दयालक्षण धर्म एक अनुचिन्तन - जैन स्वाध्याय सामग्री | Dayalakshan Dharm Ek Anuchintan

दयालक्षण धर्म एक अनुचिन्तन

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अनुक्रमणिका

क्र. विवरण
1 शुभाशीष
2 कृति
3 आशीर्वीद
4 लेखक
5 सम्पादन
6 प्रकाशक एवं प्राप्ति स्थल
7 प्रथम संस्करण
8 प्रसार संख्या
9 मूल्य
10 प्राप्ति स्थान
11 मुद्रक
12 शुभाशीष
13 श्री दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन
14 अनुपम कृति
15 सबसे अलग है यह कृति
16 प्राक्कथन
17 सम्पादकीय
18 दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन
19 दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन
20 दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन
21 जिनधर्मानुरागी
22 विषय सूची
23 दशलक्षण धर्म-एक अनुचिन्तन
24 मंगलाचरण
25 दश लक्षण धर्म: एक अनुचिंतन
26 उत्तम क्षमाधर्म
27 मंगलाचरण
28 सद्भाव-स्वभाव उत्तम क्षमाधर्म
29 शुद्धभाव-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म
30 सुख-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म
31 अनिष्ठ-अभावस्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

शुभाशीष

सम्पूर्ण लोक में तत्त्वज्ञान का सागर श्री जिनधर्म है। इस महार्णव में वस्तु के वस्तुत्व का सत्यार्थ-बोध कराने वाले अनन्त प्रमेय हैं, जो कि सकल-विकल प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाण के विषय हैं।

भगवान् श्री जिन तीर्थंकर परमात्मा ने सर्व द्रव्य-गुण-पर्यायात्मक वस्तु के वस्तुत्व को जाना है व्यवहार से, प्रभु के ज्ञान में झलका है सहज-स्वच्छत्व गुण के नियोग से, ईहाशून्य परम-विद्या चार अनुयोगगम्यौ वर्णित की गाथापर परमेष्ठी तथा आचार्यों ने। ऐसी पावन श्रुत-सरिता प्रवाहमान होते हुए सम्प्रति आचार्य, मुनिगणों एवं विद्वानों की प्रज्ञा का आभूषण बनी है।

इसी पवित्र दीर्घ में मनीषी तत्त्वज्ञान युक्त, सरल, सहज स्वभावी, विद्वत्-वरेण्य पंडित श्री रमेशचन्द्रजी बाँझलजी ने अपनी निर्मल तत्त्वज्ञान लब्धि से अनेक महान् कृतियों का सृजन किया है। इसी परम्परा में आत्मधर्म-प्ररूपक ‘दश लक्षण धर्म एक अनुचिन्तन’ नामक कृति का सृजन कर, श्रीजिन वागीश्वरी के कोष को वर्धमान किया है, जो कि व्यवहार एवं परमार्थ मय मिश्रित दुग्ध-मिश्री के सम्मेलन का मधुर स्वाद प्रदान करने वाली भव्यो के लिए देशना लब्धि का कार्य करेगी।

पंडित श्री रमेशचन्द्रजी इसी प्रकार श्रुतामृत का पान करते हुए “श्री जिनशासन नमोऽस्तु शासन” का उद्योतन, पर्याय के अन्तिम निष्पर्ष तक करते रहे, यही शुभाशीष…!
इति शुभम् भूयात् ॐ नमः सिद्धेभ्यः

पावन वर्षायोग
सम्मीतनगर (फाफाडीह) रायपुर (छ.ग.)
भारत
२२.१०.२०२२

• श्री १०८ आचार्य विशुद्धसागर मुनि


कृति

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

आशीर्वीद

श्री १०८ श्रमणाचार्य विशुद्धसागर मुनिराज

लेखक

पं. रमेशचन्द्र बाँझल
छत्रपति नगर, इंदौर, चलभाष : ९०९८५८०९२९

सम्पादन

प्रो. शान्तिलाल बड़जात्या
इंदौर, चलभाष : ९४०७००६६९६

प्रकाशक एवं प्राप्ति स्थल

स्वाध्याय मण्डल, रामाशाह मन्दिर
नेमिनाथ चौक, मल्हारगंज, इन्दौर

प्रथम संस्करण

भाद्रपद शुक्ल पंचमी, संवत् २०८०, सन् २०२३

प्रसार संख्या

११००

मूल्य

स्वाध्याय

प्राप्ति स्थान

(१) योगेन्द्र काला, इंदौर (चलभाष : ९८२७३०४००४)
(२) कमल पाटोदी, इंदौर (चलभाष : ९४०७०२९७९०)

मुद्रक

जैन राजेश कानूनगो
डिसेन्ट ग्राफिक्स, सुभाष चौक कार पार्किंग, इंदौर
(चलभाष : ९८२६०९४०४७)

शुभाशीष

उत्तम छिमा मार्दव आर्जव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं,
चहुँगति-दुःखते काढ़ि मुक्ति करतार हैं।।

जैन धर्म में पर्युषण पर्व का बहुत महत्त्व है। सम्पूर्ण समाज बड़े उत्साह, पूजा, भक्ति के साथ मनाती है; साधु-संत, विद्वान अलग-अलग धर्मों पर व्याख्यान करते हैं। दशलक्षण पर्व अपनी आत्मा को शिखर पर, जहाँ सिद्ध परमेष्ठी विद्यमान हैं, वहाँ की यात्रा कराने वाले सूत्र हैं, नादान को भगवान बनाने के लिए अचूक बाण हैं।

इन्दौर शहर के तत्व मनीषी, सहज स्वभावी व्यक्तित्व के धनी जिन्होंने कई महान कृतियों का सृजन करके समाज का उपकार किया है, ऐसे उच्च श्रेणी के विद्वान श्री रमेशचन्द्र बांझल ने धर्म की परिभाषाएँ, दशधर्मों को आगम, अध्यात्म से सजाकर आत्मधर्म देशना (दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन) नामक कृति का सृजन कर एवं कषाय क्यों आती है, इसके निरसन के उपाय पर प्रकाश डाला है। अतः सभी के लिए यह कृति उपयोगी बन जाएगी। यह कृति सभी की अज्ञानता को हरकर दश धर्म को नए रूप में पढ़ने, समझने का अवसर प्रदान करेगी।

पंडितजी! आपके द्वारा समाज को इसी तरह ज्ञानमृत मिलता रहे। आपकी कृति के लिए मंगल आशीर्वाद। आप चिरायु रहें। आपको शुभाशीष।
ज्ञानमृतं भोजनम्।

५ अगस्त, २०२३
चातुर्मास स्थल : मोदीजी की नसिया
मल्हारगंज, इन्दौर

  • श्रमणाचार्य विहर्षसागर
    (श्री १०८ आचार्य विहर्षसागर मुनि)

श्री दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

१. दशधर्म चारित्र गुण की निर्मल पर्याय है।
२. क्रोधादि विकारों के अभाव से प्रकट होते हैं।
३. आ. पंडितजी सा. ने अपने विशेष क्षयोपशामिक ज्ञान के द्वारा सुन्दर, सरस, उत्तम वर्णन किया है।
४. हर एक धर्म का १५ व बीस प्रकार से वर्णन किया है तथाधर्म की महिमा व फल का भी उत्तम वर्णन है।
५. क्षमादि धर्म के बाधक क्रोधादिक विकारों की उत्पत्ति का दिग्दर्शन अच्छा किया है।
६. नव विवक्षा का ध्यान रखना भी परमावश्यक है।
७. यद्यपि धर्मों का वर्णन अनेकान्तिक भव्यात्माओं ने भी किया है, परन्तु भावनाओं में अन्तर दिखाई देता है।
८. जैसे क्षमादि धर्मों का क्रम मुझे खेती के दृष्टान्त से सरल लगता है।
जैसे क्षमा नाम पृथ्वी का भी है। अतः सर्वप्रथम क्षमाधर्म का वर्णन किया। तदनन्तर कोमल भूमि का होना मार्दव, सरल भूमि का होना आर्जव का, सत्य का बीज, शौच का जल, संयम की बाड़, तप की उष्णता, अनुपयोगी घास का त्याग (अलग करना) सिर्फ आकिंचन अकेले पौधे का रहना तथा अन्त में अपने में परिपक्व होना (स्वरूप में रमणता होना) ब्रह्मचर्य धर्म का वर्णन होना यह क्रम सम्यक् लगता है।
९. आ. पंडितजी सा. की लेखनी सतत चलती रहे ताकि स्वयं के लाभ के साथ-ही-साथ अनेक भव्यो का कल्याण होना भी उत्तम है।
१०. वस्तु के स्वभाव को धर्म (आत्मा की निर्विकार चेतना परिणति), उत्तम क्षमादि दश धर्म, रत्नत्रय धर्म, जीवों का रक्षण रूप धर्म, वीतराग धर्म, चारित्र धर्म, समभाव धर्म, मोह क्षोभ से रहित परिणाम ही धर्म है। अहिंसा धर्म, श्रावक व मुनिधर्म, व्यवहार व निश्चय धर्म आदि-आदि अनेक प्रकार से वर्णन जिनगम में पाया जाता है।
११. स्याद्वाद के द्वारा सम्यक् निर्णय कर अपना कल्याण अवश्य करें।
अन्त में आ. पंडितजी सा. शीघ्रातिशीघ्र सिद्ध पद को प्राप्त करें। यही मंगल भावना भाता हूँ।

  • रतनलाल जैन
    (पं. रतनलाल जैन, शास्त्री)
    इन्द्रभवन, इन्दौर

अनुपम कृति

‘दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन’ पंडित रमेशचन्द्र जी बांझल द्वारा लिखित अनुपम कृति है। शुभकामना सन्देश के निमित्त से इस कृति का पाण्डुलिपि के स्वाध्याय और अवलोकन का परम सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।

उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य रूप आत्मा के १० धर्मों के स्वरूप का व्यापक दिग्दर्शन इसमें है। यह धर्म आत्मा के विकास की १० अवस्थाएँ हैं। सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र के विकास के ये क्रमशः सोपान हैं।

क्षमा से लेकर ब्रह्मचर्य तक प्रत्येक धर्म की आद्योपांत व्याख्या अत्यन्त सरल और बोधगम्य शैली में की है। धर्म के वास्तविक अभिप्राय को समझकर चारित्रिक गुणों का विकास इस कृति का उद्देश्य है। उत्तम क्षमाभाव धारण करने पर अन्य धर्म भी धीरे-धीरे प्रकट होने लगते हैं। इसमें निश्चय और व्यवहार का समन्वय करते हुए १० धर्मों का अनुचिन्तन है। भाव, भाषा और शैली आदि दृष्टि से यह अनुपम कृति है।

प्रत्येक श्रावक इसका अध्ययन, मनन, चिन्तन और अनुपालन कर मुक्ति का पथ प्रशस्त कर सकता है।
जिनवाणी के सच्चे साधक परम आदरणीय पं. रमेशचन्द्र जी बांझल की विद्वत्ता और ज्ञान को प्रतिबिम्बित करती हुई इस कृति को नमन करते हुए यह शुभकामना करती हूँ कि यह अधिक से अधिक जनमानस को लाभान्वित कर सके।

ससम्मान सादर नमन।

  • डॉ. रेणु जैन
    कुलपति, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय
    इन्दौर

सबसे अलग है यह कृति

बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय पंडित रमेशचन्द्र बांझल इन्दौर द्वारा लिखित नवीनतम कृति ‘दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन’ पूर्व लेखकों द्वारा लिखित सभी कृतियों से अलग है। इस कृति का मैंने आद्योपांत अध्ययन किया। इसमें धर्म के सभी लक्षणों विस्तार से वर्णन तो किया ही गया है, साथ ही उन सभी लक्षणों को प्रायोगिक जीवन में उतारने की प्रक्रिया भी बताई गई है।

इस कृति में लेखक का मौलिक चिन्तन तो पग-पग पर दृष्टिगोचर होता ही है, साथ ही अपने चिन्तन की पुष्टि के लिए आगम के प्रमाणों की भरमार भी दिखाई देती है।

जो भी पाठक इसका गहराई से अध्ययन करेगा, उसे इस कृति की विषयवस्तु से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा और जीवन में आनन्द आए बिना न रहेगा।

  • डॉ. प्रवीणकुमार जैन शास्त्री
    प्राचार्य : डाईड्रीप शिक्षण संस्थान
    इन्दौर

प्राक्कथन

जगत् के सभी जीव दुःखों से मुक्त हो सुखी रहना चाहते हैं। सुखी होने का उपाय निज शुद्ध आत्मधर्म स्वरूप का श्रद्धान-ज्ञान-चारित्र (आचरण) का होना अत्यावश्यक है। शुद्धात्मधर्म का स्वरूप प्रतिपादन करते हुए १०८ समन्तभद्राचार्य रत्नकरण्ड श्रावकाचार में लिखते हैं-
देसियामि समीचीणं धम्मं कमनिव्वहणम्।
संसारदुःखत्तः सत्तलाणं यो धत्तुव्वमे सुखे।।२।।
अर्थ- समीचीन धर्म कर्म-संहार है जो जीवों को संसार के दुःखों से छुड़ाकर उत्तम सुख अर्थात् मोक्ष में धरता है स्थापित करता है, वह धर्म है।
१०८ कार्तिकेय स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखते हैं-
धम्मो वत्थुसहावो खमादिभावो य दसविहो धम्मो।
रयणत्तयं च धम्मो जीवाणं रक्खणं धम्मो।।४४६।।
अर्थ- जिस वस्तु का जो स्वभाव है, वह उस वस्तु का धर्म है।
उत्तम क्षमा आदि भावरूप धर्म (जीव का) दश प्रकार का है। प्रथम, निश्चय्यरूप रत्नत्रय धर्म है। द्वितीय, व्यवहाररूप स्व-पर जीवों की रक्षा करना भी धर्म है।
मैंने दशलक्षण धर्म का एक अनुचिन्तन; श्रुताभ्यास के बल से चिकित्सा पद्धति के अनुसार किया है। जिस प्रकार चिकित्सा शास्त्रों में स्वस्थ शरीर, स्वास्थ्य के लक्षणों का तथा स्वास्थ्य के विकृत करने वाले कारणों का, रुग्ण शरीर के लक्षणों का, रोग से होने वाली स्वास्थ्य की क्षति का, तथा रोग-निवारक आरोग्य-वर्धक औषध का और हित-मित आहार-विहार का प्रतिपादन होता है,

उसी प्रकार प्रस्तुत कृति में उत्तम क्षामादि दशलक्षण धर्मों का स्वरूप, धर्मों के लक्षणों का, धर्म को विकृत करने वाले कारणों का, विकृत आत्मधर्म के लक्षणों का, विकृति से होने वाली आत्मधर्म की क्षति का तथा विकृति-निवारक, आत्मधर्म-वर्धक चिन्तन एवं आत्मधर्म-स्वरूप में स्थिरता का प्रतिपादन करने हेतु एक लघु प्रयास किया है।

प्रस्तुत कृति के प्रारम्भ में अनादिनिधन उत्तम क्षमा आदि दशलक्षण धर्म का, वर्तमान कालापेक्षा आराधन करने का प्रारम्भ और प्रत्येक धर्म का पृथक्-पृथक् स्वरूप-लक्षण, तथा धर्म-घातक लक्षणों एवं उनसे निवृत्ति के उपायों का प्रतिपादन किया है।

प्रस्तुत कृति में निर्रन्थ्याचार्यों के प्रमाण भी समाहित किये गये हैं। मैं उन सभी आचार्यों एवं मुनि भगवन्तों को त्रियोग से समपिक कोटिशः नमोऽस्तु करता हूँ और विद्वानों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। आशीर्वाद प्रदाता १०८ आचार्य श्री विशुद्धसागरजी, १०८ आचार्यश्री विहर्षसागरजी और समस्त उपाध्याय, मुनिराजों को नमन करता हूँ।

प्रस्तुति कृति के पुरोवाक्, भूमिका, प्रस्तावना लेखकों का, शुद्धयार्थ पठन हेतु प्रो. शान्तिलालजी बड़जात्या, डॉ. प्रवीणजी शास्त्री, डाईरैक्ट्री जिनालय, इन्दौर, श्रीमती डॉ. रेणु जी जैन, कुलपति, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर का और श्री राकेशजी जैन तथा ग्रन्थ प्रकाशन हेतु स्वाध्याय मण्डल रामाशाहा मन्दिर एवं अर्थ सहयोगियों का हृदय से कृतज्ञ हूँ।

  • पण्डित रमेशचन्द्र बांझल
    ३४-बी, छत्रपति नगर, एयरपोर्ट रोड,
    इन्दौर (म.प्र.) ४५२००५
    चलभाष : ९०९८५८०९२९

