हमारा जैन धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Hamara Jain Dharm

हमारा जैन धर्म

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जिनधर्म प्रभावना हेतु

अध्यात्मिक शिक्षण शिविर एवं संगीत मय पूजन-विधान आदि के लिये विद्वान व्यवस्था, संपादक के पते पर सम्पर्क करें।

भजन

अब क्या करना है

  1. नाली देखे पत्नी देखे, और देखे जनाबसी
    भैया देखे बेटा देखे, और देखे संग साथी
    देख लियो सब रिश्ते आते…हो…-2
    अब तो आतम देखोंगे

  2. देश-देश के भव को बढाया, मान प्रतिष्ठा साथी
    अंतरंग में कभी न देखा, सब स्वार्थ के साथी
    देख लिया स्वार्थ जग सारा…हो…-2
    अब तो आतम देखोंगे

  3. मंदिर देखी मस्जिद देखी, तीरथ देखे साथी
    निज आतम को कभी न देखा, सब घूमे बनारसी
    घूम लिए चारों गतियों में…हो…-2
    अब तो आतम देखोंगे

पवन कुमार जी
संपादक

श्री वीतरागः नमः

हमारा जैन धर्म

लेखक
अनुभव प्रकाश जैन “श्री वाले”
(M.A.) दानाओली लश्कर (ग्वा.)
संपादक
पं. पूरनचन्द जी जैन
तलहटी नं. 3 सोनागिर (दतिया)
पवन कुमार जी जैन
C/o श्री सुरेश चन्द पवन कुमार जैन
मो. जिला भिण्ड
प्रकाशक
श्री वीर पाठशाला
दानाओली, लश्कर, ग्वालियर

श्री दिगम्बर जैन समाज, ग्वालियर

पुस्तक प्राप्ति स्थल

श्री वीर पाठशाला, जैसवाल जैन मंदिर जी
दानाओली, लश्कर, ग्वालियर
श्री दि. जैन महावीर पंचकल्याण मंदिर
जैन मंदिर सदर, मुरार, ग्वालियर
श्री दिगम्बर जैन त्रिभुवन त्रिलोक सीमन्धर जिनालय
फालका बाजार, लश्कर, ग्वालियर
श्री वीतराग जैन पाठशाला
श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर जो, भी, जिला-भिण्ड
श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर
गली नं. 12, कैलाश नगर, दिल्ली
मंदिर नं. 3
श्री वाली धर्मशाला के सामने, सोनागिर, जिला-दतिया

मूल्यः (10/-) दस रुपया
(पुनः प्रकाशन हेतु)

प्रतियाँ 1111

तृतीय संस्करण 2003

लेजर टाइप सेटिंग : निर्भय कम्प्यूटर्स, फोन-2436730

प्रकाशकीय

वर्तमान भौतिक युग में मानव संसार में इतना उलझ रहा है कि उसे इस बात की सुध ही नहीं है कि उसके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य क्या है ? प्राणी यह ध्यान नहीं रख पाता है कि उसकी आयु के कितने अमूल्य क्षण व्यर्थ ही निकल रहे हैं ?
अतः हम सभी अपने लक्ष्य का ध्यान रखते हुए अपने जीवन के अमूल्य समय को व्यर्थ न जाने दें, एवं अपनी आत्मा का कल्याण कर इस चिन्तामणि रत्न के समान मनुष्य जन्म को सफल बनाएँ, इत्यादि बातों को ध्यान में रखते हुए, ‘हमारा जैन धर्म’ नामक पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा है हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि इस पुस्तक के प्रकाशन का हमें सुअवसर मिला। लेखक अनुभव प्रकाश जैन के द्वारा लिखी गई ‘हमारा जैन धर्म’ नामक पुस्तक में लगभग 1000 प्रश्न एवं पौराणिक महापुरुष एवं महासतियों की जीवन गाथा के साथ-साथ उन सभी ज्ञानवर्धक विषयों को समाहित किया गया है जिन्हें पढ़कर, स्मरण कर, हम सभी जीव भव्य से भगवान बन सकते हैं। यह पुस्तक समाज के सभी वर्ग के लिए महत्वपूर्ण एवं महापुरुषों पुस्तक है। प्रत्येक पाठक के हृदय पर यह पुस्तक अपनी एक अमिट छाप छोड़ेगी। भारत वर्ष के सकल दिगम्बर जैन समाज के लिए प्रथम बार एक ऐसी पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा है जिससे एक साथ आप कई माध्यमों से ज्ञानार्जन कर सकेंगे। इस पुस्तक को लिखने के लिए लेखक की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है। हमारे शब्दकोष में वो शब्द नहीं कि जिन शब्दों का सहारा लेकर हम लेखक को धन्यवाद ज्ञापित कर सकें। प्रकाशन समिति के सभी सदस्यों की ओर से लेखक को बहुत-बहुत धन्यवाद एवं पुस्तक के सम्पादन में आदरणीय पं. श्री पूरन चन्द्र जी, सोनागिर एवं पवन कुमार, मी ने जो अपना अमूल्य योगदान दिया है, उसके लिए भी समिति की ओर से उनको बहुत-बहुत धन्यवाद तथा इस पुस्तक के प्रकाशन में सकल जैन समाज ने जो सहयोग प्रदान किया है। उसके लिए हम समस्त जैन समाज के हृदय से आभारी हैं।
हम सभी इस पुस्तक का स्वाध्याय कर परम पावन सिद्धदशा को प्राप्त करें ऐसी मंगल भावना के साथ !
अध्यक्ष
सौरभ कुमार जैन एडवोकेट
लश्कर, ग्वालियर

