जैन धर्म कथा
रंग धर्म का
वस्तु के स्वरूप को यथार्थ समझ कर निराकुल सहज जीवन ही धर्म है।
महाराज छत्रसाल भेष बदलकर रात्रि में घूम रहे थे। तभी उन्हें एक वृद्ध किसान दिखा। उसके शरीर में झुर्रियाँ पड़ गई थी, बाल पक गए थे; लेकिन चुस्ती युवाओं जैसी थी।
राजा उनके पास गए और पूछा - आपकी आयु कितनी होगी?
वृद्ध ने उत्तर दिया - कुल चार वर्ष की।
राजा ने कहा - आपकी आयु 80 वर्ष से कम नहीं होगी, फिर भी आप चार वर्ष बताकर क्या मेरे साथ मजाक कर रहे हैं?
वृद्ध ने उत्तर दिया - श्रीमान् जी! चार वर्ष से ही मैंने धर्म का स्वरूप समझा है और धर्म सहित जीवन ही सच्चा जीवन है। बाकी जीवन तो पशुवत् जीवन ही रहा है।
Selfie with धर्म
वस्तु के स्वरूप को यथार्थ समझा कर निराकुल सहज जीवन ही धर्म है।
एक बार दस साधुओं का संघ धर्म की खोज के लिए निकला। रास्ते में उन्हें एक नदी मिली। सभी ने तैरकर नदी पार की। यह देखने के लिए कि सभी सुरक्षित नदी-पार आ गए हैं, उनमें से एक साधु ने सभी साधुओं की गिनती की। गिनती करने पर एक साधु कम निकला, क्योंकि जो साधु गिन रहा था, वह स्वयं को ही गिनना भूल गया। अपने एक साथी को खोने के गम में सभी साधु दुखी हो गए।
तभी एक राहगीर वहाँ से निकला। साधुओं को दुखी देखकर उसने इसका कारण पूछा। कारण पता होने पर उसने कहा - आप दुखी मत होइए। एक बार मैं आप सभी की गिनती करता हूँ। अबकी बार गिनती में पूरे दस साधु निकले। यह देख सभी साधु आश्चर्यचकित रह गए कि ऐसा कैसे हुआ!
तब उस राहगीर ने समझाया कि आप सब धर्म की खोज में निकले हैं, लेकिन खुद को ही नहीं खोजा। आप सब शास्त्रों में पूजन-भक्ति, दान आदि में धर्म खोजते हैं, पर धर्म और आपकी सभी समस्याओं के समाधान तभी मिलेंगे, जब आप स्वयं को खोजेंगे और जानेंगे। स्वयं को खोजोगे तो धर्म को पाओगे।
रंग क्षमा धर्म का
क्रोध कषाय के अभाव पूर्वक शान्त परिणाम ही क्षमा धर्म है।
राजा की सवारी बड़ी धूमधाम से निकल रही थी, तभी एक पत्थर जोर से आकर राजा के माथे पर पड़ता है। राजा की चोट देखकर सभी सैनिक अपराधी को ढूँढने निकल पड़ते हैं और एक छोटे-से बच्चे को पकड़कर लाते हैं। राजा उस बच्चे से पत्थर मारने का कारण पूछते हैं।
बालक बड़ी ही मासूमियत से कहता है - "महाराज! मैंने तो फल खाने के लिए पेड़ पर पत्थर मारा था, पर निशाना चूक जाने से पत्थर आपको लग गया। बच्चे का जवाब सुनकर राजा खुश होकर उसे इनाम देते हैं। सभी सैनिक आश्चर्यचकित होते हैं कि बच्चे को सजा की बजाय इनाम क्यों दिया गया?
