आठ सतियाँ
(१) सती सीता
पुण्यभूमिः जम्बूद्वीप का भरतक्षेत्र सदा ही धर्मात्माओं से भरा धार्मिक क्षेत्र रहा है। इसी भरतक्षेत्र में धनधान्य से सम्पन्न, हरियाली से परिपूर्ण एकछत्र नाम का नगर था। इस नगर में धर्मात्मा, ज्ञानी, नीति से सम्पन्न लोग रहते थे। इनमें सागरदत्त नामक व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी का नाम रत्नप्रभा था।
सागरदत्त के गुणवती¹ नाम की एक कन्या थी। यह सर्वांग-सुन्दरी कन्या सभी युवाओं की चाहत का विषय थी। गुणवती का गुणवान नाम का भाई था। सागरदत्त ने गुणवती की युवावस्था देखकर उसके विवाह का विचार किया।
उसी नगर में नयनदत्त नाम का व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुनन्दा था। उसके धनदत्त (राम का जीव) तथा वसुदत्त (लक्ष्मण का जीव) नाम के दो बेटे थे। सागरदत्त ने समान हैसियतवाला जानकर धनदत्त के साथ गुणवती का विवाह तय कर दिया था।
इसी नगर में एक अमीर व्यापारी का श्रीकान्त (रावण का जीव) नाम का बेटा रहता था। वह हर पल गुणवती के बारे में सोचता था। जब उसे गुणवती के धनदत्त के साथ विवाह तय होने का पता चला, तब वह गुणवती की माँ रत्नप्रभा के पास गया। उसने रत्नप्रभा से मीठी-मीठी लुभावनी बातें कीं, तब लोभी स्वभाववाली रत्नप्रभा नारीजन दुर्बलता के कारण श्रीकान्त का वैभव देखकर उस पर लट्टू हो गई और उसने श्रीकान्त से ही गुणवती के विवाह का वादा किया।
जब वसुदत्त को यह बात पता चली।तब उसे बहुत गुस्सा आया; उसी समय यज्ञबलि (विभीषण का जीव) नामक युवक वहाँ आया। उस यज्ञबलि ने वसुदत्त को श्रीकान्त को मारने के लिए उकसाया।
वसुदत्त कपड़े में तलवार को छिपाकर श्रीकांत के पास गया। श्रीकांत उस समय असावधान था। वसुदत्त ने झट् से तलवार निकाल कर श्रीकांत पर प्रहार किये। श्रीकान्त के पास भी तलवार थी, उसने भी तलवार उठाकर वसुदत्त पर प्रहार किये। उसी समय दोनों का कुमरण हुआ।
मरकर दोनों विंध्याटवी नामक घने जंगल में हिरण बने। वसुदत्त और श्रीकांत के मरण के बाद समाज में पंचायत हुई।
पंचायत ने इस सारे माजरे की जड़ धनदत्त और गुणवती को जानकर उनके परस्पर विवाह को अमान्य कर दिया।
धनदत्त समाज में अपनी बदनामी देखकर घर छोड़कर चला गया। इधर उधर भटकता रहा। भटकते - भटकते एक दिन सूर्यास्त के समय सुनसान जगह पहुँच गया, वहाँ मुनियों का एक संघ ठहरा हुआ था। धनदत्त को प्यास लगी थी। संघ में जाकर उसने पीने के लिए पानी मांगा। सभी मुनि मौन थे। एक क्षुल्लक को उस पर दया आयी, उन्होंने उसे समझाया: रात्रावप्यमृतं युक्तं न पातुं, किं पुनर्जलम्।
अर्थ- रात्रि में अमृत भी पीना अच्छा नहीं है, फिर जल की क्या बात? अर्थात् रात्रि में जल भी पीना नहीं चाहिए।
क्षुल्लक ने धनदत्त को धर्म का उपदेश दिया। उस ने उसी समय अणुव्रत धारण किए। जीवन भर उनका पालन कर समाधिपूर्वक देह छोड़कर ब्रह्मस्वर्ग में देव¹ बना।
गुणवती घर के कामों में अपने-आप को व्यस्त रखने लगी, परंतु वह पंचायत के फैसले को मन से निकाल नहीं पायी थी। उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया था। वह भीतर ही भीतर नाराज रहती थी। दया, धर्म उसके चित्त से वैसे ही भाग गए थे, जैसे सच्चे श्रद्धानी पुरुष के चित्त से कुदेव, कुगुरू, कुधर्म का श्रद्धान समाप्त होता है। कोई मुनिराज दिखते, तब उनकी भक्ति की बजाय, वह उनकी निन्दा, हँसी करती थी। उनसे सदा द्वेष रखती थी, तिरस्कार करती थी। इसी तरह के द्वेष भावों के साथ उसने आयु पूरी की। दुष्ट भावों से मरकर विन्ध्याटवी में उसी स्थान पर हिरणी¹ बनी, जहाँ वसुदत्त और श्रीकांत के जीव पहले से ही हिरण बने हुए थे।
पूर्व संस्कारों के कारण श्रीकान्त का जीव हिरण उससे सम्पर्क करना चाहता था, परंतु पूर्व संस्कारों के कारण ही वसुदत्त के जीव दूसरे हिरण में और पहले हिरण में जोरदार लड़ाई हुई। लड़ाई में दोनों मरे। मरकर क्रमशः सुअर, हाथी, भैसा, बैल, बंदर, चीता, भेड़िया, काला हिरण बने। हर गति में एक दूसरे से लड़ते हुए मरे, बाद में अनेक जानवर आदि शरीरों को व दुष्टभावों को धारण करते रहे।
गुणवती का जीव हिरणी के बाद अनेक पशु शरीरों² को धारण करती रही, दुष्टभावों से मरती रही। जब उसका पाप कुछ कम हो गया, तब वह गंगा नदी के तट पर हथिनी³ बनी। वहाँ भी वह अपने पूर्व पाप के फल को ही भोग रही थी। दूसरी हथिनियाँ उसे सदा सताती रहती थीं।
एक बार चरते-चरते वह कीचड़ में फँस गई थी। ज्यों-ज्यों बाहर निकलने का प्रयत्न करती, त्यों-त्यों वह कीचड़ में धंसती गई। बचने का कोई उपाय न देखकर वह जोर जोर से चिंघाड़ने व रोने लगी। उसकी करुण आवाज़ सुनकर वहाँ से जा रहे तरंगवेग नामक विद्याधर को उस पर दया आ गई । वह उसके पास गया, उसके कानों में णमोकार मंत्र सुनाया, उसे धर्म का उपदेश देकर प्रत्याख्यान-संयम ग्रहण कराया। हथिनी ने भी अपना अंतिम समय जानकर क्षेत्रसंन्यास ग्रहण किया। उसने शांत परिणामों से देह छोड़ी।
वसुदत्त (लक्ष्मण का जीव) हिरण आदि अनेक तिर्यञ्च पर्यायों में भटका । भटकते-भटकते जब उसका पाप क्षीण हो गया, तब वह मृणालकुण्ड नामक नगर में श्रीभूति नाम का ब्राह्मण बना। वह जैनधर्म श्रद्धानी था। मृणालकुण्ड नगर का राजा वज्रकुम्भ था। श्रीभूति ब्राह्मण उस राजा का राजपुरोहित बना।
श्रीकांत (रावण का जीव) हिरण आदि अनेक तिर्यञ्च पर्यायों में भटकता रहा। भटकते-भटकते जब उसका पाप क्षीण हो गया, तब वह मृणालकुण्ड नामक नगर में ही वज्रकुम्भ राजा का शम्भू नाम का बेटा बना।
हथिनी (सीता) का जीव श्रीभूति पुरोहित की वेदवती¹ नामकी बेटी के रूप में जन्मा। वेदवती सुंदर थी, पर वह मुनियों की हँसी करती थी, उन पर ताने कसती थी। श्रीभूति उसे ऐसा करने से मना करते थे, पर वह नहीं मानती थी।
एक बार मृणालकुण्ड नगर में सुदर्शन नाम के मुनिराज का संघ आया था। लोग उनके दर्शन के लिए जाते थे।
एक दिन वंदना कर उपदेश सुनकर लोग चले गए थे। संघ में मुनिराज की सगी बहन सुदर्शना थी। उसने भी भाई के साथ दीक्षा ली थी। सब लोगों के चले जाने पर सुदर्शना आर्यिका और सुदर्शन मुनिराज धर्मचर्चा कर रहे थे। वेदवती ने उनको परस्पर चर्चा करते हुए देखा था। अपने-आपको धर्मात्मा बताने वाली वेदवती ने लोगों से कहाः“आप लोग ऐसे साधु के अवश्य दर्शन करो और उन्हें अच्छा मानो, पर मैं न उनके दर्शन करूँगी और न उन्हें अच्छा बताऊँगी मैंने उन्हें एकान्त में एक सुंदर स्त्री के साथ बात करते हुए देखा है।
वेदवती की बातों पर कइयों ने विश्वास नहीं किया; पर कइयों ने विश्वास कर मुनिराज का अनादर किया। मुनिराज ने सोचा कि इस तरह धर्म का अपमान होता रहेगा तो लोग मुनियों पर, धर्म पर विश्वास करना छोड़ देंगे। धर्म से विमुख हो जाएंगे। इस समय उसका कारण मैं बनूंगा, यह सोच उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक यह अपवाद दूर नहीं होगा, तब तक आहार ग्रहण नहीं करूँगा। आहार के लिए नहीं निकलूंगा।
मुनिनिन्दा के तीव्र पाप से वेदवती का मुँह फूल गया। उसके शरीर में तीव्र पीड़ा होने लगी। नगर-देवता व्यंतर ने उसे बहुत डर दिखाया, तब वह मुनिराज के पास गई और उसने अपने अपराध के लिए सबके सामने क्षमा मांगी। सबके सामने उसने कहाः-
