दयालक्षण धर्म एक अनुचिन्तन — जैन स्वाध्याय सामग्री | Dayalakshan Dharm Ek Anuchintan

दयालक्षण धर्म एक अनुचिन्तन

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शुभाशीष

सम्पूर्ण लोक में तत्त्वज्ञान का सागर श्री जिनधर्म है। इस महार्णव में वस्तु के वस्तुत्व का सत्यार्थ-बोध कराने वाले अनन्त प्रमेय हैं, जो कि सकल-विकल प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाण के विषय हैं।

भगवान् श्री जिन तीर्थंकर परमात्मा ने सर्व द्रव्य-गुण-पर्यायात्मक वस्तु के वस्तुत्व को जाना है व्यवहार से, प्रभु के ज्ञान में झलका है सहज-स्वच्छत्व गुण के नियोग से, ईहाशून्य परम-विद्या चार अनुयोगगम्यौ वर्णित की गाथापर परमेष्ठी तथा आचार्यों ने। ऐसी पावन श्रुत-सरिता प्रवाहमान होते हुए सम्प्रति आचार्य, मुनिगणों एवं विद्वानों की प्रज्ञा का आभूषण बनी है।

इसी पवित्र दीर्घ में मनीषी तत्त्वज्ञान युक्त, सरल, सहज स्वभावी, विद्वत्-वरेण्य पंडित श्री रमेशचन्द्रजी बाँझलजी ने अपनी निर्मल तत्त्वज्ञान लब्धि से अनेक महान् कृतियों का सृजन किया है। इसी परम्परा में आत्मधर्म-प्ररूपक ‘दश लक्षण धर्म एक अनुचिन्तन’ नामक कृति का सृजन कर, श्रीजिन वागीश्वरी के कोष को वर्धमान किया है, जो कि व्यवहार एवं परमार्थ मय मिश्रित दुग्ध-मिश्री के सम्मेलन का मधुर स्वाद प्रदान करने वाली भव्यो के लिए देशना लब्धि का कार्य करेगी।

पंडित श्री रमेशचन्द्रजी इसी प्रकार श्रुतामृत का पान करते हुए “श्री जिनशासन नमोऽस्तु शासन” का उद्योतन, पर्याय के अन्तिम निष्पर्ष तक करते रहे, यही शुभाशीष…!
इति शुभम् भूयात् ॐ नमः सिद्धेभ्यः

पावन वर्षायोग
सम्मीतनगर (फाफाडीह) रायपुर (छ.ग.)
भारत
२२.१०.२०२२

• श्री १०८ आचार्य विशुद्धसागर मुनि


कृति

दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

आशीर्वीद

श्री १०८ श्रमणाचार्य विशुद्धसागर मुनिराज

लेखक

पं. रमेशचन्द्र बाँझल
छत्रपति नगर, इंदौर, चलभाष : ९०९८५८०९२९

सम्पादन

प्रो. शान्तिलाल बड़जात्या
इंदौर, चलभाष : ९४०७००६६९६

प्रकाशक एवं प्राप्ति स्थल

स्वाध्याय मण्डल, रामाशाह मन्दिर
नेमिनाथ चौक, मल्हारगंज, इन्दौर

प्रथम संस्करण

भाद्रपद शुक्ल पंचमी, संवत् २०८०, सन् २०२३

प्रसार संख्या

११००

मूल्य

स्वाध्याय

प्राप्ति स्थान

(१) योगेन्द्र काला, इंदौर (चलभाष : ९८२७३०४००४)
(२) कमल पाटोदी, इंदौर (चलभाष : ९४०७०२९७९०)

मुद्रक

जैन राजेश कानूनगो
डिसेन्ट ग्राफिक्स, सुभाष चौक कार पार्किंग, इंदौर
(चलभाष : ९८२६०९४०४७)

शुभाशीष

उत्तम छिमा मार्दव आर्जव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं,
चहुँगति-दुःखते काढ़ि मुक्ति करतार हैं।।

जैन धर्म में पर्युषण पर्व का बहुत महत्त्व है। सम्पूर्ण समाज बड़े उत्साह, पूजा, भक्ति के साथ मनाती है; साधु-संत, विद्वान अलग-अलग धर्मों पर व्याख्यान करते हैं। दशलक्षण पर्व अपनी आत्मा को शिखर पर, जहाँ सिद्ध परमेष्ठी विद्यमान हैं, वहाँ की यात्रा कराने वाले सूत्र हैं, नादान को भगवान बनाने के लिए अचूक बाण हैं।

इन्दौर शहर के तत्व मनीषी, सहज स्वभावी व्यक्तित्व के धनी जिन्होंने कई महान कृतियों का सृजन करके समाज का उपकार किया है, ऐसे उच्च श्रेणी के विद्वान श्री रमेशचन्द्र बांझल ने धर्म की परिभाषाएँ, दशधर्मों को आगम, अध्यात्म से सजाकर आत्मधर्म देशना (दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन) नामक कृति का सृजन कर एवं कषाय क्यों आती है, इसके निरसन के उपाय पर प्रकाश डाला है। अतः सभी के लिए यह कृति उपयोगी बन जाएगी। यह कृति सभी की अज्ञानता को हरकर दश धर्म को नए रूप में पढ़ने, समझने का अवसर प्रदान करेगी।

पंडितजी! आपके द्वारा समाज को इसी तरह ज्ञानमृत मिलता रहे। आपकी कृति के लिए मंगल आशीर्वाद। आप चिरायु रहें। आपको शुभाशीष।
ज्ञानमृतं भोजनम्।

५ अगस्त, २०२३
चातुर्मास स्थल : मोदीजी की नसिया
मल्हारगंज, इन्दौर

  • श्रमणाचार्य विहर्षसागर
    (श्री १०८ आचार्य विहर्षसागर मुनि)

श्री दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन

१. दशधर्म चारित्र गुण की निर्मल पर्याय है।
२. क्रोधादि विकारों के अभाव से प्रकट होते हैं।
३. आ. पंडितजी सा. ने अपने विशेष क्षयोपशामिक ज्ञान के द्वारा सुन्दर, सरस, उत्तम वर्णन किया है।
४. हर एक धर्म का १५ व बीस प्रकार से वर्णन किया है तथाधर्म की महिमा व फल का भी उत्तम वर्णन है।
५. क्षमादि धर्म के बाधक क्रोधादिक विकारों की उत्पत्ति का दिग्दर्शन अच्छा किया है।
६. नव विवक्षा का ध्यान रखना भी परमावश्यक है।
७. यद्यपि धर्मों का वर्णन अनेकान्तिक भव्यात्माओं ने भी किया है, परन्तु भावनाओं में अन्तर दिखाई देता है।
८. जैसे क्षमादि धर्मों का क्रम मुझे खेती के दृष्टान्त से सरल लगता है।
जैसे क्षमा नाम पृथ्वी का भी है। अतः सर्वप्रथम क्षमाधर्म का वर्णन किया। तदनन्तर कोमल भूमि का होना मार्दव, सरल भूमि का होना आर्जव का, सत्य का बीज, शौच का जल, संयम की बाड़, तप की उष्णता, अनुपयोगी घास का त्याग (अलग करना) सिर्फ आकिंचन अकेले पौधे का रहना तथा अन्त में अपने में परिपक्व होना (स्वरूप में रमणता होना) ब्रह्मचर्य धर्म का वर्णन होना यह क्रम सम्यक् लगता है।
९. आ. पंडितजी सा. की लेखनी सतत चलती रहे ताकि स्वयं के लाभ के साथ-ही-साथ अनेक भव्यो का कल्याण होना भी उत्तम है।
१०. वस्तु के स्वभाव को धर्म (आत्मा की निर्विकार चेतना परिणति), उत्तम क्षमादि दश धर्म, रत्नत्रय धर्म, जीवों का रक्षण रूप धर्म, वीतराग धर्म, चारित्र धर्म, समभाव धर्म, मोह क्षोभ से रहित परिणाम ही धर्म है। अहिंसा धर्म, श्रावक व मुनिधर्म, व्यवहार व निश्चय धर्म आदि-आदि अनेक प्रकार से वर्णन जिनगम में पाया जाता है।
११. स्याद्वाद के द्वारा सम्यक् निर्णय कर अपना कल्याण अवश्य करें।
अन्त में आ. पंडितजी सा. शीघ्रातिशीघ्र सिद्ध पद को प्राप्त करें। यही मंगल भावना भाता हूँ।

