धार्मिक कलर बुक
धार्मिक कलर बुक
धार्मिक कलर बुक
कृति : धार्मिक कलर बुक
पावन प्रसंग : श्रमण संस्कृति संस्थान रजत जयंती वर्ष 2021-22
शुभाशीर्वाद : परमपूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
पावन प्रेरणा : निर्यापक श्रमण मुनिश्रीसुधासागर जी महाराज ससंघ
संपादक : डॉ. जयकुमार जैन (अधिष्ठाता)
डॉ. शीतलचंद जैन (निदेशक)
प्राचार्य श्रमण संस्कृति संस्थान
सह-संपादक / संकलक: प्रदीप कुमार जैन ‘शास्त्री’, दमोह
(शोधकार्य प्रभारी)
संयोजना : अभिषेक कुमार जैन ‘शास्त्री’, सागर
(द्वाराचार्य पाठ्यक्रम प्रभारी)
प्रतियाँ : 1100
संस्करण : प्रथम, 2021
मूल्य : 40/-
प्रकाशक : श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान
जैन नसियाँ रोड, बीसद्वार नगर
सांगानेर, जयपुर (राज.) 302029
मो.- 9314030108, 8306876339
1. अशोक वृक्ष
आठ प्रतिहार्यों में अशोकवृक्ष-देव रचित होता है, शोकरहित, तीर्थंकर
के मस्तक पर रहने के कारण यह अशोक वृक्ष कहलाता है।
2. सिंहासन
अष्ट प्रतिहार्यों में सिंहासन-रत्न जड़ित होता है, भगवान उससे चार अंगुल ऊपर अधर में विराजमान रहते हैं।
3. भामण्डल
अष्ट प्रतिहार्यों में भामण्डल-तीर्थंकरों के भामण्डल की प्रतिच्छाया में भव्य आत्मा अपने अतीत के तीन भव, एक वर्तमान और आगामी तीन भव, इस प्रकार 7 भवों को देख सकता है।
4. तीन छत्र
अष्ट प्रतिहार्यों में तीन छत्र-भगवान के मस्तक पर रत्नमय तीन छत्र शोभायमान रहते हैं, तीनों लोकों के साम्राज्य को सूचित करते हैं, तीन लोक के स्वामी हैं।
5. चँवर
अष्ट प्रतिहार्यों में चँवर – भगवान के दोनों ओर सुंदर सुसज्जित देवों द्वारा 64 चँवर ढोरे जाते हैं, यह नमन और उन्नमन द्वारा सूचित करते हैं कि प्रभु को नमस्कार करने से सज्जन उच्च गति को प्राप्त करते हैं।
6. पुष्पवृष्टि
अष्ट प्रतिहार्यों में पुष्पवृष्टि – भगवान के मस्तक के आकाश से सुगंधित जल की बूंदों से युक्त एवं सुखद मंदार, सुन्दर, नमेरु, पारिजात आदि उत्तम वृक्षों के ऊर्ध्वमुखी दिव्य फूलों की वर्षा देवों द्वारा की जाती है।
7. देवदुंदुभि
अष्ट प्रतिहार्यों में देवदुंदुभि – तीर्थंकर के सान्निध्य में ऊपर आकाश में भुवनव्यापी दुंदुभि ध्वनि होती है। देवाधिदेव अरहन्त प्रभु के आगमन की सूचना भी सर्वजनों को एक साथ मिल जाती है, दुंदुभि जयगान का प्रतीक है।
दिव्यध्वनि
अष्ट प्रतिहार्यों में दिव्यध्वनि—मृदु, मधुर, मनोहर, अधिक गंभीर और एक योजन प्रमाण समवसरण में विद्यमान देव, मनुष्य और तिर्यंचों को प्रतिबोधित करने वाली होती है। यह 18 महाभाषा एवं 700 लघु भाषा रूप परिणत होकर एक साथ समस्त जीवों को आनंद प्रदान करती है।
गज
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में गज—महत्ता का प्रतीक है। यह गर्भस्थ शिशु के महान् तीर्थ प्रचारक एवं महान् अभ्युदय की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
वृषभ
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में वृषभ—धर्म का प्रतीक है एवं गर्भस्थ शिशु के सत्य धर्म का प्रचारक होने का सूचक है।
3. सिंह
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में में
सिंह—गर्भस्थ बालक के अतुल पराक्रमी होने का प्रतीक
है।
4. लक्ष्मी
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में में
लक्ष्मी—यह दर्शाती है कि सुमेरु पर्वत पर सौधर्म आदि
इन्द्रों द्वारा बालक का अभिषेक किया जाएगा।
5. दो पुष्प मालाएँ
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में में दो
पुष्पमालाएँ—उत्सव यश और प्रसिद्धि का सूचक है।
6. चंद्रमा
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में
