जैन धर्म का संक्षिप्त परिचय
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दश लक्षण धर्म
अथवा
दशधर्म-दीपक।
[ जाप्यमंत्र, दशधर्म स्तवैये, दश लक्षण व्रत कथा, दशधर्म
भजन और दश लक्षण व्रतोद्यापन सहित ]
लेखक-
स्व० धर्मरत्न पं० दीपचन्द्रजी वर्णी,
नरसिंहपुर निवासी।
प्रकाशक-
मूलचन्द किसनदास कापड़िया,
मालिक, दिगम्बर जैन पुस्तकालय,
गांधी चौक, सूरत।
चतुर्थावृत्ति ] वीर सं० २४६८ [ प्रति ६००
मूल्य- नौ आना।
निवेदन
जैन धर्ममें धर्मके दशलक्षण बताये गये हैं अतः उसको दशलक्षण धर्म कहते हैं और इसीपर धर्मकी इमारत खड़ी है। इसका इतना महत्व है कि इसीके नामसे जैनोंका महान पर्व दशलक्षण पर्व प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
जैन भाषा शास्त्रोंमें इन दश धर्मोंका स्वरूप सामान्यरूपसे दर्शाया गया है लेकिन सर्वसाधारणके समझनेमें आजायें उस प्रकारसे इनका स्वरूप दर्शानेवाले ग्रन्थकी बड़ी आवश्यकता थी जिसको हमारे निवेदमने स्व० धर्मरत्न पं० दीपचन्द्रजी वर्णा (नरसिंहपुर सी. पी. निवासी) ने २८ वर्ष हुए पूर्ण कर दी थी। तब हमने वीर सं० २४४० में उसकी २००० प्रतियां छपाकर वितरित की थी, फिर इसकी दूसरी आवृत्ति वीर सं० २४४३ में प्रकट की और तीसरी आवृत्ति वीर सं० २४५३ में प्रकट की थीं। वह भी खत्म हो जानेसे इसकी यह चतुर्थ आवृत्ति प्रकट की जाती है।
इस आवृत्तिमें इसवार कई विशेषताएँ की गई हैं जैसे कि मुखपृष्ठपर खास खर्च करके ‘दशधर्म दीपक’ का आकर्षक व भावपूर्ण चित्र बनाकर रखा है तथा भीतर दशलक्षण व्रत कथाके साथ २ स्व० ब्र० शीतलप्रसादजी कृत एक दशधर्म भजन और आचार्यश्री सुमतिमसागरजी कृत दशलक्षण व्रत उद्यापन भी जोड़
[ २ ]
दिया है जिससे दशलक्षण व्रतके १० उपवास करनेवालोंको दश-लक्षण व्रत कथा पढ़नेमें तथा उद्यापन करनेमें सुभीता होगा। इस व्रतके उद्यापनमें १०० कोठेका साचिया निकालना पड़ता है तथा सब प्रकारके दश २ उपकरण मंदिरमें चढ़ानेका रिवाज है वह यथाशक्ति भरना चाहिये तथा दशलक्षण व्रत करनेवालोंको खास करके शास्त्रदानमें अच्छी रकम निकालना चाहिये और इस पुस्तककी प्रभावना तो अवश्य २ करनी चाहिये। अब कांच व धातुके बर्तनोंकी प्रभावनाकी आवश्यकता नहीं है, यह ख्याल रखना चाहिये।
दूसरी आवश्यक सूचना यह है कि इस ग्रन्थका आद्यंत मननपूर्वक वारवार स्वाध्याय करते रहें और दशलाक्षणिक व्रतके दिनोंमें मिल एक २ धर्मका पाठ सबको सुनाना चाहिये व उसपर विशेष उपदेश देते रहना चाहिये। यदि हम इन दश धर्मोंका अच्छी तरहसे पालन कर सकेंगे तो सब कुछ कर सकेंगे ऐसा निःसंशय कहा जा सकता है।
आशा है इस चतुर्थावृत्तिका भी शीघ्र ही प्रचार हो जायगा।
निवेदक-
मूलचन्द किसनदास कापड़िया।
-प्रकाशक।
श्रीवीतरागाय नमः
श्रीदशलक्षण धर्म
मनुष्य महान् धर्मो, खुमादि भावो य दंसिणो धम्मो।
रयणत्तयं च धम्मो. जीदाणं रक्खणं धम्मो ॥
-स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा।
अर्थ-मनुष्यका जो स्वभाव है वह धर्म है, अर्थात् जैसे जीव दर्शनज्ञानादि उपयोग स्वभाव तथा चेतनत्वभाव अथवा पुद्गल अचेतनत्व स्वभाव, स्व, गंध, वर्णोंदि आदि स्वभाव होता है, उत्तम-क्षमादि दश प्रकारके भाव भी धर्म है और रत्नत्रय रूप भी धर्म होता है तथा अहिंसा लक्षण अर्थात् जीवोंकी रक्षा करना भी धर्म है।
भावार्थ-यद्यपि उक्त गाथा में वस्तुके स्वभावको, उत्तम क्षमादि दश गुणोंकी, रत्नत्रयकी और अहिंसाको, इस प्रकार धर्म चार प्रकारसे कहा है तथापि निश्चयसे विचार करनेपर केवल वस्तुस्वभावमें ही अन्य तीनों प्रकार गर्भित हो सकते हैं। कारण यहाँपर जो धर्म शब्दकी व्याख्या की गई है, वह जीवकी अपेक्षा की गई है; इस-लिये जिस प्रकार अजीवकका स्वभाव ‘महल’ है, उसी प्रकार 'जीवका स्वभाव चेतनत्व अर्थात् ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्यादिरूप होता है अर्थात् जहाँ चेतनत्व होता है, वहाँ उससे ‘जानिभावी’ सम्बन्ध रखनेवाले दर्शन और ज्ञानगुण अर्थात् देखना व जानना अवश्य ही होता है। यह कथन अभेद नयकी अपेक्षासे है
श्रीदशलक्षण धर्म।
