जैन धर्म का विशिष्ट स्वरूप
वाती थी बहुत परेशान
न्धी थी। हमें भी माफ कर दो।
-बई मुझे भी माँ माफ कर दो।
मैंने भी बहुत तंग किया तुमको।
ऊन कर फनी गौच
नित्व देवकर्शन करणा
नेसचे जैन के कवग है।
हाँ पस्या में भी बैंकों गाँधी को केसले जैनी के
मेरेनियों को पाचन करना अनिवार्य
है।
[कये
कर रहे है
nor ી આવી મેં વ્
सेविका है]
③
तुमने जरा भी
भोगी
भऔर हम सब भी बन निव
4 का वाचन करके सारचे जैनरी के
नाने को जला करके २०
जीन को पा कसे वा
वाचे धर्म की सच्चे शुरू की
वादी क्या हुआ वेलच्या हुआ?
*** આજ પણ
(પાક જો કે પાr soft-2)
+
(मगर) ठीक चली थी।
उसे कितना भय-दु दिवख।
हो मंड करने वाली। मगर आपको वेब शास्त की वृम करें।
श्री गती या बनना ही अफवेमेली नारी भावना है।
से मैं किन नियनों का पालन करखी और भक्त हो रही
आप भी उन मियों का पालन
देखें।
ॐ हुम मनुपचाप में बहुत ही
पाई में जाते हैं। और न्यारें तो
नि पुष्य का उदय प। के हमें
क पर्याय उच्चऊन व मपन
धर्म में कम मिया। और हर
आधी बात नहीं है।
बई रही बात है (मारका अब
हमें माफ कर के।
हरीः (तथा)
भांडी सेका मनवर ये
है कि आप लोग भी
- होमियों का पता
- तो कोई बात नहीं है।
NTS
A
कागवेलत्री से
देवी वह जा
दिन में भोजन कान के पांनी
जय जवान जायेंगा।"
वेत. यही पानी नहीं में में भोजन की तने दिनो
पाँच ने तो मम जाने पैसा है। पी कर जनी।
है कि भाप भोन क्सानीमा
धर्म को स्वीधरना चाहते है।
पहचान चाहने सभा की लाड
भऔर माप सभी भी
के धर्म को समझे
अवधिलेन्द्र
तुम कि
वैसे भी में slast (গনিত)
चाना नही है, और उस भोजर
नुको करना हो तो करो।
[ में मंकित जैन इसा कर नहीं दाह ये भोजन नहीं
कोने। स्पेड नेसा भोस करने
08815429143
- of top of જેવા ની જેવી
पर आने ? भाद भी नही
हपरे बहुत पुनले आहे त्य
अथ ब्था करें ?
बेलेंगे और
के को में भरकर नागे
करती है इतने में सर
मरीज की बाध भी है।
फोजें।
मामी १५ हाँ गांधी कत्येक कह
रहे है। में भी डॉक्टर के
व में हथकी भोभन भने के भ
समहू में माह कर को हमने
कितना सब कुरु तुझे बहुत
हरे पाने की करना चाहिए।
के हमारा भोजन पच नहीं सकता
भी नहीं करने दिया। हमें क
करो
और हमें पेर दर्द जैसी कई बीमारियों
तो गरम क्या उसे मेरी में देनी हनने में कहीं बहूमती
नकी दौडी में कर देती हैं 'सम
सच्चा जैन कौन ?.
कञ्च यो के ये बा
लघु गरि
[डित जैन
[पाल दृश्य
[ रखने में मा
(फेरी) है
लियों की सोई घर में अकर
[का परिचय]
छोरी जी माँ जी भी भाई।
तिथी कोरे में बीउ पर वैदी
की काप दोन धर्म में पैन दुरी सांस पोती है।
नहीं ना ?
তুললো টাগ কর २।
छ लेकर की है, और बड़े मेोनों देरी कुछ नही कैदी चेरे हाथ से
बहु हसाथ बोधी है, जो से कण
अन्य लीजिए भोधी चाम
कहाँ चवी
पविरमा रही है
कही है क्या में उसे छोपे
(ट) ?
दूध गिर गया।
लेगी।
अब च्या करें।
दूध गिरना है।
बेरा
क्या हुआ
जरही है। और मंदिर जाने को
से जाओ पन्तु तामय जये।
चाबेर।
दृष्य
केको कोष (उसका रही थी।
है सियाले में हमारा विभाग
मकर दिया, दिन भर पूषन भर्दैन
आदि में तो लग मा चुकी है इन
SHO FION REDMI NOTES PRO
HIDUAL CAMER बोझ बनी है।
करी देवर से की तो Life (Forest)
करेंच्या करें, अने कर भर और दूध शिक्ष
कोरी जी अभी थे भाती है। [ चवी जाती है
तो सिर्फ चाय ही ने कहीं
मकल से है
コ
केन्या दुपारे साथ मारता भी द्वारा दृश्य]
बाते हैं। तुमरे पर आने ने हुछ
सिएसन नहीं स्था?
