायोग्यलब्धि और (v) करणलब्धि।

उक्त पाँचों लब्धियों में प्रथम चार लब्धि भव्य व अभव्य दोनों को होती हैं। इनके होने पर सम्यग्दर्शन होने का कोई नियम नहीं है, किसी जीव को हो भी सकता है व किसी को नहीं भी हो; किन्तु पाँचवीं करणलब्धि उस भव्यजीव को ही होती है; जिसे अंर्तमुहूर्त में सम्यग्दर्शन होना होता है। (i) क्षयोपशमलब्धि :- जिसके होने पर तत्त्वविचार करने की शक्ति हो ह्र ऐसे ज्ञानावरणादि कर्मों का क्षयोपशम होना ही क्षयोपशमलब्धि है। क्षयोपशमलब्धि के बिना जीव को तत्त्व समझ में नहीं आता है।

(ii) विशुद्धलब्धि :- मोह के मन्द उदय होने से तत्त्व विचार करने में उद्यम होना ही विशुद्धलब्धि है। विशुद्धलब्धि के बिना जीव तत्त्व को 1. तत्त्वार्थ सूत्र; सूत्र - 4

अ

जैनदर्शनसार

समझने का प्रयास ही नहीं करता । मन्दकषायरूप भाव होने पर यह लब्धि होती है।

(iii) देशनालब्धि :- जिनोपदिष्ट तत्त्व को सुनकर, पढ़कर, चिंतवन करके सही निर्णय पर पहुँचना ही देशनालब्धि है। देशनालब्धि में बाह्य निमित्त वीतरागी सर्वज्ञ देव, उनकी वाणी और उसके अनुसार लिखे शास्त्र व आत्मानुभवी तत्त्वज्ञ ज्ञानीजन होते हैं। जिनसे सच्चे उपदेश की प्राप्ति होती है। जहाँ नरकादि में उपदेश का निमित्त न हो, वहाँ वह पूर्व संस्कार से होती है।

(iv) प्रायोग्यलब्धि :- देशनालब्धि द्वारा निर्णीत आत्मतत्त्व में वृद्धिंगत रुचि का परिपाक ही प्रायोग्यलब्धि है। इससे परिणामों में विशुद्धता की वृद्धि होती जाती है।

परिणामों में विशुद्धता होने पर पूर्वकर्मों की सत्ता कम होती जाती है, नवीन बंध भी क्रमशः घटते जाते हैं तथा अनेक पाप प्रकृतियों का बंध मिटता जाता है।

(v) करणलब्धि :- करणलब्धि वाले जीव को बुद्धिपूर्वक तो इतना ही उद्यम होता है कि तत्त्वविचार में ही उपयोग तद्रूप होकर लगे, जिससे समय-समय पर परिणाम निर्मल होते जाते हैं। इस करणलब्धि के तीन भेद हैं (क) अधःकरण (ख) अपूर्वकरण और (ग) अनिवृत्तिकरण । (क) अधःकरण :- करण परिणाम को कहते हैं। जहाँ पहिले व

पिछले समय वाले जीवों के परिणाम समान भी हो सकते हैं व अधिक हीन विशुद्धता सहित भी हो सकते हैं, वह अधःकरण है। जैसेह्रकिसी जीव के परिणाम पहले समय में अल्पविशुद्धता सहित हुए तथा बाद में समय- समय अनन्तगुनी विशुद्धता बढ़ती गई। अनन्तगुणा विशुद्धता बढ़ते हुए उसके द्वितीय-तृतीय आदि समयों में जैसे परिणाम होते हैं वैसे परिणाम किसी अन्य जीव के प्रथम समय में ही हो जाते हैं तथा इनके परिणाम भी द्वितीय-तृतीय आदि समय में प्रथम समय से अनन्तगुनी विशुद्धता सहित ही होते हैं।

इस करण में प्रत्येक जीव के परिणाम प्रथम समय से द्वितीयादि समय में सम्यग्दर्शन

अनन्तगुणी विशुद्धता सहित ही होते हैं। विशेष इतना कि किसी जीव के द्वितीय-तृतीय समय में जैसे परिणाम होते हैं वैसे परिणाम किसी अन्य जीव के प्रथम समय में भी हो सकते हैं।

