दया मेरा धर्म विचार — जैन स्वाध्याय सामग्री | Daya Mera Dharm Vichar

दया मेरा धर्म विचार

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श्री दशलक्षण व्रत मंडल विधान का माडना


आत्म कल्याण के लिए दश प्रकार की प्रवृत्तियों को आचरित करने का उपदेश केवली भगवानों ने दिया है। मानव से महामानव और महामानव से अर्हंत पद तक पहुँचने के लिए यह दश लक्षण धर्म ही लोकोत्तर है। प्रत्येक धर्म की आराधना के साथ उनके प्रमुख भेदों की आराधना के अर्थ इस विधानमें आराधे गए हैं। यह व्रत वर्ष में तीन बार भाद्रपद शुक्ला ५ से १४ माघ शुक्ला ५ से १४ तथा चैत्र शुक्ला ५ से १४ तक आराधित करना चाहिए।
इस विधान का मंत्र इस प्रकार है।
ॐ ह्रीं उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव सत्य शौच संयम तप त्याग अकिंचन ब्रह्मचर्य धर्मगाय नमः।
श्री दशलक्षण व्रत मंडल विधान का माडना (कपडे पर) “दिगम्बर जैन पुस्तकालय” खपाटिया चकूला, गांधीचौक सूरत से ५००/- रुपये में पक्के रंग में मिलेगा।

कवि श्री टेकचन्दजी कृत

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

जोगी-रासा
नेमीनाथो, देतो साथो,१ भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशदिन मन वच, काय लाय करि गाऊँ॥
धर्म कहो तुम, वार्ण दश विधि, सो मोहि होउ सहाई।
करुणासागर, स.रू. गर्भित, शीश नमों श्रुति गाई॥

गीता छन्द
धर्मके दश कहे लक्षण, तिन थकी की जिय सुख लहै।
भवरोगको यह महा औषधि, मरण जामन दुख दह्रै॥
यह वरत नीका मीत जीका२, करो आदरतें सही।
मैं जजों दश विधि धर्मके अंग, तासु फल है शिवमही॥

पद्धड़ी छन्द
यह धर्म भवदधि नाव जान, या सेयें भव दुख होइ हान।
यह धर्म कल्पतरु सुख्ख पूर, मैं पूजों भव दुख करन दूर॥

गीता छन्द
यह वरत मन कपि गले साहीं, सांकली सम जानिये।
गज-अश्व३जीत न सिंह जैसे, मोहतम रवि मानिये॥

१ तुम्हारा साथ। २ जीवका मित्र। ३ इन्द्रयरूपी हाथी को।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सुरथान माहीं व्रत नाहीं, मनुज हूँ शुभ कुल लहें।
तातैं सुअवसर है भलो, अब करों पूजा धुनि कहैं॥
बेसरी छन्द

जाने दशलक्षण व्रत कीना, से सतरूपनिमें परवीना।
भवसागर फिरनो मिट जावै, जो नर दशलक्षण वृष भ्रावै॥
भुजंगप्रयात छन्द

यही धर्म सारं करै पाप क्षारं, करै सुख अपारं।
यही धर्म धीरा, हरै लोक पीरा, यही धर्म मीरा करै लोक तीरा॥
त्रिभंगी छन्द

यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत उधारा हितदानी।
यह दशविधि गाया, जन मन भाया, उच्च बताया जिनवानी॥
यह शिव करता रा, अधतैं न्यारा, भवि उद्धारा मुनि धारा।
ताकौ मैं ध्याऊँ शीश नवाऊँ, अर्घ चढ़ाऊँ सुखकारा॥
चौपाई छन्द

या व्रतकी महिमा कहै वीर, दशविधि धर्म हरै भवपीर॥
इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजुहु धरम अति दुरलभ पाय॥
दोहा- दश प्रकारको धरम यह, दशविधि सुतरु जान।
वांछित पद सेवक लहैं, अधिक कहा सुखदान॥
सोरठा- धर्म हमारा नाथ, धर्म जगतका सेहरा।
भव भवमें हो साथ, और न वांछा मन विषै॥
मण्डल मध्ये पुष्पांजलि क्षिपेत्।

१-स्वर्ग। २-धर्म। ३- प्रधान। ४-कल्पवृक्ष

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

समुच्च्य पूजा

त्रिभंगी छन्द

यह धर्म क्षमावा मान गुमावा, सरल सुभावा सतिवानी।
शुचि भाव करावा संयम लाबा, तप करवावा अधिकानी॥
शुचि त्याग बतावा नगन पुजावै, शील बढ़ावै शिवदाई।
यह धर्म दशारा थाप करारा, पूजन धारा शिरनाई॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र
तिष्ठ ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।
मणुयाणदकी चाल

क्षीर सागर तना नीर शुभ लाइये।
कनक झारी विषै धार गुण गाइये॥
मरण उत्पत्ति नहीं होय ता फल सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥१॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व।
नीर संग अगर चन्दन घिस लाइयजी।
सुभग पातर विषै धारि श्रुति गाइयजी॥
जगत ताप तासु फल तुरत नाशौ सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥२॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्व।
लेय अक्षत भले मुक्तिफलसे कहे।
उजले अखंड सुभग स्वर्ण पातर लहे॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

