गरीब लहर — जैन स्वाध्याय सामग्री | Garib Lahar

गरीब लहर

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नमोंकार मंत्र की आरती

ॐ णमो अरिहंताणं, णमो लोए सव्व साहूणं … टेक
प्रथम श्री अरहंत जिनेश्वर, गुण अनंत धारी, स्वामी… ज्ञान
अवंते दंश अवंते -२ सुख बल भण्डारी … टेक
दूजे सिद्ध सदा सुखदाता, शिवपुर के वासी, स्वामी …
पूर्ण शुद्ध पदमातम प्रभुजी-२ अविचल अविनाशी … टेक
तीजे श्री आचार्य परमगुरु, छत्तीस गुणधारी, स्वामी…
पंचाचार आचारी स्वामी-२ मुनिसंघ संचारी … टेक
चौथे श्री उपाध्याय गुरुजी, स्वाध्याय धारी, स्वामी…
ग्यारह अंग पूर्व चौदह के -२, नित अभ्यास कारी … टेक
पंचम सब मुनिराज लोक के, रत्नत्रय धारी, स्वामी…
आठ बीस गुण मूल सहित है-२, शुद्धातम धारी … टेक
ऐसो पंच णमो यारो, सव्वपापप्पणासणो, स्वामी…
मंगलाणं च सव्वेसिं स्वामी-२ पढमं होइ मंगलम् … टेक


श्री वीतरागाय नमः

भक्ति-लहर


प्रस्तुतकत्र्ता

अनुभव प्रकाश जैन “मी काले”
(M.A.) दान ओसी लेक्चर (मा)

सम्पादक

पं. पूरन चन्द जी जैन
लखपति नं ३ सोनीपत (हरियाणा)

पवन कुमार जी जैन

C/o श्री सुरेश चन्द ज्ञान कुमार जी जैन
मी. जिला भिण्ड

प्रकाशक

महिला मुमुक्षु मण्डल
गली नं १२, कैलाश नगर, दिल्ली
श्री दिगम्बर जैन समाज, ध्यासिकर

पुस्तक प्राप्ति स्थल

  • श्री दिगम्बर जैन महावीर परमागम मंदिर
    जैन मंदिर सत्तर, मुरार
    ग्वालियर
  • श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर
    गली नं. 12, कैलाश नगर, दिल्ली
  • श्री वीतराग विज्ञान पाठशाला
    श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर
    मो, जिला-भिण्ड
  • श्री वीतराग विज्ञान पाठशाला
    2372, गली नं. 12
    कैलाश नगर, दिल्ली
  • श्री वीर पाठशाला
    जैसवाल जैन मंदिर जी
    दाना ओली लश्कर, ग्वालियर

मूल्य : 15 रुपये
(छपा मूल्य से प्राप्त राशि अगले संस्करण के प्रस्तुतीकरण के उपयोग में ली जावेगी)

प्रतियाँ : 1111

प्रथम संस्करण 2001


: लेजर टाइप सेटिंग :
तात्या कम्प्यूटर इन्स्टीट्यूट
गांधी भवन, प्रताप सिंह मार्ग, लश्कर भावा,
लश्कर, ग्वालियर, फोन - 436730

प्रकाशकीय

आधुनिकता के इस युग में जीव भोग विषयों की चकाचौंध में इतना धँसा हुआ है कि उसे अपनी ही सुध नहीं रही है। कि मैं स्वयं कौन हूँ? तथा कर क्या रहा हूँ? किसके लिए कर रहा हूँ? और वास्तव में मुझे क्या करना चाहिए? इन सब प्रश्नों का हल जब वह ढूँढ़ता है। तो उसे कोई सकारात्मक हल नहीं मिलता और उसका मन अशांत हो जाता है। तब इस अशांत मन की शांति के लिए वह देव-शास्त्र-गुरु के चरणों में आके आराधना करता है, अर्थात् पूजन-भक्ति-विधान आदि रचता है और शांतिमयी प्रभु की शरण में शांति पाता है। तब उसे निज का भान होता है कि मैं जीव हूँ और अभी तक क्या कर रहा था…! जीव सोचता है कि मैंने एक बार प्रभु के दर्शन-पूजन-विधान किये तो मेरा भटका हुआ मन शांत हुआ और जब प्रतिदिन भगवान का पूजन विचार स्वाध्याय तो कितना अच्छा होगा, ऐसा सोच वह श्री जिनेन्द्र देव की आराधना करना अपने जीवन का एक अभिन्न कार्य बना लेता है।

पूजन-विधान को रुचिकर बनाने के लिए रुचिवानों के उसमें अनेक छंदों का समावेश भी किया है और इन छंदों को वह कैसे पढ़े इस बात का ज्ञात न होने से उसका मन पुनः विचलित हो जाता है, कि इन छंदों को मैं कैसे पढूँ कि मुझे अत्यधिक आनंद आये। उसकी इस समस्या का हल करती है “भक्ति-लहर” नामक पुस्तक। अनुपम प्रकाश जी के द्वारा तैयार की गई भक्ति-लहर


नामक पुस्तक अपने आप में एक अलग स्थान रखती है इस तरह की यह पहली पुस्तक है, जिसमें कि विधान में आये हुए विभिन्न छंदों को भक्तिमय होकर कैसे पढ़ा जाय यह सब दिया गया है। भजन आध्यात्मिक-हृदयस्पर्शी हों इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है।

इस पुस्तक को प्रस्तुत करने के लिए अनुपम प्रकाश जी की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है, किन शब्दों से मैं उनका धन्यवाद ज्ञापित करूँ शब्द वो शब्द मेरे पास नहीं है। “भक्ति-लहर” पुस्तक के प्रकाशन का सौभाग्य जो हम महिला मुमुक्षु मण्डल को मिला है इसके लिए मैं पुनः समस्त महिला मुमुक्षु मण्डल की ओर से भाई अनुपम जी को धन्यवाद देती हूँ एवं पुस्तक के संपादन में पं. श्री पूरन चन्द्र जी, सोनगिर एवं श्री पवन कुमार जी, जो ने अपना जो अमूल्य योगदान दिया है तथा पुस्तक के प्रकाशन में सकल जैन समाज ने जो सहयोग प्रदान किया है उसके लिए हम उन सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं।

हम सभी इस पुस्तक के माध्यम से पूजन-विधान को स्वरमयी, भक्तिमयी, आनंदमयी, सम्पन्न कर अपना आत्म कल्याण करें ऐसी मंगल भावना के साथ!


सचिव
नही जैन
महिला मुमुक्षु मण्डल
कैलाश नगर, दिल्ली

सम्पादकीय

वर्तमान भौतिकवादी युग में विषयोन्मुख हो रहे प्राणियों के लिए भजन, भक्ति के माध्यम से उनको धर्मचरण में लगाने की सद्भावना से भक्ति की महिमा बताई गई है ‘जिने-भक्ति-जिने-भक्ति दिने-दिने सम्फल्लकल्याण संसार वारुण’ ऐसी भक्ति लहर में भावना है।

वास्तव में निज ज्ञायक स्वभाव के आश्रय से अभेद भक्ति एवं उसके साथ में शुभ राग का परिणाम भेद भक्ति है। सभी श्रद्धालुओं को ‘भक्ति-लहर’ जीवन में प्रदर्शन के रूप में नहीं अपितु प्रवर्तन में आये तभी उसकी सार्थकता है।

“हमारा जैन धर्म” के बाद “भक्ति-लहर” लिखकर धर्म प्रेमी बालक अनुपम प्रकाश ने एक आदर्श जीवन देने ऐसे संस्कारों के प्रयोजन से प्रस्तुत पुस्तक लिखी है

सभी लोग भक्ति भावना भाकर के आत्म कल्याण की ओर अग्रसर हों ऐसी सद्भावना है। भक्ति-लहर जन-2 में घर-2 में पहुँचे सभी साधर्मी जन उसका सदुपयोग करें तभी उसके उपयोग की सार्थकता है।

पूरन चन्द्र जैन
मंदिर नं. 3
मी वाली धर्मशाला
सोनगिर, दतिया (म.प्र.)

