इस अध्यात्म ग्रन्थ में इष्ट आत्मा के स्वरूप का परिचय प्रस्तुत किया है। 51 श्लोकों में पूज्यपाद स्वामी ने अध्यात्म को गागर में सागर भर देने की कहावत चरितार्थ की है। ईसा की छठवीं शताब्दी में रचित इस ग्रन्थ में संसार की यथार्थ स्थिति का परिज्ञान प्राप्त होने से राग-द्वेष, मोह की परिणति घटती है। इस लघुकाय ग्रन्थ में समयसार की गाथाओं का सार अंकित किया गया है। शैली सरल और प्रवाहमय है।
मंगलाचरण
यस्य स्वयं स्वभावाप्तिरभावे कृत्स्नकर्मणः ।
तस्मै सञ्ज्ञानरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥१॥
अर्थ : (यस्य) जिस भगवान् के ( कृत्स्नकर्मणः ) समस्त कर्मों का (अभावे) अभाव हो जाने पर (स्वयं) अपने आप (स्वभाव आप्तिः ) स्वभाव की प्राप्ति हो गयी है ( तस्मै ) उस (संज्ञानरूपाय ) अनन्तज्ञान स्वरूप (परमात्मने) परमात्मा के लिए ( नमः अस्तु) नमस्कार हो।
निमित्तोपादान से सिद्धि
योग्योपादानयोगेन दृषदः स्वर्णता मता । द्रव्यादिस्वादिसंपत्तावात्मनोऽप्यात्मता मता ॥२॥
अर्थ : (योग्य) योग्य ( उपादान) उपादान के (योगेन) मिलने से (दृषदः ) जैसे स्वर्णपाषाण की (स्वर्णता मता) स्वर्णरूपता मानी गई है, उसी तरह (द्रव्यादि स्वादि) सुद्रव्य, सुक्षेत्र, सुकाल आदि (सम्पत्तौ ) कारण रूप सामग्री के मिल जाने पर (आत्मनः अपि ) संसारी आत्मा की भी (आत्मता ) शुद्ध आत्म स्वरूप की प्राप्ति होना (मता ) माना गया है।
व्रतों की सार्थकता
वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वत नारकं ।
छायातपस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ।।३।।
अर्थ : (व्रतैः ) व्रतों के द्वारा (दैवं पदं) देवपद पाना (वरम्) अच्छा है। (किन्तु) (वत) खेद हैं! (अव्रतैः ) अव्रतों द्वारा (नारकं ) नरक में उत्पन्न होना (न) अच्छा नहीं है (हि) क्योंकि (छाया आतपस्थयोः ) छाया और धूप में स्थित व्यक्तियों के समान (प्रतिपालयतोः) प्रतीक्षारत पुरुषों में ( महान् भेदः) बड़ा भारी अन्तर है ।
शिव प्रद भावों से स्वर्ग सहज ही
यत्र भावः शिवं दत्ते द्यौः कियद् दूरवर्तिनी ।
यो नयत्याशु गव्यूतिं क्रोशार्धे किं स सीदति ? ॥४॥
अर्थ : (यत्र भावः) जहाँ भाव (शिवं दत्ते) मोक्ष को देता है [ वहाँ ] ( द्यौः ) स्वर्ग की प्राप्ति ( कियद्दूरवर्तिनी) कितनी दूर है ? ( यः गव्यूतिं ) जो मनुष्य दो कोश तक (आशु नयति ) भार को शीघ्र ले जाता है। (स) वह ( क्रोशार्धे ) आधा कोश ले जाने में (किं सीदति ) क्या दुःखी हो सकता है ? अर्थात् नहीं ।
स्वर्ग सुख का कथन
हृषीकज-मनातङ्कं दीर्घ-कालोपलालितम् ।
नाके नाकौकसां सौख्यं नाके नाकौकसामिव ॥५॥
अर्थ : ( नाके ) स्वर्ग में (नाकौकसाम् ) देवों का ( हृषीकजं ) इन्द्रियों से उत्पन्न (अनातङ्कं ) दुःख रहित और ( दीर्घकालोपलालितम् ) दीर्घकाल तक सेव्य (सौख्यं) सुख (नाके) स्वर्ग में (नाकौकसाम् इव) देवों के समान ही होता है।
इन्द्रिय सुख-दुःख भ्रान्ति मात्र
वासनामात्रमेवैतत् सुखं दुःखं च देहिनाम् ।
तथा ह्युद्वेजयन्त्येते भोगा रोगा इवापदि ॥६॥
अर्थ : (देहिनाम् ) संसारी जीवों के ( एतत् सुखं) ये इन्द्रिय सुख (च) और (दुःखं) दुःख (वासनामात्रं एव) भ्रम मात्र ही हैं ( तथा हि ) इसलिए (एते भोगाः ) ये इन्द्रियों के भोग ( आपदि ) आपत्ति के समय (रोगाः इव) रोगों की तरह (उद्वेजयन्ति ) व्याकुल करते हैं।
