धर्म के दशलक्षण — जैन स्वाध्याय सामग्री | Dharm Ke Dashlakshan

धर्म के दशलक्षण

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

धर्म के दशलक्षण

लेखक :
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
शास्त्री, न्यायतीर्थ, साहित्यरत्न, एम.ए., पीएच.डी.
श्री टोडरमल स्मारक भवन, ए-4, बापू नगर, जयपुर - 302015

प्रकाशक :
रवीन्द्र पाटनी फैमिली चैरिटेबल ट्रस्ट
एवं
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-4, बापू नगर, जयपुर - 302015
फोन : 0141-2707458, 2705581 • फैक्स : 2704127
E-mail : [email protected]

हिन्दी

प्रथम तेरह संस्करण : 72 हजार
(अक्टूबर 1977 से अद्यतन)
चौदहवाँ संस्करण : 2 हजार
(15 अगस्त, 2007)
आत्मधर्म : 10 हजार
(सम्पादकीय के रूप में)
योग : 84 हजार

गुजराती :

प्रथम सात संस्करण : 20 हजार 900
(जुलाई 1979 से अगस्त 2007 तक)

मराठी :

प्रथम संस्करण : 3 हजार 100
(जनवरी, 1981)

कन्नड़ :

प्रथम संस्करण : 2 हजार 200
(जनवरी, 1981)

तमिल :

प्रथम संस्करण : 1 हजार 200
(जनवरी, 1981)

अंग्रेजी :

प्रथम तीन संस्करण : 6 हजार 400
(जनवरी, 1981 से अद्यतन)
योग : 1 लाख 17 हजार 800

मूल्य : सोलह रुपये

मुद्रक :
प्रिन्ट ओ लैण्ड
बाईस गोदाम, जयपुर

प्रकाशकीय

(चौदहवाँ संस्करण)

पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर द्वारा प्रकाशित डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल की लोकप्रिय कृति ‘धर्म के दश लक्षण’ का हिन्दी भाषा में चौदहवाँ संस्करण प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है।

दशलक्षण महापर्व ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जो परमोदात भावनाओं का प्रेरक, वीतरागता का पोषक तथा संयम व साधना का पर्व है। सम्पूर्ण भारतवर्ष का जैन समाज इसे प्रतिवर्ष बड़े ही उत्साह से मनाता है। दश दिन तक चलने वाले इस महापर्व के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें विद्वानों के उत्तमक्षमादि दशधर्मों पर व्याख्यान भी आयोजित किए जाते हैं। सब जगह सुयोग्य विद्वानों का पहुँचना संभव नहीं हो पाता; अतः जैसा गम्भीर व मार्मिक विवेचन उक्त धर्मों का होना चाहिए, वैसा सहज संभव नहीं हो पाता है।

पूज्य श्रीकानजीस्वामी द्वारा जो अध्यात्म की पावन धारा प्रवाहित हुई है, उसने जैनसमाज में एक आध्यात्मिक क्रान्ति पैदा कर दी है। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर लाखों लोग आत्महित की ओर मुड़े हैं। सैकड़ों आध्यात्मिक प्रवक्ता तैयार हुए हैं, जो प्रतिवर्ष इस अवसर पर प्रवचनार्थ बाहर जाते हैं।

इस पुस्तक के लेखक डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल भी उन गिने-चुने उच्चकोटि के विद्वानों में से एक हैं, जिन्हें पूज्य स्वामीजी से सन्मार्ग मिला है। दशलक्षण पर्व पर प्रतिवर्ष जहाँ भी जाते रहे हैं, वहाँ दशधर्मों पर उनके मार्मिक व्याख्यान होने पर आबाल-गोपाल सभी उनसे सीमातीत प्रभावित होते रहे हैं।

अनेक आग्रहों-अनुरोधों के बावजूद तथा उनका स्वयं का विचार होते हुए भी वे व्याख्यान निबद्ध न हो सके, पर सन् 1976 में डॉ. भारिल्लजी के कन्नूरों पर जब हिन्दी आत्मधर्म के सम्पादन का भार आया, तब वे व्याख्यान निबद्ध होकर सम्पादकीय के रूप में क्रमशः आत्मधर्म में प्रकाशित हुए। उक्त निबन्धों का निश्चय-व्यवहार की सन्धिपूर्वक मार्मिक विवेचन जब सुबोध, सतत तथा आकर्षक शैली में पाठकों तक पहुँचा तो वे झूम उठे। सामान्य पाठकों ने ही नहीं, पूज्य स्वामीजी ने भी उनकी पुस्तकण्ठ से भरपूर सराहना की। स्थान-स्थान से यह माँग आने लगी कि इन्हें शीघ्र ही अनेक भाषाओं में पुस्तकाकार प्रकाशित कर जन-जन तक पहुँचाया जाय, इनका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाय, जिससे डाक्टर साहब के चिन्तन का लाभ जन-जन को मिल सके।

सन् 1977 एवं 1978 में सोनगढ़ में डॉ. भारिल्लजी के ही निर्देशन में प्रवचनकार-प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये गये। इनमें प्रवचनकारों को इन

निबन्धों का अध्ययन कराया गया, जिससे शताधिक प्रवचनकारों के माध्यम से यह बात गाँव-गाँव में पहुँचने लगी।

आत्मधर्म के हिन्दी, मराठी, कन्नड़ और तमिल संस्करण के सम्पादकीय के रूप में 10 हजार प्रतियों में प्रकाशित होने के साथ-साथ इन निबन्धों को पुस्तकाकार रूप में हिन्दी में 72 हजार, गुजराती में 20 हजार 900, मराठी में 3 हजार 100, कन्नड़ में 2 हजार 200, तमिल में 1 हजार 200 तथा अंग्रेजी में 6 हजार 400 प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अब यह हिन्दी में चौदहवाँ संस्करण 2 हजार की संख्या में प्रकाशित होकर आपके हाथों में है। इस प्रकार 30 वर्ष के काल में इन निबन्धों की 10 हजार सम्पादकीय के रूप में तथा 1 लाख 17 हजार 800 प्रतियों का प्रकाशन पुस्तकाकाररूप में हुआ है जो लेखक की लोकप्रियता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अबतक उनके द्वारा लिखी गई 65 पुस्तकों के अनेकानेक संस्करण 40 लाख की संख्या में प्रकाशित होकर समाज में क्रान्ति की लहर पैदा कर चुके हैं। वे जैन समाज के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों में अग्रगण्य हैं।

आप मात्र लोकप्रिय लेखक ही नहीं प्रभावक वक्ता, एक सुयोग्य सम्पादक, कुशल अध्यापक एवं सफल नियोजक भी हैं। पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी की आप पर असीम कृपा रही है। वे बारम्बार कहा करते थे-

“पण्डित हुकमचन्द तत्त्वप्रचार के क्षेत्र में एक हीरा है, वर्तमान में हो रहे तत्त्वप्रचार में उसका बड़ा हाथ है।”

सच बात तो यह है कि पूज्य गुरुदेवश्री के प्रताप से ऐसे अनेक हीरे उत्पन्न हो गये हैं, जो अपने आत्मकल्याण की दृष्टि से तत्त्वप्रचार के कार्यों में बिना किसी अपेक्षा के संलग्न हैं। अध्यात्मजगत को जो अनेक सेवाएँ डॉ. भारिल्ल की प्राप्त हो रही हैं, उनका संक्षिप्त विवरण इसप्रकार है -

दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़ के मुखपत्र आत्मधर्म के हिन्दी, मराठी, कन्नड़ और तमिल - इन चार संस्करणों का सम्पादन तो पूर्व में आपके द्वारा हुआ ही है, किन्तु आत्मधर्म का प्रकाशन किन्हीं कारणों से अवरुद्ध हो जाने के कारण, उसी के स्थान पर पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘वीतराग-विज्ञान’ हिन्दी एवं मराठी के अब आप सम्पादक हैं।

नए विद्वान तैयार करने के लिए आपने भागीरथ प्रयत्न कर महाविद्यालय स्थापित करने की अनुकरणीय योजना का सूत्रपात किया है। योजनानुसार वर्तमान में श्री कुन्दकुन्द कहान दि. जैन सुरक्षा ट्रस्ट, मुम्बई द्वारा संचालित श्री टोडरमल दि. जैन सि. महाविद्यालय में श्री रवीन्द्र पाटनी फैमिली चैरिटेबल ट्रस्ट, मुम्बई, श्री वीतराग-विज्ञान स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, अजमेर, पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट, देलालाली, राजमल कल्याणमल

भूमिका

पट्टनी सिद्ध चेतना ट्रस्ट, कोलकाता, मुमुक्षु मण्डल, कोलकाता, श्रीमान् भूतमलजी भण्डारी, बैंगलोर, अभिनन्दनप्रसादजी सहारनपुर आदि अनेक संस्थाओं एवं दानदाताओं के सहयोग से सम्पूर्ण देश से आवे विभिन्न भाषा-भाषी 160 छात्र श्री टोडरमल स्मारक भवन, जयपुर में स्थापित उक्त विद्यालय के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इनके माध्यम से अभी तक 419 जैनदर्शन शास्त्री विद्वान समाज को प्राप्त हो चुके हैं।
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट द्वारा संचालित वीतराग-विज्ञान विद्यापीठ परीक्षा बोर्ड, जिसमें प्रतिवर्ष लगभग बीस हजार छात्र-छात्राएं धार्मिक परीक्षा देते हैं, डॉ. साहब ही चला रहे हैं। उसकी पाठ्यपुस्तकें नवीन शैली में प्रायः आपने ही तैयार की हैं। उन्हें पढ़ाने की शैली में प्रशिक्षित करने के लिए ग्रीष्मकालीन अवकाश में प्रतिवर्ष प्रशिक्षण-शिविर भी डॉक्टर साहब के निर्देशन में आयोजित किये जाते हैं, जिनमें वे स्वयं अध्यापकों को प्रशिक्षित करते हैं।
अब तक 41 शिविरों में 7992 अध्यापक प्रशिक्षित हो चुके हैं। तत्संबंधी ‘प्रशिक्षण निर्देशिका’ भी आपने लिखी है।
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट में धार्मिक साहित्य का बिक्री विभाग भी चलता है, जिसकी बिक्री अब 24 लाख रुपये प्रतिवर्ष पहुँच गई है।
भारतवर्षीय वीतराग-विज्ञान पाठशाला समिति के भी आप मंत्री हैं। इस पाठशाला समिति के प्रयत्नों से देश में 328 वीतराग-विज्ञान पाठशालाएँ चल रही हैं, जिनमें हजारों छात्र धार्मिक शिक्षा प्राप्त करते हैं।
इनके अतिरिक्त निरन्तर होनेवाले आपके प्रभावशाली प्रवचनों से जयपुर ही नहीं, सम्पूर्ण भारतवर्ष लाभ उठाता है, जिससे तत्त्वप्रचार को अभूतपूर्व गति मिलती है। हर्ष की बात है कि 27 जून, 1984 से 1 अगस्त, 1984 तक पहली बार आपने अमेरिका और यूरोप के प्रमुख नगरों का दौरा किया। वहाँ आपके प्रवचनों से लोग इतने प्रभावित हुए कि तभी से प्रतिवर्ष आपका कार्यक्रम निर्धारित किया जाने लगा। इस प्रकार अब तक 25 बार अमेरिका, इंग्लैण्ड एवं जापान, हांगकांग, कनाडा, जर्मनी, बेल्जियम, स्विटजरलैण्ड, दुबई, आबूधबी, सरजाह, केनिया में जैनधर्म का डंका बज चुका है। आपके कार्यक्रमों से वहाँ अभूतपूर्व धर्मप्रभावना हो रही है।
पूज्य गुरुदेवश्री के पुण्य-प्रताप से चलनेवाली अन्य गतिविधियों में भी आपका बौद्धिक सहयोग निरन्तर प्राप्त होता रहता है।
साधारण जनता के साथ-साथ विद्वद् समाज ने भी इस कृति को दिल खोलकर सराहा है। समाजमान्य विद्वानों की कुछ सम्मतियाँ पुस्तक के अन्त में दी गई हैं।
पूज्य गुरुदेव श्रीकानजी स्वामी ने जब इसे आद्योपान्त पढ़ा तो वे इतने गद्गद् हो गये कि लगातार दो माह तक इस कृति की प्रशंसा करते रहे, लोगों को इसके अध्ययन की प्रेरणा देते रहे। इस कृति के सन्दर्भ में कहे गये उनके कतिपय वाक्य इस प्रकार हैं-
“गजब किया है, लिखने व कहने की पद्धति गजब है। 44 वर्ष की छोटी उम्र पर गजब लिखा है। त्यागधर्म और संयमधर्म की व्याख्या में तो गजब किया है। दान व त्याग में क्या अन्तर है - इसका विस्तृत खुलासा किया है। इतना सुन्दर लिखा है कि पढ़ते हुए पुस्तक छोड़ने का मन ही नहीं होता। इसकी गहराई की खबर तो उसे पड़ेगी, जो बचने का निश्चय भी करेगा, बस यों ही बांधे जाने से कुछ हाथ नहीं लगेगा।
हुकमचन्दजी का क्षयोपशम बहुत है और शैली ऐसी है कि बात पढ़ने वाले के गले उतर जाती है। गम्भीर प्रश्नों के अत्यन्त सरल भाषा में उत्तर दिये हैं। जैसा स्पष्टीकरण पण्डितजी ने किया है, वैसा तो मैं भी नहीं कर सकता हूँ। पण्डित आत्मारामजीलाल ने जो यह लिखा है कि हुकमचन्दजी को सरस्वती का वरदान प्राप्त है, वह एकदम सही है।”
जिस कृति के बारे में गुरुदेवश्री इस प्रकार के विचार व्यक्त करते हों, उसके बारे में हम विशेष क्या कहें?
दशलक्षण महापर्व एक ऐसा अवसर है, जब सारे देश में आध्यात्मिक वातावरण बन जाता है। इस अवसर पर प्रवचनार्थी विद्वानों की माँग बढ़ जाती है। पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट के पास ही इस वर्ष 540 स्थानों से माँग थी, पर हम 526 स्थानों पर ही विद्वान भेज सके हैं। जहाँ विद्वान नहीं पहुँच पाये, वहाँ की समाज के लिए यह पुस्तक अत्यन्त उपयोगी है। एक भाई इसका वाचन करे और सब शान्ति से सुनें तो वही आनन्द आवेगा, जो एक विद्वान के प्रवचन सुनने से आता है। यह लिखते हुए हमें प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि अनेक स्थानों पर इसप्रकार के प्रयोग हुए हैं, जो पूर्णतः सफल रहे हैं।
उक्त दशधर्मों पर डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल के प्रवचनों के ऑडियो और वीडियो कैसेट भी उपलब्ध हैं; जो प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में बिकते हैं। पर्यूषण पर्व के अवसर पर वीडियो कैसेट स्थान-स्थान पर केबल टी.वी. पर भी प्रसारित होते हैं। इस संस्कार की कीमत कम करने हेतु अनेक महानुभावों ने आर्थिक सहयोग प्रदान किया है; सभी सहयोगियों का मैं हृदय से आभारी हूँ।
इस कृति से अधिक से अधिक लोग लाभ उठावें - इस पावन भावना के साथ विराम लेता हूँ।