यद्यपि जीवका स्वभाव चैतन्य-दर्शन और ज्ञानमयी है तथापि यह अनादि कर्मबन्धके कारण पुद्गलसे मिला हुआ विभाव अर्थात् रागद्वेषरूप परिणमन करता रहता है और इसीसे यह इष्ट-अनिष्ट बुद्धिको प्राप्त होकर कभी क्रोध, कभी मान, कभी माया, कभी लोभ, कभी घृणा, कभी आशा, कभी क्षुद्र, कभी स्वच्छन्द इंद्रिय विषयसक्त-रूप प्रवृत्ति, कभी कुशील और कभी कुध्यानरूप प्रवृत्ति करता है। कभी अन्यथा श्रद्धान अर्थात् अनंतर श्रद्धान करके वस्तुस्वरूपको अन्यथा ही जानता हुआ अन्यथा प्रवृत्ति करता है। अथवा कभी स्वार्थ व प्रमादवश होकर परपीड़नरूप प्रवृत्ति करता रहता है। सो यदि वह पदार्थके यथार्थ स्वरूपका श्रद्धान व ज्ञान करके तदनुसार ही प्रवृत्ति करे जिसे कि “रत्नत्रय” कहते हैं, तो विभाव (रागद्वेष आदि) होने ही न पावें। तब ही क्रोधादि भावोंके न होनेसे उत्तम-क्षमादि दश प्रकारका धर्म कहा जावेगा। अर्थात् जब यह जीव स्वस्वरूप ही परिणमन करेगा तब न तो इससे पट्काय जीवोंके हननरूप बाह्य हिंसा ही होगी, और न रागादि भावरूप अंतरंग हिंसा होगी। इस प्रकार हिंसाके न होनेसे अहिंसा स्वयमेव हो जावेगी।
इसप्रकार उक्त गाथासे कहे हुए धर्मके भिन्न भिन्न लक्षणोंको यद्यपि भेदविज्ञानसे भिन्नता प्रतीत होती है तथापि अभेद विवादसे एकता ही है।
अब यहां उत्तमक्षमादि दश प्रकार धर्मोंका विशेष स्वरूप कहते हैं-
भगवान् उमास्वामीने धर्मका स्वरूप कहा है:-
उत्तम क्षमा।
उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयम-
तपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः॥
भावार्थ—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य, ये दश प्रकार धर्म अर्थात् आत्माके स्वभाव हैं।
सो ही कार्तिकेयस्वामीने कहा है यथाः—
सो णिय दप्पहारो खमादि भावेई सुक्खसारिहं।
मुणिजणव्वा परमसीलो मुणियव्वा परमसीलो॥
सो धर्म क्षमादि भावरूप दश प्रकार है और सच्चे सुखका देनेवाला है अथवा यही सुखस्वरूप अर्थात् सुखका सार है, और वह आगे कहा जानेवाला दश प्रकार क्षमादि भावरूप धर्म परम भक्ति अर्थात् धर्मानुरागपूर्वक जानने व मनन करने योग्य है।
(स्वा० का० अ०)
उत्तम क्षमा।
कोहेण जो ण तप्पदि सुरणर तिरिएहिं कीरमागेवि।
उवसग्गे वि रुद्दे तस्स खिया णम्मला होदि॥
अर्थात्—जो देव, मनुष्य तथा तिर्यंचों द्वारा घोरानघोर उपसर्गों होनेपर भी क्रोधसे संतप्त नहीं होते हैं और निर्मल अर्थात् उत्तम क्षमा होती है।
(स्वा० का० अ०)
भावार्थः—किसी भी प्रकारके देव, मनुष्य तथा तिर्यंचोंकृत उपसर्गोंद्वारा होनेवाले दुःखोंको बिना संक्लेश भावोंके सह लेनेकी
श्रीदशलक्षण धर्म।
शक्तिको उत्तम क्षमा कहते हैं। अर्थात् जिस शक्तिके कारण जीव किसी भी प्रकारके उपसर्ग व कष्ट (दुःख) आनेपर भी घबरावे नहीं, अर्थात् व्याकुल न हो, किन्तु उस दुःख व क्लेशको अपना ही पूर्वोपार्जित कर्मका फल जानकर समभावसे सहन करे, सो क्षमानाम आत्माका गुण है। प्रायः समस्त संसारी प्राणी अपने इस उत्तमक्षमा गुणको भूले हुए इसके विपरीत-इंद्रियोंके इष्ट विषयों वा विषयोंकी योग्य सहायक सामग्रीमें और विषयानुरागी स्वमनोनुकूल चलनेवाले मित्रोंमें राग (रति) करते हैं। और इनसे उलटे इंद्रियोंको अनिष्ट-सूचक पदार्थ व इच्छानिरुद्ध पुरुषोंसे द्वेष अर्थात् अरति (अनिष्ट) करते हैं। ऐसी अवस्थामें इष्टानिष्ट (रति-अरति) सूचक जो कुछ भाव होते हैं वे ही आत्माके परसंयोगसे उत्पन्न हुए वैभाविक भाव हैं।
तात्पर्य—जब किसी जीवको इष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है तब वह प्रफुल्लित चित्त हुआ अपने आपको परम सुखी मानता है। और समझता है कि इस इष्ट वस्तुका वियोग मुझसे कदाचित् भी कभी नहीं होगा और इसीलिये वह उसमें तल्लीन हो जाता है। परन्तु जब कोई भी चेतन अर्थात् देव मनुष्य या पशु या अचेतन पदार्थ उसकी उस इष्ट वस्तुके वियोगका कारण बन जाता है, तब वह विषधर (सर्प) के समान क्रोधित होकर उसका सर्वस्व नाश करनेका उद्यम करता है। इसीको क्रोधभाव-कषाय कहते हैं।
क्षमा गुण इसी क्रोधभावका उल्टा आत्माका स्वभाव है।
जब यह जीव निज भावस्वरूप परिणमन करता है, तब ही इसको उतने ही समय तक, जब तक वह स्वभावोंमें स्थिर रहता है, सुखी-
उत्तम क्षमा।
कह सकते हैं क्योंकि यथार्थमें सुख अपने आत्मस्वभावको प्राप्त होनेको कहते हैं, और ज्योंही यह स्वभावसे च्युत होकर परभाव अर्थात् विभाव भावोंको प्राप्त होता है कि वह तुरन्त दुःखी हो जाता है। तात्पर्य उपर्युक्त कथनसे यह निश्चित हो चुका कि क्रोधभाव आत्माका स्वभाव नहीं, किन्तु वह पर पदार्थोंके संयोगसे उत्पन्न हुआ विभाव भाव है, इसलिये ये भाव जीवको केवल दुःखके देनेवाले हैं।
सुख प्राप्त करना जीवात्माको अभीष्ट है। इसीलिये प्राणी-मात्रको चाहिये कि विषधरके समान भयंकर और प्राणघातक जानकर इस क्रोधको छोड़ेदेवे और उत्तम क्षमाको धारण करके सुखी होवें।
यदि यहाँ यह शंका उपस्थित हो कि क्षमासे परलौकिक- (सुखि) सुख मिल सकता है, किन्तु संसारी सुख तो नहीं मिलता?