सम्पादकीय

क्षमा मृदुजुत्ते शोचे सञ्चयं सव्वत्तयं।
त्यागोऽकिंचण ब्रम्ह धम्मो दसविहो स्मृतः।।
अत्यन्त हर्ष का अवसर है कि पण्डित प्रवर श्री रमेशचन्द्र जी बांझल ने ग्रन्थ रचना की श्रृंखला का नवीन ग्रन्थ “दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन” ग्रन्थ की रचना कर धर्म के दश लक्षणों का अनुपम, अद्वितीय विश्लेषण, चिन्तन, पूर्वाचार्यों के कथनों के आधार पर प्रस्तुत किया है। आदरणीय पण्डितजी ने सर्वप्रथम धर्म का स्वरूप ‘शुद्ध’ शब्द को सम्यग्दर्शन सहित वीतरागता की संसिद्धि का सूचक और प्रशंसा-वाचक विशेषण बताते हुए उसका महत्त्व प्रतिपादित किया है। दशलक्षण पर्व मनाने का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए वस्तु-स्वातंत्र्य और निज आत्मा की संसिद्धि करना बताया है अर्थात् स्वावलम्बन और अपने आत्मस्वरूप की प्राप्ति का उपाय दर्शाया है। इसको प्राप्त करने के लिए दस सोपान- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य का आलम्बन अनिवार्य है।
क्षमा का अभाव ही क्रोध है, अर्थात् अनिष्टकारक, कष्टदायी निमित्तों की उपस्थिति होने पर भी परिणामों में विकृति, क्षुब्धता का अभाव व साध्यभाव की प्रकटता; उत्तम क्षमा है। विशेष यह है कि पण्डितजी ने स्पष्ट किया है कि उत्तम क्षमा कारण है और उत्तम क्षमाधर्म कार्य है। कारण में कार्य का उपचार कर व्यवहार नय की विवक्षावश उत्तम क्षमा को ही उत्तम क्षमा धर्मरूप कथन कर दिया जाता है।
इसी प्रकार शेष मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य के प्रकरण में यही सुसंगत पद्धति अपनायी गई है।
उत्तम क्षमा के विस्तृत निरूपण के साथ उसके विरोधी क्रोध की परिभाषा और क्षमा और क्रोध में अन्तर बताकर क्रोध के विभिन्न प्रकारों का चिन्तन/प्रकटन अद्भुत है।
मान का अभाव मार्दव है। उत्तम मार्दव धर्म के स्वरूप का विविध विवक्षाओं से प्रतिपादन किया गया है। साथ ही मान कषाय की उत्पत्ति के कारण, भेद और मार्दवधर्म-घातक पर्यायवाची शब्दों के विश्लेषण से मनुष्यों द्वारा अपनायी गई मान कषाय के दुष्परिणामों से अवगत कराकर मार्दवधर्म अपनाने की प्रेरणा की विधि बतायी है। इस प्रकार मान कषाय के अभावपूर्वक मनुष्यों को नरक गति, तिर्यंच गति (विभिन्न प्रकार के मान और मदों की विवेचना करके) के दुःखों से

दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन

बनाने का मार्ग अवगत कराया है।

उत्तम आर्जवधर्म के विश्लेषण में १९ प्रकार से विवेचना की गई है। आर्जवधर्म की विरोधी मायाकषाय किस प्रकार आत्म-विशुद्धि नष्ट करती है, उसके १९ प्रकार बताकर उनसे बचने के लिए उत्प्रेरित किया है।

‘ऋजुभाव’ का नाम आर्जव है। यानी सरलता, खरापन, ईमानदारी, स्पष्टवादिता, निष्कपटता, विनम्रता, उदारता का होना आर्जव भाव है और इनके विपरीत कुटिलता, वक्रता, आदि भाव का होना मायाचारी है। मायाचारी के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करते हुए उनके अभाव के लिए प्रेरित किया गया है जिसके फलस्वरूप मनुष्य भव की सार्थकता, व्रत-शील-संयम का पालन, लोक-पूज्यता के साथ-साथ परमात्म-स्वरूप की अनुभूति और मोक्षसिद्धि होती है।

उत्तम शौच यानी शुद्धि, संस्कार, पवित्रता, मत्स्यभाव, भोगोपभोग की सामग्रियों तथा उनके प्रति मलिन परिणामों का त्याग तथा निज शुद्धात्म-स्वभाव की प्राप्ति। इसको २९ बिंदुओं द्वारा उत्कृष्टरूप से स्पष्ट किया गया है। शौच का अभाव लोभ है। कैसे-कैसे लोभ के परिणाम और कार्य होते हैं और उनका फल क्या है, यह २८ बिंदुओं द्वारा समझाया गया है जो कि सामान्य जन के परिचय में नहीं है। चिन्तन मौलिक व संकलन अद्वितीय है।

उत्तम सत्यधर्म के अन्तर्गत सत्यवचन और सत्यधर्म को परिभाषित करते हुए दोनों में अन्तर को स्पष्ट किया गया है। सामान्यतः सत्यवचन और सत्यधर्म एकस्वरूप ही समझे जाते हैं, इसको विभिन्न प्रकार से स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि सत्यवचन कारण है और सत्यधर्म कार्य है। इस भेद को २९ बिन्दुओं द्वारा विवेचित किया गया है और सत्यधर्म धारक का अन्तरंग व बाह्य प्रवर्तन अवगत कराया गया है। सत्य के अभावस्वरूप असत्य को व उसके भेदों को १५ प्रकार से समझाया गया है। सत्यधर्म की महिमा का सोदाहरण वर्णन कर उसके पालन के फल में सत्यधर्म-स्वभावी निज आत्मा की प्राप्ति की भावना की गई है।

संयम यानी नियन्त्रण, निग्रह, तपोनिरुद्ध, एकाग्रता। यानी जीव की स्वशुद्धात्मा में एकाग्रता रूप आत्म-नियन्त्रण। उत्तम संयम के भी कार्य-कारण का निरूपण २९ बिन्दुओं द्वारा कर जीवन में संयम की उत्कृष्टता को स्थापित किया गया है। संयम का घातक असंयम किस तरह हो सकता है इसे १९ बिन्दुओं में स्पष्ट किया गया है। संयमधर्म-स्वभावी निजत्मा में निमग्न रहने की प्रेरणा दी गई है।

उत्तम तप और तपधर्म में भेद बताकर तपधर्म की २३ प्रकार से विवेचना करके उनकी घातक वृत्ति-प्रवृत्ति भी प्ररूपण विशेषरूप से किया गया है।

उत्तम त्यागधर्म के प्रकरण में त्याग व दान में भेद बताते हुए बाह्य और अंतरंग त्याग का स्पष्टीकरण, अनिवार्यता तथा उत्तम त्याग और त्यागधर्म की विवेचना २९ बिन्दुओं में की गई है

दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन

जो कि अति विशिष्ट है। दान के प्रकरण में चारों प्रकार के दान और उसके घातक परिणामों, सप्त भयों और कार्यों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

उत्तम आकिंचन अर्थात् कुछ भी मेरा नहीं। परमाणुमात्र भी मेरा नहीं, केवल स्वशुद्धात्मा ही मैं हूँ, ऐसा निरूपण उत्तम आकिंचन्य है और इस भाव से सम्पन्न अनन्त गुणों से युक्त निजत्मा में निमग्न उत्तम आकिंचन्यधर्म है। उत्तम आकिंचन और आकिंचन्य धर्म में कारण-कार्य का सम्बन्ध स्थापित कर बाह्य और अंतरंग परिग्रह के त्याग का स्वरूप २६ बिन्दुओं में और उसका फल रागादि से भिन्न वीतराग-विज्ञानमयी निजतानुभूति कराना दर्शाया गया है।

उत्तम ब्रह्मचर्य के प्रकरण में ब्रह्मचर्य कारण है, ब्रह्मचर्यधर्म कार्य है- इसको ३५ बिन्दुओं से स्पष्ट किया गया है।

अब्रह्म होने के कारणों को १९ बिन्दुओं में समेटकर उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म का स्वरूप समझाकर उसमें निमग्न होकर सहज स्वभावी भगवान् आत्मा की प्राप्ति की प्रेरणा दी गई है।
अंत में, दश लक्षण धर्म पर्व का प्रारम्भ प्रथम दिन से प्रारम्भ होकर अन्त में मनाए जाने वाले ‘क्षमावाणी पर्व’ पर लेख चिन्तनीय व अवधारणाणीय और अनुकरणीय है। उत्तम क्षमा भाव में पूर्व के सभी नौ भावों (धर्मों) का समावेश बताकर क्षमावाणी पर्व को वृत्तिरूप से तथा प्रवृत्तिरूप से अर्थात् भावरूप से तथा क्रियारूप से, दोनों प्रकार से अपनाने की प्रेरणा देकर क्षमावाणी पर्व का सम्यक् स्वरूप समझकर सभी जीवों की विकारी विकल्पों से निवृत्त होकर साम्य भावों की प्राप्ति की प्रेरणा दी गई है।

मेरा उत्कृष्ट पूज्यौदय है कि आदरणीय पण्डितजी ने मुझ अल्पज्ञानी को इस योग्य समझा कि मैं इसकी टंकण सम्बन्धी त्रुटियाँ दूर करूँ और वाक्य-विन्यास में कहीं कुटन हो तो उसको अवगत कराकर निर्देशानुसार यथोचित संशोधन करूँ। मेरा परम सौभाग्य है कि हेतु मैंने ग्रन्थ को ३-४ बार पढ़ा, पण्डितजी के साथ बैठकर भी पढ़ा और धर्म के दश लक्षणों और उनके घातक परिणामों तथा प्रवृत्तियों को जानकर स्वयं के लिए तदनुसार कुछ चिन्तन करने को और अपनाने की प्रेरणा प्राप्त की।

दशलक्षण धर्मों के बारे में और उनके घातक विरोधी परिणामों-कार्यों के बारे में इतना विशद वर्णन दुर्लभ ही है। पण्डितजी का अध्ययन, मौलिक चिन्तन, भाषा, प्रवचन शैली, शब्द-भण्डार आदि अद्भुत है और यह बात उनके द्वारा विगत ४०-४५ वर्षों से रामाशाह मन्दिर, मल्हारगंज, इन्दौर में किये गये प्रवचनों से और नियमितरूप से उपस्थित धर्म पिपासु, ज्ञान पिपासु महिला-पुरुषों की शताधिक उपस्थिति से प्रमाणित है।

विगत वर्षों में पण्डितजी के स्वरचित १० ग्रन्थ, परमार्थ पूजन की पुस्तक और पण्डित आशाधरजी द्वारा विरचित सहरनाम की व्याख्या, अभिनव जिनपूजन सन्देह आदि प्रकाशित हो

दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन

चुकी हैं। सभी साधर्मी जनों ने विशेष उत्साह के साथ इनका अध्ययन कर अपने आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ की वाचना भी रामाशाह मन्दिर में हो चुकी है, तभी से श्रोतागणों का आग्रह था कि इसका शीघ्र प्रकाशन किया जाये। विलम्ब से सही, पर कार्य अन्ततः पूर्ण हुआ क्योंकि काललब्धि अभी भी पकी थी। विलम्ब के लिए मैं सभी से क्षमाप्रार्थी हूँ।

मैं परम पूज्य १००८ आचार्य श्री विशुद्धसागरजी को, परमपूज्य १००८ आचार्य श्री विहर्षसागरजी को शत-शत बार नमोऽस्तु करता हूँ। उन्होंने ग्रन्थ हेतु आशीर्वचन देकर अनुगृहीत किया है। इसी प्रकार देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर की स्वाध्याय, अध्ययनशील कुलपती श्रीमती डॉ. रेणु जैन और डाईडीप जिनालय स्थित विद्यालय के आचार्य डॉ. प्रवीणकुमार जी शास्त्री का भी उनकी विचारों की प्रस्तुति के लिए आभारी हूँ।

पुस्तक के संशोधन में आदरणीय पण्डित डॉ. प्रवीणजी शास्त्री, प्राचार्य डाईडीप जिनालय, इन्दौर, श्री राकेश जी जैन, बड़वाली चौकी, इन्दौर ने भी श्रमसाध्य कार्य किया, उनका मैं हृदय से आभारी हूँ। पुस्तक प्रकाशन में समस्त अर्थ सहयोग प्रदाता और प्रकाशक स्वाध्याय मण्डल, रामाशाह मन्दिर, मल्हारगंज, इन्दौर और अन्य धर्मानुरागी श्रोताओं का भी मैं आभारी हूँ। पुस्तक के व्यवस्थित और निर्दोष टंकण के लिए श्री नितिन पंजाबी और उत्तम मुद्रण व्यवस्था के लिए श्री राजेश कानूनगो (डीसण्ट ग्राफिक्स, इन्दौर) का भी आभारी हूँ।

इस पुस्तक की टंकण की त्रुटियों को सुधारने में मैंने अपनी बुद्धि-प्रमाण पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया है, फिर भी त्रुटि रह जाना असम्भव नहीं है। सुधीजन ज्ञात त्रुटियों से अवगत कराएँ। मैं उन त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरी भावना है कि आदरणीय पण्डितजी विरचित दशलक्षण धर्मों का यह श्रेष्ठतम, अद्भुतपूर्व, अद्वितीय चिन्तन-अनुचिन्तन, प्रस्तुति हम सबको मोक्षमार्ग में बढ़ने में प्रेरणा-स्रोत बने और पण्डितजी दीर्घायु होकर इसी तरह जिनागम के रहस्यों को उद्घाटित करते रहें।

जिनधर्मानुरागी

अन्तरिक्ष विज्ञान दिवस
दि. २३ अगस्त २०२२
इन्दौर

प्रो. शान्तिलाल बड़जात्या
२३, रामचन्द्र नगर मुख्य
इन्दौर-४५२००६
चलभाष : ९४०७०८६६९६
ई-डाक पता : बड़जात्याशान्ति@डाटामेल.भारत

विषय सूची

क्र. विषय पृष्ठ संख्या

  1. आचार्यश्री विशुद्धसागरजी के आशीर्वचन
  2. आशीर्वचन- आचार्यश्री विश्वेभसागरजी
  3. दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन- पं. रतनलालजी शास्त्री द्वारा शुभाशीष
  4. अनुपम कृति- डॉ. श्रीमती रेणु जैन
  5. सबसे अलग है यह कृति- डॉ. प्रवीण कुमार जैन, शास्त्री
  6. प्राक्कथन
  7. सम्पादकीय
  8. दशलक्षण धर्म- एक अनुचिन्तन 14
  9. उत्तम क्षमाधर्म 19
    क्रोध 27
  10. उत्तम मार्दवधर्म 43
    मान 49
  11. उत्तम आर्जवधर्म 68
    माया कषाय 71
  12. उत्तम शौचधर्म 89
    लोभ कषाय 93
  13. उत्तम सत्यधर्म 115
    असत्य 123
  14. उत्तम संयमधर्म 136
    असंयम 145
  15. उत्तम तपधर्म 153
    उत्तम तपधर्म के विविध प्रकार 157
  16. उत्तम त्यागधर्म 171
    दान और त्याग 174
  17. उत्तम आकिञ्चन्यधर्म 189
    परिग्रह 193
  18. उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म 205
    अब्रह्म 211
  19. क्षमावाणी 221
  20. सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 224

दशलक्षण धर्म-एक अनुचिन्तन

मंगलाचरण

सर्वज्ञ देव के भाषित उत्तम क्षमा आदि दश धर्म।
सम्यग्दर्शन सहित जो धारे, वह हो परम सुखी निष्कर्म।।

संसार-मनुष्य पर प्रदर्शन और प्रसिद्धि के लिए अनेक प्रकार की क्रान्तियाँ होती हैं, उनका मानव-जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। उनका जीवन में न तो प्रवर्तन किया जाता है, न स्मरण किया जाता है और न कोई पर्व की संज्ञा दी जाती है। जो क्रान्ति जगत् कल्याण के लिए होती है वह अविकल परम्परानुरूप जीवन में आचरणार्थ पर्व के रूप में स्थापित हो जाती है।

पर्व का अर्थ- आत्म-हितकर, आनन्दप्रद माङ्गलिक कार्य के प्रारम्भ का अवसर; पर्व है। पर्व; मनुष्य जीवन की निराशा, नीरसता एवं सन्ताप को मिटाकर; उत्साह, मैत्री, प्रमोद आदि सद्भावों की वृद्धि कर सुख-शान्ति प्रदान करते हैं। पर्व; देश, समाज और धर्म की संस्कृति के प्रतीक हैं।
पर्व; राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक के भेद से तीन प्रकार के हैं। धार्मिक पर्व; तात्कालिक और त्रैकालिक के भेद से दो प्रकार के हैं। तात्कालिक पर्व मोक्षमार्गमी महत्-पुरुषों के जीवन से सम्बन्धित होते हैं, जैसे तीर्थङ्करों के गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, दीक्षाकल्याणक, ज्ञानकल्याणक, निर्वाणकल्याणक की तिथियाँ। कतिपय पर्व; पुराण-पुरुषों की अतिशय घटना से सम्बन्धित होते हैं, जैसे अक्षय तृतीया, रक्षाबन्धन आदि।

त्रैकालिक पर्व; किसी पुराण-पुरुष के जीवन से या कोई विशेष घटना से सम्बन्धित नहीं, अपितु सार्वभौमिक, सार्वकालिक, शाश्वत होते हैं। उनके मनाने का प्रयोजन जन-रञ्जन, मन-रञ्जन, कल-रञ्जन नहीं; अपितु निजालम-विशुद्धि के लिए होता है। अतः ये सर्व क्षेत्रों और सर्व कालों में मनाये जाते हैं। इन पर्वों के माध्यम से मनुष्य मोह-राग-द्वेष आदि कषाय-

भावों को नाश कर, उत्तम क्षमा आदि दश लक्षणरूप धर्म की संसिद्धि एवं संवृद्धि को, मोक्ष प्राप्त करता है। वह सादि-अनन्त काल तक शाश्वत सुख भोगता है।
‘दशलक्षण धर्म’ पर्व का अपर नाम ‘पर्युषण पर्व’ भी प्रचलित है। पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है- ‘परि उष समात् सवात् भावाः इति पर्युषणा’ अर्थात् चारों ओर से विषय-कषायों से सिमटकर, धर्म-वृद्धि के निमित्त वीतराग श्री जिनेन्द्रदेव की पूजन-अर्चन द्वारा निजालम-धर्म की संसिद्धि कर उन जैसा ही बनना और मोक्ष प्राप्त करना। इस अपेक्षा से ‘दशलक्षण धर्म’ पर्व का अपर नाम ‘पर्युषण पर्व’ सार्थक है।

दशलक्षण धर्म-पर्व, मिथ्यात्व-रागादि समस्तविकल्प-जालों के परिहारपूर्वक निज शुद्धात्म-स्वभाव में निमग्न रहने के अनुष्ठान का पर्व है। इस पर्व में कल्याणमयी, कल्याणकारक उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि दशलक्षण निजालम-धर्म की आराधना की जाती है। यह पर्व वर्ष में तीन बार - माघ, चैत्र, भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