रजेन्द्रकुमार पट्टनी
अध्यक्ष
रवीन्द्र पट्टनी फैमिली चैरिटेबल ट्रस्ट,
मुम्बई

ब्र. यशपाल जैन, एम.ए.
प्रकाशन मंत्री
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
जयपुर

दशधर्म-वन्दना

मंगलाचरण

जो क्रोध-मद-माया अपावन, लोभरूप विभाव हैं।
उनके अभाव स्वभावमय, उत्तमक्षमादि स्वभाव हैं।।
है सत्य शाश्वत ज्ञानमय, निजधर्म शेष अधर्म हैं।।
निज आत्मा में रमण संयम, रमण ही तप-त्याग है।
निज रमण आकिंचन्य है, निज रमण परिग्रह-त्याग है।।
निज रमणता ब्रह्मचर्य है, निज रमणता ‘दशधर्म’ है।
निज जानना पहचानना, रमना धर्म का मर्म है।।
अरहन्त हैं दशधर्म धारक, धर्म धारक सिद्ध हैं।
आचार्य हैं, उपाध्याय हैं, मुनिराज सर्व प्रसिद्ध हैं।।
जो आत्मा को जानते, पहचानते करते रमण।
वे धर्म-धारक, धर्म-धन हैं, उन्हें हम करते नमन।।

विषय-सूची

१. दशलक्षण महापर्व १
२. उत्तमक्षमा १०
३. उत्तममार्दव २४
४. उत्तमआर्जव ४०
५. उत्तमशौच ५२
६. उत्तमसत्य ७०
७. उत्तमसंयम ८३
८. उत्तमत्तप ९७
९. उत्तमत्याग ११६
१०. उत्तमआकिंचन्य १३५
११. उत्तमब्रह्मचर्य १५५
१२. क्षमावाणी १७२
१३. सम्मतियाँ १८६

दशलक्षण महापर्व

पर्वों की चर्चा जब भी चलती है, तब-तब उनका संबंध प्रायः खाने-पीने और खेलने से जोड़ा जाता है, जैसे - रक्षाबंधन के दिन खीर और लड्डू खाए जाते हैं, भोरें खले जाते हैं, राखी बाँधी जाती है; होली के दिन अमूक पकवान खाये जाते हैं, रंग डाला जाता है, होली जलाई जाती है; दीपावली के दिन पटाखे चलाये जाते हैं; आदि-आदि।

पर अष्टाव्हिका और दशलक्षण जैसे जैनपर्वों का संबंध खाने और खेलने से न होकर खाना और खेलना त्यागने से है। ये भोग के नहीं, त्याग के पर्व हैं; इसीलिए महापर्व हैं। इनका महत्त्व त्याग के कारण है, आमोद-प्रमोद के कारण नहीं।

आप किसी भी जैन से पूछिये कि दशलक्षण महापर्व कैसे मनाया जाता है तो वह यही उत्तर देगा कि इन दिनों लोग संयम से रहते हैं, पूजन-पाठ करते हैं, व्रत-नियम-उपवास रखते हैं, हरित पदार्थों का सेवन नहीं करते। स्वाध्याय और तत्त्व-चर्चा में ही अधिकांश समय बिताते हैं। सर्वत्र बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा शास्त्र सभाएँ होती हैं, उनमें उत्तमक्षमादि दशधर्मों का स्वरूप समझाया जाता है। सभी लोग कुछ न कुछ विरक्ति धारण करते हैं, दान देते हैं आदि अनेक प्रकार के धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। सर्वत्र एक प्रकार से धार्मिक वातावरण बन जाता है।

पर्व दो प्रकार के होते हैं - (१) शाश्वत और (२) सामयिक, जिन्हें हम त्रैकालिक और तात्कालिक भी कह सकते हैं।

तात्कालिक पर्व भी दो प्रकार के होते हैं - (१) व्यक्ति विशेष से संबंधित और (२) घटना विशेष से संबंधित।

धर्म के दशलक्षण

दीपावली, महावीर जयन्ती, रामनवमी, जन्माष्टमी आदि पर्व व्यक्ति विशेष से संबंध रखने वाले पर्व हैं, क्योंकि दीपावली और महावीर जयन्ती क्रमशः महावीर के निर्वाण और जन्म से संबंध रखती हैं और रामनवमी और जन्माष्टमी राम और कृष्ण के जन्म से संबंधित हैं।

घटना विशेष से संबंधित पर्वों में रक्षाबंधन, अक्षयतृतीया, होली आदि पर्व आते हैं, क्योंकि ये प्रसिद्ध पौराणिक घटनाओं से संबंध रखने वाले पर्व हैं। ऐतिहासिक घटनाओं से संबंधित आज के राष्ट्रीय पर्व - स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस कहे जा सकते हैं।

त्रैकालिक अर्थात् शाश्वत पर्व न तो किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित होते हैं, और न घटना विशेष से; वे तो आध्यात्मिक भावों से संबंधित होते हैं। दशलक्षण महापर्व एक ऐसा ही त्रैकालिक शाश्वत पर्व है, जो आत्मा के क्रोधादि विकारों के अभाव के फलस्वरूप प्रकट होने वाले उत्तमक्षमादि भावों से संबंध रखता है।

घटनाओं और व्यक्ति विशेष से संबंधित पर्व निश्चित रूप से अनादि नहीं हो सकते; क्योंकि वे संबंधित घटना या व्यक्ति से पूर्व संभव नहीं हैं। वे अनन्त भी नहीं हो सकते; क्योंकि जब भविष्य में कोई इनसे भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति उत्पन्न हो जायेगा या घटना घट जायेगी तो जगत् उसे याद रखने लगेगा, उससे संबंधित पर्व मनाने लगेगा, इन्हें भूल जायेगा। अगले तीर्थंकर उत्पन्न होने पर भविष्य में उनकी जयन्ती और निर्वाण-दिवस मनाया जायेगा, इनका इतिहासप्रकार हम भूतकाल की चौबीसी को भूल से बैठे हैं, उसीप्रकार भविष्य इन्हें भी याद नहीं रख पावेगा।

घटनाएँ और व्यक्ति कितने ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों, वे सार्वभौम और सार्वकालिक नहीं हो सकते। उन सबकी अपने-अपने क्षेत्र और काल संबंधी सीमाएँ हैं, वे असीम नहीं हो सकते। अतः वे ही पर्व सार्वभौम और सार्वकालिक हो सकते हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष या घटना विशेष से संबंधित न होकर सभी जीवों से, उनके भावों से, समानरूप से संबंधित हों। दशलक्षण महापर्व एक ऐसा ही महान पर्व है जो सब जीवों के भावों से

दशलक्षण महापर्व

समानरूप से संबंधित है। यही कारण है कि वह शाश्वत है, सबका है, और सदा रहेगा। उसकी उपयोगिता सार्वभौमिक और सार्वकालिक है।