मोहावृत ज्ञान वस्तु - स्वरूप नहीं जानता
मोहेन संवृतं ज्ञानं स्वभावं लभते न हि ।
मत्तः पुमान् पदार्थानां यथा मदनकोद्रवैः ॥७॥
अर्थ : (मोहेन ) मोह से (संवृतं ज्ञानं ) ढका हुआ ज्ञान (स्वभावं ) आत्म स्वभाव को ( न हि लभते ) नहीं जान पाता (यथा) जैसे (मदन कोद्रवैः ) नशीले कोदों के खा लेने से ( मत्तः पुमान्) मूर्च्छित / बेखबर मनुष्य (पदार्थानां ) पदार्थों को ठीक तरह नहीं जान पाता।
मोही, पर पदार्थ को अपना मानता है
वपुर्गृहं धनं दाराः, पुत्राः मित्राणि शत्रवः ।
सर्वथान्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते ॥८ ॥
अर्थ ( वपुः गृहं ) शरीर, घर ( धनं दारा ) धन, स्त्रियाँ (पुत्राः मित्राणि) पुत्र, मित्र और (शत्रवः) शत्रु (सर्वथा ) सब तरह से (अन्यस्वभावानि ) अन्य स्वभाव वाले हैं परन्तु ( मूढः ) मोही प्राणी इन्हें (स्वानि प्रपद्यते ) अपना समझता है।
संसारी जीव का कुटुम्ब परिवार कैसा है ?
दिग्देशेभ्यः खगा एत्य संवसन्ति नगे नगे ।
स्वस्वकार्यवशाद्यान्ति देशे दिक्षु प्रगे प्रगे ॥ ९ ॥
अर्थ : (नगे नगे ) वृक्ष-वृक्ष पर ( दिग्देशेभ्यः ) दिशाओं और देशों से ( एत्य ) आकर (खगाः) पक्षी संध्या के समय (संवसन्ति) ठहर जाते हैं तथा (प्रगे प्रगे) प्रातः (स्वस्वकार्यवशात्) अपने-अपने कार्य के वश से (देशे दिक्षु) भिन्न-भिन्न देश, दिशाओं में (यान्ति) चले जाते हैं।
अहितकर के प्रति क्रोध व्यर्थ
विराधकः कथं हन्त्रे, जनाय परिकुप्यति ।
त्र्यङ्गुलं पातयन् पद्भ्यां स्वयं दण्डेन पात्यते ॥१०॥
अर्थ (विराधकः ) अपकार करने वाला मनुष्य (हन्त्रे जनाय) मारने वाले मनुष्य के लिए (कथं परिकुप्यति) कैसे क्रोध करता है (त्र्यङ्गुलं) तीन अँगुली वाले उपकरण को (पद्भ्यां ) पैरों के द्वारा (पातयन्) गिराया हुआ मनुष्य (स्वयं दण्डेन ) स्वयं लकड़ी के बेंत द्वारा (पात्यते ) गिराया (झुकाया)
संसार में जीव किस तरह घूमता है
रागद्वेषद्वयीदीर्घ - नेत्राकर्षण - कर्मणा ।
अज्ञानात्सुचिरं जीवः संसाराब्धौ भ्रमत्यसौ ॥११॥
अर्थ (असी) यह (जीव ) संसारी प्राणी ( संसार अब्धी) इस संसार समुद्र में (अज्ञानात्सुचिरं ) अज्ञान के कारण अनादिकाल से (रागद्वेषद्वयी दीर्घ- नेत्राकर्षण - कर्मणा ) राग-द्वेष रूपी दो लम्बी डोरियों के खींचने रूप कार्य से अर्थात् घुमायी जाती हुई मथानी की तरह ( भ्रमति) घूम रहा है।
कोई न कोई विपत्ति मौजूद ही रहती है
विपद्भवपदावर्ते पदिकेवातिवाह्यते ।
यावत्तावद्भवन्त्यन्याः, प्रचुरा विपदः पुरः ॥१२॥
अर्थ : (भव- पदावर्ते) संसाररूपी पैर से चलने वाले घटीयंत्र में (पदिका इव) रहट के डण्डे के समान ( यावत्) जब तक ( विपद् ) एक विपत्ति (अतिवाह्यते) समाप्त की जाती है (तावत्) तब तक (अन्याः प्रचुराः ) दूसरी बहुत सी (विपदः) विपत्तियाँ ( पुरः भवन्ति ) सामने आ खड़ी हो जाती हैं।
हर स्थिति में धन दुःखकर
दुरर्ज्येनासुरक्ष्येण नश्वरेण धनादिना ।
स्वस्थंमन्यो जनः कोऽपि ज्वरवानिव सर्पिषा ॥ १३ ॥
अर्थ : (दुरर्त्स्न्येन) बड़ी कठिनाइयों से कमाये जाने वाले तथा (असुरक्ष्येण ) सुरक्षित न रहने वाले (नश्वरेण) विनश्वर ( धनादिना ) धन पुत्रादिकों के द्वारा (स्वस्थं मन्यः ) अपने आपको स्वस्थ (सुखी) मानने वाला (कः अपि जनः ) कोई भी मनुष्य (सर्पिषा) घी के प्रयोग से ( ज्वरवान् इव) ज्वर से पीड़ित मनुष्य की तरह मूर्ख होता है।