जैनदर्शन में जितने भी धार्मिक पर्व हैं, उन सभी के मनाने का उद्देश्य अपने में वीतराग भावों सहित ज्ञान-वैराग्य शक्ति की संवृद्धि करना है। ‘दशलक्षण धर्म’ पर्व में उत्तम क्षमा आदि गुण-धर्मों की आराधना सम्यग्दर्शन-पूर्वक होने से इसे महापर्व की संज्ञा है।

धर्म- आत्मधर्म तो एक है। उसे समझने के लिए उसके लक्षण दश हैं। धर्म के माध्यम से जीव को दशलक्षण में संवर-धारण करने की सामर्थ्य प्रकट होने से इसे ‘धर्म’ की संज्ञा सार्थक है।

‘आत्मानुशासन’ में आचार्य गुणभद्र लिखते हैं- धर्म वह है, जिसके होने पर अधर्म न हो। धर्म, वस्तु का स्वभाव है। जीव का स्वभाव सुख है।
‘धर्म’ शब्द ‘धृ’ धातु से निष्पन्न है। उसका व्युत्पत्ति अर्थ है- जो धारण कराता है या जिसके द्वारा धारण किया जाता है, वह धर्म है। अथवा जो जीव को इष्ट स्थान में धरता है, वह धर्म है। या जो जीव को कर्मों का निवारण कर, संसार के दुःखों से उठाकर उत्तम (आत्म) सुख में धरता है, वह धर्म है।

१. तेषां संवरधारणासामर्थ्यदधर्म इत्येषां संज्ञा अनवद्येति (रा.वा.।) २. धर्मो यत्र नाधर्मः /४६।
३. वत्थु सहवो धम्मो। ४. धार्यते लोकोऽनेन इति धर्मः। (रा.वा.) ५. इष्ट स्थाने धत्ते इति धर्मः। (स.सि.)
६. देशावधि समीचीने धर्म कर्म निवारणम्।
संसार-दुःखान् सत्वान् च धरत्युत्तमे सुखे।। -र.का.श्रा

दश लक्षण धर्म: एक अनुचिंतन

आगम में धर्म का निरूपण दो प्रकार से है- १. व्यवहार धर्म २. निश्चय धर्म। व्यवहारधर्म-जीवों की संसार के दुःखों से रक्षा करनेरूप दया-विशुद्धि है। निश्चयधर्म - अहिंसारूप है अर्थात् रागादि की अनुपत्तिरूप है। जो जीवों को मिथ्यात्व, रागादि समस्त सङ्कल्प-विकल्पों में संसरण करनेरूप भावसंसार से विस्थापित कर, मोह-क्षोभ-विहीन निर्विकार परम शुद्ध स्वसमयरूप- निज चैतन्य में स्थापित (धरण) करता है वह धर्म है।१ सम्यक्ता, ममता, माध्यस्ता, शुद्ध भाव, वीतरागता, चारित्र धर्म, स्वभाव की आराधना आदि धर्म के एकार्थवाची नाम हैं।२
सर्व विभाव-भावों से विमुक्त आत्मसुख-स्वरूप उत्तम क्षमा आदि धर्म के दशलक्षण हैं।
उत्तम- ‘उत्तम’ शब्द प्रशंसा-वाचक विशेषण है। प्रत्येक धर्म के साथ प्रयुक्त उत्तम विशेषण सम्यग्दर्शन सहित वीतरागता की संसिद्धि का सूचक है। अर्थात् आत्मा के क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि दश धर्म सर्वोत्कृष्ट हैं, प्रशंसनीय हैं। ये दशलक्षण धर्म सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र गुण की निर्मल पर्यायें हैं। सम्यग्दर्शन को धर्म का मूल कहा है।३ सम्यग्दर्शन धर्म का मूल होने से धर्म का प्रारम्भ भी सम्यग्दर्शन से ही होता है। सम्यग्दर्शन-सहित सम्यग्ज्ञानमयी ज्ञानक्रिया मोक्ष का कारण है।४ बाह्य में दान-पूजा, व्रत-शील, संयम, उपवास आदि करना; सम्यग्दर्शन के साथ होने पर मोक्ष के साधनभूत कारण हैं।५
धर्म के पात्र- धर्म के पात्र श्रमण और श्रावक हैं। दशलक्षण धर्मों की प्रकटता श्रमणों में मुख्य है और श्रावकों में गौणरूप है।
श्रमणों में चार चौकड़ी कषाय व नव नोकषाय के अभाववरूप अर्हन्त और तीन चौकड़ी कषाय के अभाववरूप मुनि भगवन्त हैं और श्रावकों में दो चौकड़ी कषाय के अभाववरूप व्रती प्रतिमाधारी श्रावक और एक चौकड़ी कषाय के अभाववरूप अविरत सम्यग्दृष्टि श्रावक होते हैं।
श्रमण; दशलक्षण धर्म और रत्नत्रय की एकता पूर्ण कर, निर्वाण प्राप्त करते हैं। श्रावक; धर्म-धर्म का एकदेश पालन करता हुआ सर्वदेश पालन करने को उद्यमवन्त रहता है। उसका बाह्य प्रवर्तन निर्ग्रन्थों की भक्तिपूर्वक, विनयी, दयामयी, हितमित-प्रिय सम्भाषी; उपशम भावी और विपरीत वृत्ति-प्रवृत्ति वालों के प्रति मध्यस्थ होता है। वह देव-पूजा आदि छः कर्मों और समता आदि छः आवश्यक रूपों प्रवर्तित रहता है। संवेग-वैराग्य की वृद्धि के लिए
१. प्र.सा. ता. वृ. ७/१। २. न.च.वृ. २५६। ३. दंसण मूलो धम्मो। (द.पा.मू. २)। ४. र.सा. १०५। ५. भा.स. ४०४।

जगत-काय का स्वभाव और द्वादश अनुप्रेक्षाओं का चिन्तन निरन्तर करता है।
धर्म का प्रारम्भ- भरत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल होता है। प्रत्येक काल के छः-छः भेद होते हैं। अवसर्पिणी-काल में दुःखम-दुःखम-दुःखमा-काल के उनचास दिन कम इक्कीस हजार वर्ष बीत जाने पर श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से सात-सात दिन तक विभिन्न प्रकार की विशिष्ट वर्षा होती है, भयदायक घोर प्रलय होता है। उस समय पर्वत, शिला आदि को चूर्ण कर देने वाली सात दिन तक संवर्तक-वायु चलती है। उसी समय मेघ गम्भीर-गर्जना सहित तुहिन और क्षार-जल तथा विषैले जल में से प्रत्येक सात दिन तक बरसते हैं। इसके अतिरिक्त मेघों के समूह धूम्र-धूलि, वज्र एवं दुष्टेक्ष्य ज्वाला; इनमें से प्रत्येक सात दिन तक बरसते हैं।१
पश्चात् उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ में सात दिन तक पुष्कर मेघ सुखोत्पादक जल की वर्षा होती है, जिससे वज्राग्नि से जली हुई पृथ्वी शीतल हो जाती है। क्षीरमेघ सात दिन तक क्षीरजल की वर्षा करते हैं। इसके पश्चात् अमृत मेघ अमृत की वर्षा करते हैं। रसमेघ सात दिन तक दिव्यरस की वर्षा करते हैं, जिसके माध्यम से सुकाल पकता है और लोग पुनः अहिंसक वृत्ति की धारण कर लेते हैं। पश्चात् भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी से मनुष्य, धर्म की आराधना प्रारम्भ करते हैं। इस कालचक्र की अपेक्षा उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ से इस भरत क्षेत्र में दशलक्षण धर्म के प्रारम्भ का पर्व मनाया जाता है। यद्यपि यह पर्व भाद्रपद, माघ और चैत्र; इन तीनों माहों में शुक्ल पक्ष की पञ्चमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है।
दशलक्षण धर्म का पर्व मनाने का प्रयोजन- यह पर्व मनुष्य को वस्तु-स्वातन्य का बोध कराने और निजात्मा के उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि दश धर्मों की संसिद्धि करने के प्रयोजन से मनाया जाता है।
जीव; अनादि से मोह-राग-द्वेष आदि विकारी भावों से ग्रस्त रह दुःखी रहा है। ये विकारी भाव आत्मा में मलिनता के उत्पादक और संसार-परिभ्रमण के हेतु हैं, आत्मा के शुद्ध स्वभाव को आवरित रखते हैं, प्रकट नहीं होने देते हैं। अतः आत्मस्वभाव के घातक हैं।
ये विकारी भाव काषाधिक भाव हैं जो अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन के भेद से चार प्रकार के हैं। प्रत्येक भेदरूप कषाय में क्रोध-
१. ति.प. १५४९-१५५०

मान-माया-लोभ- ये चारों कषायें गणित होने से प्रत्येक भेद को चौकड़ी कहते हैं। अनन्तानुबन्धी आदि चौकड़ी में क्रमशः जितनी-जितनी चौकड़ी का अभाव होता है, उतनी-उतनी आत्मधर्म में शुद्धि प्रकट होती है। चारों चौकड़ी कषायों के अभाव होने पर सम्पूर्ण आत्मशुद्धि प्रकट होकर, अर्हन्त अवस्था प्रकट हो जाती है।
मनुष्य में एक चौकड़ी कषाय के अभावानुरूप लेश्या की विशुद्धि और इन्द्रियों के विषयों-भोगों से विरक्ति तथा वीतरागतानुप आत्मधर्म की संवृद्धि होती है। धर्म का प्रारम्भ चतुर्थ गुणस्थान से होता है और पूर्णता तेरहवें गुणस्थान में होती है।
दशलक्षण धर्म का क्रम- यहाँ धर्म का अर्थ है- आत्मा की आनिमित्तिक, निरूपाधिक, सहज, शाश्वत वृत्ति। उसकी अनुभूति कराने वाले धर्म के लक्षण दश हैं। धर्म; दश नहीं है, धर्म तो एक ही है।
‘तत्त्वार्थ सूत्र’ में धर्म के दश लक्षणों का क्रम इस प्रकार है- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन्य और ब्रह्मचर्य। इस क्रम का कारण कषाय के अभाव के क्रमानुसार है।
कषायें चार प्रकार की हैं- क्रोध, मान, माया और लोभ। क्रोध कषाय के अभाव से उत्तम क्षमाधर्म, मान कषाय के अभाव से उत्तम मार्दवधर्म, माया कषाय के अभाव से उत्तम आर्जवधर्म और लोभ कषाय के अभाव से उत्तम शौचधर्म प्रकट होता है। इन चारों धर्मों से मनुष्य सत्-स्वरूप निजात्मा का आश्रय कर; उत्तम सत्यधर्म प्रकट करता है। उत्तम धर्म की प्रकटता से सत्य धर्म की आत्मा के प्रदेशों का परिस्पन्दन नियन्त्रित और वृत्ति-प्रवृत्ति नियन्त्रित होने से उत्तम संयमधर्म प्रकट होता है। उत्तम संयमी की संसार-शरीर सम्बन्धी समस्त इच्छाओं का निरोध हो जाता है। उससे उत्तम तपधर्म प्रकट होता है। उत्तम तपधर्मों के राग-द्वेष आदि का अभाव और विषय-भोगादि के निरोध से उत्तम त्यागधर्म प्रकट होता है। उत्तम त्यागधर्म के बाह्याभ्यन्तर चौबीस भेदरूप परिग्रह किञ्चित् भी न होने से उत्तम आकिञ्चन्यधर्म प्रकट होता है। उत्तम आकिञ्चन्यधर्म के अपने शुद्ध ब्रह्म स्वभाव में निमग्न रहने से उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म प्रकट होता है।
पर्व के दिन दश और आत्मधर्म के लक्षण भी दश हैं। इसलिए भव्यों को समझाने के लिए एक-एक दिन, एक-एक धर्म को समझाया जाता है।

उत्तम क्षमाधर्म

मंगलाचरण

क्रोध-अनन्त से दहत है, ज्ञान चेतना-भूप।
उत्तम क्षमाधर्म-भावों से, पावे शान्ति अनूप।।

क्षमाधर्म के पूर्व ‘उत्तम’ विशेषण का प्रयुक्त होना सर्वोत्कृष्ट प्रशंसावाचक एवं सम्यग्दर्शन का सूचक है। उत्तम क्षमाधर्म के सम्बन्ध में आचार्यों ने विविध विवक्षाओं से प्ररूपण किया है; किन्तु सभी का अभिप्राय एक ही है।

‘धवलाजी’ में आचार्यदेव उत्तम क्षमाधर्म का स्वरूप प्रतिपादन करते हुये लिखते हैं- 'निरपराध-स्वरूप निजात्मा के स्वभाव के सम्मुख होकर अपराध को पुनः न होने देना उत्तम क्षमाधर्म है।'१ अपराध का अर्थ है- आत्मा का संसिद्धि के विपरीत प्रवर्तन करना और निरपराध का अर्थ है- आत्मा की संसिद्धि के अनुकूल प्रवर्तन करना।

अज्ञानी, मिथ्यादृष्टियों द्वारा त्रासपूर्वक अपने शरीर का वध होता हुआ जानने पर भी अवध्य-स्वरूपी निजात्मा के परम ब्रह्मभावमयी साम्यभाव में स्थित रहना; उत्तम क्षमा है और उससे प्रकट समरसी-भावमयी परमानन्द उत्तम क्षमाधर्म है।२

अज्ञानीजनों द्वारा अप्रिय, कटुक, कठोर वचन बोलने या त्रास देने के भावरूप जो उद्यम वर्त रहा है, वह मेरे द्वारा बाँधे गये पूर्वकृत कर्मों का फल है। उनका कोई दोष नहीं है। यह प्रथम प्रकार की उत्तम क्षमा है। अज्ञानीजनों को मुझे ताड़ने का, मेरा वध आदि करने का भाव हुआ है, वह मेरे सत्कृत (पुण्य) से दूर हुआ- यह द्वितीय प्रकार की उत्तम क्षमा है।३ दोनों प्रकार की उत्तम क्षमा से मुझे आकाशवत् निर्मल, अखण्ड आत्मानन्द का प्रकट होना, उत्तम क्षमा-धर्म है।

क्रोध की उत्पत्ति के निमित्त असह्य आक्रोश आदि के सम्भव होने पर कालूष्यभाव नहीं होना क्षमा है।४

मुनि भगवन्त अपने शरीर की स्थिति अल्प जानकर, समाधि-स्वरूप रहने के लिए, अपना सङ्ग छोड़कर अन्य आचार्य-भगवन्तों के सङ्घ में जाते हैं। उस समय मार्ग में यदि दुर्जन उपहास, अवज्ञा, ताड़न, शरीर का व्यापादन (वध) करें तो भी उनके प्रति कलुष
१. ध.१२.१. नि.सा.ता.वृ. ११५। २. नि.सा.ता.वृ. ११५। ४. क्रोधोत्पत्तिनिमित्तासह्यक्रोशादिरसम्भवे कालूष्योपशमः क्षमा।

परिणाम न होना उत्तम क्षमा है।१ उससे प्रकट ज्ञानशरीरी निज शुद्धात्मा का आनन्द-स्वरूप सुखारस उत्तम क्षमाधर्म है।

क्षमा वह है जहाँ क्रोध न हो अर्थात् जीव को अनिष्टकारक, पीड़ादायक निमित्त-कारणों के मिलने पर स्वयं के परिणामों में क्रोध की उत्पत्ति न होना और साम्यभाव में बना रहना उत्तमक्षमा है।

जिस प्रकार सम्यग्दर्शन कारण है और सम्यग्ज्ञान कार्य है, सम्यग्ज्ञान कारण है और सम्यक्चारित्र कार्य है, उसी प्रकार उत्तम क्षमा कारण है और उत्तम क्षमाधर्म कार्य है। कारण में कार्य का उपचार कर व्यवहार नय की विवक्षावश उत्तम क्षमा को ही उत्तम क्षमाधर्म से निरूपित किया है।

उत्तम क्षमाधर्म के स्वरूप का प्रतिपादन विविध विवक्षाओं से किया जाता है-
१. निज शुद्धात्म-स्वरूप के अभिमुख रहना उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट शुद्धात्म-स्वरूप का आनन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
२. निज शुद्धात्म-स्वरूप को सर्वदेव के ज्ञानानुसार मानना, जानना और उसी में रम जाना, उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट सर्वज्ञदेवमयी निज आत्मानन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
३. काय-वचन-मन की स्वशुद्धात्मा में एकाग्रता; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अयोग-स्वरूपी परमानन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
४. आत्मा-अनात्मा के भिन्नत्व भाव की प्रकटता; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट आत्मा का आत्मीय अभिन्नत्व का आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
५. निज शुद्धात्म-गुणों का सम्वर्धन करना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अनन्त शुद्ध गुणमयी निजानन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
६. निजाल-स्वभाव को स्वस्थ-सुरक्षित रखने का भाव; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट स्वरूपस्थ रहने का परमानन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
७. निर्विकार निजाल-स्वरूप प्राप्ति का पुरुषार्थ; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अविकार-स्वरूप निजात्मानुभूति; उत्तम क्षमाधर्म है।