काही
क्यो वाली से।
(दूसरी व खोई में छप कर रही है, पर बेरा भाना
काम को दिपेकर आता है) को भी मुझे मूत्र बनी है।
किया ही कथा है उकारे मारे विहा
एक तो दहेज भी इतना कम लाई हो
और ऊपर से पूजन प्रत भारत
सबने तो मेरी जान निकाल दी
मेरा तो सिर फटा जा रहा है
मेरे मेरा Red क्या करेगा
२०- भवे वर्ष में कुछ नहीं मान
६- क हट, तू तो कपने भाषा पर गया है. वेचन ही खायेगा।
दोको पालो उन्को कुछ विषानी है। (दोनों चले जाते है।
(तीसरा हस्थ)
वहीं कुछ खोई में चम कर रही है। (छत्री पर मानी है, तथ
वर्ग वह बोलती है।
चलो इंसिर दो मेरा ? ही में भाई दूध
(गुस्से से
बेरी- जी दाही. क्रिय में भी रख दिया
ol
तीर्थधाम मङ्गलायतन
धार्मिक पहेलियाँ
१. आतम प्याना-आतम ध्याना,
आतम में रम जाना आतम भ्यानो।
अष्ट कर्म की धनी पड़ा हो, रहता है मस्तना
- स्वभाव समाधि
२. तीन अधर का मेरा नाम अन्त करे तो मैं ही दूँ हूँ।
मुझमे लोकालोक झलकते में हूँ अनन्त सुखों का धान।। - सर्वज्ञ
३. एक अधर का मेरा नाम मैं हूँ पञ्च प्रभु का धाम।
सब जर्न करते मेरा ध्यान पूरे जिनागम का है सार।।
४. दो अधर का मेरा नाम हता हूँ मैं हूँ के धाम।
काम-धाम में हूँ पेकाम सिद्ध शिला है मेरा धाम।।
५. एक मनुष्य ऐसा देखा जाता है अजूबा है।
लाखों वर्षों तक जीता है अमृत की पीता है।। - अरहन्त
६. तीन अधर का मेरा नाम मुझको क्या दुनिया से काम।
ज्ञान-ध्यान बस व्यापार मुक्ति पाने को नेदार।
दिखने में लगता कंगाल फिर भी मैं हूँ मालामाल।। - मुनिराज
७. चार अधर का मेरा नाम पानी नहीं पर गंगा नाम।
हर कण में चेतन का नाम जीव नहीं पर जड़ का काम।
जो भी मेरा आश्रय लेता वह मन जाता है गवान।। - जैनवाणी
८. दो अधर क्य मेरा नाम बिना कमाये ही आप।
नाम अमाः है दूजा मेग अमृत पीने का है।
फिर भी मैं मर जाता एक दिन, इससे मैं होता हैरन।। - देव
९. चार अधर का मेरा नाम चेतन से मुझको क्या कामः
मुझने भ्रषित हुआ है उम, सारे जग में मेरा धाग।। - पुदगल
१०. दो अधर का मेरा नाम दो द्रव्यों के आता काम।
पलती दुनिया अपनी गति से फिर भी आता है गेय नाम।। - धर्म,व्य
११. तीन अधर का मेरा नाम पूरे लोक में मेरा धाम।
सारी दुनिया बलकर रुकती दुनिया कहती मेय काम ।। - अधर्मद्रव्य
१२. तीन अधर का मेरा नाम, मात्र हूँ रहने के काम।
मुझसे रहा न जग में कोई नाम बताओ मेरा कोई।" - आकाशद्रव्य
१३. दो अक्षर हा मेरा नाम, स्थिर रहकर भी चलता हूं।
आता तर द्रव्यों के काम, बोलो जल्दी मेरा नाम ।। - कालद्रव्य
१४. अधर का मेरा नाभ, पाँच भाइयों का है धाम।
मुझको जो अपनाता है, वह नरकों में जाता है।। - पाप
१५. तीन अधर का मेरा नाम पायें भति में मेरा धाम।
उलटी श्ररः मेरा काम मुझसे सारा जग हैरान ।। - मिध्यात्व
१६. जो जीवों भो दुःख देता है यह मुझको धारण करता है।
एम-द्वेष है मेरे भाई मुझसे यह दुनिया भरमाई ।। - हिंसा
१७. सत्य रूप से मे विपरीत अज्ञानी में मेरी गीत।
मेले सातारकों बीन मुझमें है पात्रो की कोगे ।। - एउ
१८. सब लोगों का माल हड़पता सदको पहुंचाता ने जेल ।
सबकी ब०सभी करवाता मतलाओ यह कैसा खेल ।। - चांय
१९. मुझे ८ई। उपया-पैसा बोलो मे रूप है फैला।
तृष्ण देवो मेरी माता तीन लोक की सम्पत्ति खाता ।। - परिग्रह
२०. पांय अधर का मेरा नाम शुद्धात्म का मुझमें भाम।
कुन्दकुन्द या मुझमें नाम पोलो बच्यो मेरा नाम ।। - समयसार
२१. भार अक्षा की मेरा नाम छह खण्डों में मेरा धाम।
पूर्वार्ध में छाए रह जाता मुझको गातें दौलतराम । - उदयाला
२२.गे सभ हो कर फ़र दुःख देती सरकी भुख शान्ति हर लेती।
मैं हूँ अकुलता की माता, भेरा नभ किरो है आता ॥ - अज्ञान
२३. जिसके सिर पर मैं हूँ. आता उसके होठ, भुजा फड़काण।
जो मुझभ अन्दा हो जाता छोटा-बड़ा न उसे सुद्धाता ।। - क्रोध
२४. मेरा मस्तक समसे अंबा बोलो बच्यो मेरा नाम।
में यमण को नरक ले गया सब लोगों में मेरा बाम।। - मान
२५. मुख बनती गुप्त है मेरी मनमोहक है मूरत मेरी।
मै छारे जभ की उगती हूँ दो अधर से वरा करती हूँ।। - माया
२६. एड अधर का मेरा नाम समको मुक्तिमार्ग बताती।
कितना घुगर मेए काम - दिव्यध्वनि
प्रस्तुति: पण्डित अशोक लुहाडिया, तीर्थधाम मङ्गलायतन
