धर्मी होवे पाहुने | Dhani hove pahune

धर्मी होवे पाहुने धनि भाग्य हमारें ।।टेक।।
गृहस्थ दशा तो हीन दशा है, अविरति है कमजोरी।
महाभाग नर सुख सागर हैं, जिन संयम रति जोरी।।1।।
तत्त्व की बात करें वे भी, इस दुःखम काल में थोरे।
अधिक जीव तो ऐसे दीखे, राग-रंग में बोरे।।2।।
ज्ञानी के शुभ दर्शन, चर्चा, सेवा पाप नशावे।
पात्र जीव पुरुषार्थ जगाकर, निज स्वरूप को पावे।।3।।
शुद्धात्म की अनुपम महिमा, ज्ञानीजन दर्शावें।
समझें, श्रद्धें, ध्यावें हम भी परमानंद प्रगटावें।। 4।।
तत्त्वों का सम्यक् निर्णय कर, भेदज्ञान उर लावें।
हो अन्तर्मुख निर्विकल्प, आतम अनुभव प्रगटावें। 5।
तज भव फाँसी हो वनवासी, आतम ध्यान लगावें।
ज्ञानमयी ही चर्या होवे, ज्ञानमयी पद पावें।। 6।।

रचियता - पूजनीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्

Source - जिन भक्ति सिंधु