दशलक्षण महापर्व सम्प्रदायविशेष का नहीं, सबका है। भले ही उसे मात्र सम्प्रदायविशेष के लोग ही क्यों न मनाते हों, पर वह सम्प्रदायिक पर्व नहीं है; क्योंकि वह सम्प्रदायिक भावनाओं पर आधारित पर्व नहीं है, उसका आधार सार्वजनिक है। विकारी भावों का परित्याग एवं उदात्तभावों का ग्रहण ही उसका आधार है, जो सभी को समानरूप से हितकारी है। अतः यह पर्व मात्र जैनों का नहीं, जन-जन का पर्व है। इसे सम्प्रदायविशेष का पर्व मानना स्वयं सम्प्रदायिक दृष्टिकोण है।

यह सब का पर्व है, इसका एक कारण यह भी है कि सभी प्राणी सुखी होना चाहते हैं और दुःख से डरते हैं। क्रोधादि भाव दुःख के कारण हैं और स्वयं दुःखस्वरूप हैं एवं उत्तमक्षमादि भाव सुख के कारण हैं और स्वयं सुखस्वरूप हैं। अतः दुःख से डरने वाले सभी सुखार्थी जीवों को क्रोधादि के त्यागूप उत्तमक्षमादि दशधर्म परम आराध्य हैं।

इसीप्रकार सभी को सुखकर और सन्मार्गदर्शक होने से यह दशलक्षण महापर्व सभी का पर्व है।

क्रोधादि विभावभावों के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि दशधर्मों का विकास ही जिसका मूल है, ऐसे दशलक्षण महापर्व की सार्वभौमिकता का आधार यह है कि सर्वत्र ही क्रोधादि को बुरा, अहितकारी और क्षमादि भावों को भला और हितकारी माना जाता है। ऐसा कौनसा क्षेत्र है, जहाँ क्रोधादि को बुरा और क्षमादि को अच्छा न माना जाता हो?

वह सार्वकालिक भी इसी कारण है; क्योंकि कोई काल ऐसा नहीं कि जब क्रोधादि को हेय और उत्तमक्षमादि को उपादेय न माना जाता रहा हो, न माना जाता हो और न माना जाता रहेगा। अर्थात् सर्वकालों में इसकी उपादेयता असंदिग्ध है। भूतकाल में भी क्रोधादि से दुःख व अशान्ति तथा क्षमादि से सुख व शान्ति की प्राप्ति होती देखी गई है, वर्तमान में भी देखी जाती है और भविष्य में भी देखी जायेगी।

उत्तमक्षमादि धर्मों की सार्वभौमिक त्रैकालिक उपयोगिता एवं सुखकरता के कारण ही दशलक्षण महापर्व शाश्वत पर्वों में गिना जाता है और इसी कारण यह महापर्व है।

यहाँ एक प्रश्न संभव है कि यह महापर्व त्रैकालिक है, अनादि-अनन्त है, तो फिर इसके आरंभ होने की कथा क्यों कही जाती है? कहा जाता है कि कालचक्र के परिवर्तन में कुछ स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आते हैं, जिन्हें जैन परिभाषा में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी के नाम से जाना जाता है। अवसर्पिणी में क्रमशः ह्रास और उत्सर्पिणी में क्रमशः विकास होता है। प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी में छह-छह काल होते हैं।

प्रत्येक अवसर्पिणी काल के अन्त में पंचम काल समाप्त और छठा काल आरंभ होता है, तब लोग अनार्यवृत्ति धारण कर हिंसक हो जाते हैं। उसके बाद उत्सर्पिणी आरंभ होती है और धर्मोत्थान का काल पकता है, तब श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से सात सप्ताह (४९ दिन) तक विभिन्न प्रकार की बरसात होती है, जिसके माध्यम से सुकाल पकता है और लोगों में पुनः अहिंसक आर्यवृत्ति का उदय होता है; एकप्रकार से धर्म का उदय होता है, आरंभ होता है और उस वातावरण में दश दिन तक उत्तमक्षमादि दशधर्मों की विशेष आराधना की जाती है तथा इसी आधार पर हर उत्सर्पिणी में यह महापर्व चल पड़ता है।

यह कथा तो मात्र यह बताती है कि प्रत्येक उत्सर्पिणी काल में इस पर्व का पुनरारम्भ कैसे होता है। इस कथा से दशलक्षण महापर्व की अनादि-अनन्तता पर कोई आँच नहीं आती।

यह कथा भी तो शाश्वत कथा है, जो अनेक बार दुहराई गई है और दुहराई जायगी; क्योंकि अवसर्पिणी के पंचमकाल के अन्त में जब-जब लोग इन उत्तमक्षमादि धर्मों से अलग हो जायेंगे और उत्सर्पिणी के प्रारंभ काल में जब-जब इसकी पुनरावृत्ति होगी, तब-तब उस युग में दशलक्षण महापर्व का इस तरह आरंभ होगा। वस्तुतः यह युगारंभ की चर्चा है, पर्वोंरंभ की

नहीं। यह अनादि से अनेक युगों तक इसीप्रकार आरंभ हो चुका है और भविष्य में भी होता रहेगा।

इसकी अनादि-अनन्तता शास्त्र-सम्मत तो है ही, युक्तिसंगत भी है; क्योंकि जब से यह जीव है तभी से यद्यपि क्षमादिस्वभावी है, तथापि प्रकटरूप (पर्याय) में क्रोधादि विकारों से युक्त भी तभी से है। इसीकारण ज्ञानानन्दस्वभावी होकर भी अज्ञानी और दुःखी है। जब से यह दुःखी है; सुख की आवश्यकता भी तभी से है। चूँकि सभी जीव अनादि से हैं, अतः सुख के कारण उत्तमक्षमादि धर्मों की आवश्यकता भी अनादि से ही रही है। इसीप्रकार यद्यपि अनन्त आत्माएँ क्षमादिस्वभावी आत्मा का आश्रय लेकर क्रोधादि से मुक्त हो चुकी हैं, तथापि उनसे भी अनन्तगुणी आत्माएँ अभी भी क्रोधादि विकारों से युक्त हैं, दुःखी हैं; अतः आज भी इन धर्मों की आराधना की पूरी-पूरी आवश्यकता है तथा सुदूरवर्ती भविष्य में भी क्रोधादि विकारों से युक्त दुःखी आत्माएँ रहने वाली हैं; अतः भविष्य में भी इनकी उपयोगिता असंदिग्ध है।

तीनलोक में सर्वत्र ही क्रोधादि दुःख के और क्षमादि सुख के कारण हैं। यही कारण है कि यह महापर्व शाश्वत अर्थात् त्रैकालिक और सार्वभौमिक है, सबका है। भले ही सब इसकी आराधना न करें, पर यह अपनी प्रकृति के कारण सबका है, सबका था और सबका रहेगा।

यद्यपि अष्टादश महापर्व के समान यह भी वर्ष में तीन बार आता है - (१) भादो सुदी ५ से १४ तक, (२) माघ सुदी ५ से १४ तक व (३) चैत्र सुदी ५ से १४ तक; तथापि सारे देश में विशालरूप में बड़े उत्साह के साथ मात्र भादो सुदी ५ से १४ तक, ही मनाया जाता है। बाकी दो को तो बहुत से जैन लोग भी जानते तक नहीं हैं। प्राचीन काल में बरसात के दिनों में आवागमन की सुविधाओं के पर्याप्त न होने से व्यापारारादि कार्य सहज ही कम हो जाते थे। तथा जीवों की उत्पत्ति भी बरसात में बहुत होती है। अहिंसक समाज होने से जैनियों का साधुगण तो चार माह तक गाँव से गाँव भ्रमण बंद कर एक स्थान पर ही रहते हैं, श्रावक भी बहुत कम भ्रमण करते

