धर्म के दशलक्षण - जैन स्वाध्याय सामग्री | Dharm Ke Dashlakshan

धर्म के दशलक्षण

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

अनुक्रमणिका

लेखक :
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
शास्त्री, न्यायतीर्थ, साहित्यरत्न, एम.ए., पीएच.डी.
श्री टोडरमल स्मारक भवन, ए-4, बापू नगर, जयपुर - 302015

प्रकाशक :
रवीन्द्र पाटनी फैमिली चैरिटेबल ट्रस्ट
एवं
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-4, बापू नगर, जयपुर - 302015
फोन : 0141-2707458, 2705581 • फैक्स : 2704127
E-mail : [email protected]

हिन्दी

प्रथम तेरह संस्करण : 72 हजार
(अक्टूबर 1977 से अद्यतन)
चौदहवाँ संस्करण : 2 हजार
(15 अगस्त, 2007)
आत्मधर्म : 10 हजार
(सम्पादकीय के रूप में)
योग : 84 हजार

गुजराती :

प्रथम सात संस्करण : 20 हजार 900
(जुलाई 1979 से अगस्त 2007 तक)

मराठी :

प्रथम संस्करण : 3 हजार 100
(जनवरी, 1981)

कन्नड़ :

प्रथम संस्करण : 2 हजार 200
(जनवरी, 1981)

तमिल :

प्रथम संस्करण : 1 हजार 200
(जनवरी, 1981)

अंग्रेजी :

प्रथम तीन संस्करण : 6 हजार 400
(जनवरी, 1981 से अद्यतन)
योग : 1 लाख 17 हजार 800

मूल्य : सोलह रुपये

मुद्रक :
प्रिन्ट ओ लैण्ड
बाईस गोदाम, जयपुर

प्रकाशकीय

(चौदहवाँ संस्करण)

पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर द्वारा प्रकाशित डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल की लोकप्रिय कृति ‘धर्म के दश लक्षण’ का हिन्दी भाषा में चौदहवाँ संस्करण प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है।

दशलक्षण महापर्व ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जो परमोदात भावनाओं का प्रेरक, वीतरागता का पोषक तथा संयम व साधना का पर्व है। सम्पूर्ण भारतवर्ष का जैन समाज इसे प्रतिवर्ष बड़े ही उत्साह से मनाता है। दश दिन तक चलने वाले इस महापर्व के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें विद्वानों के उत्तमक्षमादि दशधर्मों पर व्याख्यान भी आयोजित किए जाते हैं। सब जगह सुयोग्य विद्वानों का पहुँचना संभव नहीं हो पाता; अतः जैसा गम्भीर व मार्मिक विवेचन उक्त धर्मों का होना चाहिए, वैसा सहज संभव नहीं हो पाता है।

पूज्य श्रीकानजीस्वामी द्वारा जो अध्यात्म की पावन धारा प्रवाहित हुई है, उसने जैनसमाज में एक आध्यात्मिक क्रान्ति पैदा कर दी है। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर लाखों लोग आत्महित की ओर मुड़े हैं। सैकड़ों आध्यात्मिक प्रवक्ता तैयार हुए हैं, जो प्रतिवर्ष इस अवसर पर प्रवचनार्थ बाहर जाते हैं।

इस पुस्तक के लेखक डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल भी उन गिने-चुने उच्चकोटि के विद्वानों में से एक हैं, जिन्हें पूज्य स्वामीजी से सन्मार्ग मिला है। दशलक्षण पर्व पर प्रतिवर्ष जहाँ भी जाते रहे हैं, वहाँ दशधर्मों पर उनके मार्मिक व्याख्यान होने पर आबाल-गोपाल सभी उनसे सीमातीत प्रभावित होते रहे हैं।

अनेक आग्रहों-अनुरोधों के बावजूद तथा उनका स्वयं का विचार होते हुए भी वे व्याख्यान निबद्ध न हो सके, पर सन् 1976 में डॉ. भारिल्लजी के कन्नूरों पर जब हिन्दी आत्मधर्म के सम्पादन का भार आया, तब वे व्याख्यान निबद्ध होकर सम्पादकीय के रूप में क्रमशः आत्मधर्म में प्रकाशित हुए। उक्त निबन्धों का निश्चय-व्यवहार की सन्धिपूर्वक मार्मिक विवेचन जब सुबोध, सतत तथा आकर्षक शैली में पाठकों तक पहुँचा तो वे झूम उठे। सामान्य पाठकों ने ही नहीं, पूज्य स्वामीजी ने भी उनकी पुस्तकण्ठ से भरपूर सराहना की। स्थान-स्थान से यह माँग आने लगी कि इन्हें शीघ्र ही अनेक भाषाओं में पुस्तकाकार प्रकाशित कर जन-जन तक पहुँचाया जाय, इनका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाय, जिससे डाक्टर साहब के चिन्तन का लाभ जन-जन को मिल सके।

सन् 1977 एवं 1978 में सोनगढ़ में डॉ. भारिल्लजी के ही निर्देशन में प्रवचनकार-प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये गये। इनमें प्रवचनकारों को इन

निबन्धों का अध्ययन कराया गया, जिससे शताधिक प्रवचनकारों के माध्यम से यह बात गाँव-गाँव में पहुँचने लगी।

आत्मधर्म के हिन्दी, मराठी, कन्नड़ और तमिल संस्करण के सम्पादकीय के रूप में 10 हजार प्रतियों में प्रकाशित होने के साथ-साथ इन निबन्धों को पुस्तकाकार रूप में हिन्दी में 72 हजार, गुजराती में 20 हजार 900, मराठी में 3 हजार 100, कन्नड़ में 2 हजार 200, तमिल में 1 हजार 200 तथा अंग्रेजी में 6 हजार 400 प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अब यह हिन्दी में चौदहवाँ संस्करण 2 हजार की संख्या में प्रकाशित होकर आपके हाथों में है। इस प्रकार 30 वर्ष के काल में इन निबन्धों की 10 हजार सम्पादकीय के रूप में तथा 1 लाख 17 हजार 800 प्रतियों का प्रकाशन पुस्तकाकाररूप में हुआ है जो लेखक की लोकप्रियता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अबतक उनके द्वारा लिखी गई 65 पुस्तकों के अनेकानेक संस्करण 40 लाख की संख्या में प्रकाशित होकर समाज में क्रान्ति की लहर पैदा कर चुके हैं। वे जैन समाज के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों में अग्रगण्य हैं।

आप मात्र लोकप्रिय लेखक ही नहीं प्रभावक वक्ता, एक सुयोग्य सम्पादक, कुशल अध्यापक एवं सफल नियोजक भी हैं। पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी की आप पर असीम कृपा रही है। वे बारम्बार कहा करते थे-

“पण्डित हुकमचन्द तत्त्वप्रचार के क्षेत्र में एक हीरा है, वर्तमान में हो रहे तत्त्वप्रचार में उसका बड़ा हाथ है।”

सच बात तो यह है कि पूज्य गुरुदेवश्री के प्रताप से ऐसे अनेक हीरे उत्पन्न हो गये हैं, जो अपने आत्मकल्याण की दृष्टि से तत्त्वप्रचार के कार्यों में बिना किसी अपेक्षा के संलग्न हैं। अध्यात्मजगत को जो अनेक सेवाएँ डॉ. भारिल्ल की प्राप्त हो रही हैं, उनका संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है -

दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़ के मुखपत्र आत्मधर्म के हिन्दी, मराठी, कन्नड़ और तमिल - इन चार संस्करणों का सम्पादन तो पूर्व में आपके द्वारा हुआ ही है, किन्तु आत्मधर्म का प्रकाशन किन्हीं कारणों से अवरुद्ध हो जाने के कारण, उसी के स्थान पर पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘वीतराग-विज्ञान’ हिन्दी एवं मराठी के अब आप सम्पादक हैं।

नए विद्वान तैयार करने के लिए आपने भागीरथ प्रयत्न कर महाविद्यालय स्थापित करने की अनुकरणीय योजना का सूत्रपात किया है। योजनानुसार वर्तमान में श्री कुन्दकुन्द कहान दि. जैन सुरक्षा ट्रस्ट, मुम्बई द्वारा संचालित श्री टोडरमल दि. जैन सि. महाविद्यालय में श्री रवीन्द्र पाटनी फैमिली चैरिटेबल ट्रस्ट, मुम्बई, श्री वीतराग-विज्ञान स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, अजमेर, पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट, देलालाली, राजमल कल्याणमल

भूमिका

पट्टनी सिद्ध चेतना ट्रस्ट, कोलकाता, मुमुक्षु मण्डल, कोलकाता, श्रीमान् भूतमलजी भण्डारी, बैंगलोर, अभिनन्दनप्रसादजी सहारनपुर आदि अनेक संस्थाओं एवं दानदाताओं के सहयोग से सम्पूर्ण देश से आवे विभिन्न भाषा-भाषी 160 छात्र श्री टोडरमल स्मारक भवन, जयपुर में स्थापित उक्त विद्यालय के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इनके माध्यम से अभी तक 419 जैनदर्शन शास्त्री विद्वान समाज को प्राप्त हो चुके हैं।
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट द्वारा संचालित वीतराग-विज्ञान विद्यापीठ परीक्षा बोर्ड, जिसमें प्रतिवर्ष लगभग बीस हजार छात्र-छात्राएं धार्मिक परीक्षा देते हैं, डॉ. साहब ही चला रहे हैं। उसकी पाठ्यपुस्तकें नवीन शैली में प्रायः आपने ही तैयार की हैं। उन्हें पढ़ाने की शैली में प्रशिक्षित करने के लिए ग्रीष्मकालीन अवकाश में प्रतिवर्ष प्रशिक्षण-शिविर भी डॉक्टर साहब के निर्देशन में आयोजित किये जाते हैं, जिनमें वे स्वयं अध्यापकों को प्रशिक्षित करते हैं।
अब तक 41 शिविरों में 7992 अध्यापक प्रशिक्षित हो चुके हैं। तत्संबंधी ‘प्रशिक्षण निर्देशिका’ भी आपने लिखी है।
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट में धार्मिक साहित्य का बिक्री विभाग भी चलता है, जिसकी बिक्री अब 24 लाख रुपये प्रतिवर्ष पहुँच गई है।
भारतवर्षीय वीतराग-विज्ञान पाठशाला समिति के भी आप मंत्री हैं। इस पाठशाला समिति के प्रयत्नों से देश में 328 वीतराग-विज्ञान पाठशालाएँ चल रही हैं, जिनमें हजारों छात्र धार्मिक शिक्षा प्राप्त करते हैं।
इनके अतिरिक्त निरन्तर होनेवाले आपके प्रभावशाली प्रवचनों से जयपुर ही नहीं, सम्पूर्ण भारतवर्ष लाभ उठाता है, जिससे तत्त्वप्रचार को अभूतपूर्व गति मिलती है। हर्ष की बात है कि 27 जून, 1984 से 1 अगस्त, 1984 तक पहली बार आपने अमेरिका और यूरोप के प्रमुख नगरों का दौरा किया। वहाँ आपके प्रवचनों से लोग इतने प्रभावित हुए कि तभी से प्रतिवर्ष आपका कार्यक्रम निर्धारित किया जाने लगा। इस प्रकार अब तक 25 बार अमेरिका, इंग्लैण्ड एवं जापान, हांगकांग, कनाडा, जर्मनी, बेल्जियम, स्विटजरलैण्ड, दुबई, आबूधबी, सरजाह, केनिया में जैनधर्म का डंका बज चुका है। आपके कार्यक्रमों से वहाँ अभूतपूर्व धर्मप्रभावना हो रही है।
पूज्य गुरुदेवश्री के पुण्य-प्रताप से चलनेवाली अन्य गतिविधियों में भी आपका बौद्धिक सहयोग निरन्तर प्राप्त होता रहता है।
साधारण जनता के साथ-साथ विद्वद् समाज ने भी इस कृति को दिल खोलकर सराहा है। समाजमान्य विद्वानों की कुछ सम्मतियाँ पुस्तक के अन्त में दी गई हैं।
पूज्य गुरुदेव श्रीकानजी स्वामी ने जब इसे आद्योपान्त पढ़ा तो वे इतने गद्गद् हो गये कि लगातार दो माह तक इस कृति की प्रशंसा करते रहे, लोगों को इसके अध्ययन की प्रेरणा देते रहे। इस कृति के सन्दर्भ में कहे गये उनके कतिपय वाक्य इस प्रकार हैं-
“गजब किया है, लिखने व कहने की पद्धति गजब है। 44 वर्ष की छोटी उम्र पर गजब लिखा है। त्यागधर्म और संयमधर्म की व्याख्या में तो गजब किया है। दान व त्याग में क्या अन्तर है - इसका विस्तृत खुलासा किया है। इतना सुन्दर लिखा है कि पढ़ते हुए पुस्तक छोड़ने का मन ही नहीं होता। इसकी गहराई की खबर तो उसे पड़ेगी, जो बचने का निश्चय भी करेगा, बस यों ही बांधे जाने से कुछ हाथ नहीं लगेगा।
हुकमचन्दजी का क्षयोपशम बहुत है और शैली ऐसी है कि बात पढ़ने वाले के गले उतर जाती है। गम्भीर प्रश्नों के अत्यन्त सरल भाषा में उत्तर दिये हैं। जैसा स्पष्टीकरण पण्डितजी ने किया है, वैसा तो मैं भी नहीं कर सकता हूँ। पण्डित आत्मारामजीलाल ने जो यह लिखा है कि हुकमचन्दजी को सरस्वती का वरदान प्राप्त है, वह एकदम सही है।”
जिस कृति के बारे में गुरुदेवश्री इस प्रकार के विचार व्यक्त करते हों, उसके बारे में हम विशेष क्या कहें?
दशलक्षण महापर्व एक ऐसा अवसर है, जब सारे देश में आध्यात्मिक वातावरण बन जाता है। इस अवसर पर प्रवचनार्थी विद्वानों की माँग बढ़ जाती है। पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट के पास ही इस वर्ष 540 स्थानों से माँग थी, पर हम 526 स्थानों पर ही विद्वान भेज सके हैं। जहाँ विद्वान नहीं पहुँच पाये, वहाँ की समाज के लिए यह पुस्तक अत्यन्त उपयोगी है। एक भाई इसका वाचन करे और सब शान्ति से सुनें तो वही आनन्द आवेगा, जो एक विद्वान के प्रवचन सुनने से आता है। यह लिखते हुए हमें प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि अनेक स्थानों पर इसप्रकार के प्रयोग हुए हैं, जो पूर्णतः सफल रहे हैं।
उक्त दशधर्मों पर डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल के प्रवचनों के ऑडियो और वीडियो कैसेट भी उपलब्ध हैं; जो प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में बिकते हैं। पर्यूषण पर्व के अवसर पर वीडियो कैसेट स्थान-स्थान पर केबल टी.वी. पर भी प्रसारित होते हैं। इस संस्कार की कीमत कम करने हेतु अनेक महानुभावों ने आर्थिक सहयोग प्रदान किया है; सभी सहयोगियों का मैं हृदय से आभारी हूँ।
इस कृति से अधिक से अधिक लोग लाभ उठावें - इस पावन भावना के साथ विराम लेता हूँ।

रजेन्द्रकुमार पट्टनी
अध्यक्ष
रवीन्द्र पट्टनी फैमिली चैरिटेबल ट्रस्ट,
मुम्बई

ब्र. यशपाल जैन, एम.ए.
प्रकाशन मंत्री
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
जयपुर

दशधर्म-वन्दना

मंगलाचरण

जो क्रोध-मद-माया अपावन, लोभरूप विभाव हैं।
उनके अभाव स्वभावमय, उत्तमक्षमादि स्वभाव हैं।।
है सत्य शाश्वत ज्ञानमय, निजधर्म शेष अधर्म हैं।।
निज आत्मा में रमण संयम, रमण ही तप-त्याग है।
निज रमण आकिंचन्य है, निज रमण परिग्रह-त्याग है।।
निज रमणता ब्रह्मचर्य है, निज रमणता ‘दशधर्म’ है।
निज जानना पहचानना, रमना धर्म का मर्म है।।
अरहन्त हैं दशधर्म धारक, धर्म धारक सिद्ध हैं।
आचार्य हैं, उपाध्याय हैं, मुनिराज सर्व प्रसिद्ध हैं।।
जो आत्मा को जानते, पहचानते करते रमण।
वे धर्म-धारक, धर्म-धन हैं, उन्हें हम करते नमन।।

विषय-सूची

१. दशलक्षण महापर्व १
२. उत्तमक्षमा १०
३. उत्तममार्दव २४
४. उत्तमआर्जव ४०
५. उत्तमशौच ५२
६. उत्तमसत्य ७०
७. उत्तमसंयम ८३
८. उत्तमत्तप ९७
९. उत्तमत्याग ११६
१०. उत्तमआकिंचन्य १३५
११. उत्तमब्रह्मचर्य १५५
१२. क्षमावाणी १७२
१३. सम्मतियाँ १८६

दशलक्षण महापर्व

पर्वों की चर्चा जब भी चलती है, तब-तब उनका संबंध प्रायः खाने-पीने और खेलने से जोड़ा जाता है, जैसे - रक्षाबंधन के दिन खीर और लड्डू खाए जाते हैं, भोरें खले जाते हैं, राखी बाँधी जाती है; होली के दिन अमूक पकवान खाये जाते हैं, रंग डाला जाता है, होली जलाई जाती है; दीपावली के दिन पटाखे चलाये जाते हैं; आदि-आदि।

पर अष्टाव्हिका और दशलक्षण जैसे जैनपर्वों का संबंध खाने और खेलने से न होकर खाना और खेलना त्यागने से है। ये भोग के नहीं, त्याग के पर्व हैं; इसीलिए महापर्व हैं। इनका महत्त्व त्याग के कारण है, आमोद-प्रमोद के कारण नहीं।

