न्यायालय के मंच पर चलता एक जैन नाटक — “धर्मी आत्मा कौन है?” इस प्रश्न पर जज, वकील, धर्मात्मा जीव और आपत्तिकर्ता के बीच बहस चलती है, और सर्वज्ञ भगवान द्वारा प्रणीत वस्तु-स्वरूप के आधार पर सच्चे धर्म का निर्णय होता है। लेखक — संजय पुजारी, खनियांधाना।
A Jain stage play (natak) staged as a courtroom trial on the question “who is truly a dharmi aatma?” — the judge, the lawyer, the soul and the objectors argue it out. Written by Sanjay Pujari, Khaniyadhana. Full script inline, original PDF attached.
नाटक - धर्मी आत्मा कौन?
लेखक - संजय पुजारी खनियांधाना
-: पात्र :-
- जज (1)
- वकील (4)
- धर्मात्मा जीव (6) - [1.TAD 2.SPN 3. TBN 4. NMN 5. BSD 6. EKK]
- आपत्तिकर्ता (5) - [1. PRS 2. AF 3. DEP 4. BR 5. AS]
- बाबू (1)
- आवाज लगाने वाला (1)
- मंच की रूपरेखा -
(मंच पर जज साहब कुर्सी पर बेठे है, उनके सामने टेबल रखी है जिसपर फाइल रखी हुई है। एक तरफ बाबू बैठा हुआ है जो कुछ लिख रहा है, आवाज लगाने वाला बाहर की साइड खड़ा है, एक कठघरा बना हुआ है टेबल पर एक लकड़ी का हथोड़ा रखा हुआ है जिसे जज साहब ठोकते है।)
जज सा० : हाँ, तो न्यायालय की कार्यवाही शुरू की जाये।
बाबू : जी। श्रीमान आज न्यायालय में जिस प्रकरण पर चर्चा होना है वह प्रकरण है कि "धर्मी आत्मा कौन है?”
जज सा० : यह प्रकरण किसके द्वारा प्रस्तुत हुआ?
बाबू : महोदय यह जनहित याचिका है जो कि वकील श्रीधर द्वारा दायर की गयी है।
जज सा० : ठीक है, प्रकरण के दस्तावेज प्रस्तुत कर श्रीधर वकील साहब को हाजिर करो।
आवाज लगाने वाला : श्रीधर वकील साहब हाजिर हों…
(वकील साहब हाजिर होते हैं, जज साहब को अभिवादन करते हैं, जज साहब भी जवाब में अभिवादन करते हैं)
जज सा० : कहिए वकील साहब आप अपने प्रकरण के विषय में क्या कहना चाहते हैं, आपके प्रकरण का मूल मुद्दा क्या है वह प्रस्तुत करें।
वकील सा० : महोदय, बात यह है कि पूरे विश्व में लोग अपने आवश्यक कार्यों के साथ धर्म भी करते है, करना भी चाहिए, क्योंकि सभी सुख चाहते है और धर्म ही सुख का कारण है। पर बात यह है कि सबके धर्म करने के अपने मनमाने तरीके हैं, सर्वज्ञ भगवान द्वारा प्रणीत वस्तु स्वरूप की जानकारी से बेखबर कुछ भी क्रियाकलापों को धर्म मान बैठे हैं, लोगों को धर्म करने से सुख मिल रहा है कि नहीं यह तो अलग बात है पर हर कोई यह सिद्ध करने में लगा है, कि हम ही धर्मात्मा हैं और हमारा ही धर्म सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा प्रदर्शन करने की होढ़ लगी है।
जज सा० : तो इससे आपको समस्या क्या है?
वकील सा० : महोदय, धर्म को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की प्रतियोगिता में यह देखने की किसी को भी फुरसत नहीं है कि धर्म करने के तरीकों में हम जो साधन अपनाते हैं उससे प्रकृति को, संशाधनों को, छोटे-मोटे जीवों को या अन्य मनुष्यों को कितना नुकसान हो रहा है। जो वातावरण को प्रदूषित कर असंतुलित करता है।
जज सा० : मैं आपकी बात अच्छे से समझा नहीं।
वकील सा० : श्रीमान जी, धर्म करने के तरीकों की क्या बात करें, कोई अग्नि जला कर धुआँ करके, तो कोई गुलाल उड़ाकर, तो कोई तेज आवाज में गाकर, तो कोई सड़कों पर नाचकर, तो कोई पुराने मंदिर तोड़कर नए बनवाकर धर्म मान रहा है। इसमें प्राकृतिक प्रदूषण एवं संशाधनों की हानि तो है ही मनुष्य भी प्रभावित होते है। अतः यह सिद्ध होना आवश्यक है कि ये जो हो रहा है क्या यह सब धर्म है?
जज सा० : हाँ, सही कहा आपने कि यदि ऐसा है तो यह जरूरी है कि इस बात पर न्याय हो, कि धर्म क्या है? और धर्म के नाम पर जो हो रहा है उसका धर्म के साथ कोई संबंध है कि नहीं, इसके अलावा भी आप कुछ कहना चाहते है?
वकील सा० : हाँ साथ में यह भी समझा जावे कि इस तरह धर्म करने से उनके सुख-शांति का क्या संबंध है, इस हेतु कोई भी वकील उनसे कोई प्रश्न करना चाहें या उनके धर्म करने से किसी को कोई आपत्ति है तो वह भी अपनी बात रख सकते हैं।
जज सा० : ठीक हैं, वकील सा० आपको अपनी बात रखने की आज्ञा है आप प्रकरण को आगे बढ़ावे।
वकील सा० : मेरे प्रकरण के मुख्य बिन्दु यही हैं कि धर्म करने के तरीकों से जीव के सुखी होने का प्रयोजन तो सिद्ध हो इसके अलावा श्रीमान जी से निवेदन है कि आगे की सुनवाई के लिए मेरे सहायक मित्र को कार्य करने की अनुमति चाहता हूँ।
जज सा० : इजाजत है।
वकील 2 : (अभिवादन करते है) महोदय मैं सर्वप्रथम तेज आवाज से बोलकर धर्म करने वालों को बुलाने की आज्ञा चाहता हूँ।
जज सा० : तेज आवाज के आधार से धर्म करने वाले धर्मात्मा को बुलाया जाये।
आवाज लगाने वाला : तेज आवाज में धर्म करने वाले हाजिर हो. (TAD)
(TAD साहब हाजिर होते हैं, अभिवादन करते हैं।)
TAD- जी मुझे यहाँ क्यों बुलाया गया है? (तेज स्वर में)
वकील 2 : ऐसा बताया गया है कि आप बहुत तेज आवाज के उपकरणों का उपयोग करके धर्म करते है। TAD- हाँ सही है, मैं धर्म करने के लिए आवाज को तेज करने एवं विस्तारित करने के लिए माइक, स्पीकर, बॉक्स आदि का उपयोग करता हूँ, पर इससे आपको दिक्कत क्या है..?