भक्तो का वह अमरदीप है साथ प्रवचनों का अनमोल ।
करें प्रकाशक मोक्ष मार्ग को साष्टी पदेश का क्या है तौष ।।
→ भस्तामर, प्रवचनसार, मोसमार्ग प्रकार
इस्रोपदेश
छहढाला
छहढाला
छन्दपूर्ति राइज्ड
3/2 3/2
- अति पुण्य उदय मम आया
- पावन मेरे नयन भये तुम दरशते
- इस अर्घ्य का क्या मूल्य है
शुचि निर्मल नीर गंध सु अक्षत
शास्त्रोक्त विधि पूजा महोत्सव - आत्तम को हित है सुख सो सुख
वसु द्रव्य सँवारी तुम हिंग धारी - जीन भुवन में शार
- मंगल भगवान् वीरो
- मंगलमर मंगलकरण
- प्रभु पतित पावन मैं अपावन
यैः शान्तराग रुचिभिः
यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु - कार्तिक फाल्गुन साद चौ
- उत्कन-तल पुष्णकै
जल प्तल आठी शुचि बार - मैं कौन हूँ आया कहाँ से
- तास भ्रमण की है बहु कथा
- अर्हन्तो भगवन्त इन्द्र महिता
- राजा राणा छत्रपति
- ऋषभ अजित संभव अभिशु
- सम्यक दर्शत ज्ञान
- देत पूजा गुरुपास्ति
- सत्य प्रीति अस्व्था
- संयम से। डग्यौ जहाँ
- नमः श्री वर्धमानाय
- पुद्गल नभ दहशवम कलि
- कोटि जन्म तपतयें
- धन समाज गज बाज
- पुण्य पाप फुल माहि
- धर उर समताभावे
- बारह व्रत के अतीचार
- इन चिन्तृत सम सुख जागे
- जो भार मोह तै न्यारे
- सम्यक प्रकार निरोधमन कच काय
- समता सम्हारे युति उचारि
नारि मित्र महल मसान कचन - जीव अजीव तत्वमरु भास्तव
- परद्रव्यन्तै भिन्न आपमें
- बालपने में ज्ञानन सहयो
- कभी अकामनिर्जरा करे
- तीन लोक को नाज जु खाप
- तास भ्रमण की है बह कथा
- निजकाल पाय निधि झसा
- पिता भूप वा मातुल नृप जो
- कुगुरु कुदेत-कुवृष सेवक की
- प्रथम तरकारित
दोषरहित युनसहित सुधी जी
र. रनि
साम्यकद्रष्टी भी
धर्मभाव
गुप्ति
रागदेबाल
यवहार स
निश्चय स
मा
मद
छहअ
महिमा सन्दर
अनु
REDMI NOTE 5 PRO
CAMERA
Ravindra Jain
पर्यूषण पर्व प्रतियोगिता खजाना
अन्तर्रात्मा
सभी प्रश्नों के उत्तर ‘अ, आ’ से दें
प्र.1. इस युग के धर्म के प्रथम प्रचारक कौन थे ?
प्र.2. प्रथमानुयोग का एक महाग्रंथ ?
प्र.3. किंचित मात्र भी परिग्रह संग्रह न करना ?
प्र.4. जिन्होने चार घातिया कर्म नष्ट कर दिये वह ?
प्र.5. जो संघ के नायक होते हैं?
प्र.6. बारह तपों में एक तप ?
प्र.8. जो जीव कभी मोक्ष नहीं पा सकता ?
प्र.9. पाँचों पाजों का एक देश त्याग करना ?
प्र.10. दूसरों की वस्तु बिना आज्ञा के ग्रहण नहीं
करना ?
प्र.11. भूतकाल के तेईसवें तीर्थंकर का नाम ?
प्र.12. भविष्यकाल के बारहवें तीर्थकर का नाम ?
प्र.13. कैकई कौन सी विद्या में निपुण थी ?
प्र.14. आदिनाथ के भी पहले मोक्ष गये ?
प्र.15 वे मुनिराज जिन्होंने छह माह तक देवी से
शास्त्रार्थ किया ?
प्र.16. दशरथ की एक रानी का नाम ?
प्र.17. चार दानों में एक का नाम ?
प्र.18. पाँचवें नरक का नाम ?
प्र.19. जो देव आपस में लड़ाते हैं ?
प्र.20. पंचमेरू में एक का नाम ?
प्र.21. तेरहवें स्वर्ग का नाम ?
प्र.22. आठवीं प्रतिमा का नाम ?
प्र.23. भरत जी को कितने समय में कैवल्य ज्ञान
हुआ ?
प्र.24. कर्मों के आने के द्वार को कहते हैं ?
नाम
पता
पितम् का नाम
उम्र
दूरभाष
→4
Roma
→5→7→12→14
↓
पहेली ग्रंथै बैंक
आचार्य जबर
गुणरहमान
मुनि संघ के नायक को क्या कहते है?
सबा ने कौन-सा पर्वत उठाया था?
3. मारीच के पिता का नाम क्या था?
जटायु पक्षी के कान में णमोकार मंत्र किसने सुनाया था? राम
5. विज्ञ छ ज्ञान किसे कहते हैं। लोक में उत्तम वस्तु क्या प्रत्यक्ष केवलज्ञान।
6. तत्वार्यसूत्र का दूसरा नाम क्या है?
सोलहवे तीर्थकर
खर्य का नाम क्या है?
8. समभवारण की रचना कौन-से गुणस्थान में होती है?
9. आ. समंतभद्र को कौन-सा रोग हुआ था?
10. भ. महावीर के मुख्य गणधर का नाम?
11. जिनके 25 सुलगुण होते है?
12. छते बलभद्र का नाम क्या है?
ऐसे तीर्थकर जिनके दो से अधिक नाम है?
13. णमोकार मंत्र के अविनय से कौन नरक गया था?
14.
15. शमशान में कौन जन्मा था?
16. वे कौन थे जिन्हें स्वर्ग की देवी का नृत्य देखकर वैराग्य हुआ था? ऋषभदेव
17. सम्यग्दर्शन के कितने अंग है?
18. दर्शनीपयोग के कितने भेद है?
19. तीर्थकर की सर्वप्रथम इच्चुरस का आहार किसने दिया था? राजा श्रेयोस
20. 353 मत किसने चलाए थे?