संसारी प्राणी दूसरों का दुःख देखता है।
विपत्तिमात्मनो मूढः परेषामिव नेक्षते ।
दह्यमान - मृगाकीर्ण - वनान्तर - तरुस्थवत् ॥१४॥
अर्थ : (मृगाकीर्ण) मृग आदि जीवों से भरे तथा (दह्यमान ) अग्नि से जलते हुए ( वनान्तर) वन के मध्य (तरुस्थवत् ) वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य के समान (मूढः ) मूर्ख प्राणी ( परेषां ) दूसरे की ( विपत्तिम् इव) विपत्ति के समान (आत्मनः ) अपनी विपत्ति को (न ईक्षते) नहीं देखता है।
लोभी को धन इष्ट है
आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्ष हेतुं कालस्य निर्गमम् ।
वाञ्छतां धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनम् ॥१५॥
अर्थ : (कालस्य निर्गमम् ) समय का व्यतीत होना (आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्ष हेतुं ) आयु क्षय और धनवृद्धि का कारण है (वाञ्छतां धनिनां ) धन चाहने वाले धनवान् पुरुषों को (जीवितात्) अपने जीवन से भी (सुतराम् ) अधिक ( धनं इष्टम् ) धन इष्ट होता है।
त्याग के लिए संग्रह उचित नहीं
त्यागाय श्रेयसे वित्तमवित्तः सञ्चिनोति यः ।
स्वशरीरं स पङ्केन स्नास्यामीति विलिम्पति ॥ १६ ॥
अर्थ : ( यः अवित्तः ) जो निर्धन मनुष्य ( त्यागाय श्रेयसे ) दानरूपी पुण्य के लिए ( वित्तं सञ्चिनोति ) धन को संग्रहीत करता है ( सः ) वह ( मनुष्य ) ( स्नास्यामि ) मैं स्नान करूँगा ( इति ) इस विचार से ( स्वशरीरं ) अपने शरीर को ( पङ्केन विलिम्पति ) कीचड़ से लिप्त करता है।
हर स्थिति में भोग कष्टकर
आरम्भे तापकान् प्राप्तावतृप्तिप्रतिपादकान् ।
अन्ते सुदुस्त्यजान् कामान् कामं कः सेवते सुधीः ॥१७॥
अर्थ : ( आरम्भे ) प्रारम्भ में ( तापकान् ) सन्ताप देने वाले ( प्राप्तौ ) प्राप्त हो जाने पर ( अतृप्ति प्रतिपादकान् ) तृष्णा को बढ़ाने वाले तथा ( अन्ते ) अन्त में ( सुदुस्त्यजान् ) बड़ी कठिनाई से छूटने योग्य ( कामान् ) विषय भोगों को ( कः सुधीः ) कौन बुद्धिमान् पुरुष ( कामं ) रुचि से ( सेवते ) सेवन करता है।
अपवित्र शरीर की कामना व्यर्थ
भवन्ति प्राप्य यत्सङ्गमशुचीनि शुचीन्यपि ।
स कायः सन्ततापायस्तदर्थं प्रार्थना वृथा ॥१८॥
अर्थ : ( यत्सङ्गं प्राप्य ) जिसका संयोग पाकर ( शुचीनि अपि ) पवित्र पदार्थ भी ( अशुचीनि ) अपवित्र ( भवन्ति ) हो जाते हैं ( स कायः ) वह शरीर ( सन्ततापायः ) सदा क्षुधादि दुःखों का कारण है अतः ( तदर्थं ) उसके लिए ( प्रार्थना वृथा ) भोगों की कामना व्यर्थ है।
उपकारक/अपकारक
यज्जीवस्योपकाराय, तद्देहस्यापकारकम् ।
यद्देहस्योपकाराय तज्जीवस्यापकारकम् ॥१९॥
अर्थ : ( यत् जीवस्य ) जो कार्य आत्मा के ( उपकाराय ) उपकार के लिए है ( तत् देहस्य ) वह शरीर का ( अपकारकम् ) अपकार करने वाला है तथा ( यत् ) जो ( देहस्य उपकाराय ) शरीर के उपकार के लिए है ( तत् ) वह ( जीवस्य अपकारकम् ) आत्मा का अपकार करने वाला है।
विवेकी किसमें आदर करे
इतश्चिन्तामणिर्दिव्य इतः पिण्याकखण्डकम् ।
ध्यानेन चेदुभे लभ्ये क्वाद्रियन्तां विवेकिनः ॥२०॥
अर्थ : ( इतःदिव्य ) एक तरफ दिव्य ( चिन्तामणिः ) चिन्तामणि रत्न और ( इतः ) दूसरी तरफ ( पिण्याकखण्डकम् ) खली का टुकड़ा ( चेत् उभे ) यदि ये दोनों ( ध्यानेन लभ्ये ) ध्यान के द्वारा प्राप्त होते हैं तो ( विवेकिनः ) बुद्धिमान् मनुष्य ( क्व ) किसमें ( आद्रियन्तां ) आदर करें ?