वकील 2 : दिक्कत यह है कि आप आवाज को इतनी तेज एवं इतनी ज्यादा विस्तारित कर देते हैं कि वह आपके धर्म स्थल से भी बाहर बहुत दूर चली जाती है। TAD- हाँ चली जाती है, तो यह तो हम स्वयं ही करते है, आवाज दूर तक बाहर भेजना है, तब तो माइक स्पीकर आदि मे रुपया खर्च किया है।
वकील 2 : तो आप समझाएंगे कि इससे धर्म का क्या संबंध है? TAD- वकील साहब, आवाज का ही तो धर्म से संबंध है, सबसे अच्छा धर्म तो तेज आवाज से गाने-बजाने पर ही होता है, इसमे दो फायदे है; एक तो जहाँ तक आवाज जाती है वहाँ तक के लोग यह जान जाते है कि यहाँ धर्म हो रहा है और दूसरा यह कि यह भी जान जाते हैं कि यह व्यक्ति कितना धर्मात्मा है जो इतना अच्छा धर्म कर रहा हैं।
वकील 2 : इसके अलावा भी और कोई लाभ है क्या? TAD- हाँ है न, जिन घरों से लोग मंदिर नहीं आना चाहते या काम की व्यस्तता के कारण घर पर ही हैं, उन्हें भी तेज आवाज में होने वाली पूजा सुनाई देने से उनका भी धर्म हो जाता है, और तेज आवाज होने से भगवान तक भी आवाज पहुचती है तो वह भी जल्दी ही भला करने की सोचते हैं।
वकील 2 : तो आप मानते हैं कि धीमी आवाज में भजन करने से भगवान को सुनाई नहीं देता है और तेज आवाज उन्हें जल्दी सुनाई देती हैं। TAD- हाँ यह तो है, जितनी तेज आवाज उतना ज्यादा धर्म और उतना ही ज्यादा सुख होता ही है।
वकील 2 : पर भजन तो आत्मा की शांति करने को किया जाता हैं, जिसमें भजन के शब्दों का भाव भाषण होने से सहज ही चित्त स्थिर और शुद्ध होता है, तेज बोलने में भाव भाषण भी नहीं हो पाता चित्त भी स्थिर नहीं रहता। TAD- मुझे समझ नहीं आ रहा कि आवाज धीमी या तेज यह मेरा तरीका है जिसमें मुझे आनंद आता है, आप न जाने क्यों मेरे पीछे पड़े हैं।
वकील 2 : यदि मैं कहूँ कि आपके सुखी होने के चक्कर में कई लोग परेशानी का शिकार हैं, तो क्या यह आप स्वीकार करेगें? TAD- नहीं बिल्कुल नहीं, क्योंकि मेरे धर्म करने से भला किसी को परेशानी क्यों होगी?
वकील 2 : (जज साहब से) - महोदय मैं परेशान व्यक्ति को आपके समक्ष पेश करने की आज्ञा चाहता हूँ।
जज सा० : आज्ञा है।
आवाज लगाने वाला : PRS साहब (परेशान व्यक्ति) हाजिर हों। PRS- (अभिवादन करते है)
वकील 2 : साहब आप अपनी परेशानी महोदय के समक्ष रखें। PRS- जज साहब मेरा घर इनके धर्मस्थल से काफी निकट हैं, मेरे पिताजी हृदय रोगी थे, जिन्हें तेज आवाज से तकलीफ होती थी इनकी तेज आवाज की शिकायत इनसे की पर इन्होंने कुछ न सुनी और अंततः चल बसे। इसके अलावा मेरे दूसरे तरफ जो परिवार है उनका बेटा तेज आवाज के कारण पढ़ाई बराबर न कर सका और फैल हो गया, जिससे वह अवसादग्रस्त है, मेरी माँ भी इस बात से मानसिक तनाव में रहती है कि प्रातः काल से ही मंत्रोच्चार की तेज आवाज आने लगती है जो शौचालय में भी सुनाई देती हैं अब व्यक्ति अपनी नित्य प्रति क्रियाएं करें कि नहीं करें।
(कुछ शोर सा होता हैं)
जज सा० : ऑर्डर-ऑर्डर, ठीक है मैने दोनों पक्ष सुने हैं अब अन्य के धर्मात्माओं को बुलाया जावें। वकील साहब आप अपने क्रॉस questions इस प्रकार से करें कि धर्म की विकृति क्या है? और सही स्वरूप क्या है यह स्पष्ट हो सकें, अब अगले धर्मात्मा सड़क पर नाच गान कर धर्म करने वालों को बुलाएं।
आवाज लगाने वाला : सड़क पर नाच गान (SPN) करके धर्म करने वाले हाजिर हों… SPN- अभिवादन करते हैं। जी मुझे क्यों बुलाया गया?
वकील सा० : सुना है आप नाच-गान करके धर्म करते हैं, कृपया विस्तार से बतावें कि इससे धर्म किस प्रकार होता है?
