धनि मुनि जिनकी लगी लौ। Dhani Muni Jinki Lagi lau

धनि मुनि जिनकी लगी लौ शिव ओरनै।
सम्यग्दर्शनज्ञानचरननिधि, धरत हरत भ्रमचोरनै।।धनि.।।

यथाजातमुद्राजुत सुन्दर, सदन विजन गिरिकोरनै।
तृन-कंचन अरि-स्वजन गिनत सम, निंदन और निहोरनै।।१।।धनि.।।
भवसुख चाह सकल तजि वल सजि, करत द्विविध तप घोरनै।
परम विरागभाव पवितैं नित, चूरत करम कठोरनै।।२।।धनि.।।
छीन शरीर न हीन चिदानन, मोहत मोहझकोरनै।
जग-तप-हर भवि कुमुद निशाकर, मोदन ‘दौल’ चकोरनै।।३।।धनि.।।
~पण्डित दौलतरामजी कृत

वे मुनि धन्य हैं जिनको मोक्ष की लगन लगी है । वे रत्नत्रय अर्थात् सम्यकदर्शन , ज्ञान और चारित्र रूपी निधि को धारण करते हैं जो संशयरुपी/ भ्रमरूपी चोर को हरती है , उसका नाश कर देती है ।
जो सुंदर, नग्न दिगम्बर मुद्रा को धारण कर निर्जन पहाड़ों की कंदराओं में , कोनों में रहते हैं । जो तिनके और स्वर्ण में , शत्रु और आत्मियजनों में , निंदक और प्रशंसक में समान भाव रखते हैं , वे मुनि धन्य हैं ।
सब सांसारिक सुख की कामना छोड़कर , अपनी पूर्ण क्षमता के साथ आन्तरिक व बाह्य दोनों प्रकार से घोर , कठिन तप की साधना करते हैं । निरासक्त, वैराग्य भाव रूपी वज्र को धारण कर वे कठोर कर्मों को भी चूर कर देते हैं , नष्ट कर देते हैं , वे मुनि धन्य हैं ।
यद्यपि उनका शरीर क्षीण हो गया है अर्थात् काया कृश हो गई है , फिर भी आत्मिक दृष्टि से किसी प्रकार की निर्बलता नहीं है और वे मोह की प्रचंड वायु झकोरे को भी मोह लेते हैं , रोक लेते हैं , उसका प्रतिघात सह लेते हैं । ऐसे जगत का ताप हरनेवाले , कुमुद को विकसित करनेवाले , चंद्रमा के समान उन मुनि को देखकर चकोर की भांति दौलतराम का चित्त भी प्रसन्न हो जाता है , मुदित हो जाता है ।

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