१. स.सि. ९/५।

८. क्रोध-कषाय के अभाव से सम्यग्दर्शनसहित अक्रोध-स्वरूप में निमग्न रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट शाश्वत, शान्तिमयी अतीन्द्रिय आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
९. क्रोध-कषाय की उत्पत्ति के कारणभूत उपसर्ग आदि के होने पर पृथ्वी की भाँति क्षमा-स्वभावी निज शुद्धात्मा में स्थित रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अचल निजात्मानन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१०. पर-निमित्तक व्यग्र भावों से निज उपयोग को व्यावृत्त/पृथक् करके अनिमित्तक अव्यग्र-भावमयी, सहज शान्ति-स्वरूप निजात्मा में निमग्न रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट शान्तस्वरूप सुखानुभूतिरस; उत्तम क्षमाधर्म है।
११. बाह्य में उत्तम क्षमाधर्म के स्वरूप का प्रतिपादन विविध विवक्षाओं से किया जाता है-
१२. स्वयं के द्वारा कृत-कारित-अनुमोदित दोषों की निवृत्तिपूर्वक निर्दोष स्वभावी निजात्मा के आश्रय से निगुर्छन, निर्दोष परिणामों का होना; उत्तम क्षमा है। उससे अप्रकट, अकारित, अननुमोदित समरसीभावमयी निजात्मानुभूतिरूप आनन्द; उत्तम क्षमाधर्म है।
१३. जगत् में प्रत्येक वस्तु का परिणमन स्वकीय योग्यतानुसार ही है। अपना भला-बुरा, हित-अहित अपने ही परिणामों से होता है। पर से नहीं होता है। पर-वस्तु का परिणमन स्वतन्त्र है। ऐसा जानकर परिणामों को उद्विग्न न कर, सहज शान्तिस्वरूप रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट सहज समता-स्वरूप निजात्मानुभूतिरूप आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१४. मिथ्यात्व के कारण जीव के श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र का परिणमन अन्यथा होने से उपयोग व्यग्र हो रहा है। उपयोग की व्यग्रता का शमन सम्यग्दर्शनज्ञान-चारित्र से करना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट रत्नत्रयी साम्य-भावमयी निजात्मानुभूतिरूप आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१५. जीव, परार्थ-दृष्टि के कारण मूढ़ हो रहा है। मूढ़ता से उपयोग में अत्यन्त क्लेशित होता है। जीव द्वारा अपनी मूढ़ता को छोड़कर अपने द्रव्यत्व, गुणत्व, पर्यायत्व की शुद्ध दृष्टि को दृढ़ करना; उत्तम क्षमा है। उससे निर्मूढ़, प्रकट मोक्षविहीन

सद्भाव-स्वभाव उत्तम क्षमाधर्म

साम्यभावमयी, अकषाय, परमानन्द-स्वरूप सुखप्रस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१६. जीव, अनादि के अकषाय-स्वभावी निजात्म-तत्त्व को विस्मृत कर, काषायिक भावों में सुख के भ्रम से प्रवर्तन करता आ रहा है। इन काषायिक भावों से विमुक्त, अकषाय-स्वरूप निजात्मा में निमग्नता; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट निष्कषायमयी वीतराग परमानन्दस्वरूप की अनुभूतिरूप सुख रस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१७. वस्तु-स्वातंत्र्य के बोध बिना, पर-द्रव्यों के परिणमन में इष्ट-अनिष्ट की कल्पना से उपयोग उद्दलित हो जाता है। उद्दलित उपयोग को वस्तु-स्वातंत्र्य का बोध कराकर पर-द्रव्यों के परिणमन में इष्ट-अनिष्ट की कल्पना को विलोपित करना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट निज शुद्धात्मा का अकम्प ज्ञाननन्दस्वरूप सुखप्रस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१८. पर-द्रव्य-गुण-पर्याय का अकर्तृत्व का परिणमन; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट स्वतन्त्रता एवं स्वावलम्बनरूप परम शान्तिस्वरूप सुखप्रस; उत्तम क्षमाधर्म है।

शुद्धभाव-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

शुद्धभावस्वरूप उत्तम क्षमाधर्म से आत्मा के सर्व गुणों में उत्तरोत्तर शुद्धि की वृद्धि होती है। दर्शन, ज्ञान, चारित्र में जितने-जितने अंशों में रागरूप अशुद्धि का अभाव होता जाता है, उतने-उतने अंशों में वीतरागता की वृद्धि होती जाती है, जो कि कर्मों के अवबन्धन और मोक्ष का कारण है। दूसरे शब्दों में, जीव को पराय-दृष्टि का विलाय और द्रव्यत्व-दृष्टि का प्रादुर्भाव (प्राकट्य) होता है और आत्मा के अनन्त गुणों में उत्तरोत्तर शुद्धि की वृद्धि होती जाती है।
जगत् में जीव जो भी कार्य करता है वह स्वयं के हित के लिए करता है। उत्तम क्षमाधर्म का धारण भी आत्महित के लिए करता है। आत्महित की दृष्टि से किये गये कार्यों से आत्मा में शुद्धि की वृद्धि होती है। यथा; उत्तम क्षमाधर्मी १०८ यशोधर मुनिराज के समागम में रानी चेल्हना सहित राजा श्रेणिक आया। महामुनिराज से धर्म-वृद्धि का आशीर्वाद सुनने से राजा श्रेणिक के क्रोधरूप कलुषता का नाश और शुद्ध भावों की अतिशय वृद्धि हुई।

सुख-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

उत्तम क्षमाधर्म सुख-स्वरूप है। जीवों को बाह्य-अभ्यन्तर में कोई दुःख नहीं होता है; क्योंकि जगत् के समस्त द्रव्यों का परिणमन स्वकीय योग्यतानुसार होता है। कोई भी द्रव्य, किसी अन्य द्रव्य को परिणमाता नहीं है। पर-द्रव्यों के परिणमन को अनुकूल-प्रतिकूल न समझने से इस लोक और परलोक सम्बन्धी समस्त दुःखों का नाश और सहज आत्म-सुख प्रकट होता है।

अनिष्ठ-अभावस्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

उत्तम क्षमाधर्मी को कोई भी द्रव्य अनिष्ट प्रतीत नहीं होता है। पर-द्रव्यों के प्रति अनिष्ट प्रतीति तो मन की भ्रान्ति है, द्वेषरूप क्रोध है। किसी भी जीव का क्रोधरूप परिणमन, पर-जीवों की अनिष्टरूप नहीं होता है, अपितु स्वयं का ही अनिष्ट होता है। उत्तम क्षमाधर्म का धारक तो पर के क्रोध को उसका औदयिक भाव जानकर उत्तम क्षमाधर्ममय रहता है, पर के प्रति उदासीन रहता है।

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

साम्यभावमयी, अकषाय, परमानन्द-स्वरूप सुखरस; उत्तम क्षमाधर्म है।

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४०

अनिष्ट-अभावरूप उत्तम क्षमाधर्म- उत्तम क्षमाधर्मी को कोई भी द्रव्य अनिष्ट प्रतीत नहीं होता है। पर-द्रव्यों के प्रति अनिष्ट प्रतीति तो मन की भ्रान्ति है, द्वेषरूप क्रोध है। किसी भी जीव का क्रोधरूप परिणमन, पर-जीवों को अनिष्टरूप नहीं होता है, अपितु स्वयं का ही अनिष्ट होता है। उत्तम क्षमाधर्म का धारक तो पर के क्रोध को उसका औदयिक भाव जानकर उत्तम क्षमाधर्ममय रहता है, पर के प्रति उदासीन रहता है।

उत्तम क्षमाधर्म नय-दृष्टि से- निश्चयनय-दृष्टि से जीव न तो स्वयं क्षमा कर सकता है और न ही क्षमा करा सकता है। वह तो स्वयं क्षमास्वरूप है।

व्यवहारनय-दृष्टि से जीव क्षमा करता भी है और दूसरों से क्षमा करवाता भी है। सामायिक पाठ में बोलते हैं- मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें। मेरा किसी से भी वैर-भाव नहीं है। समाधि-मरण के समय भी सब जीवों से क्षमायाचना करना और सब जीवों को क्षमा करने का विधान है। १००८ तीर्थकर पार्श्वनाथ के जीव ने पूर्व के दश भवों तक उपसर्गकर्ता कमठ के प्रति क्षमा-भाव रखा।

राजा श्रेणिक ने १०८ यशोधर महामुनिराज के गले में मृत सर्प डाला, सर्प के शव पर असंख्यात चींटियाँ उत्पन्न हो गईं। चींटियों ने मुनिराज के शरीर को भी दंश कर छलनी जैसा कर दिया। मुनिराज पर उपसर्ग ज्ञात होने पर राजा श्रेणिक की रानी चेलना ने उपसर्ग दूर किया। क्षमाधर्मी महामुनिराज ने दोनों को धर्म-वृद्धि का आशीर्वचन कहा। पाँचों पाण्डव महामुनिराजों को उनके ही मामा कर्मयूधाय ने तप्त लोहे के कड़े पहनाये तो भी महामुनिराज आत्म-ध्यानस्थ रहे। उत्तम क्षमाधारी मुनिराजों को कड़े पहनाने वाले के प्रति क्रोध उत्पन्न नहीं हुआ।

राजा ने सुदर्शन सेठ को शूली पर चढ़वाया। धर्म के प्रभाव से शूली; सिंहासनरूप परिणमित हो गई। उत्तम क्षमाधर्मी सुदर्शन सेठ को राजा के प्रति क्रोध नहीं आया, अपितु उत्तम क्षमाभाव बना रहा।

उत्तम क्षमाधर्म की दृढ़तार्थ चिन्तवन- जीव को उत्तम क्षमाधर्म की दृढ़तार्थ एवं सम्वृद्धि के लिए सदैव ऐसा चिन्तवन करना चाहिए कि कोई देव या मनुष्य मुझे देखकर क्रोधित हो; अप्रिय, अशिष्ट वचनालाप करे, उससे मेरा कोई अहित नहीं है; अपितु क्रोध करने वाले का ही अहित होता है। यदि मैं क्रोध करने वाले का अपराधी हूँ तो वह सत्य ही तो बोल रहा है। मुझे अपराधों से निवृत्त होना चाहिए। यदि मैं निरपराध हूँ तो उसका वचनालाप अज्ञान- जन्य है, मिथ्या है। यह तो उसके क्रोध कषायोदय का ही परिचायक है।

१. खम्मामि सव्व जीवाणां… सा. पाठ।

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन 8

यदि कोई मनुष्य मुझे गालियाँ दे तो उसने गालियाँ ही तो दी हैं, मैंने तो नहीं ली हैं। उसने गालियाँ ही तो दी हैं, पीटा तो नहीं। पीटा है तो मुझे ताड़ना ही दी है, वध तो नहीं किया। वध करने पर, वध तो किया, मेरा आत्मधर्म तो नष्ट नहीं किया है। क्रोधी मनुष्य ने मुझ पर क्रोध कर, मेरे उत्तम क्षमाधर्म की परीक्षा कर, मेरा महान् उपकार किया है। उपकारी पर मित्रवत् क्षमाभाव रखना ही श्रेयस्कर है। जिस प्रकार साहूकार से लिया ऋण समयसीमा में अदा कर देना ही योग्य है, उसी प्रकार पूर्वोपार्जित पाप कर्मों का ऋण अदा करने का समय कर्मोदय में आया है तो यह उत्तम अवसर है। इस दुःख की घड़ी में मुझे क्षमा-स्वरूप शान्त-भावमय रहना ही श्रेयस्कर है। मैं तो पूर्वोपार्जित कर्मों के ऋण से मुक्त हो रहा हूँ। १

उत्तम क्षमाधर्म को दृढ़ एवं स्वस्थ रखने के लिए सदैव मङ्गल-कारक, मङ्गल-वर्धक भावों से वचनालाप करना चाहिए। यदि कोई मनुष्य अमङ्गलरूप वचन बोले तो उसे अनसुना कर दें अथवा अमाङ्गलिक शब्दों का अर्थ, माङ्गलिक करें। जैसा कि १०५ क्षुल्लक गणेशप्रसादजी वर्णीजी ने किया है- “कोई मनुष्य मुनिराज को नङ्‌ङ्गा-लुच्चा कहे तो, यह सत्य कह रहा है, मुनिराज नग्न-दिगम्बर रहते हैं और केशों का लुञ्चन करते हैं। इसमें अमङ्गल क्या कहा? कुछ भी नहीं। यदि लाकड़ा-पड़ा कहे तो, उसमें क्या बुरा कहा? मुनिराज शारीरिक श्रम के शमनार्थ लकड़ी के पाटे पर पड़ते हैं। यदि कोई सत्यानाशी कहे तो यह समझो कि वह कह रहा है कि तुम्हारे सात कर्मों का नाश हो, आयुकर्म मात्र शेष रहे। यदि अद्यानाशी कहे तो यह समझो कि वह कह रहा है कि तुम आठों कर्मों का नाश कर मोक्ष प्राप्त करो। इस प्रकार जगत्-मान्य अमाङ्गलिक अर्थ प्रकट करने वाले वाक्यों के श्रवण में भी माङ्गलिक अर्थ को प्रकट करने वाले भाव रखने से क्रोध की अनुत्पत्ति और उत्तम क्षमा-धर्म की दृढ़ता एवं सम्वृद्धि होती है। लोक में भी प्रचलित है- ‘गँवार की गाली हँसकर टाली।’

उत्तम क्षमाधर्म की महिमा - क्रोध कषाय के अभाव से उत्तम क्षमाधारी मुनीश्वर समस्त पाप-कर्मों का क्षय करते हैं। वे वर्तमान में सज्जन पुरुषों के द्वारा प्रशंसनीय और अतिशय पूज्य होते हैं, भवान्तर में देव और मनुष्य-पर्याय धारण कर निर्वाण प्राप्त करते हैं।२ १. भ.आ.मू. १४२० से १४२६ तक।

२. पावं खवइ असेसं खमाए पडिमंडिओ य मुणिवरो।

खेयर अमरणराणं पसंसडीओ धुवं होई ।। भा.पा.मू. १०८

OS 24 श

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

उत्तम क्षमाधर्म के धारक; अपने ऊपर उपसर्ग आदि अपराध करने वालों का शीघ्र ही प्रतिकार करने में समर्थ होते हुये भी, प्रतिकार न कर, उनके प्रति उत्तम क्षमा-भाव रखते हैं। उत्तम क्षमारूप धर्मामृत का समीचीनतया सेवन करने वाले साधु समस्त पापों को नष्ट कर देते हैं।१

उपवास आदि तपश्चर्या करने वाले निःसंदेह महान् हैं, किन्तु उनसे भी महान् वे होते हैं, जो अपनी निन्दा करने वालों को क्षमा कर देते हैं।२

उत्तम क्षमाधर्म समस्त सज्जन पुरुषों का सर्वोत्तम आभूषण है और परम रसायन भी है, उसके सेवन से समस्त पाप-कर्मों का क्षय होता है। अतः तपश्चर्या से भी उत्कृष्ट परमामृत रसायन उत्तम क्षमाधर्म है। उत्तम क्षमाधर्मी पर-कृत अपराधों को विस्मृत कर, अपराधी के प्रति भी समत्व एवं मित्रवत् व्यवहार करता है।

उत्तम क्षमाधर्म से आत्मा के सर्व गुणों में विशिष्ट निर्मलता आती है। वीतराग चारित्र की अद्वितीय अनुपम वृद्धि होती है। कर्म-निरपेक्ष अतीन्द्रिय सुख की सम्वृद्धि होती है। उत्तम क्षमाधर्म-धारक के बाह्य और अभ्यन्तर में भी कोई शत्रु नहीं होता है। उसे इस भव में यश और पर-भव में सुख प्राप्त होता है। उत्तम क्षमाधर्मी का सद्व्यवहार लोक में अनुकरणीय और पूज्य होता है। उत्तम क्षमाधर्म, इस लोक और परलोक सम्बन्धी दुःखों का हरण करता है, उससे मोक्ष-सुख की सम्वृद्धि होती है।

उत्तम क्षमाधर्म-धारण करने पर द्रव्यों के प्रतिकूल परिणमन से उनके प्रति अनिष्टता भासित नहीं होती है क्योंकि; पर-द्रव्यों का परिणमन; पर का स्वभाव और निज द्रव्य का परिणमन; निज का स्वभाव प्रतीत होता है।

उत्तम क्षमाधर्म का धारक स्वयं अविचल, शाश्वत, अनुपम शान्तिस्वरूप अद्वितीय आत्मानन्द की अनुभूति करता है तथा वह अनेक समागत भव्यात्माओं को उत्तम क्षमाधर्म का प्रतिबोध कराता हुआ, उन्हें भी अतीन्द्रिय निजात्मा का संवेदन कराता है। उत्तम क्षमाधर्मी; उपसर्ग-कर्त्ता को परीक्षक और स्वयं को परीक्षार्थी मानता है। वह उपसर्ग में भी उत्तम क्षमाधर्म में स्थित रहता हुआ स्वयं को क्षमाधर्म का सम्यक् परीक्षित अनुभवता है। परीक्षा में सम्पूर्ण सम्यक् सफल होने से समस्त क्रोध कषाय का क्षय होता है। १. अ.ध. ६/५। २. कु.का. १६/१०।

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४०

उत्तम क्षमाधर्म; वीर पुरुषों का भूषण है।१ वीर पुरुष वह है, जो स्वयं विशेषरूप से रत्नत्रयमयी हो और अन्य पुरुष को रत्नत्रयमयी मोक्ष के प्रति परिणमित रहने की प्रेरणा करे।२ वीर पुरुष सुरक्षित शाश्वत निज शुद्धात्मा में स्थित रह ज्ञानानन्दमयी स्वात्मा का रसपान करते हैं।

उत्तम क्षमाधर्म का फल- उत्तम क्षमाधर्म धारण करने का फल; राष्ट्र, समाज, परिवार में अद्वितीय शान्ति है तथा स्वयं के उत्थानरूप श्रेयस मार्ग में अविकल गमन होता है। उत्तम क्षमाधर्म के साथ ही आत्मा के समस्त गुण-धर्मों में शुद्ध स्वरूप से परिणमन होता है। उत्तम क्षमाधर्म; मोहान्धकार, विषयान्धकार, अज्ञानान्धकार, कर्मबन्ध एवं सर्व दुःखों का नाशक है तथा अभ्यन्तर में आत्मशान्तिदायक, तीन लोक में सारभूत है; चैतन्य रस का रसायन, ज्ञानामृत का सागर; व्रत, शील, संयम, तप, चारित्र का वर्धक है।

क्षमा से दुःखदायी पूर्व-सञ्चित कर्म नष्ट हो जाते हैं तथा विद्वेष और भय से रहित हो, चित्त शुद्ध हो जाता है।३