सम्पादकीय

आज के इस भौतिकवादी युग में जहाँ चारो तरफ मानव विषय कषाय की अग्नि में झुलस रहा है, विषय वासनाओं कषायों की ही चर्चा, वार्ता जगह जगह पर मिल रही है एवं उसकी ही प्रेरणा देते है परन्तु सन्मार्ग पर चलने वाले एवं उसी पर उत्तरोत्तर बढ़ते हुए चलने की प्रेरणा देने वाले इस कलि काल में सत शास्त्र आगम ही है। आप्त कहा गया, गणधरों द्वारा गुंथा गया, मुनियों द्वारा मनन किया गया है वही आगम है जो आगम, मोक्ष मार्ग का प्रकाश करे वही आगम पढ़ने सुनने योग्य है क्योंकि संसार में जीव अनेक प्रकार के दुखों से पीड़ित है जो शाश्वत सुखी दीपक के द्वारा मोक्ष मार्ग में गमन करे, संसार के दुखों से मुक्त होकर मोक्ष मार्ग तो वीतराग भाव है, इसलिये जिन शास्त्रों में किसी प्रकार का राग, द्वेष, मोह, भावों का निषेध कर वीतराग भाव का प्रबोधन किया गया है उन्हीं शास्त्रों को पढ़ना सुनना योग्य है। चारों अनुयोग (प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग द्रव्यानुयोग) आगम है। सभी अनुयोगों का प्रयोजन वीतरागता है। सशास्त्रान पढ़ते शुभ राग होता है परन्तु प्रयोजन तो यह बतलाने का है कि शुभ राग भी आत्मा का स्वरूप नहीं, अतः वह भी रुकने जैसा नहीं। इस प्रकार सशास्त्रान आत्मा की स्वतंत्रता बतलाकर मोह, राग, द्वेष को दूर करने के लिए साधन है।
जपमंत्र मंत्र का मांगलिक कहा है। उसमें पंचपरमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। उनका यथार्थ स्वरूप जानने से उनका स्मरण करने वाला अपनी ज्ञान ही परम मांगलिक है। उनके स्वरूप को द्रव्य, गुण, पर्याय से पहचान करके हम भले, आपके हृदय पर, ऐसी भावना भाई गई है।
प्रथमानुयोग में पुराण पुरुषों, तिरेसठ शलाका, २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण आदि के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। जैसी करनी वैसी भरनी। पाप के परिणाम से नरक, पुण्य के परिणाम से स्वर्ग, धर्म के पवित्र परिणाम से मोक्ष की प्राप्ति हो, ऐसा वर्णन किया गया है।
पौराणिक पुरुष वह है जिनका पुराण में नाम आया है और जिनका जीवन समाज के लिए एक आदर्श बना है। वह भव्य जीव मोक्ष जा चुके
हैं, जा रहे हैं, जाएंगे ऐसे पौराणिक पुरुषों का जीवन चरित्र पढ़कर अपने परिणामों को सुधारने का उपाय करें और परिणाम बिगड़ न जाएं इसका उपाय करते रहें।
पौराणिक महिलायें भी पुरुष से पीछे नहीं। उन्होंने भी अपने सत स्वभाव का आश्रय प्राप्त करके सतीत्व का उत्तम रखते हुए कितने ही प्रतिकूल प्रयोगों में भी अपने स्वभाव का आश्रय नहीं छोड़ा एवं सती नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करके सती चन्दन बाला, सती अंजनसती, सती मैनाससुंदरी, सती मनोरमा आदि ने जैन दर्शन में आदर्श उपस्थित किया।
जैन दर्शन में आचार्यों ने स्तवनों के माध्यम से ज्ञान, वैराग्य, भक्ति प्रेरक, ध्यान को अग्रसर किया है। परमानंद स्तोत्र में अर्हन्तदेव देव स्वामी ने ध्यान का स्वरूप, अरिहंतों का स्वरूप, साधु का स्वरूप का वर्णन किया गया है। भक्तामर स्तोत्र में भक्ति परक उदाहरणों से, उपमाओं से, भक्ति भावना भाई गई है।
षट् पर्वता का प्रतीक है। जीवन में पवित्रता, परिणामों में निर्मलता, सहजता, सरलता, समता, शांति की प्राप्ति हो, ऐसे पवित्र दिन संयम की साधना में निहित है। षट् अकायिक और तात्कालिक दो प्रकार के होते हैं। त्रैकालिक पर्व दशलक्षण, अष्टाह्निका, सोलह कारण पर्व हैं। तात्कालिक महावीर जयंती, अक्षय तृतीया, वीर निर्वाण महोत्सव आदि हैं।
वर्तमान चौबीस तीर्थंकरों में पांच बाल्यगति अर्थात् बाल ब्रह्मचारी हुए हैं उनमें सबसे प्रथम वासुपूज्य भगवान जिनको पांचों कल्याणक अगदेश के चम्पापुरी राज्य में हुए।
श्री वासुपूज्य महर्षि नेमि पारस वीर आदि।
मनुष्य भव तन धरि प्रेम पांचों बाल्यादि।।
“हमारा जैन धर्म” नामक पुस्तक में अब ३१ विषयों का वर्णन प्रश्नोत्तरों के माध्यम से किया गया है। धर्म किसी जीवित विशेष का नहीं, धर्म तो जन-जन का है। प्रत्येक वस्तु अपने धर्मी स्वभाव में ही रहती है “वस्तु स्वभावो धम्मो” वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। ज्ञान का स्वभाव शीतलता है, अग्नि का स्वभाव उष्णता है। नमक का स्वभाव खारापन है, इसी प्रकार प्रत्येक प्राणीगण का स्वभाव ज्ञान दर्शन है। अज्ञानभाव से जीव अज्ञान मोह के कारण चार गति चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है। पं. दौलतराम जी ने छहढाला में लिखा है "मोह महामद पियो अनादि, भूल

अपनी बात

आपको मरना यदि" अपने को भूलने के कारण व्यर्थ में संसार में भटकता रहा अब हमें संसार में न भटकना पड़े, इसके लिये अपने उपयोग को स्थिर करने के लिए जीवन में स्वाध्याय ही परम कल्याणकारी है। इस पुस्तक के माध्यम से जैन दर्शन के मूलभूत सिद्धान्तों का चारों अनुयोगों से सरल भाषा में प्रश्न एवं उत्तर दिये गये हैं, जिनको पढ़कर सभी संबंधी बंधु आत्म लाभ प्राप्त करें और घर-घर चर्चा करें, धर्म की, ऐसी भावना है।
यह पुस्तक होनहार युवा बालक अनुभव प्रकाश जैन ने लिखी है। अनुभव जी के द्वारा जैन समाज के लिये किया गया यह कार्य अत्यन्त सराहनीय है। प्रस्तुत पुस्तक का सम्पादन करते मुझे बड़ी हर्ष हुआ कि इस युवा बालक ने पूर्वाचार्यों द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों का अध्ययन कर इस पुस्तक को लिखा और समाज को आगम रूपी तिजोरी में रखे हुए धर्मज्ञान रूपी माल का इस पुस्तक के माध्यम से प्रदान किया। इसके पूर्व भी इन्होंने प्रश्नोत्तरी प्रश्नमंजूषा, भजनों एवं पाठशाला आदि के माध्यम से वीतराग धर्म का प्रचार किया और वर्तमान में कर रहे हैं। वास्तव में यह युवा बालक बहुत-बहुत धन्यवाद का पात्र है।
हम सभी भव्य आत्मायें महापुरुषों के जीवन परिचय पढ़कर अपने जीवन में चर्चा का विषय बनायें, ऐसी भावना के साथ।
पं. पूरनचन्द्र जैन
मंदिर नं. 3,
सोनागिर, जिला दतिया