अपनी बात

जो वीतराग देव झुके और निष्प्रयोज्य भी सेवा दें
जो सर्वज्ञता में इस पथ पर चले कर्म मल धोया है।
जो साधक है आत्मज्ञ है जिससे अंतरंग तारे टले
इस महद दर्जे की सिद्धि हेतु अपने शहर सफल बनाया है।।
जीवन में पुण्य कमाने के कई तरीके हैं कोई दान देकर पुण्य कमाता है तो कोई देव-दर्शनों को सेवा करके पुण्य कमाता है, कोई तीर्थयात्रा कर पुण्य कमाता है, तो कोई जिनेन्द्र देव की आराधना अर्थात् पूजन-विधान करके पुण्य कमाता है इत्यादि अनेक प्रकार से जीव अपने जीवन में पुण्यार्जन कर सकता है। लेकिन इन अनेक प्रकार के पुण्यार्जन के तरीकों में जो सर्वश्रेष्ठ उत्तम व सरल तरीका है वह है जिनेन्द्र देव की आराधना अर्थात् पूजन विधान क्योंकि जब हम जिनेन्द्र देव की पूजन विधान करते हैं तो उसमें जिनेन्द्र देव का गुणगान करते हैं, कि हे भगवान आप इन सब दुखों सभी प्रकार को दुःख, मोह रूपी अंधकार को दूर भगाकर, आप शाश्वत सुखमय सुखी हुए हैं कितना अच्छा अतिशय है, तीर्थंकरों के समयों में आदि गुणगान करते हैं तब एक बात के लिए अपनी बात याद आती है कि अरे तो मैंने भी 'देव इस दुखमयी संसार से कब कर रहा हूँ ? मैं भी भगवान की तरह मोह रूपी अंधकार को दूर कर शाश्वत सुख सुखी प्राप्त कर सकता हूँ, ऐसी अनुभूति उसे अपने आप में होती है। ठीक भी है “जिस प्रकार दर्पण को देखकर शरीर का दर्शन होता है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन को देखकर निजआत्मा का दर्शन होता है” यह बात अन्य प्रकार के पुण्यार्जन में नहीं है जबकि और पुण्यार्जन वाला पूजन होता है और साथ ही संसार भ्रमण का कारण है। जैसे-व्यक्ति जब दान देता है, तो वह सोचता है कि आज दान देंगे तो कल मिलेंगे भी अर्थात् स्वर्ग स्वर्ग दान करता है। और जब वह देव-दर्शनों की सेवा करता है तो वह सोचता है कि आज हम सेवा करेंगे तो कल हमारी भी सेवा होगी और तीर्थयात्रा करने व्यक्ति जब जाता है तो वह पहले ही अपनी कामना पूरी कर लेता है, कि हे कुम्भलगढ़ वाले बाबा, हे रामेश्वर वाले बाबा, अब मेरा ये रोग दूर हो जाये या मेरी नौकरी लग जाये आदि अनेक प्रकार के वह तीर्थयात्रा करने जाता है। अर्थात् ये सब पुण्यार्जन, संसार में भ्रमण ही कराने वाले हैं और पूजन विधान वाला पुण्यार्जन, संसार से मुक्ति दिलाने वाला है।

प्रिय पाठकों! आज जिनेन्द्र देव की आराधना के लिए रुचियों ने अनेक पूजन विधान तैयार समाज पर एक उपकार किया है। इन पूजन विधानों में अनेक प्रकार के छंदों का भी उपयोग किया गया है। जैसे तेरह छंद, चौदह छंद, बत्तीस छंद, सत्तरह छंद आदि, आप इन छंदों को लयबद्ध या राग में जब गाते तो पूजन विधान में इतना अधिक आनंद आता है कि किसी अन्य कार्य को याद ही नहीं रहती है। इन सामान्य इन सब छंदों की गान से परिचित नहीं है, अर्थात् यह पूजन-विधान का सर्वोत्तम आनंद नहीं उठा पाते, तो सभी सामान्य जन पूजन-विधान का भरपूर आनंद उठायें इसी उद्देश्य को लेकर यह “भक्ति-लहर” नामक पुस्तक तैयार करके मैं आप सभी के बीच प्रस्तुत की है। इस पुस्तक के अंदर जितने भी प्रकार के छंद होते हैं इन सभी छंदों की लय व राग क्या है एवं इस लय व राग को कितने प्रकार से गाया सिर्फ़ सात के साथ पढ़ा जा सकता है। उन सभी छंदों के ऊपर आध्यात्मिक भाव तैयार करके इस पुस्तक के अंदर दिये गये हैं। भक्तों को अधिक से अधिक छंदों के प्रभाव में कई भजनों को छोटे रूप में प्रस्तुत किया गया है, इस पुस्तक के अन्दर छोटे-बड़े लगभग ५०९ भजन दिये गये हैं।

समाज के लोगों की विशेष माँग होने के कारण पहले ही अल्प समय में “भक्ति-लहर” मेरा प्रथम प्रयास है। “भक्ति-लहर” में कहीं कोई त्रुटि न रह जाय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है, लेकिन फिर भी इस संस्करण में कहीं कोई त्रुटियाँ रह गई हों या दृष्टि में गलती हो गई हो तो कृपया आप हमें अवश्य सूचित करें जिससे अगले संस्करण में कोई त्रुटि न हो। इस पुस्तक का संपादन आदरणीय पं. श्री पूरन चन्द्र जी जैन, सोनगिर एवं श्री पवन कुमार जी जैन, मो के द्वारा किया गया है मैं उनका हृदय से आभारी हूँ। इस पुस्तक के प्रकाशन का भार महिला मुमुक्षु मण्डल, कैलाश नगर, दिल्ली ने लिया है साथ ही जिन महानुभावों ने अपनी नवल लक्ष्मी का पुस्तक को समर्पित करने में जो सहयोग देकर सहयोग किया है उन सभी साधर्मी जनों को हमारी ओर से बहुत-बहुत धन्यवाद!

अगली पुस्तक के प्रकाशन में मुमुक्षुओं एवं विद्वत् जनों के सुझाव का अभिलाषु

अनुपम प्रकाश जैन
C/o श्री शांति कुमार जी जैन
सुभाष बाड़ा, नया ओली
लश्कर, ग्वालियर

क्या/कहाँ

छन्द का नाम - पृष्ठ
विगत, समान, श्रेया, प्रशस्ति - 4
शिवांजलि - 5
मंगला - 6
मंगलाष्टक, विदा, कविता, - 7
सूचना, शुद्धिनी, कहानीहीन - 8
दोहा - 10
वीर छंद, सोरठा, मालनी, लावणी, मदन गायत्री, - 11
छप्पय, सवैया, भुजंगप्रयात, भुजंगिका, पृथ्वीका, पद्म, - 27
चामर, मनु छंद, त्रिभंगी, मदन - 30
सुंदरी - 49
घात, पादवा, रेखता, रुमली, राही - 51
चौपाई, ध्रोवक, लावनिक, दोधक, रेवती, अलार, - 55
मुक्तादाम, शांतिकाम, मौलिक, प्रेम, मोदक - 60
दोधक, दहेरी - 79
गीता, शालिक, हरगीतिका, नारायणदत्त - 85
सप्तदाम, अद्वैत, पीयूष - 87
माधव - 91
राधिका, श्रेया, ध्रुव, दोधक, आत्मकंठ - 94
बसंततिलका, भुजंगप्रयात, इन्द्रवज्रा, पीयूषनिर्झर, - 98
संवादार्थ, उपछंद्या - 100
सौरभ - 104
अग्रसार - 105
सरसी, चौपैया, सार, विष्णु, छबीला, चौबोला, - 106
नयनारसी, उत्सवा, अपराजिता - 109
द्विभुज - 110
द्विचाल, दीर्घबन्धु - 115
विद्युता - 120
तोमर, लव तोमर, वंदना, बालय, अर्ध नारायण, - 125
नारायण, चामर, वामन - 126