चंद्रमा—यह सूचित करता है कि बालक चंद्रमा की तरह
जगत के संताप को दूर करेगा।
7. सूर्य
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में
सूर्य—बालक अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करने वाला
होगा और सूर्य के समान भास्कर केवलज्ञान प्राप्त करेगा।
8. कलश
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में
कलश—बालक अक्षय निधियों का अधिपति होगा।
9. मत्स्य युगल
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में
युगल—बालक की सुख-समृद्धि का प्रतीक एवं अनन्त
सुख की उपलब्धि का सूचक है।
10. सरोवर
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में
सरोवर—बालक अत्यधिक संवेदनशील और वात्सल्य
भाव से युक्त होगा।
11. सागर
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में
सागर—हृदय की विशालता का प्रतीक है एवं बालक
समुद्र के समान गंभीर बुद्धि का धारक होगा।
12. रत्न जड़ित सिंहासन
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में रत्न
जड़ित सिंहासन—बालक तीनों लोकों में सर्वाधिक
वर्चस्व और प्रभुत्व को दर्शाता है।
13. देव विमान
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में देव
विमान—देवों के आगमन का प्रतीक है।
14. नागेन्द्र भवन
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में नागेन्द्र भवन—गर्भस्थ शिशु के अवधिज्ञानी होने का सूचक है।
15. रत्नराशि
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में रत्नराशि—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय धारण करेगा।
16. निर्धूम अग्नि
तीर्थंकर की माता के द्वारा देखे गए सोलह स्वप्नों में निर्धूम अग्नि—समस्त कर्म कालिमा को नष्टकर निर्वाण को प्राप्त करेगा।
PRIMARY + SECONDARY = TERTIARY
चित्र में रंगों का मिश्रण दिखाया गया है।
YELLOW + ORANGE = YELLOW-ORANGE
RED + ORANGE = RED-ORANGE
RED + VIOLET = RED-VIOLET
BLUE + VIOLET = BLUE-VIOLET
BLUE + GREEN = BLUE-GREEN
YELLOW + GREEN = YELLOW-GREEN
श्री दिगम्बर जैन समाज संस्कृति मण्डल
द्वारा प्रकाशित पुस्तकें
| क्रमांक | पुस्तक का नाम | मूल्य | क्रमांक | पुस्तक का नाम | मूल्य |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | जैन धर्म शिक्षा भाग-1 | 5 | 23 | कुन्द कुन्द का प्रवचन | 30 |
| 2 | जैन धर्म शिक्षा भाग-2 | 7 | 24 | प्रश्नोत्तर संग्रह भाग 1 | 70 |
| 3 | जैन धर्म शिक्षा अंग्रेजी भाग-1 | 3 | 25 | प्रश्नोत्तर संग्रह भाग 2 | 80 |
| 4 | जैन धर्म शिक्षा अंग्रेजी भाग-2 | 4 | 26 | जिज्ञासा समाधान भाग 1 | 70 |
| 5 | बाल संस्कार भाग-1 | 20 | 27 | जिज्ञासा समाधान भाग 2 | 80 |
| 6 | बाल संस्कार भाग-2 | 20 | 28 | दार्शनिक प्रश्न | 500 |
| 7 | सिद्धान्त प्रवेशिका भाग-1 | 15 | 29 | आत्म दर्शन | 74 |
| 8 | सिद्धान्त प्रवेशिका भाग-2 | 16 | 30 | आत्म निधि | 18 |
| 9 | सिद्धान्त प्रवेशिका भाग-3 | 17 | 31 | जिनशासन की वास्तविक मान्यताएँ | 18 |
| 10 | श्रद्धादान | 15 | 32 | कषाय युद्ध में ‘प’ शब्द के विवेचन | 10 |
| 11 | रत्नत्रय | 15 | 33 | विद्यासागर भाग-1 | 200 |
| 12 | पंचपरमेष्ठी | 10 | 34 | विद्याश्री सुकुमार भाग-1 | 260 |
| 13 | अष्टसहस्र भावदीपिका | 14 | 35 | गुणों के सागर | 125 |
| 14 | अध्यात्म प्रदीप | 10 | 36 | आत्मज्ञान तथा कोष | 350 |
| 15 | बाल बोध | 60 | 37 | विद्यापूजा | 100 |
| 16 | बाल शिक्षा | 15 | 38 | विद्याधर से विद्यासागर | 100 |
| 17 | अभिनव पूजा | 50 | 39 | विद्याश्री सुकुमार भाग-2 | 200 |
| 18 | पूजा संग्रह | 25 | 40 | कर्तव्य पथ प्रदर्शन | 50 |
