जैन धर्म
सेठ सुदर्शन
सेठ सुदर्शन का पूर्व भव - सुगन्ध नामक ग्वाला मुनि को तेज धूप में शिला पर लेटा देखता है तथा आश्चर्यचकित होता है।
ग्वाला कौन बैठे हैं ये भाई इतनी धूप में। जा के लाने धूप नहीं लग रही का।
महिला ① ये दिगम्बर मुनिराज हैं अभी इनके दर्शन करते हैं।
महिला ② ये ऐसे मुनिराज हैं जो की दिन में एक बार भोजन - पानी आहार के रूप में ग्रहण करते हैं।
महिला ① ये हमेशा २८ मूलगुणों का पालन करते हैं।
महिला ② आओ इन्हें नमस्कार करो।
ग्वाला जय हो मुनिराज की जय हो। (भजन)
ग्वाला घर जाता है
ग्वाला सुनती हो कहा चली गई (दरवाजा खटखटाते हुए)
पत्नी चिल्लाये रहे हो बात बताओ का हो गयो।
पत्नी खोलो तो रहे हैं दरवाजा रुक तो जाओ। चिल्लाये रहे हो।
ग्वाला समझ नहीं आ रही इतनी देर से चिल्ला रहे हैं। आवाज दब जाए हमारी। तो सब समझ में आ जाए तुम्हारी। दिमाग खराब करती हो।
पत्नी चिल्ला काये रहे हो बात बताओ का हो गयो।
ग्वाला बात बताओ। बात बताओ। बात बताने ही से चिल्ला रहे हैं। जंगल में, कपड़ा नहीं है उनके पास पहनने।
पत्नी तो हम का करे।
ग्वाला कपड़ा दो - कपड़ा कई हम का करे।
पत्नी हमाये हते का कपड़ा को पेड़ लगे हैं, जो कपड़ा मांग रहे हो हमसे।
ग्वाला तुमसे तो बात करवो बेकार है। जाओ निकलो। हम कह रहे हैं जाओ।
ग्वाला कपड़े से मुनि का पसीना पोंछता है। (भजन)
ग्वाला नमस्कार महाराज
मुनि धर्मवृद्धि हो।
ग्वाला हे महाराज मैं आपके जैसा कब बन पाऊंगा।
मुनि हे भव्य जीव मैं तुम्हें महामंत्र देता हूँ जिसके बोलने तथा जाप्य देने से तुम स्वर्ग व मोक्ष को प्राप्त कर सकते हो। ये णमोकार महामंत्र मंत्र है। मेरे साथ बोलो। (णमोकार मंत्र बोलता है।)
ग्वाला धन्य हो महाराज धन्य हो। नमस्कार।
ग्वाला घर जाता है
ग्वाला हम कह रहे हैं खोलो दरवाजा।
पत्नी इतनी लेट काये आए हैं। पता नहीं सेठ के पास जाने हैं।
ग्वाला का कह रही हो। जल्दी बांध रोटी जल्दी कर हम कह रहे हैं जल्दी बांध समझ में नहीं आये कहूं।
ग्वाला सेठ के यहाँ देरी से पहुँचता है।
सेठ इतनी देर कैसे हो गई। रोज तो जल्दी आते हो।
ग्वाला अरे सेठ जी जा मत पूछो भागते - भागते आए हैं अभी तक खाना भी नहीं खाया मैंने।
सेठ पहला पेट पूजा फिर काम दूजा। चलो खाना खाते हैं।
संवाद
ग्वाला
खाना खाते वक्त वह ग्वाला णमोकार मंत्र पढ़ता है। तभी सेठ सुन लेता है।
सेठ
अरे ये तो महामंत्र है। ये तुम्हें कहाँ से मिला।
ग्वाला
उसारे से सारी कथा सुनाता है।
सेठ
धन्य है तुम्हारे भाग्य। धन्य है वो घड़ी, जिसमें तुम्हें ऐसे मुनिराज का सानिध्य प्राप्त हुआ। जिनके दर्शन को देवता भी तरसते हैं। अहो भाग्य तुम्हारा।
ग्वाला
ठीक है सेठ जी मैं निकलता हूँ।
अरे! उन मुनिराज का जीवन कैसा होगा जिनके दर्शन को देवता भी तरसते हैं मुझे भी उनके जैसा बनना है। णमो—
उसी समय वहाँ भीषण बारिश होती है परंतु जब ग्वाला पुल पार करने लगता है तब तालाब के पानी में गिर जाता है और मर जाता है।
अगले जन्म में वह सेठ पुष्पद्त के पुत्र के रूप में जन्म लेता है और जब वह बड़ा होता है तो बड़ी मनोरम्य से इसकी शादी हो जाती है।