लेखक की कलम से

जो वीतराग हो चुके और जिनको भविष्य में होना है।
जो वर्तमान में इस पथ पर चल रहे कर्मशील योग्य हैं।
जो साधक हैं आराधक हैं जिनसे अंतरंग बैरी हारा है।
इस समूह (संघ) की सिद्धि हेतु उनको शत नमन हमारा है।
हमारा जैन धर्म जगत में सबसे उत्तम, अनादि निधन धर्म है। इस जैन धर्म में निर्वाण प्राप्ति के चार मार्ग बताए गए हैं। प्रथमानुयोग, द्रव्यानुयोग चरणानुयोग, करणानुयोग। इनका अनुसरण करके जीव इस दुखमयी संसार को छोड़कर सच्चे सुख की प्राप्ति कर सकता है एवं वीतरागतादि गुणों से युक्त अपने जीवन को महान बना सकता है। इन चारों मार्ग में प्रथमानुयोग के मार्ग का अपना एक अलग महत्व है। प्रथमानुयोग में उन महापुरुषों के जीवन चरित्र का वर्णन होता है, जिन्होंने इस संसार में रहकर पंचेंद्रिय विषय भोगों का भोग किया और फिर इस संसार को असार जानकर अपने निज स्वरूप को आराधना कर मोक्ष को प्राप्त किया। इनका जीवन सुलझा हमारे में आपके जैसा ही होता था अतः इनके जीवन चरित्र की कथाओं को पढ़कर अथवा प्रथमानुयोग के मार्ग का अनुसरण कर हम व आप अपने जीवन में सरलता व सुगमता के साथ परिवर्तन ला सकते हैं तथा इस संसार की असारता को जानकर इस दुखमयी संसार को छोड़कर सच्चे सुख की प्राप्ति करके अपने जीवन को महान बना सकते हैं। ऐसी सरलता व सुगमता अन्य मार्ग में नहीं है। इसलिए “हमारा जैन धर्म” नामक इस पुस्तक में प्रथमानुयोग को मुख्य विषय बनाया गया है।
हमारे जैन धर्म में पूर्वाचार्यों द्वारा रचित प्रथमानुयोग के अनेक ग्रन्थराज हैं, जैसे पद्म पुराण, हरिवंश पुराण, पाण्डव पुराण, विमल पुराण, उत्तर पुराण आदि, परन्तु सामान्य तौर पर यह प्रकाशन सामग्री भाई के पास उपलब्ध नहीं है, अगर कहीं है भी तो आज के इस भौतिकवादी युग में मनुष्य के पास इतना समय नहीं है कि वह इन बड़े-बड़े ग्रन्थराजों का पठन कर मनन कर सके। वर्तमान समय में काल थोड़ा है और साधन अधिक अतः संक्षिप्त में मनुष्य को

सामान्य जानकारी

बहुत कम जानकारी के साथ सारभूत बात मिले और उसे ग्रहण कर अपना आत्मकल्याण कर सके, इसी उद्देश्य को लेकर मैंने यह प्रश्न एवं कहानी रूपी सुमन आगम रूपी सुंगध से चुनकर इस पुस्तक रूपी गुलदस्ते में सजाए हैं।

वर्तमान समय में एवं आने वाली २१ वीं सदी में यह पुस्तक हमारे आदरणीय बुजुर्गों, माताओं, बहिनों एवं सामान्य भाइयों तथा मुख्यतः हमारे कल के समाज के कर्णधार हमारे अपने बालकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी।

धर्म है ये माता, पिता जो अपने बालकों को बालकाल से ही धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से सुसंस्कृत करते हैं। वास्तव में बाल्य अवस्था से ही बालक को ऐसे ही सुसंस्कार व उत्तम शिक्षा दी जाए जिससे कि वह बालक आगे चलकर सन्मार्ग से न भटक जाए और खुद के कल्याण के साथ-साथ परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण कर सके।

प्रिय पाठकों ! इस पुस्तक में वे सभी ज्ञान की बातें समाहित की गई है जिनसे बाल युवा कुमारी से विरक्त होकर सन्मार्ग पर अग्रसर होते रहेंगे, अतः समस्त सामग्री जनों से अनुरोध है कि इस पुस्तक को वह स्वयं पढ़कर अपने बालकों को भी पढ़ाए तथा स्वयं के साथ-साथ अपने बालकों का भी जीवन, धर्ममयी, संस्कारमयी और महान बनाएँ।

प्रस्तुत संस्करण में कहीं त्रुटियां रह गई हों या प्रिंटिंग में गलती हुई हो तो प्रिय पाठकों अवश्य सूचित करने की कृपा करें, ताकि अगला संस्करण शुद्ध हो सके। इस पुस्तक का संपादन आदरणीय पं. पूरणचन्द जी जैन, मींगगिरि एवं पवन कुमार जी जैन, मी को द्वारा किया गया। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ और उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ एवं पुस्तक के प्रकाशन में जिन महानुभावों ने अपनी चंचल लक्ष्मी को शास्त्र दान में सहयोग देकर सदुपयोग किया है उन सभी महानुभावों को हमारी ओर से बहुत बहुत धन्यवाद।

अगली पुस्तक के प्रकाशन में गुरुजनों एवं विद्वत जनों के सुझाव एवं मार्गदर्शन का अभिलाषु।

आपका

वर्तमान निवास पता
अनुभव प्रकाश जैन,
C/o श्री पी. एल. जैन, एडवोकेट
दाना ओली, लश्कर (ग्वा.)

स्थायी पता
अनुभव प्रकाश जैन,
C/o श्री सुरेश चन्द्र, पारस कुमार जैन
सदर बाजार, मींगिरि (म.प्र.)

क्या / कहाँ

क्र. विषय पृष्ठ
1. णमोकार मंत्र 1-14
2. जैसी करनी वैसी भरनी 15-27
3. पौराणिक पुरुष 28-46
4. पौराणिक महिलायें 47-60
5. रत्नत्रय 61-66
6. पर्व 67-73
पाँच बाल्याति तीर्थंकर
7. श्री वासुपूज्य जी 74-88
8. श्री मल्लिनाथ जी 89-98
9. श्री नेमिनाथ जी 99-109
10. श्री पार्श्वनाथ जी 110-123
11. श्री महावीर जी 124-138
12. संसार का भविष्य 139-142

॥ विचार करें ॥

जो मनुष्य वीर नहीं, वह मनुष्य किसी कार्य में सफल नहीं हो सकता।

1

णमोकार मंत्र


णमो अरिहंताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आइरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्व साहूणं

प्रश्न 1. णमोकार मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है।
प्रश्न 2. परमेष्ठी किसे कहते हैं और यह कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- जो परम पद में स्थित हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते हैं।

हमारा जैन धर्म

॥ विचार करें ॥

निरंकुश का भूल कारण बुद्धि है।

परमेष्ठी के नाम इस प्रकार हैं-
(1) अरहंत परमेष्ठी, (2) सिद्ध परमेष्ठी, (3) आचार्य परमेष्ठी, (4) उपाध्याय परमेष्ठी, (5) साधु परमेष्ठी।
प्रश्न 3. अरहंत परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- चार घातियाँ कर्मों का नाशकर चार अनंत चतुष्टय प्राप्त कर जिन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त किया है तथा जो 18 दोषों से रहित हैं, उन्हें अरहंत परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 4. अरहंत परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी के 46 मूलगुण होते हैं।

दस अतिशय जन्म के

(1) मल नहीं, (2) पसीना नहीं, (3) मधुर वचन, (4) सुगन्धमय शरीर, (5) वज्र ऋषभ नाराच संहनन, (6) एक हजार आठ लक्षण, (7) सुन्दर रूप, (8) श्वेत रुधिर, (9) सम चतुरस्र संस्थान, (10) अनन्त बल।

दस केवल ज्ञान के अतिशय

(1) सी-सी योजन चारों दिशाओं में सुभिक्ष, (2) आकाश गमन, (3) दया का भाव, (4) उपसर्ग नहीं, (5) कालाहार नहीं, (6) चारों दिशाओं में सुख दिखाई देना, (7) सब विद्याओं का ईश्वराना, (8) शरीर की छाया न पड़ना, (9) नाखून और केशों का नहीं बढ़ना, (10) नेत्रों के पलकों का नहीं गिरना।

