हमारा जैन धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Hamara Jain Dharm

हमारा जैन धर्म

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जिनधर्म प्रभावना हेतु

अध्यात्मिक शिक्षण शिविर एवं संगीत मय पूजन-विधान आदि के लिये विद्वान व्यवस्था, संपादक के पते पर सम्पर्क करें।

भजन

अब क्या करना है

  1. नाली देखे पत्नी देखे, और देखे जनाबसी
    भैया देखे बेटा देखे, और देखे संग साथी
    देख लियो सब रिश्ते आते…हो…-2
    अब तो आतम देखोंगे

  2. देश-देश के भव को बढाया, मान प्रतिष्ठा साथी
    अंतरंग में कभी न देखा, सब स्वार्थ के साथी
    देख लिया स्वार्थ जग सारा…हो…-2
    अब तो आतम देखोंगे

  3. मंदिर देखी मस्जिद देखी, तीरथ देखे साथी
    निज आतम को कभी न देखा, सब घूमे बनारसी
    घूम लिए चारों गतियों में…हो…-2
    अब तो आतम देखोंगे

पवन कुमार जी
संपादक

श्री वीतरागः नमः

हमारा जैन धर्म

लेखक
अनुभव प्रकाश जैन “श्री वाले”
(M.A.) दानाओली लश्कर (ग्वा.)
संपादक
पं. पूरनचन्द जी जैन
तलहटी नं. 3 सोनागिर (दतिया)
पवन कुमार जी जैन
C/o श्री सुरेश चन्द पवन कुमार जैन
मो. जिला भिण्ड
प्रकाशक
श्री वीर पाठशाला
दानाओली, लश्कर, ग्वालियर

श्री दिगम्बर जैन समाज, ग्वालियर

पुस्तक प्राप्ति स्थल

श्री वीर पाठशाला, जैसवाल जैन मंदिर जी
दानाओली, लश्कर, ग्वालियर
श्री दि. जैन महावीर पंचकल्याण मंदिर
जैन मंदिर सदर, मुरार, ग्वालियर
श्री दिगम्बर जैन त्रिभुवन त्रिलोक सीमन्धर जिनालय
फालका बाजार, लश्कर, ग्वालियर
श्री वीतराग जैन पाठशाला
श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर जो, भी, जिला-भिण्ड
श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर
गली नं. 12, कैलाश नगर, दिल्ली
मंदिर नं. 3
श्री वाली धर्मशाला के सामने, सोनागिर, जिला-दतिया

मूल्यः (10/-) दस रुपया
(पुनः प्रकाशन हेतु)

प्रतियाँ 1111

तृतीय संस्करण 2003

लेजर टाइप सेटिंग : निर्भय कम्प्यूटर्स, फोन-2436730

प्रकाशकीय

वर्तमान भौतिक युग में मानव संसार में इतना उलझ रहा है कि उसे इस बात की सुध ही नहीं है कि उसके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य क्या है ? प्राणी यह ध्यान नहीं रख पाता है कि उसकी आयु के कितने अमूल्य क्षण व्यर्थ ही निकल रहे हैं ?
अतः हम सभी अपने लक्ष्य का ध्यान रखते हुए अपने जीवन के अमूल्य समय को व्यर्थ न जाने दें, एवं अपनी आत्मा का कल्याण कर इस चिन्तामणि रत्न के समान मनुष्य जन्म को सफल बनाएँ, इत्यादि बातों को ध्यान में रखते हुए, ‘हमारा जैन धर्म’ नामक पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा है हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि इस पुस्तक के प्रकाशन का हमें सुअवसर मिला। लेखक अनुभव प्रकाश जैन के द्वारा लिखी गई ‘हमारा जैन धर्म’ नामक पुस्तक में लगभग 1000 प्रश्न एवं पौराणिक महापुरुष एवं महासतियों की जीवन गाथा के साथ-साथ उन सभी ज्ञानवर्धक विषयों को समाहित किया गया है जिन्हें पढ़कर, स्मरण कर, हम सभी जीव भव्य से भगवान बन सकते हैं। यह पुस्तक समाज के सभी वर्ग के लिए महत्वपूर्ण एवं महापुरुषों पुस्तक है। प्रत्येक पाठक के हृदय पर यह पुस्तक अपनी एक अमिट छाप छोड़ेगी। भारत वर्ष के सकल दिगम्बर जैन समाज के लिए प्रथम बार एक ऐसी पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा है जिससे एक साथ आप कई माध्यमों से ज्ञानार्जन कर सकेंगे। इस पुस्तक को लिखने के लिए लेखक की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है। हमारे शब्दकोष में वो शब्द नहीं कि जिन शब्दों का सहारा लेकर हम लेखक को धन्यवाद ज्ञापित कर सकें। प्रकाशन समिति के सभी सदस्यों की ओर से लेखक को बहुत-बहुत धन्यवाद एवं पुस्तक के सम्पादन में आदरणीय पं. श्री पूरन चन्द्र जी, सोनागिर एवं पवन कुमार, मी ने जो अपना अमूल्य योगदान दिया है, उसके लिए भी समिति की ओर से उनको बहुत-बहुत धन्यवाद तथा इस पुस्तक के प्रकाशन में सकल जैन समाज ने जो सहयोग प्रदान किया है। उसके लिए हम समस्त जैन समाज के हृदय से आभारी हैं।
हम सभी इस पुस्तक का स्वाध्याय कर परम पावन सिद्धदशा को प्राप्त करें ऐसी मंगल भावना के साथ !
अध्यक्ष
सौरभ कुमार जैन एडवोकेट
लश्कर, ग्वालियर

सम्पादकीय

आज के इस भौतिकवादी युग में जहाँ चारो तरफ मानव विषय कषाय की अग्नि में झुलस रहा है, विषय वासनाओं कषायों की ही चर्चा, वार्ता जगह जगह पर मिल रही है एवं उसकी ही प्रेरणा देते है परन्तु सन्मार्ग पर चलने वाले एवं उसी पर उत्तरोत्तर बढ़ते हुए चलने की प्रेरणा देने वाले इस कलि काल में सत शास्त्र आगम ही है। आप्त कहा गया, गणधरों द्वारा गुंथा गया, मुनियों द्वारा मनन किया गया है वही आगम है जो आगम, मोक्ष मार्ग का प्रकाश करे वही आगम पढ़ने सुनने योग्य है क्योंकि संसार में जीव अनेक प्रकार के दुखों से पीड़ित है जो शाश्वत सुखी दीपक के द्वारा मोक्ष मार्ग में गमन करे, संसार के दुखों से मुक्त होकर मोक्ष मार्ग तो वीतराग भाव है, इसलिये जिन शास्त्रों में किसी प्रकार का राग, द्वेष, मोह, भावों का निषेध कर वीतराग भाव का प्रबोधन किया गया है उन्हीं शास्त्रों को पढ़ना सुनना योग्य है। चारों अनुयोग (प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग द्रव्यानुयोग) आगम है। सभी अनुयोगों का प्रयोजन वीतरागता है। सशास्त्रान पढ़ते शुभ राग होता है परन्तु प्रयोजन तो यह बतलाने का है कि शुभ राग भी आत्मा का स्वरूप नहीं, अतः वह भी रुकने जैसा नहीं। इस प्रकार सशास्त्रान आत्मा की स्वतंत्रता बतलाकर मोह, राग, द्वेष को दूर करने के लिए साधन है।
जपमंत्र मंत्र का मांगलिक कहा है। उसमें पंचपरमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। उनका यथार्थ स्वरूप जानने से उनका स्मरण करने वाला अपनी ज्ञान ही परम मांगलिक है। उनके स्वरूप को द्रव्य, गुण, पर्याय से पहचान करके हम भले, आपके हृदय पर, ऐसी भावना भाई गई है।
प्रथमानुयोग में पुराण पुरुषों, तिरेसठ शलाका, २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण आदि के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। जैसी करनी वैसी भरनी। पाप के परिणाम से नरक, पुण्य के परिणाम से स्वर्ग, धर्म के पवित्र परिणाम से मोक्ष की प्राप्ति हो, ऐसा वर्णन किया गया है।
पौराणिक पुरुष वह है जिनका पुराण में नाम आया है और जिनका जीवन समाज के लिए एक आदर्श बना है। वह भव्य जीव मोक्ष जा चुके
हैं, जा रहे हैं, जाएंगे ऐसे पौराणिक पुरुषों का जीवन चरित्र पढ़कर अपने परिणामों को सुधारने का उपाय करें और परिणाम बिगड़ न जाएं इसका उपाय करते रहें।
पौराणिक महिलायें भी पुरुष से पीछे नहीं। उन्होंने भी अपने सत स्वभाव का आश्रय प्राप्त करके सतीत्व का उत्तम रखते हुए कितने ही प्रतिकूल प्रयोगों में भी अपने स्वभाव का आश्रय नहीं छोड़ा एवं सती नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करके सती चन्दन बाला, सती अंजनसती, सती मैनाससुंदरी, सती मनोरमा आदि ने जैन दर्शन में आदर्श उपस्थित किया।
जैन दर्शन में आचार्यों ने स्तवनों के माध्यम से ज्ञान, वैराग्य, भक्ति प्रेरक, ध्यान को अग्रसर किया है। परमानंद स्तोत्र में अर्हन्तदेव देव स्वामी ने ध्यान का स्वरूप, अरिहंतों का स्वरूप, साधु का स्वरूप का वर्णन किया गया है। भक्तामर स्तोत्र में भक्ति परक उदाहरणों से, उपमाओं से, भक्ति भावना भाई गई है।
षट् पर्वता का प्रतीक है। जीवन में पवित्रता, परिणामों में निर्मलता, सहजता, सरलता, समता, शांति की प्राप्ति हो, ऐसे पवित्र दिन संयम की साधना में निहित है। षट् अकायिक और तात्कालिक दो प्रकार के होते हैं। त्रैकालिक पर्व दशलक्षण, अष्टाह्निका, सोलह कारण पर्व हैं। तात्कालिक महावीर जयंती, अक्षय तृतीया, वीर निर्वाण महोत्सव आदि हैं।
वर्तमान चौबीस तीर्थंकरों में पांच बाल्यगति अर्थात् बाल ब्रह्मचारी हुए हैं उनमें सबसे प्रथम वासुपूज्य भगवान जिनको पांचों कल्याणक अगदेश के चम्पापुरी राज्य में हुए।
श्री वासुपूज्य महर्षि नेमि पारस वीर आदि।
मनुष्य भव तन धरि प्रेम पांचों बाल्यादि।।
“हमारा जैन धर्म” नामक पुस्तक में अब ३१ विषयों का वर्णन प्रश्नोत्तरों के माध्यम से किया गया है। धर्म किसी जीवित विशेष का नहीं, धर्म तो जन-जन का है। प्रत्येक वस्तु अपने धर्मी स्वभाव में ही रहती है “वस्तु स्वभावो धम्मो” वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। ज्ञान का स्वभाव शीतलता है, अग्नि का स्वभाव उष्णता है। नमक का स्वभाव खारापन है, इसी प्रकार प्रत्येक प्राणीगण का स्वभाव ज्ञान दर्शन है। अज्ञानभाव से जीव अज्ञान मोह के कारण चार गति चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है। पं. दौलतराम जी ने छहढाला में लिखा है "मोह महामद पियो अनादि, भूल

अपनी बात

आपको मरना यदि" अपने को भूलने के कारण व्यर्थ में संसार में भटकता रहा अब हमें संसार में न भटकना पड़े, इसके लिये अपने उपयोग को स्थिर करने के लिए जीवन में स्वाध्याय ही परम कल्याणकारी है। इस पुस्तक के माध्यम से जैन दर्शन के मूलभूत सिद्धान्तों का चारों अनुयोगों से सरल भाषा में प्रश्न एवं उत्तर दिये गये हैं, जिनको पढ़कर सभी संबंधी बंधु आत्म लाभ प्राप्त करें और घर-घर चर्चा करें, धर्म की, ऐसी भावना है।
यह पुस्तक होनहार युवा बालक अनुभव प्रकाश जैन ने लिखी है। अनुभव जी के द्वारा जैन समाज के लिये किया गया यह कार्य अत्यन्त सराहनीय है। प्रस्तुत पुस्तक का सम्पादन करते मुझे बड़ी हर्ष हुआ कि इस युवा बालक ने पूर्वाचार्यों द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों का अध्ययन कर इस पुस्तक को लिखा और समाज को आगम रूपी तिजोरी में रखे हुए धर्मज्ञान रूपी माल का इस पुस्तक के माध्यम से प्रदान किया। इसके पूर्व भी इन्होंने प्रश्नोत्तरी प्रश्नमंजूषा, भजनों एवं पाठशाला आदि के माध्यम से वीतराग धर्म का प्रचार किया और वर्तमान में कर रहे हैं। वास्तव में यह युवा बालक बहुत-बहुत धन्यवाद का पात्र है।
हम सभी भव्य आत्मायें महापुरुषों के जीवन परिचय पढ़कर अपने जीवन में चर्चा का विषय बनायें, ऐसी भावना के साथ।
पं. पूरनचन्द्र जैन
मंदिर नं. 3,
सोनागिर, जिला दतिया

लेखक की कलम से

जो वीतराग हो चुके और जिनको भविष्य में होना है।
जो वर्तमान में इस पथ पर चल रहे कर्मशील योग्य हैं।
जो साधक हैं आराधक हैं जिनसे अंतरंग बैरी हारा है।
इस समूह (संघ) की सिद्धि हेतु उनको शत नमन हमारा है।
हमारा जैन धर्म जगत में सबसे उत्तम, अनादि निधन धर्म है। इस जैन धर्म में निर्वाण प्राप्ति के चार मार्ग बताए गए हैं। प्रथमानुयोग, द्रव्यानुयोग चरणानुयोग, करणानुयोग। इनका अनुसरण करके जीव इस दुखमयी संसार को छोड़कर सच्चे सुख की प्राप्ति कर सकता है एवं वीतरागतादि गुणों से युक्त अपने जीवन को महान बना सकता है। इन चारों मार्ग में प्रथमानुयोग के मार्ग का अपना एक अलग महत्व है। प्रथमानुयोग में उन महापुरुषों के जीवन चरित्र का वर्णन होता है, जिन्होंने इस संसार में रहकर पंचेंद्रिय विषय भोगों का भोग किया और फिर इस संसार को असार जानकर अपने निज स्वरूप को आराधना कर मोक्ष को प्राप्त किया। इनका जीवन सुलझा हमारे में आपके जैसा ही होता था अतः इनके जीवन चरित्र की कथाओं को पढ़कर अथवा प्रथमानुयोग के मार्ग का अनुसरण कर हम व आप अपने जीवन में सरलता व सुगमता के साथ परिवर्तन ला सकते हैं तथा इस संसार की असारता को जानकर इस दुखमयी संसार को छोड़कर सच्चे सुख की प्राप्ति करके अपने जीवन को महान बना सकते हैं। ऐसी सरलता व सुगमता अन्य मार्ग में नहीं है। इसलिए “हमारा जैन धर्म” नामक इस पुस्तक में प्रथमानुयोग को मुख्य विषय बनाया गया है।
हमारे जैन धर्म में पूर्वाचार्यों द्वारा रचित प्रथमानुयोग के अनेक ग्रन्थराज हैं, जैसे पद्म पुराण, हरिवंश पुराण, पाण्डव पुराण, विमल पुराण, उत्तर पुराण आदि, परन्तु सामान्य तौर पर यह प्रकाशन सामग्री भाई के पास उपलब्ध नहीं है, अगर कहीं है भी तो आज के इस भौतिकवादी युग में मनुष्य के पास इतना समय नहीं है कि वह इन बड़े-बड़े ग्रन्थराजों का पठन कर मनन कर सके। वर्तमान समय में काल थोड़ा है और साधन अधिक अतः संक्षिप्त में मनुष्य को

सामान्य जानकारी

बहुत कम जानकारी के साथ सारभूत बात मिले और उसे ग्रहण कर अपना आत्मकल्याण कर सके, इसी उद्देश्य को लेकर मैंने यह प्रश्न एवं कहानी रूपी सुमन आगम रूपी सुंगध से चुनकर इस पुस्तक रूपी गुलदस्ते में सजाए हैं।

वर्तमान समय में एवं आने वाली २१ वीं सदी में यह पुस्तक हमारे आदरणीय बुजुर्गों, माताओं, बहिनों एवं सामान्य भाइयों तथा मुख्यतः हमारे कल के समाज के कर्णधार हमारे अपने बालकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी।

धर्म है ये माता, पिता जो अपने बालकों को बालकाल से ही धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से सुसंस्कृत करते हैं। वास्तव में बाल्य अवस्था से ही बालक को ऐसे ही सुसंस्कार व उत्तम शिक्षा दी जाए जिससे कि वह बालक आगे चलकर सन्मार्ग से न भटक जाए और खुद के कल्याण के साथ-साथ परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण कर सके।

प्रिय पाठकों ! इस पुस्तक में वे सभी ज्ञान की बातें समाहित की गई है जिनसे बाल युवा कुमारी से विरक्त होकर सन्मार्ग पर अग्रसर होते रहेंगे, अतः समस्त सामग्री जनों से अनुरोध है कि इस पुस्तक को वह स्वयं पढ़कर अपने बालकों को भी पढ़ाए तथा स्वयं के साथ-साथ अपने बालकों का भी जीवन, धर्ममयी, संस्कारमयी और महान बनाएँ।

प्रस्तुत संस्करण में कहीं त्रुटियां रह गई हों या प्रिंटिंग में गलती हुई हो तो प्रिय पाठकों अवश्य सूचित करने की कृपा करें, ताकि अगला संस्करण शुद्ध हो सके। इस पुस्तक का संपादन आदरणीय पं. पूरणचन्द जी जैन, मींगगिरि एवं पवन कुमार जी जैन, मी को द्वारा किया गया। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ और उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ एवं पुस्तक के प्रकाशन में जिन महानुभावों ने अपनी चंचल लक्ष्मी को शास्त्र दान में सहयोग देकर सदुपयोग किया है उन सभी महानुभावों को हमारी ओर से बहुत बहुत धन्यवाद।

अगली पुस्तक के प्रकाशन में गुरुजनों एवं विद्वत जनों के सुझाव एवं मार्गदर्शन का अभिलाषु।

आपका

वर्तमान निवास पता
अनुभव प्रकाश जैन,
C/o श्री पी. एल. जैन, एडवोकेट
दाना ओली, लश्कर (ग्वा.)