तो उत्तर यह है कि यह क्षमाभाव मुक्ति सुखका तो हेतु है ही किन्तु सांसारिक सुखका भी एक प्रधान हेतु है। देखो, लोकमें कहावत है कि बनिया सबसे मोटा होता है, क्योंकि वह गम खाता- क्षमा रखता है और क्षत्रिय दुबला होता है, क्योंकि वह सदा बात बातमें क्रोधित होजाता है। कहा भी है—
क्रोधः करोति पितृमातृसुहृज्जनाना-
मप्यप्रियत्वमुपकारिजनोपकारम्।
देहेक्ष्यते प्रकृतकाचिनिर्वाशर्न च,
मत्वेति कोपवशिनो न भवन्ति भव्याः॥
-द्रुमापत्तिरत्नसन्दोह।
अर्थ—क्रोधसे मातापितादि स्नेही पुरुषोंका जप्रिय, उपका-
दशलक्षण धर्म।
रियोंका अपकारी होजाता है, शरीर क्षीण होता है और सांसारिक कार्य भी बिगड़ जाते हैं, ऐसा समझकर भव्य (उत्तम) पुरुष कदापि क्रोधके वश नहीं होते हैं।
क्रोधसे जीवोंको कैसे कैसे दुःख भोगने पड़ते हैं इसीके उद्दा- हरण स्वरूप श्रेणिकपुराणकी एक कथा कहते हैं कि—एक नगरमें किसी ब्राह्मणकी इकलौती सुन्दर कन्या थी और वह ब्राह्मण राजपु- रोहितका था। इसलिये वह छोटी कन्या पिताके साथ कभी कभी राजमहलमें आया जाया करती थी। राजा भी उस कन्यापर रूपवती होनेके कारण बहुत प्रेम करते थे। यद्यपि वह कन्या रूपवती तथा विद्यावती थी, तथापि उसमें क्रोध भी असीम था, इसलिये यदि कोई कभी उसे तू करके बोले देता, तो वह भोर क्रोधके लाल हो जाती थी। प्राणियोंकी रुचि विचित्र है। लोगोंने उसे तू शब्दसे चिढ़ती हुई जानकर और भी चिढ़ाना आरम्भ किया। यहाँतक कि उसका नाम ही ‘तुकारी’ पड़ गया। तुकारी लोगोंके केवल तू शब्दपर ही अनेक गालियाँ देती, मारने दौड़ती और किसी किसीको मार भी बैठती थी तो भी राजाके भयसे उससे कोई कुछ भी नहीं कह सकता था।
जब वह कन्या तरुण हुई, तो उसके क्रोधी स्वभावके कारण कोई उसे नहीं ब्याहता था। निदान कोई एक जुआरी—वृत्युत्पन्नी ब्राह्मणने (जो कि जुआमें उधार द्रव्य लेकर हार गया था और जिसे अन्य जुआरी अपना उधार दिया द्रव्य न पानेके कारण नाकमें • कौड़ी-पहिनाकर और-उलटा झाड़से टाँगकर मार रहे थे, छुटकारा
उत्तम क्षमा।
पानेकी इच्छासे) ब्याहना स्वीकार कर लिया। सो देखो, वह तुकारी क्रोधित होनेके कारण एक रंक, गुणहीन, कुरूप, व्यसनी पुरुषसे ब्याही गई। पश्चात् किसी एक दिन उसका पति राजसभासे कुछ देरीसे आया कि इसीपरसे क्रोधित होकर वह (तुकारी) घरसे निकल गई। और चोरोंके हाथ पड़ गई और उन चोरोंने उसका वीभ- त्सँग करना चाहा, तब उसके शीलके माहात्म्यसे वहाँ वनदेवीने आकर उसकी रक्षा की। फिर जब वह चोरोंसे छूटी तो वणजारोंके हाथ पड़ी। उन्होंने भी उसी प्रकार उसपर कुदृष्टि की है, तब फिर भी उसने वनदेवीकी सहायतासे रक्षा पाई, तब वणजारोंने शोभित होकर उसे एक छीये- (कपड़े छापनेवाले) को बेच दी। वह छीपा उसका मस्तक आठवें पन्द्रहवें दिन चीरकर लोहू निकालता और उससे कपड़े रंगता। फिर जड़ीबूटियों (लक्ष्मूल) के तेलसे उसका घाव अच्छा कर देता था। इस प्रकार कई महीनों तक कितने ही बार उसका मस्तक चीरा गया कि जिससे उसे घोर वेदना भोगनी पड़ी। एक दिन भाग्यवश कहीं उसका चाचा वहाँ पहुँच गया और छीपाको कुछ द्रव्य देकर ज्यों त्यों उसे छुड़ा लाया। तबसे तुकारीने क्रोध करना सर्वथा छोड़ दिया। तात्पर्य—क्रोधके कारण ही तुकारीको इतने दुःख भोगने पड़े इसलिये क्रोध पिशाचको दूरसे ही छोड़ देना चाहिये, और भी कहा है कि—
“ क्षमा हने औरको, अरु क्रोध हने आपको। ”
देखो, जो शत्रु बड़े बड़े शूरधारी साथियोंसे अनेक बेधार्द्ध, करनेपर भी वश नहीं होते हैं या जो सिंह व्याघ्रादि घातक जीव
श्रीदशलक्षण धर्म।
संसारके प्राणियोंको सर्वदा भयभीत करते रहते हैं, वे सब अनावास
ही क्षमावान् महात्मा पुरुषके वशमें होजाते हैं।
क्षमावान् पुरुषका कभी कोई भी शत्रु नहीं होता है। देखो,
जब कोई पुरुष किसी अन्य पुरुषपर कुछ क्रोध करता है और वह
अन्य पुरुष यदि उसे शान्ति भावसे सहन कर लेता है, तो क्रोध करने-
वाला पुरुष स्वयं ही लज्जित हो पश्चात्ताप करने लगता है।
और भी क्रोधसे क्या २ हानि होती है सो सुनिये-क्रोधी
पुरुष मणिवत्ले सर्ववत् पुरुषगुणके होनेपर भी प्रशंसा नहीं पाता, क्रोधी
पुरुषके व्रत, तप, नियम, उपवास, संयम, दान, पूजा, जप, स्वाध्याय,
विद्या आदि समस्त गुण पुष्पसहितके भी क्षणभरमें भस्म होजाते हैं।
क्रोधसे धैर्य छूट जाता है, बुद्धि नष्ट होजाती है रोग घेर लेते हैं,
हठ बढ़ जाता है, शरीर शिथिल होजाता है, धर्म अलग होजाता है,
वचन अन्यथा प्रवृत्त होने लगते हैं, मुख व नेत्र लाल होजाते हैं, शरीर
काँपने लगता है, रोमाँच खड़े होजाते हैं, विचारशक्ति नहीं रहती है,
दया चली जाती है, मित्रताके बदले शत्रुता बढ़ जाती है, अपयश
फैल जाता है, दरिद्रता घेर लेती है, इत्यादि और भी अनेक प्रकारसे
हानि होती है और इसके विपरीत क्षमासे सर्व गुण प्रगट होते हैं,
इसीलीये सुखाभिलाषी सत्पुरुष सदैव क्षमाभाव धारण करते हैं।
जब कोई उन्हें दुर्वचन कहता है, अर्थात् उनपर क्रोध करता
है, तो वे सोचते हैं कि अमुक पुरुषके क्रोधका कारण क्या है? यदि
मैंने उसका कुछ भी अपराध किया है, तब तो मुझपर उसका क्रोध
कर दुर्वचन कहना ठीक ही है। मैंने क्यों ऐसा अनर्थ किया, जिससे
उत्तम क्षमा।
परके परिणामोंमें क्रोधभाव उत्पन्न होगया। अब जैसे बने उसे क्षमा
ग्रहण कराना उचित है और इसलिये वे अपने दोषोंकी आलोचना
करके स्वनिन्दा करते हुए उस पुरुषसे नम्र शब्दोंमें क्षमा माँगकर
शान्त कर देते हैं। और अपने आपको किंचित् भी क्रोध नहीं
आने देते हैं।
किन्तु कदाचित् कोई निष्कारण ही क्रोध कर कुवचन बोले तो
सोचते हैं कि इसमें मेरा तो कुछ भी दोष है ही नहीं, यह पुरुष
स्वयं ही क्रोधसे अपने आत्माको मलिन कर कर्मबन्ध कर रहा है
और व्यर्थ ही बिना सोचे मुझको दुर्वचन कह रहा है। यह अज्ञानी
है, पागल है। इसीसे यह विवेक बिना व्यर्थ ही अपना समय
नष्ट करता हुआ स्ववचन बिगाड़ रहा है सो पागल व अज्ञानीके
कहनेका बुरा ही क्या मानना? वह तो अभी केवल मुँहसे ही बकता
है, मारता तो नहीं है क्योंकि पागल तो मारता है, बाँधता है, काटता
है, कपड़े फाड़ देता है, वस्तुओंको तोड़ मरोड़ कर फेंक देता है,
और अनेक नहीं करने योग्य कार्य भी करता है, सो अभी तो यह
केवल मुँहसे ही दुर्वचन कह रहा है और कुछ तो नहीं करता है, सो
ये दुर्वचन मेरे शरीरमें कहीं भी चिपट तो जाते नहीं हैं, इसलिये
इनसे मेरी हानि ही क्या है? कुछ नहीं।
अब यदि उन्हें कोई मारने भी लगे तो सोचते हैं कि वह मुझे
केवल मारता ही तो है, कुछ प्राण रहित तो नहीं करता है।
और यदि कोई प्राण हरण भी करने लगे, तो सोचते हैं कि
यह प्राण ही तो हरण करता है, कुछ मेरा धर्म जो क्षमा (आत्माका
श्रीदशलक्षण धर्म।
स्वभाव) है, उसे तो हरण नहीं करता। अर्थात् यह एक मेरे