21. प्राण कितने होते हैं।
- वितरीत
- एकांते
- विज्ञा
संश्य
LL Round/
→ सिध्द → अंत
भाषण
आचार्य
कैलाश
भरत
शान्तिनाथ
सम्यग्दृष्टि
छठवे
भरूस कव्याधि
गौतमगणधर
उपाध्यास
राम
महाबीर
सुभौम चक्रवर्ती
जीवंधर
मारिची
क्षमावाणा पव
- क्षमावाणी पर्व क्यों?
दशलक्षण पर्व में आयो विशुद्धि के कारण, पुराने गलत प्रसंगो को भूलने के लिए। - क्षमावाणी पर्व वर्ष में कितनी बार और क्यों?
वर्ष में 3 बार। दशलक्षण के बाद। ताकि कपाय अनंतनुबंधी न बन जाये। - कैसे मनायें-
जिनके साथ दूरी बन गई है, उस दूरी को समाप्त करें।
स्वयं आगे आयें। अन्य की चिन्ता न करके अपनी आत्म विशुद्धि करें। - आजकल कैसे मनाई जाती है-
सब स्थानों पर अलग अलग तरीका। पर वास्तविकता का अभाव। कार्ड छपाकर डाल देते हैं, क्लर्क का जीव
जो पत्र आते हैं उनको भी देखने की फुर्सत नहीं, मात्र गैट अप देख लेते हैं। क्षमा मांगने के समय, जिनसे मांगना
उनसे नहीं मांगते। सब कोरम पूरा किया जाता है। आगरे का ढंग श्रेष्ठ था। यह तो विश्व मैत्री का पर्व है।
बिना शर्त क्षमा मांगनी चाहिये। - क्षमा के उदाहरण-
- रफी अहमद किदवई- मित्र ने शादी पर नहीं बुलाया। बिना निमंत्रण पहुँच गये।
- तिरुवल्लुवर- कपड़े फाड़ना।
- सिंहोर को वक्रकर्मा ने क्षमा किया था।
- काशी का राजा दीर्घायु, ब्राह्मण ने हराया, गर्भ के बालक को क्षमा।
- त्यागी अधम सर्प- राजकुमार को काटा, परन्तु मंजूर पर जहर नहीं घूंसा।
- क्षमा जब है जब बुरा, बुरा सा लगने लगे :
- क्रोध करना अर्थात किसी की गलती की सजा अपने को देना।
- [[?]]
- अचेतनमिदं दृश्यदृश्यं चेतनं ततः।
यत्र रुष्यामि, यत्र तुष्यामि, मध्यास्थो भयागतः। - मैं काथ पूरय किये खोटे रहे क्यों नहिं जोगरा।
- उत्सग क्षण जहां मन होई, अंतर बाहिर शत्रु न कोई।
- क्षमा रूपी चिंतामणि रहती जिसके पास।
तीन लोक की सम्पदा, बनती है फिर दास। - क्षमावाणी पर्व पर सब मन की हुण्डी खोल दो।
एक बार सब प्रेम से, भगवान् की जय बोल दो ॥
उत्तम तप
- प्रस्तावना - संसार में दो तरह के मार्ग
- साधन सम्पन्न सुख सुविधा का मार्ग। परलोक में दुःखदायी है, पाप बंध का कारण है।
- स्वतन्त्र स्वाधीन साधना तपश्चर्या का मार्ग। स्वर्ग और मोक्ष का देने वाला है।
- दोनों मार्गों में साधना का मार्ग श्रेष्ठ है। श्रेष्ठता शुद्धता और पूज्यता हमेशा तपाकर प्राप्त की जाती है।
- सुवर्ण अग्नि में तपकर ही शुद्ध होता है।
अग्नि के भेद-घर को, ज्वराग्नि, कामाग्नि, क्रोधाग्नि, दावाग्नि, बड़वाग्नि, जठराग्नि पर यह है तपाग्नि।
मिट्टी अग्नि में तपकर मंगलमय कलश बनती है।
आटा, घी तथा शक्कर हो, पर अग्नि से तपा नहीं तो हलुवा नहीं बनता।
- आज तक तप न धारण करने का कारण-
(1)-हमारी अज्ञानता - तप की उपादेयता का ज्ञान न होना।
(2)-हमारा अविश्वास - तप से निर्जरा या मोक्ष होता है।
(3)-हमारी प्रवृत्ति - हमें तप दुःखकारी प्रतीत होता है। डास्ट करे तो शान -
- मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत ॥ आज करे तो काल्ह -
- तप की परिभाषा-
इह पर लोय सुहाणं जिरवेक्खो जो करेदि सम भावो।
विविहं काय किलेसं, तव धम्मो णिम्मलो तस्स ॥ - का. अनु.
“कर्म क्षयार्थं तप्यते इति तपः” - सर्वार्थसिद्धि
“इच्छा निरोधस्तपः” अपने मन को मोड़ना, मरोड़ना, नियन्त्रण, कन्ट्रोल करना है। - तप का प्रयोजन-
“कर्म क्षयार्थं तप्यते इति तपः” - सर्वार्थसिद्धि “तपसा निर्जरा च” - तत्त्वार्थ सूत्र
1-जर या इच्छापूर्ति के लिए - जं - जैसे रावण ने विद्या सिद्ध करने के लिये तप किया था।
2-मान, सम्मान प्राप्त करने के लिए नहीं - जैसे आजकल कोई दशलक्षण व्रत आदि करते हैं, पर धर्मध्यान नहीं क
3-प्रशंसा प्राप्त करने के लिए नहीं। - लाभ के लिए नहीं। इससे कुछ मैलता नहीं, गंदगी साफ होती है।
- तप से लाभ -
कर्मनाश, ऋद्धियों को प्राप्ति, स्वर्ग व मोक्ष सुख की प्राप्ति, 63 शलाका पुरुष बनना, तीर्थंकर बनना आदि।
- मोक्ष की राह तप के बिना सम्भव नहीं। आज तक जो भी मोक्ष गये हैं, तप से ही मोक्ष गये हैं, "यह तन पाय महातप की
- तपस्वी के कारण नहीं आवरण प्रकटन चाहिए। शरीर का उपभोग नहीं, सही उपयोग करें।
6 तप के भेद - तप के दो भेद हैं- (1) बहिरंग (2) अन्तरंग
बहिरंग तप -
(1) अनशन-चा. चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर महाराज ने 35 साल के दीक्षा काल में 9938 उपवास किये। मुनि
नेमिसागर जी ने भी 11000 उपवास किये। It is feast for the soul and fast for the body.