स्थायी पता
अनुभव प्रकाश जैन,
C/o श्री सुरेश चन्द्र, पारस कुमार जैन
सदर बाजार, मींगिरि (म.प्र.)

क्या / कहाँ

क्र. विषय पृष्ठ
1. णमोकार मंत्र 1-14
2. जैसी करनी वैसी भरनी 15-27
3. पौराणिक पुरुष 28-46
4. पौराणिक महिलायें 47-60
5. रत्नत्रय 61-66
6. पर्व 67-73
पाँच बाल्याति तीर्थंकर
7. श्री वासुपूज्य जी 74-88
8. श्री मल्लिनाथ जी 89-98
9. श्री नेमिनाथ जी 99-109
10. श्री पार्श्वनाथ जी 110-123
11. श्री महावीर जी 124-138
12. संसार का भविष्य 139-142

॥ विचार करें ॥

जो मनुष्य वीर नहीं, वह मनुष्य किसी कार्य में सफल नहीं हो सकता।

1

णमोकार मंत्र


णमो अरिहंताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्व साहूणं

प्रश्न 1. णमोकार मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है।
प्रश्न 2. परमेष्ठी किसे कहते हैं और यह कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- जो परम पद में स्थित हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते हैं।

हमारा जैन धर्म

॥ विचार करें ॥

निरंकुश का भूल कारण बुद्धि है।

परमेष्ठी के नाम इस प्रकार हैं-
(1) अरहंत परमेष्ठी, (2) सिद्ध परमेष्ठी, (3) आचार्य परमेष्ठी, (4) उपाध्याय परमेष्ठी, (5) साधु परमेष्ठी।
प्रश्न 3. अरहंत परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- चार घातियाँ कर्मों का नाशकर चार अनंत चतुष्टय प्राप्त कर जिन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त किया है तथा जो 18 दोषों से रहित हैं, उन्हें अरहंत परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 4. अरहंत परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी के 46 मूलगुण होते हैं।

दस अतिशय जन्म के

(1) मल नहीं, (2) पसीना नहीं, (3) मधुर वचन, (4) सुगन्धमय शरीर, (5) वज्र ऋषभ नाराच संहनन, (6) एक हजार आठ लक्षण, (7) सुन्दर रूप, (8) श्वेत रुधिर, (9) सम चतुरस्र संस्थान, (10) अनन्त बल।

दस केवल ज्ञान के अतिशय

(1) सी-सी योजन चारों दिशाओं में सुभिक्ष, (2) आकाश गमन, (3) दया का भाव, (4) उपसर्ग नहीं, (5) कालाहार नहीं, (6) चारों दिशाओं में सुख दिखाई देना, (7) सब विद्याओं का ईश्वराना, (8) शरीर की छाया न पड़ना, (9) नाखून और केशों का नहीं बढ़ना, (10) नेत्रों के पलकों का नहीं गिरना।

चौदह अतिशय देवकृत

(1) अर्द्धमागधी भाषा, (2) सकल जीवों में मैत्री भाव, (3) सब ऋतु के फल फूलों का फलना, (4) धर्मचक्र का समान भूमि लक्ष्य होना, (5) मन्द-मन्द सुगन्ध वायु का चलना, (6) सब जीवों को आनंद देने वाली कठोर रहित भूमि, (7) गन्धोदक की वृष्टि होना, (8) भगवान के दोनों चरणों के तल 225 कमलकल्पना, (9) आकाश का निर्मल होना (10) देवों का जय-जयकार शब्द (11) धर्म चक्र का आगे-आगे चलना (12) अष्ट मंगल द्रव्यों का होना (13) पवन कुमार जाति के देवों का भूमि निर्माण करना (14) समस्त जीवों का आनन्दमय होना

णमोकार मंत्र

॥ मनन करें ॥

एकांत मूर्ख के लिए कैदखाना है ज्ञानी के लिए स्वर्ग।

चार अनन्त चतुष्टय

(1) अनन्त ज्ञान (2) अनन्त दर्शन (3) अनन्त सुख (4) अनन्त वीर्य

अष्ट प्रतिहार्य

(1) सिंहासन (2) पुष्प वृष्टि (3) अशोक वृक्ष (4) भामण्डल या भामण्डल (5) दिव्य ध्वनि (6) दुन्दुभि बाजों का बजना (7) तीन छत्र (8) चौंसठ चंवर।
प्रश्न 5. सिद्ध परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जिन्होंने समस्त कर्मों का नाश कर दिया है और जिन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए जन्म मरण से छुटकारा पा लिया है तथा जो नित्य, निरंजन, निराकार हैं उन्हें सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 6. सिद्ध परमेष्ठी के कितने मूल गुण होते हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी के आठ मूलगुण होते हैं-
(1) सम्यक्त्व (2) ज्ञान (3) दर्शन (4) वीर्यत्व (5) सूक्ष्मत्व (6) अवगाहनत्व (7) अमूर्त्तत्व (8) अव्याबाधत्व।
प्रश्न 7. आचार्य परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो मुनि संघ के नायक होते हैं और शिष्यों को शिक्षा-दीक्षा देते हैं तथा अपराध होने पर प्रायश्चित देते हैं, उन्हें आचार्य परमेष्ठी कहते हैं।

प्रश्न 8. आचार्य परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण होते हैं-

दस धर्म

(1) उत्तम क्षमा (2) मार्दव (3) आर्जव (4) सत्य (5) शौच (6) संयम (7) तप (8) त्याग (9) आकिंचन (10) ब्रह्मचर्य।

बारह तप

(1) अनशन (2) अवमौदर्य (3) वृत्ति परिसंख्यान (4) रस परित्याग (5) विविक्त शय्यासन (6) कायक्लेश (7) प्रायश्चित (8) विनय (9) वैयावृत्य (10) स्वाध्याय (11) व्युत्सर्ग (12) ध्यान

हमारा जैन धर्म

॥ विचार करें ॥

पहले धर्मज्ञान प्राप्त करो और कुछ।

पंचाचार

(1) दर्शनाचार (2) ज्ञानाचार (3) चारित्राचार (4) वीर्याचार (5)

षट आवश्यक

(1) सामायिक, (2) स्तुति, (3) वन्दना, (4) स्वाध्याय, (5) प्रतिक्रमण, (6) कायोत्सर्ग।

तीन गुप्ति

(1) मनोगुप्ति, (2) वचन गुप्ति, (3) काय गुप्ति।
प्रश्न 9. उपाध्याय परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो संघ में रहकर पढ़ते हैं तथा तपस्वी अन्य मुनियों को पढ़ाते हैं, विशेष ज्ञानवान होते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 10. उपाध्याय परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर- उपाध्याय परमेष्ठी के 25 मूलगुण होते हैं-

ग्यारह अंग

(1) आचारांग, (2) सूत्रकृतांग, (3) स्थानांग, (4) समवायांग, (5) व्याख्याप्रज्ञप्ति, (6) ज्ञातृ कथा, (7) उपासका ध्यान, (8) अंतःकृद्दशांग, (9) अनुत्तरोपपाद दशांग, (10) विपाक सूत्रंग, (11) प्रश्न व्याकरण।

चौदह पूर्व

(1) उत्पादपूर्वार्ध पूर्व, (2) अग्रायणी पूर्व, (3) वीर्यानुवाद पूर्व, (4) अस्ति नास्ति प्रवाद पूर्व, (5) ज्ञान प्रवाद पूर्व, (6) कर्म प्रवाद पूर्व, (7) सत्य प्रवाद पूर्व, (8) आत्म प्रवाद पूर्व, (9) प्रत्याख्यान पूर्व, (10) विद्यानुवाद पूर्व, (11) कल्याणवाद पूर्व, (12) प्राणानुवाद पूर्व, (13) क्रिया विशाल पूर्व, (14) लोक बिन्दु पूर्व।
प्रश्न 11. साधु परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो पंचेंद्रिय के विषय वासनाओं और आरम्भ तथा पाप क्रियाओं से दूर हैं, परिग्रह से रहित हैं, दिगम्बर हैं, पिच्छी कमण्डल से युक्त हैं तथा ज्ञान ध्यान में अनुरक्त हैं, उन्हें साधु परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 12. साधु परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर- साधु परमेष्ठी के 28 मूलगुण होते हैं-

णमोकार मंत्र

॥ चिंतन करें ॥

सावधान रहना। यह दुनिया शैतान की दुकान है।

पाँच महाव्रत-

(1) अहिंसा, (2) सत्य, (3) अचौर्य, (4) ब्रह्मचर्य, (5) अपरिग्रह।

पाँच समितियाँ-

(1) ईर्या, (2) भाषा, (3) एषणा, (4) आदान निक्षेपण, (5) प्रतिष्ठापन।

पाँच इंद्रियाँ पर विजय-

(1) स्पर्शन, (2) रसना, (3) घ्राण, (4) चक्षु, (5) कर्ण।

षट आवश्यक कार्य-

(1) सामायिक, (2) स्तुति, (3) वन्दना, (4) प्रतिक्रमण, (5) स्वाध्याय, (6) कायोत्सर्ग।

सात विशेष गुण-

(1) नग्नता, (2) खड़े होकर आहार लेना, (3) केशलोंच करना, (4) दन्त धवन नहीं करना, (5) एक फखत सो सोना, (6) स्नान नहीं करना (7) हाथ में भोजन करना।

प्रश्न 13. णमोकार मंत्र किस ग्रंथ का मंगलाचरण है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र षट्खण्डागम ग्रंथ का मंगलाचरण है।

प्रश्न 14. णमोकार मंत्र किस भाषा में है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा में है।

प्रश्न 15. णमोकार मंत्र को लिपिबद्ध किसने किया था ?
उत्तर- णमोकार मंत्र को लिपिबद्ध आचार्य पुष्पदंत एवं भूतबली ने किया था।

प्रश्न 16. णमोकार मंत्र में कितने स्वर हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 34 स्वर होते हैं।

प्रश्न 17. णमोकार मंत्र कब से है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र अनादि निधन से है।

प्रश्न 18. णमोकार मंत्र में कितने व्यंजन हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 30 व्यंजन हैं।

प्रश्न 19. णमोकार मंत्र पर दुष्ट श्रद्धा से किसको कौनसी विद्या सिद्ध हुई थी ?
उत्तर- णमोकार मंत्र पर दुष्ट श्रद्धा से अंजन चोर को आकाशागामिनी विद्या सिद्ध हुई थी।

॥ चिंतन करें ॥

आज ऐसे जियो मानो यह आखिरी दिन है।

प्रश्न 20. णमोकार मंत्र में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 35 अक्षर हैं।

प्रश्न 21. णमोकार मंत्र में कितने काव्य हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में चार काव्य हैं।

प्रश्न 22. णमोकार मंत्र के अभिनय से कौन साक्ष्य नरक में गए ?
उत्तर- णमोकार मंत्र के अभिनय से ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती सातवें नरक में गए।

प्रश्न 23. णमोकार मंत्र में कितने पद हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 5 पद हैं।

प्रश्न 24. णमोकार मंत्र को कितने लाख मंत्रों का जनक माना जाता है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र को 84 लाख मंत्र का जनक माना जाता है।

प्रश्न 25. णमोकार मंत्र में कितने मुनिराज हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में तीन मुनिराज हैं-
(1) आचार्य, (2) उपाध्याय, (3) साधु।

प्रश्न 26. णमोकार मंत्र मुख्यतः कितने नामों से जाना जाता है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र मुख्यतः 5 नामों से जाना जाता है-
(1) मूल मंत्र, (2) महामंत्र, (3) पंच नमस्कार मंत्र, (4) णमोकार मंत्र, (5) अनादि निधन मंत्र।

प्रश्न 27. णमोकार मंत्र में कितने भगवान हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 2 भगवान हैं-
(1) अरहंत, (2) सिद्ध।

प्रश्न 28. देव को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था ?
उत्तर- देव को णमोकार मंत्र पद्म ऋषि सेठ ने सुनाया था।

प्रश्न 29. कुत्ते को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था ?
उत्तर- कुत्ते को णमोकार मंत्र जीवाधर स्वामी ने सुनाया था।

प्रश्न 30. नाग नागिन णमोकार मंत्र के प्रभाव से क्या बने थे ?
उत्तर- नाग व नागिन णमोकार मंत्र के प्रभाव से धरणेन्द्र व पद्मावती बने थे।

प्रश्न 31. णमोकार मंत्र में कितनी मात्राएँ हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 58 मात्राएँ हैं।

॥ चिंतन करें ॥

आत्माध्यास जगत् ही सर्वाधिक जिसमें आत्मनिर्णय हो सके।

प्रश्न 32. णमोकार मंत्र के स्मरण से किसका नाश होता है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र के स्मरण से सब पापों का नाश होता है।

प्रश्न 33. णमोकार मंत्र किस छन्द में है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र आर्या छन्द में है।

प्रश्न 34. पंच परमेष्ठी में से सर्वज्ञ कितने परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- दो, (1) अरहंत (2) सिद्ध।

प्रश्न 35. पंच परमेष्ठी में से गर्भ के अतिशय कौन से परमेष्ठी के होते हैं ?
उत्तर- किसी के नहीं।

प्रश्न 36. पंच परमेष्ठी में से पंचम गतिने परमेष्ठी को प्राप्त हो गई है ?
उत्तर- एक, (सिद्ध)।

प्रश्न 37. जैन साधु को आचार्य पद कौन से परमेष्ठी देते हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 38. अरहंत परमेष्ठी कितने कर्मों का नाश कर चुके हैं ?
उत्तर- चारघातिया कर्मों का-ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनीय, अन्तराय।

प्रश्न 39. आचार्य परमेष्ठी के कितने गुण होते हैं ?
उत्तर- अनंत गुण।

प्रश्न 40. ॐ में कितने परमेष्ठी गर्भित हैं ?
उत्तर- पाँच परमेष्ठी।

प्रश्न 41. पाँच परमेष्ठी में से 105 कितने परमेष्ठी के आगे लगाया जाता है ?
उत्तर- किसी के आगे नहीं।

प्रश्न 42. अरहंत परमेष्ठी ने मोहनीय कर्म का नाश कर कौन सा अनन्त चतुष्टय प्रगट किया है ?
उत्तर- अनन्त सुख।

प्रश्न 43. जिन मंदिर जी में मुख्यतः कितने परमेष्ठी की प्रतिमा होती है ?
उत्तर- दो (1) अरहंत (2) सिद्ध।

प्रश्न 44. दिव्य ध्वनि कितने परमेष्ठी की खिलती है ?
उत्तर- एक (अरहंत)।

॥ चिंतन करें ॥

आंतरिक कलह (कषाय) के अभाव में धर्म मार्ग प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 45. पाँच परमेष्ठी में से गुणधर कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 46. पाँच परमेष्ठी के मूल गुणों का जोड़ क्या है ?
उत्तर- 46+8+36+25+143

प्रश्न 47. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी विहार करते हैं ?
उत्तर- चार- (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 48. पाँच परमेष्ठी में से कौन से परमेष्ठी नियम से इस भव में मोक्ष प्राप्त करेंगे ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।

प्रश्न 49. पाँच परमेष्ठी में से वर्तमान में कषाय रहित कितने परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 50. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पीठी कमण्डलु रखते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 51. कितने परमेष्ठी प्रत्यक्ष में दिखते हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 52. कितने परमेष्ठी मन रहित हैं ?
उत्तर- एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