अविनाशी, सच्चिदानन्द अखण्ड चैतन्य वैतन्य आत्माको तो देख ही
नहीं सकता; तब पीड़ा किसे देगा? और जिसे यह मारता काटता
बाँधता व हरण कर रहा है, वह तो मेरा स्वरूप ही नहीं है। वह
जड़ अर्थात् अचेतन है, नाशवान् है। किसी न किसी दिन इसका
वियोग तो होना ही है सो आज इसीके हाथसे सही। और यदि यह
मेरे प्राण हरनेमें ही प्रसन्न है, तो अच्छा ही है। मेरा जो पूर्वकृत
कर्मोंका इससे बैर था, सो वह अभी मेरी सावधान अवस्था में क्षय
लेता है। यह इसका मुझपर बड़ा उपकार है। जो कदाचित् असाव-
धान अवस्थामें प्राण हरण करता, तो संभवतः मेरा कुमरण होकर मैं
दुर्गतिमें चला जाता।
इसलिये मेरा कर्तव्य है कि मैं इस पूर्वकृतकर्मत क्षयसे
उपशमको शांतिपूर्वक सहन कर समाधिमरण सहित प्राण त्याग करूँ।
इसीमें मेरा कल्याण है। इसलिये वे ऐसा विचार करके कि-
खम्मामि सव्व जीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्व भूदेसु बैरं मज्झं न केणवि ॥ १ ॥
अर्थात्-मैं सब जीवोंको क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझपर
भी क्षमा करो, मेरे सबसे मित्रभाव है, मुझे किसीसे भी बैर-द्वेषभाव
नहीं है, उत्तमक्षमा धारण करते हैं-
तात्पर्य-मित्र क्षमा सम जगमें, नहीं जीवको कोय।
अरु बैरी नहीं क्रोध सम, निश्चय जानो लोय ॥
सो ही पं० ध्यानतरायजीने कहा है-
उत्तम मार्दव । [११
पीछे हुए अनेक, बाँध मार बहु विध करें।
धीरिये क्षमा विवेक, काँप न कीजे प्रीतमा ॥१॥
उत्तम क्षमा गहोरे भाई, यह भव यश परभव सुखदाई।
गाली सुन मन खेद न आनो, गुणको औरुण कहो अजानो॥
कहे अज्ञानो वस्तु छीने, बांध मार बहुविधि करे।
घरसे निकारे वन विहारे, बैर तो न तहां धरे॥
तू कर्म पूरब किये खोटे, सह क्यों नाहीं जीवरा।
अति क्रोध अग्नि बुझाय प्राणी, साम्य जल ले सीचरा ॥१॥
इति उत्तमक्षमा धर्मार्थाय नमः।
उत्तम मार्दव ।
उत्तमगुणपहाणो उत्तम तव परण करण सीलोवि।
अप्पायो जो हो लदि मद्दव रयण भवे तस्स॥
अर्थात्—जो उत्तम ज्ञानमें प्रधान और उत्तम तपश्चरण करनेमें समर्थ होनेपर भी अपने आत्माको मानकल्पनासे मलिन नहीं करते हैं उनके उत्तममार्दव धर्म होता है। (स्व० का० अ०)
भावार्थ—(निर्गृणी, दीन, दरिद्री, अशक्त, अज्ञानी, हीन, कुलजातिवाला, कुरूप, चारित्रहीन पुरुष यदि विनय (नम्रता) धारण करते हैं तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, क्योंकि उनको तो दबना ही पड़ता है या वे दबाये जाते ही हैं। सो उनके ऐसा करनेसे वे
१२ श्रीदशलक्षण धर्म।
कुछ मार्दव गुणके धारी नहीं कहे जाते। क्योंकि उनकी यह विनय व नम्रता स्वाभाविक नहीं है किन्तु दबाव व लाचारीकी है। वे अवसर पाकर पुनः मस्तक उठाकर चलने लगते हैं।
परन्तु जो उत्तम ज्ञानवान्, तपस्वी, ऐश्वर्यवान्, समर्थ, बलवान्, रूपवान्, कुलवान्, उत्तम जातिवान तथा धनवान होते हुये भी इनका मान नहीं करते और यथायोग्य विनय व शिष्टाचाररूप प्रवर्तन करते हैं अर्थात् नहीं (जो ज्ञान चारित्र दीक्षा पद व वयमें वृद्ध हैं) की विनय भक्ति और छोटोंमें दया व मृदुभाव रखते हैं और अपने आत्माको मानकषायसे मलिन नहीं होने देते हैं वे ही उत्तम मार्दव धर्मचारी कहे जाते हैं। क्योंकि कहा है—
मृदोर्भावः इति मार्दवः अर्थात्—मृदु (नम्र) भावोंका होना सो ही मार्दव धर्म है। उत्तम अर्थात् सच्चा कि जिसमें दिखावट या बनावट न हो, ऐसा उत्तम मार्दव धर्म आत्माहीका निजस्वभाव है। यह गुण आत्मासे, मान कषायके क्षय, उपशम वा क्षयोपशम होनेसे प्रगट होता है—अर्थात् जबतक किसी जीवको मानकषायका उदय रहता है, तबतक वह प्राणी अपने आपको सर्वोच्च मानता और दूसरोंको तुच्छ गिनता हुआ, सबको अपने आधीन बनानेकी चेष्टा करता रहता है और जो कोई उसे नमस्कार व प्रणाम आदि शिष्ट व्यवहार नहीं करता है वा इससे मध्यस्थ अथवा विद्रोही होकर रहता है, तो वह उसे देख नहीं सकता तथा सदैव उसे नीचा दिखानेका विचार और उपाय किया करता है। यद्यपि कि वह अपने बलपौरुषको न विचारकर अपनेसे सबलका भी सामना कर बैठता है और बंदी हो
उत्तम मार्दव । [१३
जानेपर भी वह अपनेको नम्रतासक न करके नप्रायः होजाता है, इसीको मान कषाय कहते हैं।
इस कषायके उदय होते हुए विचार-शक्ति कम हो जाती है।
देखो, लंकाधिपति प्रतिज्ञादेव दशानन (रावण) जब सीताको हर लाया और जब मंदोदरी आदि समस्त स्वजनोंने उसे समझाया कि सीता रामचंद्रको पीछे दे दो और अपने पवित्र कुलमें परस्त्री रूपी मल न लगाकर सुखपूर्वक राज्य करो या बनमें जाकर तपश्चरण करो। इसीमें हित है, तब उसने यही उत्तर दिया कि—
“जानि है कायर मुझे नृपगण सभी संग्रामसे;
तासे लड़ना है मुझे पुन बांधके अब रामसे।
जीतकर अब सिया प्यारी जु उनके प्राणसे;
यद्यपि होय मेरा विश्वमें बेशक सियाके दानसे॥”
अर्थात्—तब स्वमित्रगणोंको विदित होगया है कि रावण सीताको हर लाया है और राम लक्ष्मण युद्धके लिये भी आगये हैं सो यदि मैं सीताको अभी रामके पास पहुँचा दूँ, तो क्षत्रियगण मुझे कायर समझकर हास्य करेंगे, इसलिये मैं रामचंद्र लक्ष्मणको युद्धमें जीतकर, सीता और उनके साथ बहुतर्रा द्रव्य देकर उन्हें विदा कहूँगा। किन्तु इस समय तो सीताको न भेजकर केवल युद्ध करना ही अभीष्ट है इत्यादि। और इस प्रकार उस महापुरुषने अन्त तक—पाल जाते हुए भी अपने प्रणको नहीं छोड़ा तथा वीरभूमि (रणक्षेत्र) में ही मृत्युको प्राप्त हुआ।
इसीलिये संसारमें मानी पुरुषोंको लोग रावणकी उपमा देकरः
श्रीदशलक्षण धर्म।
कहा करते हैं कि देखो-
“इक लख पूत सवा लख नाती।
ता रावण घर दिया न बाती ॥”
तात्पर्य—गर्व (मान=अहंकार) मत करो, त्रिखण्डी रावणका भी मान नहीं रहा है तो औरोंकी क्या बात ? इत्यादि।
सो जब इस प्रकारके मान कर्मका क्षय या उपशम होता है, तभी आत्माका मार्दव नामक स्वाभाविक गुण प्रगट होता है।
इस गुणके प्रगट होते हुए जीव अपने सिवाय अन्य समस्त जीवोंको अपने समान समझता है, तब उसे किसीसे रागद्वेष नहीं होता। वह विचारता है कि सब जीव समान हैं, कोई कम-बढ़ नहीं है। और जब कोई कम-बढ़ है ही नहीं, तब मैं जिनको आधीन करना चाहता हूँ, जिनको मैं अपमानित करना चाहता हूँ, जिन्हें आज्ञाकारी बनाकर नमस्कार कराना चाहता हूँ, वे सब मेरे ही समान हैं। फिर समान समानमें अधिकारी और अधिकृत भाव कैसा? और तू जो अभी अपने आपको बड़ा समझता है, सो जब नरक-पशु आदि गतियोंमें, हीन सेवक देवोंमें व नीच गोत्रीय मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ था, तब वह तेरा बड़प्पन कहाँ चला गया था? तू सैकड़ों-बार क्या जलहंसार्व बार नरक निगोदमें गया, एक पाईकी माखी-खरीदनेवालेके यहाँ रूकरूपमें चला गया, मैलका कीड़ा हुआ, तब तेरा बड़प्पन कहाँ चला गया था?