(2) ऊनोदर-सागर में पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने 3 दिन तक एक अंजुलि पानी ही लिया।
(3) वृत्तिपरिसंख्यान-चा. चक्र. आ. शान्तिसागर महाराज ने सर्दी में गीले कपड़े पहनकर पड़गाहन होने की, हाथ में
जेयर लेकर पड़गाहन की विधि ली।
(4) रस परित्याग-सोम-हरी, मंगल-मीठा, बुध-घी, गुरु-दूध, शुक्र,-दही, शनि-तेल, रवि-नमक का त्याग।
आचार्य श्री-विद्यासागर जी ने फिरोजाबाद चातुर्मास में पूरे 4 माह छहों रस का त्याग रखा।
(5) विविक्त शैय्यासन - सेठ सुदर्शन गृहस्थ अवस्था में भी नग्न होकर श्मशान में ध्यान करते थे।
(6) कायक्लेश - अनंतवीर्य मुनिराज ने पैर में जलने पर भी नहीं हटाया। पू. आचार्य श्री फिरोजाबाद में 72 घर खड़े रहे
प्रसंग
तप न करने से हानिः-
① अन्तर्दाह, निगोद, नरक, तिर्यंच
उत्तम सत्य
परिभाषा - परमंताययकारण, बदलण पहिय
जो वदटि भिक्खु तुरि शे, तस्स दु एत्तो रत्तं ॥ चारसाणुबंबखा
सासु प्रशस्तेषु जनेषु साधु वचनं सत्गम् इति उच्यते। सत्यार्थसिद्धि
2. सत्य के चार रूप-
-
सत्य महावत - जिनके लेश। राग द्वेष, मोह से रहित, अन्य पीड़ा कारक न हो,
ऐसे आगमानुसाः वचन बोलना, सत्य महावत हैं। मू. आ. -
सत्याणुव्रत- परचधकार कठोर निंद्य नहीं वचन उच्चारें।
स्थूलमलीकं न वदति, न परान् वादयति सत्थर्मापि विपदे।
यत्तद्वदन्ति सराः स्थूल मृषावाद वैरमणम्॥ - रत्नकरण्डक श्रावकाचार -
भाषा समिति- जग सुहित कर सब अहित हर।
-
वचन गुप्ति- सम्यक् प्रकार निरोध… (मौन धारण करना)
-
सत्यव्रत की पाँच भावना- क्रोधलोभभीत्त्वहारप्रत्याख्यानान्यनुवोचि भाषणं च पञ्च। तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 7
-
सत्यव्रत के पाँच अतिचार- मिथ्योपदेशरहो भ्या पानफूटलेखतियान्यासापहारसाकार मन्त्रभेदाः। तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 7
5 सत्य वचन
• अहितकारी सत्य भी असत्य है तथा हितकारी असत्य भी सत्य है। अवसर देखकर उचित बोलना चाहि
• कटु उपदेश भी असत्य नहीं, हितकारी है। शब्दों का सदुपयोग सत्य है। शब्द वर्गणा दुर्लभ है। -
असत्य वचन- असदभिधानमनृतम्। अकल्याणकर वचन बोलना।
-
असत्य के भेद-
-
भाँजूद वस्तु को मना करना।
-
गरमीजूद को हाँ करना।
-
कुछ का कुछ कहना।
-
गर्हित वचन व.लना। (चुगलीरूप, हास्य, कलह, मिथ्याद्वान युक्त, बकवास रूप, शास्त्र विरुद्ध, खेल-कूद
पापयुक्त) अप्रिय वचन बोलना। (अप्रीतिकर, भयकार, खेदकार, और शोक सहकार, संताप व -
असत्य से हानि - अविश्वास, डर, अपयश, कलह, शोक, खेद आदि।
-
क्या करें - • गृहस्थ को साक्ध वचनों का त्याग वर्जित है, अतः शेष का त्याग करें। मुनि संपूर्ण रूप से त्याग
-
निश्चय सत्यधर्म.