प्रश्न 53. पाँच परमेष्ठी में से सबसे बड़े परमेष्ठी कौन से हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी।

प्रश्न 54. पाँच परमेष्ठी में से आयिका माता कौन सी परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 55. पाँच परमेष्ठी में से सबसे कम मूलगुण किस परमेष्ठी के हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी।

प्रश्न 56. कितने परमेष्ठी आहार करते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 57. कितने परमेष्ठी वस्त्र सहित हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 58. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी के इन्द्रियाँ नहीं हैं ?
उत्तर- एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

॥ चिंतन करें ॥

अज्ञानी पर के गुण दोष देखता है ज्ञानी अपने गुण दोष देखता है।

प्रश्न 59. ऐसे कितने परमेष्ठी हैं जिनकी इन्द्रियाँ तो हैं लेकिन काम नहीं करती हैं ?
उत्तर- एक (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 60. कितने परमेष्ठी कर्मों से सहित हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 61. कितने परमेष्ठी कलाधारी हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 62. कितने परमेष्ठी केवलज्ञानी हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 63. कितने परमेष्ठी संसारी हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 64. कितने परमेष्ठी को केवल ज्ञान हो गया है ?
उत्तर- दो (अरहंत, सिद्ध)।

प्रश्न 65. पाँच परमेष्ठी में से सबसे छोटे परमेष्ठी कौन से हैं ?
उत्तर- साधु परमेष्ठी।

प्रश्न 66. कौन-कौन से परमेष्ठी के मूल गुणों का योग 90 है ?
उत्तर- अरहंत 46 + सिद्ध 8 + आचार्य 36 = 90।

प्रश्न 67. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी ने अनन्त चतुष्टय प्राप्त कर लिया है ?
उत्तर- दो (अरहंत, सिद्ध)।

प्रश्न 68. कितने परमेष्ठी को अविनाशी पद प्राप्त हो गया है ?
उत्तर- एक, (सिद्ध)।

प्रश्न 69. कितने परमेष्ठी निकल परमाला है ?
उत्तर- एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

प्रश्न 70. मांगतुंगाचार्य कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 71. कितने परमेष्ठी मन सहित हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 72. सिद्ध परमेष्ठी पीठ के कौन से नम्बर के परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- पाँच नम्बर के।

॥ चिंतन करें ॥

उपदेश जवान से नहीं, जीवन से दो।

प्रश्न 73. पाँच परमेष्ठी में से चौबीस तीर्थंकर कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।

प्रश्न 74. शिक्षा एवं दीक्षा का काम कौन से परमेष्ठी करते हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 75. सम्यग्दर्शन कितने परमेष्ठी का लगता है ?
उत्तर- एक (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 76. कितने परमेष्ठी पर त्याग कर ग्रहण कर सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 77. सकल परमाला कितने परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- एक (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 78. सिद्ध परमेष्ठी कितने कर्मों से रहित हैं ?
उत्तर- समस्त कर्मों से (द्रव्य कर्म, नो कर्म भाव कर्म)।

प्रश्न 79. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पाठन का कार्य करते हैं ?
उत्तर- एक, (उपाध्याय परमेष्ठी)।

प्रश्न 80. पाँच परमेष्ठी में से गृहस्थ कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 81. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी का उपदेश होता है ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 82. पाँच परमेष्ठी में से कितने भगवन्त हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 83. कितने परमेष्ठी संसार में केवल ज्ञानी हैं ?
उत्तर- एक, (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 84. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी के मूलगुण का योग 61 है ?
उत्तर- दो, (आचार्य, उपाध्याय)।

प्रश्न 85. कितने परमेष्ठी ध्यान करते हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 86. वर्तमान में बाहुबली कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी।

॥ शिवत्वं करे ॥

धर्म में विवाद नहीं, विज्ञान में धर्म नहीं।

प्रश्न 97. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी बने बिना मोक्ष मिल सकता है ?
उत्तर- दो (आचार्य, उपाध्याय)।
प्रश्न 98. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पर उपसर्ग हो सकता है ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 99. कितने परमेष्ठी निद्राहारी हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।
प्रश्न 100. सिद्ध परमेष्ठी ने नामकर्म का नाश कर कौन सा गुण प्रकट किया है ?
उत्तर- सूक्ष्मत्व गुण।
प्रश्न 91. णमोकार मंत्र का जाप संक्षेप में कैसे करते हैं ?
उत्तर- ॐ ह्रीं असी आ ऊसा नमः।
प्रश्न 92. पांच परमेष्ठी में से आदिनाथ तीर्थंकर कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।
प्रश्न 93. कितने परमेष्ठी 18 दोषों से रहित हैं ?
उत्तर- दो (अरहंत, सिद्ध)।
प्रश्न 94. कितने परमेष्ठी पुनः जन्म ले सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 95. वर्तमान में हम कितने परमेष्ठी से बात कर सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 96. अरहंत परमेष्ठी का प्रभाव करने के बाद कहां लगाना चाहिए ?
उत्तर- मस्तक पर।
प्रश्न 97. पांच परमेष्ठी में से 108 कितने परमेष्ठी के आगे लगाया जाता है ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 98. आचार्य, उपाध्याय, साधु के आगे 108 ही क्यों लगाते हैं ?
उत्तर- आचार्य, उपाध्याय, साधु 108 प्रकार के गुणों से युक्त होते हैं इसलिए इनके आगे 108 लगाया जाता है। 108 गुण इस प्रकार हैं— (28 मूलगुण, 22 व्रत परिग्रह, 12 तप, 12 भावना, 10 धर्म, 13 प्रकार का चारित्र, 6 कायकी रक्षा, 5 पंचाचार)।

॥ शिवत्वं करे ॥

भावना, कारणता और अधर्म है, देखना वीरता और धर्म है।

प्रश्न 99. अरहंतों छोटे हैं सिद्ध बड़े हैं फिर पहले अरहंतों को नमस्कार क्यों किया गया है ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी समवशरण में बैठकर भव्य जीवों को सम्यग्देश देते हैं तभी सिद्धों का ज्ञान परिचय आदिदेवता के द्वारा ही होता है, इस उपकार को मानने हेतु अरहंतों को प्रथम नमस्कार करते हैं।
प्रश्न 100. कितने परमेष्ठी इंद्रियों से काम लेते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 101. णमोकार मंत्र के लेखक कौन हैं ?
उत्तर- वैसे तो यह अनादि निधन मंत्र है लेकिन इस काल की अपेक्षा से आचार्य पुष्पदंत एवं भूतबली इस मंत्र के लेखक हैं।
प्रश्न 102. वर्तमान में हम कितने परमेष्ठी को देख सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 103. णमोकार अरहंतों में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 7 अक्षर हैं।
प्रश्न 104. णमो सिद्धायण में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 5 अक्षर हैं।
प्रश्न 105. णमो आइरियाणं में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 7 अक्षर हैं।
प्रश्न 106. णमो उवज्झायाणं में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 7 अक्षर हैं।
प्रश्न 107. णमो लोए सव्व साहूणं में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 9 अक्षर हैं।
प्रश्न 108. णमोकार मंत्र की संक्षेप में कहानी लिखिए।
उत्तर- काशी नगरी में नदी किनारे एक पीपल का पेड़ था। उस पेड़ पर एक पक्षी का परिवार रहता था, जिसमें दो बच्चे एवं तीन छोटे पक्षी थे। बड़े ही सुख से वह अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। बड़े पक्षी जब दाना लेने जाते थे छोटे पक्षी अपने घोंसले में रहा करते थे। एक दिन बड़े पक्षी जब दाना संखेजने लगे तो उनसे छोटे पक्षियों ने भी कहा कि हम भी आपके साथ दाना संखेजने लगे। बड़े पक्षियों के मना करने पर भी वह नहीं माने और उनके साथ

॥ शिवत्वं करे ॥

युवाओं को धर्म स्थान देना ही अधर्म से रोकना है।

चित्र: एक पेड़ के नीचे एक व्यक्ति बैठा है, बारिश हो रही है, और कुछ पक्षी उड़ रहे हैं।

॥ शिवत्वं करे ॥

सुनो ज्यादा, देखो ज्यादा, बोलो कम ! कभी घाटा नहीं होगा।

चल दिए। थोड़ी दूर चलने के बाद उन्हें एक गिद्ध पक्षी अपनी ओर आते दिखाई दिया तो बड़े पक्षी घबड़ा गए कि अब तो हम सबकी जान खतरे में है, यह सोचकर वह पक्षी नीचे उतरने लगे पर उन्होंने नीचे देखा कि एक शिकारी उन्हें मारने के लिए तीर से निशाना लगा रहा था। यह देख बेचारे पक्षी और घबड़ा गए कि ऊपर गिद्धराज और नीचे शिकारी। उन्होंने सोचा कि अब बचने का कोई उपाय नहीं है, क्या करें ? इतने में ही उन्हें पूर्व संस्कारवश जो कि संसार भ्रमण की आदि है व्याधि को मिटाने वाला, आपत्ति एवं विपत्ति को टालने वाला, दुखों से छुटकारा दिलाने वाला, पापों का नाश करने वाला एवं सम्यक ज्ञान को प्राप्त कराने वाला, ऐसे महा मंत्रराज णमोकार मंत्र का ध्यान आया तो सभी पक्षी बीच में ही रुककर सच्ची श्रद्धा के साथ णमोकार महामंत्र का स्मरण करने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा तो नीचे गिद्ध व शिकारी दोनों तड़प रहे थे। उनको तड़पता देख सभी पक्षी नीचे उतरकर उनको णमोकार मंत्र सुनाने लगे। यह देख शिकारी व गिद्धराज कहने लगे कि मुझे क्षमा करना। मैं तुम सबका शिकार करना चाहता था और तुम मेरे दुखी समय में मुझे णमोकार मंत्र सुना रहे हो, तुम्हारा परम उपकार रहेगा हम पर। इसी बीच पक्षियों ने पूछा कि तुम्हारा यह हाल हुआ कैसे ? तो शिकारी कहता है कि जब तुम आकाश में ही रुककर सच्ची श्रद्धा के साथ णमोकार मंत्र का जाप (स्मरण) कर रहे थे तभी मैं अपना शिकार और आसान समझ पृथ्वी से निशाना लगा रहा था, लेकिन उसी समय एक सर्प ने आकर डस दिया जिससे निशामुक्त होकर गिद्ध पक्षी में जा लगा, इसलिए हम दोनों का यह हाल हो गया। यह कहते ही उनकी जान निकल गई।
ज्ञानी विचार करते हैं कि- अहा ! जब तिर्यंच गति के जीव श्रद्धा के साथ णमोकार मंत्र का स्मरण कर अपने कष्टों को मिटा सकते हैं सुख की प्राप्ति कर सकते हैं तो हम सभी तो मनुष्य गति के सम्यग धारण करने वाले जीव हैं। इसलिए हम सभी भी णमोकार महामंत्र का पूर्ण श्रद्धा के साथ स्मरण (जाप) करें और अपने समस्त पापों का नाश कर, मोह, राग-द्वेष का अभाव कर सच्चे सुख की प्राप्ति करें। ऐसी मंगल भावना के साथ—

॥ शिवत्वं करे ॥

खुद जियो और दूसरों को जीने दो ! सही सच्ची दया है।

जैसी करनी वैसी भरनी

प्रश्न 1. श्री पाल को कुष्ठ रोग क्यों हुआ ?
उत्तर- श्री पाल ने खेल-खेल में पूर्व भव में मुनि को कोढ़ी कहा था, अतः उन्हें कुष्ठ रोग का दुख उठाना पड़ा था।
प्रश्न 2. अंजना सती का 22 वर्ष तक अपने पति से वियोग रहा था ?
उत्तर- पूर्वभव में अंजना सती ने लीला से लड़खड़ाकर उसकी प्रतिमा को 22 पल तक वहां से हटा दिया था, अतः उसे अपने पति का वियोग सहना पड़ा था।
प्रश्न 3. मुनि ऋषभदेव को 6 महीने तक आहार क्यों नहीं मिला था ?
उत्तर- मुनि ऋषभदेव ने पूर्व पर्याय में खेती की रखवाली केली के मुंह में धोके बेचने को कहा था, अतः उन्हें मुनि पर्याय में 6 माह तक आहार नहीं मिला था।
प्रश्न 4. कुन्द-कुन्द आचार्य इतने बड़े विद्वान कैसे हुए थे ?
उत्तर- उन्होंने कोषस्थ पाले की पर्याय में मुनिराज को शास्त्र दिया था।
प्रश्न 5. राजा श्रेणिक को नरक का बंध क्यों हुआ था ?
उत्तर- उन्होंने उपसर्ग हेतु मुनिराज के गले में मरा हुआ सर्प डाला था।
प्रश्न 6. सुदर्शन सेठ के सूली पर चढ़ते ही सूली सिंहासन कैसे बन गई ?
उत्तर- ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करने के कारण सूली सिंहासन बनी।
प्रश्न 7. राजा अरिहंत नरक में क्यों गया था ?
उत्तर- उसने अपने पुत्रों को आज्ञा दी थी कि खून से बावड़ी भरकर मुझे उससे स्नान कराओ।
प्रश्न 8. श्रेष्ठीश्वर राजा को मरकर मुर्गा बनना पड़ा, ऐसा उन्होंने क्या किया था ?
उत्तर- उसने आटे का मुर्गा बनाकर चर्मदादी देवी के आगे चढ़ाया था।

॥ शिवत्वं करे ॥

आकांक्षा सहित धर्म ही, सबसे उत्तम है।

प्रश्न 9. प्रद्युम्न कुमार का अपहरण धूमकेतु नाम के असुर ने क्यों किया ?
उत्तर- पूर्व भव में प्रद्युम्न के जीव ने उस असुर के पहले भव की पत्नी को हरण किया था।
प्रश्न 10. यमपाल चांडाल के समुद्र में जाने पर उसके लिए सिंहासन क्यों बन गया था ?
उत्तर- क्योंकि उसने ऐसी प्रतिज्ञा ली थी कि चतुर्दशी के दिन किसी जीव को फांसी नहीं दूंगा।
प्रश्न 11. ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती को सातवें नरक का कारण जाना पड़ा ?
उत्तर- उन्होंने मानकाद मंत्र को पांव से मिटाया था।
प्रश्न 12. किस कारण मृगसेन धीवर के जीव की 6 बार रक्षा हुई ?
उत्तर- उसने पूर्वभव धीवर की पर्याय में एक मछली को 6 बार जाल में फंसने पर भी छोड़ दिया था।
प्रश्न 13. श्री भूत पुरोहित को गोबर खाना पड़ा, मुझके रहने पड़े, देश निकाला मिला, यह दण्ड उसे क्यों मिला ?
उत्तर- क्योंकि उसने अमावस में स्नान की थी।
प्रश्न 14. किस कारण श्रीपाल को समुद्र में गिराया गया था ?
उत्तर- पूर्व भव में इन्होंने मुनिराज को समुद्र में फेंका था।
प्रश्न 15. सुभूम्य दम्भी में वर्णित रानी सती के शरीर से दुर्गन्ध आने लगी थी, ऐसा क्यों हुआ ?
उत्तर- पूर्व भव में इन्होंने मुनिराज को कड़वी तुम्बी का आहार दिया था।
प्रश्न 16. पांच पांडव में से दो को मोक्ष की प्राप्ति क्यों नहीं हुई ?
उत्तर- जयंत समर इनके मन में अपने भाईयों के प्रति राग उत्पन्न हुआ था।
प्रश्न 17. सिंहासन सहित राजावसु को नरक क्यों जाना पड़ा था ?
उत्तर- अठ्ठल बोलने के कारण।
प्रश्न 18. रोमा सती के गले में नाग का हार क्यों बना था ?
उत्तर- क्योंकि उसने रात्रि भोजन के त्याग का नियम लिया था।
प्रश्न 19. अनंतकार को आकाशगामिनी विद्या सिद्ध क्यों हुई ?
उत्तर- णमोकार मंत्र पर दृढ़ श्रद्धा के कारण।

॥ चिंतन करें ॥

सदा दम ही परम धर्म है।

प्रश्न 20. सीता अग्नि कुंड में कूदी और वह जल का सरोवर बन गया। यह सब कैसे हो गया ?
उत्तर- सीता जी के शील के महत्त्व के कारण।

प्रश्न 21. सुभद्राना के स्नान के जल से सभी प्रकार के रोग व विष नष्ट हो जाते थे ऐसी ऐसी सर्वोषधि सिद्धि कैसे प्राप्त हुई ?
उत्तर- पिछले भव में मुनि की सेवा कर ओषधि दान देने के कारण।

प्रश्न 22. सीता जी का अपवाद क्यों हुआ ?
उत्तर- सीता जी ने पूर्व भव में मुनि का अपवाद किया था।

