गल दमयंति — जैन स्वाध्याय सामग्री | Gal Damyanti

गल दमयंति

नल दमयन्ती

संचालन – (कुण्डलपुर नगरी में बहुत जोर शोर से तैयारियाँ चल रही है। आईये हम सब देखते है कि आखिर ये तैयारियाँ किस चीज की चल रही है।)

दासी – अरे! सुनो वरमाला आ गई क्या, लगता है पुष्पा लाने गई है।
(महाराज का प्रवेश)

राजा – मंत्री जी, मुख्य प्रवेश द्वार पर सारी तैयारियाँ हो गई क्या

मंत्री – जी हाँ राजन सारी तैयारियाँ हो गई है। आप निश्चिंकर रहे।

संचालन – (यह तैयारियाँ कुण्डलपुर नगरी में दमयन्ती के स्वयंवर की चल रही हैं जहां के राजा महापराक्रमी, भीमरथ तथा उनकी पुण्यवती रानी है। उनकी बेटी दमयन्ती जो 64 कलाओं में निपुण, धार्मिक तथा शस्त्रों की पाठी है। ऐसी महान् पुत्री के लिये आज भव्य स्वयंवर रचा गया है।)

राजा – अरे पुष्पवती दमयन्ती कहाँ है।

रानी – महाराज वह अपनी सखियों के साथ जिनालय में पूजा करने गई है।

महाराज मुझे तो दमयन्ती की बहुत चिन्ता होती है कि वह अपने ससुराल में कैसे रहेगी।

राजा – आप चिन्ता क्यों करती है अपनी बेटी तो बहुत ही विवेकवान और धार्मिक है। वह हर कार्य को बहुत ही अच्छे से निभा पाएगी।

रानी – आप सही कह रहे है राजन, जिसके जीवन में धर्म है उसे कोई भी परिस्थिति बाधा नहीं पहुंचा सकती। मैं व्यर्थ ही इतनी चिन्ता कर रही थी।

मंत्री – महाराज, महाराज अनेक राजा अपने राजकुमारों के साथ यहीं पधार चुके हैं।
(राजाओं का प्रवेश)

राजा – आप सभी का इस भव्य स्वयंवर में स्वागत है आप सभी को मेरा जय जिनेन्द्र।
(सारे जय जिनेन्द्र)

राजा – आप सभी अपना आसन ग्रहण करें।
(सभी राजकुमार बोलेंगे जी महाराज)

राजा – दमयन्ती आओ बेटा।

संचालन – (दमयन्ती सोचते हुए) हे वीतरागी प्रभु आप जैसा बनना ही मेरा ध्येय है परंतु मैं आपका राजमार्ग प्राप्त कर सकूँ, सर्व परित्याग कर सकूँ ऐसी अभी मेरी सामर्थ्य नहीं है। मुझे कामदेव जैसे सुंदर पति की आकांक्षा नहीं है परंतु हाँ मेरा जीवनसाथी सरलता के सौंदर्य से भरा हो। वह राजाओं का राजा न हो, परंतु आपके चरणों का भक्त अवश्य हो। ऐसी कामना करते हुए मैं इस मंडप में प्रवेश करती हूँ।

राजा – मंत्री जी सभी राजकुमारों का परिचय करवायें।

मंत्री – धनवन्ती देश के राजा, राजा ऋतुपर है। जो वेद, पुराण, न्याय में पारंगत हैं एवं जिनेश्वर देव के परम भक्त हैं।

दासी – ऐसे गुणवान राजा क्या आपको आकर्षित करते हैं।

मंत्री – जहाँ मुनि भगवन विहार करते है ऐसे राज्य के राजा नील है जो निषद राजा के पुत्र एवं नल के छोटे भाई है।

दासी – ऐसे सुंदर भुजाओं वाले राजा क्या आपको मोहित करते है।

मंत्री – महाराज की जय हो, राजकुमार नल प्रवेश की अनुमति चाहते है।

राजा – अनुमति है।
Time

नल – प्रणाम राजा।

राजा – इक्ष्वाकु वंशी, सूर्यसमान निषद राजा के बड़े पुत्र आपका स्वयंवर में स्वागत है।

नील – अरे भ्राताश्री ऐसे सभा में देर से आना आपको शोभा नहीं देता।

नल – क्षमा चाहता हूँ। मैं तो जल्दी ही प्रस्थान किया था परंतु रास्ते में एक वृद्ध मिला जो बहुत पीड़ित था मैं उसी की सेवा में लगा हुआ था।

नील – भ्राताश्री मैंने आपसे सीखा है कि भावनाओं पर विवेक की लगाम लगाना चाहिए।

नल – मैं स्वयं जिनेश्वर का भक्त हूँ, अगर मैं बिना वैयवृत्त्य के वहाँ से आ जाता तो यह जिनेश्वर देव का साक्षात् अपमान होता।

राजा – मंत्रीश्वर दमयन्ती को राजकुमार नल का विशेष परिचय करवायें।

मंत्री – युद्ध नीति में प्रवीण तथा सदा अहिंसा के चाहक ऐसे महाराज नल है। जिनेश्वर देव की पूजा तथा जो नियमित शास्त्र स्वाध्याय करते है। अतिसुंदर जिनालयों का निर्माण करवाया है तथा अनेक दानशालाएँ खोली है। शिकार खेलना, क्षत्रियों का शौक होता है पर राजकुमार ने कभी भी शिकार नहीं खेला तथा नगरी में शिकार खेलने पर प्रतिबंध लगाया है।
(दमयन्ती मुड़ते हुए दासी के कान में कुछ कहती है।)

दासी – आप सभी से दमयन्ती कुछ प्रश्नों के समाधान चाहती है।

सारे – अवश्य

दमयन्ती – दुनिया में देव तो बहुत है पर आप जिनेश्वर देव को ही क्यों पूजते है।

नील – यह तो कोई प्रश्न ही नहीं हुआ। मेरे पिता जिनेश्वर देव के भक्त थे इसलिये मैं भी परम्परा अनुसार जिनेश्वर का परम भक्त हूँ।

ऋतुपर – जिनकी स्तुति सारे करते है इन्द्र जिनको शीर्ष झुकाते है जिनका भव्य समवसरण है ऐसे जिनेन्द्र देव को कौन नहीं पूजेगा।