आप किसी भी जैन से पूछिये कि दशलक्षण महापर्व कैसे मनाया जाता है तो वह यही उत्तर देगा कि इन दिनों लोग संयम से रहते हैं, पूजन-पाठ करते हैं, व्रत-नियम-उपवास रखते हैं, हरित पदार्थों का सेवन नहीं करते। स्वाध्याय और तत्त्व-चर्चा में ही अधिकांश समय बिताते हैं। सर्वत्र बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा शास्त्र सभाएँ होती हैं, उनमें उत्तमक्षमादि दशधर्मों का स्वरूप समझाया जाता है। सभी लोग कुछ न कुछ विरक्ति धारण करते हैं, दान देते हैं आदि अनेक प्रकार के धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। सर्वत्र एक प्रकार से धार्मिक वातावरण बन जाता है।

पर्व दो प्रकार के होते हैं - (१) शाश्वत और (२) सामयिक, जिन्हें हम त्रैकालिक और तात्कालिक भी कह सकते हैं।

तात्कालिक पर्व भी दो प्रकार के होते हैं - (१) व्यक्ति विशेष से संबंधित और (२) घटना विशेष से संबंधित।

धर्म के दशलक्षण

दीपावली, महावीर जयन्ती, रामनवमी, जन्माष्टमी आदि पर्व व्यक्ति विशेष से संबंध रखने वाले पर्व हैं, क्योंकि दीपावली और महावीर जयन्ती क्रमशः महावीर के निर्वाण और जन्म से संबंध रखती हैं और रामनवमी और जन्माष्टमी राम और कृष्ण के जन्म से संबंधित हैं।

घटना विशेष से संबंधित पर्वों में रक्षाबंधन, अक्षयतृतीया, होली आदि पर्व आते हैं, क्योंकि ये प्रसिद्ध पौराणिक घटनाओं से संबंध रखने वाले पर्व हैं। ऐतिहासिक घटनाओं से संबंधित आज के राष्ट्रीय पर्व - स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस कहे जा सकते हैं।

त्रैकालिक अर्थात् शाश्वत पर्व न तो किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित होते हैं, और न घटना विशेष से; वे तो आध्यात्मिक भावों से संबंधित होते हैं। दशलक्षण महापर्व एक ऐसा ही त्रैकालिक शाश्वत पर्व है, जो आत्मा के क्रोधादि विकारों के अभाव के फलस्वरूप प्रकट होने वाले उत्तमक्षमादि भावों से संबंध रखता है।

घटनाओं और व्यक्ति विशेष से संबंधित पर्व निश्चित रूप से अनादि नहीं हो सकते; क्योंकि वे संबंधित घटना या व्यक्ति से पूर्व संभव नहीं हैं। वे अनन्त भी नहीं हो सकते; क्योंकि जब भविष्य में कोई इनसे भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति उत्पन्न हो जायेगा या घटना घट जायेगी तो जगत् उसे याद रखने लगेगा, उससे संबंधित पर्व मनाने लगेगा, इन्हें भूल जायेगा। अगले तीर्थंकर उत्पन्न होने पर भविष्य में उनकी जयन्ती और निर्वाण-दिवस मनाया जायेगा, इनका इतिहासप्रकार हम भूतकाल की चौबीसी को भूल से बैठे हैं, उसीप्रकार भविष्य इन्हें भी याद नहीं रख पावेगा।

घटनाएँ और व्यक्ति कितने ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों, वे सार्वभौम और सार्वकालिक नहीं हो सकते। उन सबकी अपने-अपने क्षेत्र और काल संबंधी सीमाएँ हैं, वे असीम नहीं हो सकते। अतः वे ही पर्व सार्वभौम और सार्वकालिक हो सकते हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष या घटना विशेष से संबंधित न होकर सभी जीवों से, उनके भावों से, समानरूप से संबंधित हों। दशलक्षण महापर्व एक ऐसा ही महान पर्व है जो सब जीवों के भावों से

दशलक्षण महापर्व

समानरूप से संबंधित है। यही कारण है कि वह शाश्वत है, सबका है, और सदा रहेगा। उसकी उपयोगिता सार्वभौमिक और सार्वकालिक है।

दशलक्षण महापर्व सम्प्रदायविशेष का नहीं, सबका है। भले ही उसे मात्र सम्प्रदायविशेष के लोग ही क्यों न मनाते हों, पर वह सम्प्रदायिक पर्व नहीं है; क्योंकि वह सम्प्रदायिक भावनाओं पर आधारित पर्व नहीं है, उसका आधार सार्वजनिक है। विकारी भावों का परित्याग एवं उदात्तभावों का ग्रहण ही उसका आधार है, जो सभी को समानरूप से हितकारी है। अतः यह पर्व मात्र जैनों का नहीं, जन-जन का पर्व है। इसे सम्प्रदायविशेष का पर्व मानना स्वयं सम्प्रदायिक दृष्टिकोण है।

यह सब का पर्व है, इसका एक कारण यह भी है कि सभी प्राणी सुखी होना चाहते हैं और दुःख से डरते हैं। क्रोधादि भाव दुःख के कारण हैं और स्वयं दुःखस्वरूप हैं एवं उत्तमक्षमादि भाव सुख के कारण हैं और स्वयं सुखस्वरूप हैं। अतः दुःख से डरने वाले सभी सुखार्थी जीवों को क्रोधादि के त्यागूप उत्तमक्षमादि दशधर्म परम आराध्य हैं।

इसीप्रकार सभी को सुखकर और सन्मार्गदर्शक होने से यह दशलक्षण महापर्व सभी का पर्व है।

क्रोधादि विभावभावों के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि दशधर्मों का विकास ही जिसका मूल है, ऐसे दशलक्षण महापर्व की सार्वभौमिकता का आधार यह है कि सर्वत्र ही क्रोधादि को बुरा, अहितकारी और क्षमादि भावों को भला और हितकारी माना जाता है। ऐसा कौनसा क्षेत्र है, जहाँ क्रोधादि को बुरा और क्षमादि को अच्छा न माना जाता हो?

वह सार्वकालिक भी इसी कारण है; क्योंकि कोई काल ऐसा नहीं कि जब क्रोधादि को हेय और उत्तमक्षमादि को उपादेय न माना जाता रहा हो, न माना जाता हो और न माना जाता रहेगा। अर्थात् सर्वकालों में इसकी उपादेयता असंदिग्ध है। भूतकाल में भी क्रोधादि से दुःख व अशान्ति तथा क्षमादि से सुख व शान्ति की प्राप्ति होती देखी गई है, वर्तमान में भी देखी जाती है और भविष्य में भी देखी जायेगी।

उत्तमक्षमादि धर्मों की सार्वभौमिक त्रैकालिक उपयोगिता एवं सुखकरता के कारण ही दशलक्षण महापर्व शाश्वत पर्वों में गिना जाता है और इसी कारण यह महापर्व है।

यहाँ एक प्रश्न संभव है कि यह महापर्व त्रैकालिक है, अनादि-अनन्त है, तो फिर इसके आरंभ होने की कथा क्यों कही जाती है? कहा जाता है कि कालचक्र के परिवर्तन में कुछ स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आते हैं, जिन्हें जैन परिभाषा में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी के नाम से जाना जाता है। अवसर्पिणी में क्रमशः ह्रास और उत्सर्पिणी में क्रमशः विकास होता है। प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी में छह-छह काल होते हैं।

प्रत्येक अवसर्पिणी काल के अन्त में पंचम काल समाप्त और छठा काल आरंभ होता है, तब लोग अनार्यवृत्ति धारण कर हिंसक हो जाते हैं। उसके बाद उत्सर्पिणी आरंभ होती है और धर्मोत्थान का काल पकता है, तब श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से सात सप्ताह (४९ दिन) तक विभिन्न प्रकार की बरसात होती है, जिसके माध्यम से सुकाल पकता है और लोगों में पुनः अहिंसक आर्यवृत्ति का उदय होता है; एकप्रकार से धर्म का उदय होता है, आरंभ होता है और उस वातावरण में दश दिन तक उत्तमक्षमादि दशधर्मों की विशेष आराधना की जाती है तथा इसी आधार पर हर उत्सर्पिणी में यह महापर्व चल पड़ता है।

यह कथा तो मात्र यह बताती है कि प्रत्येक उत्सर्पिणी काल में इस पर्व का पुनरारम्भ कैसे होता है। इस कथा से दशलक्षण महापर्व की अनादि-अनन्तता पर कोई आँच नहीं आती।

यह कथा भी तो शाश्वत कथा है, जो अनेक बार दुहराई गई है और दुहराई जायगी; क्योंकि अवसर्पिणी के पंचमकाल के अन्त में जब-जब लोग इन उत्तमक्षमादि धर्मों से अलग हो जायेंगे और उत्सर्पिणी के प्रारंभ काल में जब-जब इसकी पुनरावृत्ति होगी, तब-तब उस युग में दशलक्षण महापर्व का इस तरह आरंभ होगा। वस्तुतः यह युगारंभ की चर्चा है, पर्वोंरंभ की

नहीं। यह अनादि से अनेक युगों तक इसीप्रकार आरंभ हो चुका है और भविष्य में भी होता रहेगा।

इसकी अनादि-अनन्तता शास्त्र-सम्मत तो है ही, युक्तिसंगत भी है; क्योंकि जब से यह जीव है तभी से यद्यपि क्षमादिस्वभावी है, तथापि प्रकटरूप (पर्याय) में क्रोधादि विकारों से युक्त भी तभी से है। इसीकारण ज्ञानानन्दस्वभावी होकर भी अज्ञानी और दुःखी है। जब से यह दुःखी है; सुख की आवश्यकता भी तभी से है। चूँकि सभी जीव अनादि से हैं, अतः सुख के कारण उत्तमक्षमादि धर्मों की आवश्यकता भी अनादि से ही रही है। इसीप्रकार यद्यपि अनन्त आत्माएँ क्षमादिस्वभावी आत्मा का आश्रय लेकर क्रोधादि से मुक्त हो चुकी हैं, तथापि उनसे भी अनन्तगुणी आत्माएँ अभी भी क्रोधादि विकारों से युक्त हैं, दुःखी हैं; अतः आज भी इन धर्मों की आराधना की पूरी-पूरी आवश्यकता है तथा सुदूरवर्ती भविष्य में भी क्रोधादि विकारों से युक्त दुःखी आत्माएँ रहने वाली हैं; अतः भविष्य में भी इनकी उपयोगिता असंदिग्ध है।

तीनलोक में सर्वत्र ही क्रोधादि दुःख के और क्षमादि सुख के कारण हैं। यही कारण है कि यह महापर्व शाश्वत अर्थात् त्रैकालिक और सार्वभौमिक है, सबका है। भले ही सब इसकी आराधना न करें, पर यह अपनी प्रकृति के कारण सबका है, सबका था और सबका रहेगा।

यद्यपि अष्टादश महापर्व के समान यह भी वर्ष में तीन बार आता है - (१) भादो सुदी ५ से १४ तक, (२) माघ सुदी ५ से १४ तक व (३) चैत्र सुदी ५ से १४ तक; तथापि सारे देश में विशालरूप में बड़े उत्साह के साथ मात्र भादो सुदी ५ से १४ तक, ही मनाया जाता है। बाकी दो को तो बहुत से जैन लोग भी जानते तक नहीं हैं। प्राचीन काल में बरसात के दिनों में आवागमन की सुविधाओं के पर्याप्त न होने से व्यापारारादि कार्य सहज ही कम हो जाते थे। तथा जीवों की उत्पत्ति भी बरसात में बहुत होती है। अहिंसक समाज होने से जैनियों का साधुगण तो चार माह तक गाँव से गाँव भ्रमण बंद कर एक स्थान पर ही रहते हैं, श्रावक भी बहुत कम भ्रमण करते

थे। अतः सहज ही सत्समागम एवं समय की सहज उपलब्धि ही विशेष कारण प्रतीत होते हैं-भादों में ही इसके विशाल पैमाने पर मनाये जाने के।

वैसे तो प्रत्येक धार्मिक पर्व का प्रयोजन आत्मा में वीतरागभाव की वृद्धि करने का ही होता है, किन्तु इस पर्व का संबंध विशेष रूप से आत्म-गुणों की आराधना से है। अतः यह वीतरागी पर्व संयम और साधना का पर्व है।

पर्व अर्थात् मंगल काल, पवित्र अवसर। वास्तव में तो अपने आत्म-स्वभाव की प्रतीतिपूर्वक वीतरागी दशा का प्रगट होना ही यथार्थ पर्व है; क्योंकि वही आत्मा को मंगलकारी है और पवित्र अवसर है।

धर्म तो आत्मा में प्रकट होता है, तिथि में नहीं; किन्तु जिस तिथि में आत्मा में क्षमादिरूप वीतरागी शान्ति प्रकट हो, वही तिथि पर्व कही जाने लगती है। धर्म का आधार तिथि नहीं, आत्मा है।

आत्मस्वरूप की प्रतीतिपूर्वक चारित्र (धर्म) की दश प्रकार से आराधना करना ही दशलक्षण धर्म है। आत्मा में दश प्रकार के सद्भावों (गुणों) के विकास से संबंधित होने से ही इसे दशलक्षण महापर्व कहा जाता है।

अनादिकाल से ही प्रत्येक आत्मा, आत्मा में ही उत्पन्न, आत्मा के ही विकार-क्रोध, मान, माया, लोभ, असत्य, असंयम आदि के कारण ही दुःखी और अशान्त रहता आया है। अशान्ति और दुःख मेटने का एकमात्र उपाय आत्माराधना है। आत्म-स्वभाव को जानकर, मानकर, उसी में जम जाने से, उसी में समा जाने से, अतीन्द्रिय आनन्द और सच्ची शान्ति की प्राप्ति होती है। ऐसे ही आत्माराधक व्यक्ति के हृदय में उत्तमक्षमादि गुणों का सहज विकास होता है। अतः यह स्पष्ट है कि उक्त पर्व का संबंध आत्माराधना से है, प्रकारान्तर से उत्तमक्षमादि दश गुणों की आराधना से है।

क्षमादि दश गुणों को दशधर्म भी कहते हैं। ये दशधर्म हैं-(१) उत्तमक्षमा (२) उत्तममार्दव (३) उत्तमआर्जव (४) उत्तमशौच (५) उत्तमसत्य (६) उत्तमसंयम (७) उत्तमतप (८) उत्तमत्याग (९) उत्तमआकिंचन्य, और (१०) उत्तमब्रह्मचर्य।

दशलक्षण महापर्व

ये दश धर्म नहीं, धर्म के दशलक्षण हैं; जिन्हें संक्षेप में दशधर्म शब्द से भी अभिहित कर दिया जाता है। जिस आत्मा में आत्म-रुचि, आत्म-ज्ञान और आत्म-लीनतारूप धर्म पर्याय प्रगट होती है, उसमें धर्म के ये दश लक्षण सहज प्रगट हो जाते हैं। ये आत्माराधन के फलस्वरूप प्रगट होने वाले धर्म हैं, लक्षण हैं, चिह्न हैं।

यद्यपि उक्त दशधर्म चारित्रगुण की निर्मल पर्यायें हैं, तथापि प्रत्येक के साथ लगा हुआ ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की अनिवार्य सत्ता को सूचित करता है। तात्पर्य यह है कि ये चारित्र गुण की निर्मल दशाएँ सम्यग्दृष्टि ज्ञानी आत्मा को ही प्रगट होती हैं, अज्ञानी मिथ्यादृष्टि को नहीं।

वस्तुतः चारित्र ही साक्षात् धर्म है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान तो चारित्ररूप वृक्ष की जड़ें (मूल) हैं। जैसे वृक्ष जड़ के बिना खड़ा नहीं रह सकता, पनप नहीं सकता, अथवा जड़ के बिना जैसे वृक्ष की एक प्रकार से सत्ता ही संभव नहीं है; उसीप्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानरूपी जड़ के बिना सम्यक्चारित्ररूपी वृक्ष खड़ा ही नहीं रह सकता, पनप नहीं सकता, अथवा इन दोनों के बिना सम्यक्चारित्र की सत्ता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

यद्यपि लोक में बहुत से लोग आत्म-श्रद्धान और आत्म-ज्ञान के बिना भी बंधन के भय एवं स्वर्ग-मोक्ष तथा मान-प्रतिष्ठा आदि के लोभ से क्रोधादि कम करते या नहीं करते-से देखे जाते हैं, तथापि वे उत्तमक्षमादि दशधर्मों के धारक नहीं माने जा सकते हैं।

इस संबंध में महापंडित टोडरमलजी के विचार द्रष्टव्य हैं-
“तथा बंधादिक के भय से अथवा स्वर्ग-मोक्ष की इच्छा से क्रोधादि नहीं करते, परन्तु वहाँ क्रोधादि करने का अभिप्राय तो मिटा नहीं है। जैसे - कोई राजादिक के भय से अथवा महंतपने के लोभ से परस्त्री का सेवन नहीं करता, तो उसे त्यागी नहीं कहते। वैसे ही यह क्रोधादिक का त्यागी नहीं है।

तो कैसे त्यागी होता है? पदार्थ अनिष्ट-इष्ट भासित होने से क्रोधादिक होते हैं; जब तत्वज्ञान के अभ्यास से कोई इष्ट-अनिष्ट भासित न हो, तब स्वयमेव ही क्रोधादि उत्पन्न नहीं होते; तब सच्चा धर्म होता है।"

इसप्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक क्रोधादि का नहीं होना ही उत्तमक्षमादि धर्म है।

यद्यपि उक्त दशधर्मों का वर्णन शास्त्रों में जहाँ-तहाँ मुनिधर्म की अपेक्षा गया है, तथापि ये धर्म मात्र मुनियों को धारण करने के लिए नहीं हैं; गृहस्थों को भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार इनको अवश्य धारण करना चाहिए। धारण क्या करना चाहिए, वस्तुतः बात तो ऐसी है कि ज्ञानी गृहस्थ के भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार ये होते ही हैं, इनका पालन सहज पाया जाता है।