क्षमा; शक्तिहीन जीवों का बल है, शूरवीर जीवों का क्षमा आभूषण है। क्षमा से वशीकृत लोक में क्या-क्या सिद्ध नहीं होता है? अर्थात् सबकुछ सिद्ध होता है।४

क्षमा के समान तप नहीं, क्षमा के समान दूसरा कोई सदाचरण नहीं, क्षमा के समान कोई हित नहीं, क्षमाधारियों के समान कोई जीवन नहीं।५

क्षमा शान्ति है, शस्त्र है, श्रेयस्कर है, धैर्य है, धन है, रक्षा-कवच है, माता है, बन्धु है, लक्ष्मी है, शोभा है, कीर्ति है, सत्य है। क्षमा में शौच-पूजा-दान-मङ्गल-उत्तमता-शरण इत्यादि सर्व गुण समाहित हैं।६

क्षमा; मुक्तिवधू की सखी है। मनुष्यों को क्षमा; कल्पवृक्ष के समान सुख देने वाली है। क्षमा; कर्म-शत्रुओं से रक्षा करने वाली है। क्षमा; समतारूपी धन को उत्पन्न करने वाली माता के समान है। क्षमा; धर्मरत्न की खानि (खदान) है।७

१. क्षमा वीरस्य भूषणं। २. विशेषेण ईरयति मोक्षं प्रति प्रेरयति गमयति प्राणिनः इति वीरः। स.सि. ९/६। ३. क्षम या क्षयते कर्म दुःखदं पूर्व-सञ्चितम्। चित्तं च जायते शुद्धं विद्वेषभयवर्जितम्।।१५।।द.ध.स्क.। ४.क्षमा बलमसक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा। क्षमा वशीकृतो लोकः क्षमया किं न साध्यते ।।१३।।द.ध. स्क.। ५. क्षमासमं तपो नास्ति. क्षमा तुल्यं न सव्रतम्। क्षमामं न हितं किञ्चित् क्षमाभ न च जीवितम्।।१४।।द.ध. स्क.। ६. दशधर्म स्कन्ध पृ. २६। ७. दशधर्म स्कन्ध पृ. २७। -७४

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४०

उत्तम क्षमाधर्म सम्यग्दर्शन-सहित होता है- उत्तम क्षमाधर्म सम्यग्दर्शन-सहित होता है। सम्यग्दर्शन के होने पर आत्मा में जैसी परम शान्ति प्रकट होती है, वैसी मिथ्यात्व के रहते हुये नहीं होती है। मिथ्यात्व के साथ बाह्यरूप-क्षमा का भाव तो हो सकता है, किन्तु उत्तम क्षमाधर्म नहीं होता है।

सम्यग्दर्शन-रहित जीवन बाह्य में विषय-प्रतिकूलता होने पर भी क्रोध न करे तो भी उसे अभ्यन्तर में क्रोध की सत्ता परिपूर्णरूप से विद्यमान है। उसकी बाह्यरूप-क्षमा; उत्तम क्षमाधर्म नहीं है। मनुष्य ने मिथ्यात्व के साथ निग्रंथ, जिनलिङ्ग धारण कर, घोर उपसर्गों को सहन किया, उपसर्गकर्ताओं पर रञ्च-मात्र भी क्रोध नहीं किया है तो भी अभ्यन्तर में क्रोधरूप भाव विद्यमान हैं। उसे सम्यग्दर्शन के अभाव से क्षमा-स्वरूप आत्म-विशुद्धि न होने से उत्तम क्षमाधर्म नहीं होता है।

मिथ्यादृष्टि का निर्ग्रन्थ-जिनलिङ्ग धारण करना मात्र अभिनयरूप है। जैसे किसी रङ्क ने राजा का अभिनय तो यथावत् किया, किन्तु उसे राजकीय वैभव की सम्पन्नता नहीं है, वह तो रङ्क ही है। यद्यपि जिनलिङ्ग धारण कर वह स्वर्गादिक गति में तो जाता है, किन्तु मोक्ष नहीं होता है।

अब हम क्षमाधर्म के घातक; क्रोध के स्वरूप, भेदों और शमन के उपायों पर विचार करते हैं-

क्रोध कषाय

जीव को स्वयं के प्रति या दूसरों के प्रति अपकार या अनुपकार आदि करने के क्रूर परिणाम; क्रोध१ है अथवा निष्ठुर, निर्दयी, भयप्रद, उत्पात आदि के परिणाम; क्रोध है। यह पाषाणरेखा, पृथ्वीरेखा, धूलिरेखा और जलरेखा के समान चार प्रकार का है।२

क्षमा की अप्रकटता ही; क्रोध है अर्थात् क्षमा को आवरित रखने वाला; क्रोध है। क्रोध एक काषायिक भाव है जो उत्तम क्षमाधर्म का घातक है। क्रोध के वशीभूत जीव विवेक-विहीन हो जाता है। उसे अन्य जनों का उत्कर्ष नहीं सुहाता है, ईर्ष्या-भाव रखता है। वह स्व-पर के घात करने के परिणाम एवं तद्नुसार परिणमन/प्रवर्तन करता है। क्रोध की तीव्रता से उसके हृदय में दाह, नेत्रों में लाली, शरीर के अङ्गों में कम्पन, वचनों में प्रलाप आदि दोष प्रकट हो जाते हैं, जो सभी को प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं।

१. राजवार्तिक ८/९। २. गो.जी.का. पृ. २८४

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

क्रोध के निमित्त से जीव के हाव-भाव उग्र और हिंसक हो जाते हैं, मस्तिष्क विकृत हो जाता है। मस्तिष्क को लगभग २० प्रतिशत रक्त की मात्रा पर्याप्त होती है किन्तु, क्रोध की अवस्था में रक्त की मात्रा अधिक हो जाती है, उससे मुख, नेत्र लाल हो जाते हैं। उसके वचन अप्रिय, कटुक, कठोर, अशिष्ट, स्व-पर की पीड़ाकारक निकलते हैं, यहाँ तक कि शरीर में रक्त का प्रवाह असन्तुलित हो प्राणान्त तक हो जाता है। क्रोध के वशीभूत जीव स्व-पर का घात कर डालता है।

क्रोध; नरक आदि दुर्गति का कारण है। जैसे द्वीपायन मुनि को क्रोध-कषाय के उदय से क्रोध उत्पन्न हुआ, उससे उनका विवेक नष्ट हो गया। उनके अशान्तरूप व्यग्र परिणाम उग्र हो गये, उससे उनके बायें कन्धे से एक हाथ का अशुभ तैजस शरीर निकला, जिससे द्वारिका नगर का दहन हो गया और स्वयं का भी दहन हो गया।

उत्तम क्षमाधर्म का धारी क्रोध को अपने से भिन्न ज्वर की भाँति रोग जानता है। जैसे ज्वररोग शारीरिक बाह्य-अभ्यन्तर के विकृत कारणों से उत्पन्न होता है। ज्वर में शरीर उष्ण हो जाता है, जो कि शरीर का ही परिणमन है। उसका उपचार करने से ज्वर का शमन हो जाता है। शरीर उष्णता-रहित स्वाभाविक मूल स्वभाव में आ जाता है। वैसे ही क्रोध भी आत्मीक बाह्य-अभ्यन्तर कारणों के विकारी होने से उत्पन्न होता है। बाह्य कारण है- पर पदार्थों के प्रति प्रतिकूलता की मान्यता एवं क्रोध-कषाय का उदय और अभ्यन्तर कारण है- आत्मा का विभावरूप परिणमन होने की योग्यता। क्रोध में आत्मा का परिणमन अति व्यग्ररूप परिस्पन्दित होता है और तद्नुसार शारीरिक परिणमन होता है। निष्कषाय-स्वरूप निजात्मा के आश्रयरूप उपचार से आत्मा सहज शान्त-स्वरूप हो जाता है।

जैसे; ज्वररोग शरीर का ही परिणमन है, शरीर से भिन्न कोई स्वतन्त्र परिणमन नहीं है। ज्वर; ज्वर है, शरीर नहीं; शरीर; शरीर है, ज्वर नहीं; वैसे ही क्रोध आत्मा का ही परिणमन है, आत्मा से भिन्न कोई स्वतन्त्र परिणमन नहीं है। क्रोध; क्रोध है, आत्मा नहीं। आत्मा; आत्मा है, क्रोध नहीं।

यदि क्रोध, आत्मोपयोग में हो तो, क्रोध को आत्मोपयोगरूप हो जाना चाहिए और यदि आत्मोपयोग में क्रोध हो तो आत्मोपयोग को क्रोधरूप हो जाना चाहिए। जबकि ऐसा है नहीं। यदि ऐसा होता तो अचेतन-स्वरूपी क्रोध और चेतन-स्वरूपी आत्मा, दोनों एक हो जाते, दोनों द्रव्यों का लोप हो जाता और अनवस्था दोष उत्पन्न होने से सर्व द्रव्यों का लोप हो -७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन 8

जाता। अतः स्पष्ट है आत्मा का उपयोग; उपयोग है। उपयोग में क्रोध नहीं, क्रोध में उपयोग नहीं है। १

उत्तम क्षमाधर्म और क्रोध कषाय में अन्तर

उत्तम क्षमाधर्म

क्रोध कषाय

• उत्तम क्षमाधर्म का जनक; सम्यग्दर्शन है। • क्रोध का जनक; क्रोध कषाय का उदय है। • निरपराध स्वरूप है।

• अव्यग्र, शान्त उपयोग है।

• पर द्रव्यों की अनुकूलता-प्रतिकूलता के

अभावरूप भाव है।

• त्रैकालिक सहज शुद्ध भाव है।

• सादि-अनन्त परम पारिणामिक भाव है।

• बाह्य-अभ्यन्तर, आत्म-रक्षक एवं

सुखस्वरूप भाव है।

• अकषायमयी शुद्धात्म-धर्म है।

• अपराध स्वरूप है।

• व्यग्र, अशान्त उपयोग है।

• पर द्रव्यों के प्रति प्रतिकूलता का भाव है।

• तात्कालिक, असहज विकारी भाव है।

• सादि-सान्त औदयिक भाव है।

• बाह्य-अभ्यन्तर का आत्मघातक

दुःखस्वरूप भाव है।

• सकषायरूप अशुद्धात्मा का विकार है।

क्रोध- क्रोध के एकार्थवाची नाम हैं- रोष, गुस्सा, विद्वेष, कोप आदि- जो दुर्गति की उत्पत्ति के लिए जीव की मनोभूमि को कृष करे, वह क्रोध है। जैसे कृषक; फसल की उत्पत्ति के लिए खेत की मिट्टी को वक्र, नुकीले और धारयुक्त उपकरणों से कृष करता है, वैसे ही जीव दुर्गति-गमन के लिए पीड़ाकारक, वधकारक, अहितकर क्रोधरूप परिणाम करता है। उत्तम क्षमाधर्म-घातक क्रोध-कषाय की उत्पत्ति के कारण-

उत्तम क्षमाधर्म-घातक बाह्य कारण क्रोध कषाय का उदय है और उस क्रोध की उत्पत्ति के बाह्य साधनरूप कारण अनेक हैं। यथा-रोष, गुस्सा, विद्वेष, कोप, शत्रुता, घृणा, तिरस्कार, विरोध, विपरीतता, पर में एकत्व, पर में अभिन्नत्व, अव्यवस्था, मतभेद, परतन्त्रता, पर-सम्बन्ध, कुसङ्गति, बन्धन, अक्रमिकता, निन्दा आदि साधनभूत अनेक कारणों से क्रोध की उत्पत्ति होती है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

क्रोध-कषाय की उत्पत्ति के अन्य और भी अनेक कारण हैं- यथा एकान्त का अभाव, अनेकता, बहुत्व, अव्यवस्था, असङ्गति, अमेल (मेल न होना), पर से सम्बन्ध, अनुपयुक्तता, १. स.सा. गा. १८१।

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

विपत्ति, सङ्कट, यातना आदि। इनमें उपयोग जाने से क्रोध उत्पन्न होता है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है अर्थात् उत्तम क्षमाधर्म प्रकट नहीं होता है।

रोषरूप क्रोध- जीव को जब सांसारिक-शारीरिक प्रतिकूलता भासित होती है तब

वह प्रतिकूलता और प्रतिकूल सामग्रियों के प्रति नाराज हो जाता है और रुक-रुककर उग्र कलुषित परिणाम होते हैं, वह रोषरूप क्रोध है। जैसे किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा इच्छानुसार कार्य/परिणमन न होने पर उसे डाँट देना, थोड़े समय के पश्चात् अकारण उसी कार्य पर से पुनः-पुनः डाँटना; रोषरूप क्रोध है। इसके निमित्त से जीव के प्रदेशों का अशुभरूप परिस्पन्दन होता है और कृष्ण-वर्णी अशुभ कर्मों का बन्ध होता है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

रोषरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए-

'बाह्य पदार्थों का परिणमन हमारी इच्छानुसार नहीं होता है। अनादिनिधन वस्तुएँ अपनी- अपनी मर्यादा लिये स्वयमेव परिणमन करती हैं। उन्हें कोई परिणमाता नहीं है। १ बाह्य पदार्थों का परिणमन उत्तम क्षमाधर्म की प्राप्ति एवं वृद्धि के लिए साधक-बाधक नहीं है। उनके प्रतिकूल परिणमन से रोष करना मिथ्या है। अतः अरोष-स्वरूपी निज शुद्धात्मा के आश्रय से उत्तम क्षमाधर्म का संवेदन करने के भाव से रोष ऐसे विलय हो जाता है जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार विलय हो जाता है। अतः जीव को निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना श्रेयस्कर है।

गुस्सारूप क्रोध- जीव को चेतन-अचेतन पदार्थों का परिणमन अपने प्रतिकूल प्रतिभासित होने पर जो तीव्र उद्वेगरूप विकृत भाव होता है अर्थात् उसे उच्च स्वर से व्यक्त करते हुये शारीरिक कुचेष्टा करना; गुस्सारूप क्रोध है। गुस्सा से मनुष्य अनर्गल, अप्रिय, कुवचन बोलता है तथा कभी वचनालाप तो नहीं करता है; किन्तु काय से गुस्सारूप कुचेष्टा करता है। जैसे, आँख दिखाना/भौंह चढ़ाना इत्यादि। उससे बच्चे भी समझ जाते हैं कि अभी माता-पिता गुस्से में हैं। बच्चे भी उस काल में माता-पिता से कुछ भी प्राप्ति की इच्छा व्यक्त नहीं करते, वे चुप रहते हैं। वे जानते हैं कि अभी कुछ प्राप्ति नहीं होगी, अपितु हानि हो सकती है। गुस्सा में जीव को परोपकार के भाव नहीं होते हैं, विवेक-शून्य हो जाता है, स्व-पर का घात भी १. मोक्षमार्ग प्रकाशक

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

कर देता है। गुस्सा करने से स्व का घात होने का तो नियम है, परन्तु पर के घात होने का नियम नहीं है, हो भी सकता है और न भी हो। जैसे, राजा अरविन्द ने गुस्से में आकर अपने ही बच्चों को तलवार से मारने का उद्यम किया; किन्तु बच्चों का घात तो नहीं हुआ, अपितु उसी तलवार से स्वयं का घात हुआ और मरणकर नर्क चला गया।

गुस्से में आकर कोई व्यक्ति अन्य किसी को जलाने के लिए अपने हाथ से अङ्‌गारा उठाकर उसके ऊपर फेंके तो अङ्‌गारा उठाने वाले का हाथ तो जलेगा-ही-जलेगा, यह तो नियम है; किन्तु सामने वाला जलेगा, यह नियम नहीं है। जले और न भी जले।

गुस्सारूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

पूर्व कृत परिणामों के फलस्वरूप प्रतिकूल सामग्रियों का संयोग और उनका प्रतिकूल परिणमन हो रहा है, उसमें उन संयोगी सामग्रियों का कोई दोष नहीं है। सामग्रियों पर गुस्सा करने से स्वयं का कोई लाभ नहीं होगा, अपितु विपरीत भावरूप हानि अवश्य होगी। प्रतिकूल संयोगों में उत्तम क्षमाधर्म-स्वरूप असंयोगी निज शुद्धात्मा का मनन-चिन्तवन या पञ्च परमेष्ठियों के नामों का/स्वरूप का मनन-चिन्तवन, उच्चारण करना चाहिए। अतः जीव को सर्वानुकूल निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

विद्वेषरूप क्रोध - अप्रीति, विषाद, अपकार, अदया आदि भावों को विद्वेष कहते हैं। अनिष्ट विषयों में प्रीति, अपकारियों के प्रति बैरभाव, प्रतिकूल पदार्थों के प्रति दुर्भाव रखना; विद्वेषरूप क्रोध है। अरति, शोक, भय, जुगुप्सारूप नो कषाय के असंख्यात भेद; विद्वेष-रूप क्रोध है।

नाम, स्थापना, आगम द्रव्य, नो-आगम द्रव्य, निक्षेप, ज्ञायक, शरीर और भावी निक्षेपों का कथन सुगम है, ऐसा कह कर उनका कथन न करना; श्री जिनेंद्रदेव-प्रणीत अनन्त धर्मात्मक वस्तु का स्वरूप स्याद्वाद शैली से न कर, एकान्त से कथन करना; स्याद्वाद शैली के प्रति क्षोभ होना, गौण नय के प्रति उपेक्षा भाव का होना- विद्वेषरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

विद्वेषरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए, आत्मवस्तु का अनेकान्त स्वरूप दृष्टि में रखकर स्याद्वाद शैली से कथन करना चाहिए। os