अनुक्रमणिका

भजन - पृष्ठ सं.
गरब मतला में है - 1
सोनागिरि सिद्धक्षेत्र में - 1
मोहे माया से ये मन - 4
जागी कहते हैं जीव - 4
तुमको पुकारा ये - 5
तेरे पाँच हुए कल्याण - 5
मेरी बनना है - 5
जैनी होवे धानी - 6
आया है अवधि सार - 6
प्रभु दर पे आया - 6
पवन चले राजूले - 7
ए दुनिया के सारे - 7
हम अगर वीर यानी - 8
झूठे वैभव में चेतन - 8
तू ही चेतन चिदानंद - 8
जिनवाणी सुन भैया - 9
हमने देखा जहाँ - 9
माया मोह जाल का - 9
महावीर की वाणी - 9
जिनमंदिर के आगने - 10
भगवान मेरी नैया - 10
आओ जिन रे शरण - 10
लागी विचारन से - 11
देखा-देखा रे - 11
करुणा सागर - 11
मनदो नगरी त्यागो - 11
गाँव में फँसे इन्सान - 12

भजन - पृष्ठ सं.
मन जपले अहिंसा - 12
वीर वाणी के भजन - 12
सोते-सोते मैं निकल - 13
हे जन वंदन - 13
मैं तेरा पुजारी - 13
सुन रे चेतन - 14
दयावानों दया करो - 14
आओ झूले मेरे - 14
भक्तों का सहारा - 14
मैं ज्ञानमय का - 15
करले जिनवर का - 15
पार्थ प्रभु जी पार - 15
चेतन अविनाशी सोलों - 16
हमें तार दे - 16
एक ही झटके - 16
मैंने तेरे ही भरोसे - 17
मैं हूँ शिक्षा तेरी लाल - 17
समझो-समझो रे - 17
चिंता का ध्यान - 17
चिंता पैदा के - 18
वीतरागी छवि - 18
करले आत्म का - 18
विचारें सारे बाबा - 18
अरहत मंगल है - 19
मन में प्रभु पूजा - 19
मेरी अरज कहानी - 19
मन प्रभु की लगन - 19

रोम-रोम से निकले - 20
जन्म-जन्म तक - 20
चेतन सुख अपना - 20
निरखो अंग-अंग - 21
वृथा क्यों काहे को - 21
मेरा मन गावे - 21
मैंने प्रभु के चरण - 21
निस दिन प्रभु मेरे - 22
कितना प्यारा तेरा - 22
करलो इन्द्र ध्वज - 22
वीर प्रभु की जय - 22
मैं भैरव पाया रे - 23
गाड़ी खड़ी रे खड़ी - 23
हमारे पार्श्व जिनेश - 23
वीर भजले रे भैया - 24
आओ-आओ जी जैन - 24
म्हारो साँचो साँचो - 24
करो-करो रे प्रभु - 25
आजा मंदिर में रोक - 25
भव-भव के दुखड़े - 27
अहो बिहारी अद्भुत - 27
चुलिया मोरी ऐसी - 28
ओकारणी वाणी तेरी - 28
परदेशी प्यारे ! कौन - 28
जोति भक्ति बड़ी महान - 29
दुनियाँ में रहूँ चाहे - 29
जैन धर्म के हीरे मोती - 29
जिसको तू खोज रहा - 30
जीवन में शांति न - 30
सुख में मित्र महान - 30
शुभ कर्मों से पुण्य - 31
जितना देखूंगा बाहर - 31
दृष्टि हो बस अपने - 31
रे गाणी गा आ - 31

हे मनूष जन्म - 32
पिला प्यारे पर इतना - 32
कौन विधि कौन - 32
आओ भाई तुम्हें - 33
माया की परवाह न - 33
निज आत्म देव - 33
अपने घर को देख - 34
जैन धर्म है सबको - 34
मेरी परिणति में - 34
परम दिगम्बर मुनिवर - 35
माटी का घर छोड़ - 35
आया कहीं से कहीं है - 35
जरा सुनले ओ चेतन - 36
इन पिंजरे के अंदर - 36
आत्मज्ञान में लीन - 36
तू धरले दिगम्बर - 36
सम्यक् आत्मा के - 37
देखो देखो जी - 37
जय जयकार करो - 37
आनंद अपार है - 38
यदि भला किसी का - 38
मेरा मन गुलाम - 38
आप नहीं जाना - 39
पार कर भव सिन्धु - 39
भर-भर जाय शरीर - 39
तब जैन धर्म की - 40
दिगम्बर विष्णु अलोन - 40
जो जो देखी वीतराग - 40
जो चेतन निज की - 40
कहाँ-कहाँ तक भटक - 41
जन्म मरण का तोड़ - 41
एक लगन हो मेरे - 42
जनम-जनम तन धरले - 42
मंदिर में जी लगे - 42

हे ज्ञान स्वरूपी आत्म - 43
चेतन को मिला जब - 43
आत्म तत्व का करो - 43
कंकड़ पत्थर गले लगाये - 44
जल से गट्ठा रवि से - 44
हे वर ज्ञानी तू - 44
देखा जब अपने अंतर - 45
जो वीर नाम की - 45
दर्शन तेरा पाया है - 45
परिग्रह दोषों से - 46
रे धर्म को सारे - 46
जिस धर्म की रक्षा - 46
ये दुनियाँ सताये - 47
जिनवाणी को नम - 47
सुन चेतन प्यारे साथ - 47
बैठ अकेला दो घड़ी - 48
तुम कब तक घूमेंगे - 48
ज्ञानमयी चेतन हूँ - 49
आत्म की महान - 49
आत्म में आत्म में - 50
मेरा प्रभु सबसे - 50
तेरी शरण संकट - 51
हे मानव तुम को - 51
तेरा दो दिन का - 51
नित उठ शीश - 52
रे मन कर लो - 52
भव दिगम्बर धार - 52
बिन पूजे पढ़े न - 52
मन फेरा करते सोला - 53
चारों मुखों से दर्शन - 53
संतों से सुना है - 53
तू ओ आत्मा अकेला - 54
मन में सोच विचार - 54
पहिनो गले में - 55

हे स्वातन्त्र्य निष्णात - 55
धन्य धन्य चिन्मय - 55
आत्मज्ञान में - 56
मेरी परणति में - 56
निजगुण में आज - 56
कहाँ न ध्यान लगावे - 57
जब ज्ञान में लगावे - 57
कहाँ मोक्ष लगे प्रभु - 57
मंदिर हमारे में आ - 57
खाली पुद्गल पड़ा - 57
वीर नाम सुखदाई - 58
प्रभु रत्न में हूँ - 58
जिन मंदिर में धर्म - 58
तुम सुनो श्री महावीर - 58
कंद प्रभु भगवान - 58
मोक्ष परम पद - 59
तेरे दर्शन से - 59
त्रिशला के नन्द - 59
कैसे कहूँ गुणगान - 59
प्रभु नाम जपले - 60
जय जय जय जिन - 60
महावीर की वाणी - 60
मेरे मन मंदिर में - 60
पारस नाम पारस - 61
म्हारो अंगना में आये - 61
पार लगा पार लगा - 61
घूम रे दुनिया अपनी - 61
चाल चला मारला - 62
शिवपुर की पहाड़ी - 62
मोह की महिमा - 62
भूला है स्वयं आत्म - 63
मेरा जपो नवकार - 63
अहो अराध्य देव - 63
मोहे भावे न भैया - 64

महावीर नगर में - 64
जोती जाये उमरिया - 64
जिनवाणी मा - 64
नाम प्रभु का बोले - 65
होली खेले मुनिराज - 65
वीर गये निर्वाण - 65
मेरी जय जय तो - 66
ये शाश्वत सुख का - 66
मढ़ी रे मन श्री - 66
शुद्धात्म शुद्धात्म - 67
ये रतन पाया मुझे - 67
अपना ही रंग मोह - 67
रंग मां रंग मां - 67
आओ शिव जिनवर - 67
मां जिनवाणी झांक - 68
अनुभव निज ज्ञान - 68
सुन रे जिया - 68
श्रामक प्रभु को - 68
जिनवर तू है चंदा - 69
हुआ इन्द्रध्वज का - 69
वरदान तुमको प्रभु - 69
मनुष्य जन्म को - 69
मेरे अंगना आओ - 70
साँची कहूँ, होरे - 70
पुजारी ! हृदय के - 70
रंग भराई ले ले - 70
मुझ दुखिया की - 71
महावीरजी झूले पलना - 71
जिन पूजन करले - 71
करले आत्म ज्ञान - 71
मा रे भैया या - 72
वीर प्रभु का है - 72
होम-होय के - 72
निज घर में अब - 72