SPN- श्रीमान जी धर्म में प्रभावना बड़ी बात होती है, जब तक दूसरे लोग अपने धर्म से प्रभावित नहीं हों तबतक हम धर्मात्मा हैं, यह भी सिद्ध नहीं होता और हमारा धर्म अच्छा हैं यह भी सिद्ध नहीं होता, इसलिए हम जब महिला पुरुष आकर्षण पैदा करने वाले परिधान पहनकर DJ की तेज आवाज में नाच-गान करते हुए सड़क पर चलते हैं, तब ही तो दुनिया को समझ आता हैं कि यह ही धर्म अच्छा हैं। नाचने वालों को तो आनंद आता ही हैं, देखने वालों को भी आनंद आता हैं। जिससे नए युवा भी धर्म से जुड़ जाते हैं जिस कारण धर्म मानने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती जाती हैं, यही तो हमारा प्रयोजन हैं कि हमारा समूह निरंतर बढ़ता रहें, जो पूरी तरह से सिद्ध हो जाता हैं।
वकील 2 : जो बाहरी नाच गान का आनंद है वह तो अन्य प्रकार विवाह आदि से भी आ सकता है इसमें प्रयोजन की सिद्धि तो वहाँ से भी हो सकती है, इसको धर्म के आधार से ही करने का उद्देश्य समझ नहीं आया। SPN- धर्म के आधार से करेगें तो पुण्य होगा और विवाह आदि के आधार से करेगें तो पाप होगा यह तो जग जाहिर बात है; और इससे किसी को कोई परेशानी भी नहीं हैं।
वकील 2 : परेशानी है, मैं आपको प्रत्यक्ष बता सकता हूँ, प्रभावित व्यक्ति को बुलाने का इशारा करते हैं।
आवाज लगाने वाला : प्रभावित व्यक्ति हाजिर हों… AF- (अभिवादन करके) जी जज साहब, मैं कुछ कहना चाहता हूँ, इनके इस तरह धर्म करने में मेरी माँ चल बसी, क्योंकि सड़क अवरुद्ध था। माँ के बीमार होने पर उन्हें अस्पताल ले जाना था जो मैं न ले जा सका और माँ ने वहीं दम तोड़ दिया। इसी तरह मेरे एक परिचित बता रहे थे कि उनके बेटे को नौकरी के साक्षात्कार हेतु शहर जाना था पर सड़क अवरुध्द होने से स्टेशन पहुचने में विलंब हो गया और ट्रेन छूट गयी। इसके अलावा मेरे एक मित्र ऑफिस जा रहे थे, रास्ते में जुलूस में रंग गुलाल काफी उढ़ रहा था जो उनके नाक-मुँह में भर गया और उन्हें उससे ऐलर्जी हो गयी, माइ लॉर्ड मुझे इतना ही कहना था। AS- (अभिवादन करके) माइ लॉर्ड, मैं एक सफाई कर्मचारी कुछ कहना चाहता हूँ, मैं अक्सर कर देखता हूँ कि जुलूस के लोगों का स्वागत रास्ते में किया जाता हैं; जिसमें कोई आइसक्रीम खिलाता हैं, तो कोई शिकंजी पिलाता हैं, तो कोई पानी या शरबत पिलाता हैं और जुलूस के लोग खाने-पीने के बाद डिस्पोज़ल ग्लास, कप, चम्मच, प्लेट सड़क पर ही फेंक देते हैं, जिससे सड़क पर गंदगी फैलती हैं, चींटिया, मक्खियाँ आदि पैदा होकर कुचल कर मरती हैं और वह कप ग्लास आदि नाली मे फंस जाते हैं, जिससे नाली चोक हो जाती हैं और मच्छर पैदा होते हैं, क्या धर्म इन सबकी आज्ञा देता है? आप अवश्य विचार करें…
जज सा० : ठीक है, विचार करेगें। अगले धर्मात्मा को बुलाया जाएं।
आवाज लगाने वाला : भ्रमण या तीर्थ घूमने से धर्म करने वाले हाजिर हों… TBN- (अभिवादन करते है) जी मुझे क्यों बुलाया गया हैं?
वकील सा० : क्या यह सही है की आप तीर्थ भ्रमण काफी करते हैं? आपके इस तरह घूमने से धर्म कैसे होता है कोर्ट को समझाएं, जिससे यह निर्णय हो सके कि आप धर्मात्मा हैं।
TBN- महोदय हम तो घर पर रहकर भी धर्म करते हैं पर जब व्यापार आदि मंदा होता हैं और घर पर एक स्थान पर रहते रहते ऊब जाते हैं; तब फिर तीर्थ घूमने का मन बनाते हैं, क्योंकि हम अधर्मी तो हैं नहीं कि शिमला या कुल्लू मनाली जाएं। अतः ऐसी योजना बनाते हैं कि कुछ घूमना फिरना भी हो जाए, मन भी बहल जाये और धर्म भी हो जाए, अतः तीर्थयात्रा का प्रोग्राम बनाते हैं और आपको तो पता ही होगा कि तीर्थों पर सब सुविधाएं तो मौजूद हैं ही, इसलिए सुबह-सुबह वंदना का कार्य पूरा कर फिर तीर्थ पर जो अन्य सुविधाये हैं उनका लाभ लेते हैं और जो अच्छे पॉइंट हैं उन्हें भी देखते हैं और इस तरह आनंद कर घर लौट आते हैं।
वकील सा० : आपकी मौज-मस्ती एवं गाड़ियों में डीजल-पेट्रोल जलने में जितनी हिंसा होती हैं उतना पुण्य कमा पाते हो कि नहीं, कभी इसका हिसाब लगाया है क्या?
TBN- अरे आप क्या बात करते हो ! वंदना में हर मंदिर या टोंक पर अर्घ्य के जो पटिये लगे रहते हैं उनको पूरा पढ़ते है, भगवान की जय बोलते है, भगवान के साथ फोटो खिंचवाते हैं, भिखारियों को घर से जो चवन्नी-अठन्नी ले जाते हैं वह भीख में देते है, तोरण द्वारों पर जो हाथी आदि रहते हैं उनके साथ भी फोटो निकलवाते हैं, जब इतना सब करते हैं तो पुण्य क्यों नहीं मिलेगा अवश्य मिलेगा। और धर्म आनंद के लिए ही तो करते हैं जिसका हम पूरा लाभ लेते हैं, यहीं हमारा धर्म करने का प्रयोजन हैं, जो सिद्ध होता हैं।
वकील 2 : ऐसा कहते हैं कि तीर्थ तो आत्म आराधना की प्रेरणा देते हैं, यहाँ आपने आत्म आराधना का क्या कार्य किया जो आपको कर्म काटने में कारण बने? जैसा आपने कहा कि कुल्लू-मनाली नहीं गए तो वहाँ नहीं जाना और तीर्थ जाना इसमें अंतर क्या रहा?
TBN- अरे वाह! अंतर क्यों नहीं है, तीर्थ पर भगवान का दर्शन होता है जो पुण्य का कार्य है अन्य जगह जाने से पुण्य मिलेगा क्या?
वकील 2 : पर आपके इस तरह पुण्य कमाने के चक्कर में तीर्थों पर भीड़ तो बढ़ गयी पर आराधना खत्म होती जा रही है; क्या आपको इसका अहसास है?
TBN- नहीं मैं सोचता हूँ कि मेरे तीर्थ यात्रा से किसी को क्या परेशानी हो सकती है, कोई हो तो बताओ?
आवाज लगाने वाला : किसी को कुछ कहना हो तो हाजिर हों…
BR- (धोती-पंचा पहने हैं) जज साहब मैं एक साधक जीव हूँ, साधना करने घर-बार छोड़कर तीर्थ पर गया था क्योंकि "ज्ञानियों ने कहा हैं कि महावीर के बोध का पात्र वही है जो तीर्थ प्रवास का उमँगी हो,” पर जब मैने वहाँ देखा कि तीर्थ तो मुंबई की चौपाटी हो रहा हैं, पूरी जगहों पर चाट-पकोड़ी, भेलपुरी, पिज्जा, आइस-क्रीम आदि के ठेले लगे हैं और लोग बड़े ही चाव से खा रहे हैं। वहाँ रात्रि भोजन अभक्ष्य भक्षण का कोई भेद नहीं हैं। पारदर्शी, तंग एवं फैशन के छोटे बड़े परिधानों से युक्त महिलायों को ये समझ ही नहीं आ रहा कि इस स्थान का महत्व क्या हैं?