आत्मा का स्वरूप
स्वसंवेदन सुव्यक्तस्तनुमात्रो निरत्ययः ।
अत्यन्तसौख्यवानात्मा, लोकालोकविलोकनः ॥२१॥
अर्थ : ( आत्मा ) आत्मा ( स्वसंवेदन-सुव्यक्तः ) आत्म-अनुभव द्वारा स्पष्ट प्रकट होता है/जाना जाता है ( तनुमात्रः ) शरीर के बराबर है ( निरत्ययः ) अविनाशी है ( अत्यन्त सौख्यवान् ) अनन्त सुख वाला है तथा ( लोकालोक-विलोकनः ) लोक और अलोक को जानने देखने वाला है।
आत्मध्यान करने का उपाय
संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वेन चेतसः ।
आत्मानमात्मवान् ध्यायेदात्मनैवात्मनि स्थितम् ॥२२॥
अर्थ : ( आत्मवान् ) जितेन्द्रिय पुरुष ( करणग्रामं ) इन्द्रिय समूह को ( संयम्य ) संयमित कर [पंचेन्द्रिय के विषयों से रोककर] ( चेतसः ) चित्त की ( एकाग्रत्वेन ) एकाग्रता से ( आत्मनि ) आत्मा में ( स्थितम् ) स्थिर होकर ( आत्मना एव ) अपने आत्मा द्वारा ही ( आत्मानं ) अपने आत्मा को ( ध्यायेत् ) चिन्तन करे।
जो है उसी का दान
अज्ञानोपास्तिरज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः ।
ददाति यत्तु यस्यास्ति सुप्रसिद्धमिदं वचः ॥२३॥
अर्थ : ( अज्ञानोपास्तिः ) अज्ञानी की उपासना/सेवा ( अज्ञानं ) अज्ञान को ( ददाति ) देती है ( ज्ञानिसमाश्रयः ) ज्ञानियों की उपासना/सेवा ( ज्ञानं ) ज्ञान को, ( तु ) क्योंकि ( इदम् वचः ) यह बात ( सुप्रसिद्धम् ) अच्छी तरह प्रसिद्ध है कि ( यस्य ) जिसके पास ( यत् अस्ति ) जो होता है, [उसी को वह] ( ददाति ) देता है।
आत्म-ध्यान का फल
परीषहाद्यविज्ञानादास्त्रवस्य निरोधिनी ।
जायतेऽध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरा ॥२४॥
अर्थ : ( अध्यात्मयोगेन ) अध्यात्म के योग से/चिन्तन से ( परीषहादि ) परीषह आदि का ( अविज्ञानात् ) अनुभव/ज्ञान नहीं होने से ( आस्त्रवस्य ) आस्त्रव ( निरोधिनी ) निरोध करने वाली ( कर्मणाम् ) कर्मों की ( निर्जरा ) निर्जरा ( आशु जायते ) शीघ्र होती है।
एकत्व में सम्बन्ध नहीं
कटस्य कर्त्ताहमिति सम्बन्धः स्याद् द्वयोर्द्वयोः ।
ध्यानं ध्येयं यदात्मैव सम्बन्धः कीदृशस्तदा ॥ २५ ॥
अर्थ : ( अहम् ) मैं ( कटस्य कर्त्ता ) चटाई का कर्ता हूँ ( इति सम्बन्धः ) इस प्रकार कर्ता-कर्म सम्बन्ध ( द्वयोर्द्वयोः ) भिन्न-भिन्न दो पदार्थों में ( स्यात् ) होता है, परन्तु ( यदा ध्यानं ध्येयं ) जब ध्यान ध्येय ( आत्मा एव ) आत्मा ही हो ( तदा ) तब ( कीदृशः सम्बन्धः ) सम्बन्ध कैसा ?
