इबादत का जुनून — जैन स्वाध्याय सामग्री | Ibadat Ka Junun

इबादत का जुनून

अनुक्रमणिका

कुंदकुंद का जन्म

दाई माँ - बधाई हो बधाई हो, पुत्र रत्न हुआ है
(पुत्र रत्न की प्राप्ति पर नगर सेठ बहुत प्रसन्न हुआ)
पण्डित जी - ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पद्मनंदी नाम
सर्व श्रेष्ठ है
नगर सेठ - जाओ सारे नगर में जन्मोत्सव की तैयारी
करो
(सेठ ने नगर में धार्मिक उत्सव करवाए)
धार्मिक उत्सव (ढोल बाजा, खुशी का माहौल)
(नगर में सानंद उत्सव मनाया गया)

कुछ महिला रंगोली डालते हुए.
महिला 1 - सुना है नगर सेठ का पुत्र बहुत सुंदर है
महिला 2 - क्या तुमने देखा नहीं

(एक दिन पद्मनंदी बहुत रो रहा था, परिवार के सभी
लोगों ने हर प्रकार से उसे चुप करवाने का प्रयत्न
किया, [ बच्चे के रोने की आवाज ] किंतु व्यर्थ रहा,
तब ही मंदिर से लौटी सेठानी ने उसे गोद में ले लिया)

सेठानी माँ - सुद्धोसी बुद्धोसी निरंजनो सी, संसार माया
परिवार जीतोसी × 2
सेठानी के साथ वाली - आश्चर्य, माँ के द्वारा लोरी सुनाने
पर यह चुप क्यों हो जाता है
माँ - मेरा बेटा चुप क्यों होता, वह तो जागृति के गीत ही सुनना
चाहता है
साथ वाली - अवश्य ही इस बच्चे में कोई असाधारण
बात है, बेटा भी तो तुम्हारा है, तो धर्मात्मा और विवेक
शील ही होगा
माँ - तुम्हारा कथन सत्य हो बहन !
(पद्मनंदी कम सोता है, देर तक जागता है, माँ से
लोरियां सुनता है।)

लोरी … (लोरी के बीच राजा कि entry)
(पद्मनंदी हँसता है खेलता है, तरह तरह के प्रश्न करता है,
इस बात से सेठानी चिंतित होती है, दिनों दिन
उनकी चिंता बढ़ती जाती है और एक दिन . रात्रि को सोते
समय अपने पति से कहती है)

सेठानी माँ - देखो जी मुझे एक भीभर लग रहा है
सेठ - ठीक है अभी तुम आराम करने, सुबह देखेंगे

(सेठ ने प्रातः निपुण चिकित्सकों और ज्योतिषियों को
आमंत्रित कर समस्या से अवगत कराया, तथा उन्हें
परीक्षण हेतु कहा। परीक्षण के बाद उन्होंने अपने

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सेठानी मां - देखो जी मुझे पद्म बीमार लग रहा है
सेठ - ठीक है अभी तुम आराम करो, सुबह देखेंगे

( सेठ ने प्रातः निपुण चिकित्सकों और ज्योतिषियों को आमंत्रित कर समस्या से अवगत कराया, तथा उन्हें परीक्षण हेतु कहा। परीक्षण के बाद उन्होंने अपने अपने सुझाव दिए )

ज्योतिष - ज्यादा थकान से निद्रा आती है, तीक्ष्ण एवम् जागृत बुद्धि होने से ये बालक निद्रा नहीं लेता, किंतु इसमें चिंतित होने का कारण नहीं है
चिकित्सक - सेठ जी आपने हम लोगों को बुलाकर बहुत उपकार किया है ऐसे बालक के दर्शन कर के हम सब कृत - कृत्य हुए
ज्योतिष - यह बालक तेजवान महा पुरुष होगा सेठ !
सेठ - आप लोगों का कहना सत्य है किंतु…
ज्योतिष - किंतु परंतु कुछ नहीं इतनी आयु में ऐसे शुभ लक्षणों से युक्त बालक को नहीं देखा, तुम धन्य हो सेठ