(कुछ रोने सा लगता हैं)
वकील सा० : अरे ! धीरज रखिए शांति से अपनी बात कहिए।
BR- महोदय, क्या कहूँ धर्मशाला आदि भी पूर्ण सुविधाओं से युक्त पाश्चात्य शैली में निर्मित हैं, पाँच इंद्रियों के भोगों की प्रचुर सामग्री मौजूद देखकर में उल्टे पाँव घर लौट आया कि जिस विषय सुख को छोड़ में वहाँ गया था कहीं पुनः उसी में न उलझ जाऊँ। महोदय, घर पर रहूँ तो लोग कहते हैं कि इन्हें डनलप के गद्दे पर बैठकर ही मोक्ष जाना हैं और तीर्थों की यह हालत हैं, मैं आत्म कल्याण हेतु कहाँ जाऊँ? आप ही न्याय करें क्योंकि तीर्थों पर सुविधाएं भोगपूर्ण हो जाती हैं तो परिणाम भी विकृत हो जाते हैं।
जज सा० : ठीक हैं, विचार करते हैं आप बैठिए।
(इतने में एक मैले-कुचेले, फटें हुए कपड़े पहने लुहु-लुहान, बेहाल एक जीव चिल्लाता हुआ आता हैं)
DEP- बचाओ-बचाओ, कोई तो बचाओ, मेरी रक्षा करों, मुझे मत मारों, मुझे बचा लो- बचा लो… कोई तो बचा लो…
जज सा० : ऑर्डर-ऑर्डर। सभी शांत हो जाएं, कौन हो तुम और इस तरह चिल्ला क्यों रहे हो? DEP- महोदय, मैं विकलत्रय जीव यानि दो इन्द्रिय, तीन इंद्रिय, चार इन्द्रिय जीवों का प्रतिनिधि हूँ। आपसे अपने सभी साथियों की तरफ से दया की भीख मागनें आया हूँ, क्या बताएं हम नीच गोत्र कर्म का उदय लेकर एवं हीन पर्याय में क्या जन्मे हैं कि हम तो लातों से कुचले जाने और तिरस्कार पाने को ही है।
वकील सा० : आप क्या कहना चाहते हैं? और आपको परेशानी किससे हैं, वह स्पष्ट करें, पहेली न बुझाएं। DEP- वकील सा० हमारी परेशानी धर्म करने वालों से हैं, सभी जानते हैं कि हम सममूर्छन जीवों का जन्म उमस हो और तेज लाइट जला दी जाए तो हो जाता हैं, यह जानते हुए भी धर्म करने वाले तेज लाइट जलाकर, हमें पैदा करते हैं और फिर जब हम पैदा होकर जमीन पर गिरते हैं तो यह हाथों में दीपक ले-लेकर नाचते हैं और हमें लातों से कुचल-कुचल कर आहत करते हैं और मानते हैं कि हम धर्म कर रहे हैं। हमारें हजारों साथी जो जमीन पर न गिरकर दीपक में गिर जाते है तो गर्म तेल में तले जाते हैं, माइ लॉर्ड हमारे साथ न्याय करें। क्या हमें जीने का कोई अधिकार नहीं हैं?
वकील 2 : तो क्या आप यह चाहते हैं कि लोग दीपक लेकर भगवान के सामने न नाचें तो प्रभु भक्ति केसे करेगें? DEP- महोदय हजारों जीव मारे जा रहे हों ऐसे अमर्यादित कार्य करने को भक्ति तो नहीं कह सकते, आप भक्ति करें इसको कौन मना करते है, पर क्षेत्र और काल तो ऐसा हो जहाँ जीवों की हिंसा न हो रही हो।
जज सा० : हाँ अधीर मत हो, सभी के साथ न्याय होगा। अभी आप शांति से बैठ जाएं। अब अगले धर्मात्मा को बुलाया जाएं।
आवाज लगाने वाला : मंदिर मूर्ति बनवाने में धर्म मानने वाले धर्मात्मा हाजिर हों… NMN- (अभिवादन करके) मुझे बहुत काम हैं, मुझे यहाँ क्यों बुलाया गया हैं?
वकील सा० : आपको क्या काम हैं? NMN- मुझे मंदिर निर्माण की पूरी रूपरेखा देखना हैं मुझे समय नहीं हैं।
वकील सा० : पर आप तो धर्मात्मा हैं, जब आपके पास समय ही नहीं है तो आप धर्म कब करते हैं।
NMN- वकील सा० आप बड़े भोले लगते हो, अरे! यह सब धर्म ही है, मंदिर बनवाना, मूर्ति बनवाना, चन्दा इकठ्ठा करना यह सब धर्म ही तो हैं।
वकील सा० : तो आप स्पष्ट करें कि मंदिर निर्माण से धर्म किस प्रकार होता हैं? आप बिल्डिंग के निर्माण में ही लगे रहते हैं, तो जीवन निर्माण एवं चरित्र निर्माण के लिए समय कब निकालते हैं? NMN- महोदय, यदि मंदिर निर्माण अच्छा हो गया तो चरित्र निर्माण तो अच्छा हो ही जाएगा। आज आधुनिक युग में दुनियाँ काफी आगे निकल चुकी हैं, नई तकनीक से जब कुछ नया नहीं हो तो लोगों को आनंद नहीं आता। पुराने मंदिर जिनमें छोटे- छोटे दरवाजे हैं, सिर झुकाकर जाना पड़ता हैं, भगवान के निकट संकीर्णता हैं और मंदिरों में न कोई डिजाइन, न कोई आकर्षण जिस कारण लोगों का मन नहीं लगता अतः हम सभी पुराने मंदिरों को नए रंग रूप में लाकर धर्म करते हैं। लोग इस तरह धर्म करने के नाम पर चन्दा भी खूब देते हैं।
वकील सा० : हम तो ऐसा समझते हैं कि मन तो भगवान में लगाना चाइए, क्योंकि भगवान का रूप ही देखने योग्य हैं जिसके आधार से हम अपने स्वरूप को जान सकें; मंदिर के आकर्षण से क्या प्रयोजन? NMN- वकील सा० भगवान तो पूजने को होते हैं, मन तो मंदिर की डिजाइन में ही रमता हैं। भगवान को अर्घ्य देने के बाद मन को रंजायमान करने के लिए कोई नई चीज चाहिये होती हैं इसलिए मंदिरों का नया आकर्षक रूप होना अत्यंत आवश्यक हैं, इसलिए हम मंदिरों के रूप को निखार कर धर्म करते हैं।
वकील सा० : इसका मतलब आप मन का रंजन करना चाहते है, मन को स्थिर नहीं, चलो ठीक है, मंदिर अच्छा बना लो पर प्रतिमाजी में मन नहीं लगता तो प्रतिमाओं की संख्या तो ज्यादा नहीं करो। NMN- वकील सा० मंदिर भव्य बनाने को रुपया चाहिए तो वह क्या पेड़ से टपकेगें? प्रतिमाओं को विराजमान करने वालों से ही तो इकठ्ठा होगा। इसके लिए हम प्रचारित करते हैं कि एक प्रतिमा को विराजमान करने वालों के नरक-तिर्यंच गति नहीं
होगी। तो व्यापार : धंधे की मायाचारी और बहुआरंभ-परिग्रह के दोष के छिपाने को हर कोई तैयार हो जाता है और रुपया दे देता हैं। इसमें दान भी होता है और नाम भी होता है
वकील सा० : यह तो सरासर व्यापार बुद्धि हो गयी इसके अलावा आप मंदिर तो अहिंसा के पुजारी का बनाते हैं और उपदेश भी अहिंसा के देते होगें पर वेदी और प्रतिमा बनाने वाले लोग शाकाहारी है या मांसाहारी है इस पर विचार करते है कि नहीं? NMN- वकील साहब आप उन्हें देखने की कह रहे हैं; हम भी कौन से शुध्द-शाकाहारी हैं? दवाई, शैम्पू, लिपिस्टीक, चाय, साबुन, टॉफी, बिस्कुट, केक आदि से तो हम भी वैसे ही है और उनके मांसाहारी होने में उनका पाप उनके माथे, हम क्यों उनकी चिंता करें।
वकील सा० : पर आप तो अहिंसा या शाकाहार के संदेश प्रसारित करने को मंदिर बना रहें हैं। तो आपका मंदिर जब बनेगा तब आप अहिंसा संदेश को फैला पायेगें पर आपके रुपयों से तो मांसाहार का पोषण हो रहा है और हिंसा फल फूल रही है। NMN- वकील सा० दुनियाँ में कौन का पैसा कहाँ से आ रहा हैं और कहाँ जा रहा हैं और कौन क्या उपयोग कर रहा है, क्या इसकी भी जवाबदारी हमारी है? हम तो इस बात से मतलब रखते हैं कि हमारे पास रुपया जिस प्रयोजन आया, उस प्रयोजन हमने खर्च किया, अब आगे उसका उपयोग क्या हो इससे हमें क्या प्रयोजन?