नल – वीतरागता एवं सर्वज्ञता से सुशोभित, सर्वघाति कर्मों का क्षय किया है, मोह राजा को परास्त किया इसलिये वह मेरे लिये पूज्य है।

दमयन्ती – विश्व में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है।

नील – देवी आश्चर्य तो यह है कि इस स्वयंवर सभा में रूप श्रृंगार की चर्चा की जगह जिनेश्वर देव की चर्चा चल रही है।

ऋतुपर – 1008 लक्षणों से युक्त तीर्थंकर भगवान् समवशरण आदि विभूतियों से युक्त है। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है। उनका रक्त लाल की जगह श्वेत होता है।

नल – अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य से युक्त अपना आत्मा ही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

दमयन्ती – मेरा तीसरा प्रश्न इस जगत् में सबसे सुंदर कौन है।

नील – हे मृगनयनी तुम्हारा सौंदर्य ही विश्व सौंदर्य है ऐसी सुंदरता और कहीं नहीं मिलेगी।
ऋतुपर – इस जगत् में जिनेन्द्र भगवान् ही सबसे सुंदर हैं तथा भगवान् का समवशरण भी सुंदर है।
नल – समवशरण की सुंदरता से भगवान् भव्य नहीं होते अपितु भगवान् की भव्यता से समवशरण सुंदर होता है तथा जिनेन्द्र देव द्वारा बताया गया अपना आत्मा ही सबसे सुंदर है।।
दमयन्ती – पुद्गल कि नहीं अपितु अपनी आत्मा की अद्भुतता जिसे भाती है ऐसे महाराजा नल को मैं आपकी अनुमति से स्वीकार करती हूँ।

(वरमाला) TUNE

दमयन्ती – आज से मेरे मन, वचन तथा काया के स्वामी आप हो।
नल – अपना स्वामी तो सदैव आत्मा ही है।
दमयन्ती – आज से मेरा जीवन आपकी इच्छा के अधीन रहेगा।
नल – परंतु अपना जीवन तो सदैव जिनेन्द्र देव की आज्ञा में रहना चाहिए।
दमयन्ती – सुख-दुख में मैं हमेशा आपके साथ हूँ।
नल – एक-दूसरे के सुख की नहीं परंतु हमें अपने आत्मा के सुख की कामना करनी चाहिए।

पर्दा

SCENE -2

संचालन – जिनके सात फेरे भी संसार में बंधने के लिये नहीं अपितु वीतरागता का मार्ग दिखाते हैं ऐसी उत्तम भावना के लक्ष्य से दो धार्मिक रूचिवन्त जीवों का विवाह सम्पन्न हुआ। बहुत ही भूषधाम से उनका स्वागत किया गया। मंदिरों में दान दिया गया वात्सल्य भोज हुआ। इस प्रकार वे अपना जीवन सुख संतोषपूर्वक बिताने लगे। सभी सुखी थे सिवाय एक के।
नील – मुझे तो नल की यह भक्ति पूजा चाल लगती है चाल।
मंत्री 2 – चाल ये आप क्या कह रहे हैं आप तो उनसे बहुत प्रेम करते हैं।
नील – प्रेम, प्रेम नहीं यह तो मेरी मजबूरी है अंतर तो ईर्ष्या की अग्नि से जल रहा है। जो जो मुझे प्रिय था वह सब कुछ नल को मिला। राज्यमुकुट, राजसंपत्ति और दमयन्ती इसकी तो मैं ऐसी दशा करूंगा कि ये सभी सुखपूर्वक नहीं रह पाएंगे।
मंत्री 2 – राजा नल में तो ऐसा कोई भी दोष नहीं है जिससे हम उनका अपयश कर सकें।
नील – दोष नहीं है तो क्या हुआ दोष उत्पन्न करा देंगे।
मंत्री 2 – परंतु कैसे।
नील – लत लगाऊँगा मैं राजा को, उन्हें जीतने का बहुत शौक है न देखना आज मैं उसे कैसे जिताऊँगा।

(पीछे से)

नल – मंत्रीश्वर पूजा की तैयारियाँ करो।
नील – अरे भ्राताश्री प्रणाम।
नल – अरे अनुज तुम यहां
नील – भ्राताश्री आप यहाँ अकेले भाभी श्री कहाँ हैं।
नल – वह तो जिनालय गई है, पूजा अर्चना करने। आज से दशलक्षण पर्व जो प्रारम्भ हो गए हैं।

नील – बहुत अच्छा, परंतु भ्राताश्री मुझे आपकी बहुत चिन्ता होती है। आप हमेशा राज पाट में लगे रहते हो। आपके स्वास्थ्य के लिए इतनी मेहनत अच्छी नहीं है।
नील – मैंने आपके मनोरंजन के लिए एक अद्भुत नुस्खा सोच रखा है।
नल – वह क्या है ?
नील – आओ मैं आपको बताता हूँ, ये देखो भ्राताश्री।
नल – अरे यह क्या … यह तो जुआ है, व्यसन !
नील – अरे नहीं नहीं व्यसन नहीं, यह तो घड़ी दो घड़ी का आनंद मात्र है। थोड़ी देर बैठकर देखिए, आपको बहुत आनंद आएगा।

मंत्री विक्रम सिंह

मंत्री 2 – (हाथी दाँत की पेटी और मोतियों की माला लेकर आते है।)
नील – भ्राताश्री एक दाव फेंक कर तो देखिए, जो जीतेगा उसका यह सब कुछ हो जाएगा।
नल – परंतु मुझे पूजन में जाना है।
मंत्री 2 – अरे राजन पूजन तो रोज ही करते हो …
नील – चलो भ्राताश्री एक आंकड़ा फेंको अरे एक आंकड़ा बोलो
नल – अरे बोलो ना

संचालक – इस प्रकार वे खेल में रम जाते हैं …
नील – अरे भ्राताश्री आप तो पहली बारी से ही अच्छा खेल रहे हो।
मंत्री 2 – वाह वाह! महाराज

(दमयन्ती का प्रवेश)

दमयन्ती – स्वामी आप जिनेश्वर देव की पूजा में नहीं आये। ऐसा पहली बार हुआ जब आपने पूजन छोड़ी हो।

नाटक

नल – अरे खेलते खेलते समय कब बीत गया पता ही नहीं चला। देखो मैंने यह सब जीता है

दमयन्ती – परंतु जिनेश्वर देव की भक्ति के सामने इन काँच के टुकड़ों का कोई मूल्य नहीं है क्या पता कि आज की जीत कब हार में बदल जाये।