  • रतनलाल जैन
    (पं. रतनलाल जैन, शास्त्री)
    इन्द्रभवन, इन्दौर

अनुपम कृति

‘दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन’ पंडित रमेशचन्द्र जी बांझल द्वारा लिखित अनुपम कृति है। शुभकामना सन्देश के निमित्त से इस कृति का पाण्डुलिपि के स्वाध्याय और अवलोकन का परम सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।

उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य रूप आत्मा के १० धर्मों के स्वरूप का व्यापक दिग्दर्शन इसमें है। यह धर्म आत्मा के विकास की १० अवस्थाएँ हैं। सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र के विकास के ये क्रमशः सोपान हैं।

क्षमा से लेकर ब्रह्मचर्य तक प्रत्येक धर्म की आद्योपांत व्याख्या अत्यन्त सरल और बोधगम्य शैली में की है। धर्म के वास्तविक अभिप्राय को समझकर चारित्रिक गुणों का विकास इस कृति का उद्देश्य है। उत्तम क्षमाभाव धारण करने पर अन्य धर्म भी धीरे-धीरे प्रकट होने लगते हैं। इसमें निश्चय और व्यवहार का समन्वय करते हुए १० धर्मों का अनुचिन्तन है। भाव, भाषा और शैली आदि दृष्टि से यह अनुपम कृति है।

प्रत्येक श्रावक इसका अध्ययन, मनन, चिन्तन और अनुपालन कर मुक्ति का पथ प्रशस्त कर सकता है।
जिनवाणी के सच्चे साधक परम आदरणीय पं. रमेशचन्द्र जी बांझल की विद्वत्ता और ज्ञान को प्रतिबिम्बित करती हुई इस कृति को नमन करते हुए यह शुभकामना करती हूँ कि यह अधिक से अधिक जनमानस को लाभान्वित कर सके।

ससम्मान सादर नमन।

  • डॉ. रेणु जैन
    कुलपति, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय
    इन्दौर

सबसे अलग है यह कृति

बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय पंडित रमेशचन्द्र बांझल इन्दौर द्वारा लिखित नवीनतम कृति ‘दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन’ पूर्व लेखकों द्वारा लिखित सभी कृतियों से अलग है। इस कृति का मैंने आद्योपांत अध्ययन किया। इसमें धर्म के सभी लक्षणों विस्तार से वर्णन तो किया ही गया है, साथ ही उन सभी लक्षणों को प्रायोगिक जीवन में उतारने की प्रक्रिया भी बताई गई है।

इस कृति में लेखक का मौलिक चिन्तन तो पग-पग पर दृष्टिगोचर होता ही है, साथ ही अपने चिन्तन की पुष्टि के लिए आगम के प्रमाणों की भरमार भी दिखाई देती है।

जो भी पाठक इसका गहराई से अध्ययन करेगा, उसे इस कृति की विषयवस्तु से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा और जीवन में आनन्द आए बिना न रहेगा।

  • डॉ. प्रवीणकुमार जैन शास्त्री
    प्राचार्य : डाईड्रीप शिक्षण संस्थान
    इन्दौर

प्राक्कथन

जगत् के सभी जीव दुःखों से मुक्त हो सुखी रहना चाहते हैं। सुखी होने का उपाय निज शुद्ध आत्मधर्म स्वरूप का श्रद्धान-ज्ञान-चारित्र (आचरण) का होना अत्यावश्यक है। शुद्धात्मधर्म का स्वरूप प्रतिपादन करते हुए १०८ समन्तभद्राचार्य रत्नकरण्ड श्रावकाचार में लिखते हैं-
देसियामि समीचीणं धम्मं कमनिव्वहणम्।
संसारदुःखत्तः सत्तलाणं यो धत्तुव्वमे सुखे।।२।।
अर्थ- समीचीन धर्म कर्म-संहार है जो जीवों को संसार के दुःखों से छुड़ाकर उत्तम सुख अर्थात् मोक्ष में धरता है स्थापित करता है, वह धर्म है।
१०८ कार्तिकेय स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखते हैं-
धम्मो वत्थुसहावो खमादिभावो य दसविहो धम्मो।
रयणत्तयं च धम्मो जीवाणं रक्खणं धम्मो।।४४६।।
अर्थ- जिस वस्तु का जो स्वभाव है, वह उस वस्तु का धर्म है।
उत्तम क्षमा आदि भावरूप धर्म (जीव का) दश प्रकार का है। प्रथम, निश्चय्यरूप रत्नत्रय धर्म है। द्वितीय, व्यवहाररूप स्व-पर जीवों की रक्षा करना भी धर्म है।
मैंने दशलक्षण धर्म का एक अनुचिन्तन; श्रुताभ्यास के बल से चिकित्सा पद्धति के अनुसार किया है। जिस प्रकार चिकित्सा शास्त्रों में स्वस्थ शरीर, स्वास्थ्य के लक्षणों का तथा स्वास्थ्य के विकृत करने वाले कारणों का, रुग्ण शरीर के लक्षणों का, रोग से होने वाली स्वास्थ्य की क्षति का, तथा रोग-निवारक आरोग्य-वर्धक औषध का और हित-मित आहार-विहार का प्रतिपादन होता है,

उसी प्रकार प्रस्तुत कृति में उत्तम क्षामादि दशलक्षण धर्मों का स्वरूप, धर्मों के लक्षणों का, धर्म को विकृत करने वाले कारणों का, विकृत आत्मधर्म के लक्षणों का, विकृति से होने वाली आत्मधर्म की क्षति का तथा विकृति-निवारक, आत्मधर्म-वर्धक चिन्तन एवं आत्मधर्म-स्वरूप में स्थिरता का प्रतिपादन करने हेतु एक लघु प्रयास किया है।

प्रस्तुत कृति के प्रारम्भ में अनादिनिधन उत्तम क्षमा आदि दशलक्षण धर्म का, वर्तमान कालापेक्षा आराधन करने का प्रारम्भ और प्रत्येक धर्म का पृथक्-पृथक् स्वरूप-लक्षण, तथा धर्म-घातक लक्षणों एवं उनसे निवृत्ति के उपायों का प्रतिपादन किया है।

प्रस्तुत कृति में निर्रन्थ्याचार्यों के प्रमाण भी समाहित किये गये हैं। मैं उन सभी आचार्यों एवं मुनि भगवन्तों को त्रियोग से समपिक कोटिशः नमोऽस्तु करता हूँ और विद्वानों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। आशीर्वाद प्रदाता १०८ आचार्य श्री विशुद्धसागरजी, १०८ आचार्यश्री विहर्षसागरजी और समस्त उपाध्याय, मुनिराजों को नमन करता हूँ।