| 19 | तीन-लोक में सीधा मार्ग-1 | 15 | 41 | चरित्र खण्ड जीवन | 25 |
| 20 | तीन लोक में सीधा मार्ग-2 | 15 | 42 | जैन तीर्थावली पूजन | 30 |
| 21 | जिन शासन रहस्य | 20 | 43 | दीक्षा पर्याय | 10 |
| 22 | रत्नत्रय धर्म | 50 | 44 | दार्शनिक कार्य का अर्जित | 10 |
प्रेषक पता
श्री दिगम्बर जैन समाज संस्कृति मण्डल
पारमार्थिक भवन संस्कृति परिषद
टैगोर मार्ग, जैन मंदिर मार्ग, शास्त्रीनगर, जयपुर 302029
WhatsApp ASHOK SAIN: 91400008, 8209716162
Email - [email protected]
संस्थान द्वारा संचालित प्रमुख गतिविधियाँ
- धार्मिक आचार्य ज्ञानदान छात्रावास - जिसमें अंग्रेजी सहित कक्षा दसवीं के उत्तीर्ण छात्रों को प्रवेश देकर उन्हें धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों से सुसंस्कृत करते हुए सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक ज्ञान को क्रमबद्ध शिक्षा, मनोवैज्ञानिक शिक्षण, नैतिक ज्ञान के माध्यम से समाज, अपनी संस्कृति एवं अपने धर्म के प्रति समर्पित विद्वानों, स्वाध्यायियों एवं धर्म प्रचारकों के रूप में तैयार किया जाता है। जो विद्यार्थी 12वीं उत्तीर्ण कर स्नातक, स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें विश्वविद्यालयीन परीक्षा (राजस्थान विश्वविद्यालय एवं संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर में बी.ए. एम.ए. में, संस्कृत विश्वविद्यालय से) में प्रवेश दिलाकर उनकी शिक्षा का व्यय भी संस्थान द्वारा वहन किया जाता है।
- स्वाध्यायी ज्ञानदान छात्रावास - इसमें आप अपना तथा अपने पुत्र पुत्रियों को प्रशिक्षित कर उन्हें मुमुक्षु व स्वाध्यायी हेतु उपलब्ध कराएँ।
- भारतवर्षीय श्रुत संस्कृति परिषद - इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य श्री दिगम्बर जैन समाज संस्कृति संस्थान, शास्त्रीनगर द्वारा प्रकाशित ज्ञानोपयोगी एवं धार्मिक साहित्य व धार्मिक शिक्षण संस्थाओं में अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं, विद्वानों, मुमुक्षुओं व पूज्य मुनियों के लिये धार्मिक परीक्षा आयोजित करना और उन्हें उत्तीर्ण प्रमाण पत्र प्रदान करना एवं आर्थिकीय विद्वानों का यथा-संभव करना है।
- धार्मिक शिक्षण शिविर - जैन संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन तथा धार्मिक एवं नैतिक सिद्धान्तों को जनसाधारण के लिये बालक, युवाओं एवं प्रौढ़ व्यक्तियों को धर्म में जागरूक, श्रद्धा सम्पन्न करने हेतु आध्यात्मिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करना।
- स्वाध्याय संस्था - दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों पर देश विदेश के लिये विद्वानों की व्यवस्था करना।
- अनुसन्धान संस्था - संकलनात्मक, सैद्धांतिक, ऐतिहासिक एवं समसामयिक विषयों में धार्मिक एवं आर्थिक आयोजनों के लिये श्रेष्ठ शोधार्थियों एवं विद्वानों की व्यवस्था करना।
- आदर्श श्रुत संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम - परम पूज्य मुनिराज श्री सुधासागर जी महाराज के मार्गदर्शन व आशीर्वाद से स्वाध्याय आपके बालक बालिकाओं में धर्म के विशेष प्रति रुचि जगाएगा, श्रुति विद्याज्ञान से मुक्त कराकर स्वाध्याय व मनन का निर्माण कर आगमयुक्त धर्मोपदेश करते हुए आत्म कल्याण का भी प्रशस्त करेगा।
- ज्ञान की सुप्रवाह महाविद्यालय एवं छात्रावास - धार्मिक व सामाजिक हिन्दी भाषावार विद्यालय - पूज्य सद्गुरुदेव श्री ज्ञानसागर जी महाराज के आशीर्वाद से।
चित्र में श्री दिगम्बर जैन समाज संस्कृति संस्थान का भवन दिखाया गया है।
महाराज आचार्य ज्ञानसागर छात्रावास भवन
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है