“मैंने मुनिराज को शक की निगाह से देखा और उन पर झूठा आरोप लगाया था। जिसका फल मुझे तुरन्त मिल गया, मेरा मुँह सूज गया, शरीर में पीड़ा रहने लगी। व्यंतर देव ने मुझे सच बात बताकर बहुत डराया। आप लोग मेरी बात को सत्य मानो, मुनिराज निर्दोष हैं। मैं ही गुनहगार हूँ, मुनिराज नहीं।
वेदवती ने मुनिराज से क्षमा मांगकर सबको मुनिराज के निर्दोष होने का विश्वास दिलाया।
मुनिराज ने वेदवती को क्षमा कराकर सबसे कहा- जिससे पापबंध होता हो ऐसा एक शब्द भी नहीं बोलना चाहिए।
दृष्टः सत्योऽपि दोषो न वाच्यो जिनमतश्रिता।
उच्चमानोऽपि चान्येन वार्यः सर्वप्रयत्नतः।।
- सीता का जीव है, पद्मपुराण में सीता के जीव की कहानी इस भव से प्राप्त होती है।
- सीता के जीव का दूसरा भव।
- सीता के जीव ने अनेक तिर्यञ्च आदि पर्यायें धारण कीं।
- सीता का जीव।
- सीता का जीव।
अर्थ- जिनमत के सच्चे श्रद्धानी को किसी का वास्तविक दोष दिखने पर भी उसे नहीं कहना चाहिए। कोई दूसरा उस दोष
को कह रहा हो तो उसे रोकने का प्रयत्न करना चाहिए।
ब्रुवाणो लोकविद्वेषकरणं शासनाश्रितम्।
प्रतिपद्य चिरं दुःखं संसारमवगाहते।।
अर्थ- लोक में वीतरागी जिन-शासन संबंधी, विद्वेष फैलानेवाले दोष को जो कहता है, वह दुःख पाकर संसार में भटकता है। इसलिए हे धर्मवत्सलजनों! दोष करने से एवं कहने से दूर ही रहो।
इसप्रकार सुदर्शन मुनिराज का उपदेश सुनकर प्रसन्न होकर सभी अपने-अपने घर की ओर शान्त मन से गए। मुनिराज भी अपने ध्यान में लीन हो गए।
पूर्व में भी वेदवती के पिता उसे समझाते थे, जब वह मुनियों की हँसी करती थी, तब उससे कहते थे कि बेटी! मुनि हम संसारियों से श्रेष्ठ होते हैं, उनकी हँसी नहीं करनी चाहिए। ये वीतरागी मुनि परमपूज्य होते हैं। हम रागियों को राग से मुक्त करानेवाले होते हैं। उन्हीं से धर्म चलता है। यदि ये न हों तो हमें कौन संबोधित करेगा? हमारे दुःख कौन हरेगा? इनकी हँसी के पाप के फल से जगत् में हम हँसी के पात्र बनते हैं। नरक निगोद आदि गतियों में भटकते हैं। उनकी भक्ति हमें संसार-समुद्र से पार लगाती है। इसलिए इनकी श्रद्धा करो, भक्ति करो, इन्हें आहार दो, इनकी वैयावृत्ति करो। इनके दर्शन भी दुर्लभ हैं, समागम तो और भी दुर्लभ है।
पूर्व में पिता के उपदेश के स्मरण से तथा प्रत्यक्ष में धर्मनिंदा का प्रत्यक्ष फल देखकर उसे सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। उसने श्राविका के व्रत लिए। देवगुरुधर्म के प्रति भक्तिमय रहने लगी।
वेदवती अनुपम सुंदरी थी। उसके सौंदर्य की चर्चा चारों ओर होने लगी थी, हर कोई उसे पाना चाहता था, उसे पाने में ही जीवन की सार्थकता समझ रहा था। अनेक राजकुमार भी उसके सौंदर्यजाल में फंसे हुए थे।
मृणालकुण्ड नगर का राजकुमार शम्भू उसे पाने के लिए बहुत लालायित था। पर श्रीभूति की प्रतिज्ञा थी किः“मिथ्यावासनावाला पुरुष भले ही धन में कुबेर के समान हो तो भी उसके लिए अपनी कन्या नहीं दूँगा। मैं अपनी कन्या देव शास्त्र गुरु के श्रद्धानी को ही दूँगा।
शम्भू को श्रीभूति की प्रतिज्ञा का पता चला, तब उसे बहुत गुस्सा आया। क्योंकि वह स्वयं मिथ्या-वासनावाला था।
वेदवती को पाने के लिए उसने रात में सोये हुए श्रीभूति पुरोहित को मारा। श्रीभूति प्रतिज्ञा एवं जिनधर्म के प्रभाव से देव हुआ।
शम्भू ने वेदवती का अपहरण किया। पिता को मारे जाने से वेदवती शम्भू पर बहुत क्रोधित थी ही अपहरण करने पर और भी क्रोधित हुई। शम्भू ने उसके साथ जबरदस्ती कर उसका आलिंगन चुंबन किया, तब क्रोध से लाल आँखोंवाली वेदवती ने शम्भू से कहा - अरे पापी, अरे नीच, नराधम? तुमने मेरे धर्मात्मा पिता को मारकर पहला महापाप किया है। इच्छा न होते हुए भी मेरे साथ जबरदस्ती कर दूसरा महापाप किया है। यद्यपि मेरे पिताजी परलोक चले गए, परंतु मैं उनकी इच्छा का मान रखूँगी, मिथ्या वासनावाले पुरुष को चाहने की अपेक्षा मर जाना पसंद करूँगी।
और सुन, तेरे विनाश का कारण मैं ही बनूँगी। इतना कहकर वेदवती आँखों में गुस्सा लिए वहाँ से चली गई। उसके गुस्से से डरा शम्भु उसे रोकने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
वेदवती ने वहाँ से निकलकर हरिकान्ता आर्यिका के पास दीक्षा ली। उसने बहुत कठोर तपश्चरण किया। तपश्चरण से उसका शरीर सूखकर कांटा हो गया। शरीर में मांस का नामो-निशान नहीं था। केवल हड्डियों का ढांचा रह गया था। ऐसा कठोर तपश्चरण कर समाधि के साथ मरण कर वह ब्रह्मस्वर्ग में देवी हुई। यहाँ उसका नाम अमृतमती था। ब्रह्मस्वर्ग में धनदत्त (राम) का जीव देव था, वह उसकी देवी बनी। स्वर्ग से आकर वह राजा चक्रध्वज की चित्तोत्सवा नाम की बेटी बनी।
मिथिला नगरी के राजा जनक की विदेहा नाम की एक सुंदर रानी थी। वह जब गर्भवती थी तब एक महाकाल नाम का देव उसके गर्भ में स्थित संतान के जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था।
वह देव इस तरह प्रतीक्षा क्यों, किसलिए कर रहा था? उसके पीछे उसके पूर्वजन्मों की कहानी है, जो इस प्रकार है- चक्रपुर नगर में चक्रध्वज राजा था। उसके चित्तोत्सवा नाम की कन्या थी। वह गुरु के घर पढ़ने जाती थी। वहीं राजपुरोहित का बेटा पिंगल भी जाता था। दोनों में प्रेम हुआ। प्रेम के कारण दोनों विद्या प्राप्त नहीं कर सके।
पिंगल चित्तोत्सवा को भगाकर बहुत दूर विदग्ध नाम के नगर में ले गया। जहाँ उन्हें कोई नहीं पहिचानता था, वहाँ झोपड़ी बनाकर रहने लगे। पिंगल मजदूरी करता, लकड़ियाँ बीनता, बेचता, इस तरह रोटी की व्यवस्था करता था। वे दोनों शांति से जीवन बीता रहे थे।
एक दिन विदग्ध नगर के राजा का बेटा कुण्डलमंडित घूमने निकला। जब वह नगर के बाहर गया, तब उसकी निगाह झोपड़ी के बाहर काम करती चित्तोत्सवा पर पड़ी। उसकी निगाहें उसी पर टिकी रहीं। वह उसकी सुंदरता से काम के पांचों बाणों से घायल हो गया था। उसने एक विश्वस्त दासी को धन का लोभ देकर उसके पास भेजा। और कहा कि किसी भी प्रकार से, कैसे भी हो, उसे ले आओ, नहीं तो मैं उसके बिना जी नहीं पाऊँगा।
दासी बडी चालाक थी, उसने उसे झूठीं, मीठीं बातों में फंसा कर राजमहल में लाकर कुण्डलमंडित को सौंपा।
थके हारे पिंगल ने घर आकर चित्तोत्सवा को नहीं देखा, तब उसने उसे कई जगह ढूंढा। नहीं मिली, तब वह कुण्डलमंडित राजकुमार के पास सहायता के लिए गया। उसने राजकुमार से कहा-मेरी स्त्री का अपहरण हुआ है, आप मेरी सहायता कीजिए-यह कहता हुआ वह उसके चरणों पर गिरा, गिड़गिड़ाया, राजकुमार ने इशारे से एक धूर्त मंत्री को बुलाकर कहा- देरी मत करो, इसकी स्त्री को ढूंढकर लाओ। मंत्री उसके ईशारे को समझ गया। उसने तुरंत झूठ ही कहा- मैंने इसकी स्त्री को पोदनपुर के रास्ते पर आर्यिकाओं के समूह में देखा है। शायद वह दीक्षा लेने गई है।
पिंगल ने कहा- अरे पुरुष जल्दी कर, जा उसे लौटा ला, नहीं तो उसकी दीक्षा के बाद तेरे प्रयास व्यर्थ हो जायेंगे। वह तुरंत तेज भागता -भागता पोदनपुर के रास्ते गया। उसने वहाँ पर, वनों, उपवनों, मंदिरों में सभी जगह उसे ढूंढा, परंतु वह होती तो मिलती?