तत्त्वार्थसूत्र में गुप्ति, समिति, अनुप्रेक्षा (बारह भावना) और परीषहजय के साथ ही उत्तमक्षमादि दशधर्मों को चर्चा की गई है। ये सब मुनिधर्म से संबंधित विषय हैं। यही कारण है कि जहाँ-जहाँ इनका वर्णन मिलता है, वहाँ-वहाँ उत्कृष्टरूप का ही वर्णन मिलता है। इससे आतंकित होकर सामान्य श्रावकों द्वारा इनकी उपेक्षा संगत नहीं है।

यदि 'मुनियों को अनन्तानुबंधी आदि तीन कषायों के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि धर्म होंगे तो पंचम गुणस्थानवर्ती ज्ञानी श्रावकों के अनन्तानुबंधी आदि दो कषायों के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि धर्म होंगे। इसीप्रकार चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत सम्यग्दृष्टि के एकमात्र अनन्तानुबंधी कषाय के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि धर्म प्रगट होंगे। मिथ्यादृष्टि के उत्तमक्षमादि धर्म नहीं होते। उसकी कषायें कितनी भी मंद क्यों न हों, उसके उक्त धर्म प्रगट नहीं हो सकते; क्योंकि उक्त धर्म कषाय के अभाव से प्रगट होने वाली पर्यायें हैं, कषाय की मंदता से नहीं। मंदता से जो तारतम्यरूप भेद पड़ते

१. मोक्षमार्गप्रकाशक, पृष्ठ २२६
२. स गुप्तिसमितिसम्यग्प्रेक्षापरिषहजयचारित्रैः (अ. ९ सूत्र २)

दश लक्षण महापर्व

हैं, उन्हें शास्त्रों में लेश्या संज्ञा दी है, धर्म नहीं। धर्म तो मिथ्यात्व और कषाय के अभाव का नाम है, मंदता का नहीं।
इन धर्मों की व्याख्या अनेक पहलुओं (दृष्टिकोणों) से संभव है। जैसे - मुनियों और श्रावकों की अपेक्षा, निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा, अन्तर और बाह्य की अपेक्षा आदि।
इनमें से प्रत्येक धर्म स्वतंत्ररूप से विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखता है। आगे प्रत्येक पर विस्तृत विश्लेषण किया ही जा रहा है।
अतः अब यहाँ इस पवित्र भावना के साथ विराम लेता हूँ कि इस दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर सभी आत्माएँ धर्म के उक्त दश लक्षणों को अच्छी तरह जानकर, पहचानकर, तद्रूप परिणमन कर परमसुखी हों।

अपनी ओर देख ! एक बार इसी जिज्ञासा से अपनी ओर देख !! जानने लायक, देखने लायक एकमात्र आत्मा ही है, अपना आत्मा ही है। यह आत्मा शब्दों में नहीं समझाया जा सकता, इसे वाणी से नहीं बताया जा सकता। यह शब्दजाल और वाक्‌विलास से परे है। यह मात्र जानने की वस्तु है, अनुभवगम्य है। यह अनुभवगम्य आत्मवस्तु ज्ञान का घनपिण्ड और आनन्द का कन्द है। अतः समस्त परपदार्थों, उनके भावों एवं अपनी आत्मा में उठने वाले विकारी-अविकारी भावों से भी दृष्टि हटाकर एक बार अन्तर में झाँक ! अन्तर में देख, अन्तर में ही देख। देख!!! देख!!!

  • तीर्थंकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, पृष्ठ ७६

उत्तमक्षमा

क्षमा आत्मा आत्मा का स्वभाव है। क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध के अभावरूप शान्ति-स्वरूप पर्याय प्रकट होती है, उसे भी क्षमा कहते हैं। यद्यपि आत्मा क्षमास्वभावी है, तथापि अनादि से आत्मा में क्षमा के अभावरूप क्रोध पर्याय ही प्रकटरूप से विद्यमान है।
जब-जब उत्तमक्षमादि धर्मों की चर्चा चलती है, तब-तब उनका स्वरूप अभावरूप ही बताया जाता है। कहा जाता है - क्रोध का अभाव क्षमा है, मान का अभाव मार्दव है, माया का अभाव आर्जव है - आदि।
क्या धर्म अभावरूप (Negative) है? क्या उसका कोई भावात्मक (Positive) रूप नहीं है? यदि है, तो क्यों नहीं उसे भावात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता?
क्रोध नहीं करना, मान नहीं करना, छल-कपट नहीं करना, हिंसा नहीं करना, चोरी नहीं करना, आदि न जाने कितने निषेध समा गये हैं धर्म में। धर्म क्या मात्र निषेधों का नाम है? क्या उसका कोई विधेयात्मक पक्ष नहीं? यदि धर्म में पर से निवृत्ति की बात है तो साथ में स्व में प्रवृत्ति की भी चर्चा कम नहीं है।
यह नहीं करना, वह नहीं करना, प्रतिबंधों की भाषा है। बंधन से छूटने का अभिलाषी मोक्षार्थी जब धर्म के नाम पर भी बंधनों की लम्बी सूची सुनता है तो घबड़ा जाता है। वह सोचता है कि यहाँ आया था बंधन से छूटने का मार्ग खोजने के लिए और यहाँ तो अनेक प्रतिबंधों में बांधा जा रहा है। धर्म तो स्वतंत्रता का नाम है। जिसमें अनन्त बंधन हों, वह धर्म कैसा?
तो क्या धर्म प्रतिबंधों का नाम है, अभावरूप है?

उत्तमक्षमा

नहीं, धर्म तो वस्तु के स्वभाव को कहते हैं, अतः वह सद्भावरूप ही होता है, अभावरूप नहीं। पर क्या करें, हमारी भाषा उल्टी हो गई है। क्रोध का अभाव क्षमा है, मान का अभाव मार्दव है - के स्थान पर हम ऐसा क्यों नहीं कहते कि क्षमा का अभाव क्रोध है, मार्दव का अभाव मान है, आर्जव का अभाव मायाचार है, आदि।
जरा विचारिए - ज्ञान का अभाव अज्ञान है या अज्ञान का अभाव ज्ञान ? ‘ज्ञान’ मूल शब्द है, उसमें निषेधवाचक ‘अ’ लगाकर ‘अज्ञान’ शब्द बना है, अतः स्वतः सिद्ध है कि ज्ञान का अभाव अज्ञान है।
वस्तु का स्वभाव तो धर्म होता ही है, साथ ही स्वभाव के अनुरूप पर्याय को अर्थात् स्वभावपर्याय को भी धर्म कहा जाता है। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वभावपर्याय होने से ही धर्म है। विभाव (विभावपर्याय) को अधर्म कहते हैं।
ज्ञान आत्मवस्तु का स्वभाव है, अतः धर्म है। सम्यग्ज्ञानपर्याय को भी ज्ञान कहते हैं, अतः सम्यग्ज्ञान भी धर्म है। अज्ञान (मिथ्याज्ञानपर्याय) आत्मा का विभाव है, अतः वह अधर्म है। इसीप्रकार क्षमा आत्मा का स्वभाव है, अतः वह तो धर्म ही है; साथ ही क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से उत्पन्न होनेवाली क्षमाभावरूप स्वभावपर्याय भी धर्म है, किन्तु क्षमास्वभावी आत्मा जब क्षमास्वभावरूप परिणमन न करके विभावरूप परिणमन करता है, तो उसके उस विभाव परिणमन को क्रोध कहा जाता है।
क्रोध आत्मा का एक विभाव है और वह क्षमा के अभावरूप प्रकट हुआ है। यद्यपि वह संतति की अपेक्षा से अनादि का है, तथापि प्रतिसमय नया-नया उत्पन्न होता है। अतः सत्य तो यह है कि क्षमा का अभाव क्रोध है, पर कहा यह जाता है कि क्रोध का अभाव क्षमा है। इसका कारण यह है कि अनादि से यह आत्मा कभी भी क्षमादि स्वभावरूप परिणमित नहीं हुआ, क्रोधादि विकाररूप ही परिणमित हुआ है; और जब भी क्षमादि स्वभावरूप परिणमित होता है तो क्रोधादि का अभाव हो जाता है। अतः क्रोधादि के अभावरूपक क्षमादि परिणमन देखकर उक्त कथन किया जाता है।

१२

यदि ज्ञान के समान ही इसका प्रयोग अपेक्षित हो तो वह इसप्रकार किया जा सकता है – ज्ञान का अभाव अज्ञान, क्षमा का अभाव अक्षमा (क्रोध), मार्दव का अभाव अमार्दव (मान), आर्जव का अभाव अनार्जव (मायाचार- छल कपट) आदि।

जब कोई यह नहीं कहता कि अज्ञान मत करो, पर यही कहा जाता है कि ज्ञान करो; तब क्रोध मत करो के स्थान पर क्षमा धारण करो, क्यों नहीं कहा जाता? इसका भी कारण है, और वह यह कि हम क्रोध, मान, माया आदि से परिचित हैं; वे हमारे नित्य अनुभूत विभाव हैं। क्षमादि हमारे लिए अपरिचित और अननुभूत-से हैं। परिचित से अपरिचित को और, अनुभूत से अननुभूत को तरफ जाना ही सहज होता है।

दुनिया की स्थिति यह है कि उससे जब यह कहा जाता है कि क्रोध नहीं करना क्षमा है तो उसे संतोष हो जाता है, पर उससे यह कहा जाय कि क्षमा नहीं करना क्रोध है तो अटपटा लगता है, कुछ समझ में नहीं आता। अतः क्रोध की परिभाषा सदा भावात्मक (Positive) समझाई जाती है। जैसे – क्रोध गुस्से को कहते हैं, जब क्रोध आता है तो आँखें लाल हो जाती हैं, शरीर काँपने लगता है, होंठ फड़कने लगते हैं, आदि।

यहाँ एक प्रश्न हो सकता है कि आचार्यों ने भी तो इसीप्रकार समझाया है। आचार्यों के सामने भी एक समस्या थी कि उन्हें क्रोधियों को क्षमा समझानी थी; अतः क्षमा को भी क्रोध के माध्यम से समझाना पड़ा। व्यवहार को व्यवहार की भाषा में समझाना पड़ता है। मुनिजन क्षमा के भण्डार होते हैं। यदि वे अपनी ओर से बोलेंगे तो यही बोलेंगे कि क्षमा का अभाव क्रोध है, पर दुनिया में भाव होता है वक्ता का और भाव होती है श्रोता का। यदि श्रोता की भाषा में न बोला गया तो वह कुछ समझ ही न सकेगा।

अतः ज्ञानीजन समझाना तो चाहते हैं क्षमाधर्म, पर समझाते हैं क्रोध की बात करके। बच्चों से बात करने के लिए उनकी ओर से बोलना पड़ता है। जब हम बच्चे से कहते हैं कि माँ को बुलाना, तब हमारा आशय बच्चों की माँ से होता है, अपनी माँ से नहीं; क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा कहने पर बच्चा अपनी माँ को ही बुलायेगा, हमारी माँ को नहीं।

उत्तमक्षमा

१३

इसीप्रकार जब हमें भी क्षमा को क्रोध की भाषा में ही समझाना है तो पहले क्रोध को ही अच्छी तरह स्पष्ट करना समुचित होगा।

यद्यपि यह आत्मा ज्ञान का घनपिण्ड और आनन्द का कन्द है, स्वभाव से स्वयं परिपूर्ण है; तथापि कुछ विकारों, कमजोरियों तब से ही इसके साथ जुड़ी हुई हैं, जब से यह है। उन कमजोरियों को शास्त्रकारों ने विभाव कहा, कषाय कहा, और न जाने क्या-क्या नाम दिये; उनके त्याग का उपदेश भी कम नहीं दिया; सच्चे सुख को प्राप्त करने का उपाय भी उनके त्याग को ही बताया। महात्माओं के अनेक उपदेशों और आदेशों के बावजूद भी प्राणी इनसे बच नहीं पाया। इन कमजोरियों के कारण प्राणियों ने अनेक कष्ट उठाये हैं, उठा रहे हैं और उठायेंगे। इनसे बचने के लिए भी उपाय कम नहीं किये गये, पर बात वहीं की वहीं रही।

जिन विकारों के कारण, जिन कमजोरियों के कारण, जिन कषायों के कारण प्राणी सफलता के द्वार तक पहुँचकर भी कई बार असफल हुआ, सुख-शान्ति के शिखर पर पहुँचने के लिए प्रयत्नशील रहने पर भी पहुँच नहीं पाया; उन विकारों में, उन कमजोरियों में, उन कषायों में सबसे बड़ा विकार, सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी कषाय है क्रोध।

क्रोध आत्मा की एक ऐसी विकृति है, ऐसी कमजोरी है, जिसके कारण उसका विवेक समाप्त हो जाता है, भले-बुरे की पहचान नहीं रहती। जिसपर क्रोध आता है, क्रोधी उसे भला-बुरा कहने लगता है, गाली देने लगता है, मारने लगता है, यहाँ तक कि स्वयं की जान जोखिम में डालकर भी उसका बुरा करना चाहता है। यदि कोई हितैषी पूज्य पुरुष भी बीच में आवे तो उसे भी भला-बुरा कहने लगता है, मारने तक को तैयार हो जाता है। यदि इतने पर भी उसका बुरा न हो तो स्वयं बहुत दुखी होता है, अपने ही अंगों का घात करने लगता है, माथा कूटने लगता है, यहाँ तक कि विषादि भक्षण करके मर तक जाता है।

लोक में जितनी भी हत्याएँ और आत्म-हत्याएँ होती हैं, उनमें से अधिकांश क्रोधावेश में ही होती हैं। क्रोध के समान आत्मा का कोई दूसरा शत्रु नहीं है।

१४

क्रोध करने वाले को जिसपर क्रोध आता है, वह उसकी ओर ही देखता है, अपनी ओर नहीं देखता। क्रोधी को जिसपर क्रोध आता है, उसी की गलती दिखाई देती है, अपनी नहीं; चाहे निष्पक्ष विचार करने पर अपनी ही गलती क्यों न निकले। पर क्रोधी विचार करता ही कब है? यहीं तो उसका अज्ञान है कि उसकी दृष्टि पर की ओर ही रहती है और वह भी पर में विद्यमान-अविद्यमान दुर्गुणों की ओर ही; गुणों को तो वह देख ही नहीं पाता। यदि उसे पर के गुण दिखाई दे जावें तो फिर तो उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होगी।

यदि मालिक के स्वयं के पैर से ठोकर खाकर काँच का गिलास फूट जावे तो एकदम चिल्लाकर कहेगा कि इधर बीच में गिलास किसने रख दिया? उसे गिलास रखने वाले पर क्रोध आएगा, स्वयं पर नहीं। वह यह नहीं सोचेगा कि मैं देखकर क्यों नहीं चला?

यही यदि गिलास नौकर के पैर की ठोकर से फूटे तो चिल्लाकर कहेगा – देखकर नहीं चलता, अंधा है। फिर उसे बीच में गिलास रखने वाले पर क्रोध न आकर ठोकर देने वाले पर आएगा; क्योंकि बीच में गिलास तो स्वयं उसने है।

गलती हमेशा नौकर को ही दिखेगी चाहे स्वयं ठोकर दे, चाहे नौकर के पैर की ठोकर लगे; चाहे स्वयं गिलास रखे, चाहे दूसरे ने रखा हो।

यदि कोई कहे कि गिलास तो आप ही ने रखा था और ठोकर भी आपने मारी, अब नौकर को क्यों डाँटते हो? तब भी यह बोलेगा कि इसे उठा लेना चाहिए था, इसने उठाया क्यों नहीं? उसे अपनी भूल दिख ही नहीं सकती; क्योंकि क्रोधी ‘पर’ में ही भूल देखता है; स्वयं में देखने लगे तो क्रोध आएगा कैसे? यही कारण है कि आचार्यों ने क्रोधी को क्रोधान्ध कहा है।

क्रोधान्ध व्यक्ति क्या-क्या नहीं कर डालता? सारी दुनिया में मनुष्यों द्वारा जितना भी विनाश होता देखा जाता है, उसके मूल में क्रोधादि विभाव ही देखे जाते हैं। द्वारिका जैसी पूर्ण विकसित और सम्पन्न नगरी का विनाश द्वैपायन मुनि के क्रोध के कारण ही हुआ था। क्रोध के कारण सैकड़ों घर-परिवार

उत्तमक्षमा

दृष्टते देखे जाते हैं। अधिक क्या कहें - जगत में जो कुछ भी बुरा नजर आता है, वह सब क्रोधादि विकारों का ही परिणाम है।

कहा भी है - “क्रोधोदयाद् भवति कस्य न कार्यहानिः” क्रोध के उदय में किसकी कार्य-हानि नहीं होती, अर्थात् सभी की हानि होती है।"

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘क्रोध’ नामक निबन्ध में इसका अच्छा विश्लेषण किया है।

क्रोध एक शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। वह क्रोध करने वाले को मानसिक शान्ति तो भंग कर ही देता है, साथ ही वातावरण को भी कलुषित और अशान्त कर देता है। जिसके प्रति क्रोध-प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित है या अनुचित।

क्रोध का एक खतरनाक रूप है बैर। बैर क्रोध से भी खतरनाक मनोविकार है। वस्तुतः वह क्रोध का ही एक विकृत रूप है। बैर क्रोध का आचार या मुरब्बा है। क्रोध के आवेश में हम तत्काल बदला लेने को सोचते हैं। सोचते क्या हैं - तत्काल बदला लेने लगते हैं। जिसे शत्रु समझते हैं, क्रोधावेश में उसे भला-बुरा कहने लगते हैं, मारने लगते हैं। पर जब हम तत्काल कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न कर मन में ही इस प्रति क्रोध को इस भाव से दबा लेते हैं कि अभी मौका ठीक नहीं है, अभी प्रत्याक्रमण करने से हमें हानि हो सकती है, शत्रु प्रबल है, मौका लगने पर बदला लेंगे; तब वह क्रोध बैर का रूप धारण कर लेता है और वर्षों दबा रहता है तथा समय आने पर प्रकट हो जाता है।