( आशीर्वाद एवम् शुभ वचन दे कर सभी जाने लगे और तब )

सेठ - पंडित जी दक्षिणा तो लेते जाइए ..
ज्योतिष - हमे दक्षिणा मिल गई है सेठ जी, बालक का दर्शन कर हम कृतार्थ हुए

( पुष्प की तरह प्रसन्नता के खेलते हुए पद्मानंदी 4 वर्ष का हो गया, मां ने प्रारंभिक शिक्षा देने के साथ धार्मिक शिक्षा देना भी आरंभ किया और एक दिन …

मां - बेटा पद्म कुछ समय आकर पढ़ लो
पद्म - नहीं मां मैं तुमसे नहीं पढूंगा, अब तुम नई बात नहीं सिखाती हो मुझे
मां (मन में) - अब इस पद्म को क्या पढ़ाऊं जो कुछ मुझे ज्ञान था वह इसने कुछ महीनो में ही सीख लिया, अब इसकी जिज्ञासा कैसे शांत करूं। हा एक रास्ता अवश्य है रात को मैं पढूंगी और सुबह वही पद्म को पढ़ाऊंगी, यही ठीक रहेगा।
सेठ - प्रिय आज कल दिन रात पुस्तकों में ही खोई रहती हो।
मां - कुछ देर और पढ़ लू, सुबह पद्म को भी पढ़ाना है, मां बनना सरल है मां का कर्तव्य निभाना बहुत कठिन है ! शीघ्र ही पद्म के लिए योग्य गुरु की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे वो भी बड़ा हो कर सूर्य के समान प्रकाशवान बने

( एक दिन प्रातः काल से ही कोड़ कुड़ पुर में बहुत हल चल थी, लोग प्रसन्न थे, आपस में कुछ बातें करते और जंगल की ओर बढ़ जाते )

व्यक्ति 1 - अरे भाई सुबह सुबह कहा भागे जा रहे हो, क्या कोई संकट आ गया है
व्यक्ति 2 - यहां तुम अब तक सो रहे हो अब तो जागने का समय आ गया है
व्यक्ति 1 - तुम साफ साफ बात क्यों नहीं करते, क्या बात है
व्यक्ति 2 - तो सुनो संकट तो अब जाने वाला है, क्यूकी आचार्य श्रेष्ठ जिनचंद्र को जंगल के समीप देखा गया है

महल का scene

पद्म - सुनो ध्रुवेश, आज हो क्या रहा है तुम सबको, सुबह सुबह ही कहा

ध्रुवेश - अरे तुम्हे नही मालूम, कल शाम वयोवृद्ध आचार्य श्री जिनचंद्र जी को नगर के समीप जंगल में देखा गया है

( विश्राम कर रही मां के पास पद्म आता है और कहता है )

पद्म - मां जल्दी उठो, देखो आज सूर्य का उदय हुआ है

मां - उठ रही हु बेटे पद्म परंतु तुम्हे क्या हुआ सूर्योदय तो रोज ही होता है नया क्या है

पद्म - हां मां मैं ही क्या आज तो पूरा नगर ही धन्य होगा, क्युकी आज के सूर्य का उदय ही ऐसा है, जिससे अज्ञान का नाश होगा, पाप गलेंगे, ज्ञान के प्रकाश से सबको मुक्ति का मार्ग मिलेगा

मां - पहेलियां क्यों बुझाते हो पुत्र, पद्म तुम तो मुझ से ही पांडित्य करने लगे, सीधी बात बताओ ना

पद्म - बात यह है मां की आचार्य जिनचंद्र के रूप में सूर्योदय हुआ है, वे पास के जंगल के विराजमान है, सारा नगर उनके

हुआ है, वे पास के जंगल के विराजमान है, सारा नगर उनके दर्शन करने जा रहा है मां, और मैं भी