अक्षयपद पावनै आप मनमें सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥३॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व. स्वाहा।
फूल कन्ननवन कल्पतरु के भले।
गन्ध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले॥
माल तीन गुंथि कामबाण नाशक सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥४॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व.
सुगम नैवेद्य मोदक घने लाइये।
विविध स्वादमय सु धारि भक्ति उर भाइये।
भूख दुख हर्ण स्वर्ण पात्र धरिके सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥५॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्व.
दीप मणि रतनमय और उत्तमय सही।
धारि कनक थालमें सु आरति जु करि लही॥
धर्मज्योति मोह अन्धकार नाशिका सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥६॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्व.
धूप दश अङ्ग मय लायकर सारजी।
अगनिसंग खेवहु सुभक्ति उर धारजी॥
कर्म क्षयकारि भव वास नाशन सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥७॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व. स्वाहा।

जयमाला-दोहा

दश वृष रतन मिलायके, माल करै भव जोय।
धरै आपने उर विषै, ता सम और न कोय ॥११॥

बैसरी छन्द

दशलक्षण वृष शिवमग दीवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा।
मुकति दीप पहुचाँवन नावा, ये दश धर्म जजों जुत भावा ॥
१-दीपक।

दोहा

इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश पार।
पावै सुख मन भावना, अनुक्रम ले भव पार ॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः पूर्णाघ्यं निर्वपामि स्वाहा।

इति समुच्चय पूजा।

१-जीवकी रक्षा। २- आकिंचन्य धर्म।

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

अडिल छन्द

जीव तिरस थावर जेते जगमें सही।
देव नरक नर पशु चारि गतिकी मही ॥
तिन सब ऊपर दयाभाव उर माँहि जी।
सो है उत्तम क्षमा थापि जजूँ याहि जी ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांग! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांग! अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांग! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अद्धाष्टकम् (पद्धरी छंद)

जल गंग नदीको विमल सोइ, धरि रतन पियाले शुद्ध होइ।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
बावन चंदन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जुत चढ़ाय।
यह धर्म छिमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि.।
अक्षत मुक्ताफल सम जु लाय, अति उज्ज्वल नख शुद्ध शुभ्राय।
यह धर्म छिमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय अक्षयपद प्राप्ताये अक्षतान् नि.।
शुभ फूल कल्पतरुके अनूप, करि माला सुभग सुगन्ध रूप।
यह धर्म छिमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

नाना रस पूरित चरु सम्हार, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
मणि दीपकसार बनाय लाय; धरि कनक थाल धरि भक्ति आय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि.।
ले धूप अग्रुजगा गन्धकार, दुर्भाव हुताशन मांहि जार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा।
फल नारिकेल बादाम सोड़, पूगीफल खारिक भक्ति जोड़।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत फूल लाय, चरु दीप धूप फल अरघ भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं नि. स्वाहा।
प्रत्येकार्घ्याणि। अडिल

पाप प्रकृति कर जीव, अशुभ बन्धन करयो।
थावर नामा कर्म उदय दुखको भरयो॥
पृथ्वी मांहि सु जाय सहे बहु अध फला।
तिनका रक्षण भाव क्षमा उत्तम भला॥१॥
ॐ ह्रीं श्री पृथ्वीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

जे जलकायिक जीव ज्ञान बिन दुख लहें।
इक इन्द्रियके द्वार अतुल विपदा सहें॥
तिनको दुखमय जानि मुनि करुणा करै।
तसु प्रसादतैं झटिति मोक्ष वनिता वरै॥२॥
ॐ ह्रीं जलकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
अगनिकाय धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुख तन सहैं जलैं सब जग मही॥
इन पर करुणाभाव धरैं जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही॥३॥
ॐ ह्रीं अग्निकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
पवन कायके जीव महा सङ्कट सहैं।
हाथ पांव मुख वचन थकी बाधा लहें॥
इनपर करुणाभाव जती धारैं सही।
सो ही उत्तम क्षमा कही शिवकी मही॥४॥
ॐ ह्रीं वायुकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि. स्वाहा।
हरित कायमें प्राणी अति वेदन लहै।
छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहै॥
इन पर समता भाव सुखी इनको चहै।
सो ही उत्तम क्षमा धारी मुनि शिव लहै॥५॥
ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
थावरके पन भेद पाप फलतैं बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भनै॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

इनको दुखमय जानि दया मन लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिर नाय है॥६॥
ॐ ह्रीं सूक्ष्मस्थूल पञ्चस्थावरपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
लट अरु जोंक गिंडोला इणी जानिये।
कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये॥
इन पर करुणाभाव जती धारैं सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवकी मही॥७॥
ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
चींटी कूंथा खटमल वीछू दुखमही।
ते इन्द्रिय परजाय पाय धुन आदि ही॥
इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सब अघ जरैं॥८॥
ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
माखी मच्छर टीड़ी भंवरादिक सही।
बर्रै ततड़या मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही॥
इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों वसुविधि जरैं॥९॥
ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
इन्द्रिय पांचों होय, नहीं मन जो लहै।
ते जिय जानि असैनी अघ फल दहैं॥
इनको दुःख भरिपूर जानि करुणा धरैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवधल धरैं॥१०॥
ॐ ह्रीं संज्ञी पंचेन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