ऊपर से देखने पर क्रोध की अपेक्षा यह बैर विवेक का कम विरोधी नजर आता है, पर यह है क्रोध से भी अधिक खतरनाक; क्योंकि यह योजनाबद्ध विनाश करता है, जबकि क्रोध विनाश की योजना नहीं बनाता, तत्काल जो

१. आत्मानुशासन, छंद २२६

जैसा संभव होता है, कर गुजरता है। योजनाबद्ध विनाश सामान्य विनाश से अधिक खतरनाक और भयानक होता है।

यद्यपि जितनी तीव्रता और वेग क्रोध में देखने में आता है - उतना बैर में नहीं, तथापि क्रोध का काल बहुत कम है, जबकि बैर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।

क्रोध और भी अधिक रूपों में पाया जाता है। झल्लाहट, चिड़चिड़ाहट, क्षोभ आदि भी क्रोध के ही रूप हैं। जब हमें किसी की कोई बात या काम पसन्द नहीं आता है और वह बात बार-बार हमारे सामने आती है तो हम झल्ला पड़ते हैं। बार-बार की झल्लाहट चिड़चिड़ाहट में बदल जाती है। झल्लाहट और चिड़चिड़ाहट असफल क्रोध के परिणाम हैं। ये एक प्रकार से क्रोध के हल्के-फुल्के रूप हैं। क्षोभ भी क्रोध का ही अव्यक्त रूप है।

ये सभी विकार क्रोध के ही छोटे-बड़े रूप हैं। सभी मानसिक शान्ति को भंग करने वाले हैं, महानता की राह के रोड़े हैं। इनके रहते कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता, पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। यदि हमें महान बनना है, पूर्णता को प्राप्त करना है तो इन पर विजय प्राप्त करनी ही होगी, इन्हें जीतना ही होगा। पर कैसे? आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी के अनुसार -

“अज्ञान के कारण जबतक हमें परपदार्थ इष्ट-अनिष्ट प्रतिभासित होते रहेंगे, तबतक क्रोधादि की उत्पत्ति होती ही रहेगी; किन्तु जब तत्त्वाभ्यास के बल से परपदार्थों में से इष्ट-अनिष्ट बुद्धि समाप्त होगी, तब स्वभावतः क्रोधादि की उत्पत्ति नहीं होगी।”

आशय यह है कि क्रोधादि की उत्पत्ति का मूल कारण, अपने सुख-दुःख का कारण दूसरों को मानना है। जब हम अपने सुख-दुःख का कारण अपने में खोजेंगे, उनका उत्तरदायी अपने को स्वीकारेंगे, तो फिर हम क्रोध करेंगे किस पर? क्योंकि अपने अच्छे-बुरे और सुख-दुःख का कर्ता दूसरों को मानना ही क्रोधादि की उत्पत्ति का मूल कारण है।

क्षमा के साथ लगा उत्तम शब्द सम्यग्दर्शन को सत्ता का सूचक है। सम्यग्दर्शन के साथ होनेवाली क्षमा ही उत्तमक्षमा है।

उत्तमक्षमा

यहाँ एक प्रश्न संभव है - जबकि क्षमा का संबंध क्रोध के अभाव से है तो फिर उसका सम्यग्दर्शन से क्या संबंध? यह शर्त क्यों कि उत्तमक्षमा सम्यग्दृष्टि को ही होती है, मिथ्यादृष्टि को नहीं? जिसको क्रोध नहीं हुआ, उसके उत्तमक्षमा हो गई; चाहे वह मिथ्यादृष्टि हो या सम्यग्दृष्टि। मिथ्यादृष्टि के उत्तमक्षमा हो ही नहीं सकती, यह अनिवार्य शर्त क्यों?

भाई! बात ऐसी है कि क्रोध का अभाव आत्मा के आश्रय से होता है। मिथ्यादृष्टि के आत्मा का आश्रय नहीं है; अतः उसके क्रोध का अभाव नहीं हो सकता। इसलिए मिथ्यादृष्टि के क्रोध नहीं हुआ, यह बनता ही नहीं है। उसे जो ‘क्रोध नहीं हुआ’ ऐसा देखने में आता है, वह तो क्रोध का प्रदर्शन नहीं हुआ वाली बात है। क्योंकि कभी-कभी जब क्रोध मंद होता है तो क्रोध का प्रदर्शन नहीं देखा जाता है, उसे ही अज्ञानी क्रोध का अभाव समझ लेते हैं और उत्तमक्षमा कहने लगते हैं। वस्तुतः वह उत्तमक्षमा नहीं, उत्तमक्षमा का भ्रम है।

धर्म के दशलक्षण

क्षमा के साथ लगा उत्तम शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। सम्यग्दर्शन के साथ होनेवाली क्षमा ही उत्तमक्षमा है।

उत्तमक्षमा

अब प्रश्न यह पैदा होता है कि मिथ्यादृष्टि के क्रोध का अभाव क्यों नहीं हो सकता? उसके सदा अनन्तक्रोध क्यों रहता है? इसका उत्तर यह है कि पर में कर्तृत्वबुद्धि से ही अनन्तानुबन्धी क्रोध उत्पन्न होता है। जब कोई परपदार्थ उसकी इच्छा के अनुकूल परिणमित नहीं होता है, तो वह उस पर क्रोधित हो उठता है। इसका अर्थ यह हुआ कि लोक में जो-जो परपदार्थ उसकी इच्छा के अनुकूल परिणमत न होंगे, वे सब उसके क्रोध के पात्र होंगे। परपदार्थ हैं अनन्त, अतः अभिप्राय में अनन्त परपदार्थ उसके क्रोध के पात्र हुए; यही है अनन्तानुबन्धी क्रोध, क्योंकि उसने अनन्त परपदार्थों से अनुबन्ध किया है।

इसप्रकार हम देखते हैं कि मिथ्यादृष्टि के परपदार्थों में कर्तृत्व बुद्धि रहती है; इसकारण उसके क्रोधादि मंद भले ही हो जाएँ, किन्तु जब उसके अनन्तानुबन्धी कषाय का भी अभाव नहीं होता है तो उत्तमक्षमादि धर्म प्रकट कैसे हो सकते हैं?

दूसरी बात यह भी तो है कि उत्तमक्षमादि दशधर्म सम्यक्चारित्र के ही रूप हैं और सम्यक्चारित्र सम्यग्दर्शन के बिना होता नहीं, इसलिए यह स्वतः धर्म के दशलक्षण

सिद्ध है कि मिथ्यादृष्टि के उत्तमक्षमादि धर्म प्रकट नहीं हो सकते। निश्चय से तो क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से पर्याय में क्रोधरूप विकार की उत्पत्ति नहीं होना ही उत्तम क्षमा है; पर व्यवहार से क्रोधादि के निमित्त मिलने पर भी उत्तेजित नहीं होना, उनके प्रतिकाररूप प्रवृत्ति नहीं होने को भी उत्तमक्षमा कहा जाता है। दशलक्षण पूजन में उत्तमक्षमा का वर्णन करते हुए कविवर द्यानतरायजी ने कहा है -

"गाली सुन मन खेद न आनौ, गुन को औगुन कहै बखानौ।

कहि है बखानौ वस्तु छीने, बाँध-मार बहुविधि करै।

घरतें निकारै तन विदारै, बैर जो न तहाँ धेरै।।"

उक्त छन्द में निमित्तों की प्रतिकूलता में भी जो शान्त रह सके, वही उत्तमक्षमा का धारी है; ऐसा कहा गया है। गाली सुनकर भी जिसके हृदय में खेद उत्पन्न न हो, वह उत्तमक्षमावान है।

बहुत से लोग ऐसा कहते पाये जाते हैं कि वैसे तो मेरा स्वभाव एकदम शान्त है, पर कोई छेड़ दे तो फिर मुझसे शान्त नहीं रहा जाता। उनसे मेरा कहना है कि ऐसा कोई व्यक्ति बताइए कि जिसकी हम प्रशंसा करें और उसे क्रोध आवे। प्रशंसा सुनकर तो लोगों को मान आता है, क्रोध नहीं। क्षमा का धारी तो वह है, जिसे गालियाँ सुनकर भी क्रोध न आवे।

यहाँ तो और भी ऊँची बात की है। क्रोध की उग्रता तो दूर, मन में भी खेद तक उत्पन्न न हो, तब क्षमा है। किन्हीं बाह्य कारणों से क्रोध व्यक्त न भी करे, पर मन में खेद-खिन्न हो जावे तो भी क्षमा कहाँ रही? जैसे- मालिक ने मुनीम को डाँटा-फटकारा, तो नौकरी छूट जाने के भय से मुनीम में क्रोध के लक्षण तो प्रकट नहीं हुए, पर खेद-खिन्न हो गया तो वह क्षमा नहीं कहला सकती। इसीलिए तो लिखा है - “गाली सुनि मन खेद न आनौ।”

जो ‘गाली सुनकर चाटा मारे’, वह काया की विकृति वाला है। ‘गाली सुनकर गाली देवे’, वह वचन की विकृति वाला है। ‘गाली सुनकर खेद मन में लावे’, वह मन की विकृति वाला है। परन्तु ‘गाली सुन मन खेद न आवे’, उत्तमक्षमा

वह क्षमाधारी है।

इसके भी आगे कहते हैं कि ‘गुन को औगुन कहै बखानौ।’ हों तो हम में गुण और सामने वाला औगुणरूप से वर्णन करे, और वह भी अकेले में नहीं-भरी सभा में, व्याख्यान में; फिर भी हम उत्तेजित न हों तो क्षमाधारी हैं। कुछ लोग कहते हैं भाई ! हम गालियाँ बर्दाश्त कर सकते हैं, पर यह कैसे संभव है कि जो दुर्गुण हममें हैं ही नहीं, उन्हें कहता फिरे। उन्हें भी अकेले में कहे तो किसी तरह सह भी लें, पर भरी सभा में, व्याख्यान में कहें तो फिर तो गुस्सा आ ही जाता है।

कवि इसी बात को तो स्पष्ट कर रहा है कि गुस्सा आ जाता है, तो वह क्षमा नहीं; क्रोध ही है। मान लो तब भी क्रोध न आवे, हम सोच लें - बकने वाले बकते हैं तो बकने दो, हमें क्या है? पर जब वह हमारी वस्तु छीनने लगे तब? वस्तु छीनने पर भी क्रोध न करें, पर वह हमें बाँध दे, मारे और भी अनेक प्रकार पीड़ा दे तब? इसी के उत्तर में कवि ने कहा है :- “वस्तु छीने, बाँध मार बहुविधि करै।”

‘बहुविधि करै’ शब्द में बहुत भाव भरा है। आप में जितनी सामर्थ्य हो इसका अर्थ निकालिए। आज पीड़ा देने के अनेक नए-नए उपाय निकाल लिए गए हैं। विदेशी जासूसों के पकड़े जाने पर उनसे शत्रुओं के गुप्त भेद उगलवाने के लिए अनेक प्रकार की अमानुषिक पीड़ाएँ दी जाती हैं, जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं; ‘बहुविधि करै’ में वे सब आ जाती हैं। पीड़ा देने के जितने प्रकार आप कल्पना कर सकें, करिए; वे सब ‘बहुविधि करै’ में आ जावेंगे। फिर भी क्रोध न करें तब उत्तमक्षमा होगी, ऐसा कवि कहना चाहता है। बात यहीं पर समाप्त नहीं हुई, आगे भी बढ़ती है -

“घरतें निकारै तन विदारै, बैर जो न तहाँ धेरै।”

कोई दुष्ट अनेक प्रकार पीड़ाएँ दे देकर चला जाए, पर बाद में हम घर में रहकर उपचार और आराम तो कर सकते हैं; पर जब वह हमें घर से ही निकाल दे, तब क्या करें? घर से भी निकाल दे, पर शरीर स्वस्थ है तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ करके जीवन चला ही लेंगे। पर जब वह घर से भी निकाल धर्म के दशलक्षण

दे और शरीर का भी विदारण कर दे, तब तो क्रोध आ ही जावेगा।

नहीं भाई ! तब भी क्रोध न आवे तो उत्तमक्षमा है। तब भी कहाँ? मान लो क्रोध नहीं किया, पर मन में गाँठ बाँध ली, बैर धारण कर लिया तो भी उत्तमक्षमा नहीं है।

क्रोध और बैर के बारे में पहले स्पष्टीकरण किया जा चुका है। क्रोध किया जाता है और बैर धारण किया जाता है अर्थात् क्रोध में तत्काल प्रतिक्रिया होती है और बैर में मन में गाँठ बाँध ली जाती है।

बैर आग है और आग जहाँ रखी जाएगी पहिले उसे जलाएगी, बाद में

दूसरे को जलाए चाहे न जलाए। अतः बैर भी - जो धारण करता है, उसे ही जलाता है; जिसके प्रति बैर धारण किया है, उसे चाहे जला पाये अथवा नहीं भी; क्योंकि उसका भला-बुरा तो उसके पुण्य-पाप के उदय के

आधीन है। अतः यहाँ क्रोध के अभाव के साथ-साथ बैर के अभाव को

उत्तमक्षमा कहा है।

पर ये सब बातें व्यवहार की हैं। निश्चय से तो बाह्य निमित्तों की प्रतिकूलताओं पर भी मात्र क्रोध की प्रवृत्ति दिखाई नहीं देना उत्तमक्षमा नहीं है। हो सकता है कि बाह्य में क्रोधादि की प्रवृत्ति न भी दिखाई दे और अन्तर में उत्तमक्षमा का विरोधी क्रोधभाव विद्यमान हो तथा अन्तर में आंशिक उत्तमक्षमा विद्यमान रहे, फिर भी बाह्य में क्रोधादि में प्रवृत्ति दिखाई दे। अतः निश्चय उत्तमक्षमा समझने के लिए कुछ गहराई में जाना होगा।

शास्त्रों में क्रोध चार प्रकार का कहा गया है। (१) अनन्तानुबन्धी (२) अप्रत्याख्यान (३) प्रत्याख्यान और (४) संज्वलन । चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरतसम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्धी क्रोध का अभाव हो गया है, अतः उसे तत्सम्बन्धी उत्तम क्षमाभाव प्रकट हो गया है। पंचम गुणस्थानवर्ती अणुव्रती के अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानसम्बन्धी क्रोध के अभावजन्य उत्तमक्षमा विद्यमान है तथा छठवें-सातवें गुणस्थानवर्ती महाव्रती मुनिराजों के अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान और प्रत्याख्यान सम्बन्धी क्रोध का अभाव होने से वे तीनों के अभाव संबंधी उत्तमक्षमा के धारक हैं। नौंवें-दसवें गुणस्थान उत्तमक्षमा

से ऊपर वाले तो पूर्ण उत्तमक्षमा के धारक हैं।

उक्त कथन शास्त्रीय भाषा में हुआ, अतः शास्त्रों के अभ्यासी ही समझ पाएँगे। इस सबका तात्पर्य यह है कि उत्तमक्षमा आदि का नाप बाहर से नहीं किया जा सकता है। कषायों की मंदता और तीव्रता पर उत्तमक्षमा आधारित नहीं है, उसका आधार तो उक्त कषायों का क्रमशः अभाव है। कषायों की मंदता-तीव्रता के आधार पर जो भेद पड़ता है, वह तो लेश्या है। यद्यपि व्यवहार से मंदकषाय वाले को भी उत्तमक्षमादि का धारण करने वाला कहा जाता है, पर अन्तर की दृष्टि से विचार करने पर ऐसा भी हो सकता है कि वह बाहर से तो बिल्कुल शान्त दिखाई दे, किन्तु अन्तर में अनन्त क्रोधी हो अर्थात् अनन्तानुबन्धी का क्रोधी हो। नववें ग्रैवेयक तक पहुँचने वाले मिथ्यादृष्टि द्रव्यलिंगी मुनि बाहर से इतने शान्त दिखाई देते हैं कि उनकी खाल खींचकर नमक छिड़कें तब भी उनकी आँख की कोर लाल न हो, फिर भी शास्त्रकारों ने कहा है कि वे उत्तमक्षमा के धारक नहीं हैं, अनन्तानुबंधी के क्रोधी हैं; क्योंकि उनके अन्तर से आत्मा की अरुचिरूपी क्रोध का अभाव नहीं हुआ है। बाह्य में जो क्रोध का अभाव दिखाई देता है, उसका कारण आत्मा के आश्रय से उत्पन्न शान्ति नहीं है, वरन् जिस चिन्तन के आधार पर वे शान्त रहे हैं, वह पराश्रित ही रहता है। जैसे – वे सोचते हैं कि यदि मैं साधु हुआ हूँ तो मुझे शान्त रहना ही चाहिए। यदि शान्त नहीं रहूँगा तो लोग क्या कहेंगे? इस भव में मेरी बदनामी होगी और पाप का बन्ध होगा तो अगला भव भी बिगड़ जायगा। यदि शान्त रहूँगा तो अभी प्रशंसा होगी और पुण्यबंध होगा तो आगे भी सुख की प्राप्ति होगी।

इसीप्रकार का कोई न कोई यशादि का लोभ व अपयश आदि का भय

अथवा पुण्य की रुचि और पाप की अरुचि ही उनकी शान्ति का आधार रहती है या फिर शास्त्रों में लिखा है कि मुनिराज को क्रोध नहीं करना चाहिए, शान्त रहना चाहिए – आदि किसी न किसी बाह्य आधार को पकड़ कर ही शान्त रहते हैं, उनकी शान्ति का आधार आत्मा नहीं बनता है।