राजा कहता है, जब पेड़ इतने पत्थर खाकर भी फल दे सकता है, फिर मैं तो मनुष्य हूँ, क्या मैं अपना क्रोध भूलकर उसे क्षमा करके इनाम नहीं दे सकता।
Selfie with क्षमा धर्म
क्रोध कषाय के अभाव पूर्वक शान्त परिणाम ही क्षमा धर्म है।
एक बार स्वामी विवेकानन्द ट्रेन में सफर कर रहे थे। उन्हीं के साथ 2-3 अंग्रेज यात्री भी सफर कर रहे थे। अंग्रेजों ने जब एक हिंदुस्तानी और धोती पहने व्यक्ति को चुपचाप बैठे देखा तो उसे अनपढ़-गंवार समझकर उसका मजाक उड़ाने लगे। विवेकानन्दजी के बारे में उन्होंने बहुत ही अपशब्द कहे और बीच-बीच में गाली देने से भी नहीं चूके।
कुछ देर बाद जब स्टेशन आया तो विवेकानन्दजी ने स्टेशन-मास्टर को बुलाया और शुद्ध अंग्रेजी में पानी लाने का निवेदन किया।
विवेकानन्दजी को शुद्ध और स्पष्ट अंग्रेजी में बोलता देख अंग्रेज यात्री बहुत शर्मिंदा हुए और बोले - आप तो अंग्रेजी जानते हैं! हमारी बात सुनकर आपको बहुत क्रोध आया होगा, फिर आपने कुछ बोला क्यों नहीं?
विवेकानन्दजी ने मुस्कुराते हुए कहा - मेरी तो आप जैसे सज्जन व्यक्तियों से अक्सर मुलाकात हो जाती है, फिर बेकार में क्रोध करके मैं अपनी शक्ति क्यों व्यर्थ करूँ!
रंग मार्दव धर्म का
मान कषाय के अभाव में होने वाले कोमल परिणाम मार्दव धर्म है।
प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस बूढ़े हो गए थे। उनके शिष्य ने उनसे दीर्घ जीवन का राज पूछा। उन्होंने अपना मुँह खोलकर दिखाया और पूछा - क्या दिख रहा है ?
शिष्यों ने कहा - सिर्फ जीभ दिख रही है।
तब कन्फ्यूशियस ने कहा - यही दीर्घ जीवन का राज है। दाँत कठोर होते हैं, इसलिए जल्दी चले जाते हैं और जीभ कोमल तथा मुलायम होती है, इसलिए अंत तक टिकी रहती है।
अतः दीर्घ जीवन का राज स्वभाव में कोमलता और मृदुता ही है।
Selfie with मार्दव धर्म
मान कषाय के अभाव में होने वाले कोमल परिणाम मार्दव धर्म है।
गाँधीजी और संत विनोबा भावे एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। एक बार गाँधीजी ने उन्हें एक पत्र लिखा, जो उन्होंने पढ़ते ही फाड़कर फेंक दिया। जब आश्रम में रहने वालों ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा - ‘झूठ, बिलकुल झूठ लिखा था गाँधीजी ने’
एक सज्जन ने पूछा - पर आप तो कहते थे कि गाँधीजी कभी झूठ नहीं बोलते।’
विनोबा भावे जी कहते हैं कि गाँधीजी ने लिखा था कि मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हूँ! अरे भाई! दुनिया में मुझसे भी ज्यादा गुणी लोग हैं, फिर मैं कैसे सर्वश्रेष्ठ हो सकता हूँ!
वे सज्जन फिर कहते हैं, फिर भी आपको पत्र नहीं फाड़ना चाहिए था।
तब विनोबा भावे जी उत्तर देते हैं - मेरे पास पत्र रहता तो मेरे अंदर अहंकार पैदा हो सकता था और अहंकार मेरी प्रगति में बाधक बन जाता; इसलिये उस पत्र को फाड़ता नहीं तो और क्या करता।’
रंग आर्जव धर्म का
मायाचारी के अभाव में होने वाली सरलता आर्जव धर्म है।
एक किसान एक बेकर को एक सेर मक्खन दिया करता था। एक दिन बेकर ने यह परखने के लिए कि मक्खन एक सेर है कि नहीं, उसे दुबारा तौला और उसने पाया कि मक्खन एक सेर से कम था। उसे गुस्सा आया और वह किसान को अदालत ले गया।
जज ने किसान से पूछा कि उसने तौलने के लिए किस बाँट का इस्तेमाल किया था?