प्रस्तुति कृति के पुरोवाक्, भूमिका, प्रस्तावना लेखकों का, शुद्धयार्थ पठन हेतु प्रो. शान्तिलालजी बड़जात्या, डॉ. प्रवीणजी शास्त्री, डाईरैक्ट्री जिनालय, इन्दौर, श्रीमती डॉ. रेणु जी जैन, कुलपति, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर का और श्री राकेशजी जैन तथा ग्रन्थ प्रकाशन हेतु स्वाध्याय मण्डल रामाशाहा मन्दिर एवं अर्थ सहयोगियों का हृदय से कृतज्ञ हूँ।

  • पण्डित रमेशचन्द्र बांझल
    ३४-बी, छत्रपति नगर, एयरपोर्ट रोड,
    इन्दौर (म.प्र.) ४५२००५
    चलभाष : ९०९८५८०९२९

सम्पादकीय

क्षमा मृदुजुत्ते शोचे सञ्चयं सव्वत्तयं।
त्यागोऽकिंचण ब्रम्ह धम्मो दसविहो स्मृतः।।
अत्यन्त हर्ष का अवसर है कि पण्डित प्रवर श्री रमेशचन्द्र जी बांझल ने ग्रन्थ रचना की श्रृंखला का नवीन ग्रन्थ “दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन” ग्रन्थ की रचना कर धर्म के दश लक्षणों का अनुपम, अद्वितीय विश्लेषण, चिन्तन, पूर्वाचार्यों के कथनों के आधार पर प्रस्तुत किया है। आदरणीय पण्डितजी ने सर्वप्रथम धर्म का स्वरूप ‘शुद्ध’ शब्द को सम्यग्दर्शन सहित वीतरागता की संसिद्धि का सूचक और प्रशंसा-वाचक विशेषण बताते हुए उसका महत्त्व प्रतिपादित किया है। दशलक्षण पर्व मनाने का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए वस्तु-स्वातंत्र्य और निज आत्मा की संसिद्धि करना बताया है अर्थात् स्वावलम्बन और अपने आत्मस्वरूप की प्राप्ति का उपाय दर्शाया है। इसको प्राप्त करने के लिए दस सोपान- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य का आलम्बन अनिवार्य है।
क्षमा का अभाव ही क्रोध है, अर्थात् अनिष्टकारक, कष्टदायी निमित्तों की उपस्थिति होने पर भी परिणामों में विकृति, क्षुब्धता का अभाव व साध्यभाव की प्रकटता; उत्तम क्षमा है। विशेष यह है कि पण्डितजी ने स्पष्ट किया है कि उत्तम क्षमा कारण है और उत्तम क्षमाधर्म कार्य है। कारण में कार्य का उपचार कर व्यवहार नय की विवक्षावश उत्तम क्षमा को ही उत्तम क्षमा धर्मरूप कथन कर दिया जाता है।
इसी प्रकार शेष मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य के प्रकरण में यही सुसंगत पद्धति अपनायी गई है।
उत्तम क्षमा के विस्तृत निरूपण के साथ उसके विरोधी क्रोध की परिभाषा और क्षमा और क्रोध में अन्तर बताकर क्रोध के विभिन्न प्रकारों का चिन्तन/प्रकटन अद्भुत है।
मान का अभाव मार्दव है। उत्तम मार्दव धर्म के स्वरूप का विविध विवक्षाओं से प्रतिपादन किया गया है। साथ ही मान कषाय की उत्पत्ति के कारण, भेद और मार्दवधर्म-घातक पर्यायवाची शब्दों के विश्लेषण से मनुष्यों द्वारा अपनायी गई मान कषाय के दुष्परिणामों से अवगत कराकर मार्दवधर्म अपनाने की प्रेरणा की विधि बतायी है। इस प्रकार मान कषाय के अभावपूर्वक मनुष्यों को नरक गति, तिर्यंच गति (विभिन्न प्रकार के मान और मदों की विवेचना करके) के दुःखों से

दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन

बनाने का मार्ग अवगत कराया है।

उत्तम आर्जवधर्म के विश्लेषण में १९ प्रकार से विवेचना की गई है। आर्जवधर्म की विरोधी मायाकषाय किस प्रकार आत्म-विशुद्धि नष्ट करती है, उसके १९ प्रकार बताकर उनसे बचने के लिए उत्प्रेरित किया है।

‘ऋजुभाव’ का नाम आर्जव है। यानी सरलता, खरापन, ईमानदारी, स्पष्टवादिता, निष्कपटता, विनम्रता, उदारता का होना आर्जव भाव है और इनके विपरीत कुटिलता, वक्रता, आदि भाव का होना मायाचारी है। मायाचारी के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करते हुए उनके अभाव के लिए प्रेरित किया गया है जिसके फलस्वरूप मनुष्य भव की सार्थकता, व्रत-शील-संयम का पालन, लोक-पूज्यता के साथ-साथ परमात्म-स्वरूप की अनुभूति और मोक्षसिद्धि होती है।

उत्तम शौच यानी शुद्धि, संस्कार, पवित्रता, मत्स्यभाव, भोगोपभोग की सामग्रियों तथा उनके प्रति मलिन परिणामों का त्याग तथा निज शुद्धात्म-स्वभाव की प्राप्ति। इसको २९ बिंदुओं द्वारा उत्कृष्टरूप से स्पष्ट किया गया है। शौच का अभाव लोभ है। कैसे-कैसे लोभ के परिणाम और कार्य होते हैं और उनका फल क्या है, यह २८ बिंदुओं द्वारा समझाया गया है जो कि सामान्य जन के परिचय में नहीं है। चिन्तन मौलिक व संकलन अद्वितीय है।

उत्तम सत्यधर्म के अन्तर्गत सत्यवचन और सत्यधर्म को परिभाषित करते हुए दोनों में अन्तर को स्पष्ट किया गया है। सामान्यतः सत्यवचन और सत्यधर्म एकस्वरूप ही समझे जाते हैं, इसको विभिन्न प्रकार से स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि सत्यवचन कारण है और सत्यधर्म कार्य है। इस भेद को २९ बिन्दुओं द्वारा विवेचित किया गया है और सत्यधर्म धारक का अन्तरंग व बाह्य प्रवर्तन अवगत कराया गया है। सत्य के अभावस्वरूप असत्य को व उसके भेदों को १५ प्रकार से समझाया गया है। सत्यधर्म की महिमा का सोदाहरण वर्णन कर उसके पालन के फल में सत्यधर्म-स्वभावी निज आत्मा की प्राप्ति की भावना की गई है।

संयम यानी नियन्त्रण, निग्रह, तपोनिरुद्ध, एकाग्रता। यानी जीव की स्वशुद्धात्मा में एकाग्रता रूप आत्म-नियन्त्रण। उत्तम संयम के भी कार्य-कारण का निरूपण २९ बिन्दुओं द्वारा कर जीवन में संयम की उत्कृष्टता को स्थापित किया गया है। संयम का घातक असंयम किस तरह हो सकता है इसे १९ बिन्दुओं में स्पष्ट किया गया है। संयमधर्म-स्वभावी निजत्मा में निमग्न रहने की प्रेरणा दी गई है।

उत्तम तप और तपधर्म में भेद बताकर तपधर्म की २३ प्रकार से विवेचना करके उनकी घातक वृत्ति-प्रवृत्ति भी प्ररूपण विशेषरूप से किया गया है।