जैन मंदिर हमको - 73
छोटा सा मंदिर - 73
प्रेमसुखी मैंने अलमुन - 73
सुहागिनी मेरी को - 73
हँसा हुआ क्यों - 74
मैं आया रे - 74
जिनवर भक्ति - 74
जय हे प्रभु का - 75
मेरी परिणति में - 75
बोलो चेतन निज - 75
राही राम नाम - 76
हमने तो सुनी चार - 76
लय राग - 76
मोरे दर्शन से भगवान - 76
हरि-हरि पल-पल - 76
महावीर मंत्र भजा - 77
मंत्र जपो नवकार - 77
जब चले आत्मराम - 77
मुनिवर आज मेरी - 77
निम जिन धरे रे - 78
मंदिर में आईंगा - 78
जिनवर की होरे - 78
मेरे चार दिशा - 78
सोला आत्मा में - 79
जिनवाणी सुनलो - 79
झूठ बोलो पाप - 79
पावन तेरा प्रभु - 79
हम सब कुछ अपना - 80
यह धर्म है आत्म - 80
आप न होते-ज्ञान - 80
स्वाध्याय करो - 81
आवरण गुणसारा - 81
महावीर प्रभु मेरी - 81
यह तन जावे तो - 81

हे परम दिगम्बर - 82
पुद्गल सदा देखते - 82
एक प्रेम पुजारी - 82
महावीर प्रभु के - 82
मिलता है सच्चा - 83
अब गलियों में - 83
बल बिना छोड़ पर - 83
हे वीर तुम्हारे प्यारे - 83
चेतो-चेतो भाई - 84
क्यों न ध्यान - 84
चंदनपुर के - 84
धन मुनीश्वर - 85
तन नहीं छूटा - 85
संत साधु बन - 86
जाना नहीं निज - 86
सुन-सुन भैया - 87
जब तेरी डोली - 87
वीतराग भगवान - 87
हे प्रभु ! चरणों में - 88
आत्म आत्मा में - 88
चन्द क्षण जीवन - 88
कैसे-कैसे रंग - 89
कब हम यहाँ - 89
बार-बार तोहे शीश - 89
झूम-झूम के प्रभु - 90
जिनमंदिर-जिनमंदिर - 90
मेरी दर पर आते - 90
जीवन के किसी - 91
'सुनलो महावीर की - 91
तुम राग-द्वेष से - 91
दर्शन को आया - 92
हे वीर रतन के - 92
जीवों का जिसके - 92
तू, जाम रे चेतन - 93

आओ जिन मंदिर - 94
मुनिराज भगवान - 94
मन पर काबू कर - 95
जीव तू अपना जगा - 95
घट-घट जिन - 96
मैं तो आरती - 96
तुम जपो मंत्र - 96
तुम तो प्रभु - 97
छोड़ो पर की - 97
आत्म हूँ, आत्म - 98
हम नाथ प्रभु में - 98
तुम ही मेरे भगवान - 98
प्रभु दर्शन कर आज - 99
हे प्रभु वीर का आसरा - 99
जलनियों का उत्सव - 99
सुखद शाम जिनको - 99
अमन लागी भगवान - 100
लगाओ प्रभु से - 100
वीर प्रभु गा - 100
मन में ये सोच - 100
गोपाल पर्वत का - 101
भावले पारस अति - 101
मैं महापुण्य उपजे - 101
बड़े भाग्य से - 102
मैं हूँ, पूर्ण ज्ञायक - 102
विशाल के भवन - 102
इन्ही कर्मों ने हरी - 102
अरे दुनिया वालों - 103
आत्म का जप - 103
दिन रात स्वामी - 103
करना मन ध्यान - 104
प्रभु प्रभु अवतार - 104
पारस की जय - 104
आनंद भरत बहु - 105

भक्ति-लहर

ॐ मेरा निश्चय ॐ

नरजन्म मिला है मैं अर्हत् कार्य करूँगा
पाया जिन शासन अब भव का अभाव करूँगा


है मेरा निश्चय है सम्यक् निश्चय…
मिथ्यात्व वश अनादि काल से ही भूल रहा
गति-गति में खाते ठोकरें मैं अब तो थक गया


जिन दर्शन से निज दर्शन मैं मोह तजूँगा…
इन्द्रिय सुखों की कामना अब है नहीं मन में
उपसर्ग की परवाह नहीं जाकर रहूँ वन में


निर्द्वन्द्व हूँ, रत्नत्रय से निर्द्वन्द्व रहूँगा…
नव रवि रहित भगवान अगर माहि दिखावा
भगवान होने का सहज विश्वास जगाया


निज के आनंद में ही निज से तृप्त रहूँगा…
देहादि से अति भिन्न हूँ न्यारा चिन्मय से
एकाकी शुद्ध निर्मम हूँ ज्ञायक स्वभाव से


स्वधीन निर्णय एकाकी अति पूर्ण रहूँगा…
चैतन्य की अदम्य शोभा ही भाई है मुझे
आत्म विभूति सिद्ध सम सुहाई है मुझे


झूठे प्रपंचों में फंसकर दुख अब ना सहूँगा…
रे कर्म अपने रात तू दिखाता है किसे
प्रतिफूलताओं का भी भय दिखाता है किसे


निश्चय ज्ञाता ज्ञेय हूँ, ज्ञाता ही रहूँगा…


भक्ति-लहर

जिनको अनन्त बार भोग-भोग कर छोड़ा
है वे ही भोग नहीं नवीन वित्त है भाड़ा


अज्ञान वश उद्दिष्ट भोगी अब ना बनूँगा…
निज के लिए निज में ही नव सुख अतीन्द्रिय
भोगूँगा अनन्तकाल मैं बनूँगा जिनेन्द्रिय


है द्वार मुक्ति का मिला भय मैं न रुकूँगा…
दुःख के पहाड़ बाह्य को प्रवृत्ति मार्ग में
आनंद की हिलोरें हैं निवृत्ति मार्ग में


उल्लास से निवृत्ति के मार्ग में बढूँगा…
इस मार्ग में कुछ पाप तो होते ही नहीं है
रे पूर्व जन्म भी सहज जिससे ही सही है


कैसे कहूँ फिर दुःख की कल्पना भी करूँगा…
निश्चय कहे वे ही जिन्हें कुछ ज्ञान नहीं है
अनुमोदना करते जिन्हें निज ज्ञान सही है


कुछ हर्ष या विषाद मैं मन में न धरूँगा…
अवस्था परिणमन है सही द्रव्य का सदा
योगा सहाय की नहीं मन में ही मैं कदा


स्थिरता निजसभ्य से ही शिव पद भी लहूँगा…
स्वभाव से निर्मुक्त हूँ, स्वीकार है हुआ
स्वभाव के सन्मुख सहज पुरुषार्थ है हुआ


ध्याई सहज शुद्धातमा सम दृष्टि रहूँगा…
भविष्य वती काल लब्धि आई है अहो
निश्चित भी मिले मिलेंगे सौख्य है अहो


हर हाल में आत्ममय मैं स्थिर ही रहूँगा…
विघ्नों के भय से मूढ़ हो निज लक्ष्य नहीं भजते
विघ्नों के आने पर भी मार्ग नहीं तजते


निश्चित निराकुल हुआ निज साध्य लहूँगा…


भक्ति-लहर

सब जीवों के प्रति मेरे सहज क्षमा भाव है
करना क्षमा मुझको क्षमा आत्म स्वभाव है


त्याग है मोह-राग मैं न जजूँगा…
पाया है ऐसा मार्ग जिसके बाद मार्ग ना
पाऊँगा ऐसा सुख जिसके बाद दुःख ना


तिरछा न हो अभाव यह प्रमुख लहूँगा…
पाया स्वरूप झूठे स्वांग अब नहीं धरूँगा
चैतन्य महत्व है मिला भय नहीं भरूँगा


दरिद फिर जिसने न हो वैभव वह लहूँगा…
सरागों का मैंने चरण कीना अनंत बार
नियोग के दुःख में जले टूटे सदा पहाड़


निश्चय क्रिया आरण्य ध्रुव स्वभाव वरूँगा…
तज करूँ मोह देखो यह आनंद मय मार्ग
निशंक हो जानी सभी आनंद मय मार्ग