नारक जीव अति दुखी पाप फलतै सही।
छेदन भेदन पीर सहैं जात न कही॥
इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सुखदाय है ॥११॥
ॐ ह्रीं नारकीजीवपरिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

गीता छन्द

मनुष्य क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने।
बहु चाह पीड़ित रागद्वेषी, अध घनो उपजे तिने॥
तिन देख यतिवर दया लावे, महा दीन दयालजी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल, जजों भाग्य विशालजी॥
ॐ ह्रीं मनुष्यजीव-परिरक्षण-रूपोत्तमक्षमा-धर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परकार चारों देव गतिमें, जीव सुख राचे सही।
लखि देखि परकी झुरे नितही, मानते पीड़ा कही॥
तिन देखि मुनि उर दया भावै, महा कोमल भाव जो।
सो धर्म उत्तम क्षमा पूजौं अर्घ तैं कर चावजी॥
ॐ ह्रीं चतुर्गतिदेवजीव परिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

बेसरि छन्द

थावर तिरस जीव जब जोई चहैं गति करमनिके वशि होई।
तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम क्षमा धर्म जजाई॥
ॐ ह्रीं त्रसस्थावर-समस्तजीव-परिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला-दोहा

धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जजै जीव सो पुनि लहे, करै जु शिवपुर जाय॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

बेसरि छन्द

सब जीवन में राग न दोषा, सो है क्षमा धर्म निरदोषा।
दुर्जन कृत उपसर्ग लहावै, ताहू पै समभाव रहावै॥
मुनिको वचन कहै दुखकारी, मर्म छेद छेदै अध धारी।
मान खंड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥
जे कोय दुष्ट मुनिनको मारै, तीक्ष्ण शस्त्रतैं करि परिहरै।
बांधे तनको खेद न पावै, तिनपर क्षमा धर्म मन लावै॥
अति दुखिया जिय को ऋषि जानै, तब मुनि अनुकंपामानै।
आपा परको हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥
उत्तम क्षमा धर्म सुखदाई, क्षमा धर्म सब जियका भाई।
जब मुनिहुपै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥
क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई।
क्षमा समान न बल अति पावै, तातैं जजो क्षमा वृक्ष भावै॥
क्षमा धर्म शिव राह बतावै, क्षमा तात अरु भाई।
जाते सिद्ध सुखवनको पावै, ऐसी क्षमा मुनि मन लावै॥

सोरठा।

क्षमा आभूषण सार, उर में जो पहिरे सही।
ते भवसागर पार, जजों धर्म उत्तम क्षमा॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा-धर्माङ्ग्याय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
॥ इति उत्तमक्षमाधर्म पूजा ॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम मार्दव धर्माङ्ग पूजा

पड्डी छन्द

मार्दव वृष भाव विचार सोइ, जहां मान भाव दीखे न कोइ।
इंहधारी मुनि शिवगामी जानि, मैं जजों थापि मार्दव सुभानि॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तममार्दवधर्म धर्माङ्ग्याय अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।

अष्टाष्टकम् (मनुयणाणन्द की चाल)

क्षीर सम नीर शुद्ध गाल कर लाइये।
पात्र सुवरण विषे धारि गुण गाइये॥
जगतफिरनो मिटे तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१२॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्ग्याय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वच्छ नीर संग चंदनादिको मिलायजी।
शुद्ध गंधयुक्त भक्ति भावतैं चढ़ायजी॥
जगत आताप-हर जानि ता फल सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१३॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्ग्याय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत समुज्ज्वल खंड बिन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये॥
धौल्य फलदाय मनलाय ध्याऊं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१४॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्ग्याय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

फूल कल्पवृक्षके गंध रंग सारजी।
माल ग्रंथि शुद्धभाव भक्ति कर धारजी॥
मदन मद हरन सुफल जानि यातै सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय पुष्प निर्व. स्वाहा।
सुभग रस शुद्ध नैवेद्य मन लाइये।
मोदकादि शुद्ध भक्ति भावतैं चढ़ाइये॥
धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन वचन तन सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय नैवेद्यं निर्व. स्वाहा।
दीप रतनमयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्ति भावतैं धरा॥
नाश अज्ञान है तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय दीपं निर्व. स्वाहा।
धूप दशगंध शुभ लेय मन मानिये।
अगर चंदन सबे मेली शुभ ठानिये॥
अग्नि संग खेड़ये कर्म जालन सही
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय धूपं निर्व.स्वाहा।
श्रीफलादि लोंग पुञ्जी फलादि जानिये।
शुद्ध बादाम खारकर भले आनिये॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सिद्ध थानक लहै तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय फलं निर्व.स्वाहा।
नीर चंदन अखित पुष्य चरु दीप जी।
धूप फल अर्घ कर भाव शुद्ध टीपजी॥
लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व. स्वाहा।