उत्तम त्यागधर्म के प्रकरण में त्याग व दान में भेद बताते हुए बाह्य और अंतरंग त्याग का स्पष्टीकरण, अनिवार्यता तथा उत्तम त्याग और त्यागधर्म की विवेचना २९ बिन्दुओं में की गई है

दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन

जो कि अति विशिष्ट है। दान के प्रकरण में चारों प्रकार के दान और उसके घातक परिणामों, सप्त भयों और कार्यों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

उत्तम आकिंचन अर्थात् कुछ भी मेरा नहीं। परमाणुमात्र भी मेरा नहीं, केवल स्वशुद्धात्मा ही मैं हूँ, ऐसा निरूपण उत्तम आकिंचन्य है और इस भाव से सम्पन्न अनन्त गुणों से युक्त निजत्मा में निमग्न उत्तम आकिंचन्यधर्म है। उत्तम आकिंचन और आकिंचन्य धर्म में कारण-कार्य का सम्बन्ध स्थापित कर बाह्य और अंतरंग परिग्रह के त्याग का स्वरूप २६ बिन्दुओं में और उसका फल रागादि से भिन्न वीतराग-विज्ञानमयी निजतानुभूति कराना दर्शाया गया है।

उत्तम ब्रह्मचर्य के प्रकरण में ब्रह्मचर्य कारण है, ब्रह्मचर्यधर्म कार्य है- इसको ३५ बिन्दुओं से स्पष्ट किया गया है।

अब्रह्म होने के कारणों को १९ बिन्दुओं में समेटकर उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म का स्वरूप समझाकर उसमें निमग्न होकर सहज स्वभावी भगवान् आत्मा की प्राप्ति की प्रेरणा दी गई है।
अंत में, दश लक्षण धर्म पर्व का प्रारम्भ प्रथम दिन से प्रारम्भ होकर अन्त में मनाए जाने वाले ‘क्षमावाणी पर्व’ पर लेख चिन्तनीय व अवधारणाणीय और अनुकरणीय है। उत्तम क्षमा भाव में पूर्व के सभी नौ भावों (धर्मों) का समावेश बताकर क्षमावाणी पर्व को वृत्तिरूप से तथा प्रवृत्तिरूप से अर्थात् भावरूप से तथा क्रियारूप से, दोनों प्रकार से अपनाने की प्रेरणा देकर क्षमावाणी पर्व का सम्यक् स्वरूप समझकर सभी जीवों की विकारी विकल्पों से निवृत्त होकर साम्य भावों की प्राप्ति की प्रेरणा दी गई है।

मेरा उत्कृष्ट पूज्यौदय है कि आदरणीय पण्डितजी ने मुझ अल्पज्ञानी को इस योग्य समझा कि मैं इसकी टंकण सम्बन्धी त्रुटियाँ दूर करूँ और वाक्य-विन्यास में कहीं कुटन हो तो उसको अवगत कराकर निर्देशानुसार यथोचित संशोधन करूँ। मेरा परम सौभाग्य है कि हेतु मैंने ग्रन्थ को ३-४ बार पढ़ा, पण्डितजी के साथ बैठकर भी पढ़ा और धर्म के दश लक्षणों और उनके घातक परिणामों तथा प्रवृत्तियों को जानकर स्वयं के लिए तदनुसार कुछ चिन्तन करने को और अपनाने की प्रेरणा प्राप्त की।

दशलक्षण धर्मों के बारे में और उनके घातक विरोधी परिणामों-कार्यों के बारे में इतना विशद वर्णन दुर्लभ ही है। पण्डितजी का अध्ययन, मौलिक चिन्तन, भाषा, प्रवचन शैली, शब्द-भण्डार आदि अद्भुत है और यह बात उनके द्वारा विगत ४०-४५ वर्षों से रामाशाह मन्दिर, मल्हारगंज, इन्दौर में किये गये प्रवचनों से और नियमितरूप से उपस्थित धर्म पिपासु, ज्ञान पिपासु महिला-पुरुषों की शताधिक उपस्थिति से प्रमाणित है।

विगत वर्षों में पण्डितजी के स्वरचित १० ग्रन्थ, परमार्थ पूजन की पुस्तक और पण्डित आशाधरजी द्वारा विरचित सहरनाम की व्याख्या, अभिनव जिनपूजन सन्देह आदि प्रकाशित हो

दश लक्षण धर्म : एक अनुचिंतन

चुकी हैं। सभी साधर्मी जनों ने विशेष उत्साह के साथ इनका अध्ययन कर अपने आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ की वाचना भी रामाशाह मन्दिर में हो चुकी है, तभी से श्रोतागणों का आग्रह था कि इसका शीघ्र प्रकाशन किया जाये। विलम्ब से सही, पर कार्य अन्ततः पूर्ण हुआ क्योंकि काललब्धि अभी भी पकी थी। विलम्ब के लिए मैं सभी से क्षमाप्रार्थी हूँ।

मैं परम पूज्य १००८ आचार्य श्री विशुद्धसागरजी को, परमपूज्य १००८ आचार्य श्री विहर्षसागरजी को शत-शत बार नमोऽस्तु करता हूँ। उन्होंने ग्रन्थ हेतु आशीर्वचन देकर अनुगृहीत किया है। इसी प्रकार देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर की स्वाध्याय, अध्ययनशील कुलपती श्रीमती डॉ. रेणु जैन और डाईडीप जिनालय स्थित विद्यालय के आचार्य डॉ. प्रवीणकुमार जी शास्त्री का भी उनकी विचारों की प्रस्तुति के लिए आभारी हूँ।

पुस्तक के संशोधन में आदरणीय पण्डित डॉ. प्रवीणजी शास्त्री, प्राचार्य डाईडीप जिनालय, इन्दौर, श्री राकेश जी जैन, बड़वाली चौकी, इन्दौर ने भी श्रमसाध्य कार्य किया, उनका मैं हृदय से आभारी हूँ। पुस्तक प्रकाशन में समस्त अर्थ सहयोग प्रदाता और प्रकाशक स्वाध्याय मण्डल, रामाशाह मन्दिर, मल्हारगंज, इन्दौर और अन्य धर्मानुरागी श्रोताओं का भी मैं आभारी हूँ। पुस्तक के व्यवस्थित और निर्दोष टंकण के लिए श्री नितिन पंजाबी और उत्तम मुद्रण व्यवस्था के लिए श्री राजेश कानूनगो (डीसण्ट ग्राफिक्स, इन्दौर) का भी आभारी हूँ।

इस पुस्तक की टंकण की त्रुटियों को सुधारने में मैंने अपनी बुद्धि-प्रमाण पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया है, फिर भी त्रुटि रह जाना असम्भव नहीं है। सुधीजन ज्ञात त्रुटियों से अवगत कराएँ। मैं उन त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। मेरी भावना है कि आदरणीय पण्डितजी विरचित दशलक्षण धर्मों का यह श्रेष्ठतम, अद्भुतपूर्व, अद्वितीय चिन्तन-अनुचिन्तन, प्रस्तुति हम सबको मोक्षमार्ग में बढ़ने में प्रेरणा-स्रोत बने और पण्डितजी दीर्घायु होकर इसी तरह जिनागम के रहस्यों को उद्घाटित करते रहें।

जिनधर्मानुरागी

अन्तरिक्ष विज्ञान दिवस
दि. २३ अगस्त २०२२
इन्दौर

प्रो. शान्तिलाल बड़जात्या
२३, रामचन्द्र नगर मुख्य
इन्दौर-४५२००६
चलभाष : ९४०७०८६६९६
ई-डाक पता : बड़जात्याशान्ति@डाटामेल.भारत