प्रश्न 23. मुनिराज को देखकर क्रूर प्राणी अपनी क्रूरता छोड़ देते, फिर सुकुमार मुनि को स्यालिनी ने क्यों खाया ?
उत्तर- क्योंकि पिछले भव में सुकुमार ने अपनी भावी जो इस भव में स्यालिनी है, को लात मारी थी।

प्रश्न 24. राजा वसु को उसकी प्रजा ने देश निकाला क्यों दिया ?
उत्तर- छोटे व्यसन के कारण (मांस खाने के कारण)।

प्रश्न 25. नागदत्त नाम का सेठ सामायिक करते-करते मरण को प्राप्त हुआ और मरकर नरक की पर्याय मिली, ऐसा क्यों ?
उत्तर- स्वाध्याय के समय प्यास (पानी) की तृष्णा के कारण मरा, इसलिए वह भेडक बना।

प्रश्न 26. सुलभलवी नाम की सती जो दूसरों का खून भोजन खाती थी लेकिन मरकर देव हुई, ऐसा क्यों हुआ ?
उत्तर- क्योंकि उसने एक दिन अन्तर्मुहूर्त का उपवास रखा और उसी उपवास के बीच मरण को प्राप्त हुई, इसलिए उसे स्वर्गगति की प्राप्ति हुई।

प्रश्न 27. पारसीधि के जीव को अनेकों बार गाय, बिल्ली, भेड़-चींटे इत्यादि बनना पड़ा, बहुत दुख सहन किया, ऐसा क्यों हुआ ?
उत्तर- क्योंकि उसने 363 मिथ्यामत चलाये थे।

प्रश्न 28. जिन दर्शन के सिवाय से कितना पुण्य लगता है ?
उत्तर- जिनेन्द्र भगवान के दर्शन के सिवाय से एक उपवास का फल लगता है।

॥ चिंतन करें ॥

स्वभाव की भावना ही मोक्ष मार्ग है।

प्रश्न 29. मंदिर जी जाने के लिए उद्यम करने पर कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- मंदिर जी जाने के लिए उद्यम करने पर दो उपवास का फल लगता है।

प्रश्न 30. मंदिर जी के लिए चल देने पर कितना पुण्य लगता है ?
उत्तर- चार उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 31. मंदिर जी में पहुँचने पर कितना पुण्य लगता है ?
उत्तर- छह माह के उपवास का फल लगता है।

प्रश्न 32. जिन मंदिर की प्रदक्षिणा देने से कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- सौ वर्ष के उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 33. जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करने पर कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- एक हजार वर्ष के उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 34. जिनेन्द्र भगवान की पूजन स्तुति करने से कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- अनंत पापों का क्षय एवं अनंत उपवासों का फल मिलता है।

प्रश्न 35. यह फल विवरण किस ग्रंथ में कहीं लिखा गया है ?
उत्तर- पद्मपुराण के 32 वें पर्व में लिखा है।

प्रश्न 36. किस जीव को मरते समय बहुत कष्ट उठाना पड़ता है ?
उत्तर- जो जीव अपनी जाति में घमण्डी, क्रोधी, मृत्यु से डरने वाला, आत्म प्रशंसी, मुँह पर मीठा, भीतर दुष्ट होता है। उसे मरते समय बहुत दुख उठाना पड़ता है और जो ऐसे नहीं है, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता है।

प्रश्न 37. कौन सा जीव मरकर कबक योनि पाता है ?
उत्तर- जो जीव गुरु व धर्म की निंदा करता है और देव द्रव्य खाकर पेट भरता है, वह नीच कबक योनि पाता है।

प्रश्न 38. कौन से जीव मरकर उल्लू, गधा व कुत्ते बनते हैं ?
उत्तर- जो जीव भीतर कपट रखते हैं। दूसरों के कल्याण व धन को देखकर डाह करते हैं वे मरकर उल्लू, गधा व कुत्ते होते हैं।

प्रश्न 39. कौनसा जीव मरकर शाकिनी व भूतनी के पर्याय में जन्म लेता है ?
उत्तर- जो स्त्रियां (जीव) जिन मंदिरों को निंदा करने वाली है, दूसरों के

॥ चिंतन करें ॥

सदा अपना हित शुद्धता है।

गुणों का लोप करती है, लड़ाका है, वह चुड़ैल दिखती है। वे नियम से शाकिनी व भूतनी बनती हैं।

प्रश्न 40. विद्वान का जीव मरकर स्वर्ग में देव हुआ, क्या कारण था ?
उत्तर- क्योंकि वह भगवान महावीर के दर्शनों की भावना मन में लिए हुए मरण को प्राप्त हुआ था।

प्रश्न 41. कौन से जीव अज्ञानीत्व तथा कुरूप होते हैं ?
उत्तर- जो जीव स्वयं तो तप नहीं करते परंतु तप करने वालों की निंदा करते हैं वे अज्ञानी और कुरूप होते हैं।

प्रश्न 42. कौन से जीव कामदेव के समान सुंदर होते हैं ?
उत्तर- जो दुष्कर तपों को सदा तपते हैं वे कामदेव के समान सुन्दर शरीर वाले होते हैं।

सम्पूर्ण जानकारी के साथ सारभूत बात मिले और उसे ग्रहण कर अपना आत्मकल्याण कर सके, इसी उद्देश्य को लेकर मैंने यह प्रश्न एवं कहानी रूपी सुमन आगम रूपी बगान से चुनकर इस पुस्तक रूपी गुलदस्ते में सजाए हैं। वर्तमान समय में एवं आने वाली २१ वीं सदी में यह पुस्तक हमारे आदरणीय बुजुर्गों, माताओं, बहिनों एवं साधर्मी भाइयों तथा मुख्यतः हमारे कल के समाज के कर्णधार हमारे अपने बालकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी।

धन्य हैं वे माता.पिता जो अपने बालकों को बाल्यकाल से ही धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से सुसंस्कृत करते हैं। वास्तव में बाल्य अवस्था से ही बालक को ऐसे ही सुसंस्कार व उत्तम शिक्षा दी जाए जिससे कि वह बालक आगे चलकर सन्मार्ग से न भटक जाए और खुद के कल्याण के साथ.साथ परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण कर सके।

प्रिय पाठकों ! इस पुस्तक में वे सभी ज्ञान की बातें समाहित की गई हैं जिनसे बाल युवा कुमार्ग से विमुख होकर सन्मार्ग पर अग्रसर होते रहेंगे, अतः समस्त साधर्मी जनों से अनुरोध है कि इस पुस्तक को वह स्वयं पढ़कर अपने बालकों को भी पढ़ाएं तथा स्वयं के साथ-साथ अपने बालकों का भी जीवन. धर्ममयी, संस्कारमयी और महान बनाऐं।

आपका

वर्तमान निवास पता

अनुभव प्रकाश जैन,

C/o श्री पी. एल. जैन, एडवोकेट

दाना ओली, लश्कर (ग्वा.)

स्थानीय पता

अनुभव प्रकाश जैन,

C/o श्री सुरेश चन्द, पारस कुमार जैन

सदर बाजार, मौ जिला (भि’ ड)

क्या/कहाँ

क्र. विषय

पृष्ठ

  1. णमोकार मंत्र

  2. जैसी करनी वैसी भरनी 15-27

  3. पौराणिक पुरुष

  4. पौराणिक महिलायें

  5. स्तोत्र

  6. पर्व

पांच बाल्यति तीर्थंकर

  1. श्री वासुपूज्य जी

  2. श्री मल्लिनाथ जी

  3. श्री नेमिनाथ जो

  4. श्री पारर्वनाथ जी

  5. श्री महावीर जी

  6. संसार का भविष्य

।। विचार करें ।।

जो मनुष्य धीर नहीं, वह मनुष्य किसी कार्य में सफल नहीं हो सकता। ॐ

णमोकार मंत्र

णमो अरिहंताणं,

णमो सिद्धाणं,

णमो आइरियाणं,

णमो उवज्झायाणं,

णमो लोए सव्व साहूणं

प्रश्न 1. णमोकार मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है ? उत्तर— णमोकार मंत्र में पांच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। प्रश्न 2. परमेष्ठी किसे कहते हैं और यह कौन-कौन से हैं ? उत्तर— जो परम पद में स्थित हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते हैं। हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

विरक्ति का मूल कारण तृप्ति है।

परमेष्ठी के नाम इस प्रकार हैं-

प्रश्न 3. अरहंत परमेष्ठी किसे कहते हैं ?

दस अतिशय जन्म के

(1) मल नहीं, (2) पेशाब नहीं, (3) मधुर वचन, (4) सुगन्धमय शरीर, (5) वज्र वृषभ नाराच सहनन, (6) एक हजार आठ लक्षण, (7) सुन्दर रूप, (8) श्वेत रुधिर, (9) सम चतुर संस्थान, (10) अनन्त बल।

दस केवल ज्ञान के अतिशय

(1) सौ-सौ योजन चारों दिशाओं में सुभिक्ष, (2) आकाश गमन, (3) दया का भाव, (4) उपसर्ग नहीं, (5) कवलाहार नहीं, (6) चारों दिशाओं में मुख दिखाई देना, (7) सब विद्याओं का ईश्वरपना, (8) शरीर की छाया न पड़ना, (9) नाखून और केशों का नहीं बढ़ना, (10) नेत्रों के पलकों का नहीं गिरना। चौदह अतिशय देवकृत

(1) अर्धमागधी भाषा, (2) सकल जीवों में मैत्री भाव, (3) सब ऋतु के फल फूलों का फलना, (4) दर्पण के समान भूमि स्वच्छ होना, (5) मन्द-मन्द सुगन्ध वायु का चलना, (6) सब जीवों को आनंद देने वाली कंटक रहित भूमि, (7) गन्धोदक की वृष्टि होना, (8) भगवान के दोनों चरणों के तल 225 कमलरचना, (9) आकाश का निर्मल होना (10) देवों का जय-जयकार शब्द (11) धर्म चक्र का आगे-आगे चलना (12) अष्ट मंगल द्रव्यों का होना (13) पवन कुमार जाति के देवों का भूमि निर्माण करना (14) समस्त जीवों का आनन्दमय होना

णमोकार मंत्र

।। मनन करें ।।

एकान्त मूर्ख के लिए कैदखाना है ज्ञानी के लिऐ स्वर्ग।

चार अनन्त चतुष्टय

(1) अनन्त ज्ञान (2) अनन्त दर्शन (3) अनन्त सुख (4) अनन्त वीर्य अष्ट प्रातिहार्य

(1) सिंहासन (2) पुष्प वृष्टि (3) अशोक वृक्ष (4) प्रभामण्डल या भामण्डल (5) दिव्य ध्वनि (6) दुन्दुभि बाजों का बजना (7) तीन छत्र (8) चौसठ चॅवर। प्रश्न 5. सिद्ध परमेष्ठी किसे कहते हैं ?

उत्तर— सिद्ध परमेष्ठी के आठ मूलगुण होते हैं—

(1) सम्यकत्व (2) ज्ञान (3) दर्शन (4) वीर्यत्व (5) सूक्ष्मत्व (6) अवगाहनत्व (7) अगुरुलघुत्व (8) अव्यावाधात्व ।

प्रश्न 7. आचार्य परमेष्ठी किसे कहते हैं ?

प्रश्न 8. आचार्य परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?

उत्तर आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण होते हैं—

दस धर्म

बारह तप

(1) अनशन (2) अवमोदर्य (3) वृति परिसंख्यान (4) रस परित्याग (5) विविक्त शय्यासन (6) कायक्लेश (7) प्रायश्चित (8) विनय (9) वैयावृत्य (10) स्वाध्याय (11) व्युत्सर्ग (12) ध्यान

हमारा जैन धर्म

।। विचार करें ।।

पहले धर्मज्ञान प्राप्त करो पीछे और कुछ।

पंचाचार

(1) दर्शनाचार (2) ज्ञानाचार (3) चरित्राचार (4) तपाचार (5) वीर्याचार। षट आवश्यक

तीन गुप्ति

(1) मनोगुप्ति, (2) वचन गुप्ति, (3) काय गुप्ति ।

प्रश्न 9. उपाध्याय परमेष्ठी किसे कहते हैं ?

उत्तर— जो संघ में रहकर पढ़ते हैं तथा संघस्थ अन्य मुनिगणों को पढ़ाते हैं, विशेष ज्ञानवान होते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं। प्रश्न 10. उपाध्याय परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ? उत्तर— उपाध्याय परमेष्ठी के 25 मूलगुण होते हैं—

ग्यारह अंग—

(1) आचारांग, (2) सूत्रकृतांग, (3) स्थानांग, (4) समवायांग, (5) व्याख्यापठणत्ति, (6) ज्ञातृ कथा, (7) उपासका ध्यांग, (8) अतः कृछशांग, (9) अनुत्तरोप्पाद दशांग, (10) विपाक सूत्रांग, (11) प्रश्न व्याकरणांग।

चौदह पूर्व—

(1) उत्पादशर्व पूर्व, (2) अग्रयणी पूर्व, (3) वीर्यानुवाद पूर्व, (4) अस्ति नास्ति प्रवाद पूर्व, (5) ज्ञान प्रवाद पूर्व, (6) कर्म प्रवाद पूर्व, (7) सत्य प्रवाद पूर्व, (8) आंत्म प्रवाद पूर्व, (9) प्रत्याख्या पूर्व, (10) विद्यानुवाद पूर्व, (11) कल्याणवाद पूर्व, (12) प्राणानुवाद पूर्व, (13) क्रिया विशाल पूर्व, (14) लोक बिन्दु पूर्व। प्रश्न 11. साधु परमेष्ठी किसे कहते हैं ?

उत्तर— जो पंचेन्द्रिय के विषय वासनाओं और आरम्भ तथा पाप क्रियाओं से दूर है, परिग्रह से रहित है, नग्न दिगम्बर है, पिच्छी कमण्डल से युक्त है तथा ज्ञान ध्यान में अनुरक्त है, उन्हें साधु परमेष्ठी कहते हैं। प्रश्न 12. साधु परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?

उत्तर— साधु परमेष्ठी के 28 मूलगुण होते हैं—

णमोकार मंत्र

।। चिंतवन करें ।।

सावधान रहना ! यह दुनिया शैतान की दुकान है।

पांच महाव्रत-

(1) अहिंसा, (2) सत्य, (3) अचौर्य, (4) ब्रह्मचर्य, (5) अपरिग्रह। पांच समिति-

(1) ईर्या, (2) भाषा, (3) ऐषणा, (4) आदान निक्षेपण, (5) प्रतिष्ठापन । पांच इन्द्रियों पर विजय-

(1) स्पर्शन, (2) रसना, (3) घ्राण, (4) चक्षु, (5) कर्ण। षट आवश्यक कार्य-

सात विशेष गुण-

(1) नग्नता, (2) खड़े होकर आहार लेना, (3) केंशलोंच करना, (4) दन्त धवन नहीं करना, (5) एक करवट से सोना, (6) स्नान नहीं करना (7) हाथ में भोजन करना।

प्रश्न 13. णमोकार मंत्र किस ग्रंथ का मंगलाचरण है ? उत्तर- णमोकार मंत्र षटखण्डागम ग्रंथ का मंगलाचरण है। प्रश्न 14. णमोकार मंत्र किस भाषा में है ?

उत्तर- णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा में है।

प्रश्न 16. णमोकार मंत्र में कितने स्वर हैं ?

उत्तर- णमोकार मंत्र में 34 स्वर होते हैं।

प्रश्न 17. णमोकार मंत्र कब से है ?

उत्तर- णमोकार मंत्र अनादि निधन से है।

प्रश्न 19. णमोकार मंत्र पर दृढ़ श्रद्धा से किसको कौनसी विद्या सिद्ध हुई थी ?

उत्तर- णमोकार मंत्र पर दृढ़ श्रद्धा से अंजन चोर को आकाशगामनी विद्या सिद्ध हुई थी।

हमारा जैन धर्म

।। मनन करें ।।

आज ऐसे जियो मानो यह आखिरी दिन है।

प्रश्न 20. णमोकार मंत्र में कितने अक्षर हैं ?

उत्तर- णमोकार मंत्र में 35 अक्षर हैं।

प्रश्न 21. णमोकार मंत्र में कितने काव्य हैं ?

उत्तर- णमोकार मंत्र में चार काव्य हैं।

प्रश्न 22. णमोकार मंत्र के अविनय से कौन सातवें नरक में गए ? उत्तर- णमोकार मंत्र के अविनय से ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती सातवें नरक में गए। प्रश्न 23. णमोकार मंत्र में कितने पद हैं ?

उत्तर- णमोकार मंत्र में 5 पद हैं।

(1) आचार्य, (2) उपाध्याय, (3) साधु।

प्रश्न 27. णमोकार मंत्र में कितने भगवान हैं ?