चौदह अतिशय देवकृत

(1) अर्द्धमागधी भाषा, (2) सकल जीवों में मैत्री भाव, (3) सब ऋतु के फल फूलों का फलना, (4) धर्मचक्र का समान भूमि लक्ष्य होना, (5) मन्द-मन्द सुगन्ध वायु का चलना, (6) सब जीवों को आनंद देने वाली कठोर रहित भूमि, (7) गन्धोदक की वृष्टि होना, (8) भगवान के दोनों चरणों के तल 225 कमलकल्पना, (9) आकाश का निर्मल होना (10) देवों का जय-जयकार शब्द (11) धर्म चक्र का आगे-आगे चलना (12) अष्ट मंगल द्रव्यों का होना (13) पवन कुमार जाति के देवों का भूमि निर्माण करना (14) समस्त जीवों का आनन्दमय होना

णमोकार मंत्र

॥ मनन करें ॥

एकांत मूर्ख के लिए कैदखाना है ज्ञानी के लिए स्वर्ग।

चार अनन्त चतुष्टय

(1) अनन्त ज्ञान (2) अनन्त दर्शन (3) अनन्त सुख (4) अनन्त वीर्य

अष्ट प्रतिहार्य

(1) सिंहासन (2) पुष्प वृष्टि (3) अशोक वृक्ष (4) भामण्डल या भामण्डल (5) दिव्य ध्वनि (6) दुन्दुभि बाजों का बजना (7) तीन छत्र (8) चौंसठ चंवर।
प्रश्न 5. सिद्ध परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जिन्होंने समस्त कर्मों का नाश कर दिया है और जिन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए जन्म मरण से छुटकारा पा लिया है तथा जो नित्य, निरंजन, निराकार हैं उन्हें सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 6. सिद्ध परमेष्ठी के कितने मूल गुण होते हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी के आठ मूलगुण होते हैं-
(1) सम्यक्त्व (2) ज्ञान (3) दर्शन (4) वीर्यत्व (5) सूक्ष्मत्व (6) अवगाहनत्व (7) अमूर्त्तत्व (8) अव्याबाधत्व।
प्रश्न 7. आचार्य परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो मुनि संघ के नायक होते हैं और शिष्यों को शिक्षा-दीक्षा देते हैं तथा अपराध होने पर प्रायश्चित देते हैं, उन्हें आचार्य परमेष्ठी कहते हैं।

प्रश्न 8. आचार्य परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण होते हैं-

दस धर्म

(1) उत्तम क्षमा (2) मार्दव (3) आर्जव (4) सत्य (5) शौच (6) संयम (7) तप (8) त्याग (9) आकिंचन (10) ब्रह्मचर्य।

बारह तप

(1) अनशन (2) अवमौदर्य (3) वृत्ति परिसंख्यान (4) रस परित्याग (5) विविक्त शय्यासन (6) कायक्लेश (7) प्रायश्चित (8) विनय (9) वैयावृत्य (10) स्वाध्याय (11) व्युत्सर्ग (12) ध्यान

हमारा जैन धर्म

॥ विचार करें ॥

पहले धर्मज्ञान प्राप्त करो और कुछ।

पंचाचार

(1) दर्शनाचार (2) ज्ञानाचार (3) चारित्राचार (4) वीर्याचार (5)

षट आवश्यक

(1) सामायिक, (2) स्तुति, (3) वन्दना, (4) स्वाध्याय, (5) प्रतिक्रमण, (6) कायोत्सर्ग।

तीन गुप्ति

(1) मनोगुप्ति, (2) वचन गुप्ति, (3) काय गुप्ति।
प्रश्न 9. उपाध्याय परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो संघ में रहकर पढ़ते हैं तथा तपस्वी अन्य मुनियों को पढ़ाते हैं, विशेष ज्ञानवान होते हैं, उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 10. उपाध्याय परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर- उपाध्याय परमेष्ठी के 25 मूलगुण होते हैं-

ग्यारह अंग

(1) आचारांग, (2) सूत्रकृतांग, (3) स्थानांग, (4) समवायांग, (5) व्याख्याप्रज्ञप्ति, (6) ज्ञातृ कथा, (7) उपासका ध्यान, (8) अंतःकृद्दशांग, (9) अनुत्तरोपपाद दशांग, (10) विपाक सूत्रंग, (11) प्रश्न व्याकरण।

चौदह पूर्व

(1) उत्पादपूर्वार्ध पूर्व, (2) अग्रायणी पूर्व, (3) वीर्यानुवाद पूर्व, (4) अस्ति नास्ति प्रवाद पूर्व, (5) ज्ञान प्रवाद पूर्व, (6) कर्म प्रवाद पूर्व, (7) सत्य प्रवाद पूर्व, (8) आत्म प्रवाद पूर्व, (9) प्रत्याख्यान पूर्व, (10) विद्यानुवाद पूर्व, (11) कल्याणवाद पूर्व, (12) प्राणानुवाद पूर्व, (13) क्रिया विशाल पूर्व, (14) लोक बिन्दु पूर्व।
प्रश्न 11. साधु परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर- जो पंचेंद्रिय के विषय वासनाओं और आरम्भ तथा पाप क्रियाओं से दूर हैं, परिग्रह से रहित हैं, दिगम्बर हैं, पिच्छी कमण्डल से युक्त हैं तथा ज्ञान ध्यान में अनुरक्त हैं, उन्हें साधु परमेष्ठी कहते हैं।
प्रश्न 12. साधु परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?
उत्तर- साधु परमेष्ठी के 28 मूलगुण होते हैं-

णमोकार मंत्र

॥ चिंतन करें ॥

सावधान रहना। यह दुनिया शैतान की दुकान है।

पाँच महाव्रत-

(1) अहिंसा, (2) सत्य, (3) अचौर्य, (4) ब्रह्मचर्य, (5) अपरिग्रह।

पाँच समितियाँ-

(1) ईर्या, (2) भाषा, (3) एषणा, (4) आदान निक्षेपण, (5) प्रतिष्ठापन।

पाँच इंद्रियाँ पर विजय-

(1) स्पर्शन, (2) रसना, (3) घ्राण, (4) चक्षु, (5) कर्ण।

षट आवश्यक कार्य-

(1) सामायिक, (2) स्तुति, (3) वन्दना, (4) प्रतिक्रमण, (5) स्वाध्याय, (6) कायोत्सर्ग।

सात विशेष गुण-

(1) नग्नता, (2) खड़े होकर आहार लेना, (3) केशलोंच करना, (4) दन्त धवन नहीं करना, (5) एक फखत सो सोना, (6) स्नान नहीं करना (7) हाथ में भोजन करना।

प्रश्न 13. णमोकार मंत्र किस ग्रंथ का मंगलाचरण है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र षट्खण्डागम ग्रंथ का मंगलाचरण है।

प्रश्न 14. णमोकार मंत्र किस भाषा में है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा में है।

प्रश्न 15. णमोकार मंत्र को लिपिबद्ध किसने किया था ?
उत्तर- णमोकार मंत्र को लिपिबद्ध आचार्य पुष्पदंत एवं भूतबली ने किया था।