धर्म के दशलक्षण

थे। अतः सहज ही सत्समागम एवं समय की सहज उपलब्धि ही विशेष कारण प्रतीत होते हैं-भादों में ही इसके विशाल पैमाने पर मनाये जाने के।

वैसे तो प्रत्येक धार्मिक पर्व का प्रयोजन आत्मा में वीतरागभाव की वृद्धि करने का ही होता है, किन्तु इस पर्व का संबंध विशेष रूप से आत्म-गुणों की आराधना से है। अतः यह वीतरागी पर्व संयम और साधना का पर्व है।

पर्व अर्थात् मंगल काल, पवित्र अवसर। वास्तव में तो अपने आत्म-स्वभाव की प्रतीतिपूर्वक वीतरागी दशा का प्रगट होना ही यथार्थ पर्व है; क्योंकि वही आत्मा को मंगलकारी है और पवित्र अवसर है।

धर्म तो आत्मा में प्रकट होता है, तिथि में नहीं; किन्तु जिस तिथि में आत्मा में क्षमादिरूप वीतरागी शान्ति प्रकट हो, वही तिथि पर्व कही जाने लगती है। धर्म का आधार तिथि नहीं, आत्मा है।

आत्मस्वरूप की प्रतीतिपूर्वक चारित्र (धर्म) की दश प्रकार से आराधना करना ही दशलक्षण धर्म है। आत्मा में दश प्रकार के सद्भावों (गुणों) के विकास से संबंधित होने से ही इसे दशलक्षण महापर्व कहा जाता है।

अनादिकाल से ही प्रत्येक आत्मा, आत्मा में ही उत्पन्न, आत्मा के ही विकार-क्रोध, मान, माया, लोभ, असत्य, असंयम आदि के कारण ही दुःखी और अशान्त रहता आया है। अशान्ति और दुःख मेटने का एकमात्र उपाय आत्माराधना है। आत्म-स्वभाव को जानकर, मानकर, उसी में जम जाने से, उसी में समा जाने से, अतीन्द्रिय आनन्द और सच्ची शान्ति की प्राप्ति होती है। ऐसे ही आत्माराधक व्यक्ति के हृदय में उत्तमक्षमादि गुणों का सहज विकास होता है। अतः यह स्पष्ट है कि उक्त पर्व का संबंध आत्माराधना से है, प्रकारान्तर से उत्तमक्षमादि दश गुणों की आराधना से है।

क्षमादि दश गुणों को दशधर्म भी कहते हैं। ये दशधर्म हैं-(१) उत्तमक्षमा (२) उत्तममार्दव (३) उत्तमआर्जव (४) उत्तमशौच (५) उत्तमसत्य (६) उत्तमसंयम (७) उत्तमतप (८) उत्तमत्याग (९) उत्तमआकिंचन्य, और (१०) उत्तमब्रह्मचर्य।

दशलक्षण महापर्व

ये दश धर्म नहीं, धर्म के दशलक्षण हैं; जिन्हें संक्षेप में दशधर्म शब्द से भी अभिहित कर दिया जाता है। जिस आत्मा में आत्म-रुचि, आत्म-ज्ञान और आत्म-लीनतारूप धर्म पर्याय प्रगट होती है, उसमें धर्म के ये दश लक्षण सहज प्रगट हो जाते हैं। ये आत्माराधन के फलस्वरूप प्रगट होने वाले धर्म हैं, लक्षण हैं, चिह्न हैं।

यद्यपि उक्त दशधर्म चारित्रगुण की निर्मल पर्यायें हैं, तथापि प्रत्येक के साथ लगा हुआ ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की अनिवार्य सत्ता को सूचित करता है। तात्पर्य यह है कि ये चारित्र गुण की निर्मल दशाएँ सम्यग्दृष्टि ज्ञानी आत्मा को ही प्रगट होती हैं, अज्ञानी मिथ्यादृष्टि को नहीं।

वस्तुतः चारित्र ही साक्षात् धर्म है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान तो चारित्ररूप वृक्ष की जड़ें (मूल) हैं। जैसे वृक्ष जड़ के बिना खड़ा नहीं रह सकता, पनप नहीं सकता, अथवा जड़ के बिना जैसे वृक्ष की एक प्रकार से सत्ता ही संभव नहीं है; उसीप्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानरूपी जड़ के बिना सम्यक्चारित्ररूपी वृक्ष खड़ा ही नहीं रह सकता, पनप नहीं सकता, अथवा इन दोनों के बिना सम्यक्चारित्र की सत्ता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

यद्यपि लोक में बहुत से लोग आत्म-श्रद्धान और आत्म-ज्ञान के बिना भी बंधन के भय एवं स्वर्ग-मोक्ष तथा मान-प्रतिष्ठा आदि के लोभ से क्रोधादि कम करते या नहीं करते-से देखे जाते हैं, तथापि वे उत्तमक्षमादि दशधर्मों के धारक नहीं माने जा सकते हैं।

इस संबंध में महापंडित टोडरमलजी के विचार द्रष्टव्य हैं-
“तथा बंधादिक के भय से अथवा स्वर्ग-मोक्ष की इच्छा से क्रोधादि नहीं करते, परन्तु वहाँ क्रोधादि करने का अभिप्राय तो मिटा नहीं है। जैसे - कोई राजादिक के भय से अथवा महंतपने के लोभ से परस्त्री का सेवन नहीं करता, तो उसे त्यागी नहीं कहते। वैसे ही यह क्रोधादिक का त्यागी नहीं है।

धर्म के दशलक्षण

तो कैसे त्यागी होता है? पदार्थ अनिष्ट-इष्ट भासित होने से क्रोधादिक होते हैं; जब तत्वज्ञान के अभ्यास से कोई इष्ट-अनिष्ट भासित न हो, तब स्वयमेव ही क्रोधादि उत्पन्न नहीं होते; तब सच्चा धर्म होता है।"

इसप्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक क्रोधादि का नहीं होना ही उत्तमक्षमादि धर्म है।

यद्यपि उक्त दशधर्मों का वर्णन शास्त्रों में जहाँ-तहाँ मुनिधर्म की अपेक्षा गया है, तथापि ये धर्म मात्र मुनियों को धारण करने के लिए नहीं हैं; गृहस्थों को भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार इनको अवश्य धारण करना चाहिए। धारण क्या करना चाहिए, वस्तुतः बात तो ऐसी है कि ज्ञानी गृहस्थ के भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार ये होते ही हैं, इनका पालन सहज पाया जाता है।

तत्त्वार्थसूत्र में गुप्ति, समिति, अनुप्रेक्षा (बारह भावना) और परीषहजय के साथ ही उत्तमक्षमादि दशधर्मों को चर्चा की गई है। ये सब मुनिधर्म से संबंधित विषय हैं। यही कारण है कि जहाँ-जहाँ इनका वर्णन मिलता है, वहाँ-वहाँ उत्कृष्टरूप का ही वर्णन मिलता है। इससे आतंकित होकर सामान्य श्रावकों द्वारा इनकी उपेक्षा संगत नहीं है।