दमयन्ती – चलो आज खेला तो खेला परंतु कल से नहीं खेलना ऐसा मुझे वचन दो।

नल – (भाई से) मैं तुम्हें वचन देता हूँ अब से मैं यह जुआ नहीं खेलूंगा। यह बहुत बुरा कार्य है, पाप का कार्य है।

नील – भ्राताश्री, आप ही बताइये क्या इसमें कोई हिंसा है, कोई झूठ है तो फिर क्या इसमें कोई अधर्म है, नहीं ना यह तो बस एक निर्दोष आनन्द है।

नल – पर दमयन्ती को यह पसंद नहीं है।

नील – ओ क्या एक वीर पुरुष एक स्त्री की इच्छानुसार चलेगा। भ्राताश्री मुझे आपसे यह अपेक्षा नहीं थी। मैं आपका भाई हूँ, हितैषी हूँ। मैं थोड़ी ना आपका कुछ बुरा करूंगा।

नल – तुम्हारी बात सत्य है, इस खेल में कोई अधर्म नहीं है। चलो खेलते हैं।

मंत्री 2 – राजा शत्रु सेना, हमारे विरोध में योजना बना रही है हमें भी कुछ सोच विचार कर लेना चाहिए।

नल – मेरे पास समय नहीं है आपको जो योग्य लगे आप करिये।

मंत्री 2 – राजन यह क्या! आपकी निर्मल मति पर व्यसन का ग्रहण लग गया है।

नल – (गुस्से में) मुझे कब क्या करना है यह मेरी मर्जी है। इसमें मुझे मजा आ रहा है, तुम रंग में भंग मत करो। जाओ यहां से।

मंत्री 2 – क्षमा कर दो महाराज।

नील – मैं 25 सोने की थाल दाव पर लगाता हूँ।

नल – कौन-सा आंकड़ा

नील – 7

(7)

नल – ये लो

मंत्री – (पीछे से) वाह वाह आप तो जीत गये। दाद देनी पड़ेगी पासा तो आपका गुलाम हो गया है।

मंत्री – महाराज आप कोई मोटी रकम दाव पर लगाओ ना

नल – मैं 25 लाख गाँव दाव पर लगाता हूँ।

मंत्री – वाह वाह

नल – मैं पाँच का आंकड़ा देता हूँ।

नील – हा हा हा मैं जीत गया।

मंत्री – ओ वाह वाह

नल – मैं 20 करोड़ अश्व, दस लाख हाथी दाव पर लगाता हूँ।
(दमयन्ती का प्रवेश)

मंत्री – महाराज महारानी दमयन्ती पधार रही हैं।

नल – तुम रुक क्यों गये। आगे खेल बढ़ाओ।

दमयन्ती – स्वामी यह क्या विनाश का खेल बंद करने के लिये मैं आपसे विनती करती हूँ।

नल – जब पुरुष बोल रहे हों तो स्त्रियों को नहीं बोलना चाहिए।

दमयन्ती – आप विद्वान् हो, विवेकवान हो, आपको यह कार्य शोभा नहीं देता।

नल – परंतु अगर मैं हार गया तो मुझे यह हार शोभा नहीं देगी।

नील – अरे भाभीश्री अगर भ्राताश्री हार को जीत में न पलट दे तो वह महाराज नल नहीं।

तो भ्राताश्री पांसा फेंकूं।

हां हां, तो आपने क्या दांव पर लगाया था, 20 करोड़ अश्व 10 लाख हाथी और 1 आयुधशाला।

ये लो मेरा पांसा

(8)

मंत्री – (पीछे से) अरे बधाई हो आप जीत गये।

(नील से) ज्यादा खुश ना हो क्या पता कब पांसा पलट जाये, महाराज नल के पास राजकुमार, है, राजसंपत्ति है, राजधानी है सब कुछ है

(नल से) क्यों ना महाराज इस बार इन सब को दांव पर लगा दें। हार को जीत में पलटो महाराज जीत आपकी ही होगी। लगा दो

नल –

दमयन्ती – नहीं स्वामी

मंत्री – सावधान रहिये महाराज नल भी का शक आपके पक्ष में है।

नल – मैं राजकुमार, राजसंपत्ति, राजधानी सब कुछ दांव पर लगाता हूँ।

मंत्री – ये होती है मर्दानगी, आपकी हिम्मत की तो दाद देनी चाहिये।

दमयन्ती – नहीं नहीं, आपके पिता ने यह सब आपको बहुत प्रेम से दिया था इन सबको जुए में हार जाना, यह इक्ष्वाकु वंश पर कलंक होगा

नील – 8 का आंकड़ा

मंत्री – अफसोस यह तो 5 का आंकड़ा है।

नल – मैं हार गया। मैं फिर से हार गया। (उठकर)

नील – हा हा हा भ्राताश्री कहीं जा रहे हो अभी खेल खत्म नहीं हुआ।

नल – पर मैं तो सब कुछ हार गया मेरे पास कुछ भी नहीं है।

नील – है एक आशा की किरण

नल – क्या ?

नील – है एक चीज सबसे कीमती और सबसे मूल्यवान।

नल – क्या है मेरे पास बोलो कुंवर ?

नील – (हाथ दिखाकर) दमयन्ती

नल – यह क्या बोल रहे हो।

(9)

नाटक

नील – मैं आपको आपकी सम्पत्ति से अवगत करा रहा हूँ।

मैं आपको एक और मौका देता हूँ अगर आप जीत गये तो सब कुछ आपका।

नल – ठीक है मैं दमयन्ती को दांव पर लगाता हूँ।

दमयन्ती – यह क्या आप मुझे दांव पर लगा रहे हो! अपनी अर्धांगिनी दमयन्ती को दांव पर लगा रहे हो। आज मैं आपके लिये सिर्फ एक वस्तु बनकर रह गई हूँ।

आपने अपने मान के लिये अपनी प्रिय को दांव पर लगा दिया, हे भगवान् ऐसा क्या अपराध हो गया मुझसे।

(पीछे पलट जाएगी)

संचालक – दमयन्ती से मत इतनी व्याकुलता क्यों अपने आप को संभालो। शान्तिनाथ भगवान् की शान्त मुद्रा को हृदय में निहारो। जिस प्रकार सूर्य की किरणों को कोई रोक नहीं सकता वैसे ही अशुभ कर्मों को आने से कोई नहीं रोक सकता

