धन्य-धन्य हे गौतम गुरु | Dhanya-2 Hey Gautam Guru

धन्य-धन्य हे गौतम गुरु पुरुषार्थ तुम्हारा,
निश्चय भक्ति करी प्रभु की भव का लिया किनारा॥टेक॥

शिष्य पाँच सौ पाए इस गौरव में भरमाये,
जिनशासन के तीव्र विरोधी मोह महातम छाये ।
कहाँ छिपी थी महायोग्यता जिसने किया उजारा॥(1)

काललब्धि जब आई इन्द्र निमित्त बन आया;
जिनशासन के सारभूत इक मङ्गल छन्द सुनाया।
मङ्गलमय भवितव्य दिशा में तुमने चरण बढ़ाया।।(2)

वीरप्रभु के समवसरण का मानस्तम्भ निहारा;
मिथ्या मद गल गया तुम्हारा वेश दिगम्बर धारा।
योग्य शिष्य थे वीर प्रभु के झेली जिन-श्रुतधारा।।(3)

अनेकांतमय वस्तु बताई स्याद्वाद के द्वारा;
वीरप्रभुजी मुक्ति पधारे तुमने केवल धारा।
धन्य-धन्य निर्वाण महोत्सव जग में हुआ उजारा॥(4)

Artist - अज्ञात

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