एक बार नगर में एक मुनिराज पधारते हैं उनके दर्शन हेतु सेठ पुष्पद्त जाते हैं तथा उन्हें वैराग्य आ जाता है और वे मुनि
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बन कर विहार कर जाते हैं।
एक दिन सारा नगर सुदर्शन के ऊपर आ जाता है तथा वह सेठ सुदर्शन कह लाने लगते हैं। तथा धर्म की प्रभावना व भगवान् की भक्ति में सेठ का खूब मन लगता है।
एक दिन सुदर्शन सेठ और उनका मित्र कपिल बाग में टहल रहे थे उनके बीच धार्मिक बात चल रही थी। तभी कपिल की पत्नि कपिला सेठ सुदर्शन पर मोहित हो जाती है।
कपिला
आ हा, हा हा कितना सुंदर पुरुष है इसे तो देवों को भी मात दे दी इसके बिना तो मेरा जीवन व्यर्थ है अतः अब मुझे इनसे मिलने का कुछ न कुछ उपाय सोचना चाहिए।
इस प्रकार कपिला के दूषित परिणाम होते हैं और वे अपना शील व सुदर्शन का शील भंग करने के लिए आतुर होती है। कपिला दासी को बुलाती है।
कपिला
दासी इधर आओ। दासी तुम इस नगरी के सेठ सुदर्शन के पास जाओ और लछो की उत्पके दस्त तकलीफ में है। अतः वह तुम्हारे साथ तुरंत आएंगे।
दासी
जी शैठानी जी।
दासी सेठ के दूर जाती है।
दासी
प्रणाम सेठ जी आपको मेरे साथ चलना होगा आपके मित्र कपिला संकट में है।
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सेठ
अच्छा ऐसी बात है। चलो मैं चलता हूँ।
सेठ कपिला के पास जाते हैं जब घर पहुँचते हैं तो कपिला घर पर नहीं होता है तो सेठ कपिला को खूब आवाज लगाते हैं।
सेठ
कपिल - कपिल कहाँ हो तुम, क्या हुआ तुम्हें।
कपिला
कपिल अभी बाहर गया है कृपया कर तुम मेरी इच्छा पूर्ण करो। मैं तुम्हारे रूप और सुंदरता पर मोहित हो गई हूँ।
सेठ
आप जैसा समझ रही हो मैं वैसा नहीं कर सकता (आपको पता नहीं है की मैं एक नपुंसक हूँ)।
कपिला
ये क्या कह रहे हो तुम चले जाओ निकृष्ट प्राणी मेरे घर से आज के बाद तुम कभी भी मेरे सामने मत आना।
इस प्रकार से कपिला सेठ सुदर्शन के प्रति वासना भाव छोड़ देती है।
सेठ सुदर्शन और गुणवान राजा एक दिन बगीचे में मेरे कर रहे थे। तबसे राजा गजवान की पत्नि सेठ सुदर्शन पर मोहित हो जाती है।
रानी
अरे वाह। क्या सौंदर्य है इसके सामने तो कामदेव भी कुछ नहीं। वाह-वाह बहुत खूब।
पत्नी है रानी मैंने लोगों को सुना था की ये नपुंसक
है।
रानी अरे ये क्या कह रही हो। ये सब झूठ है तुम्हें
शायद पता नहीं इनकी गिनती विशिष्ट शूरवीरों
तथा मूल रत्नों में होती है। तुम ये कैसे सोच
सकती हो। की ये नपुंसक है और ये तो मैं
बमान ही नहीं सकती।
कपिला रानी आपके जैसे ही मेरे मन में भी एक विषय
वासना जागी थी एवं इनको मैंने अपने घर में
बुलाया। और इन्होंने स्वयं ये बात मुझसे
आकार कही। की ये नपुंसक है।
रानी हे विलपिन दासी शायद तुम्हें पता नहीं की
ये इतने धार्मिक है कि इन्होंने अपने शील
की रक्षा के लिए ऐसा किया होगा (इन्होंने
अपने को बचाने के लिए तुमसे झूठ बोला
होगा)।
कपिला (गुस्से में) हे रानी आप अगर इस नगर की
रानी हो तो आप इस सेठ के साथ
अपनी विषय वासना पूर्ण करके बताओ।
तब ही मैं मानूंगी की आप इस नगर की
सच्ची रानी हो।
इस प्रकार कपिला के कटुक वचन रानी को
चुभ जाते है और वह अपने वासना को
पूरी करने का प्रण लेती है।