तथा कोई ज्ञानी चारित्रमोह के दोष से बाहर में क्रोध करता भी दिखाई धर्म के दशलक्षण

दे, फिर भी उत्तमक्षमा का धारक हो सकता है। जैसे - आचार्यमहाराज मुनिराज को डांटते भी दिखाई दें, उन्हें दण्ड भी दे रहे हों, उत्तेजित भी दिखाई दे रहे हों; फिर भी वे उत्तमक्षमा के धारक हैं - क्योंकि उनके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान और प्रत्याख्यान क्रोध का अभाव है, आत्मा का आश्रय विद्यमान है। अणुव्रती या अविरतसम्यग्दृष्टि गृहस्थ तो और भी अधिक बाह्य में क्रोध करता दिखाई दे सकता है। अव्रती परन्तु क्षायिकसम्यग्दृष्टि भरतचक्रवर्ती बाहुबली पर चक्र चलाते समय भी अनन्तानुबन्धी के क्रोधी नहीं थे। अतः उत्तमक्षमा का निर्णय बाह्य प्रवृत्ति के आधार पर नहीं किया जा सकता। अनन्तानुबन्धी क्रोध के अभाव से उत्तमक्षमा प्रकट होती है और अप्रत्याख्यान व प्रत्याख्यान क्रोध का अभाव उत्तमक्षमा को पल्लवित करता है तथा संज्वलन क्रोध का अभाव उत्तमक्षमा को पूर्णता प्रदान करता है। अनन्त संसार का अनुबन्ध करने वाला अनन्तानुबंधी क्रोध आत्मा के प्रति अरुचि का नाम है। ज्ञानानन्दस्वभावी आत्मा की अरुचि ही अनन्तानुबंधी क्रोध है। जब हमें किसी व्यक्ति के प्रति अनन्त क्रोध होता है तो हम उसकी शकल भी देखना पसन्द नहीं करते, उसकी बात करना-सुनना पसन्द नहीं करते। कोई तीसरा व्यक्ति उसकी चर्चा हमसे करे तो हमें वह भी बर्दाश्त नहीं होती, उसकी प्रशंसा सुनना तो बहुत दूर की बात है।

इसीप्रकार जिन्हें आत्मदर्शन की रुचि नहीं है, जिन्हें आत्मा की बात करना-सुनना पसन्द नहीं है, जिन्हें आत्मचर्चा ही नहीं, आत्मचर्चा करने वाले भी नहीं सुहाते; वे सब अनन्तानुबंधी के क्रोधी हैं; क्योंकि उन्हें आत्मा के प्रति अनन्त क्रोध है, तभी तो उन्हें आत्मचर्चा नहीं सुहाती। हमने पर को तो अनन्त बार क्षमा किया, पर आचार्यदेव कहते हैं कि हे भाई ! एक बार अपनी आत्मा को भी क्षमा कर दे, उसकी ओर देख, उसकी सुध ले। अनादि से पर को परखने में ही अनन्त काल गमाया है। एक बार अपनी आत्मा को भी देख, जान, परख; सहज ही उत्तमक्षमा तेरे घट में प्रकट हो जावेगी। आत्मा का अनुभव ही उत्तमक्षमा की प्राप्ति का वास्तविक उपाय है। क्षमास्वभावी आत्मा का अनुभव करने पर, आश्रय करने पर ही पर्याय उत्तमक्षमा

में उत्तमक्षमा प्रकट होती है।

आत्मानुभवी सम्यग्दृष्टि ज्ञानीजीव को उत्तमक्षमा प्रकट होती है, और आत्मानुभव की वृद्धि वालों को ही उत्तमक्षमा बढ़ती है, तथा आत्मा में ही अनन्तकाल को समा जाने वालों में उत्तमक्षमा पूर्णता को प्राप्त होती है। अविरतसम्यग्दृष्टि, अणुव्रती, महाव्रती और अरहन्त भगवान में उत्तमक्षमा का परिमाणात्मक (Quantity) भेद है, गुणात्मक (Quality) भेद नहीं। उत्तमक्षमा दो प्रकार की नहीं होती, उसका कथन भले दो प्रकार से किया जाय। उसको जीवन में उतारने के स्तर तो दो से भी अधिक हो सकते हैं। निश्चयक्षमा और व्यवहारक्षमा कथन-शैली के भेद हैं, उत्तमक्षमा के नहीं। इसीप्रकार अविरतसम्यग्दृष्टि की क्षमा, अणुव्रती की क्षमा, महाव्रती की क्षमा, अरहन्त की क्षमा – ये सब क्षमा को जीवन में उतारने के स्तर के भेद हैं, उत्तमक्षमा के नहीं; वह तो एक अभेद है। उत्तमक्षमा तो एक अकषायभावरूप है, वीतरागभावस्वरूप है, शुद्धभावरूप है। वह कषायरूप नहीं, रागभावस्वरूप नहीं, शुभाशुभभावरूप नहीं; बल्कि इनके अभावरूप है।

क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से समस्त प्राणियों को उत्तमक्षमा धर्म प्रकट हो और सभी अतीन्द्रिय ज्ञानानन्दस्वभावी आत्मा का अनुभव कर पूर्ण सुखी हों; इसी पवित्र भावना के साथ विराम लेता हूँ।

यह एक सर्वमान्य सत्य है कि युवकों में जोश और प्रौढ़ों में होश की प्रधानता होती है। युवकों में जितना जोश होता है, कुछ कर गुजरने की तमन्ना होती है; उतना अनुभव नहीं होता। इसीप्रकार प्रौढ़ों में जितना अनुभव होता है, उतना जोश नहीं।

कोई भी कार्य सही और सफलता के साथ सम्पन्न करने के लिए

जोश और होश - दोनों की ही आवश्यकता होती है। अतः देश व

समाज को दोनों की ही आवश्यकता होती है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

  • ‘जोश एवं होश’ नामक निबंध से

उत्तममार्दव

क्षमा के समान मार्दव भी आत्मा का स्वभाव है। मार्दवस्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो मान के अभावरूप शान्ति-स्वरूप पर्याय प्रकट होती है, उसे भी मार्दव कहते हैं। यद्यपि आत्मा मार्दवस्वभावी है तथापि अनादि से आत्मा में मार्दव के अभावरूप मानकषायरूप पर्याय ही प्रकटरूप से विद्यमान है।

‘मृदोर्भावः मार्दवम्’ मृदुता - कोमलता का नाम मार्दव है। मान कषाय के कारण आत्मस्वभाव में विद्यमान कोमलता का अभाव हो जाता है। उसमें एक अकड़-सी उत्पन्न हो जाती है। मानकषाय के कारण मानी अपने को बड़ा और दूसरों को छोटा मानने लगता है। उसमें समुचित विनय का भी अभाव हो जाता है। मानी जीव हमेशा अपने को ऊँचा और दूसरों को नीचा करने का प्रयत्न किया करता है। मान के खातिर वह क्या नहीं करता ? छल-कपट करता है, मान भंग होने पर क्रोधित हो उठता है। सम्मान-प्राप्ति के लिए सब कुछ करने को तैयार रहता है। यहाँ तक कि जिन धनादि पदार्थों का संग्रह मौत की कीमत पर करता है, उन्हें भी पानी की तरह बहाने को तैयार हो जाता है। घर-बार, स्त्री-पुत्रादि सब कुछ छोड़ देने पर भी मान नहीं छूटता। अच्छे-अच्छे तथाकथित महात्माओं को आसन की ऊँचाई के लिए झगड़ते देखा जा सकता है, नमस्कार न करने पर उखड़ते देखा जा सकता है। यह सब मानकषाय की ही विचित्र महिमा है।

मानी जीव की प्रवृत्ति का चित्रण पण्डित टोडरमलजी ने इसप्रकार किया है -

"जब इसके मानकषाय उत्पन्न होती है तब औरों को नीचा व अपने को ऊँचा दिखाने की इच्छा होती है और उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है। उत्तममार्दव

अन्य की निन्दा करता है, अपनी प्रशंसा करता है व अनेक प्रकार से औरों की महिमा मिटाता है, अपनी महिमा करता है। महाकष्ट से जो धनादिक का संग्रह किया उसे विवाहादि कार्यों में खर्च करता है तथा कर्ज लेकर भी खर्चता है। मरने के बाद हमारा यश रहेगा – ऐसा विचारकर अपना मरण करके भी अपनी महिमा बढ़ाता. है। यदि कोई अपना सम्मानादिक न करे तो उसे भयादिक दिखाकर दुःख उत्पन्न करके अपना सम्मान कराता है। तथा मान होने पर कोई पूज्य-बड़े हों उनका भी सम्मान नहीं करता, कुछ विचार नहीं रहता। यदि अन्य नीचा और स्वयं ऊँचा दिखाई न दे, तो अपने अन्तरंग में आप बहुत सन्तापवान होता है और अपने अंगों का घात करता है तथा विष आदि से मर जाता है – ऐसी अवस्था मान होने पर होती है।”

कषायों में मान का दूसरा नम्बर है, क्रोध का पहिला। दश धर्मों में भी उत्तमक्षमा के बाद ही उत्तममार्दव आता है। इसका भी कारण है। यद्यपि क्रोध और मान् दोनों द्वेषरूप होते हैं, तथापि इनकी प्रकृति में भेद है। जब कोई हमें गाली देता है तो क्रोध आता है, पर जब प्रशंसा करता है तो मान हो जाता है। दुनिया में तो निन्दा और प्रशंसा सुनने को मिलती ही रहती है। अज्ञानी दोनों स्थितियों में कषाय करता है।

जिसप्रकार जिनका शारीरिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, उन्हें ठंडी और गरम दोनों प्रकार की हवाएँ परेशान करती हैं, गरम हवा में उन्हें लू लग जाती है और ठंडी हवा से जुखाम हो जाता है; उसीप्रकार जिनका आत्मिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, उन्हें निन्दा और प्रशंसा दोनों ही परेशान करते हैं। निन्दा की गरम हवा लगने से उन्हें क्रोध की लू लग जाती है है और प्रशंसा की ठंडी हवा लगने से मान का जुखाम हो जाता है।

निन्दा शत्रु करते हैं और प्रशंसा मित्र। अतः क्रोध के निमित्त बनते हैं शत्रु और मान के निमित्त बनते हैं मित्र।

विरोधियों की एक आदत होती है – विद्यमान गुणों की चर्चा तक न करना और अविद्यमान अवगुणों की बढ़ा-चढ़ाकर चर्चा करना। अनुकूलों की भी १. मोक्षमार्गप्रकाशक, पृष्ठ ५३

धर्म के दशलक्षण

एक आदत होती है, वे भी एक कमजोरी के शिकार होते हैं – वे विद्यमान अवगुणों की चर्चा तक नहीं करते, बल्कि अल्प गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर बखान करते हैं, कभी-कभी अविद्यमान गुणों को भी कहने लगते हैं। कम्पाउंडर को डॉक्टर और मुंशी को वकील साहब कहना इसी वृत्ति का परिणाम है। दोनों ही वृत्तियाँ खोटी हैं, क्योंकि वे क्रमशः क्रोध और मान के अनुकूल हैं।

ऐसे लोग दुनिया में भले ही कम मिलें जो गुणों को अवगुण रूप में प्रस्तुत करें, पर ऐसे चापलूस पग-पग पर मिलेंगे जो छोटे से गुण को बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं। लखपति को करोड़पति कहना साधारण-सी बात है।

एक बात यह भी है कि निन्दा करने वाले प्रायः पीठ-पीछे निन्दा करते हैं, मुँह के सामने निन्दा करने वाले बहुत कम मिलेंगे; पर प्रशंसा अधिकतर मुँह पर ही की जाती है, पीठ-पीछे बहुत कम। वे लोग बड़े ही भाग्यशाली हैं जिनकी प्रशंसा लोग पीठ-पीछे भी करें।

अतः प्रशंसा निन्दा से अधिक खतरनाक है।

प्रतिकूलता में क्रोध और अनुकूलता में मान आता है। असफलता क्रोध और सफलता मान की जननी है। यही कारण है कि असफल व्यक्ति क्रोधी होता है और सफल मानी। जब कोई व्यक्ति किसी काम में असफल हो जाता है तो वह उन स्थितियों पर क्रोधित हो उठता है, जिन्हें वह असफलता का कारण समझता है और सफल होने पर सफलता का श्रेय स्वयं लेकर अभिमान करने लगता है।

यद्यपि मान भी क्रोध के समान खतरनाक विकार है, पर लोग उसे न जाने क्यों कुछ प्यार करते हैं? मानपत्र सब के घरों में टंगे मिल जावेंगे, किसी के घर पर क्रोधपत्र नहीं मिलेगा। क्रोधपत्र कोई किसी को देता भी नहीं है, और कोई देगा भी तो कोई लेगा नहीं, घर में लगाने की बात तो बहुत दूर है। पर लोग मानपत्र बड़ी शान से लेते हैं और उसे बड़े ही प्यार से घर में लगाते हैं। बहुत लोग तो उसे ज्ञान-पत्र समझते हैं, जबकि उस पर साफ- उत्तममार्दव

साफ लिखा रहता है मान-पत्र। इतने से भी सन्तोष नहीं होता है तो फिर उसे अखबारों में पूरा का पूरा छपाते हैं, चाहे उसका विज्ञापन चार्ज ही क्यों न देना पड़े।

यदि कभी मानपत्र मिल जाता है तो उसे संभाल कर रखते हैं, पर अपमान तो अनेक बार मिला है, पर…। पुण्यहीनों का मान से अधिक अपमान ही होता है।

मान एक मीठा जहर है, जो मिलने पर अच्छा लगता है, पर है बहुत दुःखदायक। दुःखदायक क्या दुःखरूप ही है, क्योंकि है तो आखिर कषाय ही। यद्यपि मान भी क्रोध के समान ही आत्मा का अहित करने वाला विकार है, तथापि बाह्य में क्रोध के समान सर्व-विनाशक नहीं। जिस पर हमें क्रोध आता है, हम उसे नष्ट कर डालना चाहते हैं, पूर्णतः बरबाद कर देना चाहते हैं; पर जिसके लक्ष्य से मान होता है उसे नष्ट नहीं करना चाहते, वरन् उसे कायम रखना चाहते हैं, पर अपने से कुछ छोटेरूप में।

क्रोधी को विरोधी की सत्ता ही स्वीकृत नहीं होती, जबकि मानी को भीड़ चाहिए, नीचे बैठने वाले चाहिए, जिनसे वह कुछ ऊँचा दिखे। मानी को मान की पुष्टि के लिए एक सभा चाहिये, जिसमें सब नीचे बैठे हों और वह सबसे कुछ ऊँचा। अतः मानी दूसरों को भी रखना चाहता है, पर अपने से कुछ नीचे; क्योंकि मान की प्रकृति ऊँचा दिखने की है और ऊँचाई एक सापेक्ष स्थिति है। कोई नीचा हो तो ऊँचे का व्यवहार बनता है। ऊँचाई के लिए नीचाई और नीचाई के लिए ऊँचाई चाहिये।

क्रोधी क्रोध के निमित्त को हटाना चाहता है, पर मानी मान के निमित्तों को रखना चाहता है। क्रोधी कहता है - गोली से उड़ा दो, मार दो; पर मानी कहता है - नहीं; मारो मत, पर जरा दबाकर रखो।

जागीरदार लोग गाँव में किसी को पाँव में सोना नहीं पहिनने देते थे, उनके मकान से ऊँचा मकान नहीं बनाने देते थे; क्योंकि उनके मकान से दूसरे का मकान बड़ा हो जाए तो उनका मान खण्डित हो जाता था।

धर्म के दशलक्षण

क्रोधी वियोग चाहता है पर मानी संयोग। यदि मुझे सभा में क्रोध आ जाय तो मैं उठकर भाग जाऊँगा और यदि वश चलेगा तो सबको भगा दूँगा। पर यदि मान आवे तो भागूँगा नहीं और सबको भगाऊँगा भी नहीं, पर नीचे बिठाऊँगा और मैं स्वयं ऊपर बैठना चाहूँगा। मान की प्रकृति भगाने की नहीं, दबाकर रखने की, नीचे रखने की है; जबकि क्रोध की प्रकृति खत्म करने की है।

यही कारण है कि क्रोध नम्बर एक की कषाय है और मान नम्बर दो की। मान के अनेक रूप होते हैं। कुछ रूप तो ऐसे होते हैं, जिन्हें बहुत से लोग मान मानते ही नहीं। दीनता मान का एक ऐसा ही रूप है, जिसे लोग मान नहीं मानना चाहते। दीन को मानी-अभिमानी मानने को उनका दिल स्वीकार नहीं करता। वे कहते हैं दीन तो दीन है, वह मानी कैसे हो सकता है? यदि मार्दवधर्म के अभाव का नाम मानकषाय और मानकषाय के अभाव का नाम मार्दवधर्म है तो फिर दीनता को मान मानना ही होगा, क्योंकि यदि उसे मान न माना जायगा तो मान के अभाव में दीनता मार्दव हो जावेगी। क्यों ? कैसे ?