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

एकान्त कथन करने से वक्ता और श्रोता दोनों को आत्मधर्म की/उत्तम क्षमाधर्म की प्राप्ति नहीं होती है। मुझे जो प्रज्ञा की प्राप्ति है उसका दुरुपयोग करने से वक्ता-श्रोता अन्यथा श्रद्धानी होकर श्री जिनेन्द्रदेव-प्रणीत वीतराग विज्ञानमयी मोक्षमार्ग से विमुख रह शाश्वत आत्मसुख से वञ्चित रह जायेंगे। भविष्य में प्रज्ञा की प्राप्ति और श्री जिनेंद्रदेव का समागम मिलना दुर्लभ हो जायगा। अतः जीव को अनेकान्त-स्वरूप आत्मवस्तु का कथन नय-सापेक्ष कर, नयातीत उत्तम क्षमाधर्म-स्वरूप निज शुद्धात्मा का अनुभवन करना, निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है। कोपरूप क्रोध - मानसिक एवं शारीरिक मनोवाञ्छित सातारूप सामग्रियों की उपलब्धता न होने पर शरीर की विकृत चेष्टा करना, दूसरों को दुःखी करने के लिए करुण-क्रन्दन करना, बनावटी आकुल-व्याकुल होना; कोपरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। कोपरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

जगत् के जीवों को मनोभिलाषित समस्त साता-सामग्रियों की उपलब्धता तो किसी को भी नहीं होती है। इन सामग्रियों की उपलब्धता पुण्य-कर्म के फल हैं, जो कि सातारूप तो होते हैं; किन्तु सुखरूप नहीं होते हैं। पुण्य-कर्म आत्मा का विभाव-भाव होने से उनके फलों की अभिलाषा नहीं करना चाहिए। अतः जीव को कोपातीत उत्तम क्षमाधर्म-स्वरूप निजात्म सुख में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

शत्रुतारूप क्रोध - जीव को संयोगी चेतन-अचेतन पदार्थों को सुखबुद्धि से भोगनेरूप पञ्चेन्द्रियों के विषय बाह्य शत्रु हैं और उनके प्रति राग-द्वेष के परिणाम अभ्यन्तर शत्रुरूप क्रोध हैं। अर्थात् स्त्री, पुत्र, मित्र आदि चेतन पदार्थ और धन, धान्य, भवन आदि अचेतन पदार्थों को सुखरूप मानकर उनके प्रति अहंकार, ममकार तथा मिथ्यात्व, राग-द्वेष, विषय- कषायरूप परिणाम बाह्यभ्यन्तर शत्रुतारूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। दूसरे शब्दों में, जगत् में जीव के साथ स्त्री-पुत्र, धन, गृह आदि का संयोग-वियोग होना, उनका सहज परिणमन है। उनके परिणमन में कभी जीव का अपने अज्ञानवश सुख- दुःख मानकर अधीर होना तथा स्व शुद्धात्म-स्वरूप के अबोध से द्रव्य-गुण-पर्याय की अन्यथा प्रतीतिरूप कलुष परिणाम करना; शत्रुतारूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। शत्रुतारूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना -os

चाहिए कि-

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन 8

जीव को चेतन-अचेतन पदार्थों का संयोग-वियोग समयानुसार सहज होता है। उनकी

अनुकूलता में राग और प्रतिकूलता में द्वेष भाव नहीं करना चाहिए। अपने द्रव्यत्व-गुणत्व- पर्यायत्व-स्वरूप में स्थिर रह सहज अतीन्द्रिय निजात्म सुख में निमग्न रहना चाहिए। जगत् में कोई भी बाह्य पदार्थ अपना शत्रु नहीं है। यदि कोई शत्रु है तो वह है स्वयं का अज्ञान- भाव है। अतः जीव को साम्यभावरूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना श्रेयस्कर है। घृणारूप क्रोध- जीव अपने अज्ञान से अन्य जनों को दुःखी, दीन, दरिद्री, मलिन, देखकर उनके प्रति हीन भावरूप जो कलुष परिणाम करता है तथा अपनी इच्छा के विरुद्ध एवं वीतराग, विज्ञानमयी मार्ग-परम्परा के विपरीत प्रवर्तन करने वालों के प्रति उपेक्षारूप जो परिणाम होता है, वह घृणारूप क्रोध है। अर्थात् जो जीव तत्त्वार्थों के अबोध के कारण वीतराग श्री जिनेन्द्रदेव की परम्परा के विपरीत वृत्ति-प्रवृत्ति करने वालों को श्री जिनेन्द्रदेव की मूल परम्परा के अनुसार समझाने पर भी न समझे, न माने तो उनके प्रति जो असुहावना, उपेक्षणीय भाव होता है वह घृणारूप क्रोध है। अथवा स्वयं को वीतरागमार्ग-परम्परा का बोध एवं प्रवृत्ति होने पर भी अनर्गल प्रवर्तन करने वालों का स्थितिकरण के भाव से मार्ग-परम्परा का बोध एवं प्रवर्तन न करना, उनके प्रति उपेक्षा भाव रखना; घृणारूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

घृणारूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

श्री जिनेन्द्रदेव की अविकल मोक्षमार्ग की परम्परा के विपरीत वृत्ति-प्रवृत्ति करने वाले जीव करुणा के पात्र हैं। उनके प्रति माध्यस्थ भाव रखना चाहिए। उनकी वृत्ति-प्रवृत्ति स्वकीय योग्यतानुसार हो रही है। प्रत्येक जीव का परिणमन स्वतन्त्र है। एक जीव दूसरे जीव को न तो समझा सकता है और न ही उसके प्रवर्तन को परिवर्तित कर सकता है। मरीचि ने भगवान् श्री जिनेन्द्रदेव के समवशरण में द्विव्य ध्वनि द्वारा मोक्ष एवं मोक्षमार्ग का स्वरूप सुनकर भी मार्ग का सरलीकरण कर अन्यथा प्रवर्तन किया। अतः जीव को सर्व जीवों को सिद्ध सादृश्य समझ कर उनकी वृत्ति-प्रवृत्ति का ज्ञाता-दृष्टा रह, स्वातन्त्र्य-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्मी निजात्मा में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४०

तिरस्काररूप क्रोध- व्यक्ति का स्वयं गुणों से हीन होते हुए भी स्वयं को गुणवान, महान समझना तथा गुणवान, महान, आदरणीय, सम्माननीय, पूज्य पुरुषों का उनके पद के अनुरूप आदर, सत्कार, सम्मान, पूजा आदि न करना; उनको अशिष्ट वचनों से

अपमानित/तिरस्कृत करना; तिरस्काररूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। तिरस्काररूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

व्यक्ति उत्तम गुणों से आदरणीय, सम्माननीय एवं सम्यक्-चारित्र की सम्पन्नता से ही जगत् पूज्य होता है। जगत् के सभी जीव स्वभाव-दृष्टि से तो उत्तम गुणमयी हैं। गुणों के अशुद्ध-शुद्ध परिणमन की अपेक्षा से अपूज्य-पूज्य का अन्तर होता है। जैसे मिट्टी सिर पर धारण करने योग्य नहीं होती है; किन्तु उसका परिणमन जब घटरूप होता है और जल धारण कर तृषित जनों के कण्ठ को शीतलता देता है तो उसी मिट्टी को सिर पर धारण किया जाता है। अतः मिट्टी तिरस्कार के योग्य नहीं है, वैसे ही जो जीव सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक अणुव्रत, महाव्रत धारण कर वीतराग चारित्र से भवाताप से तपित जीवों को भवरहित आत्म-शान्तिरूप शीतलता प्रदान करते हैं। अतः जीव को उनके प्रति यथोचित सम्मान, पूजा का भाव रखते हुए उत्तम क्षमाधर्ममयी निजात्मा में निमग्न रहना श्रेयस्कर है।

विरोधरूप क्रोध- लौकिक में सज्जन पुरुषों के द्वारा जगत्-हितकर कार्यों के करने में विरोध करना, अवरोध पैदा करना, रुकावट डालना, उनके द्वारा किये गये कार्यों से स्वार्थ- सिद्धि करना; सत्कार्यों को झूठा, मिथ्या, अहितकर सिद्ध करना और स्वयं के असत्, अहितकर कार्यों को सत्, हितकर, प्ररूपित करना; विरोधरूप क्रोध है।

अलौकिक में मोक्ष एवं मोक्षमार्ग की प्ररूपणा में एवं सम्यक् प्रवर्तन करने वालों पर दोषारोपण करना और अपना सांसारिक प्रयोजन विषय-कषायों को पुष्ट करना; विरोधरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

विरोधरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

श्री जिनेन्द्रदेव-प्रणीत वीतराग मोक्षमार्ग में निर्ग्रन्थ-मुद्राधारी, रत्नत्रय-सम्पन्न महामुनि ही पूज्य होते हैं। मोक्षमार्ग में सम्यग्दर्शन-सहित चारित्र पूज्य है। निर्ग्रन्थ मुद्रा धारण करने के os

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

अभिलाषी अव्रती, उद्यमी/प्रतिमाधारी, व्रती यथोचित आदर, सम्मान के पात्र होते हैं। हमें मोक्षमार्ग के कार्यों में बाधा न डालकर, स्वयं उसरूप परिणित हो मोक्षमार्ग का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। अतः जीव को लौकिक, अलौकिक, अविरोध-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्ममयी निजात्मा में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

प्रत्येक वस्तु का परिणमन अविरोधपूर्वक होता है तथा वस्तु के परिणमन के अनुसार ही कारण होते हैं और कारण के अनुसार कार्य होता देखा जाता है। वस्तु के परिणमन के विरुद्ध कारण नहीं होते हैं। जैसे; अग्नि के प्रज्वलन में ईंधन तथा पवन ही कारण होते हैं, जल नहीं; वैसे ही जीव को कर्मों के आस्रव में काय-वचन-मन, मिथ्यात्व, रागादि भाव ही कारण होते हैं अयोग और वीतरागभाव नहीं। वीतरागभाव तो निरास्रव होने का कारण है। आस्रव-बन्ध के कारणों को वीतरागभाव का एवं निरास्रव होने का कारण मानना; विरोधरूप क्रोध है, जिससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

विरोधरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

प्रत्येक द्रव्य का परिणमन जिस क्षेत्र-काल-भाव से और जिस निमित्त से होता है, उसी से उसीरूप होगा। वस्तु के परिणमन में कारण सदैव अनुकूल ही होते हैं। अतः आत्मा के शुद्ध स्वरूप परिणमन में वीतरागभाव ही कारण होते हैं, रागादि भाव नहीं। अतः जीव को वीतरागभाव-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

विपरीतरूप क्रोध- लौकिक में किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण यथार्थ परिचय के बिना, किसी संस्थान या घटना की सम्पूर्ण जानकारी के बिना उसके सम्बन्ध में मिथ्या प्रचार करना; लौकिक विपरीत – रूप क्रोध है। अलौकिक में छः द्रव्य, सात तत्त्व, नौ पदार्थों का स्वरूप यथार्थ न समझकर, अपनी इच्छानुसार समझना और अन्य को अन्यथा ही समझाना; विपरीतरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

विपरीतरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए-

श्री जिनेन्द्रदेव द्वारा प्रणीत द्रव्यों, तत्त्वों, पदार्थों का स्वरूप तद्रूप ही है, अन्यरूप नहीं है। श्री जिनेन्द्रदेव वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होने से अन्यथा प्ररूपण नहीं करते -3

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

हैं। हमें तो श्री जिनेन्द्रदेव द्वारा प्रणीत वीतराग-मार्ग का प्ररूपण करना है, किसी व्यक्ति विशेष या संस्थान विशेष का नहीं। अतः जीव को सम्यक् स्वरूप उत्तम क्षमाधर्ममयी निजात्मा में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

पर में एकत्वरूप क्रोध- स्त्री, पुत्र, मित्र, दासी-दास, पशु, गृह, भूमि, धान्य आदि पर पदार्थों में एकत्व मानना, उन्हें ही अपना स्वरूप समझना, उनमें लिप्त रहना तथा परिवार की वृद्धि में अपना विकास, परिग्रह की वृद्धि से अपने जीवन की सफलता मानना, लौकिक उपाधियों की वृद्धि से अपनी महानता समझना और रागादि विकारी भावों को आत्मा का स्वभाव मानना; पर में एकत्वरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। पर में एकत्वरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

लोक में सभी द्रव्य, पदार्थ, एकाकी, एकत्व-स्वरूपी है। सभी चेतन-अचेतन पदार्थ स्वचतुष्टय में रहते हैं। एक द्रव्य के चतुष्टय से अन्य द्रव्य के चतुष्टय का परस्पर में कोई भी सम्बन्ध नहीं है। पर-द्रव्यों से अपना विकास एवं प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती है। प्रत्येक द्रव्य अनन्त गुणमयी है। प्रत्येक गुण अपने गुण-स्वरूप परिणमन करता है। आत्मा के श्रद्धागुण का शुद्ध विकास अन्यथा श्रद्धान के अभाव से, ज्ञानगुण का सम्यक् विकास संशय- विभ्रम, मोह के अभाव से और चारित्रगुण का अमल विकास रागादि के अभाव से होता है। श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र का परस्पर में सम्बन्ध नहीं है। अतः जीव को पर से एकत्वरूप सम्बन्ध से रहित जानने-मानने और परिणमन से स्व-एकत्व-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

पर में अभिन्नत्वरूप क्रोध- जगत् में समस्त चेतन-अचेतन पदार्थों की सत्ता भिन्न- भिन्न है, सभी स्वकीय सत्ता में रहते हैं। उन्हें अपने से अभिन्न मानना, पर में अभिन्नत्वरूप क्रोध है। क्रोध के वश जीव उनकी अनुकूलता से अपने को सुखी और प्रतिकूलता से दुःखी मानता है। पर-द्रव्यों की प्रतिकूलता से अति क्रोधित हो अपने प्राण तक गँवा देता है। मनुष्य को प्रशस्त रागादि भाव और शरीराश्रित व्रत-तप आदि क्रियाओं द्वारा चैतन्य- स्वरूप से विरुद्ध विविध प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। उन्हें अपनी मानकर सुखी होना; पर में अभिन्नत्वरूप क्रोध है। उससे स्व से अभिन्नत्वरूप उत्तम क्षमाधर्म का os

घात होता है।

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४०

पर में अभिन्नत्वरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

जीव चेतन है और जीव से भिन्न पदार्थ अचेतन हैं। जीव का परिणमन जीव में और जीव से भिन्न अन्य समस्त पदार्थों का परिणमन जीव में नहीं है, क्योंकि दो द्रव्यों की एक क्रिया और एक क्रिया के दो द्रव्य नहीं होते हैं।

जीव को मोक्ष की सिद्धि ज्ञानक्रिया से होती है। आत्मज्ञान से शून्य शरीराश्रित क्रियाएँ मोक्षसिद्धि का कारण नहीं हैं। ऐसा आगम में निरूपण किया गया है।

आगम से प्रत्यक्ष जाना-देखा जाता है कि कोई पुरुष ज्ञानक्रिया से युक्त तपश्चरण द्वारा केवलज्ञान-ऋद्धि प्रकट कर शीघ्र मोक्ष प्राप्त करता है और कोई पुरुष ज्ञानक्रिया से शून्य तपश्चरण कर सांसारिक ऋद्धि-सिद्धियों में उलझा रहता है, मोक्ष प्राप्त नहीं करता है। अतः जीव को पर से भिन्न, स्व से अभिन्न ज्ञानक्रियारूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना श्रेयस्कर है। अव्यवस्थारूप क्रोध- लोक में सर्व द्रव्य/पदार्थ/वस्तुएँ व्यवस्थित रह स्वचतुष्टय में स्वयमेव परिणमन करती हैं। इस अनादिनिधन वस्तु-व्यवस्था को न जानना, न मानना और अपनी इच्छा के अनुसार वस्तुओं के परिणमन कराने का भाव रखना; अव्यवस्थारूप क्रोध है। जीव अन्य पर-वस्तुओं को अपने विषय-कषायों के पोषणार्थ इच्छानुसार परिणमाने का भाव करता है। यदि इच्छानुसार कार्य की सिद्धि हुई तो उन वस्तुओं को व्यवस्थित करने का कर्तव्य मान कर सुखी होता है और इच्छानुसार कार्य की सिद्धि नहीं हुई तो दुःखी होता है। जीव चेतन-स्वरूप है और जीव में होने वाले रागादि भाव अचेतन-स्वरूप हैं। दोनों का परिणमन व्यवस्थित और स्वतन्त्ररूप से होता है। वे अपनी-अपनी स्वतन्त्ररूप व्यवस्था का उल्लङ्घन नहीं करते हैं। फिर भी चेतन को अचेतन का और अचेतन को चेतन का कर्त्ता जानना-मानना ही अव्यवस्थारूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। अव्यवस्थारूप क्रोध की निवृत्ति और व्यवस्थारूप उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

अनादिनिधन वस्तुएँ अपनी-अपनी मर्यादा लिए व्यवस्थित रह स्वयमेव परिणमन करती हैं। कोई भी वस्तु अपनी मर्यादित व्यवस्था का उल्लङ्घन नहीं करती है। प्रत्येक द्रव्य/वस्तु Os

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

की षट्कारक व्यवस्था उसी द्रव्य/वस्तु में ही होती है। दो द्रव्यों की एक षट्कारक व्यवस्था कहना लौकिक व्यवहाररूप उपचार का कथन है जो कि मनुष्य को स्वच्छन्द प्रवृत्ति करने से रोकती है। निश्चयरूप वस्तु-व्यवस्था मनुष्य को स्वतन्त्र और स्वावलम्बी बनाती है। सर्वज्ञदेव के ज्ञान में सभी द्रव्यों का परिणमन व्यवस्थित ही झलकता है। अर्थात् केवलज्ञान में सकल द्रव्य के अनन्त गुण और उनकी अनन्त पर्यायें युगपद् एक ही काल में झलकती हैं। जैसे सर्वज्ञदेव के ज्ञान में द्वारिका नगर की संरचना और विध्वंस के कारण एवं समय यथाक्रम से युगपद् झलक रहे थे। अतः जीव को ऐसी वस्तु की व्यवस्था को जानने-मानने से निज में प्रकट हुआ परम संतोषरूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है। मतभेदरूप क्रोध- किसी व्यक्ति विशेष के मौलिक विचार को मत कहते हैं। जगत् में सर्वज्ञदेव द्वारा प्रणीत वस्तु-स्वरूप का कथन न कर, उससे विपरीत अपने अभिप्राय से कथन करना; मतभेदरूप क्रोध है। जगत् में नाना जीव हैं, उनके नाना कर्म और नाना भाव हैं। एक जीव के कर्म और भावों के अनुरूप अन्य जीव के कर्म और भाव एक समान न होने से परस्पर में अन्तर/भेद दिखाई देता है/ज्ञात होता है। इस प्रकार के अन्तर/भेद से उत्पन्न कलुष परिणाम; मत-भेदरूप क्रोध हैं। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