आनंदमय जिन मार्ग का प्रभाव करूँगा…
इस मार्ग से ही पाया है भगवन्त ने नव अन्न
इस मार्ग से विचरें अभी भी ज्ञानी साधु सन्त


उनका ही करना अनुसरण निजगुणमय करूँगा…
सिता नहीं दिग्भावों की नसोंगे ये स्वयं
निर्द्वन्द्व हो निज भाव में ही रमण सहज शिक्षक


होता हुआ शिव होमा सहज ज्ञाता रहूँगा…
श्वेत बाल पं. ब्र. श्री रतीक कुमार जी जैन

इस पाठ का प्रतिदिन स्मरण करें एवं दिगम्बर खण्ड के साथ पढ़ा जा सकता है।


रोक उसी का कीजिए जो अनहोनी होय
अनहोनी होती जहाँ होनी है सो होय


भक्ति-लहर

विज्ञान

समान सवैया

उपजाति

तर्ज - तुम्हें छोड़कर कहाँ…

दिल

सोलासिंग सिद्धक्षेत्र में जागा
भगवान चन्द्र प्रभु के दर्शन में कर अपना जीवन सफल मैं बनाऊँगा…
त्याग की मूरत है मेरे प्रभुवर, ज्ञान की गंगा ये तो बहाये
देखके प्रभु की शांति मुद्रा, भक्तों के मन में भाव जगाये
मोह न माया जपे, पाप न कोई करे
अपने में अपने को पा काहे है सारे भरम…
टैक
वापस परिग्रह को जीता है, तत्वों का लेकर के अवलोकन
लोक शिरोमणि आप है प्रभुवर, करता हूँ तुमको शतशत नमन
जाना न मैंने शरण पाके है कितने भरम
राह बताओं मुझे कहूँगा अपने करम…
टैक

तर्ज - दब दवाओं से ये दिल घबराये…

मोह माया से ये मन घबराये, कोई दुर्गति में न मार खाये
इतनी दुःख है इन दुर्गति में, फिर हर दम कर हाय-हाय…
टैक
मोह माया के कारण ही जब तक संसार में दुःख पाये
इतनी ही कीनी दुर्गति है सबकी भव-भव में सबको भगाये हुए
छोड़ दे मोह माया का चक्कर, फिर न भव में फिर दुःख उठाये…
टैक
तीर्थंकरों ने त्यागी थी इसको पूर्ण सुखी वो निज में हुए
निज का ही निज में आश्रय ले लेकर पूर्ण स्वयं स्वाधीन हुए
त्याग अनुभव तू ये मोह माया, निज आत्म को तू पा जाये…
टैक

तर्ज - पाप कहते हैं…

कयामत से कयामत तक

ज्ञान करते ही जीव ज्ञान करेगा, जीव सदा केवल ज्ञान करेगा
मरण ये तो कोई न जाने कि कब मुक्तिफल है कहाँ…
टैक
मेरा जो आत्म गुण सरिद्धी उस की भी शांति है अपार
सम्यक्त्व चारित्र गुणों का गुलशन, मुरझन में ध्रुव की खुशबू अपार
कहाँ बुद्धि का सर्व नाश करेगा, ज्ञान ही ज्ञान वश ज्ञान करेगा
मरण ये तो…


भक्ति-लहर

तर्ज - जुदाई देती है दिल…

गुलामी

तुम्हारी मूरत ये हमने देखा, रंज की समता रात के ही रही है
तुम्हारे अंतर की रीतियाँ से अनंत सृष्टि सुफलक रही है…
टैक
हजारों भानुओं की प्रभा भी समता से मस्तक झुका रही है
तुम्हें विलोकन को इन्द्र तरसे, नव निधियां छटपटा रही है…
टैक
अनंत गरिमा है उनकी इनसे मिले नहीं जग में कोई ऐसा
पुण्य-पाप का ना होवे छाँटा, दिव्य घनी यह समता रही है…
टैक
लाख चौरासी में आना जाना, नहीं मिली एक समय भी फुरसत
अमर पद पायेंगे हम तो गजब दामिनी सबको रही है…
टैक

तर्ज - तेरे पाँच हुए कल्याण प्रभू…

तेरे पाँच हुए कल्याण प्रभू-2 इक बार मेरा कल्याण कर दे
आचार्य, उपाध्याय, मुनि दूर मेरे अज्ञान कर दे…
टैक
गर्भ समय में ज्ञान जो हरसे, उनमें से एक रतन नहीं चाहे
जन्म समय क्षीरोदधि जल से इन्द्रों ने किया वो नमन नहीं चाहे
जो चित्त की निर्मल शांति करे, वही गणधरक मूल दान कर दे…
टैक
चार शिरमुरूप देश किया तप, तप कर विषय विकारों को त्यागा
निर्ग्रन्थों को जय-जय बनाकर, निज आत्म का ध्यान लगाया
अपने लिए बरसों ध्यान किया, मेरी ओर भी थोड़ा सा ध्यान कर ले…
टैक

ॐ शिवरवणी ॐ

तर्ज - मौसम का बहाना है

चमनार

वैरागी बनना है जरा देर लगेगी
मद मोह छुड़ाना है जरा देर लगेगी…
टैक
इन्द्रिय सुखों में दिन रात निकलती है
संयम ही-संयम ही सजाना है जरा देर लगेगी…
टैक
हर वक्त सुखों पर वीर… तेरा नाम रहे चाहे
तेरे संग-मेरे संग रंग जाना है जरा देर लगेगी…
टैक
महावीर के ही पद पे… अनुभव चाहे भावना
मुक्ति को-मुक्ति को पाना है जरा देर लगेगी…
टैक

भजन-लहर

मालिनी

तर्ज - दीदी तेरा देवर दीवाना
जिन्होंने पानी न छाना, मन रे रातों को खाये खाना … टेक
तिरस ऐसा तेरो, जिसे न निगले
तो पोरसी गति में चक्कर लगावे।
या है नग्न मनुष्य सुहाना, मन रे रातों को खाये खाना … टेक
ये नग्न भया है उत्तम कुल पावा
पर भोग विद्या में ही सब ही गँवाया
बीता जाये अवसर सुहाना, मन रे रातों को खाये खाना … टेक
तर्ज - देखना है पहली बार
आज
आधा है जबकि चार तत्वों का इतना विचार
अब भी खाली नहीं है। तब क्या है अपार
शुद्धातम से मिलने को दृष्टि गई अबके बार … अब भी खाली … टेक
पहले हटके मुझे तुम में गतिक
अब बिन मेरे मैं तो कुछ सोच न पाऊँ
ये मेरा नगर है ये मिला अवसर है
ये मेरी आत्मा ये ही मेरा अम्बर है … टेक
मेरी सत्य है ये अद्भुत निशानी,
अनादि निधन है ये मेरी कहानी
ये मेरा भवन है ये मेरा ठिकाना,
अब गई अज्ञानत तजे परका सहारा … टेक
तर्ज - तब ये वे आवा
बेला मजूब
प्रभु दर पै आया हूँ प्रभु दर्शन पाऊँगा
प्रभु दर्शन से ही मैं प्रभु का बन जाऊँगा … टेक
वो सबको दाता है, मेरे भाग्य विधाता है
तू सच्ची प्रीत लगा, मन वांछित फल को पा … टेक
प्रभु के दर्शन से ही निज दर्शन होते है
प्रभुवर की वाणी सब भव से फिर जाईंगा … टेक