दमयन्ती – संभालो खुद को दमयन्ती व्यर्थ क्लेश भाव करके क्यों कर्म बांध रही हो।

नील – आंकड़ा है 5

जीत गया हा हा हा हा …
(10)

SCENE-3

वन का दृश्य

संचालन - इस प्रकार आप सभी ने देखा कि कैसे नल राजा को व्यसन की लत लग गई थी। कहा इसने धर्म का पालन करने वाले जिनशासन अनुयायी और कहां जुआ खेलकर अपना मान-सम्मान तथा अपनी सारी सम्पत्ति खो बैठे।

देखो कर्मों की विचित्रता कहा इतना धार्मिक जीव जुआरी बन गया। परंतु आत्म बल के सामने कर्म बल कुछ भी नहीं। जिस समय हो आत्मदृष्टि कर्म थर-थर कांपते। राजा नल ने भी अपनी भूल सुधारने की पूरी कोशिश की तो आइए हम देखते हैं।

नल - राजमहल छोड़े हुए बहुत वक्त हो गया है अब तक अन्न का एक दाना भी पेट में नहीं गया, न जल की एक भी बूँद।

दमयन्ति - व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति कोई भी हो सबके दो पहलू होते हैं एक अच्छा तो दूसरा बुरा, हमें किसको मुख्य करना है ये हम पर निर्भर करना है। बुरा वक्त तो सबके जीवन में आता है, पर उसके मुख्य न करके हमें तो अपने आत्मा के आनंद को मुख्य करना है।

हे स्वामी वहां पेड़ के पीछे वो पत्थर दिखाई दे रहा है। [पानी]

नल - अच्छा वो पत्थर जिसमें दरार पड़ गई है।

दमयन्ति - हां वही, देखो ना वहां उसके ऊपर एक सुंदर पक्षी बैठा हुआ है।

नल - पर नदी के प्रवाह तो बहुत तेज है, वह उस पक्षी को नुकसान पहुंचा सकता है।

दमयन्ति - फिर भी देखिए ना वह पक्षी कितना शांत और निश्चिन्त है।

स्वामी देखिए ना वह पक्षी हमें कितनी बड़ी शिक्षा दे गया है, शांति बाहर की परिस्थिति से नहीं अपितु मन की समता से आती है। धर्म तभी तथा आत्म ज्ञान के पानी से इतना मजबूत बनना है कि कोई भी अशुभ परिस्थिति हमें डिगा न सके।

नल - दमयन्ति आज मुझे एहसास हुआ कि संसार अनंत है, अपार है, असार है।

दमयन्ति - परंतु जिनेश्वर की भक्ति अभी भी सारभूत है।
(13)

नल - संसार दावाग्नल जैसा है।

दमयन्ति - परंतु वैराग्य रूपी अमृत इस दावाग्नल को शांत करने वाला है।

नल - संसार भयंकर अंधकार है।

दमयन्ति - परंतु आत्म ज्ञान रूपी सूर्य तो हमेशा प्रकाशवान है।
(रात का दृश्य)

दमयन्ति - अच्छा स्वामी रात बहुत हो गई है बातों बातों में तो हमें खबर ही नहीं पड़ी।
(सब सो रहे होते हैं और नल जाग जाता है)

नल - मूल मैंने की और मेरी भूल को एक पवित्र विचार करने वाली नारी भोगे। जुए में रमा मैं, और मेरी घोर अपराध की सजा मेरी निःअपराधी स्त्री भोगे…
क्या करूँ मैं कहां जाऊँ
हां एक उपाय है … अगर मैं दमयन्ति को यहां अकेला छोड़ के चला जाऊँ तो यह अवश्य अपने पिता के घर चली जाएगी। दमयन्ति तेरी भलाई के लिये मुझे यह सब करना ही पड़ेगा।
(पत्थर मारते हुए)

नल - (कपड़े पर) प्रिये यहां से परिश्रम का रास्ता तुम्हें अपने पिता के घर कुण्डलपुर पहुंचा देगा। मुझे अभी जाना होगा… धर्म तुम्हारी रक्षा करे।

मुझे माफ करना तुम्हारे हित के लिये मुझे सब कुछ करना ही होगा ताकि तुम अपना जीवन सुख शांति से यापन कर सको।
(नल दमयन्ति को छोड़ने के बाद)

संचालक - इस प्रकार राजा नल कोमल सी दमयन्ति को वन में अकेला छोड़कर चले गए। अब आइए देखते है कि उस निर्जन वन में दमयन्ति क्या विचार करती है।

दमयन्ति - ओह कितना भयानक स्वप्न था अरे स्वामी कहां गए। आज तो बहुत जल्दी उठ गए … लगता है स्नान करने गए होंगे।
(14)

दमयन्ति - स्वामी स्वामी आर्य पुत्र आप कहां है। सामने आओ सामने आओ। क्या मेरे स्वामी को कोई जानवर खा गया या फिर किसी मलेच्छ ने अपहरण कर लिया कहा जाऊँ क्या करूँ किससे पूछूं कोई तो मेरे नाथ की खबर दो।
(दुपट्टे में देखते हुए)

दमयन्ति - प्रिये यहां से परिश्रम का रास्ता तुम्हें अपने पिता के घर कुण्डलपुर पहुंचा देगा। मुझे अभी जाना होगा… धर्म तुम्हारी रक्षा करे।

मुझे माफ करना तुम्हारे हित के लिये मुझे सब कुछ करना ही होगा ताकि तुम अपना जीवन सुख शांति से यापन कर सको।

दमयन्ति - यह क्या स्वामी ऐसा क्यों किया आपने निष्ठुर आप नहीं विश्वासघात आपने नहीं, वह तो मेरे पूर्व कर्मों का फल है।

स्वामी मेरे कर्मों के कारण भले ही आपने मुझे त्याग दिया है पर कर्म के उदय के कारण जैन धर्म को मत त्यागना है पृथ्वी के आभूषण आप जहां पर भी हो मैं आपकी कुशलता चाहती हूं।

SCENE-4

संचालन - दमयन्ति धैर्यतापूर्वक वन में अकेले रहने लगी तथा आत्मा का ध्यान करती रही अब देखते है कि आखिर नल राजा कहां है और उनके साथ क्या-क्या हुआ।
(अग्नि की ज्वाला दिखती है)