(ख) अपूर्वकरण :- जिसमें पहिले व पिछले समय वालों के

परिणाम समान न हों, अपूर्व ही हों, वह अपूर्वकरण हैं। इस करण में एक समय वालों के परिणाम तो परस्पर समान या असमान होते हैं; परन्तु भिन्न-भिन्न समय वालों के परिणाम समान नहीं होते, अपूर्व ही होते हैं। प्रथम समय वालों के उत्कृष्ट परिणामों से द्वितीयादि समय वालों में जघन्य परिणाम भी अनन्तगुनी विशुद्धता सहित ही होते हैं।

(ग) अनिवृत्तिकरण :- जिसमें समान समय वाले जीवों के परिणाम भेद से रहित समान ही होते हैं तथा प्रथमादि समय वालों से द्वितीयादि समय वालों के परिणाम अनन्तगुनी विशुद्धता सहित होते हैं; वह अनिवृत्तिकरण है।

सम्यग्दर्शन के भेद

सम्यग्दर्शन स्वतः या किसी के उपदेश से या जातिस्मरण,

जिनबिम्बदर्शन आदि के निमित्त से काल पकने पर भव्यजीवों को ही उत्पन्न होता है; अतः अलग-अलग अपेक्षाओं से सम्यग्दर्शन के अनेक भेद जैनदर्शन में बताए गए हैं

(i) उत्पत्ति की अपेक्षा भेद :- उत्पत्ति की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के दो भेद हैं – निसर्गज और अधिगमज¹ । जो दूसरे के उपदेशादि के बिना स्वयमेव (पूर्व में तत्त्व के श्रवण, ग्रहण, धारण से) उत्पन्न होता है, उसे निसर्गज-सम्यग्दर्शन कहते हैं। जो सम्यग्दर्शन पर के उपदेशादि से उत्पन्न होता है, उसे अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं।

प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में अनादि मिथ्यादृष्टि को देशनालब्धि (उपदेश श्रवण) आवश्यक है। यहाँ विशेष इतना है कि अधिगमज सम्यग्दृष्टि को तो साक्षात् सत्समागम प्राप्त होता है, किन्तु निसर्गज सम्यग्दृष्टि को पूर्व में सुने गए उपदेश के संस्कारवश सम्यग्दर्शन होता है।

  1. तत्त्वार्थ सूत्र; सूत्र - 3

जैनदर्शनसार

(ii) निमित्त की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के भेद :- ह्न अन्य निमित्तादि की अपेक्षा सम्यक्त्व के दस भेद हैं – आज्ञा सम्यक्त्व, मार्ग सम्यक्त्व, उपदेश सम्यक्त्व, सूत्र सम्यक्त्व, बीज सम्यक्त्व, संक्षेप सम्यक्त्व, विस्तार सम्यक्त्व, अर्थ सम्यक्त्व, अवगाढ़ सम्यक्त्व और परमावगाढ़ सम्यक्त्व । दर्शनमोह के उपशान्त होने पर जिन आज्ञा मानने से जो तत्त्वश्रद्धान उत्पन्न होता है, वह ‘आज्ञा सम्यक्त्व’ है।

दर्शनमोह का उपशम होने से निर्ग्रन्थमार्ग के अवलोकन से जो मोक्षमार्ग का श्रद्धान होता है; उसे ‘मार्ग सम्यक्त्व’ कहते हैं।

तिरेसठ श्लाका पुरुषों के पुराण के उपदेश से जो तत्त्वश्रद्धान उत्पन्न होता है, उसे ‘उपदेश सम्यक्त्व’ कहते हैं।

मुनि के चारित्रानुष्ठान को सूचित करने वाले आचारसूत्र को सुनकर जो तत्त्वश्रद्धान होता है, उसे ‘सूत्र सम्यक्त्व’ कहते हैं।

जिन जीवादि पदार्थों के समूह का अथवा गणितादि विषयों का ज्ञान दुर्लभ है; उनका किन्हीं बीजपदों द्वारा ज्ञान प्राप्त करनेवाले भव्यजीव के दर्शनमोहनीय के असाधारण उपशम होने पर जो तत्त्वश्रद्धान होता है; उसे ‘बीज सम्यक्त्व’ कहते हैं।

जो भव्य जीव पदार्थों के स्वरूप को संक्षेप में ही जानकर तत्त्वश्रद्धान करते हैं, उसे ‘संक्षेप सम्यक्त्व’ कहते हैं।

जो भव्य जीव 12 अंगों को सुनकर तत्त्वश्रद्धानी होते हैं; उसे ‘विस्तार सम्यक्त्व’ कहते हैं।

जैनागमों के वचन के बिना ही किसी अर्थ के निमित्त से हुई अर्थदृष्टि ‘अर्थ सम्यक्त्व’ है।