देखिये - मान आठ चीजों के आश्रय से होता है -

ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिं तपो वपुः।

अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः ॥

ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप, और शरीर – इन आठ वस्तुओं के आश्रय से जो मान किया जाता है, उसे मानरहित भगवान मान कहते हैं। तात्पर्य यह है कि क्रोध या मान कोई भी विकार हवा में नहीं होता, किसी न किसी के आश्रय से होता है। आश्रय का अर्थ है लक्ष्य। अर्थात् जब हमें क्रोध आता है तो वह किसी न किसी पर, किसी न किसी के लक्ष्य से होता है। ऐसा नहीं कि क्रोध आने पर पूछा जाय कि किस पर आ रहा है तो कहे किसी पर नहीं, वैसे ही आ रहा है - ऐसा नहीं होता। क्रोध किसी न किसी १. आचार्य समन्तभद्र : रत्नकरण्डश्रावकाचार, श्लोक २५

उत्तममार्दव

पर ही आता है। उसीप्रकार मान भी किसी न किसी वस्तु के आश्रय से ही होता है। जिन वस्तुओं के आश्रय से मान होता है, उन्हें आठ भागों में वर्गीकृत किया गया है।

‘मैं ज्ञानी हूँ’ इस विकल्प के आश्रय से होने वाले मान को ज्ञानमद कहते हैं। इसीप्रकार कुल, जाति, धन, बल आदि के आश्रय से कुलमद, जातिमद, धनमद, बलमद आदि होते हैं।

अधिकांश लोगों की मान्यता ऐसी पाई जाती है कि धनमद धनवालों को ही होता है, गरीबों को नहीं। उनका कहना है कि गरीबों के पास धन है ही नहीं, तो उन्हें धनमद कैसे हो सकता है? इसीप्रकार रूपमद रूपवालों को होगा, कुरूपों को नहीं। बलमद बलवानों को होगा, निर्बलों को नहीं। इसीप्रकार अन्य भी समझ लेना चाहिये।

उनकी यह बात ऊपर से कुछ जँचती भी है, पर गम्भीरता से विचार करने पर प्रतीत होता है कि यह बात युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि यदि धनमद धनवालों को ही होगा, बलमद बलवानों को ही होगा, रूपमद रूपवान को ही होगा तो फिर ज्ञानमद ज्ञानवान को ही होना चाहिए; जबकि ज्ञानमद ज्ञानी को नहीं, अज्ञानी को होता है। ज्ञानमद ही क्यों, आठों ही मद अज्ञानी को ही होते हैं, ज्ञानी को नहीं।

जब ज्ञानमद अज्ञानी को हो सकता है तो धनमद निर्धन को क्यों नहीं, रूपमद कुरूप को क्यों नहीं? इसीप्रकार बलमद निर्बल को क्यों नहीं? आदि। दूसरी बात यह है कि मान लो एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास न तो धन है, न बल है, न ही वह रूपवान है, न ही ऐश्वर्यवान है, न ही ज्ञानी एवं तपस्वी ही है; उच्च जाति एवं उच्च कुलवाला भी नहीं है तो उसके तो कोई मद होगा ही नहीं, उसे किसी भी प्रकार का मान होगा नहीं; उसे तो फिर मानकषाय के अभाव में मार्दव धर्म का धनी मानना होगा। शायद यह आपको भी स्वीकार न होगा, क्योंकि इस स्थिति में जो धर्म का नाम भी नहीं जानते; ऐसे दीनहीन, कुरूप, निर्बल, नीच जाति कुल वाले अज्ञानी जन के भी मार्दवधर्म की उपस्थिति माननी होगी, जो कि संभव नहीं है।

धर्म के दशलक्षण

वस्तुतः स्थिति यह है कि धन के संयोग से अपने को बड़ा माने वह मानी। मात्र धन के होने से कोई मानी नहीं हो जाता, पर उसके होने से अपने को बड़ा मानकर मान करने से मानी होता है। इसीप्रकार धन के न होने से या कम होने से अपने को छोटा माने वह दीन है, मात्र धन की कमी या अभाव से कोई दीन नहीं हो जाता, हो जावे तो मुनिराजों को दीन मानना होगा; क्योंकि उनके पास तो धन होता ही नहीं, वे रखते ही नहीं। वे तो मार्दवधर्म के धनी हैं, वे दीन कैसे हो सकते हैं? धन के अभाव से अपने को छोटा अनुभव कर दीनता लावे तो दीन होता है।

धनादि के अभाव में भी धनादिमदों की उपस्थिति मानने में हमें परेशानी इसलिए होती है कि हम धनादि के संयोग से मान की उत्पत्ति मान लेते हैं। हम मान का नाप पर से करते हैं। मानकषाय और मार्दवधर्म दोनों ही आत्मा की पर्यायें हैं, अतः उनका नाप अपने से ही होना चाहिए, पर से नहीं। दूध लीटर से नापा जाता है और कपड़ा मीटर से। यदि कोई कहे दो लीटर कपड़ा देना या दो मीटर दूध देना तो दुनिया उसे मूर्ख ही समझेगी; क्योंकि ऐसा बोलने वाला न तो लीटर को ही समझता है और न मीटर को ही, या फिर वह दूध और कपड़ा दोनों से अपरिचित है अन्यथा लीटरों में कपड़ा और मीटरों में दूध क्यों मांगता ?

आत्मा के धर्म मार्दवादि और अधर्म मानादि को भी परपदार्थों से क्यों नापना ? धनादि परपदार्थों के संयोग मात्र से मानकषाय एवं उनके अभाव से मार्दवधर्म को मानने वाले न तो मानकषाय को ही समझते हैं और न मार्दवधर्म को ही। भले ही वे मानकषाय करते हों, पर उसका सही स्वरूप नहीं समझते। ऐसा भी संभव है कि धनादि का संयोग हो, पर धनमद न हो। अज्ञानी को धनादि का संयोग न होने पर भी नियम से धनादिमद होते हैं; क्योंकि जबतक सम्यग्दर्शन नहीं हुआ, आत्मा का अनुभव नहीं हुआ, तबतक धनादिमदों की उपस्थिति अनिवार्य है, भले ही वह बाह्य में अभिमान करता दिखाई न भी दे। मान और दीनता दोनों ही मार्दवधर्म के विरोधी भाव हैं। अतः दोनों ही मद (मान) के ही रूप हैं। जब मार्दव के अभाव को मान या मान के अभाव उत्तममार्दव

को मार्दव कहा जाता है; कम से कम तब निश्चितरूप से ‘मान’ शब्द में दीनता को भी शामिल मानना होगा, अन्यथा मार्दवधर्म वालों के दीनता का अभाव मानना संभव न होगा।

‘ज्ञानी के ज्ञानमद नहीं होता और अज्ञानी के होता है।’ इससे भी एक बात प्रकट होती है कि जिसका मान होता है उसकी सत्ता हो ही, यह आवश्यक नहीं। अतः धनमद होने के लिए धन की उपस्थिति आवश्यक नहीं।

धनादि का व्यवहार तो मात्र मनुष्यगति में ही पाया जाता है और मान चारों ही गतियों में पाया जाता है। कुल-जाति का व्यवहार भी मनुष्य-व्यवहार है। मान को मात्र मनुष्य-व्यवहार तक सीमित रखकर नहीं, विस्तृत सीमा में समझना होगा।

इसमें मूल बात ध्यान देने की यह है कि अज्ञानी ने अपना नाप अपने से नहीं किया, वरन् धनादि के संयोग से किया। धन के संयोग से अपने को बड़ा माना और उसकी कमी या अभाव से अपने को छोटा माना। पर के कारण चाहे अपने को छोटा माने या बड़ा – दोनों ही मान हैं। इस कारण मानी तो मानी है ही, दीन भी मानी ही है।

लौकिक दृष्टि से भले ही उसमें भेद हो, पर आध्यात्मिक दृष्टि से विशेषकर मार्दवधर्म के सन्दर्भ में अभिमान और दीनता दोनों मान के ही रूप हैं, उनमें कोई विशेष भेद नहीं। मार्दवधर्म दोनों के ही अभाव में उत्पन्न होने वाली स्थिति है।

अभिमान और दीनता दोनों में अकड़ है; मार्दवधर्म की कोमलता, सहजता दोनों में ही नहीं है। मानी पीछे को झुकता है, दीन आगे को; सीधे दोनों ही नहीं रहते। मानी ऐसे चलता है जैसे वह चौड़ा हो और बाजार सकड़ा एवं दीन ऐसे चलता है जैसे वह भारी बोझ से दबा जा रहा हो।

अतः यह एक निश्चित तथ्य है कि अभिमान और दीनता दोनों ही विकार हैं, आत्म-शान्ति को भंग करने वाले हैं और दोनों के अभाव का नाम ही मार्दवधर्म है।

धर्म के दशलक्षण

समानता आने पर मान जाता है। मार्दवधर्म में समानता का तत्त्व विद्यमान है। ‘सभी आत्माएँ समान हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं।’ यह मान्यता सहज ही मानकषाय को कम करती है, क्योंकि बड़प्पन के भाव का नाम ही तो मान है। ‘मैं बड़ा और जगत छोटा’ - यह भाव मानस्वरूप है। तथा ‘मैं छोटा और जगत बड़ा’ – यह भाव दीनतारूप है; यह भी मान का ही रूपान्तर है; जैसाकि पहले स्पष्ट किया जा चुका है।

आर्हतमत में ‘मेरा स्वरूप सिद्ध समान है’ कहकर भगवान को भी समानता के सिद्धान्त के भीतर ले लिया गया है। ‘मैं किसी से बड़ा नहीं’ मानने वाले को मान एवं ‘मैं किसी से छोटा नहीं’ मानने वाले को दीनता आना संभव नहीं। छोटे-बड़े का भाव मान है और समानता का भाव मार्दव। सब समान

हैं, फिर मान कैसा ? पर हमने ‘स’ छोड़कर ‘मान’ रख लिया है। यदि मान हटाना है तो सबमें विद्यमान समानता को जानिए, मानिए; मान स्वयं भाग जाएगा और सहज ही मार्दवधर्म प्रकट होगा।

जैसा हो वैसा अपने को मानने का नाम मान नहीं है; क्योंकि उसका नाम तो सत्यश्रद्धान, सत्यज्ञान है। बल्कि जैसा है नहीं, वैसा मानने से, तथा जैसा है नहीं, वैसा मानकर अभिमान या दीनता करने से मान होता है, मार्दवधर्म खण्डित होता है। यदि मात्र अपने को ज्ञानी मानने से मान होता हो, तो फिर ज्ञानी को भी ज्ञानमद मानना होगा; क्योंकि वह भी तो अपने को ज्ञानी मानता है। केवलज्ञानी भी अपने को केवलज्ञानी मानते-जानते हैं, तो क्या वे भी मानी हैं ?

नहीं, कदापि नहीं। ज्ञानमद केवलज्ञानी को नहीं होता, क्षयोपशम ज्ञानवालों को होता है। क्षयोपशम ज्ञानवालों में भी ज्ञानमद सम्यग्ज्ञानी को नहीं, मिथ्याज्ञानी को होता है। मिथ्याज्ञानी को अज्ञानी भी कहा जाता है। संयोग को संयोगरूप जानने से भी मान नहीं होता, क्योंकि सम्यग्ज्ञानी- चक्रवर्ती अपने को चक्रवर्ती जानता ही है, मानता भी है; किन्तु साथ में यह भी जानता है कि यह सब संयोग है, मैं तो इनसे भिन्न निराला तत्त्व हूँ। यही उत्तममार्दव

कारण है कि उसके अनन्तानुबन्धी का मान नहीं होता। यद्यपि कमजोरी के कारण अप्रत्याख्यानादि का मान रहता है, तथापि मान के साथ एकत्वबुद्धि का अभाव है, अतः उसके आंशिकरूप से मार्दवधर्म विद्यमान है। अनन्तानुबन्धी मान का मूल कारण शरीरादि परपदार्थ एवं अपनी विकारी अल्पविकसित अवस्थाओं में एकत्वबुद्धि है। मुख्यतः हम इसे शरीर के साथ एकत्वबुद्धि के आधार पर समझ सकते हैं; क्योंकि रूपमद, कुलमद, जातिमद, बलादिमद शरीर से ही सम्बन्ध रखते हैं। रूपमद शरीर की कुरूपता और सुरूपता के आश्रय से ही होता है। इसीप्रकार बलमद भी शरीर के बल से संबंधित है तथा जाति और कुल का निर्णय भी जन्म से सम्बन्ध रखने के कारण शरीर से ही जुड़ जाता है।

जो व्यक्ति शरीर को ही अपने से भिन्न पदार्थ मानता है, जानता है, उसमें अपनत्व भी नहीं रखता; वह शरीर के सुन्दर होने से अपने को सुन्दर कैसे मान सकता है? इसीप्रकार उसके कुरूप होने से भी अपने को कुरूप कैसे मानेगा ?

दूसरी बात यह भी तो है कि ज्ञानी इनकी क्षणभंगुरता से भली-भाँति परिचित होता है। अतः इनके आश्रय से उसे मान कैसे हो सकता है ? शरीरादि संयोग पल-पल में विकृत और विनष्ट होने वाले हैं। क्या पता अभी सुन्दर दिखने वाला शरीर कब असुन्दर हो जावे। ऐश्वर्य का भी क्या भरोसा ? प्रातः के श्रीमंत को सायं होने से पहले श्रीविहीन होते देखा जा सकता है। अपनी भुजाओं से मोटर रोक देने वाले गामा पहलवान के बाजुओं में मरते समय मक्खी उड़ाने की भी शक्ति न रही थी। क्या कोई दावे के साथ कह सकता है कि जो शक्ति, जो सौन्दर्य और जो सम्पत्ति आज उसके पास है, वह कल भी रहेगी ? काया और माया को बिखरते क्या देर लगती है ? ऐसी स्थिति में मान क्या किया जाय और किस पर किया जाय ?

इसीप्रकार जाति, कुलादि पर भी घटित कर लेना चाहिये।

ऐश्वर्यमद बाह्य पदार्थों से सम्बन्ध रखता है तथा ज्ञानमद आत्मा की अल्पविकसित अवस्था के आश्रय से होने वाला मद है। जिसे अपनी धर्म के दशलक्षण

पूर्णविकसित पर्याय केवलज्ञान का पता है, उसे क्षयोपशमरूप अल्पज्ञान का अभिमान कैसे हो सकता है ? कहाँ भगवान का अनन्तज्ञान और कहाँ अपना उसका अनन्तवाँ भाग ज्ञान, क्या करना उसका अभिमान ? और क्षयोपशम ज्ञान क्षणभंगुर भी तो है। अच्छा-भला पढ़ा-लिखा आदमी क्षण भर में पागल भी तो हो सकता है ?

धन-जन-तन आदि संयोगों के आधार पर किया गया मान अन्ततः खण्डित होना ही है; क्योंकि संयोग का वियोग निश्चित है। अतः संयोग का मान करने वाले का मान खण्डित होना भी निश्चित है।

मार्दवधर्म की प्राप्ति के लिए देहादि में से एकत्वबुद्धि तोड़नी होगी। देहादि में एकत्वबुद्धि मिथ्यात्व के कारण होती है; अतः सर्वप्रथम मिथ्यात्व का ही अभाव करना होगा, तभी उत्तमक्षमा-मार्दवादि धर्म प्रकट होंगे, अन्य कोई मार्ग नहीं है। मिथ्यात्व का अभाव आत्मदर्शन से होता है; अतः आत्मदर्शन ही एकमात्र कर्त्तव्य है; उत्तमक्षमा-मार्दवादि धर्म अर्थात् सुख-शान्ति प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है।

देहादि में परबुद्धि के साथ-साथ आत्मा में उत्पन्न होने वाली क्रोधमानादि कषायों में हेयबुद्धि भी होनी चाहिए। उनमें हेयबुद्धि हुए बिना उनका अभाव होना संभव नहीं है। यद्यपि अज्ञानी भी कहता तो यही है कि मान खोटी चीज है, इसे छोड़ना चाहिए; तथापि उसके अन्तर में मानादि के प्रति उपादेयबुद्धि बनी रहती है। हेय तो शास्त्रों में लिखा है, इसलिये कहता है। मन से तो वह मान-सम्मान चाहता ही है; अतः मान रखने के अनेक रास्ते निकालता है। कहता है कि मान नहीं, पर आदमी में स्वाभिमान तो होना ही चाहिये। स्वाभिमान किसे कहते हैं, इसकी तो उसे खबर ही नहीं है; मान के ही किसी अंश को स्वाभिमान मान लेता है।

मान लीजिये आपने मुझे प्रवचन के लिए बुलाया, पर जो स्टेज बनाया तथा प्रवचन सुनने के लिए जितनी जनता जुड़ी, वह स्टेज व उतनी जनता मुझे अपनी विद्वता की तुलना में अपर्याप्त लगे तथा मैं कहने लगूँ कि इतनीसी स्टेज ! इस पर एक चौकी लगाओ। इतने बड़े विद्वान् के लिए इतनी नीची स्टेज बनाते शर्म नहीं आई और जनता भी इतनी-सी।

उत्तममार्दव

आप कहेंगे पंडितजी मानी हैं और मैं कहूँगा कि यह मान नहीं, स्वाभिमान है। विद्वान् को मानी नहीं, पर स्वाभिमानी तो होना ही चाहिये; उसकी इज्जत तो होनी ही चाहिए।

समझ में नहीं आता कि इसमें बेइज्जती की किसने ? क्या कम जनता एवं नीचे स्टेज से किसी की बेइज्जती हो जाती है ? अन्ततोगत्वा मान और स्वाभिमान के बीच विभाजन रेखा तो खींचनी ही होगी कि कहाँ तक वह स्वाभिमान कहलाएगा और कहाँ से मान। आखिर में होता यही है कि लोग उसे मानी कहते रहते हैं और मान करने वाला उसी को स्वाभिमान नाम देता रहता है।

और भी अनेक प्रसंगों पर इसप्रकार के दृश्य देखे जा सकते हैं। स्वाभिमान शब्द स्व+अभिमान से बना है। स्व शब्द निज का वाची है, उसमें स्टेज और जनता कहाँ से आ जाते हैं। वस्तुतः तो अपनी आत्मा की पूर्ण शक्तियों को पहिचान कर उनके आश्रय से जगत के सामने दीन न होना ही स्वाभिमान है। स्वाभिमान का सही स्वरूप न पहिचान कर स्वाभिमान के नाम पर अज्ञानी मान ही करता रहता है।

सम्मान के नाम से भी मान लिया-दिया जाता है। कहते हैं कि यह सत् मान है। हम तो समझते हैं कि मान तो असत् ही होता है, पर लोगों ने उसके भी दो भेद कर डाले हैं – सत्+मान = सम्मान और असत्+मान = असम्मान । यदि मान भी सत् होगा तो फिर असत् क्या होगा ?