नल - अरे यह क्या यह तो अग्नि की ज्वाला है।
(अंदर से आवाज आयेगी)

नल - बचाओ बचाओ मुझे कोई बचाओ नल राजा आप बचाओ

लगता है कोई जीव इस भयंकर अग्नि में फंस गया है। लो यह मेरा कपड़ा पकड़ लो। (अंदर जाता है)
(कूबड़ बन जाएगा)

कूबड़ - आह आह ये क्या हो गया ‘मेरा शरीर तो पूरा विकृत हो गया मेरा चेहरा भी खराब हो गया’।
(15)

देव

शांत हो जाओ वत्स

कश्यप

आप कौन हैं।

देव

बेटा मैं तेरा पिता हूँ, दीक्षा के प्रभाव से मैं स्वर्ग में देव हुआ, अवधि ज्ञान से मैंने तेरी सारी परिस्थिति जान ली। अब मैंने तेरी रक्षा के लिये ही तेरा रूप विकृत किया है।

कश्यप

मैं कुछ समझा नहीं आपके कहने का आशय

देव

बेटा तुम्हारे वनवास जाने के बाद तुम्हारे अनेक शत्रु बन गए जो कि तुम्हें हानि पहुँचाना चाहते हैं तुम्हारी रक्षा के लिये ही मैंने ही यह सब किया है।

कश्यप

तो मेरी पुरानी जैसी काया अब कब होगी।

देव

आज से 12 वर्ष के बाद तुम यह कंचन कपड़ा ओढ़ लेना, तुम पहले की तरह वापस अपने रूप में आ जाओगे।

कश्यप

आपके पास तो दिव्य शक्तियाँ हैं आप मुझ पर से यह विपत्ति क्यों नहीं हटा देते।

देव

जब कर्म का उदय होता है तो इन्द्र, जिनेन्द्र भी कुछ करने में समर्थ नहीं है। यह तुम भी अच्छे से जानते हो।

कश्यप

हां आपकी बात बिल्कुल सत्य है कर्म के उदय में कोई कुछ भी नहीं कर सकता सिवाय धैर्य धारण करने के।

देव

सुनो वत्स इस आम्र वृक्ष के पीछे से जो रास्ता जाता है वह तुम्हें ऋतुपर्ण राजा की राजधानी तक पहुँचाएगा। तुम अपना नाम वहाँ बाहुक रख लेना वहीं पर ही तेरा हित होगा।

कश्यप

पर मुझसे इस काया का कष्ट नहीं सहा जाएगा।

देव

तुम तो जिनेश्वर देव के भक्त हो, जो कष्टों से कम्पायमान हो वह जिनेन्द्र भक्त नहीं अपितु जो कष्टों को कम्पाये वही जिनेन्द्र भक्त है।

पर्दा

SCENE - 5

संचालक - इस प्रकार नल राजा तो कहीं दूर जाकर अपना जीवन बिताने लगे परंतु अब देखते हैं कि दमयन्ति वन में सुखपूर्वक रह रही है या नहीं।

यहाँ पर तो उसे वन में एक भयंकर अजगर ने उपसर्ग किया हुआ है।
आईये देखते हैं।

दमयन्ति - बचाओ बचाओ मेरी श्वास रुक रही है।

(हे प्रभु आपकी साक्षी में मैं सर्व जीवों को क्षमा करती हूँ, सभी जीव मुझपर क्षमा करें, मेरा सभी से प्रेमभाव है वैर नहीं … अरिहन्त सरणं…)

भील - अरे यह क्या (अजगर निकालते हुए)

मैं आपके लिये अभी पानी लेकर आता हूं।

यह लो पानी पियो।

मन में (क्या अद्भुत रूप है यह लवे लवे केश, ये मृगनैनी नैन, कंचन सी काया वाह आज तो इस स्त्री को देखकर मैं धन्य ही हो गया)

(हाथ पकड़ते हुए)

दमयन्ति - यह क्या कर रहे हो

भील - तेरे रूप को निहार रहा हूँ सुंदरी

दमयन्ति - मैं शादीशुदा स्त्री हूँ, पति की त्यागी हुई हूँ परंतु पतिव्रता हूं।

भील - पति की त्यागी हुईं… कौन मूर्ख है जिसने इतनी सुंदर स्त्री को त्याग दिया।

दमयन्ति - मेरे पति के विरोध में मैं एक शब्द भी नहीं सुनूंगी, वो मेरे देव हैं।

भील - देव हैं … जिसने तुम्हें इतनी भयानक अटवी में छोड़ दिया तुम उसको देव कहती हो।

दमयन्ति - हां, मुझे उन पर पूरा विश्वास है उन्होंने मुझे मेरे हित के लिये ही छोड़ा है। कृपा कर तुम यहां से चले जाओ।

भील - चला जाऊँ हा हा हा… कहां जाएं सुंदरी तेरे रूप ने तो मुझे पागल कर दिया है मैं तुम्हें अपनी बनाकर ही रहूंगा।

दमयन्ति - तुम यह क्या कह रहे हो, तुम्हें इसका भान भी है

भील - ऐ सुंदरी मैं तुम पर उपकार कर रहा हूँ उपकार

दमयन्ति - पर स्त्री गमन तुम्हें नरक के घोर दुख देगा।

भील - तुम जैसी सुंदर स्त्री के लिये मैं एक बार क्या अनंत बार नरक मंजूर है।

(हाथ पकड़ लेगा)

दमयन्ति - ठीक है मैं तैयार हूँ …

भील - तैयार है वाह

दमयन्ति - पर मेरी एक शर्त है

भील - मुझे तेरी हर शर्त मंजूर है।

दमयन्ति - मुझे फलाहार करने की इच्छा है।

भील - अभी लाता हूँ सुंदरी।

लो सुंदरी

दमयन्ति - (जूठन निकालते हुए) लो यह खाओ मैं तुम्हें बहुत प्रेम से दे रही हूँ, खाओ ना।

भील - ऐ सुंदरी मैं भले ही नीच जाति हूँ पर यहां मीलों का राजा हूँ राजा। एक राजा भूखा मर जाएगा पर किसी की जूठन नहीं खाएगा।

दमयन्ति - उसी प्रकार मैं भी नल राजा की जूठन हूं।

भील - सुंदरता कभी जूठन नहीं होती।

दमयन्ति - अच्छा तो यह बताओ कि कोई सरोवर में मल, मूत्र पड़ा हो तो क्या आप उसमें स्नान करना पसंद करोगे।