किसान बोला - हुजूर! मैं अनपढ़-गँवार हूँ। मेरे पास तौलने के लिए कोई बाँट नहीं है, पर तराजू है। मैं रोज सुबह बेकर के यहाँ से एक सेर ब्रेड खरीदता हूँ। उसी ब्रेड को बाँट बनाकर मक्खन तौलकर दे देता हूँ। अगर मक्खन एक सेर से कम है तो इसमें मेरा दोष नहीं है, अगर कोई दोषी है तो वह खुद बेकर ही है।
जिंदगी में हमें वही वापस मिलता है, जो हम दूसरों को देते हैं। चाहे वह विश्वसनीयता हो या विश्वासघात।
Selfie with आर्जव धर्म
मायाचारी के अभाव में होने वाली सरलता आर्जव धर्म है।
एक राजा के कोई बेटा नहीं था। जब वह बीमार होने लगा तो उसे अपने राज्य के उत्तराधिकारी की चिन्ता सताने लगी। एक दिन उसने राज्य के सभी युवकों को महल में इकट्ठा करवाया और उन सभी को एक-एक बीज देकर कहा कि वे सभी युवक उन बीजों को बोयें और ठीक एक साल बाद उस बीज से उगे पौधे को लेकर आयें। तब मैं अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करूँगा।
सभी युवक बीज लेकर घर आ गये और अपने-अपने बीजों को खाद-पानी देने लगे; लेकिन तीन हफ्ते बीतने के बाद भी जहाँ दूसरे युवकों के गमलों में पौधे बढ़ रहे थे, वहीं एक युवक के बीज में अंकुर भी नहीं फूटा था। इसी तरह पूरा साल बीत गया और वह दिन भी आ गया, जब सबको राजा के सामने उपस्थित होना था।
सभी युवकों के गमलों में रंग-बिरंगे फूल लहलहा रहे थे; लेकिन उस एक युवक का गमला अब भी खाली था। उसे लगा कि उसने राजा का दिया बीज बर्बाद कर दिया और अब राजा उसे सजा देगा। लेकिन तभी राजा उसी युवक को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देता है और बताता है कि साल भर पहले उसने सभी को उबले हुए बीज दिये थे, जिनका अंकुरण असंभव था। ये आपकी ईमानदारी की परीक्षा थी और जिन्होंने धोखेबाजी और छल किया है, वे सभी इस परीक्षा में असफल हो गये।
ईमानदारी से धोखेबाजी भी मात खा जाती है।
रंग शौच धर्म का
लोभ कषाय के अभाव से होने वाली निर्मलता शौच धर्म है।
एक फकीर को कहीं से सोने का सिक्का मिला। उसने सोचा कि मुझे जो सबसे गरीब व्यक्ति मिलेगा, उसे मैं यह सिक्का दे दूँगा। एक दिन उसने देखा कि एक राजा दूसरे राज्य पर कब्जा करने के लिए युद्ध पर जा रहा है। यह देख उसने वह सिक्का जाकर राजा को दे दिया और कहा - मैं यह सिक्का सबसे गरीब व्यक्ति को देना चाहता था, इसलिए आपको दे दिया।
राजा ने गुस्से में कहा - क्या मैं तुम्हें गरीब दिख रहा हूँ।
फकीर ने उत्तर दिया - यदि गरीब न होते तो दूसरों की सम्पत्ति क्यों हड़पते।
गरीब वही है, जिसके मन में ज्यादा पाने की लालसा और लोभ है।
Selfie with शौच धर्म
लोभ कषाय के अभाव से होने वाली निर्मलता शौच धर्म है।
एक लोभी व्यक्ति अपने जीवन से बड़ा ही दुखी था; क्योंकि उसे हर चीज पाने की लालसा लगी ही रहती थी।
एक बार उसने एक साधु को देखा जो बड़े ही सुखी दिखाई दे रहे थे। वह व्यक्ति उन साधु के पास गया और पूछा - आपके पास ऐसा क्या है, जो आप इतने सुखी हैं।
साधु ने कहा - अरे भाई! मैं तो एक साधारण-सा साधु हूँ, मेरे पास क्या होगा!