थका हारा, निराश पिंगल राजकुमार के पास पुनः अपनी फरियाद लेकर आया, पर राजकुमार स्वयं अन्यायी था, उससे न्याय की क्या आशा रखें? पिंगल से स्वयं को परेशान समझकर कुण्डलमण्डित ने उसे दूर भगाने की आज्ञा दी, लोगों ने उसे लातों, डंडों से पीटते हुए बहुत दूर भगा दिया। वहाँ से निकल कर पैर जिस रास्ते पर ले जाते, या रास्ता उसे जिधर ले जाता, उधर चलता रहा। भीख में मिले भोजन से पेट भरता। मन में बेहद निराशा लिए वह भटकता रहा।
एक दिन पुण्योदय से उसे आर्यगुप्त नाम के आचार्य के दर्शन हुए। उसने आचार्यश्री के दर्शन बड़ी विनय के साथ किए, उनसे शांति का मार्ग पूछा। आचार्यश्री ने कहा-शांति का उपाय एकमात्र संयम है- इसलिए शांति चाहते हो तो संयम धारण करो। यह सुनकर उन्हीं से तुरंत दीक्षा ली, वह धर्म के मार्ग पर आया।
सो ठीक ही है, क्योंकि दुःखी दरिद्री, भाई बन्धुओं से रहित, रोग से पीड़ित मनुष्यों की बुद्धि ही प्रायः धर्म में लगती है, यही कहा है- दुःखितानां दरिद्राणां वर्जितानां च बान्धवैः।
व्याधिसंपीडितानां च प्रायः भवति धर्मधीः ।।
दीक्षा के बाद पिंगल मुनि ने बहुत ही कठोर तप तो किया, परंतु मन के किसी कोने में चित्तोत्सवा बैठी ही रही, यदा-कदा उन्हें उसकी याद आती रहती थी। इसलिए वह कर्मों की विशेष निर्जरा नहीं कर पाये, सिर्फ कुछ पुण्य बाँध पाये, जिसके कारण वे महाकाल नाम का तेजस्वी असुर बने। अपने अवधिज्ञान से उन्होंने जान लिया था कि इस समय उनकी पूर्व प्रिया चित्तोत्सवा और शत्रु कुण्डलमंडित का जीव कहाँ हैं?
उधर कुण्डलमंडित चित्तोत्सवा में आसक्त हो गया था, उसे उसके शत्रु राजा अनरण्य के सेनापति ने युद्ध में अनायास ही हराया था। कुंडलमंडित भटकता भटकता जंगल में मुनिसंघ में धर्म का स्वरूप सुनकर अणुव्रती श्रावक बना। महापराक्रमी मामा शत्रुओं को हराने में उसकी सहायता अवश्य करेंगे - यह सोचता हुआ, मामा के नगर की ओर जा रहा था, पूर्व पापकर्म के उदय से उसके शरीर में भयंकर रोग उत्पन्न हुए। शरीर की संधियाँ तेज़ी से गल गईं, नाजुक अंगों में भारी दर्द होने लगा। परंतु उसने परिणामों की शांति नहीं छोड़ी, मरकर देव पर्याय के बाद इस समय जनक की पत्नी विदेहा के गर्भ में पुत्र के रूप में था।
चित्तोत्सवा धर्म में मन लगाकर मरकर स्वर्ग गई थी, वह जीव भी उसी समय स्वर्ग से निकलकर विदेहा के गर्भ में कुण्डलमंडित के जीव के साथ पुत्री के रूप में था।
पिंगल का जीव जो इस समय महाकाल नाम का तेजस्वी असुर बना था। अपने पूर्व जन्म के शत्रु का बदला लेने के लिए उसके जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने विचार किया कि यदि उसे गर्भ में ही मारता हूँ तो रानी विदेहा भी मर जाएगी। दो गर्भ को धारण करनेवाली रानी को मारने में मेरा क्या प्रयोजन? इसलिए वह उनके जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था।
समय पर विदेहा ने एक पुत्र¹ और एक पुत्री² को जन्म दिया। जन्म होते ही महाकाल असुर ने विचार किया कि मुझे दुष्टा चित्तोत्सवा के जीव से भी क्या प्रयोजन? मात्र पुत्र को भारी दुःख पहुँचाऊँगा, यह सोचकर वह मात्र पुत्र को उठाकर आकाश की ओर दूर ले गया। उसने विचार किया कि इसे पत्थर पर पछाड़ कर मार डालूँ ? लेकिन तुरन्त ही उसके विचार बदल गए- उसने सोचा-बुद्धिमान् को संसार बढ़ानेवाले काम नहीं करने चाहिए। पूर्व जन्म में मैंने मुनिभेष में तपरूपी कवच धारण करते हुए तिनके को भी दुःख नहीं पहुँचाया। तप के कारण आज दिव्यकांतिवाले शरीर को पाया है। इकट्ठा किया हुआ थोड़ा-सा पाप भी बहुत विस्तार को प्राप्त होता है। इन विचारों से उसके मन में बालक के प्रति दया उत्पन्न हुई, उसने मारने का विचार छोड़ दिया। बालक के कान में दिव्य कुंडल पहिनाकर उस बालक को पर्णलघ्वी विद्या के द्वारा धीरे से छोड़, वहाँ से चला गया।
- कुण्डलमण्डित का जीव।
- पूर्व की चित्तोत्सवा का जीव।
पर्णलघ्वी विद्या के कारण बालक धीरे-धीरे धरती की ओर आ रहा था, उसी समय वहाँ से चंद्रगति नाम का एक निःसंतान विद्याधर जा रहा था। उसने बालक को देखा। उसने बालक को अधर में ही पकड़ कर उसे लेकर घर पर सोई हुई पत्नी के पास रखा। उसे जगाकर कहा देख, तेरे पुत्र हुआ है। तू बेकार ही कहती रहती थी कि मैं निःसंतान हूँ। उसकी पत्नी ने कहा- हे देव, मुझ दुःखियारी को झूठ कहकर क्यों और दुःखी कर रहे हो? नहीं देवी, मेरा यह आशय नहीं है, मैं आपको दुःखी नहीं कर रहा हूँ। कई महिलाओं के गुप्त गर्भ रहता है। आपके भी गुप्तगर्भ रहा है। हे देव, झूठी तसल्ली से स्थायी समाधान नहीं होता। हे प्रिय, मैं तो वन्ध्या हूँ, मेरे पुत्र कैसे हो सकता है? हे देव, यह बालक मेरा ही सही पर यह तो बताओ कि इसके कान में ये दिव्यकुण्डल कहाँ से आये?