• सारा संसार इन्द्रजाल है, कोई मेरा नहीं, सब झूठा जाता है।
• एगो मे सासदो आदा, णाम देण लक्खणो। ऐसा मे बहिरा भावा, सब्बे संजोग सवखणा ॥
• अपुगृह धन दारा पुत्राः मित्राणशवः। सर्वधन्यस्नाभाधानि, मूढः स्वानि प्रपद्यते ॥
• पण्णाए घित्तब्शे जो चेदः सो अहं णिच्छयते। अवरोसा जे भावा, ते मन्झ प्रेरित पायव्या ॥
• न संति बाह्या मम केचनार्था, भवानि तेषां न कदाचनाहम्।
इत्थं विनिश्चित्य विमुच्ट बाह्य, स्वरथः सदा त्वं भव गद मुक्त्यै ॥
• रूप तुम्हारा सबसे न्यारा, भेद ज्ञान करना। जौला पौरुष थके न तौलों, उद्यम सो करना ॥
उदाहरण-
• अर्थिका विशुद्धमति जी ने फंड के कागजों में दस्तखत नहीं किये।
• गुजरात का व्यक्ति, गुस्से में कपप्लेट मारने से पत्नि की मृत्यु, स्वयं ने रिपोर्ट लिखाई, सजा पाई।
• एडवर्ड सप्तम की राजगद्दी पर छोड़ा गया, सत्यवादी होने से कई एजेन्सियां मिल गई।
• लड़के को बलि बदले में उतना सोना। सच तो यह है।
• लोहा खरीदा, साना निकला, मूर्ति धनया दी, प्रशरित उसी की लिखाई।
• जम्बू प्रसाद जी ने वायसराय को शिकार दे लिये हाथी नहीं दिया।
• दयानंद सरस्वती अमेरिका में 50 % नहीं नाराज, सब-नाराज +50-%-समझते है, सब खुश।
• राणा का सामंत रघुपति सिंह, छुपकर घर आया, पकड़ा गया, सच बोला, छोड़ दिया।
- भारशाणुभेक्छा।
पुजाकारि रामरतो, तांत्रकोटि सग जपः।
अमानि मारि कः क्षमा।
क्षणा अथांत सहिष्णुता, रामता, सौजन्य, पृथ्वी, वृक्ष।
क्षमा के होने पर ही अन्य गुणों की सार्थकता है। क्षमा की नींव पर ही अन्य धमों की इमारत बसी हुई है।
2. क्रोध के कारण- अन्तरंग कारण क्रोध कषाय का उदय, बहिरंग कारण अनेक हो सकते हैं।
यथा- 1- इच्छापूर्ति का न होना
3- आकांक्षाओं की पूर्ति न होना
6- अस्यरथता
3. क्रोध से हानियाँ-
1- धर्मनाश हो जाता है
2- मनचाहा न होना, रुचि भेद, हठाग्रह, चिन्तन भेद, गलतफहमी सामने वाले को
4- अपेक्षण को क्षति पहुंचना
5- मानसिक अस्तव्यस्तता
7- भोजन का तामसिक व विवर्धक होना 8- अहंकार या होना
2- शरीर नाश हो जाता है
4- आपसी रिश्तें टूट जाते हैं 5- कोई क्रोधी को पसंद नहीं करता है
4. क्रोध नियन्त्रण के उपाय-
1- तत्वज्ञान
5- संतोश
2- चिंतन धारा को बदले
6- क्षेत्र का त्याग करें
2- प्राणों का घात हो जाता है (दीपायन मुनि)
6- विवेक नष्ट हो जाता है (राजा ने तोते कोगार
3- परिस्थिति का सही-सही विश्लेषण 4- उत्तर विलंब से देना सीखें
7- उल्टी गिनती
9- क्षीण हो जाये 10- प्यार से जीना शुरू करें 11- क्रोध से सजग हो जायें
5. क्रोध के 4 भेद- शिला, अस्थि, दारू, बेल के समान।
क्रोध ही प्रमुख सब कषाय एवं पापों की जड़ है, अन्त में जीत क्षमा की ही होती है।
6. क्षमा के उदाहरण-
1- मुनियों की क्षमा
8- पानी पी लें
12- क्रोध को पैर तले रौंदें।
• धौलपुर में आचार्य शान्तिसागर ने नगर के लोगों को भड़काने वाले जिए नाम के व्यक्ति को क्षमा कर दिया।
• कोल्हापुर में सिद्धप्पा मुनिराज द्वारा उन पर पत्थर फेंकने वाले बच्चों को क्षमा कर देना।
• श्रुत सागर मुनि का मंत्रियों से विवाद, रात्रि में मंत्री मारने आये, कीलित हुये, प्रातः क्षमा।
2- गृहस्थों की क्षमा
• कृष्ण पर जरत्कुमार ने तीर चलाया, शीघ्र भाग जाने को कहा।
• रामचन्द्र जी का मेघवाहन, कुम्भकर्ण को क्षमा करना।
• श्रीपाल ने धवल सेठ को क्षमा किया।
3- अन्यपतों की क्षमा
• गौतम बुद्ध ने जहर खिलाने वाले तक को अमर बनाया।
• द्रोपदी द्वारा अपने पुत्रों की हत्या करने वाले अश्वथामा को क्षमा करना।
• तुकाराम का गन्ने वाला उदाहरण
• एकनाथ द्वारा पीक थूकने वाले व्यक्ति को क्षमा करना।
7. क्षमा के भेद- मजबूरी की क्षमा (ताकतवर के साथ), स्वार्थ प्रेरित (दुकानदार की), वास्तविक।
8. क्षमा वीरों का आभूषण है, कायरों का नहीं। उबलते पानी में चेहरा नहीं दिखता।
9. क्षमावाणी गवाने का ढंग दिखाना मात्र है, जिससे बैर है उसे तो माँगते नहीं, अन्य से नाटक करते हैं। क्षमा बिन पांडित्य रूप
वक्ताका प्रमुख गुण धैर्यशाली हो। -
क्रोध बहने की चीज है।
सुनि। कुलाणयो,
क्रोध ने कुदेवो पर हराई।
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चतुर्थ
“वे कौन थे”
DAILY NOTES
वे कौन थे? 1. प्रतियोगिता के आवश्यक नियम
(क) यह प्रतियोगिता सभी व्यक्ति के लिए है इसलिए सभी व्यक्ति इस प्रतियोगिता में
भाग ले सकते हैं।
एवं आपको हमारे प्रश्न का जवाब पूर्ण वाक्य में देना होगा।
(ग) जब आप प्रश्न का उत्तर देंगे उसका निर्णय मैं स्वयं करूंगा।
प्रश्न उत्तर 1. वे कौन थे जिनके ऊपर जलती सिगड़ी रखी गई थी - गन कुमार मुनिराज
2. वे कौन थे जिन्हें जलते हुए काष्ठ पहनाये गए थे - पंच पाण्डव
3. वे कौन थे जिन्हें मरणासन्न अवस्था में कुत्ते को नमोकार मंत्र सुनाया था - जीवंधर कुमार
4. वे कौन थे जिन्होंने ‘आप्त परीक्षा’ नामक ग्रंथ लिखा - विद्यानन्द जी आचार्य
5. वे कौन थे जिन्हें हाथी पर बैठे बैठे वैराग्य हुआ था - गजकुमार
6. वे कौन थे जिन्होंने समयसार नाटक की रचना की थी - बनारसीदास