श्रुतकेवली के तत्त्वश्रद्धान को ‘अवगाढ़ सम्यक्त्व’ कहते हैं। केवलज्ञानी के तत्त्वश्रद्धान को ‘परमावगाढ़ सम्यक्त्व’ कहते हैं। सम्यग्दर्शन के उक्त भेदों में प्रथम आठ भेद तो कारण अपेक्षा से कहे गए हैं तथा अन्तिम दो भेद ज्ञान के सहकारीपने की अपेक्षा किए गए हैं।

सम्यग्दर्शन

(iii) दर्शनमोह कर्म अपेक्षा सम्यग्दर्शन के भेद :- दर्शनमोह की प्रकृतियों के उपशम, क्षयोपशम और क्षयरूप होने से सम्यग्दर्शन क्रमशः तीन प्रकार का है – (क) औपशमिक (ख) क्षायोपशमिक (ग) क्षायिक । (क) औपशमिक सम्यग्दर्शन :- आत्मश्रद्धान के बल से दर्शनमोह और चारित्रमोह के अनन्तानुबंधी कषाय चौकड़ी के उदय के उपशान्त होने पर उपशम सम्यग्दर्शन होता है। जहाँ सत्ता पाई जाए और उदय न पाया जाए उसे उपशम कहते हैं। अतः इस सम्यग्दर्शन के काल में दर्शनमोह की सत्ता तो बनी ही रहती है; इसलिए यह अंर्तमुहूर्त कालपर्यंत ही रहता है। बाद में कोई जीव दर्शनमोह की मिथ्यात्वप्रकृति का उदय आने पर मिथ्यात्व गुणस्थान को प्राप्त होता है अथवा कोई जीव अनंतानुबंधी चार में से किसी एक कषाय का उदय आने पर सासादन सम्यग्दृष्टि होता है अथवा कोई जीव दर्शनमोहनीय की मिश्र प्रकृति का उदय होने पर सम्यग्मिथ्यादृष्टि होता है। अथवा कोई जीव दर्शनमोहनीय की सम्यक्प्रकृति का उदय होने पर औपशमिक सम्यक्त्व से क्षायोपशमिक सम्यक्दृष्टि हो जाता है। आत्मश्रद्धान की अपेक्षा यह सम्यग्दर्शन क्षायिक सम्यग्दर्शन जैसा ही निर्मल व संदेह रहित होता है। यह चौथे से ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। इसके दो भेद हैं – प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन और द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन । प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन :- जब जीव मिथ्यात्व गुणस्थान में करण द्वारा दर्शनमोह का उपशम करके जो सम्यक्त्व प्राप्त करता है, उसे प्रथमोपशम सम्यक्त्व कहते हैं। अतः प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने वाला जीव नियम से मिथ्यादृष्टि ही होता है।

अनादिकालीन मिथ्यादृष्टि जीव को सर्वप्रथम प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन ही होता है।

इस सम्यग्दर्शन को प्राप्त होने वाले जीव को अधःकरण, अपूर्वकरण व अनिवृत्तिकरण के भेद से क्रमशः तीन प्रकार की विशुद्धियाँ होती हैं। अनिवृत्तिकरण के अंतिम समय मिथ्यात्व का व्यय व सम्यक्त्व का उत्पाद जैनदर्शनसार

होने से प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। अनादि मिथ्यादृष्टि को सम्यक्त्व मोहनीय व मिश्रमोहनीय प्रकृतियों की सत्ता न होने से एक मिथ्यात्व कर्म का ही उपशम होता है।

सादि मिथ्यादृष्टि को भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में पूर्वोक्त पाँचों लब्धियाँ होती हैं – विशेष इतना कि यहाँ किसी जीव के एक प्रकृति की व किसी जीव के तीन प्रकृतियों की भी सत्ता होती है। अतः जिसको जैसी सत्ता होती है, वह उनका उपशम करके प्रथमोपशम सम्यक्त्वी होता है।

सादि मिथ्यादृष्टि को यदि थोड़े समय मिथ्यात्व का उदय रहे तो उसका बाह्य जैनीपना नष्ट नहीं होता और तत्त्वों का अश्रद्धान व्यक्त नहीं होता तथा विचार किए बिना ही अथवा थोड़े विचार से ही उसे पुनः सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जाती है; लेकिन यदि बहुत काल तक मिथ्यात्व का उदय रहे तो जैसी अनादि मिथ्यादृष्टि की दशा होती है, वैसी ही इनकी भी दशा हो जाती है; गृहीत मिथ्यात्व को भी ग्रहण कर लेता है और निगोदादि में भी चला जाता है।