भील - यह कैसी बात कर रही हो स्नान तो दूर मैं उसकी तरफ देखूंगा भी नहीं।

दमयन्ति - उसी प्रकार शरीर भी मल, मूत्र, मांस से भरा हुआ है क्या तुम इसे भोगना पसंद करोगे। मुझे भोगना उस सरोवर में स्नान करने के बराबर है।

भील

मुझे माफ कर दो क्षमा कर दो, देवी मैंने तो बस तुम्हें अजगर के मुख से बचाया था, परंतु तुमने तो मुझे संसार के अनंत दुखों से बचा लिया। मैं तुम्हारा बहुत बहुत उपकारी हूँ क्षमा कर दो मुझे। धर्म तेरी रक्षा करे।

संचालन

ऐसे ही संयम के साथ दमयंति ने कई वर्ष व्यतीत किये। शुद्ध आत्मा में अपना मन लगाया और वही गुफा में बैठकर ध्यान किया। पर अचानक तेज वर्षा के कारण गुफा में पानी भर गया, वहां से जाने के सिवाय उसके पास कोई और उपाय नहीं था। एक दिन नदी पार करके वह अपने मौसा मौसी के राज्य में पहुंची जहां पर उसे कोई नहीं जानता था। वहां पर बहुत ही धूमधाम से उत्सव मनाया जा रहा था। आईये हम सब मिलकर देखते है।

मौसी-मौसा का दृश्य

मौसी - तुम कौन हो तेरा नाम क्या है।
दासी - महारानी नदी के किनारे मुझे यह असहाय स्त्री दिखी।
आपको वैसे भी एक दासी की जरूरत थी मुझे यह सुशील लगी इसलिये इसे मैं यहां ले आई।
मौसी - ये चेहरा तो बहुत पहचाना हुआ लगता है ऐसा लगता है जैसे यह पुष्पवती की बेटी दमयंति है।
बहन - अरे मां आप भी, बहन दमयंति तो राजरानी है राजरानी इसका तो वेश का भी ठिकाना नहीं है।
मौसी - जो भी हो, परंतु इसको देखकर मुझे तो अन्तर में बहुत वात्सल्य आता है, ऐसा लगता है जैसे ये मेरी कोई सगी हो।
दमयंति - महारानी जी कोई सेवा है क्या
मौसी - क्या तुम जिन मंदिर की देख रेख कर सकती हो।
दमयंति - हां हां क्यों नहीं, आपका बहुत बहुत उपकार मैं तो आज धन्य ही हो गई।
बहन - तुम्हें मेरी भी सेवा करनी होगी।
दमयंति - जी हां क्यों नहीं
बहन - जाओ मुझे स्नान करना है, मेरे लिये सुगंधित द्रव्य वाला जल तैयार करो।
दमयंति - जी
बहन - मां एक अपरिचित को आप जिन मंदिर का कार्य कैसे सौंप सकती हैं
मौसी - बेटा इसकी आंखों में मैंने निर्दोषता देखी है और देखना यह बहुत अच्छे से जिन मंदिर की सेवा करेगी।
बहन - पर मां …
मौसी - पर वर छोड़ो, अब जल्दी जाओ और स्नान कर लो, तेरे मौसा मौसी यहां पधारने वाले है।

(भीमरथ तथा पुष्पवती का प्रवेश)

मौसा - अरे चंद्रेशा देखो कौन आया है।
मौसी - अरे … पधारो, और बताइये नल दमयंति कैसे हैं।
राजा - एक दुःखद समाचार है, राजा नल जुए में सारा राज पाठ हार गए। उन्हें 12 साल वनवास भेज दिया गया। पता नहीं वे कहां है कैसे हैं, आशंकाओं से मेरा चित्त व्याकुल हो गया है।
मौसी - दीदी व्यर्थ आकुलता ना करो वे जहां भी होंगे अच्छे ही होंगे, धर्म ने अवश्य उनकी रक्षा की होगी।
दासी - महारानी जी जिन मंदिर में से स्वर्ण छत्र गायब हो गया है।
मौसी - अरे रे यह क्या हो गया।
मौसा - जाओ जाकर सेनापति को बुलाओ
बहन - माताजी मेरा नवलक्खा हार चोरी हो गया, जब मैं नहाकर तो देखा के हार गायब है।
मौसा - तेरी सेवा में कौन था उस वक्त
बहन - अरे मां वही नई दासी, मुझे तो पहले से ही शक था उस पर
मौसी - बुलाओ उस दासी को
बहन - सूर्यकांता …
मौसी - बेटा बता क्या तूने चोरी की है।
दमयंति - मैंने कुछ नहीं किया राजमाता
बहन - झूठ बोल रही है झूठ, मुझे सब पता है कि इस भोलेपन के पीछे षड्यंत्री चेहरा छुपा हुआ है।
मौसा - शांत रहो चंद्रमति शांत
बहन - शांत कैसे रहूं, मैं शांत इतना बड़ा अपराध किया है फिर मैं शांत क्यों रहूं। इसको तो मृत्युदण्ड मिलना चाहिए।

नाटक

मौसी – कषाय परिणाम करके कर्म बन्ध क्यों कर रही है। दासी जिन मंदिर में चोरी करने से बहुत पाप का बन्ध होता है अपराध होता है।
दमयन्ति – जो अपराध मैंने किया ही नहीं उसको मैं क्यों स्वीकारूं
बहन – तूने चोरी की है इसलिये तुझे इन बेड़ियों से बांध दिया है।
संन्चालक – मुझे तो ये बेड़ी और रेशमी धागे में कोई भेद नहीं दिखता
बहन – ओ हो हो हो चेहरे से तो कितनी भोली लग रही है, परंतु इसकी करतूत तो देखो। अपना दोष कबूल करो, बोलो कि तुमने ही चोरी की है।
दमयन्ति – मैंने कोई चोरी नहीं की
(माता पिता के चरणों में गिरा दिया)
राजा – दमयन्ति, मेरी बेटी, मेरा खोया हुआ रत्न, बेटा तुम कहां थी।
रानी – तुम्हें हमने कहां कहां नहीं ढूंढा। हम कितने चिंतित थे तुम्हारे लिये
मौसी – अरे ये दमयन्ति है! मैं तो इसे पहचान ही नहीं पाई, मुझे माफ कर दो पुत्री
बहन – मैंने तुम्हारे ऊपर झूठा दोष लगाया मुझे माफ कर दो।
दमयन्ति – अपराध तो मैंने किया है किसी पूर्व भव में। कहा जाता है जो जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। तुम्हारा इसमें कोई भी दोष नहीं। मैंने कर्म बांधा था इसलिये मुझे ही भोगना पड़ा।
रानी – तुझे जीता जागता देख कर मेरे प्राण में प्राण आ गये। ये तेरे साथ क्या हो गया।
दमयन्ति – आपको मेरे शरीर की फिक्र है। मेरा शरीर ही न रहे मैं ऐसी भावना भाती हूँ
पिता – नल कहां है
(दमयन्ति चुपचाप)
माता – बोलो ना बेटा राजा नल कहां हैं
दमयन्ति – वो मुझे वन में अकेला छोड़कर चले गये।