मां - सुनो पद्म मैं भी चल रही हु

( पद्म मां की प्रतीक्षा किए बिना ही चला गया इस बात से मां सोचती है की इसे मुनिराज के प्रति इतनी श्रद्धा और निष्ठा हैं की पद्म मेरा पुत्र हो कर भी तनिक प्रतीक्षा न कर सका, सेठानी की सोच का बादल घना होने लगा, और उनके मस्तिष्क रूपी आकाश पर छा गया, उनको अचानक पद्म के मुनि बनने का खयाल आया और वह स्वयं कहने लगी )

मां - नही नही मैं ऐसा नहीं होने दूंगी, मेरा तो एक ही पुत्र है, मैं उसे मुनि नही बनने दूंगी, मेरा पुत्र तो भावी नगर सेठ है और ज्ञानी भी है पद्म

( जंगल के पास सही एकत्रित होने लगे वृक्ष के नीचे ही आचार्य श्री ध्यान मग्न है, सभी आचार्य श्री के वचनामृत पान करने की प्रतीक्षा में हैं )

व्यक्ति 1 - अरे भाई हम तो प्रवचन सुनने आए थे, परंतु मुनिराज तो ध्यान में लीन है और मुझे देर हो रही है

व्यक्ति 2 - हु तुम सत्य कहते हो साधु जनों या सज्जनों की संगति को धन व्यय करके भी प्राप्त करना चाहिए

व्यक्ति 3 - हा भैया प्रवचन से हमे ज्ञान प्राप्त होगा, सुख का मार्ग मिलेगा

व्यक्ति 4 - भाई तुम कुछ भी कहो अब मैं और अधिक समय व्यर्थ नहीं करना चाहता, आचार्य का भी कोई कर्तव्य है ना की इतने लोग अपना कार्य छोर कर यहां है

व्यक्ति 5 - तुम्हे जाना हो तो जाओ परंतु वे मुनि है, किसी के आधीन नही जो किसी के आने पर उपदेश देंगे ही वास्तव में हमारे पुण्य का उदय अभी नहीं हुआ है

व्यक्ति 3 - भैया सांसारिक कार्य तो चलते ही रहते है, रुकते नही, फिर क्यों मुनिराज के वचनों को सुनने से वंचित रहूं कितना भी समय हो मैं प्रवचन सुन कर ही जाऊंगा

पद्म - थोड़ा धीरे बोलिए आदरणीय कही बात चीत से मुनिराज का ध्यान भंग न हो, अभी वे सिद्धो से बाते कर रहे

( तब ही मुनिराज का ध्यान भंग होता है वे जन समूह को
सन्मुख देख कर उपदेश देने लगते है )

सभा - मुनिराज की जय ! x 3

मुनिराज - शुद्धात्मा को जाने बिना दुख ही दुख है सुख के लिए
अहिंसा दया , सत आचरण करना चाहिए , यदि संभव हो तो
मुनि धर्म धारण करना चाहिए

मुनि भक्त - अरे यह बात मैंने आज तक नहीं सुनी अपूर्व बात है ,
धन्य है मुनि दशा , मेरे जीवन में ऐसी दशा कब होगी

( विचार मग्न पद्म उठ कर आचार्य के सम्मुख पहुंचा )

पद्म - पूज्यवर आपके उपदेश सुन के मैं संसार का स्वरूप जान
गया हु , हे नाथ मुझे जिन दीक्षा प्रदान कीजिए
मुनिराज - हे भव्य , तुम्हारे विचार तो उत्तम है किंतु
परिजनों को अनुमति आवश्यक है

पद्म विचार करते हुए जाते है
संत साधु बन के विधु … म्यूजिक

पद्म मां के पास पहुंच कर - मां क्या तुम मुझे अच्छा पुत्र मानती
हो , मेरा हित चाहती हो , और अनंत काल तक मेरी ही मां बनी
रहना चाहती हो
मां - हां पद्म क्या बात है आज तुम ऐसी गंभीर बातें क्यों कर रहे
हो
पद्म - मां मैंने मुनि होने का निश्चय किया है , मैं सांसारिक बंधनों
से मुक्त होना चाहता हु , तुमसे दीक्षा की आज्ञा चाहता हु , तुम
मुझे आज्ञा दोगी ना ?