भजन-लहर

कव्वाली दोहा

सुशीली मणपुष्पाचार्य-चरित्र

विजया

तर्ज - दोनों सड़के दुश्वार
पैदल चलके राजुल तपस्या करी, कैसी हरदम से नेमी की रही … टेक
दिन न माने अगर आज जागा भी है, अपने नेमी से पावन निभाना भी है
सामने एक जिंदगी है मगर, पीछे मुड़कर हुआ एक जमाना भी है … टेक
छोड़ के तुम तो मुझको चले ही पिया, और कौन बंधायेगा मेरा जिया
किस जन्म का बदला ये मुझसे लिया -2
न तो कसरी रही न सुहागिन बनी, नेमी मेरा ही बीच भंवर में पड़ी
नाथ तुम छोड़ के जा रहे हो अभी -2 … टेक
तुम जाते हो मैं क्या करूँगी यहाँ, तुम्हें संग में भव से तरुँगी नहीं
साथ ही साथ में मुक्ति पाऊँगी हा -2 … टेक
तर्ज - कोई जब तुम्हारा हृदय
पूर्वजन्म
तू दुनिया के सारे विषय छोड़ दे, जिन पन्थ से नेह तू जोड़ दे
जरा सोचले कुछ ता अपने लिए
ये भरत मिला है मिला न रहेगा सदा के लिए … टेक
ये दुनिया है मेला यहाँ पर तुझे रही खिलोने तो मिल जायेंगे
मगर सोच रही खिलोने ही ये कब तेरे मन को बहलायेंगे
गौतम का गुणगान जाने लगे, बुढ़ापे का पतझड़ जब आने लगे
जवानी न तब साधना के लिये
ये जीवन मिला है मिला न रहेगा सदा के लिए … टेक
मुक्तिपथ सभी एक अगर के यहां ढूँढ़ मेरे सब ही बिछुड़ जायेंगे
मिलेगा सफर का न समा कोई तो पकड़ लिये पर ही पछतायेंगे
विद्या की घड़ी जानी आने लगे, अपने भी दामन बचाने लगे
कोई भये भान न कोई लिये
ये वचन मिले है मिले न रहेंगे सदा के लिए … टेक
ऐसी लागी लगन सब हो गए मगन, जब पड़े-पड़े प्रभु गुणगाने लगे।
प्रभु के दर्शन बिना कुछ ये हुई दूर, हम प्रभु के ही भक्त कहाने लगे।।

भजन-लहर

तर्ज - तुम जबर श्रद्धा करे का
हम अगर वीर वाणी पर श्रद्धा करें, ज्ञान के दीप जलते चले जायेंगे
गर जले ज्ञान के दीप हृदय में तो, मार्ग संयम के खुलते चले जायेंगे … टेक
हमने पाया है गुरुदेव से यह नर का तन, देव तरसे जिसे ऐसा पावन रतन
गर हमने विषयों में ही खो दिया भूल पर अपनी खुद हम पछतायेंगे … टेक
अब मिला है ये जिनवाणी जिनवर शब्द, जिनवाणी मिली और ये अमृत वचन
मोह ममता से थोड़ा भी हम हटे, मार्ग कल्याण के खुद ही खुल जायेंगे … टेक
जब नहीं सच्ची श्रद्धा तो क्या अर्थ है, इस बिना ज्ञान और आचरण व्यर्थ है
हम पुजारी बने वीतरागी के तो, कर्म क्षीण भी कटते चले जायेंगे … टेक
हम पालें अपनी ये जिनधर्म को, सच्ची श्रद्धा हृदय से श्री धर्म को
अब रखना अनुभव श्रद्धा गुरु, जब उस के ये सारे कट जायेंगे … टेक
तर्ज - झूठे वैभव में चेतव भले
झूठे वैभव में चेतना मत रहो, संग में मेरे कुछ भी नहीं जायेगा … टेक
कितनी जन्मों में तुमने सहा दुख मगर, सच्चा सुख है कहा अब तक जाना नहीं
पर को अपना समझ तुम अब क्यों, कौन हूँ मैं यह तूने जाना नहीं
अब भी जिनधर्म पर तू श्रद्धा करे,
खुद के ईश्वर को कब दिन तू पा जाएगा … टेक
महिमा जिन धर्म की कुछ जाने न तू, अग्नि जल से गई सीता के ध्यान से
भूल गया दश बन्धु अपूछ लगा तबक, धन्य मनराज तेरे धर्म ध्यान से
करले श्रद्धा तू चेतना निज धर्म पर
मुक्ति पथ को एक दिन तू पा जाएगा … टेक
तर्ज - तूही चेतन चितवनद विछू है
पूही चेतन शिवानन्द विछू है चित्त में न समाये तो मैं क्या करूँ
ज्ञान गुण से भरा मेरा स्वरूप है, कब समझ में न आये तो मैं क्या करूँ … टेक
शास्त्र पाठ किया पूजा जाप किया, मन में न ही अहंकार छोड़ा नहीं
मरकर मैं न कर पाऊँगा कबतर का तन, अपना सिर कटाये तो मैं क्या करूँ … टेक
झूठ चोरी कुशील व हिंसा बुरी, आत्मा का नाश करने की मैंने बुरी
समझने में न समझे अगर अब भी तू, मत कराये न खाये तो मैं क्या करूँ … टेक
मंदिर आओ भैया, पूजन करो भैया -2
पारे पाप मरो, तुमसे पुण्य मिले -2 … टेक

भजन-लहर

तर्ज - नैया भरता भैया
जिनवाणी सुन भैया, जिनवाणी सुन भैया
तेरे सब कर्म कटे, तुझे सद्ज्ञान मिले … टेक
ज्ञान की रोशनी जिससे दिल में खिली, उसको मिथ्यात्व का सब अंधेरा गया
वीतरागी को सब तीर्थंकरों नेमी, बस सम्यक्त्व कि भव-भव का फेरा गया … टेक
तर्ज - हमने देखा जहाँ
शेर - नहीं मंजिल है पर तोखे छोड़ दे और आगे जादव तो चले भी चल छोड़ दे है
मोहब्बत कितनी करना है मत पूछो मेरे बड़े नटों तो अपने भी मैं नाता तोड़ दे है
हमने देखा जहाँ कुछ न पाया यहाँ, कहिया टूटी तो सब चमन से रहा
जिन्दगी को जियो बन्दगी के लिए, पाया नवरत्न तो सपनों में क्यों खो रहा … टेक
आदमी का बस ये जवानी पर चले, चाहे सागर से गहरी उसे खोजले
शेर - कहीं से चाँद सितारों में नजर आता है, कहीं से चाँद बाजारों में नजर आता है
यही दो आदमी सपनों में खोये रहते है, बाहर इनका भीतर में खोया रहता है
आईने में स्वयं को स्वयं देखले, आईना दूसरों का तू क्यों धो रहा … टेक
मौत आई तो जीवन का अवाज है, जिन्दगी है तो तुझको खबर ही नहीं
शेर - मौत ने जिन्दगी को घेरा है, मौत जीवन का अब देख है
मौत से डर हो तो हल्का हो क्यों, जिन्दगी का हर पल खतरा हो
गीत मुरादल ही है आत्मा की नहीं, दीप मन में जलकर बाहर क्यों रो रहा … टेक
तर्ज - मेरे मेरे बीच में
माया मोह जाल अब कैसा है ये बंधन अजाना
मुझे नहीं जाना तुझे नहीं जाना … टेक
एक तुम मुझे पूजा रोज देते आये, इसकी माया से कोई बचने न पाये
ऐसे जैसे कोई ओ… ऐसे जैसे कोई कुछ जाना … टेक
कितनी ही दुनिया कुछ भी न पा पाया, आखिर प्रभु तेरे द्वारे ही आया
खुद सा ही जो… खुद सा ही हमको बनाना … टेक
तर्ज - कब हमें यह दिखा जाबो तब
महावीर की वाणी सुनो साथियों, सुख क्या है सभी जान लो साथियों … टेक
हिंसा करते चले जा रहे है सभी, अहिंसा को समझने को पूछते नहीं
आत्म कल्याण की बात समझो नहीं, इसको समझा बिना मुक्ति मिलती नहीं
है बहुत ही कठिन नर भव साथियों … टेक
पार लो अहिंसा व्रत को तुम अभी, वीर उपदेश दिल से भुलाओ नहीं
मनोकार बिना शान्ति मिलती नहीं, जिनवाणी को दिल से भुलाना नहीं
आज दो वचन ये सभी साथियों … टेक