उत्तर- णमोकार मंत्र में 2 भगवान हैं-

(1) अरहंत, (2) सिद्ध ।

प्रश्न 28. बैल को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था ? उत्तर- बैल को णमोकार मंत्र पदम रुचि सेठ ने सुनाया था। प्रश्न 29. कुत्ते को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था ? उत्तर- कुत्ते को णमोकार मंत्र जीवंधर स्वामी ने सुनाया था। प्रश्न 30. नाग नागिन णमोकार मंत्र के प्रभाव से क्या बने थे ? उत्तर- नाग व नागिन णमोकार मंत्र के प्रभाव से धरणेन्द्र व प‌द्मावती बने थे।

प्रश्न 31. णमोकार मंत्र में कितनी मात्राऐं हैं ? उत्तर- णमोकार मंत्र में 58 मात्राऐं हैं।

णमोकार म

।। विचार करें ।।

आत्माभ्यास उतना ही सार्थक जिसमें आत्मनिर्णय हो सके। प्रश्न 32. णमोकार मंत्र के स्मरण से किसका नाश होता है ? उत्तर— णमोकार मंत्र के स्मरण से सब पापों का नाश होता है। प्रश्न 33. णमोकार मंत्र किस छन्द में है ?

उत्तर— णमोकार मंत्र आर्या छन्द में है।

प्रश्न 34. पांच परमेष्ठी में से सर्वज्ञ कितने परमेष्ठी हैं ? उत्तर— दो, (1) अरहंत (2) सिद्ध।

प्रश्न 35. पांच परमेष्ठी में से गर्भ के अतिशय कौन से परमेष्ठी के होते हैं ?

उत्तर— किसी के नहीं।

प्रश्न 36. पांच परमेष्ठी में से पंचम गति कितने परमेष्ठी को प्राप्त हो गई है ?

उत्तर— एक, (सिद्ध)।

प्रश्न 40. ॐ में कितने परिमेष्ठी गर्भित हैं ?

उत्तर— पांच परमेष्ठी।

प्रश्न 41. पांच परमेष्ठी में से 105 कितने परमेष्ठी के आगे लगाया जाता है? उत्तर— किसी के आगे नहीं।

प्रश्न 42. अरहंत परमेष्ठी ने मोहनीय कर्म का नाश कर कौन सा अनन्त चतुष्टय प्रकट किया है ?

उत्तर— अनन्त सुख।

प्रश्न 44. दिव्य ध्वनि कितने परमेष्ठी की खिरती है ? उत्तर— एक (अरंहत)।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

आंतरिक कलह (कषाओं) के अभाव में धर्म मार्ग प्रारम्भ होता है। प्रश्न 45. पांच परमेष्ठी में से गणधर कौन से परमेष्ठी हैं ? उत्तर— आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 46. पांच परमेष्ठी के मूल गुणों का जोड़ क्या है ? उत्तर— 46+8+36+25+28=143

प्रश्न 47. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी विहार करते हैं ? उत्तर— चार— अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु।

प्रश्न 48. पांच परमेष्ठी में से कौन से परमेष्ठी नियम से इस भव में मोक्ष प्राप्त करेंगे ?

उत्तर— अरहंत परमेष्ठी।

प्रश्न 49. पांच परमेष्ठी में से वर्तमान में कषायें सहित कितने परमेष्ठी हैं ?

उत्तर— तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु।)

प्रश्न 50. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पीछी कमण्डल रखते हैं ? उत्तर— तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 52. कितने परमेष्ठी मन रहित हैं ?

उत्तर— एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

प्रश्न 53. पांच परमेष्ठी में सबसे बड़े परमेष्ठी कौन से हैं ? उत्तर— सिद्ध परमेष्ठी।

प्रश्न 54. पांच परमेष्ठी में से आर्यिका माता कौन सी परमेष्ठी हैं ? उत्तर— कोई नहीं।

प्रश्न 55. पांच परमेष्ठी में से सबसे कम मूलगुण किस परमेष्ठी के हैं ? उत्तर— सिद्ध परमेष्ठी।

प्रश्न 56. कितने परमेष्ठी आहार करते हैं ?

उत्तर— तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 57. कितने परमेष्ठी वस्त्र सहित हैं ?

उत्तर— कोई नहीं।

प्रश्न 58. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी के इन्द्रियाँ नहीं हैं ? उत्तर— एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

णमोकार मंत्र

।। मनन करें ।।

उत्तर - एक, (अरहंत परमेष्ठी)।

उत्तर - तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 62. कितने परमेष्ठी केशलोंच करते हैं ? उत्तर - तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 63. कितने परमेष्ठी संसारी हैं ?

प्रश्न 65. पांच परमेष्ठी में से सबसे छोटे परमेष्ठी कौन से हैं ? उत्तर - साधु परमेष्ठी ।

प्रश्न 66. कौन-कौन से परमेष्ठी के मूल गुणों का योग 90 है ? उत्तर - अरहंत 46 + सिद्ध 8 + आचार्य 36 = 90। प्रश्न 67. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी ने अनन्त चतुष्टय प्राप्त कर लिया है ?

उत्तर - दो (अरहंत, सिद्ध)।

प्रश्न 69. कितने परमेष्ठी निकल परमात्मा हैं ? उत्तर- एक. (सिद्ध परमेष्ठी)।

प्रश्न 70. मांगतुंगाचार्य कौन से परमेष्ठी हैं ? उत्तर - आचार्य परमेष्ठी।।

प्रश्न 71. कितने परमेष्ठी मन सहित हैं ?

उत्तर - चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु) । प्रश्न 72. सिद्ध परमेष्ठी पीछे से कौन से नम्बर के परमेष्ठी हैं ? उत्तर - चौथे नम्बर के।

हमारा जैन धर्म

।। विचार करें ।।

उपदेश जवान से नहीं, जीवन से दो।

प्रश्न 73. पांच परमेष्ठी में से चौबीस तीर्थंकर कौन से परमेष्ठी हैं ? उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।

प्रश्न 75. समवशरण कितने परमेष्ठी का लगता है ? उत्तर - एक, (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 76. कितने परमेष्ठी पद त्याग कर ग्रहस्थ बन सकते हैं ? उत्तर - तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 77. सकल परमात्मा कितने परमेष्ठी हैं ? उत्तर-एक, (अरहंत परमेष्ठी)।

उत्तर - एक, (उपाध्याय परमेष्ठी)।

प्रश्न 80. पांच परमेष्ठी में से ग्रहस्थ कौन से परमेष्ठी हैं ? उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 81. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी का उपदेश होता है ? उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 82. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी अन्तरात्मा हैं ? उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 84. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी के मूलगुण का योग 61 है ? उत्तर- दो, (आचार्य, उपाध्याय)।

प्रश्न 85. कितने परमेष्ठी ध्यान करते हैं ?

णमोकार मंत्र

।। चिंतवन करें ।।

धर्म में विवाद नहीं, विवाद में धर्म नहीं।

उत्तर— दो (आचार्य, उपाध्याय)।

प्रश्न 89. कितने परमेष्ठी मिथ्यादृष्टी हैं ?

उत्तर— कोई नहीं।

उत्तर— सूक्ष्मत्व गुण।

प्रश्न 91. णमोकार मंत्र का जाप संक्षेप में कैसे करते हैं ? उत्तर— ॐ ह्रीं असि आ उसा नमः ।

प्रश्न 93. कितने परमेष्ठी 18 दोषों से रहित हैं ?

उत्तर— दो (अरहंत, सिद्ध)।

प्रश्न 94. कितने परमेष्ठी पुनः जन्म ले सकते हैं ?

उत्तर— तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 95. वर्तमान में हम कितने परमेष्टी से बात कर सकते हैं ? उत्तर— तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 96. अरहंत परमेष्ठी का प्रक्षाल करने के बाद कहां लगाना चाहिए ? उत्तर— मस्तिष्क पर।

हमारा जैन धर्म

।। मनन करें ।।

भागना, कायरता और अधर्म है, ठहरना वीरता और धर्म है।

प्रश्न 99. अरहंत छोटे हैं सिद्ध बड़े हैं फिर पहले अरहंतों को नमस्कार क्यों किया गया है ?

उत्तर— अरहंत परमेष्ठी समवशरण में बैठकर भव्य जीवों को धर्मोपदेश देते हैं तथा सिद्धों का ज्ञान परिचय अरिहन्त के द्वारा ही होता है, इस उपकार को मानने हेतु अरहंतों को प्रथम नमस्कार करते हैं। प्रश्न 100. कितने परमेष्ठी इन्द्रियों से काम लेते हैं ? उत्तर— तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 101. णमोकार मंत्र के लेखक कौन हैं ?

प्रश्न 103. णमो अरहंताणं में कितने अक्षर हैं ?

उत्तर— इस पद में 7 अक्षर हैं।

प्रश्न 104. णमो सिद्धाणं में कितने अक्षर हैं ?

उत्तर— इस पद में 5 अक्षर हैं।

प्रश्न 105. णमो आइरियाणं में कितने अक्षर हैं ?

उत्तर— इस पद में 7 अक्षर हैं।

प्रश्न 106. णमो उवज्झायाणं में कितने अक्षर हैं ?

उत्तर— इस पद में 7 अक्षर हैं।

प्रश्न 108. णमोकार मंत्र की संक्षेप में कहानी लिखिए।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

युवाओं को धर्म स्थान देना ही अधर्म से रोकना है।

ددद

णमो अरिहंताणं

णमो-

।। विचार करें ।।

चल दिए। थोड़ी दूर चलने के बाद उन्हें एक गिद्ध पक्षी अपनी ओर आते दिखाई दिया तो वह पक्षी घबड़ा गए कि अब तो हम सबकी जान खतरे में है, यह सोचकर वह पक्षी नीचे उतरने लगे पर उन्होंने नीचे देखा कि एक शिकारी उन्हें मारने के लिए तीर से निशाना लगा रहा था। यह देख बेचारे पक्षी और घबड़ा गए कि ऊपर गिद्धराज और नीचे शिकारी। उन्होंने सोचा कि अब बचने का कोई उपाय नहीं है, क्या करें ? इतने में ही उन्हें पूर्व संस्कारवश जो कि समस्त प्रकार की आदि एवं व्यादि को मिटाने वाला, आपत्ति एवं विपत्ति को टालने वाला, दुखों से छुटकारा दिलाने वाला, पापों का नाश कराने वाला एवं सम्यक ज्ञान को प्राप्त कराने वाला, ऐसे महा मंत्रराज णमोकार मंत्र का ध्यान आया तो सभी पक्षी बीच में ही रुककर सच्ची श्रद्धा के साथ णमोकार महामंत्र का स्मरण करने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा तो नीचे गिद्ध व शिकारी दोनों तड़प रहे थे। उनको तड़पता देख सभी पक्षी नीचे उतरकर उनको णमोकार मंत्र सुनाने लगे। यह देख शिकारी व गिद्धराज कहने लगे कि मुझे क्षमा करना। मैं तुम सबका शिकार करना चाहता था और तुम मेरे दुखी समय में मुझे णमोकार मंत्र सुना रहे हो, तुम्हारा परम उपकार रहेगा हम पर। इसी बीच पक्षियों ने पूछा कि तुम्हारा यह हाल हुआ कैसे ? तो शिकारी कहता है कि जब तुम आकाश में ही रुककर सच्ची श्रद्धा के साथ णमोकार मंत्र का जाप (स्मरण) कर रहे थे तभी मैं अपना शिकार और आसान समझ खुशी से निशाना लगा रहा था, लेकिन उसी समय एक सर्प ने आकर हमें डस लिया जिससे निशाना चूककर गिद्ध पक्षी में जा लगा, इसलिए हम दोनों का यह हाल हो गया। यह कहते ही उसकी जान निकल गई।

ज्ञानी विचार करते हैं कि- अहा ! जब तिर्यन्च गति के जीव श्रद्धा के साथ णमोकार मंत्र का स्मरण कर अपने कष्टों को मिटा सकते हैं सुख की प्राप्ति कर सकते तो हैं हम सभी तो मनुष्य गति के संयम धारण करने वाले जीव हैं। इसलिए हम सभी भी णमोकार महामंत्र का पूर्ण श्रद्धा के साथ स्मरण (जाप) करें और अपने समस्त पापों का नाश कर, मोह, राग-द्वेष का अभाव कर सच्चे सुख की प्राप्ति करें। ऐसी मंगल भावना के साथ-

जय जिनेन्द्र

णमोकार मंत्र

।। चिंतवन करें ।।

खुद जियो और दूसरों को जीने दो ! यही सच्ची दया है।

जैसी करनी वैसी भरनी

प्रश्न 1. श्री पाल को कुष्ठ रोग क्यों हुआ ?

प्रश्न 2. अंजना सती का 22 वर्ष तक अपने पति से वियोग क्यों रहा था? उत्तर - पूर्वभव में अंजना सती ने सौत से लड़कर उसकी जिनेन्द्र प्रतिमा को 22 पल तक वहां से हटा दिया था, अतः उसे अपने पति का वियोग सहना पड़ा था।

प्रश्न 4. कुन्द-कुन्द आचार्य इतने बड़े विद्वान कैसे हुए थे ? उत्तर - उन्होंने कोण्डेश ग्वाले की पर्याय में मुनिराज को शास्त्र दिया था। प्रश्न 5. राजा श्रेणिक को नरकागु का बंध क्यों हुआ था ?

उत्तर - उसने अपने पुत्रों को आज्ञा दी थी कि खून से बावड़ी भरकर मुझे उसमें स्नान कराओ ।

प्रश्न 8. यशोधर राजा को मरकर मुर्गा बनना पड़ा, ऐसा उन्होंने क्या किया था ?

उत्तर - उसने आटे का मुर्गा बनवाकर चण्डमारी देवी के आगे चढ़ाया था। हमारा जैन धर्म

।। मनन करें ।।

आकांक्षा रहित धर्म करना ही, सबसे उत्तम है।

प्रश्न 10. यमपाल चाण्डाल के समुद्र में फेंके जाने पर उसके लिए सिंहासन क्यों बन गया था ?

उत्तर - क्योंकि उसने ऐसी प्रतिज्ञा ली थी कि चतुर्दशी के दिन किसी जीव को फांसी नहीं दूगाँ।

प्रश्न 11. ब्रम्हदत्त चक्रवर्ती को सातवें नरक किस कारण जाना पड़ा ? उत्तर - उन्होंने णमोकार मंत्र को पांव से मिटाया था।

प्रश्न 12. किस कारण मृगसेन धीवर के जीव की 6 बार रक्षा हुई ? उत्तर - उसने मृगसेन धीवर की पर्याय में एक मछली को 6 बार जाल में फंसने पर भी छोड़ दिया था।

प्रश्न 13. श्री भूत पुरोहित को गोबर खाना पड़ा, मुक्के सहने पड़े, देश निकाला मिला, यह दण्ड उसे क्यों मिला ?

उत्तर - क्योंकि उसने अमानत में ख्यानत की थी।

उत्तर – पूर्व भव में इन्होंने मुनिराज को कड़वी तुम्बी का आहार दिया था। प्रश्न 16. पांच पाण्डव में से दो को मोक्ष की प्राप्ति क्यों नहीं हुई ? उत्तर - जलते समय इनके मन में अपने भाईयों के प्रति राग उत्पन्न हुआ था।

प्रश्न 17. सिंहासन सहित राजावसु को नरक क्यों जाना पड़ा था ? उत्तर - असत्य बोलने के कारण।

प्रश्न 18. सोमा सती के गले में नाग का हार क्यों बना था ? उत्तर - क्योंकि उसने रात्रि भोजन के त्याग का नियम लिया था। प्रश्न 19. अंजनचोर को आकाशगामिनी विद्या सिद्ध क्यों हुई ? उत्तर - णमोकार मंत्र पर दृढ़ श्रद्धा के कारण।

जैसी करनी वैसी भरनी

।। विचार करें ।।

स्व दया ही परम धर्म है।

प्रश्न 20. सीता अग्नि कुंड में कूर्वी और वह जल का सरोवर बन गया। यह सब कैसे हो गया ?

उत्तर - सीता जी के शील के महात्म्य के कारण।

प्रश्न 21. वृषभसेना के स्नान के जल से सभी प्रकार के रोग व विष नष्ट हो जाते थे उसे ऐसी सर्वोषधि सिद्धि कैसे प्राप्त हुई ?

उत्तर - पिछले भव में मुनि की सेवा कर औषधि दान देने के कारण। प्रश्न 22. सीता जी का अपवाद क्यों हुआ ?

उत्तर - क्योंकि पिछले भव में सुकुमार ने अपनी भावी जो इस भव में श्यालनी है, को लात मारी थी।

प्रश्न 24. राजा वकु को उसकी प्रजा ने देश निकाला क्यों दिया ? उत्तर - खोटे व्यसन के कारण (मांस खाने के कारण)।

प्रश्न 25. नागदत्त नाम का सेठ सामायिक करते-करते मरण को प्राप्त हुआ और मरकर मेंढक की पर्याय मिली, ऐसा क्यों ?