पर वह व्यक्ति उसके पीछे ही पड़ गया कि आपके पास जो है, वह मुझे भी दे दो; ताकि मैं भी सुखी हो सकूँ।
आखिर उससे परेशान होकर साधु ने कहा - जाओ, उस नदी के पास, तुम्हें वहाँ पारसमणि मिलेगा। वह ले लो और मेरा पीछा छोड़ो।’
व्यक्ति दौड़कर नदी की ओर जाता है और पारस-मणि को उठा लेता है; फिर कुछ पल रुक कर पारसमणि को वहीं फेंककर फिर साधु के पास आता है और कहता है - आप आप पारस-मणि के कारण सुखी होते तो वह वहाँ नहीं पड़ा होता, मुझे तो वही चाहिए, जो आपके पास है।
साधु ने कहा - मेरे पास तो संतोष धन है और इसलिये मैं सुखी हूँ।
रंग सत्य धर्म का
जिसका जैसा स्वरूप है, उसकी समझ व वैसी ही वाणी सत्य धर्म है।
राजा ने अपने दरबारियों से पूछा - पता करके बताओ कि दुनिया में सबसे मीठी चीज और सबसे कड़वी चीज कौन-सी है?
सभी दरबारियों ने अलग-अलग चीजों के नाम बताए। जैसे - सबसे मीठा गुण, शक्कर, गन्ना आदि और सबसे कड़वी - नीम, करेला, विष आदि। परन्तु राजा किसी भी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ।
तभी एक विद्वान दरबारी ने उत्तर दिया - महाराज! दुनिया में सबसे मीठी चीज है ‘वाणी’ और सबसे कड़वी चीज भी है ‘वाणी’।
Selfie with सत्यधर्म
जिसका जैसा स्वरूप है, उसकी समझ व वैसी ही वाणी सत्य धर्म है।
एक बादशाह ने सपने में एक ऐसा पेड़ देखा, जिसके सारे पत्ते झड़ चुके थे। सिर्फ एक ही पत्ती बची थी।
बादशाह ने सुबह उठते ही राज-ज्योतिष को बुलाकर अपने सपने का अर्थ पूछा तो ज्योतिषी बोला कि महाराज! इस सपने का अर्थ यह है कि आपके सामने ही आपके परिवार के सभी सदस्य मर जाएँगे, सिर्फ आप बचेंगे।
यह सुनते ही राजा क्रोधित हो गया और ज्योतिषी के लिए फाँसी की सजा सुना दी।
फिर बादशाह ने दूसरे ज्योतिषी से अपने सपने का अर्थ पूछा तो उसने जवाब दिया - महाराज! इस सपने का अर्थ है कि आपके परिवार में सबसे ज्यादा उम्र आपको मिली है और आप अपने परिवार में सबसे ज्यादा जीवित रहेंगे।
यह सुन बादशाह खुश हुए और उसे इनाम देना चाहा तो ज्योतिषी बोला - महाराज! आप इनाम के बदले राज-ज्योतिषी की सजा माफ कर दीजिए; क्योंकि वह निर्दोष है। हम दोनों ने ही आपके सपने का एक ही अर्थ बताया है। बस, शब्दों का हेर-फेर है।
सत्य को कहने का तरीका सत्य को महत्त्वपूर्ण बना देता है।
रंग संयम धर्म का
पाँच इन्द्रिय व मन के विषयों से विरक्त अपने में रत परिणाम संयम धर्म है।
एक बड़ा ही शरारती बच्चा था। उसे दिन-भर खेलना, टीवी देखना और बढ़िया खाना-पीना ही पसंद था। उसकी माँ उसे बहुत समझाती, पर वह कभी न सुनता।
एक बार उनके घर के सामने से एक पुलिस अधिकारी एक कैदी को लेकर निकला। दोनों के साथ 5-5 सैनिक चल रहे थे, लेकिन जहाँ पुलिस अधिकारी के पाँचों सैनिक उसके पीछे चल रहे थे और उसके सभी आदेशों का पालन कर रहे थे, वहीं कैदी को उन पाँचों सैनिकों के पीछे चलना पड़ रहा था और उनके आदेशों का पालन करना पड़ रहा था।