जज सा० : ऑर्डर-ऑर्डर, चर्चा को अनावश्यक लंबा किया जा रहा हैं। अगले धर्मात्मा को बुलाया जाएं।
आवाज लगाने वाला : बोलियों से धर्म करने वाले धर्मात्मा हाजिर हों… BSD- (अभिवादन करते है) क्या कोई बोली लगवाना है जो मुझें यहाँ बुलवाया गया हैं।
वकील सा० : तो इसका मतलब आप बोलियों के आधार से धर्म करते हैं? BSD- हाँ करते हैं, पर न्यायालय में किस बात की बोली लगना हैं?
वकील सा० : बोली नहीं लगना हमें तो यह समझना हैं कि बोलियों के आधार से आप धर्म किस प्रकार करते हैं? BSD- कैसी बात करते हैं वकील सा० बोली लगाकर धन एकत्रित करना कोई बुरा काम थोड़े ही है; बोलियों के माध्यम से तो दान होता है और दान तो धर्म का ही अंग है, जिसमें स्व और पर दोनों का हित छिपा है, अतः परम धर्म है।
वकील सा० : इसका मतलब तो यह हुआ कि जिसके पास धन नहीं होगा तो वह तो धर्म कर ही नहीं सकता? BSD- वकील सा० आपको पता नहीं है, धन तो लोगों के पास बहुत है पर लोग चिमाए हुए रहते हैं, उनका धन निकालने की तरकीब का नाम बोली हैं, दूसरी बात हम उनका धन निकालकर उन्हें परिग्रह से रहित करने की कोशिश करते हैं, जिससे वह नरक जाने से बच जाता है और अधिक धन शासन की निगाह में आएगा तो वह भी ठीक नहीं है, अतः वहाँ से भी बच जाता है, यह हमारा उनके ऊपर बड़ा उपकार है।
वकील सा० : तो क्या आप धर्म कार्य में नंबर 2 का भी पैसा ले लेते हैं? BSD- देखो ! हमें तो धन से मतलब हैं, एक-दो नंबर से हमें क्या प्रयोजन। धन देने वाला पुण्य कमा रहा हैं हम तो ऐसा ही जानते हैं, वैसे हम धन कोडवर्ड में लेते हैं, हम लाख को लाख नहीं कहते, वह भी बच जाता हैं और हमारा भी भला हो जाता हैं।
जज सा० : कोर्ट का समय हो रहा हैं, कोई और धर्मात्मा हो तो बुलाया जायें।
आवाज लगाने वाला : एकाकी रूप से रहने वाले धर्मात्मा हाजिर हों… EKK- (अभिवादन करते हैं) जी मेरा क्या अपराध है, जो मुझे यहाँ बुलाया गया?
वकील सा० : आप धर्म करते हैं, धर्मात्मा हैं, सो कैसे? इसको जानने के लिए बुलाया हैं। EKK- मैं धर्मात्मा हूँ, यह कहना मुझे योग्य प्रतीत नहीं होता क्योंकि महोदय धर्म को कहा नहीं जाता, अनुभव किया जाता है; धर्म को किया नहीं जाता, होता हैं; वस्तु अपने स्वभाव में रहे तो धर्मात्मा हैं, स्वभाव से विपरीत प्रवर्तन ही अधर्म हैं। नमक का स्वभाव खारापन हैं वह कहीं भी हो खारा ही है तो नमक धर्मात्मा है; इसी तरह जीव का स्वभाव जानना देखना है यदि वह इस रूप ही रहता है तो धर्मात्मा है, और परद्रव्य में अपनापन करके उसे भोगना चाहता है तो अधर्मी हैं, महोदय इस कारण मैं इसी पुरुषार्थ को करता हूँ कि स्वभाव में ही बना रहूँ। अब इसको धर्म संज्ञा हो तो हो !
वकील सा० : यह बात तो ठीक हैं पर क्या आप भगवान की पूजा अर्चना वाला धर्म नहीं करते?