उत्तर - स्वाध्याय के समय प्यास (पानी) की तृष्णा के कारण मरा, इसलिए वह मेंढक बना।

प्रश्न 26. कुलवन्ती नाम की सती जो दूसरों का झूठा भोजन खाती थी लेकिन मरकर देव हुई, ऐसा क्यों हुआ ?

प्रश्न 27. मारीचि के जीव को अनेकों बार गधा, बिल्ली, पेड़-पौधे इत्यादि बनना पड़ा, बहुत दुख सहन किया, ऐसा क्यों हुआ ?

उत्तर- क्योंकि उसने 363 मिथ्यामत चलाये थे।

प्रश्न 28. जिन दर्शन के विचार से कितना पुण्य लगता है ? उत्तर- जिनेन्द्र भगवान के दर्शन के विचार से एक उपवास का फल लगता है।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

स्वभाव की साधना ही मोक्ष मार्ग है।

प्रश्न 32. जिन मंदिर की प्रदिक्षणा देने से कितना पुण्य मिलता है ? उत्तर - सौ वर्ष के उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 37. कौन सा जीव मरकर काक योनि पाता है ?

उत्तर - जो जीव गुरु व धर्म की निंदा करता है और देव द्रव्य खाकर पेट भरता है, वह नीच काक योनि पाता है।

।। मनन करें ।।

साध्य अपना निज शुद्धात्मा है।

गुणों का लोप करती हैं, लड़ाका हैं, वक्र दृष्टि से देखती हैं। वे नियम से शाकिनी व भूतनी बनती हैं।

प्रश्न 40. मेंढक का जीव मरकर स्वर्ग में देव हुआ, क्या कारण था ? उत्तर- क्योंकि वह भगवान महावीर के दर्शनों की भावना मन में लिए हुए मरण को प्राप्त हुआ था।

प्रश्न 41. कौन से जीव अंगहीन तथा कुरूप होते हैं ?

उत्तर- जो जीव स्वयं तो तप नहीं करते परंतु तप करने वालों की निंदा करते हैं वे अंगहीन और कुरूप होते हैं।

प्रश्न 42. कौन से जीव कामदेव के समान सुंदर होते हैं ? उत्तर- जो दुष्कर तपों को सदा तपते हैं। वे कामदेव के समान सुन्दर शरीर वाले होते हैं।

प्रश्न 43. कौन से जीव रोग रहित होते हैं ?

उत्तर- जो कृपालु, दूसरों के धन, स्त्री आदि में शुद्ध मन रखने वाले, औषधि दान देने वाले होते हैं, वे जीव रोग रहित होते हैं। प्रश्न 44. कौन सा जीव मूढ़ बुद्धि व गूंगा होता है ?

उत्तर- जो जैन सिद्धान्तों के सूक्ष्म भेद प्रभेदों को सुनकर धर्म की निंदा करता है, वह जीव मूढ बुद्धि व गूंगा होता है।

प्रश्न 45. कौन सा जीव रक्त पित्त रोग से दूषित कोढ़ी होता है ? उत्तर- जो जीव मुनियों को देखकर मदान्ध हो थूकता है, उसे यह रोग होता है।

प्रश्न 46. किस जीव को अजीर्ण व उदर रोग होता है ?

उत्तर- जो उत्तम कुल में पैदा होकर भी मांस, मदिरा का भक्षण करता है उसे यह रोग होता है।

प्रश्न 47. किस जीव के परम चतुर, सुन्दर बच्चे जन्म लेते हैं ? उत्तर- जो जीव पशु-पक्षियों को कष्ट नहीं देते हैं, उनके परम चतुर सुन्दर बच्चे होते हैं।

प्रश्न 48. कौन सा जीव बुढ़ापे में निर्धन हो दुख भोगता है ? उत्तर- जो जीव पहले दान देता है और पीछे पछताता है। वह दान का फल प्राप्त कर बुढ़ापे में निर्धन हो दुःख भोगता है।

हमारा जैन धर्म

।। विचार करें ।।

साधन, सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र है।

प्रश्न 49. कौन सा जीव मरकर काँतर की पर्याय में जन्म लेता है ? उत्तर- जो जीव मृग, हंस, तोता आदि पक्षियों के बच्चे को पिजड़े में बन्द कर पोषता है। वह पापी जीव भव-भव में काँतर होता है।

प्रश्न 50. कौन सा जीव निंदनीय व मूर्ख होता है ?

उत्तर- जिस जीव के नास्तिकता रहती है और जो जीव-अजीव,

धर्म-अधर्म को नहीं मानता है। वह निंदनीय व मूर्ख होता है। प्रश्न 51. किस जीव की लम्बी आयु होती है ?

उत्तर- जो सदा जीवों की रक्षा करता है, सबका उपकार करता है और दूसरों की भलाई चाहता है, उस जीव की आयु बहुत होती है। प्रश्न 52. कौन सा जीव निर्बुद्धि हो जाता है ?

उत्तर- जो क्रोध के वशीभूत हो गुणी, तपस्वी, यशस्वी और विद्वान का तिरस्कार करता है, वह जीव निर्बुद्धि हो जाता है।

प्रश्न 53. कौन से जीव नीच नपुंसक लिंगी होते हैं ?

उत्तर- जो लोग पशुओं की नाक, कान छेदते हैं, खोटे विचार रखते और सदा अपना ही शृंगार किया करते हैं, वे नीच व नपुंसक के रूप में जन्म लेते हैं।

प्रश्न 54. कौन से जीव बहरे होते हैं ?

उत्तर- जो भगवान की वाणी को नहीं सुनते और विकथा, कुशास्त्रों व मन में विकार उत्पन्न करने वाली बातों को सुनते हैं उन जीवों को कानों से कुछ सुनाई नहीं देता अर्थात् बहरे होते हैं।

प्रश्न 55. कौन सा जीव स्त्री पर्याय में जन्म लेता है ? उत्तर- जो पुरुष, स्त्रियों में अधिक आसक्ति रखने वाला, कामी, चपल, धूर्त और सदा स्त्रियों का अन्वेषण करने वाला होता है, वह स्त्री पर्याय में जन्म लेता है।

प्रश्न 56. कौन सी स्त्री मरकर पुरुष पर्याय के रूप में जन्म लेती है ? उत्तर- जो स्त्री सत्यवादिनी, पवित्र एक देश ब्रम्हचर्य धारण करने वाली, स्थिर मनवाली, धर्मात्मा होती है, वह स्त्री मरकर पुरुष पर्याय में जन्म लेती है।

जैसी करनी वैसी भरनी

।। चिंतवन करें ।।

त्याग का अहंकार नहीं, अहंकार का त्याग करो।

प्रश्न 57. कौन से जीव मरकर नरकगति में जाते हैं ?

उत्तर - जो जीव हिंसक, असत्य बोलने वाले, पराई स्त्री और धन को चुराने वाले, मायाचारी, घमण्डी, दूसरों के सदा दोष देखने वाले और कृतघ्न होते हैं। ऐसे पापी निश्चित रूप से दुखों के समुद्र, नरक में जाते हैं।

प्रश्न 58. कौन से जीव मरकर स्वर्ग (देव) गति में जाते हैं ? उत्तर - जो लोग (जीव) सदा दानी, अर्हत देव के पूजक, तपस्वी, इन्द्रियों को वश में करने वाले, कोमल परिणामी, पवित्र विचार वाले, हित, मित्र, प्रिय बोलने वाले और देव, शास्त्र, गुरु के भक्त होते हैं। वे जीव स्वर्ग में जा सुख भोगते हैं।

प्रश्न 59. कौन सा जीव अगले भव में अन्धा बनता है ?

उत्तर - जो प्रतिदिन भगवान के दर्शन नहीं करता और किसी मां, बहिन को बुरी निगाह से देखता है वह जीव नियम से अन्धा होता है।

प्रश्न 60. कौन से जीव मरकर तिर्यन्चगति में जाते हैं ?

उत्तर - जो जीव (लोग) अपने मतलब के लिए दूसरों से स्नेह करते हैं परन्तु भीतर खोटे अभिप्राय रखते हैं और जो मायाचारी, आडम्बर. दिखाने वाले, ईर्ष्यालु, बहुत भोजन करने वाले, बहुत सोने वाले होते है वे नाना दुखों से पूर्ण तिर्यन्चगति में जाते हैं।

प्रश्न 61. इन फलों का वर्णन कहाँ दिया गया है ?

उत्तर - विमल पुराण के चौथे सर्ग में दिया गया है।

प्रश्न 62. जिनदेव के हाथ पर जलते हुए अंगारे क्यों रखे गए थे ? उत्तर- झूठ बोलने के कारण।

प्रश्न 63. एक ही परिवार के पांच सदस्य स्वर्ग में गए और एक नाग श्री अकेली पांचवे नरक में गयी, ऐसा क्यों हुआ ?

उत्तर - क्योंकि नागश्री ने मुनिराज को विष मिश्रित आहार दिया था। प्रश्न 64. श्री वदंक मंत्री की आँखें क्यों फूटी ?

उत्तर - मिथ्यात्व मार्ग में जाकर मुनि की निंदा करने से उसकी आँखें फूट गईं।

हमारा जैन धर्म

।। मनन करें ।।

धर्मी स्वभाव का आश्रय लेने वाला ही धर्मात्मा है।

प्रश्न 65. शिकारी पुरुवाभील स्वर्ग में देव कैसे बना ?

उत्तर - उसने मुनिराज के कहने पर अहिंसा व्रत का पालन किया था। उसी के प्रभाव से वह स्वर्ग में देव बना।

प्रश्न 66. स्वाध्याय करने से क्या होता है ?

उत्तर- स्वाध्याय से कर्मों की निर्जरा होती है। हिताहित का विवेक जाग्रत होता है। जिससे आत्म कल्याण सम्भव होता है। स्वाध्याय आत्म उन्नति का परम साधन है।

जैसी करनी वैसी भरनी

उज्जयनी नगर में एक सुरेन्द्रदत्त नाम का सेठ रहता था, जो कि अपूर्व वैभव का धनी था तथा अपनी पत्नी यशोभद्रा के साथ निवास करता था। यशोभद्रा के कोई संतान नहीं थी इसलिए वह बड़ी ही बेचैन रहती थी। पुत्र के बिना उसे सारा वैभव राख के ढेर के समान लगता था। सेठ जी निर्मोही प्रकृति के थे। वे दिगम्बरी दीक्षा लेने का अवसर देख रहे थे।

एक बार नगर में मुनिराज के आगमन का समाचार सुन यशोभद्रा भी दर्शन करने गई। मुनि’ वदंना कर उसने पूछा कि हे स्वामी ! अपार धनादि से सम्पन्न होने पर भी मेरी अब तक गोद खाली है। अतः मैं बहुत दुखी हूँ मुझे पुत्र प्राप्ति होगी या नहीं। मुनिराज बोले-पुत्र तो होगा, किन्तु उसका मुख देखकर तुम्हारे पति दीक्षा ले लेंगे। संयोग-वियोग की यह बात सुन कर यशोभद्रा की आँखों से हर्ष-विषाद के आँसू निकल पड़े।

“संयोग व वियोग तो संसार रूपी समुद्र के दो किनारे हैं। ज्ञानी जीव संयोग को अनुकूल जानकर कभी खुशी नहीं मनाते और वियोग को पाप का उदय जानकर कभी दुखी नहीं होते हैं।”

कुछ समय बाद सेठ के घर रूपवान, महा गुणवान पुत्र का जन्म हुआ। सेठ जी को यह मालूम न पड़े इसलिए इस समाचार को गुप्त रखा गया। पुत्र की सम्पूर्ण व्यवस्था तलघर में कर दी गई परन्तु “सत्य कभी छुपता नहीं है।” दासी के द्वारा रुधिरादि से लिप्त मलिन वस्त्रों को धोता हुआ देखकर किसी ब्राम्हण ने उनके यहां पुत्र प्राप्ति का अनुमान कर लिया और धन के लोभ में सेठ को पुत्रोत्पत्ति का समाचार सुना दिया। सेठ ने पुत्र का मुख देखकर ब्राम्हण को मुंह माँगा इनाम देकर विदा किया और पत्नी के इस छल को जैसी करनी वैसी भरनी

।। विचार करें ।।

राग द्वेष करना छोड़ दो ! बैर व विरोध सब दूर हो जायेंगे।

देखकर उनका वैराग्य और प्रबल हो उठा और उन्होंने पुत्र को सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी बनाकर स्वयं दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली और वन की ओर चल गये।

अति स्नेह के कारण यशोभद्रा ने पुत्र का नाम सुकुमार रख दिया। पति का वियोग होने पर उसका स्नेह पुत्र पर और अधिक बढ़ गया। कहीं मुनि को देखकर वह भी दीक्षा न ले ले, ऐसा भय उसके हृदय में व्याप गया। वह मुनि दर्शन न कर सके ऐसी उसने कठोर व्यवस्था कर दी। उसने सम्पूर्ण सामग्री अपने महल में ही जुटा दी। विशाल चहारदीवारी के बीच एक रत्नजड़ित स्वर्ण महल बनवाया। उसके चारों ओर बत्तीस रजतमय महल बनवाये। इस स्वर्ण महल में रहता हुआ कुमार दिन रात का भेद भी न जान पाया। ऐसी जगह मुनि दर्शन तो उसे स्वप्न में भी दुर्लभ थे। युवावस्था आने पर बत्तीस कन्याओं के साथ उसका विवाह कर दिया। अंजुलि के जल की तरह उसका जीवन जल खिरने लगा। वह भोगों की रंगरलियों में अपना सब कुछ भूल गया। माँ की ममता ने उसे मदहोश कर दिया।

अरे ! जब एक-एक इन्द्रियों के विषय की चाह रखने वाले हाथी, मीन, भ्रमर, पतंगा व हिरण मरण को प्राप्त होते हैं, तो पांचों इन्द्रियों के भोगों की निरन्तर चाह रखने वाले इस जीव की संसार में क्या दशा होगी ? एक दिन किसी व्यापारी ने आकर एक रत्नमय कम्बल नगर के राजा को दिखलाया। राजा ने मूल्य न दें सकने के कारण उसे वापस कर दिया। यशोभद्रा ने कम्बल का मूल्य चुकाकर उसे अपने पुत्र के लिए खरीद लिया परन्तु सुकुमार ने उसे देखकर कहा कि यह कठोर है इसलिए मेरे योग्य नहीं। तब यशोभद्रा ने उस कम्बल की अपनी पुत्र वधुओं के लिए जूतियाँ बनवा दी। एक दिन एक पक्षी उस जूतीं को मांस का टुकड़ा समझकर उठा ले गया और उसे राज भवन में जाकर छोड़ दिया। राजा ने आश्चर्य से उसे देखकर पूछा यह क्या है ! तो मंत्री कहता है कि- यह सुकुमार की पत्नी की पादुका है। यह सुन राजा कौतूहलपूर्वक सुकुमार को देखने के लिए चल दिए। यशोभद्रा ने राजा के आगमन पर बहुत सम्मान किया और रत्न सिंहासन पर उन्हें बिठाया। यशोभद्रा ने पूछा- हे राजन् ! आपका शुभागमन कैसे हुआ ? तो राजा कहते हैं-कि सुकुमार को देखने आया हूँ। राजा ने स्नेह के साथ सुकुमार को हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

ज्ञान के बिना मनुष्य का जीवन पशु समान है।

भी अपने ही साथ सिंहासन पर बिठा लिया। यशोभद्रा ने राजा से भोजन करने का आग्रह किया। भोजन के पश्चात् राजा ने कहा कि कुमार को तीन व्याधियाँ जान पड़ती हैं। आप उनकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं। यशोभद्रा ने पूछा-कौन सी ? "वह अपने आसन पर स्थिर नहीं बैठता, प्रकाश में इसकी आँख से पानी बहता है और भोजन में एक-एक चावल खाता है और थूकता है। "राजा ने खेदपूर्वक कहा। तब यशोभद्रा बोली- राजन् ! यह दिव्य शैय्या पर सोता है और दिव्य गद्दी पर बैठता है। आज आपके साथ सिंहासन पर बैठा तो जो राई के दाने आप पर न्यौछावर किए गए थे वह इसे चुभ रहे थे इसलिए ठीक से न बैठ सका। इसने अब तक रत्नों की प्रभा को छोड़कर कभी दीपक की प्रभा को नहीं देखा है। अतः जब आपकी दीपक से आरती उतारी तो उसे देखकर इसकी आँखों में आँसू आ गये और राजन् तीसरी बात यह है कि उसके लिए सूर्यास्त के समय चावलों को तालाब के भीतर कमल’ की कर्णिका में रख दिया जाता है। तब दूसरे दिन उन चावलों से बने भात को खाता है। आज उन चावलों में कुछ अन्य चावल मिला हुआ है, इसलिए वह उन्हें चुन-चुन कर खा रहा था। राजा को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह सुकुमार का दूसरा नाम अवन्ति सुकुमार रखकर वापिस राजभवन चला गया।