आज जो तूने यह उत्तम कुल, वल, ऐश्वर्य या रूपादिक पाये हैं, यह सब तेरे पूर्वोपार्जित शुभ कर्मोंका ही फल है सो कर्म अपनी
उत्तम मार्दव।
स्थिति पूर्ण करके निर्र्जर जायेगा, तब मेरा यह सब विनय लुप्त हो जायगा। क्योंकि कहा है-
“सदा न फूलै केतकी, सदा न श्रावण होय।
सदा न यौवन थिर रहै, सदा जियत नहिं कोय ॥”
अर्थात्—जिन कारणोंसे तू अपने आपको बड़ा मान रहा है, वे सब कारण एक दिन नष्ट होजायेंगे। क्योंकि प्रकृतिका ऐसा ही नियम है। कार्तिकेयस्वामीने भी कहा है-
“जम्मं मरणेण सग्गं, संपज्जइ जुव्वणं जरा सहिया।
लच्छी विणास सहिया, यह सव्वं खणभंगुरं मुणह ॥”
अर्थात्—जन्मके साथ मरण, यौवनके साथ बुढ़ापा और लक्ष्मीके साथ दरिद्रता लगी हुई है। इसलिये ये सब क्षणभंगुर (विनाशवान्) जानने चाहिये।
जब संसारके सर्व ही पदार्थ (पर्याय अपेक्षा) विनाशवान् हैं, तो फिर मान किस बातका ? देखो, शरीरका बल और सौन्दर्य बुढ़ापा आते ही नष्ट होजाते हैं, सब इन्द्रियाँ शिथिल होजाती हैं जिससे वे अपने अपने विषयको ग्रहण कर नहीं सकतीं।
यौवन था तब रूप था, थे ग्राहक सब लोय।
यौवन रत्न गुमो पुन:, बात न पूछे कोय ॥
इसलिये कभी तुम जो रूप सौन्दर्य आदिके मदसे अपनी तरुणअवस्था में औरोंका हास्य व निन्दा करते हो सो वे भी तुम्हारी जरावस्था होनेपर तुम्हें हँसेंगे तब तुम्हें बहुत दुःख होगा और तुम्हारा मान गल जायगा, जिससे तुमको क्रोध उत्पन्न होनेसे तुम्हारा रहा सहा
श्रीदशलक्षण धर्म।
आनन्द भी जाता रहेगा और तुम शक्तिहीन होनेसे किसीका कुछ कर भी न सकोगे। प्रायः निर्बलोंको क्रोध बहुत होता है क्योंकि वह क्रोधवश किसीको मनोमुकुल दंड नहीं दे सकता है, ताड़न तर्जन नहीं कर सकता है अर्थात् अपना बदला नहीं ले सकता तब स्वयं अपने आपका घात कर बैठता है। इसलिये ऐसे रूप सौन्दर्य बला-दिका मान करना क्या यथार्थ है ? कभी नहीं।
यदि कर्मके क्षयोपशमसे कदाचित् तुमको कुछ भी ज्ञानका प्रकाश हुआ है, तो उसका मान मत करो, क्योंकि संसारमें तुमसे भी अधिक अनेकों ज्ञानी भी रह रहे हैं सो यदि तुम इस तुच्छ क्षायोपशमिक ज्ञानका मान करते हो, तो तुम उस ऊँटके समान हो, जो अनेकों संसारमें सबसे बड़ा मानता है, किंतु जब पहाड़की तलहटीमें पहुँचता है, तो उसका मान भंग होजाता है, उसे हार मानना पड़ती है और भूल स्वीकारना पड़ती है कि मैं सबसे बड़ा नहीं हूँ किंतु मुझसे और भी बड़े पदार्थ संसारमें हैं।
सो प्रथम तो यह क्षायोपशमिक ज्ञान है इसका घटना बढ़ना भी संभव है। दूसरे वह ज्ञान इन्द्रियाधीन है सो इन्द्रियोंकी शक्ति कम होनेसे स्वयमेव कम होजाता है, इसीसे यह पराधीन और परोक्ष कहाता है। इसलिये जो तुम इसका मान करोगे, तो इन्द्रियोंकी शक्ति कम हो जानेपर ज्ञानमें न्यूनता व विपरीतता होनेसे तुम दस-रोंकी दृष्टिमें हीन जीव जाओगे, हँसीके पात्र बन जाओगे, लोग तुम्हारी युक्तियोंको अयुक्ति ठहरावेंगे और तुम्हारे वचनोंको अप्रमाण समझेंगे, तब तुम्हें घोर दुःख होगा और उस समय तुम मानके
उत्तम मार्दव।
बधती होकर हठालु अपने असत्य वचनोंकी भी सत्य सिद्ध करनेकी चेष्टा करेगा। जैसा कि बहुतसे आधुनिक पैंडित पूर्वीय तथा पश्चिमी विद्याके अभ्यासी स्ववचन पोषणार्थ अनेकों कुयुक्तियाँ लगाकर ज्यों-लों स्वपक्ष मंडन और परपक्ष खंडन कर डालते हैं जिससे लोकमैं असत्य वचनकी प्रवृत्ति हो जाती है और अनेकों मिथ्या मत संसारमें चल जाते हैं जिनमें भोले प्राणी फँस अपने आत्माका अकल्याण कर बैठते हैं। इसलिये ऐसे क्षयोपशमिक, पराधीन तथा अल्पज्ञानका मान करना वृथा है।
देखो, जो कोई अल्पज्ञानका मान करता है और दूसरोंको अज्ञानी समझता है, वह सदा अज्ञानी ही बना रहता है; उसके ज्ञानकी वृद्धि कभी नहीं होती है। क्योंकि कहा है-
“विनय विना विद्या नहीं, विद्या विन नहीं ज्ञान।
ज्ञान विना सुख नहीं मिले, यह निश्चय कर जान।।”
इसलिये ज्ञानवृद्धिमें भी विनय प्रधान है और मान हानिकारक है।
यदि पूर्ण पुण्यवशात् कुछ ऐश्वर्य-अधिकार, पूजा, प्रतिष्ठादि प्राप्त हुआ है तो उसके मदमें आकर स्वच्छंद भवतेना अच्छा नहीं है। क्योंकि अभिमानीके सम लोग निष्कारण ही शत्रु बनजाते हैं, जिसमें फिर अभिमानी-अधिकारिका तो कहना ही क्या है? कारण उसका सम्बन्ध बहुतोंसे रहता है और जिस जिससे सम्बन्ध रहता है वे सभी उसके अभिमानसे पीड़ित (दुःखी) रहते हैं। और अवसर देखते रहते हैं कि कब इससे प्रबल पुरुषका समागम मिलाकर इसका मानभंग करावें और बदला लेवें इत्यादि।
श्रीदशलक्षण धर्म।
यहाँतक कि कभी कभी बहुतसे मनुष्य अपने अधिकारियोंसे अप्रसन्न हो विपक्षा दलमें मिलकर अपनी २ मनोकामनाएँ सिद्ध करते हैं। विभीषणको देखो, कि जब रावणने उसका अपमान किया, तो वह चार अक्षौहिणी सेना सहित आकर रामचन्द्रसे मिल गया और अपने भाईको मरवा डाला। इसीसे यह कहावत चरितार्थ हुई, कि “घरका भेदी लंका ढाए।”