भजन-लहर

दोहा

तर्ज - अम्बरे से मोरिया
जिनमंदिर के आगने बुलाते मेरा मैं तो दर्शन करने आऊँगा
दर्शन करने आऊँगा मैं तो दर्शन करने आऊँगा … टेक
जिनमंदिर के बीचों बीच मन को लाभ है
मन को लाभ या मैं चतुर्दशी तेरो बिना है
जिन में ज्योति है जाति में सबके वीर … टेक
भैया आये महिला आये मैं कहाँ रह जाऊँगा
जन्म जन्म के पाप कटेंगे, अंतत ज्योति जलाऊँगा
दर्शन करके मेरी मिटे सारी पीर … टेक
तर्ज - बेवफा की मुहब्बत का
भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना
अब तक तो निभाया है आगे भी निभा देना
सबके है झंझटों में, मैं तुमको भूल जाऊँ
पर नाथ कहीं तुम भी मुझको न भुला देना … टेक
मैं भटक रहा हूँ ये कर्मों के चक्करों में
प्रभु देखी न रहना तुम आके बचा लेना
हर दर का पुजारी मैं आज बनके तेरा
महावीर फांसी मेरा चरणों में जगह देना … टेक
तर्ज - आयो आयो रे
आओ आओ री शरण महावीर, पार करो मेरी नैया … टेक
पाप भरी है मेरी नैया भगवान खेवा खाये
राम की बल्ली टूट गई है खेवट नजर में आए
नैया वह हसी है हमारी भव तीर … टेक
माया आर ममता की सबने निमदिन देह हिलाये
आशा तृष्णा मोहि फांसी है निराशा नहीं किनारा
विश्व रही रे भूमि के तीर … टेक
केसरिया चावल संग थाली-2 शीतल मंडल बिछाए श्री गुरु सब साधे,
केसरिया चावल शंखवाये … टेक

भजन-लहर

तर्ज - लागी जिनवर ने बजरिया
लागी जिनवर ने बजरिया कैसी सुघड़ी
कैसी सुघड़ी स्वामी कैसी सुघड़ी … टेक
तेरी नित दर्शन करने से पाप होय सब दूर
स्वर्ग सम्पदा जिन से मिलती कर्म होय चकचूर
मिट जाय बहुभूति की मनिया, कैसी सुघड़ी … टेक
बहुत दिनों से भटकत-भटकत दर्शन पाये तेरे
सकल मनरथ सफल भये है, जन्म भाग्य भये मेरे
निकल नेमी से सवरिया, कैसी सुघड़ी … टेक
तर्ज - देखा-देखा रे चितवनद रूप
देखा-देखा रे चितवनद रूप, सहज सुख पायो है
भागो-भागो रे मोहमायिक भाव, कर्म गत्याओं है … टेक
दोनों का अस्तित्व न किंचित, अनन्त गुणों का सागर
सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र रत्नों का जो रत्नाकर
पाओ-पाओ रे प्रभु निज धाम, हृदय उमगाओ है … टेक
नहीं बरसता घटता बढ़ता शाश्वत आत्म राम
पर्याये प्रतिसमय बदलती फिर भी ध्रुव अविराम
पर से भिन्न पूर्ण निजभाव, शरण में पायो है … टेक
तर्ज - ऐ मेरे बिनो बावरा
करुणा सागर भगवान मोहे पार लगा देना
तुम ही बहुत मेरी नाव भव बचा लेना … टेक
मोही बनकर मैंने अब तक जीवन खोया
अपने ही हाथों से कांटों का बोध बोया
अब शरण तेरी आया मोहे पार लगा देना … टेक
वीर तेरी भक्ति से सब दुख मिट जाते है
अज्ञान तिमिर मिटता, सुख का फल पाते है
अब द्वार खड़ा तेरे चरणों में जगह देना … टेक
तर्ज - मनडो मजारो लाखो
मनडो मजारो लाखो प्रभु दर्शन में, दर्शन में निज दर्शन में … टेक
वीतराग देव प्रभु की नियमान निमनाके
भेदज्ञान की ज्योति जलाकर आत्म गुण प्रगटाके
शुद्धातम को पायो रे भव गुरु में … टेक

भक्ति-लहर

तर्ज - माया में फँसे दलाल

माया में फँसे दलाल, विषयों में न बह जाना —
विषय चेतना तिमि को भूल न पछताना —
तन धन वैभव परिजन तेरे काम न आयेंगे —
सत्संग सभी सवार तेरे साथ न जायेंगे
तू अगर अगर छूट है यह सब माया लाना —
विषय सत्वन त्यागी तू ज्ञान दिवाकर है —
है सहज शुद्ध भगवान तू सुख का सागर है
अपने को जब पहचान विषयों में न खो जाना —
लख चौरासी अपने दुर्लभ मानव पाया —
जिनमुनि जिनवर शरण पुण्यदेव से पाया
आतम अनुभूति बिना रह जाये न पछताना —

तर्ज - जब जयते अविदित

मन अपने अहिंसा, महावीर तेरा प्यारा नाम है
महावीर तेरा प्यारा नाम है, अभीरा तेरा प्यारा नाम है —
कुन्दकुन्द में जन्म लियो, जग में छाया उजियारा -
कोका नाम था जिसने माँ ने, पहली बार पुकारा —
काला नाग दंश बन आया, वह जिसको छाँया -
फूँक दिया उसे काले नाग को वीर वीर कहाया
निर्भय हाथी मौन सम्हाले जनम शोर मचावे -
वीर प्रभु ने पकडा हाथी अधीर कहाये —
ज्ञानी ने ज्ञान को देखा बोध ज्ञान की गुणी -
अनुभव मूर्तियों ने रखा तब ज्ञान सम्मति हनी —
सारे कर्म नष्ट प्रभु कीन पाया मोक्ष महल है -
मंगल दीपावली के दिन सब महावीर गुण गाए —

तर्ज - वीर स्वामी के भवन में

वीर स्वामी के भवन में देखो जय जय जय
जय जय जय -२ हो भवन में जय जय जय —
चाँदपुर तक छम से टिके नहीं लगा गंभीर
टीले से प्रगटे प्रभु जब गेह का द्वारा गंभीर —
टीला देखन जब गये बहुत टीले तीर
गाते ने जब टीला खोदा निकले सम्मति वीर —
मैना गुजर देखन आये, शोभा कही न जाय —
धन्य धन्य हो प्रभु की महिमा, महिमा कही न जाय —

तर्ज - सोते-सोते में बिखर

सोते-सोते में निकल गयी सारी जिन्दगी
सारी जिन्दगी तेरी प्यारी जिन्दगी,
धोखा होने में निकल गई सारी जिन्दगी —
जन्म लेते ही इस धरती पर तूने स्थान बनाया
आले में तू खेलने पाया, भूख भूख चिल्लाया
सोते-सोते में निकल गयी सारी जिन्दगी —
खेल कूद में मगन बीता यौवन पा यौवन
धर्म कर्म का नाम न जाना विषय भोग लिपटाया
भोगो-भोगो में निकल गई सारी जिन्दगी —
धीरे धीरे बढ़ा बुढ़ापा कमजोर होते गया
सबकी सेवा मैंने न देखी सब दुख जमाया
रोगो रोगो में निकल गई सारी जिन्दगी —
तिलको तू अपना समझा, था वह देह ही धोखा
प्राण गये फिर जल जायेगा ये माटी का खोखा
खोखा होने में निकल गई सारी जिन्दगी —

तर्ज - दिल दीवाना

मैंनें प्यार किया

है ज्ञान वन्दन त्रिशला नन्दन धर्मा देना
तेरे द्वार खड़े प्रभु विनती सुन लेना —
कोई अपनी छत्र नारियल कोई ध्यान लगाये
करे आरती पूजा तेरी ज्ञान की ज्योति जलाये
दर पे खड़े है दर्शन दिखा दे सुन लेना —
सेठ पुरूषोत्तम को सूली से बचा लिया था तुमने
श्रीपाल को देखो स्वामी पार किया था तुमने
भक्तो की नैया भव से पार लगा देना —

तर्ज - होठो से फूलों तुम

मैं तेरा पुजारी हूँ भक्ति का मुझे वर दो
ख्याती है मेरी झोली प्रभु आज इसे भर दो —
श्रद्धा के सुमन स्वामी चरणों में तेरे अर्पण
सेवा में तेरी बीते ये मेरा तन मन व धन
असीमित सुख देवर जीवन को सफल कर दो —
चरणो का दास तेरा कभी हार न छोड़ेगा
भक्ति से कभी स्वामी मुंह को नहीं मोड़ेगा
हर गीत नया देकर मुझे रोज नया स्वर दो —