(22)

पिता – वो चले गये कहां चले गये तुझे वन में अकेला छोड़कर
दमयन्ति – नहीं पिताजी इसमें उनका कोई दोष नहीं है मेरे पुण्य के उदय ने मेरा साथ छोड़ दिया।
मौसी – वहां तेरी हिम्मत नहीं टूटी
दमयन्ति – जहां वीतरागता जैसा धर्म हो वहां हिम्मत कौन तोड़ सकता है
मंत्री – महाराज महाराज चोर पकड़ा गया।
राजा – जाओ सिपाहियों
मौसी – जाओ दमयन्ति को तैयार करो।
दासी – जी महारानी
मंत्री – महाराज जीवन में पहली बार अपनी नगरी में सूर्यपाक व्यंजन बनाने वाला रसोइया आया है।
दमयन्ति – सूर्यपाक व्यंजन बनाने वाला रसोइया आया है। यह तो केवल महाराज नल को ही विद्या प्राप्त है अन्य कोई नहीं जानता।
मंत्री – क्या सुंदर रूप वाला महापराक्रमी नल राजा और कहां एक कुबड़ी रसोइया। इसके तो सारे अंग विकृत हैं ये राजा नल कैसे हो सकते हैं
दमयन्ति – कुछ तो खास होगा उनमें
मंत्री – हां एक बार एक पागल हाथी को उन्होंने अपने वश में किया था। अनेक अनेक राजा भी उस हाथी से हार गये परंतु उन्होंने विजय प्राप्त की। राजा ने उसे ईनाम में एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दी, पांच सौ गांव दिये परंतु जानती है रानी सबसे आश्चर्य की बात क्या है… उन्होंने वह सारी मुद्रा गरीबों में दान कर दी पांच सौ गांव में मंदिरपान बंद करवा दिया।
महाराज ऐसा व्यक्ति मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। अरे मैं तो भूल ही गया मुझे पूजा के बहुत काम हैं मैं चलता हूं।
दमयन्ति – ऐसा विशाल हृदय, ऐसे उच्च विचार गजदमनी की अद्भुत विद्या यह सब तो नल राजा के सिवाय अन्य किसी के पास नहीं हो सकती। पिताजी कृपया इस बाहुक को आप बुलवाईये।

(23)

रानी – पर उसका अंदर का भेद जानने के लिये एक युक्ति विचार करनी होगी।
राजा – एक युक्ति है… दमयन्ति का स्वयंवर
रानी – स्वयंवर
राजा – हां दमयन्ति का छोटा स्वयंवर, ऋतुपर्ण राजा को यहां आमंत्रित करेंगे वह तो पहले से ही दमयन्ति पर मोहित था।
माता – हां हां स्वयंवर की बात सुनकर तो वह उत्सुक होकर यहां आ जायेगा।
दमयन्ति – पिताजी एक और सूचना है चित्रशाला में दो चित्र बनवाकर रखिये। एक में शांत सरोवर तथा दूसरे चित्र में झरना बह रहा हो परंतु वहां एक पत्थर पर एक पक्षी इतनी अशांति होने पर भी शांति से बैठा हुआ हो। अगर वो नल महाराज होंगे तो वे अवश्य दूसरा चित्र पसंद करेंगे।
(ऋतुपर्ण राजा का प्रवेश)
राजा – पधारो पधारो कुण्डलपुर में आपका स्वागत है आप तो बड़े ही सही समय पर आ गये।
ऋतुपर्ण – अरे ये तो बाहुक की अश्वविद्या का कमाल है।
राजा – परंतु यह तो महाराज नल ही जानते है।
बाहुक – मैं पूर्व में नल राजा का सारथी था। उन्हीं ने मुझे यह कला सिखाई है।
ऋतुपर्ण – मुझे बहुत ही अफसोस हुआ कि इतने धर्मवान धैर्यवान नल राजा एक जुए की लत में आ गये और अपना सब कुछ गंवा दिया। उन्होंने ऐसा खेल खेला कि उन्हें वनवास तक जाना पड़ा।
राजा – अरे खेल तो उन्होंने मेरी पुत्री के साथ खेला है।
रानी – पति के विश्वास में उसने उनके साथ वन का मार्ग अपनाया। पति की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया ऐसी निष्ठावान पत्नि को उन्होंने मध्य रात्रि में वन में अकेला छोड़ दिया। नल राजा ने ऐसा कार्य करने से पहले एक बार भी नहीं सोचा।
राजा – क्या उन्हें दमयन्ति जैसी सुकोमल नारी भाग लग रही थी, क्या उन्हें दया नहीं आई। वे तो कायर है, निष्ठुर है, विश्वासघाती है।

(24)

संवाद

बाहुक - नहीं नहीं यह बात सत्य नहीं है। वे कायर नहीं वे निष्ठुर नहीं। अरे उनकी मजबूरी का तुम्हें अंदाजा नहीं अपनी पत्नि को अकेला छोड़ने पर उनके हृदय पर क्या बीती है आपको इसका अंदाजा नहीं। अरे एक पल भी ऐसा नहीं हुआ जब उन्हें दमयंति की याद न आई हो।

राजा - पर नल राजा की बातें सुनकर तुम क्यों खेद खिन्न हो रहे हो। ऐसा लग रहा है कि मानो तुम सब घटना के साक्षी थे।

बाहुक - ऐसा नहीं है पर …

ऋतुपर्ण - अरे ये बाहुक महाराज की सेवा में रह चुका है वो उनके स्वभाव से सुपरिचित है।