असहाय निरुत्तर होकर चंद्रधर विद्याधर ने बालक की सारी हकीकत बता दी। उन्होंने उसके जन्म का बड़ा उत्सव मनाया।
कानों के दिव्यकुण्डलों की आभा से उसका शरीर दमक रहा था, इसलिए उसका नाम भामण्डल रखा।
पुत्र के अपहरण से विदेहा को बहुत शोक हुआ। जिस प्रकार पश्चिम दिशा में सूर्य अस्त हो जाता है, सिर्फ़ संध्या रह जाती है, उसी प्रकार उसका पुत्र कहीं अस्त हो गया था, सिर्फ़ पुत्री रह गई थी, उसने पूर्व जन्मों में किसी के पुत्र का वियोग कराया होगा, उसी कर्म की परिणति सामने आयी थी। उसी ने फल दिखाया था। क्योंकि बिना बीज के पेड़ नहीं होता, वैसे ही बिना कारण कार्य नहीं होता।
अनेक आशंकाओं के साथ उसने बहुत दुःख किया। तब जनक ने इन शब्दों से उसे तसल्ली दिलायी कि आपको पुत्र के दर्शन अवश्य होंगे। उसे खोजने के हम प्रयास करेंगे। इच्छित वस्तु पूर्व कर्म के प्रभाव से अभी दिखती है, कभी नहीं दिखती है, पुनः दिखने लगती है। इसलिए पाप का कारणभूत शोक बन्द कीजिए, मन में शांति रखिए।
सबके लाड़प्यार के साथ बड़ी होनेवाली बालिका को पृथ्वी की समानता के कारण लोग सीता कहने लगे। वह सर्वांग सुन्दरी कब बड़ी हुई, पता ही नहीं चला।
राजा जनक ने सीता का विवाह राम के साथ करना निश्चित किया था। इस तरह के निर्णय के पीछे की कहानी इसप्रकार है-
विजयार्ध पर्वत के दक्षिण और कैलाश पर्वत के मध्य में अर्धवर्वर नाम का देश है। जिसमें असंयमी म्लेच्छ रहते थे। देश की राजधानी मयूरमाल थी। वहाँ का राजा आन्तरंगतम था। वह अनेक आर्य देशों को जीतता हुआ जनक के देश मिथिला तक आया था। जनक ने परस्पर मित्रता होने के नाते दशरथ से सहायता पाने के लिए दूत के द्वारा कहलवाया-
“हमारा देश म्लेच्छ राजा आन्तरंगतम की सेना से घिर चुका है। यह राजा अनेक आर्य देशों को म्लेच्छ बनाता हुआ समस्त प्रजा को म्लेच्छ बनाने के लिए आया हुआ है। जब प्रजा नष्ट या भ्रष्ट हो जाए तो हम किसलिए जीवित रहें? तथा प्रजा म्लेच्छ होने पर धर्म नष्ट हो जाएगा। यह कठिन दिख रहा है कि हम अपना जीवन देकर भी धर्म की रक्षा कर पाएंगे, अतः आपसे सहायता की अपेक्षा है। राजा के आश्रय से धर्म टिकता है, बढ़ता है, धर्मरक्षा से राजा को धर्म का छठा भाग प्राप्त होता है। कहा भी है-
यस्य देशं समाश्रित्य साधवः कुर्वते तपः।
षष्ठमंशं नृपस्तस्य लभते परिपालनात् ।।
अर्थ- जिस देश का आश्रय पाकर साधुजन तपश्चरण करते हैं, उनकी रक्षा के कारण राजा तप का छठा भाग प्राप्त करता है।
राजा दशरथ ने राम को बुलाकर कहा कि हम सेना के साथ हमारे मित्र जनक की सहायता के लिए जा रहे हैं। हमारे आने तक आप राज्य का कार्य देखिए। तब राम ने कहा- आप यहाँ रहिए, मैं अकेला जाकर जीतकर आऊंगा।
दशरथ ने कहा- हे पद्म (राम)? अभी तुम बालक हो। राम ने जवाब दिया- छोटा अग्निकण बड़े वन को जला देता है, बाल भास्कर अकेला ही घोर अन्धकार को नष्ट कर नक्षत्रों की कांति फींकी कर देता है। सेना से क्या प्रयोजन है? मैं अकेला ही उन म्लेच्छों को नष्ट करके आता हूँ।
पिता माता का आशीर्वाद लेकर, राम अकेले ही जनक के पास गए। लक्ष्मण से रहा नहीं गया तो वे भी राम के साथ गए थे। दोनों ओर से युद्ध हुआ। जनक के भाई कनक को शत्रु सेना ने घेर लिया था, तब राम ने शत्रुसेना को अपने पराक्रम से परास्त कर कनक को बचाया, जनक को युद्ध में जीत दिलायी।
जनक ने युद्ध में सहायता के बदले में सीता का विवाह राम के साथ करना तय किया था।
सीता का राम से विवाह तय होने का समाचार सुनकर सीता को देखने की इच्छा से नारद सीता के महल पहुँचा। उस समय सीता दर्पण में अपने रूप को निहार रही थी। दर्पण में अचानक जटाओं के कारण भीषण दिखने वाले नारद के विकराल से रूप को देखकर डर गई। उसके मुँह से चीख निकल गई। उसकी चीख सुनकर रक्षक स्त्रियाँ आईं। थोड़ी ही देर में सैनिक भी आ गए। नारद डर गया। घबरा गया। वह जैसे-तैसे जान बचाकर वहाँ से भाग कर कैलाश पर्वत पर गया। वहाँ भी वह कांप रहा था। जब वह शांत हुआ, तब उसने अपने अपमान का बदला लेने की सोची।
नारद ने सीता का सुंदर चित्र बनाया। उसे लेकर रथनूपुर नगर गया। वहाँ एक सुंदर उद्यान में ऊँचे स्थान पर उस चित्र को रखकर पास ही छिप गया। एक दिन भामण्डल वहाँ गया था। चित्र को देखकर कामभावना से इतना व्याकुल हो गया कि लज्जा आदि सबको भूल गया। उसकी ऐसी हालत देखकर नारद उसके सामने आया। नारद से चित्र में चित्रित सुंदरी के विषय में पूछा। नारद ने उसका सारा परिचय बता दिया।
चन्द्रगति विद्याधर ने पुत्र की स्थिति देखकर उसका विवाह सीता से कराने का संदेश देकर एक दूत को जनक के पास भेजा और जनक को लाने के लिए कहा।
वह दूत घोड़े का मायामयी रूप बनाकर जनक को पीठ पर रखकर चन्द्रगति के पास लाया। चन्द्रगति ने अपना परिचय देकर पुत्र के लिए सीता की मांग की। जनक ने कहा- कि मैं आपकी यह इच्छा पूरी नहीं कर सकता। क्योंकि मैं राम के साथ सीता के विवाह का वचन दशरथ को दे चुका हूँ। उसके पीछे की कहानी चंद्रागति विद्याधर को सुनायी।
चंद्रागति विद्याधर ने कहा- आप उस सम्बन्ध को तोड़ कर पुत्री हमारे पुत्र को दीजिए। क्योंकि राम भूमिगोचरी सामान्य मनुष्य है। हम विद्याओं के मालिक श्रेष्ठ विद्याधर मनुष्य हैं। वे हमारी बराबरी नहीं कर सकते।
जनक ने कहा- भूमिगोचरी सामान्य मनुष्य नहीं होते हैं। जगद् उद्धारक तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, बलभद्र जैसे महापुरुष जिनमें उत्पन्न होते हैं, ऐसे भूमिगोचरी, सामान्य मनुष्य कैसे हो सकते हैं? पूर्णसंयम भूमिगोचरियों के ही होता है। विद्याधर भी विद्या का त्याग करने पर ही पूर्णसंयम ग्रहण कर सकता है। अतः मेरी दृष्टि में भूमिगोचरी विद्याधरों से श्रेष्ठ होते हैं।
भूमिगोचरी मनुष्य संयम के द्वारा इन्द्र को भी चरणों पर नमवाता है, तब उसके सामने विद्याधर क्या है? चन्द्रगति ने विचार करके जनक से कहा- हे राजन्, यदि ऐसा है, आप उनकी इतनी प्रशंसा कर रहे तो मेरी एक शर्त सुनोहमारे पास वज्रावर्त और सागरावर्त दो धनुष हैं। इनकी रक्षा देव
करते हैं। राम और लक्ष्मण इन पर डोरी चढा देंगे तो हम जानेंगे कि उनमें शक्ति है, तब आप अपनी पुत्री राम को दीजिए। हम कुछ नहीं कहेंगे, परंतु यदि वे ऐसा नहीं कर पाए तो हम आपकी पुत्री जबरदस्ती ले आएंगे।
जनक ने कहा- ठीक है।
चन्द्रगति विद्याधर स्वयं अनेक विद्याधर राजाओं के साथ उन धनुषों को लेकर मिथिला आए। साथ में जनक भी थे। जो धनुषों की विशालता देखकर घबराए हुए थे।
धनुष को उचित स्थान पर रखवाया गया। राम लक्ष्मण को घटना की जानकारी के साथ निमंत्रण देकर बुलाया गया। अन्य अनेक राजाओं को भी निमंत्रित किया, धनुषों पर डोरी बांधने को स्वयंवर की शर्त का रूप दिया गया। सीता के सौंदर्य की चर्चा चारों ओर फैली हुई थी, अतः दूर-दूर से अनेक राजा आए थे।
स्वयंवर शुरू हुआ। राजाओं ने प्रयास किए। कोई भी धनुषों पर ड़ोरी चढाने में सफल नहीं हुआ। धनुष पर ड़ोरी चढाना तो बहुत दूर, कोई उन्हें छू भी नहीं पाया, क्योंकि जब भी कोई उनके पास जाता, उनकी तेज रोशनी से आँखें चौंधियाती थीं। राजा के पास आते ही वे अग्नि छोड़ते थे।
सब राजाओं के बाद राम की बारी आयी, तब राम के पास आते ही धनुष से निकलने वाली अग्नि राम के पुण्योदय से शांत हुई। बिना विशेष प्रयास के राम ने डोरी चढा दी। धनुष उठा लिया और उस पर बाण चढाकर विद्याधरों की ओर देखने लगे। तब डरे हुए विद्याधरों ने राम, लक्ष्मण से क्षमा मांगकर उनकी अधीनता स्वीकार की। चन्द्रगति विद्याधर ने अपनी अठारह कन्याएं लक्ष्मण को देना स्वीकार किया।
सीता का बड़े ठाठ-बाट से राम से विवाह सम्पन्न हुआ। विद्याधर अपने देश लौट गए।
चन्द्रगति विद्याधर ने अपने पुत्र भामण्डल को स्वयंवर के समाचार सुनाए। भामण्डल ने कहा आपका विद्याधर होना व्यर्थ है, क्योंकि आप साधारण भूमिगोचरी से परास्त होकर आए हो, मैं स्वयं जाकर युद्ध करूँगा युद्ध में भूमिगोचरियों को जीतकर सीता को लेकर आऊँगा। यह कहकर वह मिथिला की ओर चल दिया।
जब वह आकाश मार्ग से आ रहा था। तब उसकी नजर विदग्ध नगर की ओर गई। उसे “उस नगर को देखकर “मैंने पहले कभी उसे देखा है”-ऐसा लगा। उसने बुद्धि पर और जोर दिया, तब उसे जातिस्मरण ज्ञान हो गया। वह पूर्व घटनाओं को याद कर बेहोश हुआ। साथी उसे बेहोश हालत में चंद्रगति के पास ले गए। उपचार के बाद होश आया। तब चंद्रगति के पूछने पर उसने कहा- पिताजी, मुझे धिक्कार है, इस संसार को धिक्कार है, जिसमें
अज्ञानता में यह प्राणी न जाने क्या क्या पाप करता है? मुझे ही देख लीजिए- मैं अज्ञानता में क्या कर रहा था- जो मेरे साथ, एक साथ एक ही माँ के गर्भ में रही, ऐसी सगी बहन को पत्नी के भाव से देख रहा था। साथ ही उसने पूर्वजन्म की सारी घटनाएँ भी बता दीं और इस जन्म की भी। उसे बहुत ही आत्मग्लानि हुई।
चन्द्रगति ने संसार की विचित्रता देखकर मुनि सर्वभूतहित, जो उस समय अयोध्या के पास स्थित महेन्द्रोदय नामक उद्यान में थे। उनके पास जाकर दीक्षा ली। साथ में भामण्डल आदि अनेक विद्याधर थे, उन्होंने मुनि के नाम से ऊंची आवाज में जयकारे लगाए। वे जयकारे अयोध्यावासियों को आश्चर्य उत्पन्न कर रहे थे, भामण्डल ने ‘श्रीराम जयवन्त रहें’ ऐसा बार-बार उदघोष किया और ‘कनक जिनका बड़ा भाई है, ऐसे जनक का मैं पुत्र हूँ’ इन शब्दों में अपना परिचय दिया।
महल में सीता के कानों में ये शब्द पड़े।तब सीता भाई को यादकर जोर-जोर से रोने लगी, तब सांत्वना देते हुए राम ने कहा- चतुर व्यक्ति मरे हुए, हारे हुए, खोए हुए व्यक्ति का शोक नहीं करते। यदि यह आपका वही खोया हुआ भाई है तो अभी जाकर देखते हैं, हाथ कंगन को आरसी क्या?
