मानव-जीवनमें वह समय भी आता है जब मानव संसारके दुःखों, चिन्ताओं, उत्पीडनों और विवशताओंसे इतना घिर जाता है कि वह इनसे मुक्त होनेके लिए छटपटाने लगता है और उसका मन इस बोझको उतार फेंकनके लिए एकदम उद्यत हो जाता है। उसके मनमें उन्मुक्तिकी चाह इतनी प्रबल रूपसे प्रज्वलित हो उठती है कि वह एक क्षणके लिए भी किसी बन्धनमें बद्ध नहीं रहना चाहता । कलाकारकी स्वर-लहरीमें आज यही मानवीय भावना प्रतिध्वनित हो रही है। देखिए किस सहज भावसे इस भावनाकी अभिव्यक्ति हो रही है:-न मालूम, हमारे मनकी यह दुविधा कब दूर होगी ? वह अवसर कब आवेगा, जब में इन पामर मनुष्योंकी गुलामीसे छुटकारा प्राप्त करूँगा और अपने निर्विकार आत्मारामकी अलख जगाऊँगा ? न मालूम, हमारे मनकी यह दुविधा कब दूर होगी ? देखिए, कलाकार मानवीय भावनाके किस लक्ष्य-बिन्दुका यहां निर्देश कर रहे हैं- रुचिके साथ पान करेंगे-वह समय कब आवेगा जब हमारा मन निराकुल मोक्ष-पदकी प्राप्तिके लिए ही अर्हनिश चिन्ताशील रहेगा और वह शुभ घड़ी, न जाने जीवनमें कब आवेगी जब हमारे परिणामोंमें समता भाव की जागृति होगी और हमारा चिन्तन आत्म-विशुद्धिकी ओर अग्रसर होगा । इसके अतिरिक्त वह अवस्था भी प्राप्त होगी जब हमारे मनमें अपने शरीरके प्रति भी ममत्व-बुद्धि शेष न रहेगी ? न जाने, हमारे मनकी यह दुविधा कब दूर होगी ?