माँ ने बेटे को यह सब दिखाकर पूछा - बताओ, तुम इन दोनों में से क्या बनना चाहते हो। पुलिस अधिकारी या कैदी।
बेटे ने कहा - बेशक, मैं पुलिस अधिकारी जैसा बनना चाहूँगा।
तब माँ ने उसे समझाते हुए कहा - फिर तो तुम्हें अपने मन और इन्द्रियों पर कंट्रोल करना पड़ेगा, तभी तो ये तुम्हारी बात मानेंगे, तुम्हारे पीछे चलेंगे और यदि तुमने इन्हें कंट्रोल करना नहीं सीखा तो तुम्हें इनकी बात माननी पड़ेगी, इनके पीछे दौड़ना पड़ेगा और तब तुम अपने मन और इन्द्रियों के कैदी मात्र बनकर रह जाओगे।
Selfie with संयम धर्म
पाँच इन्द्रिय व मन के विषयों से विरक्त अपने में रत परिणाम संयम धर्म है।
शिष्यों ने गुरु से पूछा - हम अपने जीवन को सर्वश्रेष्ठ कैसे बना सकते हैं।
गुरु ने उत्तर दिया - यदि मैं तुम लोगों को एक घोड़ा दूँ, जो बड़ा ही चंचल हो तो कैसे उसकी सवारी करोगे?
शिष्यों ने उत्तर दिया - हम उस घोड़े पर लगाम लगा कर उसकी सवारी करेंगे।
गुरु ने कहा - बस, उसी तरह अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर भी संयम की लगाम लगाओ और फिर अपने जीवन की सवारी करो। तुम कभी नीचे नहीं गिरोगे।
रंग तप धर्म का
इच्छाओं के निरोध पूर्वक अपने स्वभाव में उग्रता से लीन होना ही सच्चा तप है।
अकबर ने बीरबल से कहा - तुम्हें कोयले को सफेद करके दिखाना है।
सभी ने सोचा, बीरबल साबुन या सफेद रंग से कोयले को सफेद करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ न करके बीरबल ने कोयले को सबके सामने रखा और उसमें आग लगा दी। कोयला अंगारा बना और अंगारा जब बुझा तो वहाँ बची थी सिर्फ राख, जो कि सफेद थी।
बीरबल ने कहा - यदि इंसान को उज्ज्वल और सफेद बनना है तो कोई साबुन, क्रीम या रंग काम नहीं आएगा। इंसान में जो बुराइयाँ रूपी कालिक है, उसे सिर्फ तप और पुरुषार्थ से ही शुद्ध सफेद और उज्ज्वल कर सकते हैं।
Selfie with तप धर्म
इच्छाओं के निरोध पूर्वक अपने स्वभाव में उग्रता से लीन होना ही सच्चा तप है।
एक बार एक महिला घड़े को अपने सिर पर रखकर जा रही थी।
यह देख नीचे पड़ी मिट्टी को उससे ईर्ष्या हुई और वह मिट्टी उस घड़े से बोलती है कि जब हम दोनों एक ही वंश के हैं और तुम मेरे ही अंश से बनी हो तो यह पक्षपात क्यों? कि मैं तो ज़मीन पर पड़ी हूँ और तुम मनुष्य के सिर पर हो।
यह सुन घड़ा बोलता है; क्योंकि मैंने तप के रास्ते को चुना है। आग ने मुझे तपाया और बहुत-से कष्ट मुझे उठाने पड़े, पर उन सभी परेशानियों को मैंने सहजता से सहन किया। तब जाकर मैं पाँव में पड़ी मिट्टी से मनुष्य की शिरोधार्य हो पाई।
जीवन के कष्टों की धूप में सहजता से तपने पर ही जीवन में ऊँचा उठा जा सकता है।
रंग त्याग धर्म का