राम, सीता, दशरथ आदि सारा राजपरिवार एवं अनेक अयोध्यावासी मुनि के दर्शन के लिए आए, जहाँ पहले से ही अनेक विद्याधर राजा अपने विशाल समुदाय के साथ विराजमान थे। इतनी अधिक संख्या में विद्याधरों को देखकर सबको आश्चर्य हुआ। धीरे-धीरे सभी को चंद्रगति विद्याधर के वैराग्य और मुनि बनने के समाचार का पता चला।
राजा दशरथ मुनिराजों को नमस्कार कर एक ओर बैठ गए और समस्त घटना का मूल पूछा। तब मुनि सर्वभूतहित ने अवधिज्ञान के द्वारा सीता, भामण्डल के पूर्वभव और वर्तमान जीवन की घटनाएँ बतायीं।
भुजाएँ ऊपर उठाए दौड़ती हुई सीता बिछुड़े हुए भाई के गले से ऐसे लिपटी, जैसे आत्मा शरीर में लिपटी रहती है। “हे भाई, मैं तुम्हें पहली बार देख रही हूँ, हे भाई, आपने मुझे, माँ, पिताजी को आज कितना सुख पहुँचाया है, इसे हम शब्दों से बता नहीं पाएँगे”- ऐसे शब्दों से मिलन में गाढापन लिए बार-बार गले मिली, उसके माथे को चूमा। भामण्डल ने कहा-बहन मैं भी अपनी खुशी को शब्दों से कह नहीं सकूँगा। बस, इतना समझो कि मुझे खुशियों से भरा नया जीवन मिला है।
गले मिलते हुए न केवल भाई-बहन की, बल्कि इस मिलन को देखनेवाले हर व्यक्ति की आँखें खुशियों के आँसुओं से नम थीं। मुनि को नमस्कार कर राजा दशरथ अयोध्या लौट आए। उन्होंने भामण्डल के मिलने का समाचार जनक तक पहुंचाया।
जनक पत्नी विदेहा के साथ अयोध्या आए। भामण्डल के मिलने की खुशी में राजा दशरथ ने अयोध्या में महा-उत्सव मनाया।
कुछ दिनों के बाद भामण्डल सबसे आज्ञा लेकर अपने देश चला गया। पुण्य का उदय हो तो क्या नहीं हो सकता? जिसका स्वप्न में भी नहीं सोचा ऐसे पुत्र भामण्डल का मिलन जनक,
विदेहा, सीता से हुआ। सच है- पुण्येन लभ्यते सौख्यमपुण्येन च दुःखिताः।
कर्मणामुचितं लोकः सर्वफलमुपाश्नुते।।
अर्थ- संसार में प्राणी पुण्य से सुख पाता है, पाप से दुःखी होता है। सभी प्राणी अपने कर्मों के अनुरूप ही सब प्रकार के फल प्राप्त करते हैं।
राजा दशरथ सर्वभूतहित मुनि के पास गए। उनसे धर्म और पूर्वभव के बारे में पूछा। सर्वभूतहित मुनि से अपने पूर्वभव को सुनने के बाद से संसार से उदास हुए। सम्यक्त्व भाव ही उत्कृष्ट है, निर्मलभाव ही मुक्ति का मार्ग है- उसे आज मैंने पाया है- यह कहकर उन्होंने कुटुम्बीजनों से कहा मुझे दीक्षा की आज्ञा दीजिए।
सर्वभूतहित मुनि के पास भरत ने भी धर्म का उपदेश सुना था, उसे भी वैराग्य हुआ था। वह मन में सोचने लगा। पिताजी राजा हैं, उन्हें तो राज्यभार सौंप कर जाने की वजह से सब से आज्ञा लेनी पड़ रही है, पर मैं तो इस भार से मुक्त हूँ। मुझे किससे क्या पूछना? मैं अभी दीक्षा लेता हूँ।
भरत के भावों को चेहरे की आकृति से समझ गयी, ऐसी कैकेयी भरत के पास ही खड़ी थी। भरत अभी दीक्षा ले सकता है, इधर पति दीक्षा लेकर जा रहे हैं, उधर पुत्र भी दीक्षा लेगा- दो-दो सदमे एक साथ कैसे सहन कर पाऊँगी? यह सोच वह तुरंत दशरथ के पास गई और कहा- हे प्राणनाथ! स्नेह का बन्धन बड़ा कष्टकारी है, धातु से बनी बेड़ी से बंधा मनुष्य शनैः-शनैः मीलों तक दूर जा सकता है, पर स्नेह के बंधन से बंधा एक कदम भी नहीं चल पाता। आप भाग्यवान् हैं, जो इस बंधन से मुक्त हो रहे हैं। पर मैं इस बंधन में सिर से पैर तक जकड़ी हुई हूँ। इस समय उस बंधन को तोड़ने में असमर्थ हूँ।
मैं आप से कहती हूँ कि इन्द्र के समान भोगों से पालित आपका यह शरीर भगवान् के द्वारा कही हुई अत्यन्त कठिन दीक्षा, संयम को कैसे निभा पाएगा? इसलिए आप घर में रहकर ही श्रावकधर्म का पालन कीजिए। इससे आप हमारे सामने रहेंगे और आपका धर्मपालन भी होगा।
दशरथ बोले- अरे प्रिये, समर्थ के लिए क्या कठिन और क्या आसान? शरीर को तो जैसा रखोगे, वैसा रहेगा, वह तो जड़ है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। दीक्षा, संयम भाग्यवन्तों को प्राप्त होते हैं। संयम इन्द्र को भी चरणों पर झुकाता है। संयम नहीं ले पाने के कारण इन्द्र फूट फूट कर रोता है और सोचता है कि “मैं संयम नहीं ले पाता हूँ, व्यर्थ है मेरा वैभव और स्वर्ग का राजपद”, मैं इसीलिए दीक्षा के विचार को सर्वोत्तम मानता हूँ, उस अवसर को धन्य घड़ी मानता हूँ। आप हमारे संयम की अनुमोदना करो।
अनुमोदना से भी उतना ही पुण्यलाभ होता है, जितना उसको ग्रहण करने से होता है। इसलिए संयम और संयमधारियों की सदा अनुमोदना करो।
कैकेयी ने सोचा प्राणनाथ नहीं मानेंगे। पुत्र के लिए ही प्रयास करूँ। यह सोचकर उसने दशरथ से कहा-आपको याद है मेरा वचन आपके पास सुरक्षित है, सो मैं आज आपसे निवेदन करती हूँ कि मेरे पुत्र भरत को राज्य दीजिए, वरना वह भी आपके समान दीक्षा लेकर चला जाएगा।
दशरथ ने कहा- इसमें कौनसी कठिनाई है। मैंने उसे राज्य दे दिया। उसके राज्याभिषेक की तैयारी कीजिए। फिर राम को बुलाकर कहा- हे वत्स! एक बार युद्धकला की जानकार कैकेयी ने जब मैं संकट में फंसा था, प्राण बचने की संभावना नहीं बची थी, तब उसने सारथी का काम बखूबी निभाकर मेरे प्राण बचाये थे। उस समय सभी राजाओं के सामने मैंने कहा था- हे प्रिये! युद्ध में आप ने हमारे प्राण बचाए, उसके बदले आप जो इच्छा हो मांगिए, मैं आपको दूँगा। तब तो उसने कुछ नहीं माँगा, सिर्फ यह कहा कि यह वचन आपके पास धरोहर की तरह सुरक्षित रखिए, किसी समय मांग लूँगी।
आज उसने भरत के लिए राज्य माँगा है। आप समझदार हो, मैं क्या कहूँ? मैं दीक्षा के लिए जा रहा हूँ। यह कहकर दशरथ तो दीक्षा हेतु चले गए।
राम सोचने लगे कि मेरे रहते हुए भरत निश्चिंत होकर राज्यभार संभाल नहीं पाएगा। इसलिए उन्होंने राज्य की सीमा से बहुत दूर जाने का निर्णय किया।
भरत को जब ये समाचार मिले कि उसे राज्य संभालना है, तब उसने मना किया। राम ने उसे समझाया कि इसमें पिताजी की बदनामी होगी। पिता की आज्ञा नहीं पालने का आपको दोष लगेगा। माँ की इच्छा का अपमान होगा, घर रहकर भी श्रावकधर्म का पालन कर सकते हो, समय आने पर दीक्षा भी लीजिए।
राम के गंभीर शब्दों से भरत निरुत्तर हो राज्य संभालने के लिए तैयार हो गए, पर बेमन से।
राम के राज्य से दूर जाने के समाचार आग की तरह चारों ओर फैल गए। सब राम के महल की ओर राम को मनाने के लिए भागे-भागे आ गए। लक्ष्मण सबसे पहले आकर राम को मनवाकर उनके साथ जाने की तैयारी कर रहे थे। सीता भी राम के साथ जाने के लिए जिद कर रही थी, तब राम ने उसे खूब मना किया। कहा- हे प्रिये, तुम यहीं पर सुख से रहो।
सीता- हे स्वामी आपके बिना यहाँ सुख कहाँ है ?