प्रश्न 16. णमोकार मंत्र में कितने स्वर हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 34 स्वर होते हैं।

प्रश्न 17. णमोकार मंत्र कब से है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र अनादि निधन से है।

प्रश्न 18. णमोकार मंत्र में कितने व्यंजन हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 30 व्यंजन हैं।

प्रश्न 19. णमोकार मंत्र पर दुष्ट श्रद्धा से किसको कौनसी विद्या सिद्ध हुई थी ?
उत्तर- णमोकार मंत्र पर दुष्ट श्रद्धा से अंजन चोर को आकाशागामिनी विद्या सिद्ध हुई थी।

॥ चिंतन करें ॥

आज ऐसे जियो मानो यह आखिरी दिन है।

प्रश्न 20. णमोकार मंत्र में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 35 अक्षर हैं।

प्रश्न 21. णमोकार मंत्र में कितने काव्य हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में चार काव्य हैं।

प्रश्न 22. णमोकार मंत्र के अभिनय से कौन साक्ष्य नरक में गए ?
उत्तर- णमोकार मंत्र के अभिनय से ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती सातवें नरक में गए।

प्रश्न 23. णमोकार मंत्र में कितने पद हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 5 पद हैं।

प्रश्न 24. णमोकार मंत्र को कितने लाख मंत्रों का जनक माना जाता है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र को 84 लाख मंत्र का जनक माना जाता है।

प्रश्न 25. णमोकार मंत्र में कितने मुनिराज हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में तीन मुनिराज हैं-
(1) आचार्य, (2) उपाध्याय, (3) साधु।

प्रश्न 26. णमोकार मंत्र मुख्यतः कितने नामों से जाना जाता है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र मुख्यतः 5 नामों से जाना जाता है-
(1) मूल मंत्र, (2) महामंत्र, (3) पंच नमस्कार मंत्र, (4) णमोकार मंत्र, (5) अनादि निधन मंत्र।

प्रश्न 27. णमोकार मंत्र में कितने भगवान हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 2 भगवान हैं-
(1) अरहंत, (2) सिद्ध।

प्रश्न 28. देव को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था ?
उत्तर- देव को णमोकार मंत्र पद्म ऋषि सेठ ने सुनाया था।

प्रश्न 29. कुत्ते को णमोकार मंत्र किसने सुनाया था ?
उत्तर- कुत्ते को णमोकार मंत्र जीवाधर स्वामी ने सुनाया था।

प्रश्न 30. नाग नागिन णमोकार मंत्र के प्रभाव से क्या बने थे ?
उत्तर- नाग व नागिन णमोकार मंत्र के प्रभाव से धरणेन्द्र व पद्मावती बने थे।

प्रश्न 31. णमोकार मंत्र में कितनी मात्राएँ हैं ?
उत्तर- णमोकार मंत्र में 58 मात्राएँ हैं।

॥ चिंतन करें ॥

आत्माध्यास जगत् ही सर्वाधिक जिसमें आत्मनिर्णय हो सके।

प्रश्न 32. णमोकार मंत्र के स्मरण से किसका नाश होता है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र के स्मरण से सब पापों का नाश होता है।

प्रश्न 33. णमोकार मंत्र किस छन्द में है ?
उत्तर- णमोकार मंत्र आर्या छन्द में है।

प्रश्न 34. पंच परमेष्ठी में से सर्वज्ञ कितने परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- दो, (1) अरहंत (2) सिद्ध।

प्रश्न 35. पंच परमेष्ठी में से गर्भ के अतिशय कौन से परमेष्ठी के होते हैं ?
उत्तर- किसी के नहीं।

प्रश्न 36. पंच परमेष्ठी में से पंचम गतिने परमेष्ठी को प्राप्त हो गई है ?
उत्तर- एक, (सिद्ध)।

प्रश्न 37. जैन साधु को आचार्य पद कौन से परमेष्ठी देते हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 38. अरहंत परमेष्ठी कितने कर्मों का नाश कर चुके हैं ?
उत्तर- चारघातिया कर्मों का-ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनीय, अन्तराय।

प्रश्न 39. आचार्य परमेष्ठी के कितने गुण होते हैं ?
उत्तर- अनंत गुण।

प्रश्न 40. ॐ में कितने परमेष्ठी गर्भित हैं ?
उत्तर- पाँच परमेष्ठी।

प्रश्न 41. पाँच परमेष्ठी में से 105 कितने परमेष्ठी के आगे लगाया जाता है ?
उत्तर- किसी के आगे नहीं।

प्रश्न 42. अरहंत परमेष्ठी ने मोहनीय कर्म का नाश कर कौन सा अनन्त चतुष्टय प्रगट किया है ?
उत्तर- अनन्त सुख।

प्रश्न 43. जिन मंदिर जी में मुख्यतः कितने परमेष्ठी की प्रतिमा होती है ?
उत्तर- दो (1) अरहंत (2) सिद्ध।

प्रश्न 44. दिव्य ध्वनि कितने परमेष्ठी की खिलती है ?
उत्तर- एक (अरहंत)।

॥ चिंतन करें ॥

आंतरिक कलह (कषाय) के अभाव में धर्म मार्ग प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 45. पाँच परमेष्ठी में से गुणधर कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 46. पाँच परमेष्ठी के मूल गुणों का जोड़ क्या है ?
उत्तर- 46+8+36+25+143

प्रश्न 47. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी विहार करते हैं ?
उत्तर- चार- (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 48. पाँच परमेष्ठी में से कौन से परमेष्ठी नियम से इस भव में मोक्ष प्राप्त करेंगे ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।

प्रश्न 49. पाँच परमेष्ठी में से वर्तमान में कषाय रहित कितने परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 50. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पीठी कमण्डलु रखते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 51. कितने परमेष्ठी प्रत्यक्ष में दिखते हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 52. कितने परमेष्ठी मन रहित हैं ?
उत्तर- एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

प्रश्न 53. पाँच परमेष्ठी में से सबसे बड़े परमेष्ठी कौन से हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी।

प्रश्न 54. पाँच परमेष्ठी में से आयिका माता कौन सी परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 55. पाँच परमेष्ठी में से सबसे कम मूलगुण किस परमेष्ठी के हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी।

प्रश्न 56. कितने परमेष्ठी आहार करते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 57. कितने परमेष्ठी वस्त्र सहित हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 58. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी के इन्द्रियाँ नहीं हैं ?
उत्तर- एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

॥ चिंतन करें ॥

अज्ञानी पर के गुण दोष देखता है ज्ञानी अपने गुण दोष देखता है।

प्रश्न 59. ऐसे कितने परमेष्ठी हैं जिनकी इन्द्रियाँ तो हैं लेकिन काम नहीं करती हैं ?
उत्तर- एक (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 60. कितने परमेष्ठी कर्मों से सहित हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 61. कितने परमेष्ठी कलाधारी हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 62. कितने परमेष्ठी केवलज्ञानी हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 63. कितने परमेष्ठी संसारी हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 64. कितने परमेष्ठी को केवल ज्ञान हो गया है ?
उत्तर- दो (अरहंत, सिद्ध)।

प्रश्न 65. पाँच परमेष्ठी में से सबसे छोटे परमेष्ठी कौन से हैं ?
उत्तर- साधु परमेष्ठी।