EKK- हाँ, मैं भगवान की पूजा-अर्चना करता हूँ अवश्य करता हूँ पर उनके स्वरूप को समझकर अपने स्वरूप को समझने के लिए प्रयास करता हूँ, किसी लौकिक सुख के लिए नहीं, कोई मान कषाय आदि के पोषण को नहीं, उस कला को सीखने जाता हूँ कि; “भगवान मुझे पता है कि आप अकउआ के पेड़ के जीव थे तो आपने ऐसा क्या पुरुषार्थ किया कि आप महावीर बन गए”। एवं इसलिए कि शरीरादि पर पदार्थों से भेदज्ञान होकर मेरे शुद्धात्मा का बोध होवे। इसके लिए अन्याय अनीति एवं अभक्ष्य का त्याग कर सम्यकत्व का पुरुषार्थ करूँ तथा मार्ग प्राप्त हो जाने पर बहुमान प्रगट करने जाता हूँ कि आप यह सम्यक मार्ग न बताते तो मुझ पामर का कल्याण कैसे होता।
वकील सा० : तो नाच गाना, बोली, तीर्थ भ्रमण यह आप नहीं करते? EKK- परिणति की अस्थिरता में शुभराग में प्रवर्तन होता हैं तो यह सब होता हैं होना भी चाहिए पर उसकी मर्यादा हैं, कोई कार्य जो हिंसामय हो, अन्याय अनीतिमय हो, परपीड़ाकारक हो, ऐसा अमर्यादित कार्य भक्ति के नाम पर मैं नहीं करता क्योंकि धर्म तो वह हैं, जो संसार में घुमाने वाले कर्मों का नाश कर दे तो वह धर्म तीर्थ में, लाइट की रोशनी में, बोली में, मंदिर बनवाने में, तेज आवाज में गाने में नहीं मिलता वह तो एकांत में बैठकर तत्वविचार करने पर प्राप्त होता हैं वही मैं करता हूँ।
वकील सा० : मना कि आपके एकांत में बैठ जाने से धर्म होता है, तो फिर प्रभावना आदि कार्य कैसे होगें? EKK- महोदय यह सत्य है कि मूल धर्म तो स्वभाव की आराधना पूर्वक ही होता है पर परिणति की अस्थिरता में पाप से बचने शुभराग में प्रवर्तन का भाव उत्पन्न होता ही है, उस समय साधक जीव को भक्ति, पूजा, नाच गान मंदिर बनवाना आदि यह सब कार्य धर्म के नाम पर होते हैं पर एक तो वह उसे धर्म नहीं मानता दूसरे वह कार्य इतने अमर्यादित भी नहीं होते कि धर्म का मुख्य प्रयोजन वीतरागता गायब हो जाये और मात्र नाच-गान ही बचे। इसमें स्वयं का भी हित विशेष नहीं है और अमर्यादित होने से, पर पीढ़ाकारक होने से उसे प्रभावना भी कैसे कहें?
वकील सा० : तो प्रभावना किसे कहें? जो धर्म को कहे? EKK- जीव स्वयं शांति और निराकुलता का वेदन जिस धर्म के आधार से करे वह शांति को पाने कोई और जीव उस धर्म का मार्ग तलाशें यह ही सच्ची प्रभावना है और ऐसा कार्य जिस जीव से हो वह जीव धर्मात्मा है।
जज सा० : कोर्ट का समय हो रहा हैं, चर्चा काफी हो गयी हैं; अब कोई प्रभावित कुछ कहना चाहता हो तो वह आकर कहे अन्यथा अंतिम बहस हेतु मैं दोनों पक्षों के सीनियर वकीलों को बुलाना चाहता हूँ।
आवाज लगाने वाला : सीनियर वकील (वकील 3 एवं 4) हाजिर हों… {दोनों वकील जज सा० को अभिवादन करते हैं} वकील सा०(3)- My लॉर्ड ! आपके समक्ष अपनी अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुरूप सभी धर्म करने वाले प्रस्तुत हुए; मेरे दोस्त आपने भी धर्मात्मा भाइयों के धर्म करने को सुना होगा कि जिसमें उठापटक तो दिखी पर धर्म जिसका उद्देश्य आत्मशांति था उसकी गंध भी नहीं दिखी। केवल दूसरों को परेशानी… वकील सा०(4)- मेरे काबिल दोस्त धर्म उसी का नाम ही तो हैं जो दिखे; तो उठापटक न होगी तो रीने रीने रहकर कोई धर्म होता हैं क्या? और यदि किसी को मेरे धर्म करने से परेशानी हैं तो क्या धर्म करना छोड़ दें।
वकील सा० (3)- पर धर्म तो उसका नाम हैं जहाँ स्वयं के परिणाम उज्ज्वल हों, कषाय मंद होते हुए अभाव को प्राप्त हो जाएं और अन्य जीवों को पीड़ादायक न हों। वकील सा० (4)- बराबर हैं, पर धर्म में भगवान हैं और भगवान हैं तो उन्हें पूजा जाएगा और जब पूजा जाएगा तो पुष्प, दीप, धूप, फल आदि सामग्री भी प्रयोग होगी; भगवान के मंदिर भी होगें, तीर्थ भी होगें, भक्ति अर्चना भी होगी; अब उसमें यदि जीव हिंसा कहोगें तो भगवान की पूजा कैसे होगी? और शास्त्र में यही सब करने की आज्ञा भी है। वकील सा० (3)- यह सही है कि पूजा की सामग्री शास्त्रों में यह कही हैं पर यह पूजा इन्द्रों ने या देवों ने इस प्रकार की हैं, ऐसा वर्णन है और उनकी सामग्री देवोपुनीत विक्रीया से निर्मित हैं; अतः हिंसात्मक नहीं हैं, पर हम तो अपने विवेक का इस्तेमाल करके प्रतीक रूप में ऐसा कुछ कार्य कर सकते हैं कि पूजा भी हो जाए, भाव विशुद्धि भी बनी रहे और जीवों की विराधना भी न हो, जीव हिंसा करने से धर्म कैसे होगा? वकील सा० (4)- ऑब्जेक्शन माइ लॉर्ड, मेरे काबिल दोस्त मेरे मुवक्किल को हिंसा करने वाले बता रहें हैं!
जज सा० : objection overruled।।। वकील सा० (3)- जज सा० फल भावों का लगता हैं, क्रिया का नहीं इसलिए धर्म में भावों की प्रधानता मुख्य हैं जिसके निरंतर विशुद्ध होते रहने का पुरुषार्थ हो तो ऐसा तो है नहीं वरन् पूरा धर्म दिखावे का ही बना रहता हैं। वकील सा०(4)- महोदय, इन्हें प्रत्येक क्रिया से आपत्ति हैं, इनका मतलब हैं कि धर्म करने वाला एक कोने में बैठ जाए, न माइक हो, न नाच गाना हो, न तीर्थयात्रा हो, न मंदिर बने, तो कौन समझेगा कि धर्म कहाँ हो रहा हैं? वकील सा० (3)- महोदय, आप सब करें इनको हम मना नहीं कर रहे पर अपने लिये करें, प्रदर्शन के लिए या अहं पोषण को न करें, स्वयं की पवित्रता से भरा जीवन हो या जहाँ शांति, निरकुलता सहजता हो, उसकी गंध स्वतः फैलेगी तो सारी दुनियाँ जान जाएगी कि यह धर्मात्मा हैं और यहाँ धर्म हो रहा हैं चिल्लाने का नाम धर्म थोड़े हैं। धर्म आत्मा की शुध्द परणति को कहते हैं। वकील सा० (4)- objection माइ लॉर्ड; आप मेरे मुवक्किल को अपशब्द कह रहें हैं…
जज सा० : objection overruled।।। वकील सा० (3)- महोदय, मेरे धर्म करने से मेरे सुखी होने का उद्देश्य पूरा न होता हो एवं किसी को मेरे धर्म करने से किंचित भी कष्ट हो जैसा कि आपके समक्ष जीवों ने स्वयं अपना बखान किया हैं, उसको धर्म संज्ञा कैसे मिलें?