बाहुक - हां हां उन दोनों के प्रेम का मैं साक्षी रह चुका हूं।

ऋतुपर्ण - अब कोई भला अपने स्वामी के विरुद्ध सुन सकता है क्या।

राजा - क्षमा करो महाराज। वातावरण थोड़ा गंभीर हो गया है चलो मैं आपको अपनी चित्रशाला में ले चलता हूं।

आओ राजा बताइये इन दोनों चित्र में से शांति किस चित्र में है।

ऋतुपर्ण - अरे इसमें विचार क्या करना दिख ही रहा है कि पहले चित्र में अपार शांति भरी हुई है। आकाश का वातावरण साफ है, पहाड़ की परछाई शांत सरोवर में स्पष्ट दिख रही है।

राजा - तुम्हारे अनुसार क्या है बाहुक।

बाहुक - मुझे तो वह दूसरा चित्र पसंद है क्योंकि भले ही यहां का वातावरण अशांत हो परंतु इस छोर में बैठा हुआ पंछी अशांत वातावरण में भी बिना किसी कष्ट के है इसी चित्र में स्पष्ट है सच्ची शांति।

ऋतुपर्ण - वाह वाह इसका तो मैंने विचार ही नहीं किया।

राजा - महाराज राजपाठ के लिये एक निर्णय लेना है आपकी सलाह की हमें जरूरत है

ऋतुपर्ण - हां हां ! क्यों नहीं, चलिए।

(25)

राजा - अरे बाहुक तू तो चित्र कला का प्रेमी है ना तू यहीं रह कोई सेवा की आवश्यकता हो तो सेवक को बुला लेना।
(दमयंति का प्रवेश)

दमयंति - महाराज नल … आप धोक क्यों गये, क्या आप महाराज नल है।

बाहुक - ना ना, मैं तो उनका दास हूँ मैं तो उनका नाम सुनकर चौंक गया था। मेरा नाम तो बाहुक है देवी।

दमयंति - सत्यवादी नल असत्य कब से बोलने लगे। क्या नाम रूप बदलने से आपका भूतकाल थोड़ी बदलेगा। आप रूप बदल सकते है, नाम बदल सकते है परंतु आपकी आंखों में वह रहे मेरे प्रति इस प्रेम को नहीं बदल सकते।

नजर नहीं फेरो महाराज मेरे ऊपर हाथ रखकर बोलो के आप मेरे स्वामी नहीं।

बाहुक - आप भ्रमित हो रही हो देवी। इस असत्य मान्यता का त्याग करो। मुझमें तथा नल राजा में कोई भी समानता नहीं। वे तो साक्षात् कामदेव है। और मैं विकलांग बाहुक हूं।

दमयंति - मैं तो आपको गुणों पर मोहित थी, आपके रूप पर नहीं। दमयंति के हृदय में सिर्फ एक ही व्यक्ति है और वे है राजा नल। आपकी आंखों में मैंने सिर्फ एक ही सवाल देखा है, कि दमयंति का दूसरा स्वयंवर क्यों?

राजा - अरे बेटा दमयंति महाराज के लिये फलाहार की व्यवस्था करो।

दमयंति - जी पिताजी। (बाहुक से अपना हाथ काट लेती है)

आह … मेरी तकलीफ देखकर आपको इतना कष्ट क्यों हो रहा है मुझे स्वीकारो नाथ।

(बाहुक चादर ओढ़ता है और नल प्रकट हो जाता है)

राजा - पुष्पवती अरे ओ पुष्पवती देखो चमत्कार हो गया

रानी - राजा नल आपको देखने के लिये तो मेरी आंखें तरस गई।

(दमयंति नल के चरणों पर गिर जाती है)

(26)

नल - दमयंति तुम्हारा स्थान मेरे चरणों में नहीं मेरे हृदय में है। तुम्हारा शील देखकर मैं प्रभावित हुआ।

संचालक - इस प्रकार नल और दमयंति का मिलन हुआ। नल ने अपनी गलती का प्रायश्चित किया। वह दोनों अपने घर वापिस लौट गये। वहां नल राजा ने नील को जुआ खेलने के लिये फिर से एक चुनौती दी। वहां नील राजा को परास्त कर उन्होंने विजय प्राप्त की। नील को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और अब उसने माफी मांगी।
धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होता गया। नगरी में सब खुशी पूर्वक अपना जीवन यापन करने लगे। फिर कुछ समय पश्चात् नल दमयंति को एक पुत्र इन्द्रसेन एवं पुत्री इन्द्रसेना की प्राप्ति हुई।

इन्द्रसेन - जय जिनेन्द्र माता

इन्द्रसेना - जय जिनेन्द्र माता

दमयंति - आओ बेटा मुझे आप दोनों णमोकार मंत्र सुनाओ
(दोनों सुनाते हैं)

इन्द्रसेन - मां अब हम खेलने जाएं

दमयंति - जाओ।

नल - अरे वाह तुम तो अभी से ही दोनों को धार्मिक शिक्षा दे रही हो।

दमयंति - सही कहा आखिर इन्हें भी तो आगे मोक्ष मार्ग में प्रशस्त होना है। अभी से धार्मिक संस्कार देंगे तभी तो धर्म रूपी वृक्ष फलित होगा।

स्वामी अब वक्त आ गया है कि हम भी मोह माया को छोड़कर जिन दीक्षा ले लें। अब तो यह संसार असार लगने लगा है कुछ रूचता ही नहीं अब इस मोह और झूठे जगत् में मुझे नहीं फंसना

नल - पर इतना सारा राजपाठ, राजवैभव मैं कैसे छोड़कर जाऊं। अभी तो मेरा सुखपूर्वक जीवन शुरू हुआ है। दमयंति तुम ऐसी बातें क्यों कर रही हो।

(27)

संचालक - संभालो महाराज नल तुम्हारी बुद्धि को क्या हो गया है। यह नर भव तो
जीवन सार्थक करने के लिये मिला हे, और इसे तू तुच्छ राजसंपत्ति एवं भोग
के लिये गंवा रहा है चेतो नल चेतो …
नल - ओह ! यह मुझे क्या हो गया था। दमयन्ति सही कहती है, अब हमें दीक्षा ले
लेनी चाहिए आत्मा का आनंद ही सच्चा आनंद है। बाहय विषय तो मात्र
सुखाभास है आत्म वैभव के आगे तो सब फीका हैं।

पर्दा

स्रोत: Gyata संग्रह।

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