मोह-राग-द्वेष के त्याग पूर्वक अपनी वस्तु दूसरे के उपकार के लिए देना निश्चय-व्यवहार त्याग धर्म है।
एक बार नदी और तालाब में बहस हुई।
तालाब ने कहा - तुम अपना पूरा पानी समुद्र में डाल देती हो, ऐसे तुम एक दिन खाली हो जाओगी।
नदी ने कहा - मैं अपना देना नहीं छोड़ सकती, अगर मैं बहना छोड़ दूँ और अपना जल समुद्र में न डालूँ तो मेरा होना ही व्यर्थ है।
गर्मियाँ आईं और तालाब सूख गया, नदी की धारा पतली ज़रूर हुई, पर वह सूखी नहीं।
जो देता है, वही भरता है; जो मात्र ग्रहण करता है, उसका ग्रहण उसे ही ग्रसित कर लेता है।
सफेद त्याग धर्म का
मोह-राग-द्वेष के त्याग पूर्वक अपनी वस्तु दूसरे के उपकार के लिए देना निश्चय-व्यवहार त्याग धर्म है।
एक बार एक बहुत गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी से परेशान होकर ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। वहीं पास से एक राजा गुज़र रहा था। उसने उससे उसके रोने का कारण पूछा तो पता चला कि वह अपनी गरीबी से परेशान है।
राजा ने उससे कहा - तुम्हें जो चाहिए, मुझसे माँग लो। रुपया-पैसा, घर, कपड़े, धन-दौलत… जो-जो चाहिए, सो कह दो। गरीब ने कुछ देर सोचा और कहा कि मुझे जो-जो चाहिए, वह मैं कल आपके दरबार में आकर माँग लूँगा।
अगली सुबह जब वह महल पहुँचा तो राजा ने पूछा - तो तुमने सोच लिया कि तुम्हें क्या-क्या चाहिए?
गरीब बोलता है - मुझे कुछ नहीं चाहिए, महाराज!’
पूरा दरबार आश्चर्यचकित था कि आखिर यह मना क्यों कर रहा है।
गरीब कहता है कि मैं पूरी रात सोचता रहा कि मैं आपसे क्या-क्या माँगूँगा; फिर उस पैसे की सहायता से कैसे मैं अपनी संपत्ति को बढ़ाऊँगा और बस, इसी उधेड़बुन में पूरी रात निकल गई।
अब मैं सोचता हूँ कि जब कुछ नहीं मिला, तब मैं सो न सका। यदि मिल गया, तब मेरा क्या होगा? जोड़ने में नहीं, सुख तो छोड़ने में ही है।
रंग अकिंचन्य धर्म का
अपनी चैतन्य स्वरूप आत्मा के अतिरिक्त अन्य किंचित् भी मेरा नहीं है - ऐसा निश्चय पूर्वक भाव ही आकिंचन्य है।
एक संत ने सभा में उपस्थित सभी भक्तों से कहा - मैं आप सभी का लौकिक भविष्य बता सकता हूँ।
सभी ने उत्सुकता से कहा - हाँ-हाँ बताइये।
महाराज ने कहा - सभी का अलग-अलग बताना संभव नहीं है; अतः सबका एक साथ ही बता देता हूँ। सुनो - जिसने भी, जितना भी और जो कुछ भी जोड़ रखा है, जमा कर रखा है, वह सब एक दिन छोड़कर जाना पड़ेगा - यही सभी का भविष्य है।
Selfie with अकिंचन्य धर्म
अपनी चैतन्य स्वरूप आत्मा के अतिरिक्त अन्य किंचित् भी मेरा नहीं है - ऐसा निश्चय पूर्वक भाव ही आकिंचन्य है।
एक बार एक आदमी एक संत के पास गया और कहा कि महाराज! कोई अच्छा-सा आशीर्वाद दे दीजिए। महाराज ने आशीर्वाद देते हुए कहा - मनुष्य बनो।
आदमी चकित होकर कहता है कि महाराज! ये कैसा आशीर्वाद है! मैं तो पहले से ही मनुष्य हूँ, फिर कैसे मनुष्य बनूँ?