यदि 'मुनियों को अनन्तानुबंधी आदि तीन कषायों के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि धर्म होंगे तो पंचम गुणस्थानवर्ती ज्ञानी श्रावकों के अनन्तानुबंधी आदि दो कषायों के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि धर्म होंगे। इसीप्रकार चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत सम्यग्दृष्टि के एकमात्र अनन्तानुबंधी कषाय के अभावस्वरूप उत्तमक्षमादि धर्म प्रगट होंगे। मिथ्यादृष्टि के उत्तमक्षमादि धर्म नहीं होते। उसकी कषायें कितनी भी मंद क्यों न हों, उसके उक्त धर्म प्रगट नहीं हो सकते; क्योंकि उक्त धर्म कषाय के अभाव से प्रगट होने वाली पर्यायें हैं, कषाय की मंदता से नहीं। मंदता से जो तारतम्यरूप भेद पड़ते

१. मोक्षमार्गप्रकाशक, पृष्ठ २२६
२. स गुप्तिसमितिसम्यग्प्रेक्षापरिषहजयचारित्रैः (अ. ९ सूत्र २)

दश लक्षण महापर्व

हैं, उन्हें शास्त्रों में लेश्या संज्ञा दी है, धर्म नहीं। धर्म तो मिथ्यात्व और कषाय के अभाव का नाम है, मंदता का नहीं।
इन धर्मों की व्याख्या अनेक पहलुओं (दृष्टिकोणों) से संभव है। जैसे - मुनियों और श्रावकों की अपेक्षा, निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा, अन्तर और बाह्य की अपेक्षा आदि।
इनमें से प्रत्येक धर्म स्वतंत्ररूप से विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखता है। आगे प्रत्येक पर विस्तृत विश्लेषण किया ही जा रहा है।
अतः अब यहाँ इस पवित्र भावना के साथ विराम लेता हूँ कि इस दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर सभी आत्माएँ धर्म के उक्त दश लक्षणों को अच्छी तरह जानकर, पहचानकर, तद्रूप परिणमन कर परमसुखी हों।

अपनी ओर देख ! एक बार इसी जिज्ञासा से अपनी ओर देख !! जानने लायक, देखने लायक एकमात्र आत्मा ही है, अपना आत्मा ही है। यह आत्मा शब्दों में नहीं समझाया जा सकता, इसे वाणी से नहीं बताया जा सकता। यह शब्दजाल और वाक्‌विलास से परे है। यह मात्र जानने की वस्तु है, अनुभवगम्य है। यह अनुभवगम्य आत्मवस्तु ज्ञान का घनपिण्ड और आनन्द का कन्द है। अतः समस्त परपदार्थों, उनके भावों एवं अपनी आत्मा में उठने वाले विकारी-अविकारी भावों से भी दृष्टि हटाकर एक बार अन्तर में झाँक ! अन्तर में देख, अन्तर में ही देख। देख!!! देख!!!

  • तीर्थंकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, पृष्ठ ७६

उत्तमक्षमा

क्षमा आत्मा आत्मा का स्वभाव है। क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध के अभावरूप शान्ति-स्वरूप पर्याय प्रकट होती है, उसे भी क्षमा कहते हैं। यद्यपि आत्मा क्षमास्वभावी है, तथापि अनादि से आत्मा में क्षमा के अभावरूप क्रोध पर्याय ही प्रकटरूप से विद्यमान है।
जब-जब उत्तमक्षमादि धर्मों की चर्चा चलती है, तब-तब उनका स्वरूप अभावरूप ही बताया जाता है। कहा जाता है - क्रोध का अभाव क्षमा है, मान का अभाव मार्दव है, माया का अभाव आर्जव है - आदि।
क्या धर्म अभावरूप (Negative) है? क्या उसका कोई भावात्मक (Positive) रूप नहीं है? यदि है, तो क्यों नहीं उसे भावात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता?
क्रोध नहीं करना, मान नहीं करना, छल-कपट नहीं करना, हिंसा नहीं करना, चोरी नहीं करना, आदि न जाने कितने निषेध समा गये हैं धर्म में। धर्म क्या मात्र निषेधों का नाम है? क्या उसका कोई विधेयात्मक पक्ष नहीं? यदि धर्म में पर से निवृत्ति की बात है तो साथ में स्व में प्रवृत्ति की भी चर्चा कम नहीं है।
यह नहीं करना, वह नहीं करना, प्रतिबंधों की भाषा है। बंधन से छूटने का अभिलाषी मोक्षार्थी जब धर्म के नाम पर भी बंधनों की लम्बी सूची सुनता है तो घबड़ा जाता है। वह सोचता है कि यहाँ आया था बंधन से छूटने का मार्ग खोजने के लिए और यहाँ तो अनेक प्रतिबंधों में बांधा जा रहा है। धर्म तो स्वतंत्रता का नाम है। जिसमें अनन्त बंधन हों, वह धर्म कैसा?
तो क्या धर्म प्रतिबंधों का नाम है, अभावरूप है?

उत्तमक्षमा

नहीं, धर्म तो वस्तु के स्वभाव को कहते हैं, अतः वह सद्भावरूप ही होता है, अभावरूप नहीं। पर क्या करें, हमारी भाषा उल्टी हो गई है। क्रोध का अभाव क्षमा है, मान का अभाव मार्दव है - के स्थान पर हम ऐसा क्यों नहीं कहते कि क्षमा का अभाव क्रोध है, मार्दव का अभाव मान है, आर्जव का अभाव मायाचार है, आदि।
जरा विचारिए - ज्ञान का अभाव अज्ञान है या अज्ञान का अभाव ज्ञान ? ‘ज्ञान’ मूल शब्द है, उसमें निषेधवाचक ‘अ’ लगाकर ‘अज्ञान’ शब्द बना है, अतः स्वतः सिद्ध है कि ज्ञान का अभाव अज्ञान है।
वस्तु का स्वभाव तो धर्म होता ही है, साथ ही स्वभाव के अनुरूप पर्याय को अर्थात् स्वभावपर्याय को भी धर्म कहा जाता है। सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वभावपर्याय होने से ही धर्म है। विभाव (विभावपर्याय) को अधर्म कहते हैं।
ज्ञान आत्मवस्तु का स्वभाव है, अतः धर्म है। सम्यग्ज्ञानपर्याय को भी ज्ञान कहते हैं, अतः सम्यग्ज्ञान भी धर्म है। अज्ञान (मिथ्याज्ञानपर्याय) आत्मा का विभाव है, अतः वह अधर्म है। इसीप्रकार क्षमा आत्मा का स्वभाव है, अतः वह तो धर्म ही है; साथ ही क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से उत्पन्न होनेवाली क्षमाभावरूप स्वभावपर्याय भी धर्म है, किन्तु क्षमास्वभावी आत्मा जब क्षमास्वभावरूप परिणमन न करके विभावरूप परिणमन करता है, तो उसके उस विभाव परिणमन को क्रोध कहा जाता है।
क्रोध आत्मा का एक विभाव है और वह क्षमा के अभावरूप प्रकट हुआ है। यद्यपि वह संतति की अपेक्षा से अनादि का है, तथापि प्रतिसमय नया-नया उत्पन्न होता है। अतः सत्य तो यह है कि क्षमा का अभाव क्रोध है, पर कहा यह जाता है कि क्रोध का अभाव क्षमा है। इसका कारण यह है कि अनादि से यह आत्मा कभी भी क्षमादि स्वभावरूप परिणमित नहीं हुआ, क्रोधादि विकाररूप ही परिणमित हुआ है; और जब भी क्षमादि स्वभावरूप परिणमित होता है तो क्रोधादि का अभाव हो जाता है। अतः क्रोधादि के अभावरूपक क्षमादि परिणमन देखकर उक्त कथन किया जाता है।