प्रश्न 66. कौन-कौन से परमेष्ठी के मूल गुणों का योग 90 है ?
उत्तर- अरहंत 46 + सिद्ध 8 + आचार्य 36 = 90।

प्रश्न 67. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी ने अनन्त चतुष्टय प्राप्त कर लिया है ?
उत्तर- दो (अरहंत, सिद्ध)।

प्रश्न 68. कितने परमेष्ठी को अविनाशी पद प्राप्त हो गया है ?
उत्तर- एक, (सिद्ध)।

प्रश्न 69. कितने परमेष्ठी निकल परमाला है ?
उत्तर- एक, (सिद्ध परमेष्ठी)।

प्रश्न 70. मांगतुंगाचार्य कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 71. कितने परमेष्ठी मन सहित हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 72. सिद्ध परमेष्ठी पीठ के कौन से नम्बर के परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- पाँच नम्बर के।

॥ चिंतन करें ॥

उपदेश जवान से नहीं, जीवन से दो।

प्रश्न 73. पाँच परमेष्ठी में से चौबीस तीर्थंकर कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।

प्रश्न 74. शिक्षा एवं दीक्षा का काम कौन से परमेष्ठी करते हैं ?
उत्तर- आचार्य परमेष्ठी।

प्रश्न 75. सम्यग्दर्शन कितने परमेष्ठी का लगता है ?
उत्तर- एक (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 76. कितने परमेष्ठी पर त्याग कर ग्रहण कर सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 77. सकल परमाला कितने परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- एक (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 78. सिद्ध परमेष्ठी कितने कर्मों से रहित हैं ?
उत्तर- समस्त कर्मों से (द्रव्य कर्म, नो कर्म भाव कर्म)।

प्रश्न 79. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पाठन का कार्य करते हैं ?
उत्तर- एक, (उपाध्याय परमेष्ठी)।

प्रश्न 80. पाँच परमेष्ठी में से गृहस्थ कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।

प्रश्न 81. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी का उपदेश होता है ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 82. पाँच परमेष्ठी में से कितने भगवन्त हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 83. कितने परमेष्ठी संसार में केवल ज्ञानी हैं ?
उत्तर- एक, (अरहंत परमेष्ठी)।

प्रश्न 84. पाँच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी के मूलगुण का योग 61 है ?
उत्तर- दो, (आचार्य, उपाध्याय)।

प्रश्न 85. कितने परमेष्ठी ध्यान करते हैं ?
उत्तर- चार (अरहंत, आचार्य, उपाध्याय, साधु)।

प्रश्न 86. वर्तमान में बाहुबली कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- सिद्ध परमेष्ठी।

॥ शिवत्वं करे ॥

धर्म में विवाद नहीं, विज्ञान में धर्म नहीं।

प्रश्न 97. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी बने बिना मोक्ष मिल सकता है ?
उत्तर- दो (आचार्य, उपाध्याय)।
प्रश्न 98. पांच परमेष्ठी में से कितने परमेष्ठी पर उपसर्ग हो सकता है ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 99. कितने परमेष्ठी निद्राहारी हैं ?
उत्तर- कोई नहीं।
प्रश्न 100. सिद्ध परमेष्ठी ने नामकर्म का नाश कर कौन सा गुण प्रकट किया है ?
उत्तर- सूक्ष्मत्व गुण।
प्रश्न 91. णमोकार मंत्र का जाप संक्षेप में कैसे करते हैं ?
उत्तर- ॐ ह्रीं असी आ ऊसा नमः।
प्रश्न 92. पांच परमेष्ठी में से आदिनाथ तीर्थंकर कौन से परमेष्ठी हैं ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी।
प्रश्न 93. कितने परमेष्ठी 18 दोषों से रहित हैं ?
उत्तर- दो (अरहंत, सिद्ध)।
प्रश्न 94. कितने परमेष्ठी पुनः जन्म ले सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 95. वर्तमान में हम कितने परमेष्ठी से बात कर सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 96. अरहंत परमेष्ठी का प्रभाव करने के बाद कहां लगाना चाहिए ?
उत्तर- मस्तक पर।
प्रश्न 97. पांच परमेष्ठी में से 108 कितने परमेष्ठी के आगे लगाया जाता है ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 98. आचार्य, उपाध्याय, साधु के आगे 108 ही क्यों लगाते हैं ?
उत्तर- आचार्य, उपाध्याय, साधु 108 प्रकार के गुणों से युक्त होते हैं इसलिए इनके आगे 108 लगाया जाता है। 108 गुण इस प्रकार हैं— (28 मूलगुण, 22 व्रत परिग्रह, 12 तप, 12 भावना, 10 धर्म, 13 प्रकार का चारित्र, 6 कायकी रक्षा, 5 पंचाचार)।

॥ शिवत्वं करे ॥

भावना, कारणता और अधर्म है, देखना वीरता और धर्म है।

प्रश्न 99. अरहंतों छोटे हैं सिद्ध बड़े हैं फिर पहले अरहंतों को नमस्कार क्यों किया गया है ?
उत्तर- अरहंत परमेष्ठी समवशरण में बैठकर भव्य जीवों को सम्यग्देश देते हैं तभी सिद्धों का ज्ञान परिचय आदिदेवता के द्वारा ही होता है, इस उपकार को मानने हेतु अरहंतों को प्रथम नमस्कार करते हैं।
प्रश्न 100. कितने परमेष्ठी इंद्रियों से काम लेते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 101. णमोकार मंत्र के लेखक कौन हैं ?
उत्तर- वैसे तो यह अनादि निधन मंत्र है लेकिन इस काल की अपेक्षा से आचार्य पुष्पदंत एवं भूतबली इस मंत्र के लेखक हैं।
प्रश्न 102. वर्तमान में हम कितने परमेष्ठी को देख सकते हैं ?
उत्तर- तीन (आचार्य, उपाध्याय, साधु)।
प्रश्न 103. णमोकार अरहंतों में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 7 अक्षर हैं।
प्रश्न 104. णमो सिद्धायण में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 5 अक्षर हैं।
प्रश्न 105. णमो आइरियाणं में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 7 अक्षर हैं।
प्रश्न 106. णमो उवज्झायाणं में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 7 अक्षर हैं।
प्रश्न 107. णमो लोए सव्व साहूणं में कितने अक्षर हैं ?
उत्तर- इस पद में 9 अक्षर हैं।
प्रश्न 108. णमोकार मंत्र की संक्षेप में कहानी लिखिए।
उत्तर- काशी नगरी में नदी किनारे एक पीपल का पेड़ था। उस पेड़ पर एक पक्षी का परिवार रहता था, जिसमें दो बच्चे एवं तीन छोटे पक्षी थे। बड़े ही सुख से वह अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। बड़े पक्षी जब दाना लेने जाते थे छोटे पक्षी अपने घोंसले में रहा करते थे। एक दिन बड़े पक्षी जब दाना संखेजने लगे तो उनसे छोटे पक्षियों ने भी कहा कि हम भी आपके साथ दाना संखेजने लगे। बड़े पक्षियों के मना करने पर भी वह नहीं माने और उनके साथ