रानी सेठ सुदर्शन घर अष्ट्मी-चौदस की शाम
में आकर ध्यान करते थे। तभी रानी को
पता चलते है वह सिपाहियों को बुलाती है।
सिपाही सिपाहियों जाओ और सेठ सुदर्शन को ढूंढो
और वह जहां भी हो उसे हमारे पास लेकर
आओ। सिपा।
सिपाही जो आज्ञा महारानी जी।
सिपाही सेठ को ध्यान अवस्था में ही लेकर
महल पहुंचते है।
रानी हे सुदर्शन तुम नहीं जानते में तुम्हें अपना
पति मानती हूं। सच्चा सुख तो देने को भी
नहीं मिला जो तुम्हारे पुण्य प्रताप से तुम्हें
मिल रहा है। इस समय का लुफ्त उठाओ
सेठ।
रानी कांच कर अपना सौंदर्य दिखाती है।
इस प्रकार अनेकों प्रयास के बाद भी
सेठ सुदर्शन अपने ध्यान से नहीं डिगे फिर
फिर सुबह होते ही जब वह अपनी आंख
खोलते है तो बोलते है।
सेठ क्षमा करे महारानी मैं यहां कैसे आया।
रानी मैं तुम पर मोहित हो गई हूँ मैं चाहती
हूँ की तुम मेरी काम वासना को पूर्ण
करो। हे सुदर्शन मान जाओ नहीं तो मैं
अपने प्राण त्याग दूंगी। मुझे जीवनदान दो।
सेठ मैं ऐसा नहीं कर सकता ये आप क्या कह रही
हो। ये संसार आसार है यह एक वासना
खत्म नहीं होती की दूसरी शुरू हो जाती है।
यह मैं मिलकर में सबसे पहले दिक्षा धारण
करूंगा।
रानी (गुस्से में) दीक्षा तो तब लेकेंगे लोगे ना जब
यहां से जिन्दा बचकर जा पाओगे। अब मैं
तुम्हें बताती हूँ बचाओ - बचाओ
(रानी अपने कपड़े फाड़ती है बारतून से
अपनी शरीर को नोंचती है तभी राजा और
सिपाहियों का प्रवेश होता है।)
राजा रानी आपकी यह दुर्दशा कैसे हुई।
रानी आप जिसे शीलवान समझते थे। उसने इस
राज्य की रानी पर हाथ डाला है। हे
हे राजा ये काम पीड़ा का प्यासा है। इसे
निकालो नहीं इसे कड़ी से कड़ी सजा
दो।
राजा तेरा ये दुस्साहस की तूने मेरी रानी पर हाथ
डाला तुझे ऐसा दण्ड मिलेगा की आज के
बाद कोई भी कभी में किसी पर इस प्रकार
का कुकृत्य नहीं करेगा।
डाल दो इसे काल कोठरी में।
दो दिन बाद इसे फांसी पर चढ़ा देना।
सेठ सुदर्शन को फांसी पर चढ़ाया जाता है देवों के द्वारा कोड़े
का फव्वारा फूलों का घर बन जाता है। फिर सेठ वहां से
निकलकर दीक्षा धारण करते है और मोक्ष को प्राप्त होते है।
नाटक-संवाद
सि. १ - कुरै पता है कि २ दिन पूरे हो चुके हैं।
सि. २ - अरे हाँ! चलो सेठ सुदर्शन को से वर्ष फाँसी देने ले चलें।
सि. १ - चलो सेठ जी। आपके फाँसी का वक्त हो गया है।
सेठ सु. - ठीक है चलो।
सि. २ - किसका इंतजार कर रहे हो, वक्त हो गया है फाँसी पर चढ़ा दो इनको।
देव - अरे ये मैं क्या देख रहा हूँ मध्यलोक में ऐसे महान् पुरुष को फांसी दी जा रही है। धर्म की रक्षा के लिए इनकी जरूरत है, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।
फाँसी के बाद
राजा - अरे ये कैक फाँसी का फंदा फूलों का हार कैसे बन गया। जरूर सेठ जी निर्दोष है और ये जैन धर्म का प्रताप है कि ऐसे महापुरुष की रक्षा से स्वयं ही हो जाती है। मुझे लगता है ठीक हुआ।
देव - जरूर से इन महापुरुष के का मोक्ष जाना निश्चित है तभी तो मेरी विद्या इनके काम आ सकी।
बोलो जैन धर्म की जम!
मूल दस्तावेज़ (PDF): 185.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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