राम- हे सीते, जहाँ मैं जा रहा हूँ, वहाँ पृथ्वी पत्थरों से भरी है। सीता- पर आपका वियोग पत्थरों से भी भारी है। राम- वहाँ भोजन पानी का ठिकाना नहीं।
सीता- यहाँ आपके बिना जीवन का ठिकाना नहीं । भोजन पानी तो पुण्याधीन होते हैं।
राम- वहाँ सर पर छत नहीं होगी।
सीता- आप का साथ हो तो सर पर छत की क्या आवश्यकता है?
आप ही मेरी छत हो, आपके संग में शांति तो रहेगी। राम- जंगल विकराल होते हैं, जिनमें सुख खोजने पर भी नहीं मिलता। सीता- आपके संग के अलावा मुझे अन्य सुख की इच्छा नहीं है।
जीव ने नरकों में अनंत बार जंगल से अनंत गुना ज्यादा यातनाएं भोगी हैं, उनके सामने जंगल की विकरालता कुछ भी नहीं है। राम- अच्छा, मैं हारा, आप चलिए।
सीता- आप हारे नहीं, आप तो मेरे (कण्ठ के) हार हो। मैं आपकी कभी भी हार नहीं चाहती, सदा जीत ही चाहती हूँ।
राम, सीता, लक्ष्मण जाने लगे, तब सभी माताएं उनको रोक रही थीं, तब राम ने उन्हें पिता की आज्ञापालन नहीं करने से होनेवाली बात के बारे में समझाया और समझाया कि हमारे रहते भरत ठीक से राज्य सँभाल नहीं पाएंगे। हमारे जाने में भरत और प्रजा दोनों का हित है।
कौशल्या के भारी अनुरोध को यह कहकर दूर किया कि जब मैं रहने का ठिकाना निश्चित करूंगा, तब आपको वहाँ अवश्य ले जाऊँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है।
राम, लक्ष्मण, सीता माँओं को प्रणाम कर वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर आधी रात को निकल गए और उस रात राजधानी से बाहर बने मंदिर में ठहर गए। दूसरे दिन प्रातः सीता को बीच में रखकर यात्रा करते हुए वे परियात्रा नाम के जंगल में पहुँच गए। जिसके किनारे पर शर्वरी नदी थी। ऐसे जंगल और नदियाँ पार करते हुए उन्हें छह दिन बीत गए। तब भरत, जिसका मन राज्य संभालने में नहीं लग रहा था, वह पहुँच गया। कैकेयी भी साथ थी, भरत ने कहा- आप चलिए, राज्य संभालिए। कैकेयी ने भी समर्थन किया। राम ने कहा- क्षत्रिय स्वीकृत किए कार्य से विमुख नहीं होते हैं। और भी अनेक शब्दों से उनको समझाकर राम ने भरत और कैकेयी को लौटाया। आगे बढ़ गए।
भरत का मन अयोध्या लौट आने पर बेचैन रहता था, भरत ने प्रतिज्ञा की कि राम को देखते ही वे दीक्षा लेंगे। जिनभक्ति से बढ़कर कोई पुण्यकार्य नहीं- यह समझकर वह रात-दिन जिन भक्ति में लीन रहते थे। न सूर्य, न चन्द्र की ओर देखते थे। अर्थात् वे भगवान् की भक्ति में इतना लीन रहते थे कि उन्हें न दिन का पता रहता था, न रात का।
इधर सीता, राम, लक्ष्मण क्रम-क्रम से चित्रकूट वन को पार कर अवन्ति देश में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक वीरान देश को देखा। उन्होंने सोचा इतना सुंदर प्रदेश होने पर भी मनुष्यों के बिना शोभा नहीं दे रहा है, क्या कारण है कि यह देश वीरान है?
सीता थकी हुई थी, भूख-प्यास से व्याकुल हो रही थी।
राम ने लक्ष्मण से कहा- भाई तेरी भाभी बहुत थकी हुई है, भोजनपानी की व्यवस्था करो।
ठीक है, कहकर लक्ष्मण एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ इधर-उधर बस्ती देखने लगे। उन्हें उनकी ओर आता हुआ एक दीन-हीन मनुष्य दिखाई दिया। लक्ष्मण पेड़ से उतर कर उसके पास गए, उसे लेकर राम के पास आए। राम ने उसे पूछा यह प्रदेश वीरान क्यों है?
तब उसने कहा- सिंहोदर नाम का राजा उज्जयिनी में राज करता है। यह प्रदेश उसी के राज्य में है। उसके अधीन रहनेवाला यहाँ का राजा वज्रकर्ण था। वह जन्म से क्रूर स्वभाववाला था, पाप कार्यों में आनंद मानता था। वह शिकार का व्यसनी था।
एक बार शिकार के लिए घने जंगल में गया। वहाँ कनेर वन के बीच में उसने मुनि को देखा। वे पक्षी के समान निशंक व सिंह के समान निर्भय थे। वज्रकर्ण ने मुनि से पूछा- हे साधो ! यह क्या कर रहे हो?
मुनि ने उत्तर दिया- जो पिछले सैकड़ों जन्मों में भी नहीं किया जा सका, ऐसे आत्मा के हित के कार्य को कर रहा हूँ।
वज्रकर्ण ने कहा- आपके पास सुख की सामग्री तो है नहीं, आत्मा का हित कैसे कर रहे हो?
मुनि ने उसे समझाया- आत्मा का हित करने के लिए सामग्री नहीं चाहिए, बल्कि सामग्री का त्याग चाहिए। आशा और मोह में पड़े हुए प्राणियों को सामग्री चाहिए। जिसकी आशा और मोह नष्ट हो जाते हैं, उसे सामग्री की आवश्यकता नहीं रहती। खाज़वाला ही शरीर को खुजाता है, जिसे खाज़ ही न हो, वह शरीर को क्यों कर खुजाएं? मोह और इच्छा को नष्ट करने में ही सच्चा आत्महित है।
आप हजारों प्राणियों का सिर्फ इसलिए घात करते हो, क्योंकि तुम्हें मांस चाहिए। पर सोचो तो सही कितनी ही माँए अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर चरने के लिए आती हैं, वे तुम्हारें शस्त्रों से मारी जाती हैं, बच्चे भूखे प्यासे तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। न जाने अब तक कितने परिवार आपने नष्ट कर दिए होंगे, उन्होंने आपका क्या बिगाड़ा था?
हितं करोत्यसौ स्वस्य भूतानां यो दयापरः।
दीक्षितो गृह्यातो वा बुधो निर्मलमानसः ॥
अर्थ- अहो, आत्मा का हित तो वह करता है, जो प्राणियों पर दया करने में तत्पर रहता हो, विवेकी हो, निर्मल भावों का धारक हो, चाहे वह मुनि हो या गृहस्थ हो।
मुनि ने उसे धर्म का स्वरूप समझाया। उस पर मुनि के उपदेश का ऐसा असर हुआ कि उसने उसी समय प्रतिज्ञा ली कि मैं देव, शास्त्र और मुनि को छोड़कर और किसी को नमस्कार नहीं करूंगा। सदा धर्म का पालन करूँगा- इस तरह धर्म के अनेक नियम लेकर वह घर गया।
सिंहोदर राजा को वज्रकर्ण राजा की प्रतिज्ञा का पता चला, तब मानी, अहंकारी सिंहोदर ने सोचा वज्रकर्ण से उसकी बहन को मांगता हूँ, बहनोई होने के नाते उसे मुझे नमस्कार करना ही पड़ेगा। वैसे भी मैं उसका स्वामी हूँ, उसे मुझे तो नमस्कार करना ही चाहिए। उसने दूत के द्वारा अपनी बात वज्रकर्ण तक पहुँचाई।
कहा - आप अपनी बहन देकर हमें नमस्कार करें, वरना सजा मिलेगी।
वज्रकर्ण ने मुनिसुव्रतनाथ भगवान् की प्रतिमा बनवाकर अंगूठी में जड़वाई। उसी को आगे कर उसने सिंहोदर को नमस्कार किया। सिंहोदर उस समय यह सोचकर संतुष्ट हुआ कि इसने मुझे नमस्कार किया।
परंतु यह बात ज्यादा दिन छिपी नहीं रही। एक चुगलखोर ने राजा सिंहोदर को वह बात बता दी। सिंहोदर ने उसे मारने का निश्चय करके किसी बहाने से अपने पास बुलाया था।
वज्रकर्ण को उसके मन की बात का पता नहीं था। वह भोले मन से कुछ सैनिकों के साथ सिंहोदर से मिलने के लिए जा रहा था। रास्ते में वज्रकर्ण को एक मनुष्य मिला। उसने कहा- सिंहोदर राजा को तुम्हारी अंगूठी में बनी प्रतिमा की बात पता
चली है: इसलिए वह आप पर क्रोधित हुआ है और तुम्हें मारने का निश्चय कर चुका है। आपको मरना हो तो भले ही उसके पास जाइए, नहीं तो यहीं से घर लौट जाइए।
वज्रकर्ण ने पूछा-तुम्हें कैसे पता चला?