धर्म के दशलक्षण

१२

यदि ज्ञान के समान ही इसका प्रयोग अपेक्षित हो तो वह इसप्रकार किया जा सकता है – ज्ञान का अभाव अज्ञान, क्षमा का अभाव अक्षमा (क्रोध), मार्दव का अभाव अमार्दव (मान), आर्जव का अभाव अनार्जव (मायाचार- छल कपट) आदि।

जब कोई यह नहीं कहता कि अज्ञान मत करो, पर यही कहा जाता है कि ज्ञान करो; तब क्रोध मत करो के स्थान पर क्षमा धारण करो, क्यों नहीं कहा जाता? इसका भी कारण है, और वह यह कि हम क्रोध, मान, माया आदि से परिचित हैं; वे हमारे नित्य अनुभूत विभाव हैं। क्षमादि हमारे लिए अपरिचित और अननुभूत-से हैं। परिचित से अपरिचित को और, अनुभूत से अननुभूत को तरफ जाना ही सहज होता है।

दुनिया की स्थिति यह है कि उससे जब यह कहा जाता है कि क्रोध नहीं करना क्षमा है तो उसे संतोष हो जाता है, पर उससे यह कहा जाय कि क्षमा नहीं करना क्रोध है तो अटपटा लगता है, कुछ समझ में नहीं आता। अतः क्रोध की परिभाषा सदा भावात्मक (Positive) समझाई जाती है। जैसे – क्रोध गुस्से को कहते हैं, जब क्रोध आता है तो आँखें लाल हो जाती हैं, शरीर काँपने लगता है, होंठ फड़कने लगते हैं, आदि।

यहाँ एक प्रश्न हो सकता है कि आचार्यों ने भी तो इसीप्रकार समझाया है। आचार्यों के सामने भी एक समस्या थी कि उन्हें क्रोधियों को क्षमा समझानी थी; अतः क्षमा को भी क्रोध के माध्यम से समझाना पड़ा। व्यवहार को व्यवहार की भाषा में समझाना पड़ता है। मुनिजन क्षमा के भण्डार होते हैं। यदि वे अपनी ओर से बोलेंगे तो यही बोलेंगे कि क्षमा का अभाव क्रोध है, पर दुनिया में भाव होता है वक्ता का और भाव होती है श्रोता का। यदि श्रोता की भाषा में न बोला गया तो वह कुछ समझ ही न सकेगा।

अतः ज्ञानीजन समझाना तो चाहते हैं क्षमाधर्म, पर समझाते हैं क्रोध की बात करके। बच्चों से बात करने के लिए उनकी ओर से बोलना पड़ता है। जब हम बच्चे से कहते हैं कि माँ को बुलाना, तब हमारा आशय बच्चों की माँ से होता है, अपनी माँ से नहीं; क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा कहने पर बच्चा अपनी माँ को ही बुलायेगा, हमारी माँ को नहीं।

उत्तमक्षमा

१३

इसीप्रकार जब हमें भी क्षमा को क्रोध की भाषा में ही समझाना है तो पहले क्रोध को ही अच्छी तरह स्पष्ट करना समुचित होगा।

यद्यपि यह आत्मा ज्ञान का घनपिण्ड और आनन्द का कन्द है, स्वभाव से स्वयं परिपूर्ण है; तथापि कुछ विकारों, कमजोरियों तब से ही इसके साथ जुड़ी हुई हैं, जब से यह है। उन कमजोरियों को शास्त्रकारों ने विभाव कहा, कषाय कहा, और न जाने क्या-क्या नाम दिये; उनके त्याग का उपदेश भी कम नहीं दिया; सच्चे सुख को प्राप्त करने का उपाय भी उनके त्याग को ही बताया। महात्माओं के अनेक उपदेशों और आदेशों के बावजूद भी प्राणी इनसे बच नहीं पाया। इन कमजोरियों के कारण प्राणियों ने अनेक कष्ट उठाये हैं, उठा रहे हैं और उठायेंगे। इनसे बचने के लिए भी उपाय कम नहीं किये गये, पर बात वहीं की वहीं रही।

जिन विकारों के कारण, जिन कमजोरियों के कारण, जिन कषायों के कारण प्राणी सफलता के द्वार तक पहुँचकर भी कई बार असफल हुआ, सुख-शान्ति के शिखर पर पहुँचने के लिए प्रयत्नशील रहने पर भी पहुँच नहीं पाया; उन विकारों में, उन कमजोरियों में, उन कषायों में सबसे बड़ा विकार, सबसे बड़ी कमजोरी और सबसे बड़ी कषाय है क्रोध।

क्रोध आत्मा की एक ऐसी विकृति है, ऐसी कमजोरी है, जिसके कारण उसका विवेक समाप्त हो जाता है, भले-बुरे की पहचान नहीं रहती। जिसपर क्रोध आता है, क्रोधी उसे भला-बुरा कहने लगता है, गाली देने लगता है, मारने लगता है, यहाँ तक कि स्वयं की जान जोखिम में डालकर भी उसका बुरा करना चाहता है। यदि कोई हितैषी पूज्य पुरुष भी बीच में आवे तो उसे भी भला-बुरा कहने लगता है, मारने तक को तैयार हो जाता है। यदि इतने पर भी उसका बुरा न हो तो स्वयं बहुत दुखी होता है, अपने ही अंगों का घात करने लगता है, माथा कूटने लगता है, यहाँ तक कि विषादि भक्षण करके मर तक जाता है।

लोक में जितनी भी हत्याएँ और आत्म-हत्याएँ होती हैं, उनमें से अधिकांश क्रोधावेश में ही होती हैं। क्रोध के समान आत्मा का कोई दूसरा शत्रु नहीं है।

धर्म के दशलक्षण

१४

क्रोध करने वाले को जिसपर क्रोध आता है, वह उसकी ओर ही देखता है, अपनी ओर नहीं देखता। क्रोधी को जिसपर क्रोध आता है, उसी की गलती दिखाई देती है, अपनी नहीं; चाहे निष्पक्ष विचार करने पर अपनी ही गलती क्यों न निकले। पर क्रोधी विचार करता ही कब है? यहीं तो उसका अज्ञान है कि उसकी दृष्टि पर की ओर ही रहती है और वह भी पर में विद्यमान-अविद्यमान दुर्गुणों की ओर ही; गुणों को तो वह देख ही नहीं पाता। यदि उसे पर के गुण दिखाई दे जावें तो फिर तो उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होगी।

यदि मालिक के स्वयं के पैर से ठोकर खाकर काँच का गिलास फूट जावे तो एकदम चिल्लाकर कहेगा कि इधर बीच में गिलास किसने रख दिया? उसे गिलास रखने वाले पर क्रोध आएगा, स्वयं पर नहीं। वह यह नहीं सोचेगा कि मैं देखकर क्यों नहीं चला?