विषय सूची

क्र. विषय पृष्ठ संख्या

  1. आचार्यश्री विशुद्धसागरजी के आशीर्वचन
  2. आशीर्वचन- आचार्यश्री विश्वेभसागरजी
  3. दशलक्षण धर्म : एक अनुचिन्तन- पं. रतनलालजी शास्त्री द्वारा शुभाशीष
  4. अनुपम कृति- डॉ. श्रीमती रेणु जैन
  5. सबसे अलग है यह कृति- डॉ. प्रवीण कुमार जैन, शास्त्री
  6. प्राक्कथन
  7. सम्पादकीय
  8. दशलक्षण धर्म- एक अनुचिन्तन 14
  9. उत्तम क्षमाधर्म 19
    क्रोध 27
  10. उत्तम मार्दवधर्म 43
    मान 49
  11. उत्तम आर्जवधर्म 68
    माया कषाय 71
  12. उत्तम शौचधर्म 89
    लोभ कषाय 93
  13. उत्तम सत्यधर्म 115
    असत्य 123
  14. उत्तम संयमधर्म 136
    असंयम 145
  15. उत्तम तपधर्म 153
    उत्तम तपधर्म के विविध प्रकार 157
  16. उत्तम त्यागधर्म 171
    दान और त्याग 174
  17. उत्तम आकिञ्चन्यधर्म 189
    परिग्रह 193
  18. उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म 205
    अब्रह्म 211
  19. क्षमावाणी 221
  20. सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 224

दशलक्षण धर्म-एक अनुचिन्तन

मंगलाचरण

सर्वज्ञ देव के भाषित उत्तम क्षमा आदि दश धर्म।
सम्यग्दर्शन सहित जो धारे, वह हो परम सुखी निष्कर्म।।

संसार-मनुष्य पर प्रदर्शन और प्रसिद्धि के लिए अनेक प्रकार की क्रान्तियाँ होती हैं, उनका मानव-जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। उनका जीवन में न तो प्रवर्तन किया जाता है, न स्मरण किया जाता है और न कोई पर्व की संज्ञा दी जाती है। जो क्रान्ति जगत् कल्याण के लिए होती है वह अविकल परम्परानुरूप जीवन में आचरणार्थ पर्व के रूप में स्थापित हो जाती है।

पर्व का अर्थ- आत्म-हितकर, आनन्दप्रद माङ्गलिक कार्य के प्रारम्भ का अवसर; पर्व है। पर्व; मनुष्य जीवन की निराशा, नीरसता एवं सन्ताप को मिटाकर; उत्साह, मैत्री, प्रमोद आदि सद्भावों की वृद्धि कर सुख-शान्ति प्रदान करते हैं। पर्व; देश, समाज और धर्म की संस्कृति के प्रतीक हैं।
पर्व; राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक के भेद से तीन प्रकार के हैं। धार्मिक पर्व; तात्कालिक और त्रैकालिक के भेद से दो प्रकार के हैं। तात्कालिक पर्व मोक्षमार्गमी महत्-पुरुषों के जीवन से सम्बन्धित होते हैं, जैसे तीर्थङ्करों के गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, दीक्षाकल्याणक, ज्ञानकल्याणक, निर्वाणकल्याणक की तिथियाँ। कतिपय पर्व; पुराण-पुरुषों की अतिशय घटना से सम्बन्धित होते हैं, जैसे अक्षय तृतीया, रक्षाबन्धन आदि।

त्रैकालिक पर्व; किसी पुराण-पुरुष के जीवन से या कोई विशेष घटना से सम्बन्धित नहीं, अपितु सार्वभौमिक, सार्वकालिक, शाश्वत होते हैं। उनके मनाने का प्रयोजन जन-रञ्जन, मन-रञ्जन, कल-रञ्जन नहीं; अपितु निजालम-विशुद्धि के लिए होता है। अतः ये सर्व क्षेत्रों और सर्व कालों में मनाये जाते हैं। इन पर्वों के माध्यम से मनुष्य मोह-राग-द्वेष आदि कषाय-

भावों को नाश कर, उत्तम क्षमा आदि दश लक्षणरूप धर्म की संसिद्धि एवं संवृद्धि को, मोक्ष प्राप्त करता है। वह सादि-अनन्त काल तक शाश्वत सुख भोगता है।
‘दशलक्षण धर्म’ पर्व का अपर नाम ‘पर्युषण पर्व’ भी प्रचलित है। पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है- ‘परि उष समात् सवात् भावाः इति पर्युषणा’ अर्थात् चारों ओर से विषय-कषायों से सिमटकर, धर्म-वृद्धि के निमित्त वीतराग श्री जिनेन्द्रदेव की पूजन-अर्चन द्वारा निजालम-धर्म की संसिद्धि कर उन जैसा ही बनना और मोक्ष प्राप्त करना। इस अपेक्षा से ‘दशलक्षण धर्म’ पर्व का अपर नाम ‘पर्युषण पर्व’ सार्थक है।

दशलक्षण धर्म-पर्व, मिथ्यात्व-रागादि समस्तविकल्प-जालों के परिहारपूर्वक निज शुद्धात्म-स्वभाव में निमग्न रहने के अनुष्ठान का पर्व है। इस पर्व में कल्याणमयी, कल्याणकारक उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि दशलक्षण निजालम-धर्म की आराधना की जाती है। यह पर्व वर्ष में तीन बार - माघ, चैत्र, भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

जैनदर्शन में जितने भी धार्मिक पर्व हैं, उन सभी के मनाने का उद्देश्य अपने में वीतराग भावों सहित ज्ञान-वैराग्य शक्ति की संवृद्धि करना है। ‘दशलक्षण धर्म’ पर्व में उत्तम क्षमा आदि गुण-धर्मों की आराधना सम्यग्दर्शन-पूर्वक होने से इसे महापर्व की संज्ञा है।

धर्म- आत्मधर्म तो एक है। उसे समझने के लिए उसके लक्षण दश हैं। धर्म के माध्यम से जीव को दशलक्षण में संवर-धारण करने की सामर्थ्य प्रकट होने से इसे ‘धर्म’ की संज्ञा सार्थक है।

‘आत्मानुशासन’ में आचार्य गुणभद्र लिखते हैं- धर्म वह है, जिसके होने पर अधर्म न हो। धर्म, वस्तु का स्वभाव है। जीव का स्वभाव सुख है।
‘धर्म’ शब्द ‘धृ’ धातु से निष्पन्न है। उसका व्युत्पत्ति अर्थ है- जो धारण कराता है या जिसके द्वारा धारण किया जाता है, वह धर्म है। अथवा जो जीव को इष्ट स्थान में धरता है, वह धर्म है। या जो जीव को कर्मों का निवारण कर, संसार के दुःखों से उठाकर उत्तम (आत्म) सुख में धरता है, वह धर्म है।

१. तेषां संवरधारणासामर्थ्यदधर्म इत्येषां संज्ञा अनवद्येति (रा.वा.।) २. धर्मो यत्र नाधर्मः /४६।
३. वत्थु सहवो धम्मो। ४. धार्यते लोकोऽनेन इति धर्मः। (रा.वा.) ५. इष्ट स्थाने धत्ते इति धर्मः। (स.सि.)
६. देशावधि समीचीने धर्म कर्म निवारणम्।
संसार-दुःखान् सत्वान् च धरत्युत्तमे सुखे।। -र.का.श्रा