लोग कहते हैं कि सम्मान तो दूसरों ने दिया है, उससे हम मानी कैसे हो गये ? परं भाई साहब ! लिया तो आपने है। आचार्यों ने चारों गतियों में चार कषायों की मुख्यता बताते हुए मनुष्य गति में मान की मुख्यता बताई है। आदमी सब कुछ छोड़ सकता है – घर-बार, स्त्री-पुत्रादि; यहाँ तक कि तन के वस्त्र भी, पर मान छोड़ना बहुत कठिन है। आप कहेंगे कैसी बात करते हो ? पद की मर्यादा तो रखनी ही पड़ती है। पर भाई ! समस्त पदों के त्याग का नाम साधु पद है, यह बात क्यों भूल जाते हो ?

धर्म के दशलक्षण

रावण मान के कारण ही नरक गया। यद्यपि वह सीताजी को हर कर ले गया था, तथापि उसने उन्हें हाथ नहीं लगाया। अन्त में तो उसने सीताजी को ससम्मान राम को वापस करने का भी निश्चय कर लिया था, किन्तु उसने सोचा कि बिना राम से लड़े और बिना जीते देने पर मान भंग हो जाएगा। दुनिया कहेगी कि डरकर सीता वापस कर दी है। अतः उसने संकल्प किया कि पहिले राम को जीतूँगा, फिर सीता को ससम्मान वापस कर दूँगा। देखो ! सीता वापस देना स्वीकार, पर जीतकर; हारकर नहीं। सवाल सीता का नहीं; मूँछ का था, मान का था। मूँछ के सवाल के कारण सैकड़ों घर बर्बाद होते सहज ही देखे जा सकते हैं। मनुष्यगति में अधिकतर झगड़े मान के खातिर ही होते हैं। न्यायालयों के आस-पास मूँछों पर ताव देते लोग सर्वत्र देखे जा सकते हैं।

यहाँ एक प्रश्न सहज ही उठ सकता है कि आप कैसी बातें करते हैं? मान-सम्मान की चाह तो ज्ञानी के भी हो सकती है, होती भी है। देखने पर पुराणों में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जावेंगे।

हाँ ! हाँ !! क्यों नहीं, अवश्य मिल जावेंगे। पर मान की चाह अलग बात है और मानादि कषायों में उपादेयबुद्धि अलग बात है। मानादि कषायों में उपादेयबुद्धि मिथ्यात्व भाव है, उसके रहते तो उत्तममार्दवादि धर्म प्रकट नहीं हो सकते; मान की चाह और मान कषाय की उपस्थिति में आंशिकरूप से मार्दवादि धर्म प्रकट हो सकते हैं; क्योंकि मान की चाह और मानकषाय की आंशिक उपस्थिति चारित्र-मोह का दोष है, वह क्रमशः ही जायेगा, एक साथ नहीं।

सम्यग्दृष्टि के यद्यपि अनन्तानुबंधी मान चला गया है; तथापि अप्रत्याख्यानावरण व प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन मान तो विद्यमान है, उनका प्रकट रूप तो ज्ञानी के भी दिखाई देगा ही। इसीप्रकार अणुव्रती के प्रत्याख्यान और संज्वलन सम्बन्धी तथा महाव्रती मुनिराजों के भी संज्वलन सम्बन्धी मानादि की उपस्थिति रहेगी ही। मानादि कषायें छूटेंगी तो भूमिकानुसार ही; पर उनमें उपादेयबुद्धि, उन्हें अच्छा मानना तो छूटना ही चाहिए; इसके बिना तो धर्म का आरंभ भी नहीं हो सकता।

उत्तममार्दव

आश्चर्य की बात तो यह है कि हम उन्हें उपयोगी और उपादेय मानने लगे हैं। कहते हैं कि गृहस्थी में थोड़ा क्रोध, मान आदि तो होना ही चाहिए, अन्यथा काम ही न चलेगा। यदि थोड़ा-बहुत भी क्रोध नहीं रहा तो फिर बच्चे भी कहना न मानेंगे। सारा अनुशासन-प्रशासन समाप्त हो जायगा। थोड़ा स्वभाव तेज हो तो सब काम ठीक होता है, समय पर होता है। इसीप्रकार यदि हम बिल्कुल भी मान न रखेंगे तो फिर कोई भटे के भाव भी नहीं पूछेगा। आन-बान-शान के लिए भी थोड़ा-सा मान जरूरी है।

अज्ञानी समझता है कि अनुशासन-प्रशासन और मान-सम्मान क्रोध-मान के द्वारा होते हैं, जबकि इनका क्रोध-मान के साथ दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। एक बाबाजी थे। उन्हें खाँसी उठा करती थी। उनसे कहा गया कि खाँसी का इलाज करा लीजिए, क्योंकि कहावत है कि ‘लड़ाई की जड़ हाँसी और रोग की जड़ खाँसी’। वे कहने लगे - भाई! भरे-पूरे घर में इतनी खाँसी तो चाहिए। क्यों? – ऐसा पूछने पर कहने लगे - तुम समझते तो हो नहीं, बहू- बेटियों वाला बड़ा घर है, घर में खाँसते-खखारते जाओ तो सब सावधान हो जाते हैं, इसमें उनकी और हमारी दोनों की इज्जत बनी रहती है। जब उनसे कहा गया कि खाँसी का तो इलाज करवा लीजिए, बहू-बेटियों के लिए नकली खाँस लिया करना। तब तुनक कर बोले - नकली क्यों खाँसूँ जब असली ही है तो; हम नकली काम नहीं करते, नकली वे करें जिनके असली न हो।

आवश्यकतावश खाँसना-खखारना अलग बात है और खाँसी को ही

उपयोगी और उपादेय मानना अलग बात। जिसने खाँसी को ही उपयोगी और उपादेय मान लिया है, उसे कालान्तर में निश्चितरूप से तपेदिक होने वाला है। इसीप्रकार मानादि की चाह या मानादि का आंशिकरूप से होना अलग बात है और उन्हें उपयोगी और उपादेय मानना अलग बात। उपादेय मानने वाले को धर्म प्रकट होना भी संभव नहीं है।

मानादि कषायें भूमिकानुसार क्रमशः छूटती हैं, पर उनमें उपादेयबुद्धि एक साथ ही छूट जाती है। इनमें उपादेयबुद्धि छूटे बिना धर्म का आरंभ ही नहीं होता।

धर्म के दशलक्षण

तो क्या अन्त में यही निष्कर्ष रहा कि क्रोध-मानादि कषाय नहीं करना चाहिए, इन्हें छोड़ देना चाहिये?

नहीं, कहा था न कि क्रोध-मान छोड़े नहीं जाते हैं, छूट जाते हैं। बहुत से लोग मुझसे कहते हैं कि आप बीमार बहुत पड़ते हैं, जरा कम पड़ा कीजिए न। मैं पूछता हूँ कि क्या मैं बीमार सोच-समझकर पड़ता हूँ - जो कम पड़ा करूँ, अधिक नहीं। अरे भाई ! मेरा बस चले तो मैं बीमार पडूं ही नहीं। इसीप्रकार क्या कोई क्रोध-मानादि कषायें सोच-समझकर करता है। अरे ! उसका वश चले तो वह कषाय करे ही नहीं, क्योंकि प्रत्येक समझदार प्राणी कषायों को बुरा समझता है और यह भी चाहता है कि मैं कषाय करूँ ही नहीं, पर उसके चाहने से होता क्या है ? क्रोध-मानादि कषायें हो ही जाती हैं, हो क्या जाती हैं, सदा बनी ही रहती हैं; कभी कम, कभी अधिक; कभी मंद, कभी तीव्र। अनादिकाल से एक भी अज्ञानी आत्मा आज तक कषाय किए बिना एक समय भी नहीं रहा। यदि एक बार भी, एक समय को भी कषाय भाव का पूर्णतः अभाव हो जावे तो फिर कषाय हो नहीं सकती।

अब यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है कि फिर मान क्यों उत्पन्न होता है और मिटे कैसे? इसकी उत्पत्ति का मूल कारण क्या है और इसका अभाव कैसे किया जाय?

जबतक यह आत्मा परपदार्थों को अपना मानता रहेगा, तबतक

अनन्तानुबन्धी मान की उत्पत्ति होती ही रहेगी। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि परपदार्थ की उपस्थितिमात्र मान का कारण नहीं है। तिजोरी में लाखों रुपया पड़ा रहता है, पर तिजोरी को मान नहीं होता, उन्हें संभालने वाले मुनीम को भी मान नहीं होता; पर उससे दूर बैठे सेठ को होता है, क्योंकि सेठ उन्हें अपना मानता है।

सेठ अपने को कपड़ा-मिल का मालिक समझता है। कपड़ा-मिल छूटने से मान नहीं छूटेगा; क्योंकि राष्ट्रीयकरण हो जाने पर मिल तो छूट जायगी, पर सेठ को मान की जगह दीनता हो जावेगी। अभी तक अपने को मिल का उत्तममार्दव

मालिक समझकर मान करता था, अब उसके अभाव में अपने को दीन अनुभव करेगा।

मिल छूटने से नहीं, परं छोड़ने से तो मान छूट जायगा ?

तब भी नहीं, क्योंकि छोड़ने से छोड़ने का मान हो जायगा, मान छोड़ने के लिए उसे अपना मानना छोड़ना होगा। मान का आधार ‘पर’ नहीं, पर को अपना मानना है।

जो पर को अपना माने उसे मुख्यतः मान होता है। अतः मान छोड़ने के लिए पर को अपना मानना छोड़ना होगा। पर को अपना मानना छोड़ने का अर्थ यह है कि निज को निज और पर को पर जानना होगा, दोनों को भिन्न- भिन्न स्वतंत्र सत्तायुक्त पदार्थ मानना ही पर को अपना मानना छोड़ना है, ममत्वबुद्धि छोड़ना है।

पर से ममत्वबुद्धि छोड़नी है और रागादि भावों में उपादेयबुद्धि छोड़नी है। इनके छूट जाने पर मुख्यतः मान उत्पन्न ही न होगा, विशेषकर अनन्तानुबंधी मान तो उत्पन्न ही न होगा। चारित्र-दोष और कमजोरी के कारण अप्रत्याख्यानादि मान कुछ काल तक रहेंगे, पर वे भी इसी ज्ञान-श्रद्धान के बल पर होने वाली आत्मलीनता से क्रमशः क्षीण होते जावेंगे और एक दिन ऐसा आयेगा कि मार्दवस्वभावी आत्मा पर्याय में भी पूर्ण मार्दवधर्म से युक्त हो जायगा, मानादि का लेश भी न रहेगा।

वह दिन सबको शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त हो, इस पवित्र भावना के साथ मार्दवधर्म की चर्चा से विराम लेता हूँ।

जब तक स्वयं परखने की दृष्टि न हो, उधार की बुद्धि

से कुछ लाभ नहीं होता।

  • आप कुछ भी कहो, पृष्ठ ६८

उत्तमआर्जव

क्षमा और मार्दव के समान ही आर्जव भी आत्मा का स्वभाव है। आर्जवस्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में छल-कपट मायाचार के अभावरूप शान्ति-स्वरूप जो पर्याय प्रकट होती है, उसे भी आर्जव कहते हैं। यद्यपि आत्मा आर्जवस्वभावी है, तथापि अनादि से ही आत्मा में आर्जव के अभावरूप मायाकषायरूप पर्याय ही प्रकट रूप से विद्यमान है। ‘ऋजोर्भावः आर्जवम्’ ऋजुता अर्थात् सरलता का नाम आर्जव है। आर्जव के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। सम्यग्दर्शन के साथ होने वाली सरलता ही उत्तमआर्जव धर्म है। उत्तमआर्जव अर्थात् सम्यग्दर्शनसहित वीतरागी सरलता।

आर्जवधर्म की विरोधी मायाकषाय है। मायाकषाय के कारण आत्मा में स्वभावगत सरलता न रहकर कुटिलता उत्पन्न हो जाती है। मायाचारी का व्यवहार सहज एवं सरल नहीं होता। वह सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ है। उसके मन-वचन-काय में एकरूपता नहीं रहती। वह अपने कार्य की सिद्धि छल-कपट के द्वारा ही करना चाहता है। मायाचारी की प्रवृत्ति का चित्रण पं. टोडरमलजी ने इसप्रकार किया है - "जब इसके मायाकषाय उत्पन्न होती है, तब छल द्वारा कार्य सिद्ध करने की इच्छा होती है। उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है, नाना प्रकार कपट के वचन कहता है, शरीर की कपटरूप अवस्था करता है, बाह्यवस्तुओं को अन्यथा बतलाता है तथा जिनमें अपना मरण जाने ऐसे भी छल करता है। कपट प्रकट होने पर स्वयं का बहुत बुरा हो, मरणादिक हो, उनको भी नहीं गिनता। तथा माया होने पर किसी पूज्य व इष्ट का भी सम्बन्ध बने तो उनसे भी छल उत्तमआर्जव

करता है, कुछ विचार नहीं रहता। यदि छल द्वारा कार्य सिद्धि न हो तो स्वयं बहुत संतापवान होता है, अपने अंगों का घात करता है तथा विष आदि से मर जाता है - ऐसी अवस्था माया होने पर होती है।‘’

मायाचारी व्यक्ति अपने सब कार्य मायाचार से ही सिद्ध करना चाहता है। वह यह नहीं समझता कि काठ की हांडी दो बार नहीं चढ़ती। एक बार मायाचार प्रकट हो जाने पर जीवनभर को विश्वास उठ जाता है। धोखा-धड़ी से कभी-कभी और किसी-किसी को ही ठगा जा सकता है, सदा नहीं और सबको भी नहीं।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि लौकिक कार्यों की सिद्धि मायाचार से नहीं, पूर्व पुण्योदय से होती है और पारलौकिक कार्य की सिद्धि में पाँचों समवायों के साथ पुरुषार्थ प्रधान है।

कार्यसिद्धि के लिए कपट का प्रयोग कमजोर व्यक्ति करता है। सबल व्यक्ति को अपनी कार्यसिद्धि के लिए कपट की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उसकी प्रवृत्ति तो अपने जोर के जरिये कार्य सिद्ध करने की रहती है। यह भी बात नहीं कि मायाचार की प्रवृत्ति मात्र किसी को ठगने के लिए ही की जाती हो। कुछ लोग मनोरंजन के लिए या आदतवश भी ऐसा करते हैं। उन लोगों को यहाँ की वहाँ भिड़ाने में कुछ आनन्द-सा आता है। ऐसे लोग अपने छोटे से छोटे मनोरंजन के लिए दूसरों को बड़े से बड़े संकट में डालने से नहीं चूकते।

आजकल सभ्यता के नाम पर भी बहुत-सा मायाचार चलता है। बिना लाग-लपेट के कही गई सच्ची बात तो लोग सुनना भी पसन्द नहीं करते। यह भी एक कारण है कि लोग अपने भाव सीधे रूप में प्रकट न कर एड़े- टेढ़े रूप में व्यक्त करते हैं। सभ्यता के विकास ने आदमी को बहुत-कुछ मिठबोला बना दिया है। आज के आदमी के लिए ऊपर से चिकनी-चुपड़ी बातें करना और अन्दर से काट करना एक साधारण-सी बात हो गई है। १. मोक्षमार्गप्रकाशक, पृष्ठ २३

धर्म के दशलक्षण

वह यह नहीं समझता कि यह मायाचारी दूसरों के लिए ही नहीं, स्वयं के लिए भी बहुत खतरनाक साबित हो सकती है, उसके सुख-चैन को भंग कर सकती है। भंग क्या कर सकती है, किए रहती है।

मायाचारी सदा सशंक बना रहता है, क्योंकि उसने जो दुरंगी नीति चलाई है, उसके प्रकट हो जाने का भय उसे सदा बना रहता है। छल कभी न कभी प्रकट होता ही है, उसकी गुप्तता बनाए रखना अपने आप में असंभव नहीं, तो कठिन काम अवश्य है। वह सदा उसी में उलझा रहता है।

वह हमेशा भयाक्रान्त भी बना रहता है। उसे यह भय सदा बना रहता है कि कपट खुल जाने पर उसकी बहुत बुरी हालत होगी, वह महान कष्ट में पड़ जायेगा। बलवानों के साथ किया गया कपट-व्यवहार खुलने पर बहुत खतरनाक साबित होता है। खतरा तो कपट खुलने पर होता है, पर खतरे की आशंका से कपटी सदा ही भयाक्रान्त रहता है।

सशंकित और भयाक्रान्त व्यक्ति कभी भी निराकुल नहीं हो सकता। उसका चित्त निरन्तर आकुल-व्याकुल और अशान्त रहता है। अशान्त-चित्त व्यक्ति कोई भी कार्य सही रूप में एवं सफलतापूर्वक नहीं कर सकता है, फिर धर्म की साधना और आत्मा की आराधना तो बहुत दूर की बातें हैं। मायाचारी व्यक्ति का कोई विश्वास नहीं करता। यहाँ तक कि माता-पिता, भाई-बहिन, पत्नी-पुत्र का भी उस पर से विश्वास उठ जाता है। यही कारण है कि मायाकषाय का वर्णन करते हुए श्री शुभचन्द्राचार्य ने ‘ज्ञानार्णव’ के उन्नीसवें सर्ग में लिखा है -

जन्मभूमिरविद्यानामकीर्ते र्वासमन्दिरम् ।

पापपङ्कमहागर्ती निकृतिः कीर्तिता बुधैः ॥ ५८॥

अर्गलेवापवर्गस्य पदवी श्वभ्रवेश्मनः ।

शीलशालवने वह्निर्मायेयमवगम्यताम् ॥ ५९॥

बुद्धिमान लोग कहते हैं कि माया को इसप्रकार जानौ कि वह अविद्या की जन्मभूमि, अपयश का घर, पापरूपी कीचड़ का बड़ा भारी गड्ढा, मुक्ति- उत्तमआर्जव