Emotional

मां - नहीं नहीं ऐसा नहीं बोलो पद्म , अभी तुम्हारी पढ़ने - खेलने
की आयु है
( अचानक पुत्र से मुनि बनने की बात सुन कर मां का हृदय
वियोग की कल्पना से तड़प उठा , उसने तरह तरह से पद्म को
समझाने का प्रयत्न किया , किंतु सब व्यर्थ , पद्म ने द्रण निश्चय
कर लिया था , जब मां का प्रयास भी विफल रहा तो उनके नेत्रों
से अश्रु धारा फूट निकली )

हट तजो बेटा … ( मां और बेटा का संवाद )

मां रोते हुए !!!
( सभी सेठानी को देखने लगे )
पद्म - नहीं मां मैं अपने जन्म के लिए लज्जित हु , अब अनंत
काल तक जन्म न लूंगा , किसी को कष्ट न दूंगा , इतने वर्ष संयम
बिना व्यर्थ गवाएं , परंतु अब न गवाऊंगा
मां - तुम जानते हो पद्म की मैं तुम्हे कितना प्यार करती हु तुम ही
मेरी एक मात्र संतान हो मैं अपनी ममता को कैसे तजु नहीं नहीं
पद्म मैं ऐसा नहीं दूंगी तुम ही अनंत काल तक मेरे पुत्र
कहलाओगे
पद्म - मैं जानता हु मां , इसीलिए तुमसे दीक्षा की आज्ञा चाहता
ह अब मैं दस ही जन्म तक तुम्हारा पत्र कहलाऊंगा मैं प्रतिज्ञा

संवाद

अब तुम अपनी ममता को मेरी राहों में न लाओ, तुम्हीं ने तो मुझे शिक्षा दी है
माँ - पर ऐसा संभव कैसे के बाद पद्म का निश्चय गलत तो नहीं
पर माँ का मोह पद्म को रोक रहा है विलोभ के डर में स्वार्थी
बन रही हु, धिक्कार है मेरा मोह जो सन्मार्ग पर चलने वाले पुत्र
के सुख में ही बाधा बन रहा है, कौन कहता है की मैं रोती हु, अरे
मैं मोहि पुत्र के सिंह गर्जना से मोहि माँ का मोह नेत्र पथ से बह
कर पुत्र के पथ को प्रक्षालित कर रहा है
सेठ - फिर ये आसू क्यों गिर रहे है ?
माँ - ये आसू नहीं है जन्म मृत्यु को जीतने वाले पुत्र पर दोनो
नेत्रों से जल भर कर महा मस्तकाभिषेक कर रही हु, और सुनो
पद्म तुम्हे मेरी ममता को सौगंध तुम अनंत काल तक मेरे ही पुत्र
रहोगे जाओ मैं तुम्हे भवनाशनी जैनश्वरी दीक्षा की सहस
अनुमति प्रदान करती हु
पद्म - ठीक है माँ मैं जानता था तुम अवश्य अनुमति दोगी, तत्व
ज्ञानी जो हो, और मेरी गुरु भी

संसार लगने लगा म्यूजिक (इस बीच दीक्षा होगी)

पहला दृश्य

प्रवचनकार द्वारा समयसार एवं कुंदकुंद आचार्य का
परिचय

(इसी बीच लाइट ऑफ)

