धनि मुनि जिनकी लगी लौ। Dhani Muni Jinki Lagi lau

धनि मुनि जिनकी लगी लौ शिव ओरनै।
सम्यग्दर्शनज्ञानचरननिधि, धरत हरत भ्रमचोरनै।।धनि.।।

यथाजातमुद्राजुत सुन्दर, सदन विजन गिरिकोरनै।
तृन-कंचन अरि-स्वजन गिनत सम, निंदन और निहोरनै।।१।।धनि.।।
भवसुख चाह सकल तजि वल सजि, करत द्विविध तप घोरनै।
परम विरागभाव पवितैं नित, चूरत करम कठोरनै।।२।।धनि.।।
छीन शरीर न हीन चिदानन, मोहत मोहझकोरनै।
जग-तप-हर भवि कुमुद निशाकर, मोदन ‘दौल’ चकोरनै।।३।।धनि.।।
~पण्डित दौलतरामजी कृत