प्रत्यकाध्यायी (चाल मनुष्यानन्दको)

देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही।
दोष अष्टादश तासु माहीं नहीं॥
नमत तिन पद करै धर्म मार्दव कहो।
सो जजों चारि गति मांहि भरमन दहो॥११॥
ॐ ह्रीं वीतरागदेवपद नमन-मार्दवधर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
वीतराग देव कही वानि सो धर्म है।
ता सुने जीव निज है भाव धर्म है।
मन वच काय श्रुतपाद सिरनाय है।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री जिनधर्मपद नमन-मार्दवधर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
धर्मको सेय तंप लेय कर्म जार जी।
भये सिद्ध देव तन रहित सुखकार जी॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

लेय इन नाम मन वचन शिरनाय है।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है॥१३॥
ॐ ह्रीं सिद्धपदमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घं निर्व. स्वाहा।
धारि छत्तीस गुण सूरि सुखदाय जी।
धर्म तप भाव सों गुप्त धरि भाय जी।
मान तजि नमन इन पद विषैं लाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१४॥
ॐ ह्रीं आचायपदमन मार्दव धर्माङ्गाय अर्घं निर्व. स्वाहा।
धारि गुण पांच अरु बीस उवझायजी।
और भी अनेक गुण पास तिन थायजी॥
मान तजि इन चरण कायको नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-नमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
क्षेत्र अतिशय तहां धर्म को धाय है।
नमन बहु जिय करै देव गुण गाय है॥
मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्र-पद-नमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
देव जिन की सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी।
रूप श्रुति ध्यान मुद्रा कही जिन जिसी॥
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम-जिन-चैत्यपदमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व.

श्री दश लक्षण मण्डल विधान।

सुरग थानक विंबै देव जिनके सही।
रतनमय जैन बिंब बिगर किये है मही।
मान तजि शीश इन 'चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
ज्योतिषी व्यंतरा धर्में मध्यलोकजी।
बिन किये चैत्य जिन कहै अघ रोकजी।
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
भवन देवनि विषै बहुत जिनरायजी।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तासु पायजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
आदि इन पूज्य थानक बहुत हैं सही।
सिद्ध क्षेत्र मोक्ष फलदाय तीरथ मही॥
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्र-पदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
जयमाला। (बेसरी छन्द)
मार्दव धर्म मानको खोवै, ताफल जगत पूज्य फल होवैं।
मार्दव सकल दोष निवारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥

श्री दश लक्षण मण्डल विधान।

मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजै, मार्दव धरम भजै अघ धूजै॥
मार्दव मान हरै सुखकारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम महा नर ध्यावै, मार्दव धरम हानि नहिं पावै।
यह मार्दव वृष शिव थल धारै, ताफल आप तिरै अनितारै॥
मार्दव सबको राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना।
मार्दव धरम जीव ले धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम सुरग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भव फेरा।
मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव मोक्षमार्गको दाता, मार्दव धरम सकल जग त्राता।
मार्दव वृष गुणवन्ता धारै ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम कल्पतरुभाई, मार्दव मनवांछित फलदाई।
मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम कनकमें मीना, मार्दव धारि सकै न कमीना।
मान मार मार्दव वृष धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव वृष सब धर्म प्रधाना, मार्दव मोह मल्लुक। हाना।
मार्दव माल पुरुष उर धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥

दोहा

मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय।
जगत छुड़ावै शिव करै, ते भारक्षक होय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तम मार्दव धर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।

श्री दश लक्षण मण्डल विधान।

उत्तम आर्जव धर्म पूजा

बेसरी छन्द

जग परपंच रहित जो भावा, सरल चित्त सबते निरदावा।
तिनको आर्जवभावसु कहिये, सो ह्याँ थापि पूजि फल लहिये॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जव धर्माङ्गाय अत्र अवतर २ संवौषट्।
अत्र तिष्ठर ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् सन्निधिकरणं।
अथाष्टक (बेसरी छन्द)
क्षीर समुद्रा उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धर अति धीरा।
जरा रोग नाशनको भाई, आर्जव भाव नमों शिर नाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि।
चंदन बावन जल घसि लाया, कनकपात्रमें धरि उमगाया।
शोकानल तप नाशन भाई, आर्जव धरम जजों शिर नाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि।
अक्षत मुक्ताफलसे जानो, उज्ज्वल खंड विवर्जित आनो।
क्षय नहि होय इसी पद दाओ, आर्जव भाव नमो शिर नाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् नि।
फूल सुगंध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतभय भाया।
तिनकी माला गुंथिकर लाय, आर्जव भाव नमो शिरनाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि।
नाना रस नेवेद्य करावै, मोदक आदि भक्तिसे लावै।
भूख व्याधि नाशनको भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

[२०]


दीपक रतन थालि धरि लीजै, मनवचकाय शुद्ध करी लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दरशावै, आर्जव धरम जजै शिरनाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि.।
धूप अगरजा चंदन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्म दहनकी अगनि जराई, आर्जव भाव नमो शिर नाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि.।
ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लौंग आदि हितकारी
सिद्ध लोक वांछा मन माहीं, आर्जव धरम जजो शिरनाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.।
जल चंदन अक्षत कामादी, चरु दीपक फल धूप विधारी।
अर्घ लेय मनवचनत भाई, आर्जव धरम जजों शिर नाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय अनर्घ्यपद प्राप्तयेऽर्घ्यं नि.।

प्रत्यकाव्याणि (बेसरी छन्द)

गुण चयालीस जहां प्रभु तेरा, अष्टादश तहां दोष न हेरा।
तिनपदसरल भावशिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिघ्र पावै।।
ॐ ह्रीं श्री छयालीसगुणसहितजिन चरणमनजार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
मुक्तजीव अरहंत श्रुति कीजे, मनवच कुटिल भाव तजि दीजै।
तिनपद सरलभाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीव अरहन्तपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
कर्म काटि शिवलोक सिधारे, सिद्ध सुदेव हरौ अघ सारे।
तिनपद सरल भाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।

[२१]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


सिद्ध शिला पैंतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तत्रस्थित आतम शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धशिलास्थित मुक्तात्मपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
गुण छत्तीस सुधारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य-पदनमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणन युत सूरा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य-पदपरोक्ष-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
गुण पचीस उवझाय सु माहीं, ग्यारह अंग चौदह पुरवाही।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
बहु गुण धर उवझाय सु जानौं, दूरहितै तिनको चित आनौ।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-परोक्ष-नमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
बीस आठो गुण साधन साधा, सो नहिं लहें जगत की बाधा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री साधुपदनमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
दूरहितै मुनि गुण जु चितारै, मन वच काया निज वश धारै।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री साधुपद-परोक्षनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
वरण विहीन सु जिनवर वानी, तिनको सुनि सुख पावै प्रानी।
तिनपद सरल भाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री जिनमुनि-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।

[२२]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


अतिशय क्षेत्र सु तीर्थ थामा, तातैं पुनि गात्र के पूरै कामा।
तिनस्थल सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृषजजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपद-नमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
शिखरसम्मेद आदि सिद्ध थाना, लहेंपुनि लियशिव कर्म नशाना।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपद-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
विगर किये जिनबिंब अनूपा, लक्षण चिह्ह जानि जिन रूपा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम-जिनचैत्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
कृत्रिम जे जिन बिंब बिराजे, विनय सहित पुन दायक छाजे।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।
ॐ ह्रीं श्री कृत्रिम-जिनचैत्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
इत्यादिक बहु क्षेत्र सुथाना, पूजनीय तीर्थ अघ हाना।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।
ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।

जयमाला - दोहा

सरल भाव सारे सरस, सुरनर पूज्य महान।
तातैं तजनी कुटिलता, आरजव भाव ल्हान।।

बेसरी छन्द

सरल भाव समता उर आनै, सरल भाव सब औगुन भानै
आरजव भाव धरे जो जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

आरजव भाव धरै जे प्राणी, तिनके होनहार शिवरानी।
दोष भाग तिनतैं नहिं छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा॥
आरजव भाव अमरपद धावै, आरजव में औगुन नहिं पावै।
कुटिलभाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धरै जे जीवा।
आरतिको आरजव ही खोवै, आरजव भाव पापमल धोवै।
रोग शोक ताको नहिं छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा।
आरजव शुद्धभाव जिन पाया, तिनने लहि पुन, पाप गमाया।
अनुभव आनन्द तानै छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा।
आरजवभाव दोष सब खोवै, आरजव कर्म कालिमा धोवै।
शुद्ध सुभाव सु तानै लीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा॥
आरजवभाव सकलको प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतैं न्यारा।
ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धरै जे जीवा॥
आरजव सुर शिवके सुख ठाने; आरजवभाव पूर्व अधभाने।
अदभुत आपापर भिनकिवा, आरजवभाव धरै जे जीवा॥

दोहा
अन्तरंग निरदोष के, प्रगटै आरजव भाव।
जाके फल मरनो मिटै, छुटै कर्म को दाव॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जव-धर्मङ्गाय-पूर्णार्घ्यं नि।
इति उत्तम आर्जव धर्मपूजा संपूर्ण।

उत्तम सत्य धर्म पूजा

अडिल्ल छन्द
सत्य सरीसो धर्म जगत् में है नहीं,
सत्य धरम परभाव लहें शिव की मही।
तातें भव दुख हरण सत्य वृष भाइये,
यहां थापि मैं जजों सत्य मन लाइये॥
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्माङ्गा अत्र अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठर
ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अष्ठाष्टक - त्रिभङ्गी छन्द
जो झूठ विनाशे जग विसवासे, पुण्य प्रकाशै हितदानी।
सब दोष निवारै समता धारै शिवपुर कारै गुण थानी॥
जग आदरकारी मोह निवारो, आनंदधारी जग मानो॥
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, जल ले परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व।
सति सो वृष नारो या जग माहीं, पूज्य कहाही शिव थानी।
सब औगुण धोवै पाप बिलोवै, धर्म मिलावै दुख हानी॥
पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, सुख करतारो भवि मानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, गंध ले परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्व।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

या सत्य समानो रतन न आनौ, सम्यक दानी शिवकारी।
भवदधिको नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी॥
सिधलोक नसैनी शिवसुख दैनी, ध्यावत जैनी अनलानी।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, अक्षत ले परमा जजिजानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व।
सति सो नहिं मिट्टा मिटन चिन्ता, अघ अरिहन्ता जसदाई।
सति जगत पियारो भव उद्धारो दुख जलतारो श्रुति गाई॥
याको मुनि ध्यावै शिवसुख पावै, पाप गमावै भव हानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, पुष्प परना जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व।
सति धर्म सु पूजै सब अघ धूजै, शिवमग सूजै अधिकाई।
याते वृष सारा काज संवारा, अशुभ विहारा सिद्धि दाई॥
सति सारा नीका सुखदा जीका, शिवमग टीका शुभानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, ले चरू परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि।
सति धर्म उजाला जग का पाला, विषम टाला धर्म करा।
यह ज्ञान उजाले अशुभ सु टाले, संयम पाले झूठ हरा॥
सति प्रिति उपावै बैर गमावै, जो श्रुति लावै उर ज्ञानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्व।
सति धर्म प्रभावे मुनि शिव जावै, जगजस गावै थुतिलाई।
सति धर्म जु मूला अघ-क्षय थूला, झूठ कुसूला दहभाई॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

सत धर्म अनूपा शुभ रस कूपा, पुण्य स्वरूपा मग मानौ।
ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परमां जजि जानौ॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मङ्ग्याय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
सतिधर्म अभ्यासी शिवथल वासी, पाप विनाशौ हितकारी।
गुण ज्ञान बढ़ावै आदर ल्यावै, पुण्य उपावै सति भारी॥
जगमें अति नीका बन्धु जीका, शिवतिय पीका गुण थानौ।
ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, ले फल परमां जजि जानौ॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मङ्ग्याय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल चन्दन नीका अक्षत टीका, फूल चुनीका माल करौ।
चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल आया अर्घ्य धरौ॥
उर भक्ति बढ़ाई मुख थुति गाई, सत सब भाई पहिचानौ।
ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, अर्घ्य परमां जजि जानौ॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं पदप्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रत्येक्याणि - चौपाई

क्रोध सहित जय सत नहिं कहे, झूठ वचन तैं अघ शिर लहे।
क्रोध रहित जे वचन प्रमानि, सो सतधर्म चयो जिनवानि॥
ॐ ह्रीं श्री क्रोधातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
लोभ सहित जिय झूठ बखानि, साँच धरम ताको नहिं मानि।
लोभ रहित सत धरम सुभाय, सो सत धर्म जजों थुतिगाय॥
ॐ ह्रीं श्री लोभातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
साँच न कहे भेतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव।
भयतें रहित सत्य वचन भाख, सो सत धर्म करो थुति लाख॥
ॐ ह्रीं श्री भयातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

हास्य सत्य को नाशनहार, ताते सहै महा दुख भार।
हास्य रहित सब धर्म कहाय, सो सत धर्म जजों थुति गाय॥
ॐ ह्रीं श्री हास्याचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन आज्ञा बिन भाखै बैन, पूर्वापर वच ठीक कहे न।
ऐसे दोष रहित सति भाय, सो सत धर्म जजों थुति गाय॥
ॐ ह्रीं श्री जिनाज्ञालंघननातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

गीता छन्द

जा देशमें जिस वस्तुको तिस मानिए सो सति सही।
जिम भातको गुजरात मालवदेश में चौखा क ही॥
करनाटकमें कूलू कहै द्राविड़ में चौरु बखानिये।
इमजानि जनपद सत्यदो जजि हर्ष उरमें आनिये॥
ॐ ह्रीं श्री जनपद-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आर्दिल छन्द

बहु नर ताको कहै तिसौ ही मानिये।
रंक नाम लक्ष्मीधर जाही बखानिये॥
तो यह रूढी नाम सत्य संवृत कही।
या नयतैं सत जानि जजों सत वृष सही॥
ॐ ह्रीं श्री संवृतसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
काहु नर आकार तथा पशु के सही।
चित्र काष्ठ में थापि नाम नर पशु कही॥
यह थावर सत भेद शास्त्र में गाइयो।
ताकों सत वृष जानि जजों मन लाइयो॥
ॐ ह्रीं श्री स्थापनसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

जाको जगमें नाम प्रसिद्ध बखानिये।
सोई ताको नाम सत्य सों मानिये॥
नाम सत्य सो जानि जिन जिन इमि कही।
ताको मन वच काय जजों शुभ सुखमही॥
ॐ ह्रीं श्री नामसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही।
रूपवान इत्यादि अंग बहुतैं कही॥
रूप सत्य सो जानि कह्यो जिनवानजी।
ऐसो सत्य सु जानि जजों सुखदानजी॥
ॐ ह्रीं श्री रूपसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कही वस्तु यह यातें छोटी है सही।
यातें है यह बड़ी अपेक्षा इमि कही॥
याको नाम प्रतीति सत्य सो जानिये।
ताको भी है जजों भक्ति उर आनिये॥
ॐ ह्रीं श्री अपेक्षासत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो नरपति को पुत्र ताहि राजा कहै।
सो नैगमनय जानि सत्य तातैं यहै॥
यहीसत्य 'व्यवहार जिनेश्वर धुनिकही।
मैं जजिहौं कर भक्ति नाय मस्तक सही॥
ॐ ह्रीं श्री व्यवहार-सत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्राक्ति इन्द्रमें इसी लोक उलटा करै।
सो तो लोक अनादि उलटी कैसे धरै॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

[२९
पै यह शक्ति अपेक्षा वचन प्रमाण है।
यह सम्भाव सत्य जजों स्थिति आन है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्भावना-सत्यधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
जीव अनन्त अनादि नजर आवै नहीं।
द्रव्य अमूर्ती पांच नरक सुरकी मही॥
ये नेहि देखें नयन सूत्रसों जानिये।
भाव सत्य सो जानि जजों मन आनिये॥
ॐ ह्रीं श्री भावसत्यधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
किसी वस्तुकी उपमा जाको लाड़ये।
ज्यों दानी नर देख कल्पद्रुम गाइये।
याको उपमा सत्य नाम जानों सही।
सो मैं पूज्यों भक्ति नाय मस्तक मही॥
ॐ ह्रीं श्री उपमा-सत्यधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
इत्यादिक बहु भेद सत्य के जानिये।
कहे देव जिनराय अपनी वानिये॥
सो मैं मन वच काय शुद्ध थुति गायजी।
पूज्यों सत्य सुधर्म अरघ कर लाइजी॥
ॐ ह्रीं श्री सत्य-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
जयमाला (बेसरी छन्द)
सत्य धरम जग पूज्य बतावा, सत्य श्रेष्ठ जिनधुनि गाया।
सत्य धरम भवदधिको नावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥

[३०]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सत्य धरम वर अंग प्रवीना, सत्य धरम ज्यों कंचन मीना।
सत्य धर्मका सबको चावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य धरम का राखणहारा, सत्य धरम मुनिजनको प्यारा।
सत्य शिरोमणि धर्म कहावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य समान और नहिं मिंता, सत्य धर्म मेटे भव चिंता।
सत्य करे अद्यते निरदावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य धरम अपयश क्षयकारी, सत्य सुरक्षा करें हमारी।
सतहीका सुरनर जस गावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य सहित सब सार्थक धर्मा, तासों कटै चिरंतन कर्मा।
सत्य समान और नहिं ठावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य जगतमें पूजा पावै, सत्य धरम शिव राह बतावै।
सत्य जजों सति धर्म लहावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य सरोवर में सत नीरा, सत्य धरम खोवै सब पीरा।
सत्य धरम सों कुगति न पावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
दोहा
सत सागर में जे रमें, ते वृष नायक जोय।
जजें धर्म सतको सही, मन वच काया सोय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसत्यधर्माङ्ग्याय पूर्णार्घ्यं नि.।
इति उत्तम सत्य धर्म पूजा।

[३१]

उत्तम शौच धर्म पूजा

बेसरी छन्द।
गौच धर्म पर चाह निवारै, तनतैं हू ममता निवारै।
जग वांछा तजि निर्मल भावा, शौच धर्म पूज्यों कर चावा॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय अत्र अवतर अवतर संवौषट् अत्र तिष्ठर
ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भवर भवर।
अद्धाष्टकम् - षट्पद छन्द।
जल क्षीरसमुद्रको सुभग लाय, धरि कनकपात्र में भक्तिभाय।
तन धरन मिटै वह फल सुजान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.।
घसि बावन चंदन निर आन, अलि गुंजत मानों करत गान।
घरि कनकपियाले भक्तिमान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय संसारातपविनाशनाय चंदनं नि.।
उज्जवलअखंड शुभ गंध दाय, अक्षतअनूप लखिशशिलजाय।
कनपात्र विषे धरि भक्ति आन, मैं शौच धर्म जजि हर्षआन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
जे फूल कल्पद्रुमके मनोग, असक्त भ्रमर धित करत भोग।
तेन गुंधि मालउर भक्ति ठान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.।
शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसना रंजन नैवेद्य लाय।
धरि पुष्ट थालमें भक्ति ठान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय-क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

मणी दीपक वा घृतमय संजोय, मनुनबिडभोमु तम नाशहोय।
अरु ज्ञान प्रकाश करै महान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं नि।

धूप धूप अगरजा गंध लाय, कन धूपायन ताकों खिवाय।
मिश्रा धूम्रगों वसुविधि उड़ान, मैं शौच धर्म जजि हर्षआन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय दृष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि।

ले फल बादाम खारुक अनूप, अरु पूंगी फलआदिक स्वरूप।
धरि भक्तिभाव मन मांहि सोय, मैं शौच जजों शुद्ध भाव होय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि।

जल गंधाक्षत वर कुसुम होय, चरु दीप धूप फल सुभगजोय।
कर अरघ धरों कनपात्र लाय, मैं जजों शौच वर भक्तिभाय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. स्वाहा।

अथ प्रत्येककाव्याणि (चाल मणुयणन्दकी)

देवके सकल सुख जानि चंचलमयी।
आयु पल्य सागरकी तुरत ही क्षय गयी॥
जान सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै॥११॥
ॐ ह्रीं श्री देवसुखवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.

चाहै चक्रो तने सुखको उर नहीं।
सहस छिनबे तिया और षट्खंड मही॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री चक्रिपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
खण्ड तिनको जु राज नारि बहु जानिये।
चारि विधि सैन सुर नर खगादि मानिये॥
जान सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री नारायणपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
कामदेवको सुरूप देखि देव मन हरे।
भोग वांछित सकल देव सेवा करें॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री कामदेवपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
आठ परकार सपरस विषै जानिये।
द्रव्य क्षेत्रकाल अनुसार भाव मानिये।
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री स्पर्शेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
पांच परकार रस सबि जगत दुखकारजी।
भोग वांछै सभी जगत दुखकारजी।
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री रसनेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

घ्राण इन्द्रियने गंध दो हैं सही।
ताहि अनुकूल पाय जीव साता लही॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री घ्राणेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
चक्षु इन्द्रियने पांच रूप भोग हैं।
ताहि चाहें अमर नाहिं तन रोग हैं॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१८॥
ॐ ह्रीं श्री चक्षुरिन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
राग संगीत इन आदि सुर साजिये।
सम स्वर भेद कर्ण भोग मन राजिये॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१९॥
ॐ ह्रीं श्री कर्णइन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
भोग वांछित घने चित्त आधारजी।
ताहि सेयर जीव सुख लहे अपारजी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच स्थानक धरै ॥२०॥
ॐ ह्रीं श्री मनवांछितभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
तन अशुभ आपको सु चाम मय जानिये।
सस मल घात पूरित सु घिन आनिये॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

[३५


जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥११॥
ॐ ह्रीं तनसम्वन्धीभोगावांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
रतन नवधादि भरपूर घरमें सही।
कोटि नित दान देते सु क्षय हो नहीं॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री धनवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
रूपमें शची समान नारी घरमें धनी।
शीश आज्ञा धरै प्रीत रस में सनी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री वनिताभोगावांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
कामदेव के समान पुत्र रूप धारी।
विनयवान सर्व बलवन्त तेज सारजी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री पुत्र भोगावांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
भ्रात बहु विनय जुत आनि-पालक सही।
संग तिन भोग भोगी जीव साता लही।
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री भ्रातृसुखवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।

[३६]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


मन्त्र दाता विपत्ति माहि मित्र सारजी।
प्रेम अन्तरङ्ग धारि नित्य रहें लाजजी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री मित्रानुबन्धवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.
मित्र तिय पुत्र सब घरतने दासिया।
आदि परिजन सकल और घरवासिया॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री सकलपरिजनानुकारित्ववांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.

जयमाला - दोहा

शौच सकल उर सुख करै, हरै लोभ मद सोइ।
मोक्ष धरै मरनो टरै, ताहि जजै शिव होइ॥
शौच भावतै पुण्य बड़ोई, कटै पाप जगमें जस होई।
शौच भाव संतनको प्यारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच भाव पर-चाहै निवारै, शौच भाव दुख शोकविदारै।
शौच सरवको बड़ा सहारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच सांच के बड़ा सनेहा, शौच मुनिव्रत की इक देहा।
शौच भाव मंगल करतार, जजों शौच यह धर्म हमारा॥

[३७]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


शौच भावमें नाहि कषाया, शौच भाव सब जग काभाया।
शौच धर्मका शरण गहारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच धर्मको मुनिगण सेवैं, ताफल स्वयं सिद्ध थललेवैं।
शौच धर्म समता रस धारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच समान और नहीं चिंता, शौच भाव टारै सब चिंता।
शौच सदा सब जियका प्यारा, शौच जजों यह धर्म हमारा॥

दोहा

शौच सार संसार में करै पवित्र जु भाव।
तातें धारो शौचको, भलो मिलो यह दाव॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तम शौचधर्माङ्गाय-पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा।

इति उत्तम शौच धर्म पूजा।

उत्तम संयम धर्म पूजा

अडिल्ल छन्द
संयम धर्म अनूप दोय विधि जानिये ।
इक रक्षा षट् काय दया उर आनिये ॥
मन इन्द्रिय वश करै दूसरो संयमा ।
सो मैं पूजौं थापि लहौं उत्तम रमा ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयम धर्माङ्ग ! अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र
तिष्ठ२ ठः ठःस्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भवर वषट् ।

अथाष्टकम् बेसरी छन्द।
निर्मल नीर भाव कर भीजै, मन मनोज्ञ बासन धरि लीजै ।
जिनको जन्म मरणगद जावैं, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. ।
चन्दन शीतल भावन भाया, तापर मन भंवरा जु लुभाया।
जग आताप तासु नशि जावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि. ।
शालि अखंड अखत ले भाई, शुभ परणति भाजन भरवाई।
जो अखंड थानक ले धावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. ।
फूल प्रफुल्लित भाव सु लीजै, भक्ति तारमें माल करीजै।
मदन वाण हरि सो बल पावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं नि. ।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3095.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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