॥ शिवत्वं करे ॥

युवाओं को धर्म स्थान देना ही अधर्म से रोकना है।

चित्र: एक पेड़ के नीचे एक व्यक्ति बैठा है, बारिश हो रही है, और कुछ पक्षी उड़ रहे हैं।

॥ शिवत्वं करे ॥

सुनो ज्यादा, देखो ज्यादा, बोलो कम ! कभी घाटा नहीं होगा।

चल दिए। थोड़ी दूर चलने के बाद उन्हें एक गिद्ध पक्षी अपनी ओर आते दिखाई दिया तो बड़े पक्षी घबड़ा गए कि अब तो हम सबकी जान खतरे में है, यह सोचकर वह पक्षी नीचे उतरने लगे पर उन्होंने नीचे देखा कि एक शिकारी उन्हें मारने के लिए तीर से निशाना लगा रहा था। यह देख बेचारे पक्षी और घबड़ा गए कि ऊपर गिद्धराज और नीचे शिकारी। उन्होंने सोचा कि अब बचने का कोई उपाय नहीं है, क्या करें ? इतने में ही उन्हें पूर्व संस्कारवश जो कि संसार भ्रमण की आदि है व्याधि को मिटाने वाला, आपत्ति एवं विपत्ति को टालने वाला, दुखों से छुटकारा दिलाने वाला, पापों का नाश करने वाला एवं सम्यक ज्ञान को प्राप्त कराने वाला, ऐसे महा मंत्रराज णमोकार मंत्र का ध्यान आया तो सभी पक्षी बीच में ही रुककर सच्ची श्रद्धा के साथ णमोकार महामंत्र का स्मरण करने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा तो नीचे गिद्ध व शिकारी दोनों तड़प रहे थे। उनको तड़पता देख सभी पक्षी नीचे उतरकर उनको णमोकार मंत्र सुनाने लगे। यह देख शिकारी व गिद्धराज कहने लगे कि मुझे क्षमा करना। मैं तुम सबका शिकार करना चाहता था और तुम मेरे दुखी समय में मुझे णमोकार मंत्र सुना रहे हो, तुम्हारा परम उपकार रहेगा हम पर। इसी बीच पक्षियों ने पूछा कि तुम्हारा यह हाल हुआ कैसे ? तो शिकारी कहता है कि जब तुम आकाश में ही रुककर सच्ची श्रद्धा के साथ णमोकार मंत्र का जाप (स्मरण) कर रहे थे तभी मैं अपना शिकार और आसान समझ पृथ्वी से निशाना लगा रहा था, लेकिन उसी समय एक सर्प ने आकर डस दिया जिससे निशामुक्त होकर गिद्ध पक्षी में जा लगा, इसलिए हम दोनों का यह हाल हो गया। यह कहते ही उनकी जान निकल गई।
ज्ञानी विचार करते हैं कि- अहा ! जब तिर्यंच गति के जीव श्रद्धा के साथ णमोकार मंत्र का स्मरण कर अपने कष्टों को मिटा सकते हैं सुख की प्राप्ति कर सकते हैं तो हम सभी तो मनुष्य गति के सम्यग धारण करने वाले जीव हैं। इसलिए हम सभी भी णमोकार महामंत्र का पूर्ण श्रद्धा के साथ स्मरण (जाप) करें और अपने समस्त पापों का नाश कर, मोह, राग-द्वेष का अभाव कर सच्चे सुख की प्राप्ति करें। ऐसी मंगल भावना के साथ—

॥ शिवत्वं करे ॥

खुद जियो और दूसरों को जीने दो ! सही सच्ची दया है।

जैसी करनी वैसी भरनी

प्रश्न 1. श्री पाल को कुष्ठ रोग क्यों हुआ ?
उत्तर- श्री पाल ने खेल-खेल में पूर्व भव में मुनि को कोढ़ी कहा था, अतः उन्हें कुष्ठ रोग का दुख उठाना पड़ा था।
प्रश्न 2. अंजना सती का 22 वर्ष तक अपने पति से वियोग रहा था ?
उत्तर- पूर्वभव में अंजना सती ने लीला से लड़खड़ाकर उसकी प्रतिमा को 22 पल तक वहां से हटा दिया था, अतः उसे अपने पति का वियोग सहना पड़ा था।
प्रश्न 3. मुनि ऋषभदेव को 6 महीने तक आहार क्यों नहीं मिला था ?
उत्तर- मुनि ऋषभदेव ने पूर्व पर्याय में खेती की रखवाली केली के मुंह में धोके बेचने को कहा था, अतः उन्हें मुनि पर्याय में 6 माह तक आहार नहीं मिला था।
प्रश्न 4. कुन्द-कुन्द आचार्य इतने बड़े विद्वान कैसे हुए थे ?
उत्तर- उन्होंने कोषस्थ पाले की पर्याय में मुनिराज को शास्त्र दिया था।
प्रश्न 5. राजा श्रेणिक को नरक का बंध क्यों हुआ था ?
उत्तर- उन्होंने उपसर्ग हेतु मुनिराज के गले में मरा हुआ सर्प डाला था।
प्रश्न 6. सुदर्शन सेठ के सूली पर चढ़ते ही सूली सिंहासन कैसे बन गई ?
उत्तर- ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करने के कारण सूली सिंहासन बनी।
प्रश्न 7. राजा अरिहंत नरक में क्यों गया था ?
उत्तर- उसने अपने पुत्रों को आज्ञा दी थी कि खून से बावड़ी भरकर मुझे उससे स्नान कराओ।
प्रश्न 8. श्रेष्ठीश्वर राजा को मरकर मुर्गा बनना पड़ा, ऐसा उन्होंने क्या किया था ?
उत्तर- उसने आटे का मुर्गा बनाकर चर्मदादी देवी के आगे चढ़ाया था।

॥ शिवत्वं करे ॥

आकांक्षा सहित धर्म ही, सबसे उत्तम है।

प्रश्न 9. प्रद्युम्न कुमार का अपहरण धूमकेतु नाम के असुर ने क्यों किया ?
उत्तर- पूर्व भव में प्रद्युम्न के जीव ने उस असुर के पहले भव की पत्नी को हरण किया था।
प्रश्न 10. यमपाल चांडाल के समुद्र में जाने पर उसके लिए सिंहासन क्यों बन गया था ?
उत्तर- क्योंकि उसने ऐसी प्रतिज्ञा ली थी कि चतुर्दशी के दिन किसी जीव को फांसी नहीं दूंगा।
प्रश्न 11. ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती को सातवें नरक का कारण जाना पड़ा ?
उत्तर- उन्होंने मानकाद मंत्र को पांव से मिटाया था।
प्रश्न 12. किस कारण मृगसेन धीवर के जीव की 6 बार रक्षा हुई ?
उत्तर- उसने पूर्वभव धीवर की पर्याय में एक मछली को 6 बार जाल में फंसने पर भी छोड़ दिया था।
प्रश्न 13. श्री भूत पुरोहित को गोबर खाना पड़ा, मुझके रहने पड़े, देश निकाला मिला, यह दण्ड उसे क्यों मिला ?
उत्तर- क्योंकि उसने अमावस में स्नान की थी।
प्रश्न 14. किस कारण श्रीपाल को समुद्र में गिराया गया था ?
उत्तर- पूर्व भव में इन्होंने मुनिराज को समुद्र में फेंका था।
प्रश्न 15. सुभूम्य दम्भी में वर्णित रानी सती के शरीर से दुर्गन्ध आने लगी थी, ऐसा क्यों हुआ ?
उत्तर- पूर्व भव में इन्होंने मुनिराज को कड़वी तुम्बी का आहार दिया था।
प्रश्न 16. पांच पांडव में से दो को मोक्ष की प्राप्ति क्यों नहीं हुई ?
उत्तर- जयंत समर इनके मन में अपने भाईयों के प्रति राग उत्पन्न हुआ था।
प्रश्न 17. सिंहासन सहित राजावसु को नरक क्यों जाना पड़ा था ?
उत्तर- अठ्ठल बोलने के कारण।
प्रश्न 18. रोमा सती के गले में नाग का हार क्यों बना था ?
उत्तर- क्योंकि उसने रात्रि भोजन के त्याग का नियम लिया था।
प्रश्न 19. अनंतकार को आकाशगामिनी विद्या सिद्ध क्यों हुई ?
उत्तर- णमोकार मंत्र पर दृढ़ श्रद्धा के कारण।

