(74) दृष्टि का खेल
(तर्ज : समता रस का पान करो… )
फल भोगत नहिं जड़ कर्मों का, इनसे लड़ने का काम नहीं ।
फल कर्मों का है बाहर में, तुझमें झगड़े ये तमाम नहीं ।। 1 ।।
पापोदय से जो कुष्ट हुआ, उससे मुनि खेद न माना था।
पुण्योदय से भरतेश्वर के, उर हर्ष न किंचित् आना था।। 2 ।।
नहिं भोगे राम अरु सीता ने, पाण्डवों के भी क्लेश का नाम नहीं ।
जो कि सोकिए उनको भूलो, फल में नहिं हर्ष - विषाद करो ।। 3 ।।
कर्त्ता - भोक्ता नहिं आत्मा है, निश्चय निर्णय चित्त माँहि धरो ।
देनी न तुझे इक भी पाई, समता में दुःख छदाम नहीं ।। 4 ।।
पापोदय में भी धर्म किया, जिनने दृष्टि इनसे मोड़ी ।
पुण्योदय में भी अधर्म किया, जिनने दृष्टि इनमें जोड़ी ।। 5 ।।
हे चेतन ! खेल है दृष्टि का, तुझ सम जग में सुख धाम नहीं ।
निज में ही लीन रहो आत्मन् ! पर में मिलता विश्राम नहीं ।। 6 ।।
रचयिता - पूजनीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन
Source - सहज पाठ संग्रह