7. वे कौन थे जो णमोकार मंत्र की अवहेलना करने से सातवें नरक में गये - सुभौम चक्रवर्ती
8. वे कौन थे जिन्होंने यशोधर मुनिराज के गले में मृत सर्प डाला था - राजा श्रेणिक
9. वे कौन थे जिन्हें “भस्मक व्याधि रोग” हुआ था - समन्तभद्राचार्य
10. वे कौन थे जिन पर संवर नामक देव ने उपसर्ग किया था - पार्श्वकुमार मुनिराज
11. वे कौन थे जिन पर सीता के जीव ने उपसर्ग किया था - मुनि राम
12. वे कौन थे जिनका उपसर्ग राम-लक्ष्मण ने दूर किया - कुलभूषण-देशभूषण
13. वे कौन थे जो तीन पद धारी तीर्थंकर थे - शांतिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ
14. वे कौन थे जो विवाह के एक दिन बाद घर छोड़कर चले गये थे - जम्बूस्वामी
15. वे कौन थे जो नन्दा और सुनन्दा के ससुर थे - नाभिराय
16. वे कौन थे जिन्हें पशुओं को बंधन में देखकर वैराग्य हुआ - नेमिकुमार
17. वे कौन थे जिन्होंने त्रिलोकसार की रचना की - वीरसेनाचार्य
18. वे कौन थे जिनकी अवगाहना 500 धनुष थी - राजा आदिनाथ
19. वे कौन थे जो एक वर्ष तक की आसन पर खड़े रहे - मुनि बाहुबलि
20. वे कौन थे जो गुमानीराम के पिताश्री थे - पण्डित टोडरमल जी
21. वे कौन थे जिन्होंने तत्वार्थ राजवार्तिक ग्रंथ की रचना की - भट्ट अकलंक
22. वे कौन थे जिन्होंने कोटि शिला उठाई थी - लक्ष्मण
23. वे कौन थे जो विदेह क्षेत्र में सीमंधर स्वामी के दर्शन को गए - आ. कुन्दकुन्द देव
24. वे कौन थे जो णमोकार मंत्र के प्रभाव से निरंजन हो गये - अंजन चोर
25. वे कौन थे जिनका जन्म सासनी में हुआ था - दौलतराम जी
26. वे कौन थे जिनको कोढ़ या ऐसे उन्होंने स्वयं दूर किया - वादिराज मुनिराज
27. वे कौन थे जिनको मुनिदीक्षा लेने के अन्तर्मुहूर्त में केवलज्ञान प्राप्त हुआ - भरत चक्रवर्ती
DATE
DAILY NOTES
28. वे कौन थे, जिनको पह तालों में बन्द किया गया - मांगतुंगाचार्य
29. वे कौन थे जिनको तीन दिन तक श्यालनी खाती रही - सुकुमार मुनि
30. वे कौन थे जिनके निमित्त से द्वारिका जली भी - डीपायन मुनिराज
31. वे कौन थे जो जागी होते हुये भी भाई की लाश को 6 महीने तक कंधे पर रखे घूमते रहे - रामचन्द्र ज.
32. वे कौन थे जिनका सिहचक्र के विघात से कुष्ठ रोग मिटा था - श्रीपाल
33. वे कौन थे जिन्होंने जैन धर्म का पहला ग्रन्थ लिरदा आचार्य पुष्पदेत एवं भूतवती
34. वे कौन थे जो राम की मृत्यु का समाचार सुन स्वयं भी मरण को प्राप्त हो गये - लक्ष्मण
35. वे कौन थे जिनका जन्म कारावास में हुआ था - श्रीकृष्ण
36. वे कौन थे जिनका जन्म टापशान घाट में हुआभा - जीवंधर स्वामी
37. वे कौन थे जिन पर सबसे अधिक उपसर्ग हुआशा - पार्वतनाथ मुनिराज
38. वे कौन थे जिनकी सबसे अधिक आम भी - ऋपमदेव (भपावप
39. वे कौन थे जिन्होने बालक वर्षमान की सर्पधनकर परीक्षा ली भी - संगम देव
40. वे कौन थे जिन्हे हाथी के पैर के तीन्ते कुचलवा दिया था - प. टोडरमलजी
41. वे कौन थे जिन्त्र सूली पर चरामा गया पर सिंहासन वन गमाभा - सुदर्शन सेठ
42. वे कोंग थे जिन्हें एक बार में भाद होता था - अकलंक देव
43. वे कौन थे जिन्होंने चोर को धन ले जाने में सहायता की श्री - व. बनारसी दास
44. वे कौन थे जो इस युग के प्रमम दाता बने - राजा श्रेयांस
45. वे कौन थे जिन्होंने बैल को गमोकार मंत्र सुनामाश्रा - पदमरुचि सेठ
46. वे कौन थे जिनका बाघ ने मक्षण किया था - सुकौराल मुनिराज
47. वे कौन थे जिन्होंने अपनी बहिन को बुद्धोष्ट से देखा और बाद में वैराग्य आगमा देश-कुल
48. वे मैन थे जिनके पांचों कल्याणक एक ही स्थान पर हुए - वासुपूज्य जी
49. वे कौन थे जिनके नाना व पिता एक ही थे - कार्तिकय मुनिराज
50. वे कौन थे जिन्होंने 363 मिथ्या मत-चलागे थे - मारीचि
51. वे कौन थे जो नरक गये और भविष्य में प्रथम तीर्थकर होगें - राजा श्रेणिक
52. वे कौन थे जो जुजा में प्रशिद्ध हुए - पाण्डव
53. वे कौन थे जिन्हें प्रतितारामण होते हुए भी तीसरे एक का दुख भोगना पहा - ट्रावण
54. वे कौन थे जी आचार्य पुष्पदंत एवं भूतवाली के गुरु थे - धरसेनाचार्य
55. वे कौन थे जिन्हें सीता का जीव प्रतीन्ड नरक में संबोठान करने गया - लक्ष्मण
56. वे कौन थे जो इस अवसरंगी काल में अंतिम अनुबह केवली कहलाए - जम्बू स्वागी
57. वे कौन थे जो इस अवरनपणी काल के अंतिम गुतकेवली हुए - आचार्य भडबाहु
58. वे कौन थे जो मविग्य काल ते सोलहवे तीर्मकर होंगे। श्री कृष्ण
59. ते कौन थे जो मविान काल में 19 वे तीयकर होंगे - डायरायण
60. वे कौन थे जिन्होंने संस्कृत में गयशैली का पहला प्रेम लिखा - आचार्य उम्मी
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- घ → घ्र घ्र आ घे ग घ्र घ्र घ्रा घ्र
- र → र र र
- क → ग ज त ज भ
- दि → दि द
- ड → ड़ ड़ ड़ ड़
- दे → प दे ह दि ट दे
- ध्या → अ रो घ गु
- द → प द
- चे → अ क क
- द → द द द द द द द द
- क → को क क क
- प → अ अ अ
- ट → ट बी क क प
- अ → अ द द द द
- रि → द द प द
- ध्या → स अ
- पि → प प प प प प प
- दि → द दि प पा स
- द → द पा म
- द → द द द अ
What is my Full Form
उदाहरण -
प. → अ. सि. आ. उ. सा.