यही यदि गिलास नौकर के पैर की ठोकर से फूटे तो चिल्लाकर कहेगा – देखकर नहीं चलता, अंधा है। फिर उसे बीच में गिलास रखने वाले पर क्रोध न आकर ठोकर देने वाले पर आएगा; क्योंकि बीच में गिलास तो स्वयं उसने है।

गलती हमेशा नौकर को ही दिखेगी चाहे स्वयं ठोकर दे, चाहे नौकर के पैर की ठोकर लगे; चाहे स्वयं गिलास रखे, चाहे दूसरे ने रखा हो।

यदि कोई कहे कि गिलास तो आप ही ने रखा था और ठोकर भी आपने मारी, अब नौकर को क्यों डाँटते हो? तब भी यह बोलेगा कि इसे उठा लेना चाहिए था, इसने उठाया क्यों नहीं? उसे अपनी भूल दिख ही नहीं सकती; क्योंकि क्रोधी ‘पर’ में ही भूल देखता है; स्वयं में देखने लगे तो क्रोध आएगा कैसे? यही कारण है कि आचार्यों ने क्रोधी को क्रोधान्ध कहा है।

क्रोधान्ध व्यक्ति क्या-क्या नहीं कर डालता? सारी दुनिया में मनुष्यों द्वारा जितना भी विनाश होता देखा जाता है, उसके मूल में क्रोधादि विभाव ही देखे जाते हैं। द्वारिका जैसी पूर्ण विकसित और सम्पन्न नगरी का विनाश द्वैपायन मुनि के क्रोध के कारण ही हुआ था। क्रोध के कारण सैकड़ों घर-परिवार

उत्तमक्षमा

दृष्टते देखे जाते हैं। अधिक क्या कहें - जगत में जो कुछ भी बुरा नजर आता है, वह सब क्रोधादि विकारों का ही परिणाम है।

कहा भी है - “क्रोधोदयाद् भवति कस्य न कार्यहानिः” क्रोध के उदय में किसकी कार्य-हानि नहीं होती, अर्थात् सभी की हानि होती है।"

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘क्रोध’ नामक निबन्ध में इसका अच्छा विश्लेषण किया है।

क्रोध एक शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। वह क्रोध करने वाले को मानसिक शान्ति तो भंग कर ही देता है, साथ ही वातावरण को भी कलुषित और अशान्त कर देता है। जिसके प्रति क्रोध-प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित है या अनुचित।

क्रोध का एक खतरनाक रूप है बैर। बैर क्रोध से भी खतरनाक मनोविकार है। वस्तुतः वह क्रोध का ही एक विकृत रूप है। बैर क्रोध का आचार या मुरब्बा है। क्रोध के आवेश में हम तत्काल बदला लेने को सोचते हैं। सोचते क्या हैं - तत्काल बदला लेने लगते हैं। जिसे शत्रु समझते हैं, क्रोधावेश में उसे भला-बुरा कहने लगते हैं, मारने लगते हैं। पर जब हम तत्काल कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न कर मन में ही इस प्रति क्रोध को इस भाव से दबा लेते हैं कि अभी मौका ठीक नहीं है, अभी प्रत्याक्रमण करने से हमें हानि हो सकती है, शत्रु प्रबल है, मौका लगने पर बदला लेंगे; तब वह क्रोध बैर का रूप धारण कर लेता है और वर्षों दबा रहता है तथा समय आने पर प्रकट हो जाता है।

ऊपर से देखने पर क्रोध की अपेक्षा यह बैर विवेक का कम विरोधी नजर आता है, पर यह है क्रोध से भी अधिक खतरनाक; क्योंकि यह योजनाबद्ध विनाश करता है, जबकि क्रोध विनाश की योजना नहीं बनाता, तत्काल जो

१. आत्मानुशासन, छंद २२६

धर्म के दशलक्षण

जैसा संभव होता है, कर गुजरता है। योजनाबद्ध विनाश सामान्य विनाश से अधिक खतरनाक और भयानक होता है।

यद्यपि जितनी तीव्रता और वेग क्रोध में देखने में आता है - उतना बैर में नहीं, तथापि क्रोध का काल बहुत कम है, जबकि बैर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।

क्रोध और भी अधिक रूपों में पाया जाता है। झल्लाहट, चिड़चिड़ाहट, क्षोभ आदि भी क्रोध के ही रूप हैं। जब हमें किसी की कोई बात या काम पसन्द नहीं आता है और वह बात बार-बार हमारे सामने आती है तो हम झल्ला पड़ते हैं। बार-बार की झल्लाहट चिड़चिड़ाहट में बदल जाती है। झल्लाहट और चिड़चिड़ाहट असफल क्रोध के परिणाम हैं। ये एक प्रकार से क्रोध के हल्के-फुल्के रूप हैं। क्षोभ भी क्रोध का ही अव्यक्त रूप है।

ये सभी विकार क्रोध के ही छोटे-बड़े रूप हैं। सभी मानसिक शान्ति को भंग करने वाले हैं, महानता की राह के रोड़े हैं। इनके रहते कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता, पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। यदि हमें महान बनना है, पूर्णता को प्राप्त करना है तो इन पर विजय प्राप्त करनी ही होगी, इन्हें जीतना ही होगा। पर कैसे? आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी के अनुसार -

“अज्ञान के कारण जबतक हमें परपदार्थ इष्ट-अनिष्ट प्रतिभासित होते रहेंगे, तबतक क्रोधादि की उत्पत्ति होती ही रहेगी; किन्तु जब तत्त्वाभ्यास के बल से परपदार्थों में से इष्ट-अनिष्ट बुद्धि समाप्त होगी, तब स्वभावतः क्रोधादि की उत्पत्ति नहीं होगी।”

आशय यह है कि क्रोधादि की उत्पत्ति का मूल कारण, अपने सुख-दुःख का कारण दूसरों को मानना है। जब हम अपने सुख-दुःख का कारण अपने में खोजेंगे, उनका उत्तरदायी अपने को स्वीकारेंगे, तो फिर हम क्रोध करेंगे किस पर? क्योंकि अपने अच्छे-बुरे और सुख-दुःख का कर्ता दूसरों को मानना ही क्रोधादि की उत्पत्ति का मूल कारण है।

क्षमा के साथ लगा उत्तम शब्द सम्यग्दर्शन को सत्ता का सूचक है। सम्यग्दर्शन के साथ होनेवाली क्षमा ही उत्तमक्षमा है।

उत्तमक्षमा

यहाँ एक प्रश्न संभव है - जबकि क्षमा का संबंध क्रोध के अभाव से है तो फिर उसका सम्यग्दर्शन से क्या संबंध? यह शर्त क्यों कि उत्तमक्षमा सम्यग्दृष्टि को ही होती है, मिथ्यादृष्टि को नहीं? जिसको क्रोध नहीं हुआ, उसके उत्तमक्षमा हो गई; चाहे वह मिथ्यादृष्टि हो या सम्यग्दृष्टि। मिथ्यादृष्टि के उत्तमक्षमा हो ही नहीं सकती, यह अनिवार्य शर्त क्यों?

भाई! बात ऐसी है कि क्रोध का अभाव आत्मा के आश्रय से होता है। मिथ्यादृष्टि के आत्मा का आश्रय नहीं है; अतः उसके क्रोध का अभाव नहीं हो सकता। इसलिए मिथ्यादृष्टि के क्रोध नहीं हुआ, यह बनता ही नहीं है। उसे जो ‘क्रोध नहीं हुआ’ ऐसा देखने में आता है, वह तो क्रोध का प्रदर्शन नहीं हुआ वाली बात है। क्योंकि कभी-कभी जब क्रोध मन्द होता है तो क्रोध का प्रदर्शन नहीं देखा जाता है, उसे ही अज्ञानी क्रोध का अभाव समझ लेते हैं और उत्तमक्षमा कहने लगते हैं। वस्तुतः वह उत्तमक्षमा नहीं, उत्तमक्षमा का भ्रम है।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3094.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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