फिर भी यह ऐश्वर्य सदा नहीं रहेगा, बल क्षीण होते ही क्षीण हो जायगा, तब जिन्हें तुम तुच्छ समझते थे, ऐश्वर्यभिमानी हुए दूसरोंके खुल दुःख हानि लाभको नहीं देखते थे, तथा मनमानी आज्ञा चलाते थे सो वे ही मनुष्य तुमको अधिकार-भ्रष्ट देखकर प्रसन्न होंगेगे, तुमसे घृणा करेंगे और शासक तुम्हारा अपमान और निंदा करनेमें कसर न करेंगे। देखो, रावणको मेरे हजारों वर्ष होगये हैं तब भी मातःकाल कोई उसका नायकत्व नहीं लेता। इसलिये ऐश्वर्यभिमान करना भी वृथा है। कहा है-
“दिन दश आदर पायके, करले आप बखान।
जवलग काक श्राद्ध पक्ष, तवलग तुम सन्मान।।”
तात्पर्य-ऐश्वर्य सदा स्थिर नहीं रहता है। वह भी बल और बुद्धिक तथा द्रव्यके आश्रित है; इसलिये उसका अभिमान करना भी व्यर्थ है।
यदि कुल (पितापक्ष) वा जाति (मातापक्ष) का अभिमान करते हो तो भी भूल है; क्योंकि कुल व जाति पूर्व कर्मसे प्राप्त हुए हैं। यदि ऐसा मानों तो वर्तमानमें दुःखेरा इसमें पुरुषार्थ ही तथा है,
उत्तम मार्दव।
जो इनका मान करते हो! यदि मान करोगे और दूसरोंको तुच्छ गिनोगे, तो नीचगोत्र कर्मका आस्रव करके नीच कुलमें चले जाओगे। तब फिर उपासना कहाँ रहेगा जैसा कि श्रीसद्गुरुस्वामिनीने कहा है-
परनिंदात्मप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावनै च नीचैर्गोत्रस्य।
अर्थात्-परई निंदा और आत्म-प्रशंसा करने तथा अन्यके गुणोंको आच्छादन करने व अवगुणोंको प्रगट करनेसे नीचगोत्र कर्मका आस्रव होता है।
और यदि पुरुषार्थ (उच्च आचार विरने) से कुल व जाति उच्च होती है, ऐसा मानते हो, तो फिर हरकोई अपने उच्च आचार विचारोंसे उच्च बन सकता है। तब मैं ही उच्च हूँ ऐसा मान करना व्यर्थ है और एक बात यह भी है कि उच्च कुल जाति-धारी महान् पुरुष कभी अपने आपको उच्च कहकर हलके नहीं बनते हैं। जैसा कहा है-
“बड़े बड़ाई ना करे, बड़े न बोले बोल।
हीरा मुँहसे ना कहे, बड़ा हमारा मोल।।”
लोकमें स्वप्रशंसा करनेवाला मनुष्य नीचातिनीच समझा जाता है और यह ठीक भी है क्योंकि नीच उपासना तो मनुष्योंके आचरण व विचारोंसे अपने आप ही प्रगट होजाता है।
मानलो; कोई मनुष्य भाषण मा क्षत्रिय, वैश्यके घरमें उत्पन्न होकर हिंसा करे, झूठ बोले, चोरी करे, व्यभिचार करे, न्यायान्याय रहित हुआ यथार्थता भोगादि पदार्थोंके महानमें: तृष्णावान् रहे, शस्य. मांस:भक्षण करे; जुआ खेले, इत्यादि और भी कुसित कार्य करे,
श्रीदशलक्षण धर्म।
अथवा ऐसे ही हीनाचारी, व्यसनी, पापी लोगोंका संग करे, तो क्या फिर भी वह उच्च गोत्री रह सकता है ? नहीं कभी नहीं, कभी नहीं। वह नीच, शूद्रोंसे भी महा नीच होजाता है।
और यदि कोई शूद्र, हिंसादि पाप नहीं करता है, झूठ चोरी व्यभिचार आदि पाप व व्यसन नहीं सेवन करता है, न्यायानुकूल योग्य आजीविका करके संतुष्ट रहता है, मद्यमांसादि निंद्य अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाता है, सदा भले मनुष्योंकी संगतिमें रहता है, तो क्या वह नीच ही कहा जासकता है ? नहीं, कदापि नहीं। संसारमें जीव मात्रको अपनी उन्नति करनेका स्वाभाविक अधिकार प्राप्त है। उच्च नीचपणा किसीकी पैतृक सम्पत्ति नहीं है। जीव स्वकृत कर्मसे उच्च नीच होसकता है, इसलिये उच्च बननेके लिये उच्चाचरण व उच्च विचार बनाना आवश्यक है, किंतु गर्व करना व्यर्थ है।
जब यदि धनका मद करते हो, तो प्रत्यक्ष देखते हुए भी अंधेके समान हो, क्योंकि तुम जानते हो कि यह लक्ष्मी अति चंचल स्वभाव है। पुण्यकी दासी है। इसे पुरुषविशेषसे प्रेम नहीं है। जैसे वेश्या धनवालेसे प्रेम करके जहांतक उसके पास धन रहता है, दिखाऊ प्रीति बताते हुए संपूर्ण धन हरणकर अपने उसी प्रेमीको छोड़ देती है, वैसे ही लक्ष्मी पुण्य क्षीण होनेपर पुरुषको छोड़ जाती है। वह नीच, उच्च, मूर्ख, विद्वान्, कुरूप, सुरूप, सबल, निर्बल, किसीपर दया नहीं करती, न प्रेम ही रखती है। वह तो केवल पुण्यवानसे ही प्रेम रखती है, जैसे कि वेश्या धनवालेसे। देखो ! किसी समय एक पुरुषने अपनी स्त्रीको लक्ष्मी कहकर संबोधन किया था, उसपर
उत्तम मार्दव।
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उस स्त्रीने दुःखित होकर अपने पतिसे निम्न प्रकार प्रश्न किया और जिससे वह पुरुष लज्जित होकर निरुत्तर होगया था। वह पूछती है—
जाऊँ कहूँ न रहूँ घरमें, सहूँ दुःखरूप सौख्य सबहि कठिनाई।
नीचन ऊँचनके वश (लक्ष्मी) जात है, आवत जात न नेक लजाई ॥
मेरे हे देखत गृह कितके घर मैं न दियो पग धौर पराई।
कारण क्या कुछ लेश पिया, जाते शुचि सिन्धुसुता (लक्ष्मी) ठहराई ॥
तात्पर्य—ऐसी चंचल लक्ष्मीका मान करना व्यर्थ है।