दश लक्षण धर्म: एक अनुचिंतन

आगम में धर्म का निरूपण दो प्रकार से है- १. व्यवहार धर्म २. निश्चय धर्म। व्यवहारधर्म-जीवों की संसार के दुःखों से रक्षा करनेरूप दया-विशुद्धि है। निश्चयधर्म - अहिंसारूप है अर्थात् रागादि की अनुपत्तिरूप है। जो जीवों को मिथ्यात्व, रागादि समस्त सङ्कल्प-विकल्पों में संसरण करनेरूप भावसंसार से विस्थापित कर, मोह-क्षोभ-विहीन निर्विकार परम शुद्ध स्वसमयरूप- निज चैतन्य में स्थापित (धरण) करता है वह धर्म है।१ सम्यक्ता, ममता, माध्यस्ता, शुद्ध भाव, वीतरागता, चारित्र धर्म, स्वभाव की आराधना आदि धर्म के एकार्थवाची नाम हैं।२
सर्व विभाव-भावों से विमुक्त आत्मसुख-स्वरूप उत्तम क्षमा आदि धर्म के दशलक्षण हैं।
उत्तम- ‘उत्तम’ शब्द प्रशंसा-वाचक विशेषण है। प्रत्येक धर्म के साथ प्रयुक्त उत्तम विशेषण सम्यग्दर्शन सहित वीतरागता की संसिद्धि का सूचक है। अर्थात् आत्मा के क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि दश धर्म सर्वोत्कृष्ट हैं, प्रशंसनीय हैं। ये दशलक्षण धर्म सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र गुण की निर्मल पर्यायें हैं। सम्यग्दर्शन को धर्म का मूल कहा है।३ सम्यग्दर्शन धर्म का मूल होने से धर्म का प्रारम्भ भी सम्यग्दर्शन से ही होता है। सम्यग्दर्शन-सहित सम्यग्ज्ञानमयी ज्ञानक्रिया मोक्ष का कारण है।४ बाह्य में दान-पूजा, व्रत-शील, संयम, उपवास आदि करना; सम्यग्दर्शन के साथ होने पर मोक्ष के साधनभूत कारण हैं।५
धर्म के पात्र- धर्म के पात्र श्रमण और श्रावक हैं। दशलक्षण धर्मों की प्रकटता श्रमणों में मुख्य है और श्रावकों में गौणरूप है।
श्रमणों में चार चौकड़ी कषाय व नव नोकषाय के अभाववरूप अर्हन्त और तीन चौकड़ी कषाय के अभाववरूप मुनि भगवन्त हैं और श्रावकों में दो चौकड़ी कषाय के अभाववरूप व्रती प्रतिमाधारी श्रावक और एक चौकड़ी कषाय के अभाववरूप अविरत सम्यग्दृष्टि श्रावक होते हैं।
श्रमण; दशलक्षण धर्म और रत्नत्रय की एकता पूर्ण कर, निर्वाण प्राप्त करते हैं। श्रावक; धर्म-धर्म का एकदेश पालन करता हुआ सर्वदेश पालन करने को उद्यमवन्त रहता है। उसका बाह्य प्रवर्तन निर्ग्रन्थों की भक्तिपूर्वक, विनयी, दयामयी, हितमित-प्रिय सम्भाषी; उपशम भावी और विपरीत वृत्ति-प्रवृत्ति वालों के प्रति मध्यस्थ होता है। वह देव-पूजा आदि छः कर्मों और समता आदि छः आवश्यक रूपों प्रवर्तित रहता है। संवेग-वैराग्य की वृद्धि के लिए
१. प्र.सा. ता. वृ. ७/१। २. न.च.वृ. २५६। ३. दंसण मूलो धम्मो। (द.पा.मू. २)। ४. र.सा. १०५। ५. भा.स. ४०४।

जगत-काय का स्वभाव और द्वादश अनुप्रेक्षाओं का चिन्तन निरन्तर करता है।
धर्म का प्रारम्भ- भरत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल होता है। प्रत्येक काल के छः-छः भेद होते हैं। अवसर्पिणी-काल में दुःखम-दुःखम-दुःखमा-काल के उनचास दिन कम इक्कीस हजार वर्ष बीत जाने पर श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से सात-सात दिन तक विभिन्न प्रकार की विशिष्ट वर्षा होती है, भयदायक घोर प्रलय होता है। उस समय पर्वत, शिला आदि को चूर्ण कर देने वाली सात दिन तक संवर्तक-वायु चलती है। उसी समय मेघ गम्भीर-गर्जना सहित तुहिन और क्षार-जल तथा विषैले जल में से प्रत्येक सात दिन तक बरसते हैं। इसके अतिरिक्त मेघों के समूह धूम्र-धूलि, वज्र एवं दुष्टेक्ष्य ज्वाला; इनमें से प्रत्येक सात दिन तक बरसते हैं।१
पश्चात् उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ में सात दिन तक पुष्कर मेघ सुखोत्पादक जल की वर्षा होती है, जिससे वज्राग्नि से जली हुई पृथ्वी शीतल हो जाती है। क्षीरमेघ सात दिन तक क्षीरजल की वर्षा करते हैं। इसके पश्चात् अमृत मेघ अमृत की वर्षा करते हैं। रसमेघ सात दिन तक दिव्यरस की वर्षा करते हैं, जिसके माध्यम से सुकाल पकता है और लोग पुनः अहिंसक वृत्ति की धारण कर लेते हैं। पश्चात् भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी से मनुष्य, धर्म की आराधना प्रारम्भ करते हैं। इस कालचक्र की अपेक्षा उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ से इस भरत क्षेत्र में दशलक्षण धर्म के प्रारम्भ का पर्व मनाया जाता है। यद्यपि यह पर्व भाद्रपद, माघ और चैत्र; इन तीनों माहों में शुक्ल पक्ष की पञ्चमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है।
दशलक्षण धर्म का पर्व मनाने का प्रयोजन- यह पर्व मनुष्य को वस्तु-स्वातन्य का बोध कराने और निजात्मा के उत्तम क्षमा-मार्दव-आर्जव आदि दश धर्मों की संसिद्धि करने के प्रयोजन से मनाया जाता है।
जीव; अनादि से मोह-राग-द्वेष आदि विकारी भावों से ग्रस्त रह दुःखी रहा है। ये विकारी भाव आत्मा में मलिनता के उत्पादक और संसार-परिभ्रमण के हेतु हैं, आत्मा के शुद्ध स्वभाव को आवरित रखते हैं, प्रकट नहीं होने देते हैं। अतः आत्मस्वभाव के घातक हैं।
ये विकारी भाव काषाधिक भाव हैं जो अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन के भेद से चार प्रकार के हैं। प्रत्येक भेदरूप कषाय में क्रोध-
१. ति.प. १५४९-१५५०