श्री जिनेन्द्रदेव की आज्ञा को न मानने वाले एकान्ती मतवाले पुरुष जिनमत को नहीं मानते हैं। जिनमत में वस्तुस्वरूप का निरूपण निश्चय और व्यवहार रूप; दो प्रकार से किया गया है। कोई निश्चय नय सापेक्ष वस्तु-स्वरूप को श्रवण कर, निश्चयाभासी हो जाता है तो कोई व्यवहार नय सापेक्ष वस्तुस्वरूप को श्रवण कर, व्यवहाराभासी हो जाता है। कोई निश्चय-व्यवहार नय सापेक्ष वस्तुस्वरूप को श्रवण कर उभयाभासी हो जाता है। ये तीनों प्रकार की आभासरूप उन्मत्तता; मतभेदरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। मतभेदरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

प्रमाण-नय-निक्षेप सापेक्ष वस्तुस्वरूप सर्वज्ञदेव द्वारा प्रणीत होने से सम्यक् है। उसे यथावत् वैसा ही जानना-मानना चाहिए। व्यक्ति विशेष के नय-निरपेक्ष विचार, वस्तुस्वरूप का कथन; मिथ्या होता है। वस्तुस्वरूप का कथन नय-सापेक्ष और उसका अनुभवन नयातीत होता है। वस्तु में नय नहीं होते हैं। वस्तु को सर्वाशरूप समझने के लिए नय होते हैं। निश्चय os

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४४

नय; वस्तु के वास्तविक स्वरूप का कथन करता है और व्यवहार नय; वस्तु के उपचरित स्वरूप का कथन करता है। अतः जीव को अनेकान्त-स्वरूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

परतन्त्रतारूप क्रोध- अपने से बड़े जनों के आशीर्वाद, क्रिया-कर्म के अधीन रह कर, सुखी जीवन मानना; परतन्त्रतारूप क्रोध है। उससे स्वतन्त्रता और स्वावलम्बन का लोप हो जाता है। कोई भी मनुष्य भगवान् के अधीन रह कर भी मोक्ष-सुख को प्राप्त नहीं कर सकता है। वह संसार-भ्रमणरूप दुःख ही सहता है। पराधीन/परतन्त्र वृत्ति एवं प्रवृत्ति से उत्पन्न कलुष भाव ही पराधीन/परतन्त्रतारूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। परतन्त्रतारूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए-

पराधीनता से आद्यावधि किसी को भी, कभी भी न सुख मिला है न मिलता है और न कभी आत्म-हित होता है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है- ‘पराधीन सपने हु सुख नाहीं।’ किसी कवि ने तोते का रूपक बनाकर कहा है- ‘पराधीनता सुख नहीं, स्वाधीन सुख मान। सुखी रहत मैं वन विषे, नहीं कनक पींजरे माँहिं।’ तोता विचार रहा है कि पराधीनता ही दुःख है, सुख नहीं है। सुख तो स्वाधीनता है। मैं वन में स्वतन्त्र रह सुखी रहता हूँ, इस सोने के पिन्जरे में रहना सुख नहीं है। दुःख ही है।

लोक में समस्त चेतन-अचेतन पदार्थ स्वतन्त्र रूप से परिणमन करते हैं। कोई भी पदार्थ परतन्त्र नहीं है। स्वाधीनरूप स्वतन्त्र वृत्ति ही सुखस्वरूप है। जैसे अनार के फल में उसका छिलका, परत, दाना, रस- इन चारों का स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण स्वतन्त्र परिणमन करता है, वैसे ही आत्मा का श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र का परिणमन स्वतन्त्र होता है। अतः स्वतन्त्रता और स्वावलम्बन से उत्पन्न आत्म-शान्ति-स्वरूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना श्रेयस्कर है। परसम्बन्धरूप क्रोध- मनुष्य जीव अपना सम्बन्ध पर द्रव्य एवं पर भावों से रखता है, स्व-द्रव्य एवं स्व-स्वभाव से नहीं रखता है। वह चेतन-अचेतन पर-द्रव्यों के सम्बन्ध से उत्पन्न रागादि भावों में भी अपना सम्बन्ध स्थापित रखता है। निजात्मा के आचार-विचारों और स्व-शुद्ध स्वरूप में एकत्वरूप सम्बन्ध नहीं रखता है। पर-द्रव्य एवं परभावों से सम्बन्ध रखकर उसी में ही रमता है। पर में रमण करनेरूप परासक्त परिणाम; पर-सम्बन्धरूप क्रोध -os

-७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन ४-

है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

पर-सम्बन्धरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

जीव का सम्बन्ध पर-द्रव्य एवं पर-भावों से नहीं है। जीव अपने ज्ञान से पर द्रव्य एवं पर-भावों को जानता है; परन्तु उनसे ज्ञान का कोई सम्बन्ध नहीं है। नास्ति सर्वोपि सम्बन्धः - ज्ञान, ज्ञान में ही रहता है और पर-ज्ञेय, ज्ञेयमय ही रहते हैं। ज्ञान; प्रमाता है और ज्ञेय; प्रमेय है, इसलिए पर-द्रव्य ज्ञान का विषय बनते हैं, परन्तु ज्ञान उन पर-द्रव्य के स्वरूप परिणमित नहीं होता है। आत्मा पर-द्रव्यों के सम्बन्ध से रहित है। अतः जीव को पर से असम्बन्धस्वरूप निजात्मा में उत्पन्न परम शान्तिमयी उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना श्रेयस्कर है। कुसङ्गतिरूप क्रोध - जगत् के जीव निज शुद्धात्म गुणों की और शुद्धात्म-स्वरूप श्री जिनेन्द्रदेव/पञ्च परमेष्ठियों की सङ्गति को छोड़कर, रागादि भावों एवं सरागी देवी-देवों की सङ्गति करते हैं। उससे आत्मा में जो विकारी भावरूप परिणाम हैं, वह कुसङ्गतिरूप क्रोध है। अर्थात् निजात्मा के सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान-चारित्र से विपरीत अश्रद्धान, अज्ञान, अचारित्ररूप प्रवर्तन और कर्मोदय-जनित कर्मफलों को भोगने हेतु उनकी सङ्गति करने से उत्पन्न विविध प्रकार के कलुष परिणाम; कुसङ्गतिरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है। कुसङ्गतिरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

जीव; बाह्य में समस्त चेतन-अचेतन पदार्थों की कुसंगति से रहित और अभ्यन्तर में मिथ्यात्व, राग-द्वेष की कुसङ्गति से रहित, शुद्ध-असङ्ग-स्वरूपी भगवान् आत्मा है। वीतरागी निर्ग्रन्थ मुनि-भगवन्तों को कर्मोदय-जन्य फलों का संयोग देखा गया; परन्तु उन्होंने भोगनेरूप सङ्गति नहीं की। अपितु अभोक्तृत्वरूप निजभाव में स्थित रह निर्वाण को प्राप्त किया। अतः कुसङ्गति से रहित, निज आत्म-स्वभाव की सङ्गति से उत्पन्न परमानन्दस्वरूप उत्तम क्षमाधर्म में स्थित रहना ही श्रेयस्कर है।

बन्धनरूप क्रोध - जीव; बन्धन में रहने से अति दुःखी होता है। व्यक्ति; अन्य जनों को उनकी परिस्थितिवश अपने बन्धन में रखता है। उनके कार्य करने की समयावधि समाप्त होने पर भी उन्हें रोक कर कार्य करवाना, आजीविका का भय दिखाना तथा पशु-पक्षियों को खूँटी से बाँधना, पिञ्जरे में बन्द रखना; बन्धन है। बन्धन से उत्पन्न आक्रोशरूप दुःखद भाव; os

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

बन्धनरूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

जीव अपने ही अज्ञान से कर्मों का बन्ध करता है और कर्मबन्ध के कारण संसार में भ्रमण करता है। आठों ही कर्मों के बन्धन दुःखरूप ही हैं। कर्म-बन्धन से ग्रसित जीव निर्बन्ध होने का उद्यम नहीं करता है। कर्मबन्धन से उत्पन्न मिथ्यात्व-राग-द्वेष के दुःखरूप परिणाम ही; बन्धनरूप क्रोध है।

बन्धनरूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

जगत् के सभी जीव बन्धनों से मुक्त हो, सुखी होना चाहते हैं। बन्धन किसी भी प्रकार का हो वह दुःखस्वरूप ही होता है। आत्मा में अशुभ कर्मों का बन्धन सभी को अनिष्ट-स्वरूप और दुःखरूप प्रतीत होता है और शुभ कर्मों का बन्धन सुखरूप प्रतीत होता है। शुभ कर्मों का बन्धन भी आत्मसुख का बाधक होने से दुःखरूप ही है। शुभाशुभ बन्धनों से मुक्त रहना ही सुख है। अतः जीव को अबन्धस्वरूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना श्रेयस्कर है। अक्रमिकतारूप क्रोध- लोक में समस्त द्रव्यों का परिणमन क्रमवर्ती होता है- अक्रमवर्ती नहीं। मनुष्य जब किसी द्रव्य का परिणमन अक्रम से करना चाहता है जो कि होता नहीं है। उससे कलुषित परिणाम होते हैं, वह अक्रमवर्ती क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

अक्रमवर्ती क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिए सदैव विचार करना चाहिए कि-

द्रव्य के समस्त गुणों के परिणमन को पर्याय कहते हैं। पर्याय का परिणमन क्रमवर्ती ही होता है, अक्रमवर्ती नहीं। क्रमवर्ती परिणमन के यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न जो निराकुलतारूप परम शान्ति है, वह उत्तम क्षमाधर्म है; अतः जीव को निराकुल-स्वरूप निज उत्तम क्षमाधर्म में निमग्न रहना ही श्रेयस्कर है।

निन्दारूप क्रोध- पर को कलङ्क लगाना, धिक्कारना, गाली देना, बदनाम करना, बुराई करना, फटकारना; निन्दा है।

वस्तु के यथार्थ स्वरूप को अयथार्थरूप प्रकट करने की इच्छा रखना। अनिष्ट फल-कारक विषय की प्ररूपणा करना। दूसरों को दुःखी करने के लिए अशिष्ट वचनालाप करना, योगों -७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

की वक्रता से पर को कलङ्क लगाना, धिक्कारना, गुणों को दोषरूप बखान करना। स्वयं कषाय के वश वीतरागधर्म से विमुख रहना और अन्यजनों को विमुख करना। अनेकान्त स्वरूप वस्तु का एकान्तरूप कथन करना। अहिंसामयी वीतराग धर्म में हिंसा का पोषण करना; निन्दारूप क्रोध है।

दूसरे शब्दों में, दूसरों की बुराई करना, बदनाम करना, गाली देना उसके अवगुणों को सर्वजन-प्रसिद्ध करना। निर्ग्रन्थ वीतरागी मुनि भगवन्तों की अविकल मार्ग-परम्परा का लोप कर, स्वयं के मौलिक-मार्ग की स्थापना करना। सुदृष्टिवन्त-धर्मी, ज्ञानी, व्रतियों का बहिष्कार/तिरस्कार करना। उनके सद्‌गुणों का उच्छेद करना। स्वयं के दोषों को छिपाने के लिए, दोषियों की सङ्गति करना। जगत् हितकर वीतराग-मार्ग को क्लिष्ट कारक निरूपित कर, वीतराग-मार्गियों की बुराई करना। ज्ञान-वैराग्य-सम्पन्नों को रागी-द्वेषी सिद्ध करना। उनके गुणों को दोषरूप दिखाकर, पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखना, हीन भाव रखना। वीतराग देव-शास्त्र-गुरु-धर्म की उपेक्षा कर, संसार-शरीर सम्बन्धी विषयों के पोषण के व्याख्यान करना। वस्तु के यथार्थ स्वरूप का प्रतिपादन करने वालों का उत्साह भङ्ग करना; उन्हें धर्ममार्ग से विचलित करना तथा स्वयं की प्रशंसा करना; निन्दारूप क्रोध है। उससे उत्तम क्षमाधर्म का घात होता है।

निन्दारूप क्रोध की निवृत्ति और उत्तम क्षमाधर्म की प्रवृत्ति के लिये सदैव विचार करना चाहिए कि-

आत्म-साक्षीपूर्वक स्वयं के दोष प्रकट करना और प्रायश्चित्त-विधि से आत्म-शुद्धि करना चाहिए। स्वयं की प्रशंसा और पर के दोषों को प्रकट नहीं करना क्योंकि, स्वयं की प्रशंसा करने से स्वयं के ही दोष प्रकट होते हैं, लघुपुरुष हो जाता है। उसमें सद्‌गुण प्रकट नहीं होते हैं और दोष ही पुष्ट होते हैं। निन्दा करने से बोधि-समाधि की प्राप्ति दुर्लभ हो जाती है। पर की निन्दा करने से नीच गोत्रकर्म का आस्रव-बन्ध होता है। अतः जीव को मन-वचन-काय-कृत-कारित-अनुमोदना से पर की निन्दा करने का त्याग कर,

अनिन्द्य-स्वरूपी उत्तम क्षमाधर्ममयी निजात्मा में निमग्न रहना श्रेयस्कर है। उत्तम क्षमाधर्म का स्वरूप समझकर सभी आत्माएँ उत्तम क्षमाधर्म-स्वभावी निज शुद्धात्मा में निमग्न रहें; ऐसी मेरी मङ्गल भावना है।

-७४ 42 ॐ

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

उत्तम मार्दवधर्म

मङ्गलाचरण

मान, शिला-सा अविनयी, स्वात्म-ज्ञान नहिं होय।

उत्तम मार्दवधर्म से, ज्ञानानन्द अति होय ।।

आत्मा का उत्तम क्षमाधर्म के समान एक लक्षण उत्तम मार्दवधर्म भी है। आत्मा के उत्तम मार्दवधर्म को तिरोभूत (आवरित) करने वाली मान कषाय है। मान कषाय के अभावपूर्वक उत्तम मार्दवधर्म-स्वभावी निज शुद्ध आत्मा के आश्रय से मृदुतात्मक शान्तिस्वरूप की जो अनुभूति होती है, वह वह उत्तम मार्दवधर्म है। मृदु अर्थात् कोमल परिणाम। मार्दवधर्म के साथ ‘उत्तम’ विशेषण, सम्यग्दर्शन का सूचक है। मृदुर्भावः मार्दवम्‌ मृदु भाव मार्दव है। अपमान के कारणभूत दोषों का परित्याग कर सहज मृदु प्रवृत्ति करना मार्दव है। अथवा जगत्‌ के जीवों को दुःखी देख उनके दुःख दूर करने का कोमल परिणाम मार्दव है। मार्दव आत्मा का गुण है। उसकी सहज शुद्ध पर्याय उत्तम मार्दवधर्म है। इसमें गुणस्थान के अनुरूप शुद्धि की वृद्धि होती जाती है।

मार्दव वह है, जहाँ मान न हो। कारण में कार्य का उपचार कर व्यवहारनय की विवक्षावश उत्तम मार्दव को ही उत्तम मार्दवधर्म निरूपित किया जाता है।

जिस प्रकार सम्यग्दर्शन कारण है और सम्यग्ज्ञान कार्य है, सम्यग्ज्ञान कारण है और सम्यग्चारित्र कार्य है, उसी प्रकार उत्तम मार्दव कारण है, और उससे प्रकट मार्दवस्वरूपी अतीन्द्रिय आत्म-सुख उत्तम मार्दवधर्म कार्य है।

उत्तम मार्दवधर्म के स्वरूप का प्रतिपादन विविध विवक्षाओं से किया जाता है- १. जो मनुष्य उत्कृष्ट ज्ञान-सहित उग्र, उत्कृष्ट तप करते हुए भी उसका मद नहीं करता है, वह उत्तम मार्दवरत्न का धारक होता है।२

२. जो ज्ञानी जाति, कुल आदि आठ प्रकार के मद नहीं करता है, वह उत्तम मार्दवधर्म का धारक है।३

३. आत्मा के मार्दव गुण की शुद्ध और अशुद्ध दो पर्यायें हैं। मृदुभाव शुद्ध पर्याय है और १. स.सि. ९/६। २. का.अनु. ३९५। ३. भ.आरा. विशे. ४६।

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दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

अभिमानरूप अशुद्ध भाव पर्याय है। आत्मा, मृदुभाव से संसार और शरीर सम्बन्धी समस्त प्रकार के विषय-भोगों से विरक्त रहता है और उसे निज चैतन्य-स्वरूप की मृदुतामयी जो शान्ति की अनुभूति होती है, वह उत्तम मार्दवधर्म है।

४. जीव को उत्तम मार्दवधर्म के साथ जब शुभ राग का उदय होता है तब वह दयार्द्र होकर भव्य जीवों को श्री जिनेन्द्रदेव-प्रणीत वीतराग-विज्ञानमयी धर्म का उपदेश कर सन्मार्ग दिखाता है। वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, कर्त्ता-अकर्त्ता, भोक्ता-अभोक्ता, निमित्त-उपादान, निश्चय-व्यवहार नयों का यथार्थ स्वरूप समझाता है।

अन्य जनों के द्वारा अपनी निन्दा किये जाने पर सङ्क्लेशित न होना, अपने पद का मद न करना और प्रशंसा किये जाने पर अपने पद में उन्मत्त न होना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट परमपदरूप परमानन्दस्वरूप सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है।