यदि अपने तप, व्रत, संयम आदिका मान करते हो, तो तुम्हारे जैसा मूर्ख संसारमें और कोई भी नहीं है, क्योंकि तुम आत्मकल्याणके कारण तपको बड़ाई पानेकी तुच्छ इच्छासे नष्ट कर देते हो अर्थात् जिस जप, तप, व्रत, संयमसे स्वर्ग मोक्ष प्राप्त होता उसे केवल मान बड़ाईमें ही बेच देते हो और जब निरंतर तुम्हें अपने तप संयमके मानका ही ध्यान बना रहता है तब तुम तप संयम व आत्मध्यान कब करते हो या करोगे ? जब तप ही नहीं करते हो तो केवल कपट भेष बनाकर लोगोंको और अपनी आत्माको ठगते हो। ऐसा तप करना व्यर्थ है, जिसमें मान पुष्ट किया जाय। क्योंकि तप तो इच्छाओंके रोकनेको कहते हैं जैसा कि कहा है—“इच्छानिरोधस्तपः” और तुम तो निरंतर मान पानेकी इच्छा में ही मग्न रहते हो इसलिये तपका मद करना भी व्यर्थ है। इसप्रकार विचार कर उत्तम पुरुष मान कषायको छोड़कर अपना स्वाभाविक मार्दव गुण प्रगट करते हैं।
इस मार्दव गुणसे आत्मिक—स्वाभाविक सुख तो मिलता ही है, किन्तु लौकिक सुख भी मिलता है। प्रकटरूपें नम्र—विनयका कोई
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श्रीदशलक्षण धर्म।
शत्रु नहीं, और मानीका कोई मित्र नहीं होता है। देखो, हाथीके झरोरोंसे बड़े बड़े मोटे और कठोर वृक्ष मूल सहित उखड़ जाते हैं परंतु नम्र होनेसे पत्ता भी वैद्यका वृक्ष हाथीसे कभी नहीं उखड़ता किन्तु वह अपने विनय गुणसे वैसा ही बना रहता है। कहा है—
कोई न भीत कठोरको, मृदुको कोई न अराव।
इसलिये अन्तरङ्ग मान कषायको त्याग करना और व्यवहारसे अपनेसे कुल, वय, पद, विद्या, गुण, चातुर्य, तप, ज्ञान, चारित्र आदिमें जो बड़े हैं उनका यथायोग्य विनय सुश्रूषा (सत्कार) करना तथा छोटोंमें दया प्रेम व नम्रता रखना, और अविनयी व विरोधी पुरुषोंमें माध्यस्थ्यभाव रखना, यही मार्दव गुण है। कभी अपने मुँहसे स्वप्रशंसा नहीं करना और न कभी परनिंदारूप निंद्य वाक्य कहना यही विनयका लक्षण है। अपनेसे बड़ोंको नमस्कार करना, उपवासन देना, समक्ष होकर नहीं बोलना, उनकी आज्ञा मन, वचन, कायसे यथाशक्ति पालन करना, वे बोलें तो उनके पीछे पीछे चलना, उनके गुणोंकी प्रशंसा करना, उनके अवगुणोंका अनुकरण करना, उनके द्वारा अपने ऊपर हुए उपकारको नहीं भूलना, इत्यादि विनय है। प्रसंगावश यह भी लिख देना उचित है कि किसका किसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये ? यथा—
नमोऽस्तु गुरवे कुर्वर्दिना ब्रह्मचारिणे।
इच्छाकारं सधर्मिभ्यो वंदामीत्यादिकादि ॥ १-॥
श्राद्धाः परस्परं कुर्वैः इच्छाकारं सभावतः।
सुहावरुति लोकिसमस्कारं स्वत्स्वजनः ॥ २ ॥
उत्तम मार्दव।
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योग्योपायनैरष्टधा कुर्वन्ति विनयवादिनो।
विद्यातपोयुगेः श्रद्धां लघुत्वमपि गुरुमतः ॥ ३ ॥
श्रावकानां मुनीन्द्रा हि धर्मश्रद्धि ददत्यहो।
अन्येषामपि प्रकृतानां च धर्मलाभ मतः परैः ॥ ४ ॥
आर्यिका तद्वदेत्पात्रं पुण्यवृद्धिं च वर्णिणः।
दर्शनविशुद्धिं प्रायः रुचिदेतन्मतान्तरम् ॥ ५ ॥
अर्थात्—दिगम्बर निर्मन्थ साधुओंको आदरग नमस्कार और
आर्यिका तथा ब्रह्मचारीजनोंको दोनों हाथ मस्तकसे छुआकर शिरोनति
करता हुआ वंदना करे। तथा साधर्मी, साधर्मी परस्पर इच्छाभि
(इच्छाकार) करे। श्रावकजन भी परस्पर जुहारु करें अथवा अपनेसे
बड़ोंको प्रणामादि करें और छोटोंको आशीर्वाद देवें। इस प्रकार
यथायोग्य व्यवहार करें। मुनि तथा आर्यिकाजी श्रावकोंको धर्मश्रद्धि
और अजैन (श्रावकेतर) जनोंको धर्मलाभ कहें। इसी प्रकार ब्रह्मचारी
श्रावकोंको पुण्यवृद्धि अथवा दर्शनविशुद्धि और जैनेतर जनोंको पाप
क्षयोपशम आदि कहकर आशीर्वाद देवें। यही शिष्टाचार व्यवहार
है। इसलिये सब मदोंको छोड़ स्वाभाविक और उभय लौकिक सुख
देनेवाले ऐसे उत्तम मार्दव धर्मको धारण करना चाहिये इसीमें हित
है। सो ही कहा है—
मान महा विषरूप, करे नीच गति जगतमें।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावे प्राणी सत ॥ १ ॥
उत्तममार्दव गुण मणि माना, मान करनका कौन ठिकाना।
बसो निगोद माहिसे आया, दमरी रूकन भाग विकाया ॥
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श्रीदशलक्षण धर्म।
रुंकन विकाया कर्मवशते, देव इक इन्द्री भया।
उत्तम युवा चण्डाल हुवा, भूप कीचड़में गया ॥
जीवत्यो यौवन धन गुणवान, कहा करे जल बुदबुदा।
कर विनय षट्गुण बड़े जनकी, ज्ञानको पावे सुधा ॥ २ ॥
उत्तम आर्जव।
जो चित्तेण ण वक्के कुणादिण वेक्के ण जएण वंके।
ण य गोवदिइंदियदोसे अजव धम्मो हवे तस्स ॥
अर्थात्—जो न तो वक्र (कुटिलता मायाचाररूप) चितवन
करता है, न वक्र कार्य करता है और न वक्रता लिये वचन ही
बोलता है, तथा अपने दोषोंको नहीं छिपाता है, उसीके उत्तम
आर्जव धर्म कहा जाता है। तात्पर्य—मन, वचन, काय और वचनोंमें
जिसके सरलता हो अर्थात् जो मनमें ही वही करे और वही कहे
तथा अपने दोषोंको न छिपाकर स्वीकार करे, वही आर्जवधर्मधारी
महापुरुष कहा जाता है और उसके दोष दूर होकर वह शीघ्र ही
एक पवित्र आत्मा होजाता है। सो ही आगे आर्जव धर्मका भाव कहते
हैं। तथा— (स्वा० का० अ०)
ऋजोर्भावः इति आर्जवः अर्थात्—सरल भावको आर्जव भाव