बन्ध और मुक्ति के कारण
बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ॥२६॥
अर्थ : ( सममः ) ममता सहित और ( निर्ममः ) ममता रहित ( जीवः ) जीव ( क्रमात् ) क्रम से ( कर्मों से ) ( बध्यते ) बँधता है तथा ( मुच्यते ) छूटता है ( तस्मात् ) इस कारण ( सर्वप्रयत्नेन ) सर्व प्रयत्न से ( निर्ममत्वं ) निर्ममत्व को ( विचिन्तयेत् ) ध्यावे।
निर्ममता की सिद्धि योग्य विचार
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।
बाह्याः संयोगजा भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥२७॥
अर्थ : ( अहम् एकः ) मैं एक हूँ ( निर्ममःशुद्धः ) ममता रहित शुद्ध हूँ ( ज्ञानी ) ज्ञानी हूँ तथा ( योगीन्द्र गोचरः ) योगियों/मुनियों द्वारा जानने योग्य हूँ ( सर्वे अपि ) सभी ( संयोगजाः भावाः ) संयोग से उत्पन्न होने वाले भाव ( मत्तः ) मुझसे ( सर्वथा बाह्याः ) सब तरह से भिन्न हैं।
सम्बन्धों को त्यागने की प्रेरणा
दुःखसंदोहभागित्वं संयोगादिह देहिनाम्।
त्यजाम्येनं ततः सर्वं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥२८॥
अर्थ : ( इह ) इस संसार में ( देहिनाम् ) जीवों के ( संयोगात् ) संयोग से ( दुःखसंदोहभागित्वं ) दुःख समूह का भागीदार बनना पड़ता है ( ततः ) इस कारण ( एनं सर्वं ) इन सभी [शरीर और कर्म के] संयोग को ( मनोवाक्काय-कर्मभिः ) मन, वचन, काय की क्रिया/चेष्टा से ( त्यजामि ) छोड़ता हूँ।
पौद्गलिक परिणति मेरी नहीं
न मे मृत्युः कुतो भीतिर्न मे व्याधिः कुतो व्यथा ।
नाहं बालो न वृद्धोऽहं न युवैतानि पुद्गले ॥२९॥
अर्थ : ( मे ) मेरी ( मृत्युः न ) मृत्यु नहीं होती (इस कारण) ( कुतः भीतिः ) भय कहाँ से हो सकता है? ( मे ) मुझे ( व्याधिः न ) कोई रोग नहीं होता (इसलिए) ( कुतःव्यथा ) दुःख कहाँ से हो सकता है? ( अहम् ) मैं ( बालः न ) बालक नहीं हूँ ( वृद्धः न ) बूढ़ा नहीं हूँ ( युवा न ) जवान नहीं हूँ ( एतानि ) ये सब अवस्थायें ( पुद्गले ) पौद्गलिक शरीर में होती हैं।
ज्ञानी की अनासक्त बुद्धि
भुक्तोज्झिता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपि पुद्गलाः ।
उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा ॥ ३०॥
अर्थ : ( सर्वे अपि ) सभी ( पुद्गलाः ) पुद्गल परमाणु ( मया मोहात् ) मेरे द्वारा मोह से ( मुहुः ) बार-बार ( भुक्तोज्झिता ) भोगकर छोड़ दिए गए हैं अतः ( अद्य ) अब ( उच्छिष्टेषु इव ) जूठन के समान ( तेषु ) उन पुद्गलों में ( मम विज्ञस्य ) मुझ बुद्धिमान् की ( का स्पृहा ) क्या अभिलाषा हो सकती है?
सभी अपना प्रभाव बढ़ाते हैं
कर्म कर्म - हिताबन्धि जीवो जीवहितस्पृहः ।
स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे स्वार्थं को वा न वाञ्छति ॥३१॥
अर्थ : ( कर्म ) कर्म ( कर्महिताबन्धि ) अपने हित रूप साथी कर्मों को ही बाँधता है तथा ( जीवः ) आत्मा ( जीवहितस्पृहः ) अपने आत्मा के हित की इच्छा करता है ( स्वस्वप्रभाव भूयस्त्वे ) अपने-अपने शक्तिशाली प्रभाव के होने पर ( को वा स्वार्थं ) कौन-सा व्यक्ति अपना हित ( न वाञ्छति ) नहीं चाहता?