५. गुणवानों की प्रशंसा सहज भाव से करना और उनके समान ही शुद्ध गुणों को प्रकट करने का मृदु भाव; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट शुद्ध गुणमयी मृदुल परमानन्दस्वरूप सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है।

६. निज शुद्धात्मानुभूति की वृद्धि हेतु निरन्तर सम्यग्ज्ञान के आठ अङ्गों सहित जिनश्रुत का अभ्यास करना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट श्रुतामृतरूप परम स्वात्मानन्दमयी सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है।

७. जीव का मोक्षमार्ग एवं मोक्षमार्गियों के प्रति विनम्र भाव होना उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट रत्नत्रयमयी परम आत्मानन्दमयी सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है।

८. संसार-शरीर से सम्बन्धित समस्त विषय-भोगों का और उनके सकल साधनों के प्रति अनासक्त/विरक्तभाव; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट मोक्ष-स्वरूप अतीन्द्रिय परमानन्दमयी सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है।

९. कर्मोदय जन्य उपाधियों में उन्मत्त न होकर निरुपाधि-स्वरूप निजात्मा में लक्ष्य रखना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट कर्मोपाधि-विहीन आत्मानन्दस्वरूप सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है। १०. स्वयं को जिनश्रुत का विशेष ज्ञान होने पर भी यदि कोई अन्य श्रुत-ज्ञानी, श्रुत के अनुसार अज्ञात विषय का ज्ञान कराये या अपनी कोई भूल-दोष दिखाये तो उसे सहज स्वीकार कर ज्ञान बढ़ाना और निर्दोष प्रवर्तन करना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट शुद्ध ज्ञान और शुद्ध वीतराग चारित्रमयी परमानन्दस्वरूप सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है। -७४ दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

११. सभी द्रव्यों को द्रव्यत्व-गुणत्व-पर्यायत्व से जानना-देखना और उनके प्रति अपने भावों में विकृति का न होना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट अविकृत शुद्ध निजानन्द-स्वरूप सुख-रस; उत्तम मार्दवधर्म है।

१२. भवलीन (संसारी) जीवों को संसार-पर्यायरूप से दीन-हीन न देखना। उन्हें भी सिद्ध-सादृश देखना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट सिद्ध-सादृश निजात्मानन्दस्वरूप सुखरस; उत्तम मार्दवधर्म है।

१३. संसारी जीवों को कर्मचेतना और कर्मफलचेतना का भोक्ता न देखना और उन्हें भी ज्ञानचेतना का भोक्ता देखना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट ज्ञानचेतना-स्वरूप परमानन्दस्वरूप सुखरस; उत्तम मार्दवधर्म है।

१४. लौकिक, अनुकूल बाह्य सर्व विभूति के प्रति निरपेक्ष भाव; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट अलौकिक स्वात्म-विभूति का परम आनन्दस्वरूप सुखरस; उत्तम मार्दवधर्म है।

१५. संयोग एवं संयोगी भावों से भिन्न, एकाकी-एकत्वमयी निजात्मा का बहुमान; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट अभेद-स्वरूप निज शुद्ध आत्मा का आनन्दस्वरूप सुखरस; उत्तम मार्दवधर्म है।

१६. इन्द्रिय-चक्षु से दिखायी देने वाले समस्त पदार्थों पर से दृष्टि हटाकर, ज्ञान-चक्षु से दृष्टि गोचर निज शुद्धात्मस्वरूप को देखना; उत्तम मार्दव है। उससे प्रकट ज्ञानानन्दस्वरूप सुखरस; उत्तम मार्दवधर्म है।

उत्तम मार्दव धर्म के भेद-

विनयरूप उत्तम मार्दवधर्म- स्वयं के और अन्य जनों के मोक्षमार्ग के प्रति विनयसहित बहुमानभाव रखने से उत्तम मार्दवधर्म प्रकट होता है। विनय से आत्मिक शाश्वत सुख का अनुभव किया जाता है। विनयधर्मी इस लोक में शुद्धात्म सेवियों के प्रति अति आकृष्ट रहता है, बाह्य में साता के अनुकूल साधन एवं सामग्रियाँ न होने पर भी अयाचक वृत्ति-प्रवृत्ति सहित विनम्र रहता है। वह जानता-मानता है कि मेरे पास तो स्वात्म-शान्ति-स्वरूप अविनश्वर वैभव है। जगत् के अनुकूल-प्रतिकूल बाह्य साधन-सामग्रियों का संयोग-वियोग तो अनन्त बार हुआ है। उससे सुखी-दुःखी होकर संसार का भ्रमण ही बढ़ा है।

लोक-अलोक में राजा, महाराजा, चक्रवर्ती आदि पदों को प्राप्त करके भी अतिशय विनय-सम्पन्न रहना, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के धारकों एवं रत्नत्रय के अभ्यासियों के प्रति Os

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उनके पद के अनुरूप विनयवान रहना, स्वयं भी रत्नत्रय को धारण कर, अन्य जनों के प्रति सविनय प्रवर्तन कराना; विनयरूप उत्तम मार्दवधर्म है। विनय से सर्व गुणों में शुद्धता आती है। अतः विनयवान को व्रत, शील, संयम का धारण करना सफल होता है।

लौकिक में भी विनयी शिष्य को गुरु सर्वस्व अर्पण करना चाहता है। विनय से विद्या, ज्ञान, सुख की प्राप्ति होती है। किसी कवि ने कहा है-

विनय बिना विद्या नहीं, विद्या बिन नहिं ज्ञान।

ज्ञान बिना सुख न मिले, यह निश्चय करि जान।।

पिता अपनी सम्पत्ति विनयी पुत्र को देना चाहता है। कोई भी व्यक्ति विनयपूर्वक किसी से बोले कि मेरा यह कार्य कर दीजिये तो वह उसके कार्य को सहज सहर्ष शीघ्र ही कर देता है। संस्तवनरूप उत्तम मार्दवधर्म- वीतराग, सर्वज्ञ, हितोपदेशी श्री जिनेन्द्रदेव का संस्तवन शुद्ध त्रियोगपूर्वक योग्य काल में यथोचित विधि से करना; उत्तम मार्दवधर्म है। उत्तम मार्दवधर्मी राजा भरत को तीन समाचार (चक्ररत्न की प्राप्ति, पुत्र का जन्म और श्री आदिनाथ जिनेन्द्रदेव को केवलज्ञान की प्राप्ति) एक साथ सुनने को मिले। पर, उन्होंने सर्व प्रथम श्री १००८ आदिनाथ जिनेन्द्रदेव के केवलज्ञान की पूजा कर संस्तवन किया। १०८ आचार्य मानतुङ्ङ्गदेव ने तीर्थकर १००८ श्री ऋषभदेव स्वामी का संस्तवन किया। १०८ आचार्य मानतुंगदेव की श्री जिनेन्द्रदेव के प्रति मार्दवता उनके द्वारा रचित ‘भक्तामर’ स्तोत्र के प्रत्येक काव्य में स्पष्ट प्रस्फुटित (झलक) हो रही है। उन्होंने स्वयं को श्री जिनेन्द्रदेव के संस्तवन करने का अल्पज्ञ और जिनश्रुतज्ञों द्वारा परिहास का पात्र स्वीकार किया है। आचार्यदेव ने श्री जिनेन्द्रदेव के गुणों का मुग्ध होकर संस्तवन किया है। जैसे कोयल आम्र मञ्जरियों की सुगन्ध से मुग्ध हो कर अप्रयास ही कुहू कुहूरूप मधुर ध्वनि का गुञ्जन (गुनगुनाना) करती है।१

सुमतिरूप उत्तम मार्दवधर्म - सुमति उत्तम मार्दव धर्म की आधार है। उसमें कुमति का प्रवेश नहीं है। सुमति से बाह्य-अभ्यन्तर सर्व प्रकार की सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। सुमति सूर्य की भाँति है। जैसे सूर्य-प्रकाश, प्रकाशक, और अन्धकार-विनाशक है, वैसे ही सुमति; उत्तम मार्दवधर्म की प्रकाशक और मदरूप अन्धकार की विनाशक है।

सुमतिरूप उत्तम मार्दवधर्म में हठ का कोई स्थान नहीं है। वस्तु का स्वरूप समझने- समझाने और प्रवर्तन करने में सहजता होती है। सुमतिरूप उत्तम मार्दवधर्मी; फलों से युक्त १. अल्पश्रुतं…। यत्कोकिलः… हेतु। - भक्तामर स्तोत्र

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आम्रवृक्ष की भाँति होती है। जैसे आम्र वृक्ष, फलों के पकने पर, हवा के झोंके से सहज फलों को गिराता है, पत्थर मारने वाले को भी आम्र; फल ही देता है, वैसे ही सुमतिरूप मार्दवधर्मी जगत् के जीवों को वीतराग मार्ग का उपदेश यथाकाल उसकी जिज्ञासा का समाधान के हेतु सहज ही करता है। कदाचित् कोई उन्मार्गी भी शङ्का का समाधान चाहे तो उसे भी धर्म-वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान कर उसकी शङ्का का समाधान करता है।

सुखस्वरूप उत्तम मार्दवधर्म- उत्तम मार्दवधर्म सुखस्वरूप आनन्द का जनक है। मनुष्य; अपने शुद्धात्म गुणों में नम्रीभूत रहता हुआ स्वात्म का चिन्तन-मनन करता है कि मैं शाश्वत ज्ञानादि अनन्त गुणों का पुञ्ज शुद्धात्मा हूँ, अविनश्वर अतीन्द्रिय निराबाध सुखस्वरूपी हूँ। इन्द्रियजन्य सुख आदि तो विनश्वर, पराधीन, बाधासहित, दुःख-स्वरूपी है।१

उत्तम मार्दवधर्मी संसारी जीवों को स्वभाव की दृष्टि से अभेद जानता हुआ भेद नहीं करता है और उनकी विभाव पर्याय को जानकर उनके प्रति हीनता की दृष्टि नहीं रखता है। भेद-दृष्टि संसारी जनों की होती है।

जो निगोद में सोही मुझमें, सोही मोक्ष मँझार।

अन्तर भेद कछु है नाहीं, भेद गिने संसार ।।

स्वभाव-पर्याय और विभाव-पर्याय के भेद से अपने को ज्ञानी और अज्ञानी, उच्च- नीच, मुक्त-बन्ध देखना-जानना और मानना तो संसार के भ्रमणरूप दुःख का कारण है। विद्याजनक उत्तम मार्दवधर्म- मोक्षमार्ग के अनुकूल अनेक विद्याओं का जनक उत्तम मार्दवधर्म है। लोक में अनेक प्रकार की विद्याएँ हैं, उनमें उत्तम विद्या निज शुद्धात्मा के ज्ञान की है और सर्वोत्तम विद्या केवलज्ञान है। उत्तम मार्दवधर्म के साथ जगत्-हितकर लौकिक विद्याएँ विकसित और सुशोभित होती हैं।

उत्तम मार्दवधर्मी में ही जगत्-हितकर सकल विद्याओं का प्रवेश और निवास होता है। मार्दवधर्म के अभाव में हितकर विद्याओं का प्रवेश तो होता ही नहीं है, अपितु प्रकट विद्याएँ नष्ट हो जाती हैं। अमार्दव भाव तो हितकर विद्याओं की प्रकटता/उत्पत्ति के लिए बञ्जर भूमि है। जैसे बञ्जर भूमि में धान्य उत्पन्न नहीं होता है, वैसे ही अमार्दव भाव में सुहितकर विद्याएँ प्रकट नहीं होती हैं। अर्थात् विद्या प्राप्ति की योग्यता नहीं होती है। श्री राम ने लक्ष्मणजी को विद्याएँ सीखने के लिए मरण-शय्या पर पड़े रावण के पास भेजा। लक्ष्मणजी, रावण के सिर के पास खड़े होकर बोले- हे रावण! तुम मुझे अपनी विद्याएँ सिखाओ। रावण; लक्ष्मण के वचन सुनकर भी मौन १. सपरंबाधा…। - प्र.सा.७६

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रहा। लक्ष्मणजी वहाँ से लौट आये और सम्पूर्ण वृतान्त श्री राम को सुनाया। राम ने लक्ष्मण द्वारा सम्पूर्ण वृतान्त सुनकर लक्ष्मण को पुनः आदेश दिया। हे लक्ष्मण ! इस बार तुम रावण के सिर की ओर नहीं, उसके पैरों की ओर सविनय खड़े होकर विद्याएँ सीखने की प्रार्थना करना। वह तुम्हें विद्याएँ अवश्य सिखायेगा। लक्ष्मण ने जब पैरों के पास कर-बद्ध खड़े होकर विद्याएँ सीखने के लिए प्रार्थना की, तब रावण ने उन्हें सुपात्र, विनयी समझकर अनेक विद्याएँ सिखायीं। साम्यभाव-स्वरूप उत्तम मार्दवधर्म- उत्तम मार्दवधर्म के धारक को बाह्य में अनुकूल-प्रतिकूल संयोगों के होने पर उनके प्रति इष्ट-अनिष्ट भाव न होने से वह साम्य-भावमयी रहता है। वह जानता-मानता है कि बाह्य संयोगी पदार्थों से मेरा न तो कोई हित होता है और न कोई अहित। मेरा हित-अहित तो मेरे ही शुद्ध-अशुद्ध भावों से होता है। पुण्य के फलरूप बाह्य अनुकूल पदार्थों का संयोग तो पुण्य क्षीण होने पर या आयु के क्षय होने पर स्वयमेव छूट ही जाता है। बाह्य सामग्रियाँ किसी को भी अनुकूल या प्रतिकूल नहीं होती हैं। बाह्य सामग्रियाँ तो पुण्य-पाप के फल भोगने को होती हैं। पुण्य-उदय के समय जिस सामग्री से सातारूप फल भोगा जाता है, पाप-उदय के समय उस ही सामग्री से असातारूप फल भी भोगा जाता है। जैसे पुण्य-उदय के समय रत्नजड़ित आभूषणों से शरीर को अलङ्कृत कर सातारूप फल भोगा जाता है और पापोदय के

समय चोरों द्वारा छीने/चोरी किये जाने पर असातारूप फल भी भोगा जाता है। यह जानकर मार्दवधर्मी अनुकूल-प्रतिकूल संयोगों में साम्य-भावमयी रहता है। वह बाह्य विपुल वैभव के संयोग को पुण्य का फल जान कर उसे अपने से भिन्न जानता है। वह अपना वैभव तो निजात्म ज्ञानमयी अनन्त गुणों की निधि/विभूति को जानता है।

स्वाश्रयरूप उत्तम मार्दवधर्म- उत्तम मार्दवधर्मी स्वाश्रित बुद्धि से मृदुता में अपना हित मानता है, उसी में सन्तुष्ट रह आनन्दित रहता है। वह जानता है कि पराश्रित बुद्धि से पुरुषार्थहीन हो पुण्य के फलों को भोगने की इच्छा बढ़ती है। जिनागम में तो श्री जिनेन्द्रदेव के आश्रित बुद्धि को भी पराश्रित बुद्धि निरूपित किया है। स्वाश्रित बुद्धि से ही मुक्ति होती है, पराश्रित से नहीं।

निश्चय नय की अपेक्षा से निज शुद्धामा के आश्रय से प्रकट बुद्धि को ही स्वाश्रित निरूपित किया है। व्यवहार नय की अपेक्षा पञ्च परमेष्ठी के आश्रित बुद्धि को भी स्वाश्रित और मार्दवधर्म-स्वरूप प्ररूपित किया गया है।

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मान कषाय

अब यहाँ मार्दवधर्म के घातक मानकषाय के स्वरूप, भेदों और शमन के उपायों पर विचार करते हैं।

मार्दव की अप्रकटता ही मान है। अर्थात् मार्दव को आवरित रखने वाला मान है। जीव को अपकारक, प्रशंसाकारक, साता-सम्मानदायक पद-प्रतिष्ठा आदि निमित्त कारणों के मिलने पर निज मृदु भावों का विस्मृत होना और उन निमित्त कारणों से अपनी महिमा-मण्डन मानने रूप परिणाम; मान है।१

उत्तम मार्दवधर्म का घातक; मान है जो कि एक कषायरूप है। ‘मान’ के एकार्थवाची- अभिमान, घमण्ड, अहंकार, मद, गर्व, सम्मान, आत्म-सम्मान, आत्म-निर्भरता, गर्व, स्तब्धता आदि अनेक नाम हैं।२

जाति, कुल आदि आठ मदों से उन्मत्त हो अन्यजनों के प्रति विनम्र न होना; मान कषाय है।३

विज्ञान, ऐश्वर्य, जाति, कुल, तप और विद्या- इनमें से किसी एक या अनेक के निमित्त से उत्पन्न उद्धत परिणाम मान हैं।४

कवित्व-कौशल के कारण समस्त जनों द्वारा पूजित; कुल, जाति की विशुद्धता, अनुपम बल की प्राप्ति, सम्पत्ति की वृद्धि, भोगों की प्रचुर विलासता, ऋद्धि-सिद्धियों की प्रकटता और शारीरिक लावण्य की अधिकता से होने वाला अहंकार का भाव; मान कषाय है।५ मान के भेद- मान चार प्रकार का होता है- १. पाषाणरूप, २. हड्डीरूप, ३. लकड़ीरूप और ४. लतारूप।

मान की उत्पत्ति- मान की उत्पत्ति का मूल अभ्यन्तर कारण तो मान कषाय का उदय है और बाह्य कारण पर पदार्थों के प्रति कर्तृत्व-बुद्धि है। लोक में समस्त पदार्थों का कार्यरूप परिणमन स्वकीय योग्यतानुसार, स्व-काल में होता है। मनुष्य पदार्थों के स्वतन्त्र परिणमित होने पर स्वयं को उनका कर्ता मानता है तब मान कषाय की उत्पत्ति होती है। यथा- मैंने; मन्दिर, धर्मशाला बनवाये, कुएँ खुदवाये, पाठशाला, औषधालय खुलवाये, समाज को एक सूत्र में बाँधा आदि से मान उत्पन्न होता है।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3084.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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