तब उसने कहा- मेरा नाम विधुदंग है। मैं अच्छे सम्पन्न व्यापारी का बेटा हूँ।
मैं वहाँ उज्जयिनी में व्यापार के लिए गया था, वहाँ की कामलता नाम की वेश्या को देखकर सब कुछ भूल गया। उसकी सुंदरता से घायल हो गया। पिता की जीवनभर की कमाई मैंने छह महीने में उस पर खर्च कर दी।
एक दिन मैंने उसे कुण्डल लाकर दिए। उसकी सहेली ने कुण्ड़ल की तारीफ की, तब वह बोली कि ये कुण्डल कोई कुण्डल हैं। अरे कुण्डल तो वे हैं, जो सिंहोदर राजा की श्रीधरा रानी के कानों में हैं, जो सुंदर रत्नों से बने हुए हैं। मैंने उसकी यह बात छिपकर सुन ली थी। उसके रूप रूपी फूल का भँवरा मैं रात में रानी के कुण्डल चुराने के लिए गया था। राजा को नींद नहीं आ रही थी? तब उससे रानी ने कहा- आप सो जाइए।
तब उसने कहा- वज्रकर्ण ने मेरे साथ धोखा किया है, जब तक उसे नहीं मारूंगा, तब तक मुझे नींद नहीं आयेगी। कल उसे बुलाया है, उसे मारकर ही चैन की नींद सोऊँगा।
“आप सदा धर्म में लीन रहते हो, साधुओं की सेवा करते हो, धर्मात्मा हो- आप जैसे का जीवन बचाना चाहिए” - यही सोचकर मैं आपके ही पास आ रहा था। आप रास्ते में ही मिल गए। आगे आप को जो उचित लगे, वह कीजिए।
वज्रकर्ण वापस लौट गया।
सिंहोदर को इस बात का पता चला तो क्रोध से जलता हुआ वह बड़ी भारी सेना के साथ वज्रकर्ण पर आक्रमण के लिए आया। युद्ध में व्यर्थ ही जनहानि न हो इस भावना से वज्रकर्ण ने दूत के द्वारा सिंहोदर तक संदेश भेजा कि आप मेरा सब कुछ ले लीजिए, सिर्फ पत्नी के साथ मुझे धर्म के लिए छोड़ दीजिए। लेकिन सिंहोदर नहीं माना, उसने इस देश को आग लगाकर वीरान कर दिया। हम लोग भी भाग गए। मेरी पत्नी ने घर के घड़े में धन छिपाकर रक्खा था, पत्नी के कहने से उसे लेने के लिए जा रहा था।
उसकी दरिद्र दशा से दयार्द्र होकर राम ने उसे रत्नों से जड़ा हुआ सोने का हार दिया।
उसके जाने के बाद राम ने लक्ष्मण से पुनः कहा कि जाओ, सीता बहुत दुःखी हो रही है, कहीं से भोजन-पानी ले आओ।
लक्ष्मण गए। उन्हें सैनिकों की छावनी दिखी। उस ओर गए। सैनिकों ने उन्हें रोका। उस छावनी को छोड़कर लक्ष्मण दूसरी छावनी में गए। जिसमें वज्रकर्ण राजा था। वज्रकर्ण ने लक्ष्मण से पूछा यहाँ क्यों आए हो? तब लक्ष्मण ने कहा मैं बहुत दूर देश से आया हूँ, भूखा हूँ, भोजन की तलाश में आया हूँ।
वज्रकर्ण ने सेवकों को आदेश दिया कि मेरे लिए बना हुआ भोजन इन्हें कराओ। भोजन की मुझसे ज्यादा इन्हें आवश्यकता है।
लक्ष्मण ने कहा पास ही मेरे पूज्य बड़े भाई एवं माँ समान भाभी हैं, उन्हें भोजन कराकर ही खाऊँगा। इसलिए यह भोजन मैं उनके पास ले जाऊँगा।
वज्रकर्ण ने भोजन के अलावा और अन्य स्वादिष्ट पदार्थ लक्ष्मण को दिए। लक्ष्मण उसे लेकर राम, सीता के पास आए।
सबने भोजन किया। भोजन के बाद राम ने लक्ष्मण से कहा-ऐसे धर्मात्मा राजा की रक्षा करनी चाहिए।
लक्ष्मण सीधे सिंहोदर के पास गए। कहा- मैं राजा भरत का दूत हूँ। भरत राजा आपसे कहते हैं कि व्यर्थ बैर से क्या लाभ? और धर्मात्मा से बैर नहीं रखना चाहिए। राजा वज्रकर्ण धर्मात्मा हैं, उसके साथ बैरभाव छोड़ दीजिए। लक्ष्मण के कठोर शब्दों को सुनकर सिंहोदर को गुस्सा आया। उसने सैनिकों को उसे पकड़ने के लिए आदेश दिया।
लक्ष्मण ने सैनिकों को तितर-बितर कर सिंहोदर को पकड़कर बांधा, घसीटते हुए राम के पास ले आया। रास्ते भर रानियाँ सिंहोदर के जीवन की भीख मांगती रहीं, पर उसने कहा - मेरे बड़े भाई ही इसका निर्णय करेंगे।
सिंहोदर की पत्नियों ने सीता से कहा- आप स्त्री हो, हमारे दुःख को समझ सकती हो, हमें कुछ नहीं चाहिए, आप हमारे स्वामी के प्राणों की रक्षा कीजिए। सीता ने उनको आश्वासन दिया कि राम उन्हें अवश्य माफ करेंगे। मैं उन्हें जानती हूँ, आप सब निश्चिंत रहिए।
लक्ष्मण ने राम से पूछा- सिंहोदर का क्या करें? राम ने कहा- सिंहोदर वज्रकर्ण का अपराधी है, अतः वज्रकर्ण को बुलाकर उन्हीं से पूछो, क्या करना है?