मान-माया-लोभ- ये चारों कषायें गणित होने से प्रत्येक भेद को चौकड़ी कहते हैं। अनन्तानुबन्धी आदि चौकड़ी में क्रमशः जितनी-जितनी चौकड़ी का अभाव होता है, उतनी-उतनी आत्मधर्म में शुद्धि प्रकट होती है। चारों चौकड़ी कषायों के अभाव होने पर सम्पूर्ण आत्मशुद्धि प्रकट होकर, अर्हन्त अवस्था प्रकट हो जाती है।
मनुष्य में एक चौकड़ी कषाय के अभावानुरूप लेश्या की विशुद्धि और इन्द्रियों के विषयों-भोगों से विरक्ति तथा वीतरागतानुप आत्मधर्म की संवृद्धि होती है। धर्म का प्रारम्भ चतुर्थ गुणस्थान से होता है और पूर्णता तेरहवें गुणस्थान में होती है।
दशलक्षण धर्म का क्रम- यहाँ धर्म का अर्थ है- आत्मा की आनिमित्तिक, निरूपाधिक, सहज, शाश्वत वृत्ति। उसकी अनुभूति कराने वाले धर्म के लक्षण दश हैं। धर्म; दश नहीं है, धर्म तो एक ही है।
‘तत्त्वार्थ सूत्र’ में धर्म के दश लक्षणों का क्रम इस प्रकार है- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन्य और ब्रह्मचर्य। इस क्रम का कारण कषाय के अभाव के क्रमानुसार है।
कषायें चार प्रकार की हैं- क्रोध, मान, माया और लोभ। क्रोध कषाय के अभाव से उत्तम क्षमाधर्म, मान कषाय के अभाव से उत्तम मार्दवधर्म, माया कषाय के अभाव से उत्तम आर्जवधर्म और लोभ कषाय के अभाव से उत्तम शौचधर्म प्रकट होता है। इन चारों धर्मों से मनुष्य सत्-स्वरूप निजात्मा का आश्रय कर; उत्तम सत्यधर्म प्रकट करता है। उत्तम धर्म की प्रकटता से सत्य धर्म की आत्मा के प्रदेशों का परिस्पन्दन नियन्त्रित और वृत्ति-प्रवृत्ति नियन्त्रित होने से उत्तम संयमधर्म प्रकट होता है। उत्तम संयमी की संसार-शरीर सम्बन्धी समस्त इच्छाओं का निरोध हो जाता है। उससे उत्तम तपधर्म प्रकट होता है। उत्तम तपधर्मों के राग-द्वेष आदि का अभाव और विषय-भोगादि के निरोध से उत्तम त्यागधर्म प्रकट होता है। उत्तम त्यागधर्म के बाह्याभ्यन्तर चौबीस भेदरूप परिग्रह किञ्चित् भी न होने से उत्तम आकिञ्चन्यधर्म प्रकट होता है। उत्तम आकिञ्चन्यधर्म के अपने शुद्ध ब्रह्म स्वभाव में निमग्न रहने से उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म प्रकट होता है।
पर्व के दिन दश और आत्मधर्म के लक्षण भी दश हैं। इसलिए भव्यों को समझाने के लिए एक-एक दिन, एक-एक धर्म को समझाया जाता है।

उत्तम क्षमाधर्म

मंगलाचरण

क्रोध-अनन्त से दहत है, ज्ञान चेतना-भूप।
उत्तम क्षमाधर्म-भावों से, पावे शान्ति अनूप।।

क्षमाधर्म के पूर्व ‘उत्तम’ विशेषण का प्रयुक्त होना सर्वोत्कृष्ट प्रशंसावाचक एवं सम्यग्दर्शन का सूचक है। उत्तम क्षमाधर्म के सम्बन्ध में आचार्यों ने विविध विवक्षाओं से प्ररूपण किया है; किन्तु सभी का अभिप्राय एक ही है।

‘धवलाजी’ में आचार्यदेव उत्तम क्षमाधर्म का स्वरूप प्रतिपादन करते हुये लिखते हैं- 'निरपराध-स्वरूप निजात्मा के स्वभाव के सम्मुख होकर अपराध को पुनः न होने देना उत्तम क्षमाधर्म है।'१ अपराध का अर्थ है- आत्मा का संसिद्धि के विपरीत प्रवर्तन करना और निरपराध का अर्थ है- आत्मा की संसिद्धि के अनुकूल प्रवर्तन करना।

अज्ञानी, मिथ्यादृष्टियों द्वारा त्रासपूर्वक अपने शरीर का वध होता हुआ जानने पर भी अवध्य-स्वरूपी निजात्मा के परम ब्रह्मभावमयी साम्यभाव में स्थित रहना; उत्तम क्षमा है और उससे प्रकट समरसी-भावमयी परमानन्द उत्तम क्षमाधर्म है।२

अज्ञानीजनों द्वारा अप्रिय, कटुक, कठोर वचन बोलने या त्रास देने के भावरूप जो उद्यम वर्त रहा है, वह मेरे द्वारा बाँधे गये पूर्वकृत कर्मों का फल है। उनका कोई दोष नहीं है। यह प्रथम प्रकार की उत्तम क्षमा है। अज्ञानीजनों को मुझे ताड़ने का, मेरा वध आदि करने का भाव हुआ है, वह मेरे सत्कृत (पुण्य) से दूर हुआ- यह द्वितीय प्रकार की उत्तम क्षमा है।३ दोनों प्रकार की उत्तम क्षमा से मुझे आकाशवत् निर्मल, अखण्ड आत्मानन्द का प्रकट होना, उत्तम क्षमा-धर्म है।

क्रोध की उत्पत्ति के निमित्त असह्य आक्रोश आदि के सम्भव होने पर कालूष्यभाव नहीं होना क्षमा है।४

मुनि भगवन्त अपने शरीर की स्थिति अल्प जानकर, समाधि-स्वरूप रहने के लिए, अपना सङ्ग छोड़कर अन्य आचार्य-भगवन्तों के सङ्घ में जाते हैं। उस समय मार्ग में यदि दुर्जन उपहास, अवज्ञा, ताड़न, शरीर का व्यापादन (वध) करें तो भी उनके प्रति कलुष
१. ध.१२.१. नि.सा.ता.वृ. ११५। २. नि.सा.ता.वृ. ११५। ४. क्रोधोत्पत्तिनिमित्तासह्यक्रोशादिरसम्भवे कालूष्योपशमः क्षमा।

परिणाम न होना उत्तम क्षमा है।१ उससे प्रकट ज्ञानशरीरी निज शुद्धात्मा का आनन्द-स्वरूप सुखारस उत्तम क्षमाधर्म है।

क्षमा वह है जहाँ क्रोध न हो अर्थात् जीव को अनिष्टकारक, पीड़ादायक निमित्त-कारणों के मिलने पर स्वयं के परिणामों में क्रोध की उत्पत्ति न होना और साम्यभाव में बना रहना उत्तमक्षमा है।

जिस प्रकार सम्यग्दर्शन कारण है और सम्यग्ज्ञान कार्य है, सम्यग्ज्ञान कारण है और सम्यक्चारित्र कार्य है, उसी प्रकार उत्तम क्षमा कारण है और उत्तम क्षमाधर्म कार्य है। कारण में कार्य का उपचार कर व्यवहार नय की विवक्षावश उत्तम क्षमा को ही उत्तम क्षमाधर्म से निरूपित किया है।

उत्तम क्षमाधर्म के स्वरूप का प्रतिपादन विविध विवक्षाओं से किया जाता है-
१. निज शुद्धात्म-स्वरूप के अभिमुख रहना उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट शुद्धात्म-स्वरूप का आनन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
२. निज शुद्धात्म-स्वरूप को सर्वदेव के ज्ञानानुसार मानना, जानना और उसी में रम जाना, उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट सर्वज्ञदेवमयी निज आत्मानन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
३. काय-वचन-मन की स्वशुद्धात्मा में एकाग्रता; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अयोग-स्वरूपी परमानन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
४. आत्मा-अनात्मा के भिन्नत्व भाव की प्रकटता; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट आत्मा का आत्मीय अभिन्नत्व का आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
५. निज शुद्धात्म-गुणों का सम्वर्धन करना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अनन्त शुद्ध गुणमयी निजानन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
६. निजाल-स्वभाव को स्वस्थ-सुरक्षित रखने का भाव; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट स्वरूपस्थ रहने का परमानन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
७. निर्विकार निजाल-स्वरूप प्राप्ति का पुरुषार्थ; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अविकार-स्वरूप निजात्मानुभूति; उत्तम क्षमाधर्म है।