एक दिन सुकुमार के मामा यशोभद्र मुनिराज को अवधि ज्ञान से विदित हुआ कि अब सुकुमार की आयु अल्प रह गई है और उसकी माँ ने उसके हित के सभी दरवाजे बंद कर दिए हैं और वह पुत्र के व्यामोह में उन्मत्त हो गई है। तब वह सुकुमार को प्रबुद्ध करने के लिए वर्षायोग ग्रहण करने के दिन ही उसके भवन के निकटवर्ती उद्यान में स्थित जिनमंदिर में आए। वनपाल ने मुनिराज के आगमन का समाचार यशोभद्रा को दिया। वह मुनिराज के पास पहुँची और वंदना करके बोली-हे नाथ! मुझे पुत्र का मोह बहुत है। वह आपके वचनों को सुनते ही दीक्षा ग्रहण कर लेगा तब मैं उसके वियोग में जीवित नहीं रह सकूँगी। इसलिए आप यहाँ से अन्यत्र विहार कर जावें । मुनिराज बोले- हे माता! आज वर्षायोग का दिन है। अब अन्यत्र जाना संभव नहीं अब मुझे चातुर्मास प्रतिमा योग से यहीं रहना होगा। यशोभद्रा दुःखी मन से घर गई और सुकुमार की सुरक्षा और अधिक कड़ी कर दी, ताकि मुनिराज की गंध भी वहाँ न पहुँच पाये। कार्तिक की पूर्णमासी को रात्रि के अन्तिम प्रहर में मुनिराज ने वर्षायोग समाप्त जैसी करनी वैसी भरनी

।। मनन करें ।।

जिससे तुम्हें प्रेम है ! उनमें से कौन-कौन पर भव में तुम्हारे साथ जायेगा। किया। जब उन्होंने जाना कि सुकुमार की निंद्रा भंग हो चुकी है तो उन्होंने त्रिलोक प्रज्ञप्ति का पाठ प्रारम्भ कर दिया और जब उसमें स्वर्ग के पदमनाभ देव की विभूति का वर्णन आया तो उसे सुनकर सुकुमार को जाति स्मरण हो गया और उसका हृदय वैराग्य से भर गया। सम्पूर्ण वैभव उसे क्षण में विषतुल्य भासने लगा और भोग भुजंग समान दिखने लगे। वह पक्षी की तरह इस

कारागृह से मुक्ति के लिए तड़पने लगा। कुमार को भवन से जाने का कोई उपाय नहीं दिखा तो वह व्याकुल हो गया। इतने में उसे एक वस्त्रों की भरी पेटी दिखी। उसने वस्त्रों को निकालकर आपस में बांध लिया और वस्त्रमाला को खिड़की से बांधकर पुण्योदय से नीचे उतर गया। पश्चात् मुनिराज के निकट जाकर वंदना करके दीक्षा लेने की प्रार्थना करने लगा। मुनिराज संबोधन पूर्वक बोले-वत्स ! तुमने सम्यक विचार किया है। चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्रादि तो अस्त होकर फिर उदित होते हैं। ऋतुयें जाने पर पुनः पुनः वापिस आती हैं, परन्तु इन्द्रियां, यौवन, आयु, कायादिक एक बार जाने पर वापिस नहीं आते। जैसे पर्वत से नदी बेखटक चली जाती है वैसे ही यह आयु क्षण-क्षण में बेरोक चली जा रही है। सिर पर मौत सवार है। ऐसे अवसर में आत्महित को भूलना यह बड़ा ही अनर्थ है। यह मनुष्य पर्याय बार-बार नहीं मिलती, इसलिए हे भव्य ! आत्महित में शीघ्र सावधान हो जाओ ! अब तुम्हारी आयु तीन दिन मात्र शेष है। मुनिराज का करुण संबोधन सुनकर सुकुमार की वैराग्य वीणा झनझना उठी और सुकुमार भी जैनेश्वरी भगवती दीक्षा धारण करके वन की ओर चल दिया। कहाँ राई का दाना चुभता था और कहाँ कँटीली भूमि पर कोमल पैर पड़ते ही पैरों से खून बह निकला। सम्पूर्ण रास्ता खून से लथपथ हो गया। मुनिराज सुकुमार वन में जाकर एक शिला तल पर प्रतिमायोग से ध्यानस्थ हो गए, देह से विरक्त हो, आत्मस्थ हो गए।

उसी समय सुकुमार की भावी जिसे सुकुमार ने पूर्वभव में लात मारी थी वह अनेक भवों में परिभ्रमण करती हुई कर्मयोग से उसी वन में श्यालनी हुई। वह खून चाटती हुई अपने पुत्रों सहित वहाँ आ पहुंची जहां सुकुमार ध्यानस्थ थे। सुकुमार को देखते ही उसे पूर्व संस्कार से बैर के कारण प्रतिशोध की आग भड़क उठी और वह अतिक्रूर परिणाम से सुकुमार के शरीर को भक्षण करने लगी, दूसरी ओर से उसके बच्चे भी भक्षण करने लगे।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

सच्ची भावना एक दिन अवश्य पूरी होती है।

जैसी करनी वैसी भरनी

।। विचार करें ।।

जो जोड़ते हैं वे डूबते हैं। जो छोड़ते हैं, वे पूज्य होते हैं। बैर के कारण श्यालनी तीन दिन तक सुकुमार के शरीर को चोंट-चोंट कर खाती रही। अंत में जब तीसरे दिन पेट की आंतों को निकालकर फाड़ दिया तो उनके प्राण पखेरू उड़ गए। वह धन्यात्मा परम समाधि से मरण कर क्षण में सवार्थ सिद्धि में जाकर देव पर्याय में उत्पन्न हुए और अल्प काल में परम पद को प्राप्त हुए।

जैसी करनी वैसी भरनी ! संसार में प्रत्येक जीव को अपने अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा अवश्य ही मिलता है। अतः हम सभी बुरे कर्मों से बचते हुए सदकर्मों को अपने जीवन में अपनायें और अपना जीवन धन्य बनायें।

युवाओं को धर्म में स्थान देना ही

अधर्म से रोकना है।

युवाओं के चरित्र पर ध्यान देना ही

उन्हें व्यसन से रोकना है।

प्रेम से समझाकर तुम उन्हें आगे लाओ। बन्धुओं !

आगे लाने का अर्थ ही

उन्हें पतन से रोकना है।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

जो अपने दोष का कारण ! दूसरों को मानते हैं, उनका दोष कभी नहीं टलता। 卐

पौराणिक पुरुष

प्रश्न 1. वे कौन थे जिन्हें भस्म व्याधि का रोग हुआ था ? उत्तर - समन्तभद्र आचार्य।

प्रश्न 2. वे कौन थे जो प्रभावना अंग में प्रसिद्ध हुए ? उत्तर - वज्रकुमार ।

प्रश्न 3. वे कौन थे जिनके गले में मरा हुआ सर्प डाला गया था ? उत्तर- यशोधर मुनिराज ।

प्रश्न 4. वे कौन थे जिनको कोढ़ था। उसे उन्होंने स्वयं दूर किया ? उत्तर - वादिराज मुनिराज ।

प्रश्न 5. वे कौन थे जिन्होंने सात सौ मुनियों का उपसर्ग दूर किया ? उत्तर - विष्णुकुमार मुनिराज ।

प्रश्न 6. वे कौन थे जिनका उपसर्ग राम लक्ष्मण ने दूर किया ? उत्तर - देशभूषण कुलभूषण मुनिसज ।

प्रश्न 7. वे कौन थे जिन्होंने प्रथम मोक्ष का द्वार खोला था ? उत्तर - अनन्तवीर्य जी।

प्रश्न 8. वे कौन थे जिनको मुनिदीक्षा लेने के अन्तर्मुहूर्त में केवल ज्ञान प्राप्त हुआ ?

उत्तर - भरत चक्रवर्ती।

प्रश्न 9. वे कौन थे जो स्थितिकरण अंग में प्रसिद्ध हुए ? उत्तर - वारिषेण मुनिराज ।

प्रश्न 10. वे कौन थे जो वात्सल्य अंग में प्रसिद्ध हुए ? उत्तर - विष्णुकुमार मुनिराज ।

पौराणिक पुरुष

।। मनन करें ।।

विषयाभिलाषी होना ही आकुलता की जननी है।

प्रश्न 11. वे कौन थे जिन पर प्रतीन्द्र ने उपसर्ग किया था ? उत्तर— राम मुनिराज।

प्रश्न 12. वे कौन थे जिनको लोहे के गरम कड़े पहनाए गए थे ? उत्तर— पांच पाण्डव।

प्रश्न 13. वे कौन थे जिनके सिर पर जलती सिंगड़ी रखी गई थी ? उत्तर— गजकुमार मुनि।

प्रश्न 14. वे कौन थे जिनको 48 तालों में बन्द किया गया ? उत्तर— मांगतुंगाचार्य।

प्रश्न 15. वे कौन थे जिन्होंने एक वर्ष तक खड़े होकर तप किया ? उत्तर— बाहुबली।

प्रश्न 16. वे कौन थे जिन्हें अपनी कानी पत्नी का 12 वर्ष तक ध्यान रहा ? उत्तर— पुष्पडाल मुनिराज।

प्रश्न 17. वे कौन थे जिन्होंने अपने पिता को नगर द्वार के ऊपर कैद करके रखा था ?

उत्तर— राजा कंस।

प्रश्न 18. वे कौन थे जिनको तीन दिन तक श्यालनी खाती रही ? उत्तर— सुकुमार मुनि।

प्रश्न 19. वे कौन थे जो विदेह क्षेत्र गऐ थे ?

उत्तर— आचार्य कुन्द-कुन्द।

प्रश्न 20. वे कौन थे जिनको देवता ने नगर बसाकर आहार दिया था ? उत्तर— चन्द्रगुप्त मुनिराज।

प्रश्न 21. वे कौन थे जिनके निमित्त से द्वारिका जली थी ? उत्तर— द्वीपायन मुनिराज।

प्रश्न 22. वे कौन थे जो निर्विचिकित्सा अंग में प्रसिद्ध हुए ? उत्तर— उद्दायन राजा।

प्रश्न 23. वे कौन थे जिनकी भक्ति के प्रभाव से नेत्रज्योति वापस लौटी थी? उत्तर— पूज्यपाद स्वामी जी।

हमारा जैन धर्म

।। विचार करें ।।

यदि आप अपना हित चाहते हो तो आकुलता से दूर रहिए।

प्रश्न 24. वे कौन थे जिन्होंने हाथी पर बैठे-बैठे केशलोंच किया था ? उत्तर— राजा मधु।

प्रश्न 25. वे कौन थे जिन्होंने शेर को जलेबी खिलाई थी ? उत्तर— अमरचन्द दीवान।

प्रश्न 26. वे कौन थे जिन्होंने अपने पैर के नीचे की धूल उठाकर पहाड़ पर फेंकी, तो पहाड़ सोने का हो गया ?

उत्तर— शुभचन्द्राचार्य।

प्रश्न 27. वे कौन थे जिन्हें णमोकार मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा थी ? उत्तर— अंजन चोर।

प्रश्न 28. वे कौन थे जिन्होंने विवाह के अगले ही दिन दीक्षा ले ली ? उत्तर— जम्बू स्वामी।

प्रश्न 29. वे कौन थे जिन्होंने कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष में ब्रह्मचर्य का नियम लिया था ?

उत्तर— विजय सेठ विजयारानी।

प्रश्न 30. वे कौन थे जिनके गिरने से शिला चूर-चूर हो गई थी ? उत्तर— हनुमान।

प्रश्न 31. वे कौन थे जिन्होंने कहा कि ‘अज्जैर्यष्ट-व्यम्’ शब्द का अर्थ गुरुजी ने बकरा कहा था, इस प्रकार झूठ बोला तो सिंहासन सहित पृथ्वी में धंस गए ?

उत्तर— राजा वसु।

प्रश्न 32. वे कौन थे जो ज्ञानी होते हुये भी भाई की लाश को 6 महीने तक कन्धे पर रखे घूमते रहे ?

उत्तर— रामचन्द्र जी।

प्रश्न 33. वे कौन थे जिनका सिद्धचक्र के विधान से कुष्ठ रोग मिटा था ? उत्तर— श्री पाल।

प्रश्न 34. वे कौन थे जिन्होंने संघ के साधुओं को कहा कि यहाँ बारह वर्ष तक अकाल पड़ेगा, तुम दक्षिण दिशा में चले जाओ ?

उत्तर— भद्रबाहु आचार्य।

पौराणिक पुरुष

।। चिंतवन करें ।।

सदाचार का प्रारम्भ राष्ट्र की उन्नति का प्रारम्भ है। प्रश्न 35. वे कौन थे जिन्होंने कोढ़ी का वेष बनाकर चोरी की और अन्त में मुनि बनकर मोक्ष प्राप्त किया ?

उत्तर- विद्युच्चर मुनि।

प्रश्न 36. वे कौन थे जिन्होंने जैन धर्म का पहला ग्रन्थ लिखा ? उत्तर - आचार्य पुष्पदंत एवं भूतवली ।

प्रश्न 37. वे कौन थे जिन्होंने मुनि से ऐसा सुना कि ‘तेरी तीन दिन की आयु शेष रह गयी है’ ऐसा सुन दीक्षा ले ली ?

उत्तर - सुकुमार मुनि ।

प्रश्न 38. वे कौन थे जिनके नगर आगमन से नगर में मरी का रोग दूर हो गया था ?

उत्तर-सप्तऋषि मुनियों के आगमन से।

प्रश्न 39. वे कौन थे जो राम की मृत्यु का समाचार सुन स्वयं भी मरण को प्राप्त हो गये ?

उत्तर- लक्ष्मण ।

प्रश्न 40. वे कौन थे जिनका जन्म कारावास में हुआ था ? उत्तर - श्रीकृष्ण ।

प्रश्न 41. वे कौन थे जिन्होंने कुत्ते को णमोकार मंत्र सुनाया था ? उत्तर - जीवंधर स्वामी।

प्रश्न 42. वे कौन थे जिनका जन्म शमशान घाट में हुआ था ? उत्तर - जीवंधर स्वामी।

प्रश्न 43. वे कौन थे जिन पर सबसे अधिक उपसर्ग हुआ था ? उत्तर- पार्श्वनाथ मुनिराज ।

प्रश्न 44. वे कौन थे जिन्होंने दीक्षा के बाद आहार नहीं लिया था ? उत्तर - बाहुबली।

प्रश्न 45. वे कौन थे जिनकी सबसे अधिक आयु थी ?

उत्तर - ऋषभदेवजी (84 लाख पूर्व)।

प्रश्न 46. वे कौन थे जिन्होंने बालक वर्धमान की सर्प बनकर परीक्षा ली थी? उत्तर- संगम देव।

हमारा जैन धर्म

।। मनन करें ।।

यदि सदाचार है तो दुःखपूर्ण संसार भी स्वर्ग है।

प्रश्न 47. वे कौन थे जिन्हें हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया था ? उत्तर - पं. टोडरमल जी।

प्रश्न 48. वे कौन थे जिन्हें सूली पर चढ़ाया गया पर सिंहासन बन गया था? उत्तर - सुदर्शन सेठ ।

प्रश्न 49. वे कौन थे जो ध्यान से डिगने के कारण मुक्ति प्राप्त नहीं कर सके थे ?

उत्तर - नकुल व सहदेव ।

प्रश्न 50. वे कौन थे जिन्हें एक बार में याद होता था ? उत्तर - अकलंक देव।

प्रश्न 51. वे कौन थे जो प्यास के कारण मरकर मेंढक बने थे ? उत्तर - नागदत्त सेठ।

प्रश्न 52. वे कौन थे जिन्होंने अन्याय के कारण भाई का साथ नहीं दिया ? उत्तर - विभीषण।

प्रश्न 53. वह कौन थे जो राम मुनिराज को लुभाने आये थे ? उत्तर - प्रतीन्द्र (सीता का जीव)।

प्रश्न 54. वे कौन थे जिन्होंने चोर को धन ले जाने में सहायता की थी ? उत्तर - पं. बनारसी दास।

प्रश्न 55. वे कौन थे जो वैश्या पर इतने मोहित हो गये कि उसी के घर रहने लगे ?

उत्तर- चारुदत्त ।

प्रश्न 56. वे कौन थे जिन्होंने देव शास्त्र गुरु के सिवा किसी अन्य को नमस्कार न करने का नियम लिया था ?

उत्तर - वजकर्ण ।

प्रश्न 57. वे कौन थे जो पुत्र को सांप के द्वारा काटे जाने की खबर सुनकर भी पूजा से विचलित नहीं हुए ?