आत्मोपकारी बनने का उपदेश
परोपकृतिमुत्सृज्य स्वोपकारपरो भव ।
उपकुर्वन्परस्याज्ञो दृश्यमानस्य लोकवत् ॥ ३२॥
अर्थ : ( परोपकृतिं ) परोपकार को ( उत्सृज्य ) छोड़कर ( स्वोपकार परः ) अपने उपकार करने में तत्पर ( भव ) हो ( दृश्यमानस्य ) दिखाई देने वाले ( लोकवत् ) इस जगत् की तरह ( अज्ञः ) अज्ञानी जीव ( परस्य ) पर का ( उपकुर्वन् ) उपकार करता हुआ पाया जाता है।
भेदविज्ञान का उपाय और फल
गुरूपदेशादभ्यासात् संवित्तेः स्वपरान्तरम् ।
जानाति यः स जानाति, मोक्षसौख्यं निरन्तरम् ॥३३॥
अर्थ : ( यः ) जो मनुष्य ( गुरूपदेशात् ) गुरु के उपदेश से ( अभ्यासात् ) अभ्यास से तथा ( संवित्तेः ) आत्म-ज्ञान से ( स्वपरान्तरम् ) स्व और पर पदार्थों के अन्तर को ( जानाति ) जानता है ( स निरन्तरम् ) वह सदा ( मोक्ष-सौख्यं ) मोक्ष के सुख को ( जानाति ) जानता है।
निजात्मा ही गुरु है
स्वस्मिन् सदभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः ।
स्वयं हितप्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः ॥३४॥
अर्थ : ( स्वस्मिन् ) अपने में ही ( सदभिलाषित्वात् ) प्रशस्त (मोक्ष सुख की) अभिलाषा करने से ( अभीष्ट ) अपने प्रिय आत्मा को ( ज्ञापकत्वतः ) जानने वाला होने से तथा ( स्वयं हितप्रयोक्तृत्वात् ) अपने हित में अपने आपको लगाने से ( आत्मा एव ) आत्मा ही ( आत्मनः गुरुः ) आत्मा का गुरु है।
निमित्त सहायक मात्र है
नाज्ञो विज्ञत्वमायाति विज्ञो नाज्ञत्वमृच्छति ।
निमित्तमात्रमन्यस्तु गतेर्धर्मास्तिकायवत् ॥३५॥
अर्थ : गुरु आदि के उपदेश से ( अज्ञः ) अज्ञानी ( विज्ञत्वं ) विज्ञानता (ज्ञान दशा) को ( न आयाति ) प्राप्त नहीं होता और ( विज्ञः ) ज्ञानी ( अज्ञत्वं ) अज्ञानता को ( न ऋच्छति ) प्राप्त नहीं होता है ( अन्यः ) अन्य अध्यापक, गुरु आदि ( तु ) तो (ज्ञान प्राप्ति में) ( गतेः ) चलने के लिए ( धर्मास्तिकायवत् ) धर्मास्तिकाय की तरह ( निमित्तमात्रम् ) केवल सहायक मात्र हैं।
निजात्म चिन्तन कौन, कैसे करे ?
अभवच्चित्तविक्षेप एकान्ते तत्त्वसंस्थितः ।
अभ्यस्येदभियोगेन योगी तत्त्वं निजात्मनः ॥३६॥
अर्थ : ( चित्तविक्षेपः ) जिसके चित्त में क्षोभ ( अभवत् ) नहीं है ( तत्त्वसंस्थितः ) तत्त्व विचार में स्थित है बुद्धि जिसकी ( योगी ) ऐसा योगी/मुनि ( एकान्ते ) निर्जन स्थान में ( अभियोगेन ) आलस्य, निद्रा को/सावधानी से ( निजात्मनः ) अपनी आत्मा के ( तत्त्वं ) स्वरूप-चिन्तन का ( अभ्यस्येत् ) अभ्यास करे।
आत्मसंवित्ति की पहिचान
यथा यथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ।
तथा तथा न रोचन्ते विषयाः सुलभा अपि ॥३७॥
अर्थ : ( यथा-यथा ) जैसे-जैसे ( संवित्तौ ) अनुभूति में ( उत्तमं तत्त्वं ) उत्तम तत्त्व (शुद्धात्म स्वरूप) ( समायाति ) आता है ( तथा तथा ) वैसे-वैसे ( सुलभा-अपि ) सुलभता से प्राप्त हुए भी ( विषयाः ) विषय भोग ( न रोचन्ते ) रुचते नहीं हैं।
आत्म - संवित्ति की पहिचान
यथा यथा न रोचन्ते विषयाः सुलभा अपि ।
तथा तथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ॥३८॥
अर्थ : ( यथा यथा ) जैसे-जैसे ( सुलभाः ) सुलभ ( विषयाः अपि ) पञ्चेन्द्रिय के विषय भी ( न रोचन्ते ) आत्मा को अच्छे नहीं लगते ( तथा तथा ) वैसे-वैसे ( संवित्तौ ) अनुभूति में ( उत्तमं तत्त्वं ) उत्तम तत्त्व [शुद्धात्म स्वरूप] ( समायाति ) प्रतिभासित होने लगता है।