वज्रकर्ण को बुलवाया। राम के पूछने पर वज्रकर्ण ने कहा- धर्म का आराधक होने से मैं यह नहीं चाहता कि तिनके को भी
पीड़ा हो, अतः सिंहोदर को न केवल जीवनदान, बल्कि सिंहोदर को सिंहोदर का राज्य दीजिए।
धर्मात्मा वज्रकर्ण की रक्षा कर के उसे उसका राज्य दिलाकर राम, लक्ष्मण, सीता अपनी यात्रा पर निकल गए।
कुछ दिनों की यात्रा के बाद वे विंध्याचल के घने जंगल में पहुँचे। उसे पार करके वे धीरे-धीरे तापी नदी के तट पर पहुँचे।
थके हारे वे वहाँ एक गृहस्थ के घर जलपान की आशा से गए। गृहस्थ की पत्नी ने जलपान दिया था, इतने में घर का स्वामी आया। आते ही उसने इनसे भला-बुरा कहना प्रारंभ कर दिया। तब सीता ने कहा- भूखे-प्यासे प्राण छोड़ना अच्छा है, पर ओछे लोगों के घर का कण भी स्वीकार करना अच्छा नहीं है। तब वे बिना खाए पिए, वहाँ से गए। पास के जंगल में एक घने छायादार पेड़ के नीचे ठहरे।
उस पेड़ पर इभकर्ण नाम का यक्ष रहता था, वह तुरंत अपने स्वामी पूतन नामक यक्ष के पास जाकर बोला कि- कोई तीन मानव, जिनमें एक महिला है, मेरे वृक्ष के आश्रय से ठहरे हैं, उनके पुण्य-प्रभाव से परास्त होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ।
पूतन यक्षराज ने अवधि-ज्ञान से जानकर कहा- ये अलौकिक धर्मात्मा हैं, उनकी सेवा करो। यक्षराज स्वयं आया। साथ में उसके सेवक आए थे। उसने एक दिव्य नगरी बसाकर एक सुन्दर महल में राम, सीता, लक्ष्मण को ठहराया। उस नगरी का नाम रामपुरी रखा। वे वहाँ कुछ दिन रहे।
जब वे वहाँ से जाने लगे तब जाते समय यक्षराज पूतन ने राम को स्वयंप्रभ नाम का अद्भुत हार दिया। लक्ष्मण को दो मणिमय कुण्डल दिए। सीता को दैदीप्यमान चूड़ामणि तथा वीणा दी। देखो पाप-पुण्य का उदय, पाप के उदय से जलपान नहीं मिला। पुण्य का उदय आया तो यक्ष ने नगरी बसाकर दी और भेंट के रूप में दिव्य हार आदि दिए।
इसके बाद वे वैजयन्तपुर पहुँचे। वहाँ एक स्थान पर रूके। वहाँ उन्हें पता चला कि अतिवीर्य नाम का राजा अन्य राजाओं के साथ मिलकर अयोध्या पर आक्रमण करनेवाला है। राम ने सोचा- अज्ञाता एव ये कार्यं कुर्वन्ति पुरूषाद्भूतम्।
तेऽतिश्लाघ्या यथात्यन्तं निवृष्य जलदा गताः॥
अर्थ- जो लोग अज्ञात रहकर मनुष्यों को आश्चर्य में डाल देनेवाला भारी उपकार करते हैं, वे चुपचाप बरस कर गए हुए बादलों के समान अत्यंत प्रशंसनीय होते हैं।
इसलिए अज्ञात रहकर अतिवीर्य को वश में कर भरत की मदद करनी चाहिए। यही निर्णय कर उन्होंने सीता को वरधर्मा आर्यिका के पास रखा।
राम ने नर्तकी का भेष बनाया, लक्ष्मण ने सहयोगिनी स्त्री का भेष बनाया। दरबार में उन्होंने नृत्य दिखाया और राजा अतिवीर्य को बंधक बनाकर सीता के पास लाए। सीता से पूछा इसके साथ
क्या करें? सीता ने कहा- को दोषः कर्मसामर्थ्याद्यदा यान्त्यापदं नराः।
रक्ष्या एव तथाप्येते दधतामतिसाधुताम्॥
अर्थ- इस बेचारे का क्या दोष है? मनुष्य यद्यपि कर्मों की सामर्थ्य
से संकट को प्राप्त होते हैं, फिर भी सज्जन उनकी रक्षा करते हैं।
इतरोऽपि खलीकर्तुं साधूनां नोचितो जनः।
किमुतायं नरेशानां सहस्राणां प्रपूजितः॥
अर्थ- सज्जन मनुष्य सामान्य मनुष्य को भी दुःख देना उचित नहीं समझते, यह अतिवीर्य हजारों मनुष्यों से पूजित है, अतः इसे क्षमा करें।
अतिवीर्य को क्षमा करके लक्ष्मण ने सीता के चरणों पर नमस्कार करते हुए कहा- धन्य हो देवी, आप जैसी क्षमाधारिणी, (आर्यिका के अलावा) धरती की महिलाओं में दूसरी नहीं हो सकती। आप इसप्रकार के कार्यों से देवताओं के लिए भी पूज्य हो।
सीता की कृपा से अतिवीर्य को राज्य मिला, परंतु उसने यह कहा कि मुझे राज्य की इच्छा नहीं है, राज्य ने मुझे फल दे दिया है, राज्य और संसार को भोगना उचित नहीं लगता; क्योंकि पूर्व में छह खण्ड के राज्य से भी चक्रवर्तियों को संतोष नहीं मिला, उनकी तुलना में मेरा राज्य कितना-सा है? संसार में कर्म की बलवत्ता देखो, राजा रंक होकर पैदल घूमता है, राहू चन्द्रमा को तेज रहित कर देता है। हजारों देव जिनके रथों की सेवा करते हैं, ऐसे वीर जंगल में एक बाण के द्वारा मरण को प्राप्त होते हैं। अब मैं दूसरा जन्म लेने से भयभीत हो चुका हूँ। इसलिए मैं राज्य स्वीकार नहीं करूंगा- यह कहकर अतिवीर्य ने श्रुतिधर मुनि के पास दीक्षा ली। कुछ समय पहले का शत्रु अब नमस्कार करने योग्य गुरु हो गया है।
उसके बाद राम, लक्ष्मण, सीता विजयपुर नगर गए। जहाँ का राजा पृथ्वीधर था। उसने उनका सत्कार किया और अपनी पुत्री वनमाला लक्ष्मण को दी। कुछ समय वहाँ रहकर वे आगे जाने लगे, तब वनमाला बहुत दुःखी हुई। दुःखी होकर उसने कहा- हे प्रिय मुझे इस तरह दुःखी कर क्यों जा रहे हो?
लक्ष्मण ने कहा- हे भद्रे, दुःखी मत होवो, मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास आऊंगा। शीघ्र न आऊँ तो सम्यग्दर्शन से रहित मनुष्य को जो गति प्राप्त होती है, वह मेरी हो। साधुओं की निन्दा करनेवाले अहंकारी मनुष्य के समान पाप से लिप्त हो जाऊँ।
हे प्रिये, हमें पिता के वचन की रक्षा करनी है, दक्षिण समुद्र के तट जाना है। वहाँ मलयाचल की तलहटी में जाकर उत्तम भवन बनाकर फिर तुम्हें ले जाऊंगा। तब तक धैर्य धारण करो।
वहाँ से निकलकर वे तीनों क्षमांजलि नगर गए। फिर वंशस्थद्युति नामक नगर में पहुँचे। उस नगर के पास उन्होंने वंशधर नाम का पर्वत देखा। उन्होंने यह भी देखा कि लोग नगर से निकल-निकल कर कहीं अन्यत्र जा रहे हैं। तब राम ने एक मनुष्य से पूछा- आप लोग नगर को छोड़ कर क्यों जा रहे हो?
इसके उत्तर में उस मनुष्य ने कहा- इस पर्वत के शिखर पर रात के समय जोर-जोर से आवाजें आती हैं, जो बहुत ही डरावनी होती हैं। ये आवाज़े किसकी हैं? यह बुजुर्ग भी नहीं जान पा रहे हैं। उन आवाज़ों से धरती हिल उठती है। दसों दिशाएँ चकराने लगती हैं, तालाबों का पानी घूमने लगता है, पेड़ उखड़ने लगते हैं, कान फटने लगते हैं। हम लोग रात होने से पहले ही नगर छोड़ देते हैं और सुबह होने पर लौट आते हैं। ऐसा करते करते आज तीसरा दिन है।
वह वृत्तान्त सुनकर सीता ने घबड़ाकर कहा- हे प्रिय, जहाँ ये लोग जा रहे हैं, वहीं हम भी चलें। राम ने हँसकर कहा- हे भीरू सीते! जहाँ ये लोग जा रहे हैं, वहीं तू जा, सुबह होने पर इस पर्वत के पास आना, हम तुम्हें खोज लेंगे। आज हम देखेंगे कि इस पर्वत पर ये आवाज़ें किसकी हैं? इन दीनहीन लोगों की, उनके बाल बच्चे पशुओं की रक्षा करेंगे। सीता ने कांपती हुई आवाज में कहा- आप लोगों की हठ केकड़े की पकड़ के समान बड़ी विचित्र है। मैं भी आपके साथ चलूँगी।
आगे राम, मध्य में सीता, अंत में लक्ष्मण - इस तरह तीनों पर्वत पर चढ़े।
उन्होंने ऊपर जाकर दो मुनिराज देखे, जो ध्यान में लीन थे, जिनकी लम्बी-लम्बी भुजाएँ नीचे की ओर लटक रही थीं, वे परम तेज से युक्त थे, समुद्र के समान गंभीर थे, पर्वत के समान अचल, कांति के सागर थे, नये तारुण्य से युक्त थे, सिद्ध प्रतिमा को सिद्ध कर रहे थे।
उन्हें देख रामादि आश्चर्य से भर गए। उन्होंने हाथ जोड़कर मस्तक से लगाए। उनके चरणों पर दूर से ही नमस्कार किया।
उनके हृदय में भक्ति के भाव वैसे ही उमड़ आए, जैसे चांद को देखकर समुद्र उमड़ता है। विनय से उनके शरीर नम्र हुए।
उन्होंने पास जाकर देखा कि उस समय अत्यंत भयंकर आकारवाले, काजल के समान काले, जिनकी जीभें लपलपा रही थीं- ऐसे सांप उन मुनिराजों के शरीर पर चल रहे थे। इसके अलावा जिन्होंने अपनी पूंछे ऊपर उठा रखी थीं, एक दूसरे से सटकर चल रहे थे, नाना रंग के थे, ऐसे बिच्छुओं ने मुनियों को घेरा था।
मुनियों की ऐसी दुःखभरी दशा देखकर राम, लक्ष्मण, सीता सहसा भयभीत हो गए, क्षणभर के लिए निश्चल हो गए।
सीता तो भयभीत हो पति से लिपट गई। राम ने सीता से कहा- डरो मत। वे मुनिराजों के और पास गए। सीता आश्वस्त होकर डर
को मन से निकाल कर राम, लक्ष्मण के साथ मुनिराजों के शरीर से सांप, बिच्छुओं को हटाने लगी। सांप, बिच्छू लौटकर आते थे।
धनुष के अग्र भाग से धीरे-धीरे उनको हटाया। सीता ने झरने के प्रासुक जल से मुनिराजों के पैर धोए, शरीर पोंछा।
तीनों ने मुनिराज की भक्तिभाव से वंदना की। राम ने वीणा को बजाकर, लक्ष्मण ने ताल देकर, सीता ने कोयल के समान मीठे स्वर से गीत गाकर मुनिराजों की भक्ति की। उनकी भक्ति के स्वर इतने मीठे थे कि जानवरों, पक्षियों के हृदय भी भक्तिमय बन कोमलता को प्राप्त हो गए थे। सीता ने ऐसा सुंदर, भावविभोर करनेवाला नृत्य किया, जैसे भगवान् के जन्माभिषेक के समय सुमेरु पर्वत पर श्रीदेवी ने किया था।
उपसर्ग से त्रस्त होकर ही मानो सूर्य अस्त हो गया। उसके पीछे संध्या आ गई। संध्या के पीछे नक्षत्रों का मण्डल आ गया।
सघन: Eight Satiyan