द्वार की अर्गला, नरकरूपी घर का द्वार और शीलरूपी शालवृक्ष के वन को जलाने के लिए अग्नि है।

मायाकषाय के अभाव का नाम ही आर्जवधर्म है।

आर्जवधर्म और मायाकषाय की चर्चा जब भी चलती है, तब उसे मन- वचन-काय के माध्यम से ही समझा-समझाया जाता है। कहा जाता है कि मन-वचन और काय की एकरूपता ही आर्जवधर्म है और इनकी विरूपता ही आर्जवधर्म की विरोधी मायाकषाय है। यह उपदेश भी दिया जाता है कि जैसा मन में हो वैसा ही वाणी से कहना चाहिये तथा जैसा बोला हो वैसा ही करना चाहिए। इसे ही आर्जव धर्म बताया जाता है तथा मन में और, वचन में और करे कुछ और, यह माया है – ऐसा कहा जाता है। मन-वचन-काय की इस विरूपता को ही वक्रता, कुटिलता आदि नामों से भी अभिहित किया जाता है।

किन्तु यह सब स्थूल कथन है। सूक्ष्मता से विचार करने पर इस सन्दर्भ में कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं।

आर्जवधर्म और मायाकषाय की उक्त परिभाषाएँ स्वीकार करने पर आर्जवधर्म और मायाकषाय की उपस्थिति मन-वचन-काय वालों के ही मानना होगी, क्योंकि मन-वचन-काय की एकरूपता या विरूपता मन-वचन- काय वालों के ही संभव है; जिनके मन-वचन-काय ही नहीं, उनके नहीं। मन-वचन-काय के अभाव में उनमें एकरूपता या विरूपता का प्रश्न ही नहीं उठता।

सिद्धों के मन-वचन-काय का अभाव है, अतः उक्त परिभाषा के अनुसार उनके आर्जवधर्म संभव नहीं है, जबकि उनके आर्जवधर्म होता है। उनमें आर्जवधर्म की सत्ता शास्त्रसम्मत तो है ही, युक्तिसंगत भी है। उत्तमक्षमा, मार्दव, आर्जव आदि आत्मा के धर्म हैं एवं वे आत्मा की स्वभाव-पर्यायें भी हैं, उनका सम्पूर्ण धर्मों एवं सम्पूर्ण स्वभाव-पर्यायों से युक्त सिद्ध जीवों में पाया जाना अवश्यम्भावी है, क्योंकि सम्पूर्ण शुद्धता का नाम ही सिद्धपर्याय है। धर्म के दशलक्षण

इसीप्रकार जिनके मन और वाणी नहीं है, ऐसे एकेन्द्रियादि जीवों के मायाकषाय मानना संभव न होगा; क्योंकि जिनके अकेली काया है, मन और वचन है ही नहीं, उनके मन-वचन-काय की विरूपता अर्थात् मन में और, वचन में और, करे कुछ और वाली बात कैसे घटित होगी ?

एक दुकान पर तीन विक्रेता हैं - पृथक्-पृथक् उन सबसे किसी कपड़े का भाव पूछने पर एक ने आठ रुपये मीटर, दूसरे ने दस रुपये मीटर एवं तीसरे ने बारह रुपये मीटर बताया, जबकि वह है आठ रुपये मीटर का ही। उक्त स्थिति में तीनों की बातों में विरूपता होने से वे अप्रामाणिक कहे जावेंगे। आप कहेंगे - क्या लूट मचा रखी है, जितने आदमी उतने भाव। पर यदि एक ही विक्रेता हो और वह आठ रुपये मीटर के कपड़े को बारह रुपये मीटर बतावे तो क्या वह प्रामाणिक हो जावेगा ? नहीं, कदापि नहीं। परन्तु एक ही विक्रेता होने से विरूपता दिखाई नहीं देगी। एक में विरूपता कैसी ? विरूपता तो अनेक में ही संभव है।

इसीप्रकार एकेन्द्रियादि असंज्ञी जीवों में वाणी और मन का अभाव होने से मन-वचन-काय की विरूपता तो संभव नहीं है, तो फिर उनके-मन-वचन- काय की विरूपता है परिभाषा जिसकी, ऐसी मायाकषाय की उपस्थिति कैसे मानी जावेगी? मायाकषाय के अभाव में उनके आर्जवधर्म मानना होगा, जो कि असंभव है, क्योंकि शास्त्रों में ऐसा स्पष्ट उल्लेख है कि एकेन्द्रिय के ही क्या, एकेन्द्रिय से असैनी पंचेन्द्रिय तक सभी जीवों के चारों कषायें होती हैं, भले ही उनका प्रकटरूप दिखाई न दे।

दूसरे मन-वचन-काय की एकरूपता उल्टी भी तो हो सकती है। जैसे - तीनों ही विक्रेता आठ रुपये मीटर के कपड़े का भाव बीस रुपया मीटर बतावें, तो क्या वे सही हो जावेंगे? नहीं, कदापि नहीं; जबकि उन तीनों के बोलने में एकरूपता दिखाई देगी, क्योंकि बुद्धिपूर्वक पूर्वनियोजित बेईमानी में भी एकरूपता सहज ही पाई जाती है।

उसीप्रकार जैसे किसी के मन में खोटा भाव आया, उसे उसने वाणी में भी व्यक्त कर दिया और काया से वैसा कार्य भी कर डाला तो क्या उसके उत्तमआर्जव

आर्जवधर्म प्रकट हो जावेगा ? फिर तो आर्जवधर्म प्राप्त करने के लिए मन में आये प्रत्येक खोटे भाव को वाणी में लाना और क्रियात्मकरूप देना अनिवार्य हो जायगा, जो कि किसी भी स्थिति में इष्ट नहीं हो सकता।

‘मन में होय सो वचन उचरिये’ के सन्दर्भ में एक बात यह भी विचारणीय है कि क्या आर्जवधर्म के लिए बोलना जरूरी है? क्या बिना बोले आर्जवधर्म की सत्ता संभव नहीं है? जो भावलिंगी संत मौनव्रत के धारी हैं क्या उनके आर्जवधर्म नहीं है? बाहुबली दीक्षा लेने के बाद एक वर्ष तक ध्यानस्थ खड़े रहे, कुछ बोले ही नहीं; तो क्या उनके आर्जवधर्म नहीं था ? था, अवश्य था। तो फिर आर्जवधर्म होने के लिए बोलना जरूरी नहीं रहा।

यदि जैसा मन में हो वैसा ही बोल दें, तो क्या आर्जवधर्म हो जायगा? नहीं; क्योंकि इसप्रकार तो फिर विकृत-मन और विकृत-वाणी वाला अर्द्धविक्षिप्त व्यक्ति आर्जवधर्म का धनी हो जायगा, क्योंकि उसके मन में जो आता वह वही बक देता है।

जिसप्रकार बोलने के सम्बन्ध में यहाँ स्पष्ट किया गया है, उसीप्रकार करने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।

आर्जवधर्म और मायाकषाय ये दोनों ही जीव के भाव हैं एवं मन-वचन- काय पुद्गल की अवस्थाएँ हैं। जीव और पुद्गल दोनों जुदे-जुदे द्रव्य हैं और उनकी परिणतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं। आर्जवधर्म आत्मा का स्वभाव एवं स्वभावभाव है तथा मायाकषाय आत्मा का विभावभाव है। स्वभाव और स्वभावभाव होने के लिए तो पर की आवश्यकता का प्रश्न ही नहीं उठता; विभावभाव में भी पर निमित्तमात्र ही होता है। निमित्त भी कर्मोंदय तथा अन्य बाह्य पदार्थ होंगे, मन-वचन-काय नहीं। अतः मन-वचन-काय से आर्जवधर्म और मायाकषाय के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

यद्यपि यह सत्य है कि आर्जवधर्म के होने के लिए मन-वचन-काय की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मन-वचन-कायरहित सिद्धों के वह विद्यमान है। इसीप्रकार मायाकषाय की उपस्थिति के लिए भी तीनों की अनिवार्य उपस्थिति धर्म के दशलक्षण

आवश्यक नहीं, क्योंकि एकेन्द्रिय के अकेली काया है फिर भी उसके माया पायी जाती है, जैसा कि पहिले सिद्ध किया जा चुका है; तथापि समझने- समझाने के लिए इनकी उपयोगिता है, क्योंकि इनके बिना हमारे पास मायाकषाय और आर्जवधर्म को समझने-समझाने के लिए कोई दूसरा साधन नहीं है। यही कारण है कि इन्हें मन-वचन-काय के माध्यम से समझा- समझाया जाता है।

दूसरी बात यह भी तो है कि समझने वाले और समझाने वाले दोनों ही मन-वचन-काय वाले हैं और समझने-समझाने का माध्यम भी मन-वचन- काय है। जिनके इनका अभाव है, ऐसे सिद्ध कभी किसी को समझाते नहीं एवं जिनके इनमें से एक का भी अभाव है, ऐसे असैनी पंचेन्द्रिय तक के संसारी जीव समझते नहीं। विशेषकर मनुष्य जाति में ही इनकी चर्चा चलती है तथा मनुष्य का मायाचार प्रायः मन-वचन-काय की विरूपता में तथा आर्जवधर्म इनकी एकरूपता में प्रकट होता देखा जाता है।

अतः आर्जवधर्म एवं मायाकषाय को मन-वचन-काय के माध्यम से

समझा-समझाया जाता है।

मन-वचन-काय के माध्यम से मायाचार एवं आर्जवधर्म होते नहीं, प्रकट होते हैं। समझने-समझाने के लिए प्रकट होना अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रकट वस्तु को समझना-समझाना जितना आसान है, उतना अप्रकट को नहीं। एकेन्द्रिय के मन और वचन का अभाव होने से उसके मायाकषाय अप्रकट रहती है, अतः उसमें मायाकषाय की उपस्थिति आगम से ही जानी जाती है, उसे युक्ति से सिद्ध करना संभव नहीं। इसीप्रकार सिद्धों में आर्जवधर्म भी आगमसिद्ध ही है, युक्तियों से सिद्ध करना कठिन है। जो युक्तियाँ दी जावेंगी, अन्ततः वे सब आगमाश्रित ही होंगी।

यद्यपि उक्त कारणों के कारण समझने-समझाने में मन-वचन-काय के माध्यम का प्रयोग किया जाता है, तथापि समझने-समझाने की इस पद्धति के कारण कोई यदि यही मान ले कि मायाकषाय एवं आर्जवधर्म के लिए मन-वचन-काय आवश्यक हैं, तो उसका मानना सही न होगा।

उत्तमआर्जव

यद्यपि मन-वचन-काय की विरूपता नियम से मायाचारी के ही होगी तथा जितने अंश में आर्जवधर्म प्रकट होगा, उतने अंश में तीनों की एकरूपता भी होगी ही; तथापि मायाकषायै और आर्जवधर्म इन तक ही सीमित नहीं, और भी है - यहाँ यही बताना है।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि मन-वचन-काय के माध्यम से आर्जवधर्म और मायाकषाय को समझने-समझाने का मूल कारण यह है कि मन-वचन-काय वालों की मायाकषाय और आर्जवधर्म प्रायः मन-वचन- काय के माध्यम से ही प्रकट होते हैं।

यदि ऐसी बात है तो फिर तो यह बात ठीक ही है कि -

‘मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सों करिये।’

हाँ! हाँ!! ठीक है, पर किनके लिये, इसका भी विचार किया या नहीं? यह बात उनके लिये है, जिनका मन इतना पवित्र हो गया है कि जो बात उनके मन में आई है, यदि वह वाणी में भी आ जाय तो फूलों की वर्षा हो और यदि उसे कार्यान्वित कर दिया जाय तो जगत निहाल हो जावे। यह बात उनके लिए नहीं, जिनका मन पापों से भरा है; जिनके मन में निरन्तर खोटे भाव ही आया करते हैं; हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का ही चिन्तन जिनके सदा चलता रहता है। यदि उन्होंने भी यही बात अपना ली तो मन के समान उनकी वाणी भी अपावन हो जावेगी तथा उनका जीवन घोर पापमय हो जावेगा।

‘मन में होय सो वचन उचरिये’ का आशय मात्र यह है कि मन को इतना पवित्र बनाओ कि उसमें कोई खोटा भाव आवे ही नहीं।

जिनके हृदय में निरन्तर अपवित्र भाव ही आया करते हैं, उनके लिए तो यही ठीक है कि -

‘मन में होय सो मन में रखिये, वचन होय तन सों न करिये।’ क्यों ?

क्योंकि आज लोगों के मन इतने अपवित्र हो गये हैं, उनके मनों में इतनी हिंसा समा गई है कि यदि वह वाणी में फूट पड़े तो जगत में कोलाहल मच धर्म के दशलक्षण

जाये और यदि जीवन में आ जाय तो प्रलय होने में देर न लगे। इसीप्रकार मन इतना वासनामय और विकृत हो गया है कि यदि मन का विकार वाणी और काया में फूट पड़े तो किसी भी माँ-बहिन की इज्जत सुरक्षित न रहे। अतः यह ही ठीक है कि जो पाप मन में आ गया, उसे वहीं तक सीमित रहने दो, वाणी में न लाओ; जो वाणी में आ गया, उसे क्रियान्वित मत करो। जरा विचार तो करो कि गुस्से में यदि मेरे मुँह से यह निकल जाय कि ‘मैं तुम्हें जान से मार डालूँगा’ तो क्या यह उचित होगा कि मैं अपनी बात को कार्यरूप में भी परिणित करूँ ?

नहीं, कदापि नहीं। बल्कि आवश्यक तो यह है कि मैं उस विचार को भी तत्काल त्याग दूँ।

अतः यही उचित है कि मन-वचन-काय की एकरूपता अच्छाई में ही हो, बुराई में नहीं। हमें मन-वचन-काय में एकरूपता लाने के लिए मन को इतना पवित्र बनाना होगा कि उसमें कोई खोटा भाव कभी उत्पन्न ही न हो, अन्यथा उनकी एकरूपता रखना न तो संभव ही होगा और न हितकर ही। तत्त्वार्थसूत्र में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव आदि दशधर्मों की चर्चा गुप्ति, समिति, अनुप्रेक्षा और परीषहजय के साथ की गई है - ये सब मुनिधर्म से संबंधित हैं। अतः आर्जवधर्म की चर्चा भी उन मुनिराजों के सन्दर्भ में ही हुई है, जिनके मन-वचन-काय की दशा निम्नलिखितानुसार हो रही है - दिन-रात आत्मा का चिन्तन, मृदुसंभाषण में वही कथन।

निर्वस्त्र दिगम्बर काया से भी, प्रकट हो रहा अन्तर्मन॥

वे दिन-रात आत्मा का ही चिन्तन-मनन-अनुभवन करते रहते हैं, अतः उनकी वाणी में भी उसकी ही चर्चा निकलती है और चर्चा करते-करते वे आत्मानुभवन में समा जाते हैं। उसके मन में अशुभ भाव आते ही नहीं। हमारी स्थिति उनसे भिन्न है। अतः हमें अपने स्तर पर विचार करना जरूरी है। मन में होने पर भी बहुत से पापों से जीवन में हम इसलिए बचे रहते हैं कि समाज उन कार्यों को बुरा मानता है, सरकार उन कार्यों को करने से उत्तमआर्जव

रोकती है। कभी-कभी हमारा विवेक भी उन कार्यों में हमें प्रवृत्त होने नहीं देता। वाणी को भी हम उक्त कारणों से काफी संयमित रखते हैं। यही कारण है कि जगत के कायिक जीवन में उतनी विकृति नहीं, जितनी की जन-जन के मनों में है। ‘मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होय सों तन सों करिये’ का उपदेश मन की विकृतियों को बाहर लाने के लिए नहीं, वरन् उन्हें समाप्त कर मन को पावन बनाने के लिए है।

यहाँ एक प्रश्न संभव है कि यदि यह बात है तो फिर आप यह क्यों कहते हैं कि - ‘मन में होय सो मन में रखिये।’

इसका भी कारण है और वह यह कि मन को इतना पवित्र बना लेना इतना आसान नहीं कि यहाँ हमने कहा और वहाँ आपने बना लिया। वह तो बनते-बनते ही बनेगा। अतः जबतक मन पूर्णतः पावन नहीं बन पाता और उसमें दुर्भाव उत्पन्न होते रहते हैं, तबतक हमारी उक्त सलाह पर चलना मात्र उपयुक्त ही नहीं वरन् आवश्यक भी है, अन्यथा आपका जीवन स्वाभाविक भी न रह सकेगा।

यदि मन को पवित्र बनाये बिना ही आपने मन की बातें वाणी में उगलना आरंभ कर दिया एवं उन्हें कार्यरूप में भी परिणत करने की कोशिश की तो हो सकता है कि लोग आपको मानसिक चिकित्सालय में प्रवेश दिलाने का प्रयत्न करने लगें।

वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति मन में आये खोटे भावों को रोकने का प्रयत्न करता ही है। वह चाहता है कि वाणी में खोटा भाव प्रकट ही न हो। पर कभी- कभी जब मन भर जाता है, वह भाव मन में समाता नहीं तो वाणी में फूट पड़ता है। एक बात यह भी है कि जब कोई भाव निरन्तर मन में बना रहता है तो फिर वह वाणी में फूटता ही है। मन सदा ही अपावन बना रहे तो आखिर हम उसे वाणी में आने से और जीवन में उतरने से कब तक रोकेंगे? उसको पूरी तरह रोकना संभव भी तो नहीं है।

जो जहाँ से आते हैं, वहाँ की बातें उनके मन में छाई रहती हैं; अतः वे सहज ही वहाँ की चर्चा करते हैं।

अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें


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स्रोत: Gyata संग्रह।

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