अनुभूति बढ़ने पर विचार परिणति
निशामयति निश्शेषमिन्द्रजालोपमं जगत्।
स्पृहयत्यात्मलाभाय गत्वान्यत्रानुतप्यते ॥३९॥
अर्थ : ( निश्शेषं ) जब समस्त ( जगत् ) संसार ( इन्द्रजालोपमं ) इन्द्रजाल की तरह निःसार ( निशामयति ) दिखाई देने लगता है, तब ( आत्मलाभाय ) आत्म-स्वरूप पाने के लिए ( स्पृहयति ) इच्छा करता है, उस समय यदि ( अन्यत्र ) अन्य अन्यत्र/आत्मा से भिन्न अन्य पदार्थों में ( गत्वा ) जाकर ( अनुतप्यते ) सन्तप्त/व्याकुल होता है।
योगी की निर्जन प्रियता
इच्छत्येकान्तसंवासं निर्जनं जनितादरः ।
निजकार्यवशात्किञ्चिदुक्त्वा विस्मरति द्रुतम् ॥४०॥
अर्थ : ( निर्जनं ) निर्जन स्थान ( जनितादरः ) जिसे अच्छा प्रतीत होता है ऐसा अनुभवी पुरुष ( एकान्त संवासं इच्छति ) एकान्त में रहना चाहता है ( निजकार्यवशात् ) अपने कार्यवश से ( किञ्चित् उक्त्वा ) कुछ कह करके ( द्रुतम् ) शीघ्र ( विस्मरति ) भूल जाता है।
स्वरूप निष्ठ योगी की विशेषता
ब्रुवन्नपि हि न ब्रूते गच्छन्नपि न गच्छति ।
स्थिरीकृतात्मतत्त्वस्तु पश्यन्नपि न पश्यति ॥४१॥
अर्थ : ( स्थिरीकृतात्मतत्त्वस्तु ) किन्तु आत्म तत्त्व में स्थिर रहने वाला ( ब्रुवन् अपि ) बोलता हुआ भी ( न ब्रूते ) नहीं बोलता है ( गच्छन् अपि ) चलता हुआ भी ( न गच्छति ) नहीं चलता है और ( पश्यन् अपि ) देखता हुआ भी ( न पश्यति ) नहीं देखता है।
योगी की निर्विकल्प दशा
किमिदं कीदृशं कस्य कस्मात्क्वेत्यविशेषयन् ।
स्वदेहमपि नावैति योगी योगपरायणः ॥४२॥
अर्थ : ( योग परायणः ) आत्म-ध्यान में लगा हुआ ( योगी ) योगी साधक ( इदम् ) यह ( किम् ) क्या है ( कीदृशं ) कैसा है ( कस्य ) किसका है ( कस्मात् ) किस कारण से है ( क्व ) कहाँ है ( इति ) इस तरह ( अविशेषयन् ) विशेष विचार न करता हुआ ( स्वदेहम् अपि ) अपने शरीर को भी ( न अवैति ) नहीं जानता है।
जो जहाँ रहे, वहाँ रम जाता
यो यत्र निवसन्नास्ते स तत्र कुरुते रतिम् ।
यो यत्र रमते तस्मादन्यत्र स न गच्छति ॥४३॥
अर्थ : ( यः ) जो (जीव) ( यत्र ) जहाँ पर ( निवसन् आस्ते ) रहता है ( स तत्र ) वह वहाँ (उस स्थान पर) ( रतिम् कुरुते ) प्रीति करता है और ( यः यत्र ) जो जहाँ ( रमते ) रम जाता है ( स ) वह ( तस्मात् ) उस स्थान से ( अन्यत्र ) अन्य जगह ( न गच्छति ) नहीं जाता।
साम्यभावी योगी कर्मों से छूटता है
अगच्छंस्तद्विशेषाणामनभिज्ञश्च जायते ।
अज्ञाततद्विशेषस्तु बध्यते न विमुच्यते ॥४४॥
अर्थ : ( तद्विशेषाणाम् ) उन (शरीर आदि पर पदार्थों के) विशेषणों (विशेषताओं) को ( अगच्छन् ) न जानता हुआ ( अनभिज्ञः ) अजान ( जायते ) होता है ( च ) और ( अज्ञाततद्विशेषः ) नहीं जाना है उन शरीरादि की विशेषताओं को जिसने ऐसा योगी ( न बध्यते ) कर्म से नहीं बँधता ( तु ) किन्तु ( विमुच्यते ) छूट जाता है।
सुख दुःख के आधार
परः परस्ततो दुःखमात्मैवात्मा ततः सुखम्।
अतएव महात्मानस्तन्निमित्तं कृतोद्यमाः ॥४५॥
अर्थ : ( परः ) अन्य पदार्थ (आत्मा से) ( परः ) अन्य हैं अतः ( ततः ) उस अन्य पदार्थ से ( दुःखम् ) दुःख होता है और ( आत्मा ) आत्मा ( आत्मा एव ) आत्मा ही है अतः ( ततः ) उस (आत्मा) से ( सुखम् ) सुख होता है ( अतएव ) इसी कारण ( महात्मानः ) महापुरुषों ने ( तन्निमित्तं ) उस आत्मा की प्राप्ति के निमित्त ( कृतोद्यमाः ) उद्यम किया।