महाराज ने कहा - जैसे एक चींटी के अंदर सामग्री इकट्ठा करने की आदत होती है, वैसे ही तेरे अंदर भी बस ज्यादा-से-ज्यादा इकट्ठा करने की आदत है। चींटी तो फिर भी अपनी जरूरत जितना ही इकट्ठा करती है, पर तुम तो आवश्यकता से अधिक इकट्ठा करने में ही अपना पूरा जीवन बेकार कर देते हो, फिर मैं कैसे तुम्हें मनुष्य कहूँ। इसलिये पहले मनुष्य बनो, फिर कोई और आशीर्वाद दूँगा।
Selfie with ब्रह्मचर्य धर्म का
निश्चय से ब्रह्म अर्थात् अपनी शुद्ध आत्मा में लीनता और व्यवहार से अब्रह्म अर्थात् काम-सेवन का त्याग ब्रह्मचर्य धर्म है।
नेपोलियन जब युवा थे, उन्हें एक नाई के यहाँ रहना पड़ा। वे नाई के छोटे-मोटे काम में हाथ बँटाते थे और बाकी समय में अपनी पढ़ाई करते थे। नेपोलियन एक सुंदर जवान थे, जिससे नाई की पत्नी उस पर मोहित हो गई। वह हर तरह से कोशिश करती कि नेपोलियन उसकी ओर आकर्षित हो जाये, पर नेपोलियन ने कभी उन पर ध्यान नहीं दिया।
और दिन बीते। सालों बाद नेपोलियन फ्रांस देश के प्रधान-सेनापति बन गये।
एक बार उन्हें उसी गाँव जाना पड़ा, जहाँ वह नाई रहता था। वे उस नाई से मिलने भी गये। वहाँ नाई की पत्नी बैठी थी। नेपोलियन ने उससे पूछा - आपके यहाँ कुछ साल पहले एक नेपोलियन नाम का लड़का रहता था न!
नाई की पत्नी को उसका नाम सुनते ही गुस्सा आ गया। वह बोली - आपने भी किस नीरस आदमी का नाम ले लिया। वह पागल तो प्रेम के दो शब्द बोलना भी नहीं जानता था। वह तो हमेशा किताबों में ही डूबा रहता था।
यह सुन नेपोलियन को हँसी आ गयी। वह बोला - आप बिलकुल ठीक कहती हैं, बहन! इन सब में क्या रखा है? यदि नेपोलियन उस समय तुम्हारे मोह में फँस जाता तो कभी देश का प्रधानमंत्री बनकर तुम्हारे सामने खड़ा न रह सकता था।
रंग ब्रह्मचर्य धर्म का
निश्चय से ब्रह्म अर्थात् अपनी शुद्ध आत्मा में लीनता और व्यवहार से अब्रह्म अर्थात् काम-सेवन का त्याग ब्रह्मचर्य धर्म है।
स्वामी विवेकानन्द शिकागो धर्म सम्मेलन में अमेरिका गए थे, जहाँ उन्हें वहाँ के प्रसिद्ध डॉक्टरों के बीच भाषण देना था। भाषण से पहले एक डॉक्टर ने उनसे कहा कि स्वामीजी! आपके भारत में ब्रह्मचर्य की बड़ी महिमा है, लेकिन जब आप हमें ब्रह्मचर्य का जादू दिखाएँगे, तभी हम ब्रह्मचर्य की शक्ति को स्वीकारेंगे, अन्यथा नहीं। स्वामीजी उस समय चुप रहे।
भाषण शुरू होने पर स्वामीजी ने बोलना शुरू किया और कहा – Doctors of America are all donkeys. (अमेरिका के सभी डॉक्टर गधे हैं।)
यह सुनकर पूरी सभा में सन्नाटा छा गया, पर स्वामीजी ने अपना भाषण देना जारी रखा। भाषण खत्म होने पर उनकी बहुत तारीफ हुई। लेकिन उस डॉक्टर ने आकर कहा - स्वामीजी आपने ब्रह्मचर्य का चमत्कार तो दिखाया ही नहीं।
स्वामीजी ने मुस्कुराकर कहा – मैंने आप सभी डॉक्टरों को गधा कहा, पर आप सब कुछ ना कर पाए। आप सब चाहते तो मुझे स्टेज से नीचे उतार सकते थे। मैं अकेला था और आप सैकड़ों थे, फिर भी एक शब्द न बोल सके। क्या यह ब्रह्मचर्य का चमत्कार नहीं है।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1812.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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