१. स.सि. ९/५।

८. क्रोध-कषाय के अभाव से सम्यग्दर्शनसहित अक्रोध-स्वरूप में निमग्न रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट शाश्वत, शान्तिमयी अतीन्द्रिय आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
९. क्रोध-कषाय की उत्पत्ति के कारणभूत उपसर्ग आदि के होने पर पृथ्वी की भाँति क्षमा-स्वभावी निज शुद्धात्मा में स्थित रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट अचल निजात्मानन्द-स्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१०. पर-निमित्तक व्यग्र भावों से निज उपयोग को व्यावृत्त/पृथक् करके अनिमित्तक अव्यग्र-भावमयी, सहज शान्ति-स्वरूप निजात्मा में निमग्न रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट शान्तस्वरूप सुखानुभूतिरस; उत्तम क्षमाधर्म है।
११. बाह्य में उत्तम क्षमाधर्म के स्वरूप का प्रतिपादन विविध विवक्षाओं से किया जाता है-
१२. स्वयं के द्वारा कृत-कारित-अनुमोदित दोषों की निवृत्तिपूर्वक निर्दोष स्वभावी निजात्मा के आश्रय से निगुर्छन, निर्दोष परिणामों का होना; उत्तम क्षमा है। उससे अप्रकट, अकारित, अननुमोदित समरसीभावमयी निजात्मानुभूतिरूप आनन्द; उत्तम क्षमाधर्म है।
१३. जगत् में प्रत्येक वस्तु का परिणमन स्वकीय योग्यतानुसार ही है। अपना भला-बुरा, हित-अहित अपने ही परिणामों से होता है। पर से नहीं होता है। पर-वस्तु का परिणमन स्वतन्त्र है। ऐसा जानकर परिणामों को उद्विग्न न कर, सहज शान्तिस्वरूप रहना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट सहज समता-स्वरूप निजात्मानुभूतिरूप आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१४. मिथ्यात्व के कारण जीव के श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र का परिणमन अन्यथा होने से उपयोग व्यग्र हो रहा है। उपयोग की व्यग्रता का शमन सम्यग्दर्शनज्ञान-चारित्र से करना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट रत्नत्रयी साम्य-भावमयी निजात्मानुभूतिरूप आनन्दस्वरूप सुखारस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१५. जीव, परार्थ-दृष्टि के कारण मूढ़ हो रहा है। मूढ़ता से उपयोग में अत्यन्त क्लेशित होता है। जीव द्वारा अपनी मूढ़ता को छोड़कर अपने द्रव्यत्व, गुणत्व, पर्यायत्व की शुद्ध दृष्टि को दृढ़ करना; उत्तम क्षमा है। उससे निर्मूढ़, प्रकट मोक्षविहीन

सद्भाव-स्वभाव उत्तम क्षमाधर्म

साम्यभावमयी, अकषाय, परमानन्द-स्वरूप सुखप्रस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१६. जीव, अनादि के अकषाय-स्वभावी निजात्म-तत्त्व को विस्मृत कर, काषायिक भावों में सुख के भ्रम से प्रवर्तन करता आ रहा है। इन काषायिक भावों से विमुक्त, अकषाय-स्वरूप निजात्मा में निमग्नता; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट निष्कषायमयी वीतराग परमानन्दस्वरूप की अनुभूतिरूप सुख रस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१७. वस्तु-स्वातंत्र्य के बोध बिना, पर-द्रव्यों के परिणमन में इष्ट-अनिष्ट की कल्पना से उपयोग उद्दलित हो जाता है। उद्दलित उपयोग को वस्तु-स्वातंत्र्य का बोध कराकर पर-द्रव्यों के परिणमन में इष्ट-अनिष्ट की कल्पना को विलोपित करना; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट निज शुद्धात्मा का अकम्प ज्ञाननन्दस्वरूप सुखप्रस; उत्तम क्षमाधर्म है।
१८. पर-द्रव्य-गुण-पर्याय का अकर्तृत्व का परिणमन; उत्तम क्षमा है। उससे प्रकट स्वतन्त्रता एवं स्वावलम्बनरूप परम शान्तिस्वरूप सुखप्रस; उत्तम क्षमाधर्म है।

शुद्धभाव-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

शुद्धभावस्वरूप उत्तम क्षमाधर्म से आत्मा के सर्व गुणों में उत्तरोत्तर शुद्धि की वृद्धि होती है। दर्शन, ज्ञान, चारित्र में जितने-जितने अंशों में रागरूप अशुद्धि का अभाव होता जाता है, उतने-उतने अंशों में वीतरागता की वृद्धि होती जाती है, जो कि कर्मों के अवबन्धन और मोक्ष का कारण है। दूसरे शब्दों में, जीव को पराय-दृष्टि का विलाय और द्रव्यत्व-दृष्टि का प्रादुर्भाव (प्राकट्य) होता है और आत्मा के अनन्त गुणों में उत्तरोत्तर शुद्धि की वृद्धि होती जाती है।
जगत् में जीव जो भी कार्य करता है वह स्वयं के हित के लिए करता है। उत्तम क्षमाधर्म का धारण भी आत्महित के लिए करता है। आत्महित की दृष्टि से किये गये कार्यों से आत्मा में शुद्धि की वृद्धि होती है। यथा; उत्तम क्षमाधर्मी १०८ यशोधर मुनिराज के समागम में रानी चेल्हना सहित राजा श्रेणिक आया। महामुनिराज से धर्म-वृद्धि का आशीर्वाद सुनने से राजा श्रेणिक के क्रोधरूप कलुषता का नाश और शुद्ध भावों की अतिशय वृद्धि हुई।

सुख-स्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

उत्तम क्षमाधर्म सुख-स्वरूप है। जीवों को बाह्य-अभ्यन्तर में कोई दुःख नहीं होता है; क्योंकि जगत् के समस्त द्रव्यों का परिणमन स्वकीय योग्यतानुसार होता है। कोई भी द्रव्य, किसी अन्य द्रव्य को परिणमाता नहीं है। पर-द्रव्यों के परिणमन को अनुकूल-प्रतिकूल न समझने से इस लोक और परलोक सम्बन्धी समस्त दुःखों का नाश और सहज आत्म-सुख प्रकट होता है।

अनिष्ठ-अभावस्वरूप उत्तम क्षमाधर्म

उत्तम क्षमाधर्मी को कोई भी द्रव्य अनिष्ट प्रतीत नहीं होता है। पर-द्रव्यों के प्रति अनिष्ट प्रतीति तो मन की भ्रान्ति है, द्वेषरूप क्रोध है। किसी भी जीव का क्रोधरूप परिणमन, पर-जीवों की अनिष्टरूप नहीं होता है, अपितु स्वयं का ही अनिष्ट होता है। उत्तम क्षमाधर्म का धारक तो पर के क्रोध को उसका औदयिक भाव जानकर उत्तम क्षमाधर्ममय रहता है, पर के प्रति उदासीन रहता है।

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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