कहते हैं। उत्तम विशेषण है, अर्थात् जिन भावोंमें किंचित् भी
छल-कपट, दिखावट, वनावट व मायाचारी न हो वे ही भाव आर्जव
भाव कहलाते हैं। ये भाव आत्माके निजस्वभाव ही हैं जो कि माया
कषायके क्षय व उपशम होनेसे प्रकट होते हैं।
[ २५
उत्तम आर्जव।
जिस समय जीवके मन, वचन और काय ये तीनों योग वक्रता—
मायाचार रहित सरल होते हैं, अर्थात् जो कुछ मनमें विचार हो उसे
ही वचनसे प्रकाश करना और वचनसे जो कुछ प्रकाश किया हो,
वही कायसे करना इसीको आर्जव नाम आत्माका स्वभाव कहते हैं।
किन्तु जिस समय यह जीव निज आत्मबुद्धि अर्थात् अपने
आत्मामें ही आत्म भावनासे रहित हुआ, आत्मबुद्धि परपदार्थोंमें
स्वात्म भाव धारण कर प्रवर्तता है, तभी यह अपने इच्छित मनोकुल
विषयों वा कषायोंकी पुष्ट्यर्थ नाना प्रकारकी कुचेष्टाएँ करता है।
अर्थात् मनमें कुछ और विचारता है, वचनसे कुछ और प्रगट करता
है तथा कायसे कुछ अन्य ही आचरण करता है। तब इसके अंतरंग
भावोंका भेद, सिवाय केवलज्ञानी व मनःपर्ययज्ञानीके और कोई भी
नहीं जान सकता। इसे ही अर्थात् ऐसे ही भावोंको माया कषाय कहते हैं।
यद्यपि मायाचारी पुरुष प्रायः ऊपरसे मीठे भाषण करता है,
सौम्य आकृति बनाता है, अपने आचरणोंसे लोगोंको विश्वास उत्पन्न
कराता है और अपने प्रयोजन साधनासे विपक्षीकी भी हानि हो भी
मिला देता है परन्तु अवसर पाते ही वह अपने मन जैसी कर देता है।
इसका स्वभाव ठीक बगुलेके सरीखा होता है—अर्थात् जैसे बगुला
पानीमें एक पाँवमें खड़ा होकर नासाग्र दृष्टि लगाता है और मछली ज्यों
ही उसके पास सासु समझकर आती है त्यों ही वह छद्मवेषी
झटसे उन्हें पकड़ कर भक्षण कर लेता है। कहावत है कि—
उज्ज्वल बर्णो गरीब गति, एक टाँग मुख ध्यान।
देखत लागत भगवतवत, निपट कपटकी खान ॥ १ ॥
श्रीदशलक्षण धर्म।
[२६]
मायाचारी कभी सत्य तो बोलता ही नहीं है और यदि कदाचित् कदाचित् वह कुछ सत्य भी कहे, तो भी उसका कहना असल ही समझना चाहिये और कदापि उसका विश्वास नहीं करना चाहिये और प्रायः कोई करते भी नहीं हैं।
यद्यपि वह अपने दोषोंको पूर्णरूपसे ढंकता है तो भी उसका कपटमेव अंतमें प्रकट हो ही जाता है और कपटमेव प्रगट होते ही फिर कोई उसका विश्वास नहीं करते हीं।
यद्यपि कुछ समय तक लोग बिना जाने उसके पल्लेमें गले ही फँसे रहें और वह भी अपने आपको कृतकृत्य समझले, पर जैसे कि मिट्टीसे अच्छादित नंदीसे पानीके भीतर मिट्टी गलकर छूटते ही ऊपर आ जाती है, वैसे ही कपट मेव भी बहुत समय तक नहीं छिप सकता।
मायाचारीका विश्वास लोकमेंसे उठ जानेपर उसका समस्त व्यवहार बंद होजाता है, जिससे उसे अत्यन्त दुःखी होना पड़ता है।
मायाचारी मनुष्यको कभी भी शांति नहीं मिलती, वह सदा ही उपद्रवमें लगा रहता है। किसीका चुरा करना, किसीको लड़ाना, किसीकी चुगली खाना, किसीका अपमान व पराजय कराना इत्यादि। तास्वर्य-उसे कभी सुख-नींद नहीं आती। वह निरंतर चिन्ताग्रस्त रहता है और चिन्तावानको सुख कहाँ ?
मायाचारी आप तो दुःखी रहता ही है किन्तु अन्यको दुःखी करनेमें भी हर्ष मानता है। वास्तवमें ऐसे लोग शत्रुसे भी भयंकर होते हैं क्योंकि शत्रु तो प्रगट रूपसे घावा करके मारता है, इसलिये उससे तो हम सदा शंकित. अर्थात् सावधान रहनेके कारण किसी
उत्तम आर्जव।
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प्रकारसे भी अपनी रक्षा कर सकते है परन्तु इन मीठे बोलनेवाले अस्तीनके सांपों सरीखे मायाचारियोंसे बचना तो बहुत कठिन तो क्या असंभवसा ही है। कहा है-
'अरकरिया (करोत) के मुख नहीं, नहीं गोंगके देत।
जे नर धीरे बोलते, इनसे बचिये संत" ॥ १ ॥
क्योंकि ये लोग सदा मीठी मीठी बातोंमें अंतरंगका हाल जानकर बाहिर प्रगट कर देते हैं। वे कभी किसीसे मित्रता तो करते ही नहीं हैं। ये लोग तो जहां अपना मतलब होते देखते है कि झटसे वहीं जा मिलते हैं। इनके वचनकी स्थिरता तो होती ही नहीं है। शठ बोलनेका तो इनका स्वभाव ही पड़ जाता है अथवा शठ बोलनेमें ये पाप ही नहीं समझते है, इसलिये सदा ऐसे लोगोंसे बचते रहना ही ठीक है।
ये लोग अपने प्रयोजन साधनाथे व कौतुकवशा दूसरोंको घात पहुँचानेकी चेष्टा करते रहते है, परन्तु औरोंका घात तो उनके पूर्वकृत कर्मानुसार होवे अथवा नहीं ही हो, किन्तु मायाचारीका घात उसके. परिणामसे तो सदा हुआ ही करता है। जैसे वर्णमें मुँह देखनेपर जैसा टेढ़ा सीधा करके देखो वैसा ही दिसने लगता है; ठीक, वही हाल मायाचारियोंका होता है। जो औरोंके लिये कुआ खोदते हैं, 'उसमें वे आप ही अनायस गिर जाते हैं। कहा है-“जो कोई कूप खने औरनको, ताको खाई तयार।” सत्य है ओसका मोसी कब तक स्थिर रहता है ?
एक समय एक कौआ, मोरोके पंख, पहिन कर अपने आपको
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3099.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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