किसी कवि ने कहा भी हैं कि :
मौन के नारे ही शोर मचा रहें हैं, अदालत के न्याय ही चोर बना रहें हैं। आज हम किस डॉक्टर के पास जाएं, कि ताकत के कैपसूल ही कमजोर बना रहे हैं।। वकील सा० (4)- महोदय, धर्म अकेले भी होता है और समूह में भी होता है, समूह में होने वाला धर्म ज्यादा प्रभावक होता है सभी एक साथ धर्म कर सकें इस हेतु एक ऐसा उपाय किया हैं कि कोई माइक-स्पीकर ही नहीं लगाएंगे, जिससे किसी को
दिक्कत हो, हमने सीधा प्रसारण करके घर-घर की टीवी और मोबाईल से धर्म करवाना शुरू कर दिया है, जिसका जब मन हो तो खोलकर धर्म कर लें। अब तो आपको आपत्ति नहीं होना चाहिए। वकील सा०(3)- माइ लॉर्ड, यह भी धर्म करने की एक नई विकृत पद्धति चालू हो गयी हैं कि अब पूरा धर्म मोबाईल में भर गया हैं, एक कोई वाक्य किसी ने सुबह से मोबाईल में लिख दिया वह अपनाना किसी को नहीं हैं पर फॉरवर्ड होता रहता हैं। इस तरह मोबाईल और टीवी धर्मात्मा होते जा रहे हैं। वकील सा०(4)- कुल मिलाकर यह बात समझ आ रही है कि आपको हर क्रिया से ही आपत्ति है, आपको तो जुलूस से भी आपत्ति हैं जबकि जुलूस निकालने में तो शासन की भी आज्ञा हैं। वकील सा०(3)- नहीं, हमें जुलूस से आपत्ति नहीं हैं। हम तो यह चाहते हैं कि जुलूस में लोग अनुशासित होकर चलें एवं सभी कार्य मर्यादा में हो। तो जुलूस से भला किसे आपत्ति होगी। वकील सा०(4)- आप चाहते हैं कि लोग चौथे काल में पहुँच जाएं और वह धर्म करें, अरे भाई यह आधुनिक युग हैं, इसमें जबतक धर्म को मॉडर्न नहीं बनाया जाएगा, तबतक लोग आकर्षित नहीं होंगे क्योंकि लोगों को पार्टी क्लब आदि के संस्कार हैं इसलिए उसी संस्कृति में धर्म को करना होगा नहीं तो केवल आप ही धर्मात्मा बचेंगे। आज धर्म करने को भावों की नहीं रुपयों कि प्रधानता चाहिए। वकील सा०(3)- पर हमारे धर्मात्मा पूज्य पुरुष या ज्ञानियों ने तो धन या परिग्रह को कुगति का कारण कहा हैं और जिन्होंने भावों से बिना प्रदर्शन किये हुए धर्म के नाम पर अपने इष्ट को स्मरण किया हैं उन्हें ही श्रेष्ट धर्मात्मा कहा हैं, इसलिए आचार्यों ने मेंढक को श्रेष्ट कहा किसी धनाढ्य सेठ को नहीं। गुजरात के एक ज्ञानी विद्वान अपने प्रवचनों मे अक्सर बोलते थे कि "है! सेठ कुकरी सूकरी के पेट मे जन्म लेकर बिलबिलाएगा”। जबकि निर्धन ज्ञानी धर्मात्मा को वह पंडित जी कहकर प्रशंसा करते थे। इसके अलावा शास्त्रों में शेर, नेवला, बंदर को धर्मात्मा कहा, जबकि रुपयों से अहं प्रदर्शन करने वालों का तो सूची में नाम ही नहीं हैं। वकील सा०(4)- महोदय बहस बढ़ाने का कोई फायदा नहीं हैं मेरा तो यहीं कहना हैं कि जमाने के हिसाब से धर्म होता हैं; धर्म करने के लिए रुतवा भी चाइए और रुपया भी चाइए। इस कारण मेरे मुवक्किल रुतवे के साथ रुपया खर्च करके धर्म करते हैं और करवाते है, जिस कारण उनके साथ धर्म करने वालों कि संख्या हजारों और लाखों में होती हैं। इसलिए वह ही सच्चा धर्मी आत्मा हैं और अकेले ही परिणाम विशुद्धि करके धर्म करने वाले अकेले ही हैं, उन्हें कौन देखता है कि यह धर्मात्मा हैं इसलिए मेरे इतने उचित तर्कों के आधार पर आपको स्वीकार करना योग्य हैं। मैं अपना पक्ष यहीं समाप्त करता हूँ (I rest my case my lord!!!) वकील सा०(3)- महोदय मेरे काबिल दोस्त की कोई भी बात आचार्यों के मत से मेल नहीं खाती है, धर्म तो साम्यभाव का नाम है और साम्यभाव निज स्वरूप अनुभव के बिना प्राप्त नहीं हो सकता, पर परद्रव्य में किंचित मात्र भी करतत्व-ममत्व शेष
हैं तबतक राग : द्वेष रूप परिणति बनी ही रहेगी; और राग-द्वेष के सद्भाव में कभी साम्यभाव प्रगट नहीं होगा,- साम्यभाव के बिना चारित्र नहीं होगा और चारित्र के बिना धर्म नहीं होगा। धर्म कि चार परिभाषाएं आचार्य देव ने दी है:- वस्तु का स्वभाव धर्म है, क्षमा आदि भाव धर्म हैं, रत्नत्रय ही धर्म हैं, जीवों की दया पालना धर्म हैं। इन चार परिभाषाओं में एक का भी पालन मेरे काबिल दोस्त के मॉवक्किल नहीं करते
हैं, तो उन्हें धर्मात्मा कैसे कहाँ जा सकता हैं? और जैसा की उनका कहना हैं कि रुतवे से धर्म करते हैं और कराते हैं; तो माइ लॉर्ड मुझे एक कवि की 4 पंक्ति याद आ रही हैं कि ;
ऊंचाई छूने जिनके हाथ नहीं पहुचते, ऐसे बोने कैसे ऊंचे हो सकते हैं। जिनके जीवन की चादर मैली रही सदा, वह दाग दूसरों के कैसे धो सकते है।।
अत : यहीं मैं कहना चाहता हूँ कि धर्मी आत्मा कौन हैं इसका फैसला भावों की विशुद्धि के आधार पर ही होने योग्य हैं; आरंभ परिग्रह से युक्त प्रदर्शन पर नहीं और आपने देखा कि एकाकी रूप से धर्म करने वाले जीव के जीवन में धर्म के नाम पर होने वाली सभी क्रियाएं हैं; जैसे पूजा, भक्ति, तीर्थयात्रा, जुलूस आदि जिनमें सभी कार्य मर्यादित एवं बाहरी दिखावे से रहित हैं, जिस कारण भावों की विशुद्धि भी पूर्ण है, जीवन में शांति भी है एवं अन्य जीवों की विराधना नहीं है, धर्म अहं पोषण को न होकर स्वयं के परिणामों की निर्मलता कैसे हो, इस हेतु किया जा रहा है; जो कर्म काटने के लिए कारण हैं, जिससे शाश्वत सुख
की प्राप्ति हो सके अत : वह ही धर्मी आत्मा हैं ऐसा मेरा कहना है। I rest my case…
जज सा० : दोनों पक्षों ने धर्म करने के अपने-अपने तरीके मेरे सामने प्रस्तुत किये एवं तर्क और युक्ति से वह किस प्रकार सही है इस बात को भी मेरे सामने रखा; सभी पक्षों पर विचार एवं मंथन करने के उपरांत फैसला मैं अगली तारीख पर सुनाऊँगा तबतक के लिए अदालत को स्थगित किया जाता हैं।
(… और जज सा० उठ जाते हैं)
{यहाँ कोई भजन, नृत्य या कविता पाठ हो सकता हैं, जैसे- निग्रंथता की भावना अब हो सफल मेरी…, या सच्चा जैन उसी को कहते…, निरखो अंग अंग जिनवर के…}
-: अगला दृश्यः-
अगले दिन जज सा० फैसला सुनाते हैं, सभी वकील एवं संबंधित लोग शांति से खड़े रहते हैं (जज सा० फैसला टेबल पर रखकर पढ़कर सुना रहें हैं)
जज सा० : (हथोड़ा ठोकते है) सभी शांत हो जाएं, चर्चा इस बात पर चल रहीं हैं कि धर्मी आत्मा कौन हैं?