(लाइट ऑन के साथ) … वाला अपनी गायों को चराने
जंगल ले जा रहा है।

एक तरफ कुछ ग्रामीण कोंदेश की प्रशंसा करते हुए उसे
निहार रहे है। कोंदेश यहां वहां घूम कर आनंदित मन से
गायों से बाते करता हुआ एक पेड़ के नीचे बैठकर भजन
गुनगुनाता है।
(Bg music)
कुछ दिनों बाद…
जंगल की ओर बड़े बड़े सेठ जाते देख ग्वाला बोलता है
कोंदेश - मैंने जीवन में तो इन्हें यहां नहीं देखा ये यहां क्यों
आए है। चलकर देखना चाहिए।
कोमल शरीर वाले यह धनवान लोग नंगे पैर गर्मी सहते जा
रहे है कोई बात अवश्य है, अरे बह नग्नवस्था में कौन
तपस्वी बैठा है।
मुनिराज - सभी जीव भगवान् है जगत् के जड़ चेतन सभी
मुनिराज - सभी जीव भगवान् है जगत् के जड़ चेतन सभी
का परिणामन स्वतंत्र है, तुम चेतन स्वरूप भगवान् हो जो
कभी जलता नहीं गलता नहीं sasvat अमर है स्वयं को
पहचान कर स्वयं में लीन हो जाए तो सभी सुखी हो जाए।
कोई दुखी नहीं होगा
(कोंदेश उपदेश समझने का प्रयास करने लगा)
कोंदेश - लेकिन मैं दुखी ग्वाला भगवान् कैसे हो सकता हु।
(शाम तक सोचता रहा की सभी तो मूर्ख कहते है इन
मुनिराज ने मुझे भगवान् कहा। लोटे समय बारिश में बह
भीग गया। बिस्तर पर लेटे लेटे उपदेश में सोचता
रहा।
कोंदेश (मन में) - यदि मैं भगवान् बन गया तो गाएं कौन
चरायेगा अरे गाएं भी तो भगवान् बन सकती है,
(सुबह कोंदेश के न उठने पर उसकी मां उसे जगाने आती
है)

माँ - अरे इसे तो बहुत तेज बुखार है। (मां वैद्य को बुलाती है
)
(एक सप्ताह में बुखार तो उतर गया परंतु ग्वाला जंगल न)

( एक सप्ताह में बुखार तो उतर गया परंतु ग्वाला जंगल न जा सका…)

कौंडेश - मां गाय…(घबरा कर)

मां- रहने दे, अभी और कुछ दिन आर कर।

(पंद्रह दिन बाद जब कौंडेश जंगल गया उनसे देखा जंगल में चारो ओर आग लगी। थी परंतु उस भीषण आग में उसे एक हरा भरा पेड़ मिला वह आग के बीच से उसके पास गया।

तभी उसे मुनिराज के उपदेश का स्मरण हुआ)

कौंडेश - विश्व के जड़ चेतन का परिणामण स्वतंत्र है कोई किसी का करता धर्ता नहीं है
अचानक से उसकी नजर पेड़ के कोठार पर पड़ी है। अरे! यह क्या! है अरे वाह यह। तो कोई धार्मिक ग्रंथ मालूम पड़ता है। पर मैं। तो पढ़ना ही नहीं जानता। शायद इस ग्रंथ के कारण यह वृक्ष जला नहीं। यदि मैं पढ़ा लिखा होता तो पढ़ लेता

परंतु अब में इसका क्या करूं।

ठीक है। यह ताड़ पत्र में उन मुनिराज को ही दे दूंगा।

ठीक है। यह ताड़ पत्र में उन मुनिराज को ही दे दूंगा।

( ग्वाला मुनिराज को खोजने जंगल में निकल पड़ा)

( भजन ) हे मुनिवर …।…

( मुनिराज को देख ग्वाला प्रसन्न होकर मुनिराज के पास जाता है)

  • हे मुनिवर! यह ताड़ पत्र स्वीकार कर मुझ पर उपकार कीजिए

(ग्वाला मुनिराज को शास्त्र मिलने के संपूर्ण घटना सुनाता है

मुनिराज उसे देख मुस्कुराते है)

( ग्वाला पूछता है) हे मुनिवर क्या यह कोई आत्म है क्योंकि यह जला व गला नहीं है।

मुनिराज - हे भव्य! यह आत्म नहीं है परंतु इसमें हमारी तुम्हारी आत्मा की बात लिखी है। तुम्हे आत्म गया अवश्य ही होगा और तुम सुखी भी होगे। तुम्हे हजारों वर्षों तक लोग याद करेंगे

स्रोत: Gyata संग्रह।

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