॥ चिंतन करें ॥

सदा दम ही परम धर्म है।

प्रश्न 20. सीता अग्नि कुंड में कूदी और वह जल का सरोवर बन गया। यह सब कैसे हो गया ?
उत्तर- सीता जी के शील के महत्त्व के कारण।

प्रश्न 21. सुभद्राना के स्नान के जल से सभी प्रकार के रोग व विष नष्ट हो जाते थे ऐसी ऐसी सर्वोषधि सिद्धि कैसे प्राप्त हुई ?
उत्तर- पिछले भव में मुनि की सेवा कर ओषधि दान देने के कारण।

प्रश्न 22. सीता जी का अपवाद क्यों हुआ ?
उत्तर- सीता जी ने पूर्व भव में मुनि का अपवाद किया था।

प्रश्न 23. मुनिराज को देखकर क्रूर प्राणी अपनी क्रूरता छोड़ देते, फिर सुकुमार मुनि को स्यालिनी ने क्यों खाया ?
उत्तर- क्योंकि पिछले भव में सुकुमार ने अपनी भावी जो इस भव में स्यालिनी है, को लात मारी थी।

प्रश्न 24. राजा वसु को उसकी प्रजा ने देश निकाला क्यों दिया ?
उत्तर- छोटे व्यसन के कारण (मांस खाने के कारण)।

प्रश्न 25. नागदत्त नाम का सेठ सामायिक करते-करते मरण को प्राप्त हुआ और मरकर नरक की पर्याय मिली, ऐसा क्यों ?
उत्तर- स्वाध्याय के समय प्यास (पानी) की तृष्णा के कारण मरा, इसलिए वह भेडक बना।

प्रश्न 26. सुलभलवी नाम की सती जो दूसरों का खून भोजन खाती थी लेकिन मरकर देव हुई, ऐसा क्यों हुआ ?
उत्तर- क्योंकि उसने एक दिन अन्तर्मुहूर्त का उपवास रखा और उसी उपवास के बीच मरण को प्राप्त हुई, इसलिए उसे स्वर्गगति की प्राप्ति हुई।

प्रश्न 27. पारसीधि के जीव को अनेकों बार गाय, बिल्ली, भेड़-चींटे इत्यादि बनना पड़ा, बहुत दुख सहन किया, ऐसा क्यों हुआ ?
उत्तर- क्योंकि उसने 363 मिथ्यामत चलाये थे।

प्रश्न 28. जिन दर्शन के सिवाय से कितना पुण्य लगता है ?
उत्तर- जिनेन्द्र भगवान के दर्शन के सिवाय से एक उपवास का फल लगता है।

॥ चिंतन करें ॥

स्वभाव की भावना ही मोक्ष मार्ग है।

प्रश्न 29. मंदिर जी जाने के लिए उद्यम करने पर कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- मंदिर जी जाने के लिए उद्यम करने पर दो उपवास का फल लगता है।

प्रश्न 30. मंदिर जी के लिए चल देने पर कितना पुण्य लगता है ?
उत्तर- चार उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 31. मंदिर जी में पहुँचने पर कितना पुण्य लगता है ?
उत्तर- छह माह के उपवास का फल लगता है।

प्रश्न 32. जिन मंदिर की प्रदक्षिणा देने से कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- सौ वर्ष के उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 33. जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करने पर कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- एक हजार वर्ष के उपवास का फल मिलता है।

प्रश्न 34. जिनेन्द्र भगवान की पूजन स्तुति करने से कितना पुण्य मिलता है ?
उत्तर- अनंत पापों का क्षय एवं अनंत उपवासों का फल मिलता है।

प्रश्न 35. यह फल विवरण किस ग्रंथ में कहीं लिखा गया है ?
उत्तर- पद्मपुराण के 32 वें पर्व में लिखा है।

प्रश्न 36. किस जीव को मरते समय बहुत कष्ट उठाना पड़ता है ?
उत्तर- जो जीव अपनी जाति में घमण्डी, क्रोधी, मृत्यु से डरने वाला, आत्म प्रशंसी, मुँह पर मीठा, भीतर दुष्ट होता है। उसे मरते समय बहुत दुख उठाना पड़ता है और जो ऐसे नहीं है, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता है।

प्रश्न 37. कौन सा जीव मरकर कबक योनि पाता है ?
उत्तर- जो जीव गुरु व धर्म की निंदा करता है और देव द्रव्य खाकर पेट भरता है, वह नीच कबक योनि पाता है।

प्रश्न 38. कौन से जीव मरकर उल्लू, गधा व कुत्ते बनते हैं ?
उत्तर- जो जीव भीतर कपट रखते हैं। दूसरों के कल्याण व धन को देखकर डाह करते हैं वे मरकर उल्लू, गधा व कुत्ते होते हैं।

प्रश्न 39. कौनसा जीव मरकर शाकिनी व भूतनी के पर्याय में जन्म लेता है ?
उत्तर- जो स्त्रियां (जीव) जिन मंदिरों को निंदा करने वाली है, दूसरों के

॥ चिंतन करें ॥

सदा अपना हित शुद्धता है।

गुणों का लोप करती है, लड़ाका है, वह चुड़ैल दिखती है। वे नियम से शाकिनी व भूतनी बनती हैं।

प्रश्न 40. विद्वान का जीव मरकर स्वर्ग में देव हुआ, क्या कारण था ?
उत्तर- क्योंकि वह भगवान महावीर के दर्शनों की भावना मन में लिए हुए मरण को प्राप्त हुआ था।

प्रश्न 41. कौन से जीव अज्ञानीत्व तथा कुरूप होते हैं ?
उत्तर- जो जीव स्वयं तो तप नहीं करते परंतु तप करने वालों की निंदा करते हैं वे अज्ञानी और कुरूप होते हैं।

प्रश्न 42. कौन से जीव कामदेव के समान सुंदर होते हैं ?
उत्तर- जो दुष्कर तपों को सदा तपते हैं वे कामदेव के समान सुन्दर शरीर वाले होते हैं।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


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स्रोत: Gyata संग्रह।

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