भक्ति-लहर

तर्ज - शायद मेरी शादी का

सुन रे मोहन इन्द्रिय सुख में तू न खो जाना
इन्द्रियाँ पापी गतियों में दुख ही दुख पाया —
ठीक तुम आत्मा में लीन हो जाना
पुण्य और पाप छोड़ शुद्ध हो जाना
आत्मा मेरी आत्मा शुद्ध शुद्ध मेरा लेना
परमाट मैंने आत्मा शुद्ध शुद्ध ही पाया है —
अनुभव चिन्तामणि रत्न अनुभव है मेरा रूप
अनुभव मेरा मोक्ष का अनुभव मेरा स्वरूप
आत्मा मेरी आत्मा जब अनुभव कर लेना
पुण्य-पाप को अपना माना दुख ही पाया है —

तर्ज - दशलाक्षण त्योहारों का

दशलाक्षण त्योहारों का यह शुभ दिन आया है
इन्द्रिय मंदिर जी में यह पाप खाया है —
शुभ कर्मों का पुण्य उदय जीवन में आया है —
तीन गुण धर्म के हर जगह गाना
नाम कर्म का प्रभु का कर्मों न शरमाना
लख चौरासी भोग के हमने नग्न पाया है —

तर्ज - आओ झूमे मेरे

वेव

आओ झूमे मेरे चेतन, आतम मगन में
आतम मगन में चेतन आतम मगन में —
काहे का यहाँ इस खण्ड है, काहे झूमे परै वामे
सम्यग्दर्शन इस खण्ड है ज्ञान के झूले झूले —
काहे की वामे पट्टी पड़ी है कौन झुलावे यहाँ झूलना
घड़िया की वामे पट्टी पड़ी है अनुभव झुलावे यहाँ झूलना —

तर्ज - तेरे नैनों की बंका का

भक्तों का सहारा, महावीर नाम प्यारा, तू बोल मुख से बोल
आये जाय रे चली —
विषय भोग खेलवार में बीत दिन गमादी में
विषय भोग में बीत रहा तू मजे मस्त जवानी में
खोये रत्न अमोल आयु जाय रे चली —
जाना हो परलोक तुझे जब कुछ तो धर्म कमाले तू
काल खण्ड बिचला हो सर पर क्यों न होश सम्हाले तू
अब तो अखिया खोल आयु जाय रे चली -२

भक्ति-लहर

तर्ज - हाव हाव हे मजबूर

मैं आनन्द का दरिया हूँ अनन्त गुणों से भरिया
है स्वभाव में इतनी विभूति
तीन काल के अनन्त समय में कभी-कभी नहीं होती —
मैं एक शुद्ध पूँजीसड़क रस पर से भिन्न निराला
तीन लोक में सबसे उत्तम गुण मुनियों की माला
शुद्ध रूप मेरा हो भाई अपने कोई न होती —
गुणों का गोदाम है मैंनें शक्ति का संग्रहालय
सुख शांति का समुद्र झलक शिवचन्द्र शैलालय
सिद्ध समान सदा पर मेरे सामने दृष्टि होती —

तर्ज - लाडी लावे न लजवा

करले जिनवर का गुण गान देखो आई शुभ घड़ी —
वैराग्य संवाद के कारण शीश नवाव
जन्म जन्म के जो कर्म सहे तू नष्ट कराए —
कई जीवों को आपने तार दिया जिनराज
मेरी और निहार लो सुअर जाय सब काज —

तर्ज - जो मोकू महावीर की

ओ मोकू महावीर की यात्रा करवादे सांवरिया
करवादे सांवरिया ओ करवादे सांवरिया —
चाँदपुर एक शुभ ग्राम है निकट नदी गंभीर
इक टीले पर साधु को निज प्रगट का क्षीर —
झरती देखी गाय तब टीलो खोदो घाल —
मूसा को दर्शन अभी जब मूरत ऐसी निकाल —

तर्ज - जनवरी बनके आये

पार्श्व प्रभु जी पार करो दो मेरी ये नावरिया
वीच भंवर में आज फँसी है काटो जी सांवरिया —
धर्म मार्ग बहुत ही पूजो एक अरजी तार दो
वीतराग के नाम तुम्हारे तीन जगत दिलदार हो
अपना विरद निहारो स्वामी काहे की बिछरिया —
घोर भील बहराल हो तारे भील क्यों मेरी बार है
नाग नागिनी बसत जगते मन दिया नवकार है
दास तिहारा संकट में है तीजो जी ध्रुवरिया

भक्ति-लहर

तर्ज - अखियों खोलो ना

अखियों खोलो ना, मेरे पीछे भागे चोर —
मोह रूप मन काए भर रे पीछे है दुख
नयना मीचे सो रहे रे हित की साँसें ढूँढ —
यही दशा तेरी चेतन तीनों इन्द्रिय चोर
लूटी गगरी ज्ञान की रे अब क्यों कीनी देर —
उत्तम अक्षर मिले रे छोड़ो विपन्न प्रीति
अनुभव आतम हित करो रे जाव न अवसर मीत —

तर्ज - दे दे प्यारे दे

शराबी

मेरे-अरे हाव है प्यारे प्रभु सुन लेना पुकार
लख चौरासी भटके रे गेह का दो पार
मेरे हाव दे, हाव दे, हाव दे प्यारे दे
दूजा नहीं और दिखना तेरे हाव आये
देही मोहनी मूरत सुन मेरा हावये —
पाने को तो बहुत पाये धन और मान खजाने
मिला न दूसरा इस जग में जो ज्ञान ज्योति जगाए
वीतराग सर्वज्ञ तीरथंकर तेरे ही गुण गाये
मेरी माँ फंसी है भव में परखो धार लगाए —
छोड़ दे अब दुनिया सारी चरणों में ध्यान लगाए
यह अभी है तेरी कमी ने देह बनाई
कोई नहीं है तेरा जग में जिसको न अपनाये
नाम प्रभु का जब ले देही से ही पार लगाये —

तर्ज - करवट टाऊ देखा

जब तेरे बाग

एक ही झलका में सारा मद खो गया, मरकट प्रभु पर नत हो गया
ये सारा जीवन आपको ही मैं अर्पण करता हूँ
कुछ ना चाह है जिनवर अब तो एक तेरा नाम जपता हूँ —
जब तेरा ये मुख रूप तो दर्शन के हेतु आया
इस देह से शुद्ध स्वरूप न मन मेराय गमाया
दुनिया में अब क्या है तेरा मुझे अब निज में रकें मैं धाऊँ ढूँढे —
तेरे बन कर्मों का चाकर तेरे हीरे है नाना
जिनवर करे सब को मैंने ना समझा ना जाना
मोहे कर्म तेरे कितने सितम पहाड़ों ना अब तेरा धर्म —

भक्ति-लहर

तर्ज - जैसे तेरे ही भरोसे

मेरे तेरे ही भरोसे भगवान सागर में नैया डाल देई
नैया डाल देई, नैया डाल देई —
काहे की मेरी नाव नवरिया काहे की पावार
धर्म की मेरी नाव नवरिया समकित की पावार —
काहे को हमन जाने है खेलन हार
अरे आतम जाने हमन हारो तू ही खेलनहार —

तर्ज - भैया त्रिशला तेरो लाल

भैया त्रिशला तेरो लाल जगत को तारन हारा रे
तारन हारा रे जगत को खेलन हारा रे —
मेरी सभा में दोपही साही शुद्ध दुदसा खींची
खेलन-खेलन और दुदसा भीखण हारा रे —
राम चन्द्र ने कुण्ड खुदाया सीता को छुड़वाया
अग्नि का प्रभु नीर बना और सब जग जाना रे —

तर्ज - भक्तो-भक्तो ने धर्म का लाभ

भक्तो-भक्तो ने धर्म का सारो सूखी तुम होवेगे —
धर्म ही मंगल ही उत्तम धर्म शरण सुखकार
धर्म करन वन्धन को टाले से जाय मुक्ति मकार —
पाप पुण्य सब कर्म पूजे कहे सुखकार
पुण्य भाव भी है दुखमय भी गुरु कहे दुखकार —
पाप छोड़कर पुण्य करो पर ये न बुद्धि ही सार
पुण्य पाप से भिन्न आत्मा ही शिवपद संसार —

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3064.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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