परमेष्ठी → अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु
- ध क्ष → क्ष. मा. आ. शौ. सं. स. त. त्या. आ. व्र.
- श ल → मा. मि. नि.
- क. ल्मण → ग. ज. त. ज्ञा. मो.
- नि. → नि. इ. निगोद
- पु. → ध. अ. का. मो. पुरुषार्थ
- क्षे. → भ. है. ह. वि. र है. ऐ.
- ध्या. न → आ. रौ. ध. शु.
- प्र. माद → प. प्र.
- चे. → ज्ञा. क. क.
- म.द्र. → छ. च. झा. क. पं. द. स्वा. ध्व.
- क षाय → क्रो. मा. मा. लो.
चला 12. प. → व्य. अ. उ.
स 13. र → ख. मी. क. क. च. - आ. → सा. वं रु प्र. रु ध्या. मुनि आवश्यक
- दि. ग → पू. द. प. उ.
- स्था. पहला → त. अ.
- नि. लि → का. म. पा. मा. शं. प. नै. पि. ना.
- नि. निर्वाण → कै. गि. च. पा. स.
- म. → म. मां. म. मकार
- पं. वाद्य → जी. पु. ध. अ. आ.
नोट - प्रश्न एवं उत्तर दोनों के प्रथम शब्द दिये है आपको उन्हें पूरा
लिखना है।
है भगवान । आप नाराज क्यों हथे। गए है कि
इस बार बिल्कुल भी सीजन नहीं’ चल रहा है।
अरे आपको चावल चढ़ा सकू इतनी भी कमाई नहीं हो
रहीं। परे जब हमें काना खाने को नहीं मिलेंगा
तो हम आपकी क्या चढ़ावे भगवान जय देवा करो
आप तो दयानिधान हो हमारी दुकान अच्छी चलती
लग जायें और अपने मजे हो जावें। भगवान
तो फिर अपनी यह बात पक्की एहीं की अपने मजे
तो आपके मजे । एक जोड्दार विद्यान (दशलक्षणविधान):
कराऊमा अब तो भगवान आपके ही भरोसे है।
रिश्वतखोर :
हैं भगवान भाप तो सवाल है। मैंने
जी अर्जी लगाई है। वो तो आप समझ ही गए
होंठों न यदि समझे न हो तो भगवान में फिर
से बता रहा हूँ कि में तो रिश्वत खोरी की के
चक्कर में पकड़ा गया हूँ लोगो ने कह दिया है।
मैंने नाका रू. की रिश्वत जी मगर राज की
बात बताऊँ भगवान ली तो नाका की है पर
आप ही इस झंझट । मुसीबत से छुड़ना सकते
कोर्ट से बाइज्जत बरी हो गया
आपको रंगा साथ ही
10% भी।
4- बेरोजगार :
रबर उत्थर देहाते हुए।
वाह भगवान वाहा। आपके मंदिर में कई मार्बल
का दीवारों पर बिल पेंट वेदी पर सोने का
पेंट छत्र चंतर चांदी के आपका तो क्या
कहना भगवान ? अपरिग्रही भगवान के पास
इतना परिग्रह। खऔर एक में आपका भक्त वैरोच्यार
घूम रहा हूँ किसी से कहना मत भगवान ये
पेंट भी मैंने दूसरों की पहिन रखी है। अरे भगवान
कुछ तो सोचो हमारे बारे में हम जैसे बेरोजगारी
पर कृपा करो बस एक छोटी सी नौकरी दिला दी भगवान
पहली वेतन आपको ही चगऊगी। ज्यादा क्या कहूँ
भगठान । और तो आप समझ ही गए होगें।
5- युवा :
तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण ।
पारस त्यारा तुम तो करवा दो व्याह हमारा ॥
हे पारसनाथ भगवान । मैं कब से रविवार का प्रत
रख रहा है। पर माप सुनते ही नहीं हो (अरे मैं
एक शादी ही तो कह रहा हूँ ! भगवान आपकी हो
कृपा से चक्रवर्तीयों की तो 36-36 हजार शादित्या दो
गई मेरी तो अभी एक भी नहीं हुई और आप मेरी
एक गाठी ही नहीं करवा सकते ।
25%
मूल दस्तावेज़ (PDF): 145.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है