इस हेतु सभी पक्ष अपनी अपनी धारणा को लेकर प्रस्तुत हुए, उनकी प्रवृति से लोग किस तरह प्रभावित होते हैं वह पक्ष भी प्रस्तुत हुए; धार्मिक क्रियाकलाप को करने से उत्पन्न विसंगतिया तो दिखी पर उन क्रियाकलाप से सुख के प्रयोजन की सिद्धि किस प्रकार होती है यह भाषित नहीं हुआ। तमाम गवाहों, दलीलों एवं तर्कों के माध्यम से सम्पूर्ण प्रकरण अदालत के सामने आया; सभी ने धर्म करने की बात अपने तरीके से कही पर धर्म निज और पर को किस तरह सुखदायक बन रहा हैं इस बात की सिद्धि एक पक्ष को छोड़कर कोई और नहीं कर सका क्योंकि ग्रंथकार आचार्य ऐसा लिखते हैं;
देशयामि समीचीनं धर्मकर्म निर्वहनं, संसार दुखता सत्वान यो धर्म युतयो सुखः।
इसका अर्थ है सच्चा धर्म वह है जो जीव को चार गति के दुख से निकाल कर परम उत्तम मोक्ष सुख प्रदान कर दे और ऐसा धर्म वीतराग स्वभाव के आश्रय से ही प्रगट होता हैं। भगवान का आश्रय इस कला को सीखने के लिए लिया जाता हैं, भगवान
हमें सुख दे देगें इस बुद्धि से धर्म करना ही व्यर्थ हैं क्योंकि ईश्वर जगत के परिणमन को जानता तो है, करता कुछ नहीं है क्योंकि ईश्वर किसी का कुछ करने में ही लगा रहेगा तो अपना आनंद कब करेगा? धर्म करने के फल में कषायों की मंदता अथवा उनका अभाव होना चाहिए पर यदि धर्म के करने से मान लोभ कषाय आदि का ही पोषण हो रहा हो तो उसे धर्म नहीं कहा जा सकता। प्रस्तुत धर्मात्माओं के अधिकांश पक्ष किसी ना किसी कषाय का पोषण करते दिखे तो कोई तो नवीनता या आधुनिकता की दौड़ चाहता है। प्राचीनता को नष्ट करना जो कहीं से भी उचित नहीं हैं क्योंकि प्राचीनता से तो इतिहास बनता है जिसे संरक्षित करने के लिए शासन द्वारा अलग विभाग बनाया गया है। वैसे भी हम देखते हैं कि छात्रों द्वारा जो पीएचडी की जाती है, उनके लिए इस प्रकार के शिलालेख आदि महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यहाँ यह अवश्य हैं कि जुलूस दान आदि कार्य धर्म के ही अंग हैं एवं कोई करता है तो गलत भी नहीं हैं लेकिन अमर्यादित एवं अनुशासनहीनतापूर्ण किसी कार्य की अनुमति न कानून देता हैं, न ही धर्म की ही आज्ञा हो सकती हैं और यदि धर्म के कोई भी कार्य व्यवसायिक दृष्टि से किये जा रहे हो यह तो कैसे भी उचित नहीं कहा जा सकता है, जहाँ परमार्थ हित न छिपा हो। पर हाँ एक पक्ष जिसमें जीव धर्म के कार्यों का प्रदर्शन न करते हुए यत्नाचार पूर्वक एवं बहुत आरंभ और धन से धर्म को मोल खरीदने की प्रवृति से रहित क्रियाकलाप वाला दिखा; यहाँ धर्म करने का उद्देश्य कर्म काटने की कला के ज्ञान करने की भावना एवं वीतराग भावों की ओर बढ़ने का परिणाम स्पष्ट दिखाई दिया, यहाँ भगवान की भक्ति और स्वयं की साधना के बीच का संतुलन स्पष्ट देखा गया। इस तरह धर्म साधना में जीवों की हिंसा भी नहीं हैं और किसी अन्य जीव को परेशानी उत्पन्न हो ऐसी भी बात नहीं है। एवं धर्म करते हुए इनके समस्त कार्य अनुशासित एवं मर्यादित प्रतीत हुए और इस तरह से धर्म करने वाले जीव के जीवन में शांति भी है यह भी देखने में आया, इन सबको देखकर लगा कि यह ही सही है। इन सब कार्यों एवं गतिविधियों को देखकर वकीलों के तर्क गवाह एवं उपस्थित साक्ष्य को मद्देनजर रखते हुए अदालत फैसला देती है कि एकाकी रूप से अपने स्वरूप को जानने की भावनापूर्वक भगवान की पूजा आदि कार्य जिनके जीवन में हैं ऐसा करने वाला ही “धर्मी आत्मा हैं, अदालत का यहीं फैसला है।" {जज सा० उठ जाते हैं, सभी वीतराग धर्म की जय बोलते हैं}
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