उत्तर- धनन्जय कवि ।

प्रश्न 58. वे कौन थे जिनके सांस लेने से शिला हिलती थी ? उत्तर - प्रद्युम्न कुमार।

पौराणिक पुरुष

।। विचार करें ।।

संयम का उदय इसी मानव पर्याय में होता है।

प्रश्न 59. वे कौन थे जो इस युग के प्रथम दाता बने ? उत्तर- राजा श्रेयांस।

प्रश्न 60. वे कौन थे जिन्होंने चारण ऋद्विधारी मुनि को आगम के प्रतिकूल समझकर आहार नहीं दिया था ?

उत्तर - अर्हत दत्त सेठ।

प्रश्न 61. वे कौन थे जिन्होंने धर्म के लिए भाई की जान बचाकर अपने प्राण दे दिये थे ?

उत्तर - निकलंक देव।

प्रश्न 62. वे कौन थे जिन्होंने बैल को णमोकार मंत्र सुनाया था ? उत्तर - पदमरुचि सेठ ।

प्रश्न 63. वे कौन थे जिन्होंने वन में विद्या के द्वारा नगर बसाकर चार महीने तक आहार दिया था ?

उत्तर- भामण्डल ।

प्रश्न 64. वे कौन थे जिन्हें लोहे की बेड़ियाँ डाली गयी थीं ? उत्तर - मांगतुंगाचार्य।

प्रश्न 65. वे कौन थे जिनका बौद्धों से वाद विवाद हुआ और अन्त में जीत हुई ?

उत्तर - अकलंक देव।

प्रश्न 66. वे कौन थे जिनका बाघ ने भक्षण किया था ?

उत्तर - सुकौशल मुनिराज ।

प्रश्न 67. वे कौन थे जिन्होंने श्री पाल को समुद्र में धक्का दिया था ? उत्तर- धवल सेठ ।

प्रश्न 68. वे कौन थे जिन्होंने गन्धोदक से अपने पुत्र का विष उतार दिया था ?

उत्तर - धनन्जय कवि।

प्रश्न 69. वे कौन थे जिन्होंने अपनी बहिन को कुदृष्टि से देखा और बाद में वैराग्य आ गया ?

उत्तर- देशभूषण कुलभूषण।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

संसार (जन्म मरण) का नाश इसी मानव पर्याय में होता है। प्रश्न 70. वे कौन थे जिनके पांचों कल्याणक एक ही स्थान पर हुए ? उत्तर - वासुपूज्य जी।

प्रश्न 71. वे कौन थे जिनके नाना व पिता एक ही थे ?

उत्तर - कार्तिकेय मुनिराज ।

प्रश्न 72. वे कौन थे जिन्होंने 363 मिथ्या मत चलाये थे ? उत्तर - मारीचि।

प्रश्न 73. वे कौन थे जो नरक गये और भविष्य में प्रथम तीर्थंकर होंगे ? उत्तर - राजा श्रेणिक ।

प्रश्न 74. वे कौन थे जिन्होंने गजकुमार मुनि पर उपसर्ग किया था ? उत्तर - सोमिल सेठ (सोमशर्मा)।

प्रश्न 75. वे कौन थे जिन्होंने अपने भाई पर चक्र चलाया था ? उत्तर - भरत चक्रवर्ती ।

प्रश्न 76. वे कौन थे जिनके शरीर की ऊँचाई सबसे अधिक थी ? उत्तर - बाहुबलि (525 धनुष)।

प्रश्न 77. वे कौन थे जिन्होंने गोम्टेश्वर बाहुबलि की प्रतिमा का निर्माण कराया था ?

उत्तर- चामुण्डाराय ।

प्रश्न 78. वे कौन थे जिन्होंने 16 स्वप्न देखे थे ? उत्तर - सम्राट चन्द्रगुप्त ।

प्रश्न 79. वे कौन थे जो णमोकार मंत्र के अविनय के कारण सातवें नरक में गये ?

उत्तर - ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती।

प्रश्न 80. वे कौन थे जिन्होंने राजा बलि से बाबनिया के भेष में तीन पग जमीन माँगी थी ?

उत्तर - विष्णुकुमार मुनि।

प्रश्न 81. वे कौन थे जिन्होंने तीर्थंकर महावीर के समवशरण में सबसे अधिक प्रश्न पूछे थे ?

उत्तर - राजा श्रेणिक (60 हजार प्रश्न)।

पौराणिक पुरुष

।। मनन करें ।।

जो निर्बलों पर दया नहीं करता उसे बलवानों के अत्याचार सहने पड़ेंगे। प्रश्न 82. वे कौन थे जो निशंकित अंग में प्रसिद्ध हुए ? उत्तर— अंजन चोर।

प्रश्न 83. वे कौन थे जो चक्रवर्ती पद के धारी थे फिर भी नरक गये ? उत्तर— सुभौम चक्रवर्ती, ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती ।

प्रश्न 84. वे कौन थे जिन्होंने मुनिराज पर तलवार से वार किया, पर देवों ने कील कर दिया ?

उत्तर— अग्निभूत और वायुभूत ब्राह्मण।

प्रश्न 85. वे कौन से मुनिराज थे जिन्हें तप मद के कारण सातवें नरक जाना पड़ा था ?

उत्तर— द्वीपायन मुनिराज ।

प्रश्न 86. वे कौन थे जिनसे अकलंक देव ने शास्त्रार्थ (वाद विवाद) किया था ?

उत्तर— संघ श्री नामक बौद्ध गुरु थे।

प्रश्न 87. वे कौन थे जो जुआ में प्रसिद्ध हुए ?

उत्तर— पाण्डव ।

प्रश्न 88. वे कौन थे जिनके हाथ से श्रीकृष्ण जी की मृत्यु हुई थी ? उत्तर— जरद कुमार।

प्रश्न 89. वे कौन थे जिन्हें प्रतिनारायण होते हुए भी तीसरे नरक का दुख भोगना पड़ा ?

उत्तर— रावण ।

प्रश्न 90. वे कौन थे जो अहिंसाणुव्रत में प्रसिद्ध हुये ? उत्तर— यमपाल चाण्डाल ।

प्रश्न 91. वे कौन थे जिनको मारने के लिए खड़ग से वार किया, पर वह पुष्पहार बन गया ?

उत्तर— वारिषेण ।

प्रश्न 92. वे कौन से मुनिराज थे जिनकी रक्षा सुअर ने की थी ? उत्तर— समाधिगुप्ति, त्रिगुप्ति मुनिराज ।

हमारा जैन धर्म

।। विचार करें ।।

उत्तम कार्य करते रहना चाहिए फल अपने आप मिलेगा।

प्रश्न 93. वे कौन थे जो गए थे चोरी करने, पर धर्म वार्ता सुन मुनि दीक्षा धारण कर ली ?

उत्तर— विद्युत चोर।

प्रश्न 94. वे कौन हैं जो भविष्य में होने वाली चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर बनेंगे ?

उत्तर— राजा श्रेणिक।

प्रश्न 95. वे कौन थे जो आचार्य पुष्पदंत एवं भूतवली के गुरु थे ? उत्तर— धरसेनाचार्य।

प्रश्न 96. वे कौन थे जिनसे सम्राट चन्द्रगुप्त ने 16 स्वप्नों का फल पूछा ? उत्तर— आचार्य भद्रबाहु ।

प्रश्न 97. वे कौन थे जिन्होंने अपने मित्र की दीक्षा धारण का समाचार सुना तो स्वयं भी राजपाट छोड़कर दिगम्बरी दीक्षा ले ली ?

उत्तर— राजा अनरण्य।

प्रश्न 98. वे कौन थे जो अपनी हत्या की बात सुनकर राजा होते हुए भी सामान्य जन की तरह छिप-छिप कर रहने लगे थे ?

उत्तर— राजा दशरथ, राजा जनक।

प्रश्न 99. वे कौन थे जिन्होंने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबाया था ?

उत्तर— बालि मुनिराज ।

प्रश्न 100. वे कौन थे जो कैलाश पर्वत को उठाकर फेंकना चाहते थे ? उत्तर— दशानन (रावण)।

प्रश्न 101. वे कौन थे जो हनुमान के नाना कहलाते थे ?

उत्तर— राजा महेन्द्र।

प्रश्न 102. वे कौन थे जो सती अंजना को भानजी कहकर जंगल से घर लेकर आए ?

उत्तर— राजा प्रतिसूर्य ।

प्रश्न 103. वे कौन थे जिन्होंने विद्याधरों के द्वारा प्रदान किये गए सागरावर्त व बज्रावर्त नामक दो धनुष उठाए ?

उत्तर— राम, लक्ष्मण ।

पौराणिक पुरुष

।। चिंतवन करें ।।

जो शांत भाव नहीं रखता, तो समझो कि इसमें भेद ज्ञान है ही नहीं। प्रश्न 104. वे कौन थे जो सीता के भाई थे ?

उत्तर- भामण्डल ।

प्रश्न 105. वे कौन थे जिनसे राजा दशरथ ने दीक्षा ली थी ? उत्तर- सर्वभूतहित मुनि ।

प्रश्न 106. वह कौन थे जिन्होंने अंगूठी में मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा बनवाकर पहिन ली। जिससे देव शास्त्र गुरु के अलावा अन्य

किसी को नमस्कार नहीं करने का नियम भंग न हो ?

उत्तर- राजा बज्रकर्ण।

प्रश्न 107. वे कौन थे जिन्होंने यह प्रतिज्ञा ली कि जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उससे जबरदस्ती विवाह नहीं करूंगा ?

उत्तर- रावण ।

प्रश्न 108. वे कौन थे जिन्होंने जटायु को णमोकार मंत्र सुनाया था ? उत्तर- रामचन्द्र जी।

प्रश्न 109. वे कौन थे जिन्होंने कोटिशिला को उठाया था ? उत्तर- लक्ष्मण जी।

प्रश्न 110. वे कौन थे जिन्होंने सबसे कम समय में केवलज्ञान की प्राप्ति की थी ?

उत्तर- मल्लिनाथ जी।

प्रश्न 111. वे कौन थे जिन्होंने स्तम्भिनी विद्या से आकाश में नगर बसाया था ?

उत्तर- हनुमान ।

प्रश्न 112. वे कौन थे जो सीता को वन से वापस अपने राज्य में ले गए थे ?

उत्तर- राजा वज्रजंघ।

प्रश्न 113. वे कौन थे जिसने सीता की अग्नि परीक्षा के समय रक्षा की थी ?

उत्तर- मेघकेतु नामक देव ने।

हमारा जैन धर्म

।। मनन करें ।।

जिन जीवों ने अपनी इच्छाओं का अंत कर दिया, वे ही मोक्ष के पात्र हैं। प्रश्न 114. वे कौन थे जिन्हें सीता का जीव प्रतीन्द्र नरक में संबोधन करने गया ?

उत्तर- लक्ष्मण ।

प्रश्न 115. वे कौन थे जो इस अवसर्पणी काल के अंतिम अनुबद्ध केवली कहलाए ?

उत्तर- जम्बू स्वामी ।

प्रश्न 116. वे कौन थे जो पुरोहित पुत्र भद्रबाहु को भावी श्रुतकेवली जानकर अपने साथ ले गए थे ?

उत्तर- आचार्य गोवर्धन ।

प्रश्न 117. वे कौन थे जो इस अवसर्पणी काल के अंतिम श्रुतकेवली हुए ? उत्तर- आचार्य भद्रबाहु ।

प्रश्न 118. वे कौन थे जिन्होंने पुत्र जन्म की बात सुनकर दिगम्बर दीक्षा ले ली ?

उत्तर- श्रेष्ठी सुरेन्द्रदत्त ।

प्रश्न 119. वे कौन थे जिन्हें राई के दाने चुभते थे, दीपक की प्रभा देखकर आंसू आते थे ?

उत्तर- सुकुमार ।

प्रश्न 120. वे कौन थे जिन्होंने राज्य के लिए अपने भाई की आँखें फुड़वा दी थी ?

उत्तर- राजा मुंज ।

प्रश्न 121. वे कौन थे जिन्होंने देखा कि बैल, हाथी से रथ नहीं चला तो स्वयं उसमें जुत गए लेकिन रथ फिर भी न चला ?

उत्तर- श्री कृष्ण और बलराम ।

प्रश्न 122. वे कौन थे जो कि नारायण होते हुए भी जिनके जन्म के समय कोई बाजे बजाने वाला न मिला और मरण के समय कोई पानी

पिलाने वाला न मिला ?

उत्तर- श्रीकृष्ण ।

पौराणिक पुरुष

।। विचार करें ।।

जो परिषह विजयी होते हैं, वे ही मोक्ष के पात्र होते हैं। प्रश्न 123. वे कौन थे जिन्होंने सती चंदना को उच्च कुल की समझकर अपनी बेटी बनाने के लिए वैश्या से खरीदा था ?

उत्तर- सेठ वृषभदत्त ।

प्रश्न 124. वे कौन थे जो राजा होते हुए भी उन्हें देश निकाला प्रजा ने दे दिया ?

उत्तर- राजावकु ।

प्रश्न 125. वे कौन थे जिनको अपनी ओर आता देखकर चंदना सती की जंजीर खुल गई थी ?

उत्तर- मुनि महावीर ।

प्रश्न 126. वे कौन थे जिन्होंने बिना विचारे अपने पुत्र को मृत्युदण्ड की सजा दी फिर बाद में पश्चाताप किया ?

उत्तर- राजा श्रेणिक ।

प्रश्न 127. वे कौन थे जिनसे मांगतुंग आचार्य का वाद विवाद हुआ था ? उत्तर- कवि कालिदास।

प्रश्न 128. वे कौन थे जिन्होंने मुनिराज को कड़वी तूमड़ी का विषमय आहार दिया था ?

उत्तर- अमृत रसायन नाम का रसोइया ।

प्रश्न 129. वे कौन थे जिनके चारों ओर आग लगा दी थी ? उत्तर- अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराज ।

प्रश्न 130. वे कौन थे जिन्होंने प्रभु भक्ति में नस की वीणा बजाकर शक्ति प्राप्त की थी ?

उत्तर- रावण ।

प्रश्न 131. वे कौन थे जो आगे चलकर अंजन चोर बना ?

उत्तर- ललित कुमार।

प्रश्न 132. वे कौन थे जिससे युद्ध करते-करते राजामधु हाथी पर बैठे-बैठे केशलोंच करने लगे थे ?

उत्तर- शत्रुघन ।

हमारा जैन धर्म

।। चिंतवन करें ।।

स्व का अध्ययन करना ही ! स्वाध्याय है।

प्रश्न 133. वे कौन थे जिन्होंने कुगुरु के वश होकर अपने दिगम्बर मुनिराज को घानी में पिलवा दिया था ?

उत्तर- दंडक राजा।

प्रश्न 134. वे कौन थे जो अंजन चोर के लिए पानी लेने गए थे ? उत्तर- सोमदत्त माली।

प्रश्न 135. वे कौन थे जिन्होंने षट्खण्डागम ग्रन्थ की रचना की थी ? उत्तर- आचार्य पुष्पदंत एवं भूतवली ।

प्रश्न 136. वे कौन थे जिनके शरीर को देखने देवता आये थे ? उत्तर- सनत कुमार चक्रवर्ती ।

प्रश्न 137. वे कौन हैं जो भविष्य काल के सोलहवें तीर्थंकर होंगे ? उत्तर- श्री कृष्ण (जिनका नाम होगा निर्मल तीर्थंकर)। प्रश्न 138. वे कौन हैं जो भविष्य काल के 19 वे तीर्थंकर होंगे ? उत्तर- द्वीपायन (जिनका नाम होगा स्वंयभू तीर्थंकर)।

प्रश्न 139. वे कौन थे. जो ई. शताब्दी के प्रथम आचार्य थे ? उत्तर- आचार्य शिवकोटि जी।

प्रश्न 140. वे कौन थे जिन्होंने कभी कपड़े नहीं पहने थे ? उत्तर- आचार्य जिनसेन।

प्रश्न 141. वे कौन थे जिन्होंने श्रवणवेलगोला की मूर्ति बनाई थी ? उत्तर- अरिष्टनेमि ।

प्रश्न 142. वे कौन से राजा थे जिन्होंने नगर में ढोड़ी पिटवा दी कि मुनिराज को कोई आहार नहीं देगा उन्हें मैं ही आहार दूंगा ? उत्तर- राज सुमित्र ।

प्रश्न 143. वे कौन थे जिनको सम्बोधन करने नरक में स्वर्ग से देव गये थे? उत्तर- श्री कृष्ण ।

प्रश्न 144. वे कौन से महान् व्यक्ति थे जो नौकर को जिस दिन डाँटते थे उस दिन भोजन नहीं करते थे ?

उत्तर- बैरिस्टर चम्पतराय जी।

प्रश्न 145. वे कौन थे जो मरने के बाद अपनी स्त्री के गर्भ में आये थे ? उत्तर- सुदृष्टि सुनार का जीव।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


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स्रोत: Gyata संग्रह।

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