सादि मिथ्यादृष्टि जीव को हुआ सम्यग्दर्शन भी प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन कहलाता है; क्योंकि यहाँ प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन से तात्पर्य प्रथम बार हुआ सम्यग्दर्शन न होकर ‘प्रथम गुणस्थान से प्राप्त’ सम्यग्दर्शन है। यह सम्यग्दर्शन चतुर्थगुणस्थान से लेकर सप्तम गुणस्थान तक पाया जाता है।

द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन :- सप्तम गुणस्थान में क्षयोपशम सम्यग्दर्शन से जो उपशम सम्यग्दर्शन होता है, उसे द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन कहते हैं। इसमें करणों द्वारा तीन प्रकृतियाँ उपशम होती है; क्योंकि इसमें तीन की सत्ता पाई जाती है। यह सप्तम से लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक रहती है। गिरते हुए किसी के छठवें, पाँचवें व चौथे गुणस्थान में भी रहता है। (ख) क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन :- प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन का काल पूर्ण होने पर यह सम्यग्दर्शन होता है व सादि मिथ्यादृष्टि जीव को मिथ्यात्व गुणस्थान व मिश्र गुणस्थान से भी इसकी प्राप्ति होती है। जब जीव को दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियों में से सम्यक्त्व मोहनीय का उदय हो, अन्य दो सम्यग्दर्शन

का उदय न हो तब क्षयोपशम’ सम्यग्दर्शन होता है। इसको गुणश्रेणी आदि क्रिया नहीं होती तथा अनिवृत्तिकरण भी नहीं होता।

इस क्षयोपशम सम्यग्दर्शन को ही ‘वेदक सम्यग्दर्शन’ कहते हैं। जहाँ पर मिथ्यात्व मिश्र मोहनीय की मुख्यता से कथन किया जाता है, वहाँ क्षयोपशम कहा जाता है तथा जहाँ सम्यक्त्व मोहनीय की मुख्यता से कथन किया जाता है, वहाँ वेदक सम्यग्दर्शन कहा जाता है। यह चतुर्थ गुणस्थान से सप्तम गुणस्थान तक होता है।

(ग) क्षायिक सम्यग्दर्शन :- वेदक सम्यग्दृष्टि ही इस सम्यग्दर्शन को प्राप्त करता है। दर्शनमोहनीय कर्म के सर्वथा क्षय हो जाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है, उसे क्षायिक सम्यग्दर्शन कहते हैं। इसमें प्रतिपक्षी कर्म की सत्ता नहीं पाई जाती है क्योंकि यह सात प्रकृतियों के क्षय से होता है; अतः क्षायिक सम्यग्दर्शन का कभी नाश नहीं होता, जबसे उत्पन्न होता है; तबसे सिद्ध दशा पर्यन्त इसका सद्भाव रहता है।

यह नरकगति में केवल प्रथम पृथ्वी में होता है, अन्य में नहीं। कर्मभूमिज मनुष्यों में यह केवली, श्रुतकेवली या तीर्थंकर के पादमूल में ही होता है। देवगति में भवनत्रिक व सर्वदेवियों के भी नहीं होता तथा तिर्यंचगति में तिर्यंचनियों के नहीं होता है।

सम्यग्दर्शन के अंग

सम्यग्दर्शन के आठ अंग होते हैं :- (i) निःशंकित (ii) निःकांक्षित (iii) निर्विचिकित्सा (iv) अमूढ़दृष्टि (v) उपबृंहण या उपगूहन (vi) स्थितिकरण (vii) वात्सल्य और (viii) प्रभावना ।

(i) भय का अभाव अथवा तत्त्वों में शंका का अभाव निःशंकित

अंग है।

(ii) पर द्रव्यादि में राग रूप वाँछा का अभाव निःकांक्षित अंग है। 1. मिथ्यात्व व मिश्र मिथ्यात्व के वर्तमानकाल में उदय आने वाले योग्य निषेकों का उदय आए बिना ही जो निर्जरा होती है, उसे ‘क्षय’ कहते हैं और उन्हीं के आगामी काल में उदय में आने योग्य निषेकों की सत्ता पाई जाए, उसे ‘उपशम’ कहते हैं। जहाँ इन दोनों के साथ-साथ सम्यक्त्व मोहनीय का उदय पाया जाता है, उसे क्षयोपशम कहते हैं।

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:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3028.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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