पर के अनुराग का फल
अविद्वान् पुद्गलद्रव्यं योऽभिनन्दति तस्य तत् ।
न जातु जन्तोःसामीप्यं, चतुर्गतिषु मुञ्चति ॥४६॥
अर्थ : ( यः ) जो ( अविद्वान् ) मूर्ख/बहिरात्मा ( पुद्गलद्रव्यम् ) पुद्गल द्रव्य को ( अभिनन्दति ) आत्मीय भाव से समादर करता है ( तस्य जन्तोः ) उस बहिरात्म प्राणी का ( तत् ) वह (शरीर आदि पुद्गल द्रव्य) ( जातु ) कभी भी ( चतुःगतिषु ) चारों गतियों में ( सामीप्यं न मुञ्चति ) साथ नहीं छोड़ता।
स्वरूप निष्ठता
आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य व्यवहारबहिः स्थितेः ।
जायते परमानन्दः कश्चिद्योगेन योगिनः ॥४७॥
अर्थ : ( व्यवहार बहिःस्थितेः ) व्यवहारचारित्र से बाहर ठहरे हुए ( आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य ) आत्मध्यान में लवलीन ( योगिनः ) मुनि के ( योगेन ) आत्मध्यान के द्वारा ( कश्चित् ) कोई अपूर्व ( परमानन्दः ) परम आनन्द ( जायते ) उत्पन्न होता है।
आनन्द का कार्य
आनन्दो निर्दहत्युद्धं कर्मेन्धनमनारतम्।
न चासौ खिद्यते योगी बहिर्दुःखेष्वचेतनः ॥४८॥
अर्थ : ( आनन्दः ) आत्मानन्द ( अनारतम् ) निरन्तर ( उद्धं ) बहुत ( कर्मेन्धनम् ) कर्मरूपी ईंधन को ( निर्दहति ) जलाता है ( च ) तथा ( बहिः दुःखेषु अचेतनः ) बाहरी (परीषह, उपसर्गादिक) दुःखों में अनभिज्ञ ( असौ योगी ) वह योगी/आत्मध्यानी ( न खिद्यते ) खेद-खिन्न/दुःखी नहीं होता है।
मुमुक्षु क्या करे ?
अविद्याभिदुरं ज्योतिः, परं ज्ञानमयं महत् ।
तत्प्रष्टव्यं तदेष्टव्यं,तद्द्रष्टव्यं मुमुक्षुभिः ॥४९॥
अर्थ : ( अविद्याभिदुरं ) अज्ञान-अन्धकार को नष्ट करने वाली ( महत् ज्ञानमयं ) महान् ज्ञानरूप ( परं ज्योतिः ) उत्कृष्ट ज्योति ( मुमुक्षुभिः ) मोक्ष अभिलाषी पुरुषों के द्वारा ( तत् प्रष्टव्यं ) वह पूछने योग्य है ( तत् एष्टव्यं ) वह चाहने योग्य है ( तत् द्रष्टव्यं ) वह दर्शनीय या अनुभव करने योग्य है।
तत्त्व का सार
जीवोऽन्यः पुद्गलश्चान्य इत्यसौ तत्त्वसंग्रहः ।
यदन्यदुच्यते किञ्चित् सोऽस्तु तस्यैव विस्तरः ॥५०॥
अर्थ : ( जीवः अन्यः ) जीव अन्य है ( च ) और ( पुद्गलः अन्यः ) पुद्गल अन्य है ( इति ) इस प्रकार ( असौ ) यह ( तत्त्वसंग्रहः ) तत्त्व का सार है, इसके अलावा ( यत् ) जो ( अन्यत् किञ्चित् ) कुछ अन्य बात इस विषय में ( उच्यते ) कही जाती है ( स ) वह ( तस्य एव विस्तरः ) उसका ही विस्तार है।
इष्टोपदेश ग्रन्थ के अध्ययन का फल
इष्टोपदेशमिति सम्यगधीत्य धीमान्,
मानापमानसमतां स्वमताद्वितन्य ।
मुक्ताग्रहो विनिवसन् सजने वने वा,
मुक्तिश्रियं निरुपमामुपयाति भव्यः ॥ ५१ ॥
अर्थ : ( धीमान् भव्यः ) बुद्धिमान् भव्य पुरुष ( इति ) इस प्रकार ( इष्टोपदेशं ) इष्टोपदेश ग्रन्थ को ( सम्यक् अधीत्य ) अच्छी तरह अध्ययन करके ( स्वमतात् ) अपने आत्म-ज्ञान से ( मानापमानसमतां ) सम्मान और अपमान में समता भाव को ( वितन्य ) धारण करके ( मुक्त आग्रहः ) आग्रह को त्यागता हुआ ( सजने ) गाँव आदि में ( वा ) अथवा ( वने ) निर्जन वन में ( विनिवसन् ) रहता हुआ ( निरुपमां ) अनुपम ( मुक्तिश्रियम् ) मुक्ति लक्ष्मी को ( उपयाति ) को प्राप्त किया।
Singer: मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज