दया मेरा धर्म विचार - जैन स्वाध्याय सामग्री | Daya Mera Dharm Vichar

दया मेरा धर्म विचार

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श्री दशलक्षण व्रत मंडल विधान का माडना


आत्म कल्याण के लिए दश प्रकार की प्रवृत्तियों को आचरित करने का उपदेश केवली भगवानों ने दिया है। मानव से महामानव और महामानव से अर्हंत पद तक पहुँचने के लिए यह दश लक्षण धर्म ही लोकोत्तर है। प्रत्येक धर्म की आराधना के साथ उनके प्रमुख भेदों की आराधना के अर्थ इस विधानमें आराधे गए हैं। यह व्रत वर्ष में तीन बार भाद्रपद शुक्ला ५ से १४ माघ शुक्ला ५ से १४ तथा चैत्र शुक्ला ५ से १४ तक आराधित करना चाहिए।
इस विधान का मंत्र इस प्रकार है।
ॐ ह्रीं उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव सत्य शौच संयम तप त्याग अकिंचन ब्रह्मचर्य धर्मगाय नमः।
श्री दशलक्षण व्रत मंडल विधान का माडना (कपडे पर) “दिगम्बर जैन पुस्तकालय” खपाटिया चकूला, गांधीचौक सूरत से ५००/- रुपये में पक्के रंग में मिलेगा।

कवि श्री टेकचन्दजी कृत

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

जोगी-रासा
नेमीनाथो, देतो साथो,१ भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशदिन मन वच, काय लाय करि गाऊँ॥
धर्म कहो तुम, वार्ण दश विधि, सो मोहि होउ सहाई।
करुणासागर, स.रू. गर्भित, शीश नमों श्रुति गाई॥

गीता छन्द
धर्मके दश कहे लक्षण, तिन थकी की जिय सुख लहै।
भवरोगको यह महा औषधि, मरण जामन दुख दह्रै॥
यह वरत नीका मीत जीका२, करो आदरतें सही।
मैं जजों दश विधि धर्मके अंग, तासु फल है शिवमही॥

पद्धड़ी छन्द
यह धर्म भवदधि नाव जान, या सेयें भव दुख होइ हान।
यह धर्म कल्पतरु सुख्ख पूर, मैं पूजों भव दुख करन दूर॥

गीता छन्द
यह वरत मन कपि गले साहीं, सांकली सम जानिये।
गज-अश्व३जीत न सिंह जैसे, मोहतम रवि मानिये॥

१ तुम्हारा साथ। २ जीवका मित्र। ३ इन्द्रयरूपी हाथी को।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सुरथान माहीं व्रत नाहीं, मनुज हूँ शुभ कुल लहें।
तातैं सुअवसर है भलो, अब करों पूजा धुनि कहैं॥
बेसरी छन्द

जाने दशलक्षण व्रत कीना, से सतरूपनिमें परवीना।
भवसागर फिरनो मिट जावै, जो नर दशलक्षण वृष भ्रावै॥
भुजंगप्रयात छन्द

यही धर्म सारं करै पाप क्षारं, करै सुख अपारं।
यही धर्म धीरा, हरै लोक पीरा, यही धर्म मीरा करै लोक तीरा॥
त्रिभंगी छन्द

यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत उधारा हितदानी।
यह दशविधि गाया, जन मन भाया, उच्च बताया जिनवानी॥
यह शिव करता रा, अधतैं न्यारा, भवि उद्धारा मुनि धारा।
ताकौ मैं ध्याऊँ शीश नवाऊँ, अर्घ चढ़ाऊँ सुखकारा॥
चौपाई छन्द

या व्रतकी महिमा कहै वीर, दशविधि धर्म हरै भवपीर॥
इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजुहु धरम अति दुरलभ पाय॥
दोहा- दश प्रकारको धरम यह, दशविधि सुतरु जान।
वांछित पद सेवक लहैं, अधिक कहा सुखदान॥
सोरठा- धर्म हमारा नाथ, धर्म जगतका सेहरा।
भव भवमें हो साथ, और न वांछा मन विषै॥
मण्डल मध्ये पुष्पांजलि क्षिपेत्।

१-स्वर्ग। २-धर्म। ३- प्रधान। ४-कल्पवृक्ष

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

समुच्च्य पूजा

त्रिभंगी छन्द

यह धर्म क्षमावा मान गुमावा, सरल सुभावा सतिवानी।
शुचि भाव करावा संयम लाबा, तप करवावा अधिकानी॥
शुचि त्याग बतावा नगन पुजावै, शील बढ़ावै शिवदाई।
यह धर्म दशारा थाप करारा, पूजन धारा शिरनाई॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र
तिष्ठ ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।
मणुयाणदकी चाल

क्षीर सागर तना नीर शुभ लाइये।
कनक झारी विषै धार गुण गाइये॥
मरण उत्पत्ति नहीं होय ता फल सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥१॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व।
नीर संग अगर चन्दन घिस लाइयजी।
सुभग पातर विषै धारि श्रुति गाइयजी॥
जगत ताप तासु फल तुरत नाशौ सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥२॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्व।
लेय अक्षत भले मुक्तिफलसे कहे।
उजले अखंड सुभग स्वर्ण पातर लहे॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

अक्षयपद पावनै आप मनमें सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥३॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व. स्वाहा।
फूल कन्ननवन कल्पतरु के भले।
गन्ध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले॥
माल तीन गुंथि कामबाण नाशक सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥४॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व.
सुगम नैवेद्य मोदक घने लाइये।
विविध स्वादमय सु धारि भक्ति उर भाइये।
भूख दुख हर्ण स्वर्ण पात्र धरिके सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥५॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्व.
दीप मणि रतनमय और उत्तमय सही।
धारि कनक थालमें सु आरति जु करि लही॥
धर्मज्योति मोह अन्धकार नाशिका सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥६॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्व.
धूप दश अङ्ग मय लायकर सारजी।
अगनिसंग खेवहु सुभक्ति उर धारजी॥
कर्म क्षयकारि भव वास नाशन सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही॥७॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व. स्वाहा।

जयमाला-दोहा

दश वृष रतन मिलायके, माल करै भव जोय।
धरै आपने उर विषै, ता सम और न कोय ॥११॥

बैसरी छन्द

दशलक्षण वृष शिवमग दीवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा।
मुकति दीप पहुचाँवन नावा, ये दश धर्म जजों जुत भावा ॥
१-दीपक।

दोहा

इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश पार।
पावै सुख मन भावना, अनुक्रम ले भव पार ॥
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः पूर्णाघ्यं निर्वपामि स्वाहा।

इति समुच्चय पूजा।

१-जीवकी रक्षा। २- आकिंचन्य धर्म।

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

अडिल छन्द

जीव तिरस थावर जेते जगमें सही।
देव नरक नर पशु चारि गतिकी मही ॥
तिन सब ऊपर दयाभाव उर माँहि जी।
सो है उत्तम क्षमा थापि जजूँ याहि जी ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांग! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांग! अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांग! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अद्धाष्टकम् (पद्धरी छंद)

जल गंग नदीको विमल सोइ, धरि रतन पियाले शुद्ध होइ।
यह धर्म क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि.।
बावन चंदन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जुत चढ़ाय।
यह धर्म छिमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि.।
अक्षत मुक्ताफल सम जु लाय, अति उज्ज्वल नख शुद्ध शुभ्राय।
यह धर्म छिमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय अक्षयपद प्राप्ताये अक्षतान् नि.।
शुभ फूल कल्पतरुके अनूप, करि माला सुभग सुगन्ध रूप।
यह धर्म छिमा उत्तम सुजान, मैं पूज्यों मन वच भक्ति आन ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्मांगाय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

नाना रस पूरित चरु सम्हार, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि.।
मणि दीपकसार बनाय लाय; धरि कनक थाल धरि भक्ति आय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि.।
ले धूप अग्रुजगा गन्धकार, दुर्भाव हुताशन मांहि जार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा।
फल नारिकेल बादाम सोड़, पूगीफल खारिक भक्ति जोड़।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।
जल चन्दन अक्षत फूल लाय, चरु दीप धूप फल अरघ भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्ग्याय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं नि. स्वाहा।
प्रत्येकार्घ्याणि। अडिल

पाप प्रकृति कर जीव, अशुभ बन्धन करयो।
थावर नामा कर्म उदय दुखको भरयो॥
पृथ्वी मांहि सु जाय सहे बहु अध फला।
तिनका रक्षण भाव क्षमा उत्तम भला॥१॥
ॐ ह्रीं श्री पृथ्वीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

जे जलकायिक जीव ज्ञान बिन दुख लहें।
इक इन्द्रियके द्वार अतुल विपदा सहें॥
तिनको दुखमय जानि मुनि करुणा करै।
तसु प्रसादतैं झटिति मोक्ष वनिता वरै॥२॥
ॐ ह्रीं जलकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
अगनिकाय धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुख तन सहैं जलैं सब जग मही॥
इन पर करुणाभाव धरैं जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही॥३॥
ॐ ह्रीं अग्निकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
पवन कायके जीव महा सङ्कट सहैं।
हाथ पांव मुख वचन थकी बाधा लहें॥
इनपर करुणाभाव जती धारैं सही।
सो ही उत्तम क्षमा कही शिवकी मही॥४॥
ॐ ह्रीं वायुकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि. स्वाहा।
हरित कायमें प्राणी अति वेदन लहै।
छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहै॥
इन पर समता भाव सुखी इनको चहै।
सो ही उत्तम क्षमा धारी मुनि शिव लहै॥५॥
ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
थावरके पन भेद पाप फलतैं बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भनै॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

इनको दुखमय जानि दया मन लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिर नाय है॥६॥
ॐ ह्रीं सूक्ष्मस्थूल पञ्चस्थावरपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
लट अरु जोंक गिंडोला इणी जानिये।
कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये॥
इन पर करुणाभाव जती धारैं सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवकी मही॥७॥
ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
चींटी कूंथा खटमल वीछू दुखमही।
ते इन्द्रिय परजाय पाय धुन आदि ही॥
इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सब अघ जरैं॥८॥
ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
माखी मच्छर टीड़ी भंवरादिक सही।
बर्रै ततड़या मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही॥
इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों वसुविधि जरैं॥९॥
ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।
इन्द्रिय पांचों होय, नहीं मन जो लहै।
ते जिय जानि असैनी अघ फल दहैं॥
इनको दुःख भरिपूर जानि करुणा धरैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवधल धरैं॥१०॥
ॐ ह्रीं संज्ञी पंचेन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

नारक जीव अति दुखी पाप फलतै सही।
छेदन भेदन पीर सहैं जात न कही॥
इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सुखदाय है ॥११॥
ॐ ह्रीं नारकीजीवपरिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

गीता छन्द

मनुष्य क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने।
बहु चाह पीड़ित रागद्वेषी, अध घनो उपजे तिने॥
तिन देख यतिवर दया लावे, महा दीन दयालजी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल, जजों भाग्य विशालजी॥
ॐ ह्रीं मनुष्यजीव-परिरक्षण-रूपोत्तमक्षमा-धर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परकार चारों देव गतिमें, जीव सुख राचे सही।
लखि देखि परकी झुरे नितही, मानते पीड़ा कही॥
तिन देखि मुनि उर दया भावै, महा कोमल भाव जो।
सो धर्म उत्तम क्षमा पूजौं अर्घ तैं कर चावजी॥
ॐ ह्रीं चतुर्गतिदेवजीव परिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

बेसरि छन्द

थावर तिरस जीव जब जोई चहैं गति करमनिके वशि होई।
तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम क्षमा धर्म जजाई॥
ॐ ह्रीं त्रसस्थावर-समस्तजीव-परिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला-दोहा

धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जजै जीव सो पुनि लहे, करै जु शिवपुर जाय॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

बेसरि छन्द

सब जीवन में राग न दोषा, सो है क्षमा धर्म निरदोषा।
दुर्जन कृत उपसर्ग लहावै, ताहू पै समभाव रहावै॥
मुनिको वचन कहै दुखकारी, मर्म छेद छेदै अध धारी।
मान खंड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥
जे कोय दुष्ट मुनिनको मारै, तीक्ष्ण शस्त्रतैं करि परिहरै।
बांधे तनको खेद न पावै, तिनपर क्षमा धर्म मन लावै॥
अति दुखिया जिय को ऋषि जानै, तब मुनि अनुकंपामानै।
आपा परको हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥
उत्तम क्षमा धर्म सुखदाई, क्षमा धर्म सब जियका भाई।
जब मुनिहुपै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै॥
क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई।
क्षमा समान न बल अति पावै, तातैं जजो क्षमा वृक्ष भावै॥
क्षमा धर्म शिव राह बतावै, क्षमा तात अरु भाई।
जाते सिद्ध सुखवनको पावै, ऐसी क्षमा मुनि मन लावै॥

सोरठा।

क्षमा आभूषण सार, उर में जो पहिरे सही।
ते भवसागर पार, जजों धर्म उत्तम क्षमा॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमा-धर्माङ्ग्याय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
॥ इति उत्तमक्षमाधर्म पूजा ॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम मार्दव धर्माङ्ग पूजा

पड्डी छन्द

मार्दव वृष भाव विचार सोइ, जहां मान भाव दीखे न कोइ।
इंहधारी मुनि शिवगामी जानि, मैं जजों थापि मार्दव सुभानि॥
ॐ ह्रीं श्रीउत्तममार्दवधर्म धर्माङ्ग्याय अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं।

अष्टाष्टकम् (मनुयणाणन्द की चाल)

क्षीर सम नीर शुद्ध गाल कर लाइये।
पात्र सुवरण विषे धारि गुण गाइये॥
जगतफिरनो मिटे तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१२॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्ग्याय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वच्छ नीर संग चंदनादिको मिलायजी।
शुद्ध गंधयुक्त भक्ति भावतैं चढ़ायजी॥
जगत आताप-हर जानि ता फल सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१३॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्ग्याय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत समुज्ज्वल खंड बिन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये॥
धौल्य फलदाय मनलाय ध्याऊं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१४॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्ग्याय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

फूल कल्पवृक्षके गंध रंग सारजी।
माल ग्रंथि शुद्धभाव भक्ति कर धारजी॥
मदन मद हरन सुफल जानि यातै सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥५॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय पुष्प निर्व. स्वाहा।
सुभग रस शुद्ध नैवेद्य मन लाइये।
मोदकादि शुद्ध भक्ति भावतैं चढ़ाइये॥
धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन वचन तन सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥६॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय नैवेद्यं निर्व. स्वाहा।
दीप रतनमयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्ति भावतैं धरा॥
नाश अज्ञान है तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥७॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय दीपं निर्व. स्वाहा।
धूप दशगंध शुभ लेय मन मानिये।
अगर चंदन सबे मेली शुभ ठानिये॥
अग्नि संग खेड़ये कर्म जालन सही
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥८॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय धूपं निर्व.स्वाहा।
श्रीफलादि लोंग पुञ्जी फलादि जानिये।
शुद्ध बादाम खारकर भले आनिये॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सिद्ध थानक लहै तासु फलतैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥९॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय फलं निर्व.स्वाहा।
नीर चंदन अखित पुष्य चरु दीप जी।
धूप फल अर्घ कर भाव शुद्ध टीपजी॥
लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही॥१०॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व. स्वाहा।

प्रत्यकाध्यायी (चाल मनुष्यानन्दको)

देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही।
दोष अष्टादश तासु माहीं नहीं॥
नमत तिन पद करै धर्म मार्दव कहो।
सो जजों चारि गति मांहि भरमन दहो॥११॥
ॐ ह्रीं वीतरागदेवपद नमन-मार्दवधर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
वीतराग देव कही वानि सो धर्म है।
ता सुने जीव निज है भाव धर्म है।
मन वच काय श्रुतपाद सिरनाय है।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री जिनधर्मपद नमन-मार्दवधर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
धर्मको सेय तंप लेय कर्म जार जी।
भये सिद्ध देव तन रहित सुखकार जी॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

लेय इन नाम मन वचन शिरनाय है।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है॥१३॥
ॐ ह्रीं सिद्धपदमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घं निर्व. स्वाहा।
धारि छत्तीस गुण सूरि सुखदाय जी।
धर्म तप भाव सों गुप्त धरि भाय जी।
मान तजि नमन इन पद विषैं लाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१४॥
ॐ ह्रीं आचायपदमन मार्दव धर्माङ्गाय अर्घं निर्व. स्वाहा।
धारि गुण पांच अरु बीस उवझायजी।
और भी अनेक गुण पास तिन थायजी॥
मान तजि इन चरण कायको नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-नमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
क्षेत्र अतिशय तहां धर्म को धाय है।
नमन बहु जिय करै देव गुण गाय है॥
मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्र-पद-नमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व.
देव जिन की सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी।
रूप श्रुति ध्यान मुद्रा कही जिन जिसी॥
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम-जिन-चैत्यपदमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घं निर्व.

श्री दश लक्षण मण्डल विधान।

सुरग थानक विंबै देव जिनके सही।
रतनमय जैन बिंब बिगर किये है मही।
मान तजि शीश इन 'चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
ज्योतिषी व्यंतरा धर्में मध्यलोकजी।
बिन किये चैत्य जिन कहै अघ रोकजी।
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
भवन देवनि विषै बहुत जिनरायजी।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तासु पायजी॥
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
आदि इन पूज्य थानक बहुत हैं सही।
सिद्ध क्षेत्र मोक्ष फलदाय तीरथ मही॥
मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्र-पदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।
जयमाला। (बेसरी छन्द)
मार्दव धर्म मानको खोवै, ताफल जगत पूज्य फल होवैं।
मार्दव सकल दोष निवारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥

श्री दश लक्षण मण्डल विधान।

मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजै, मार्दव धरम भजै अघ धूजै॥
मार्दव मान हरै सुखकारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम महा नर ध्यावै, मार्दव धरम हानि नहिं पावै।
यह मार्दव वृष शिव थल धारै, ताफल आप तिरै अनितारै॥
मार्दव सबको राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना।
मार्दव धरम जीव ले धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम सुरग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भव फेरा।
मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव मोक्षमार्गको दाता, मार्दव धरम सकल जग त्राता।
मार्दव वृष गुणवन्ता धारै ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम कल्पतरुभाई, मार्दव मनवांछित फलदाई।
मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव धरम कनकमें मीना, मार्दव धारि सकै न कमीना।
मान मार मार्दव वृष धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥
मार्दव वृष सब धर्म प्रधाना, मार्दव मोह मल्लुक। हाना।
मार्दव माल पुरुष उर धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै॥

दोहा

मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय।
जगत छुड़ावै शिव करै, ते भारक्षक होय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तम मार्दव धर्माङ्गाय अर्घ्यं नि।

श्री दश लक्षण मण्डल विधान।

उत्तम आर्जव धर्म पूजा

बेसरी छन्द

जग परपंच रहित जो भावा, सरल चित्त सबते निरदावा।
तिनको आर्जवभावसु कहिये, सो ह्याँ थापि पूजि फल लहिये॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जव धर्माङ्गाय अत्र अवतर २ संवौषट्।
अत्र तिष्ठर ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् सन्निधिकरणं।
अथाष्टक (बेसरी छन्द)
क्षीर समुद्रा उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धर अति धीरा।
जरा रोग नाशनको भाई, आर्जव भाव नमों शिर नाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि।
चंदन बावन जल घसि लाया, कनकपात्रमें धरि उमगाया।
शोकानल तप नाशन भाई, आर्जव धरम जजों शिर नाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि।
अक्षत मुक्ताफलसे जानो, उज्ज्वल खंड विवर्जित आनो।
क्षय नहि होय इसी पद दाओ, आर्जव भाव नमो शिर नाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् नि।
फूल सुगंध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतभय भाया।
तिनकी माला गुंथिकर लाय, आर्जव भाव नमो शिरनाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि।
नाना रस नेवेद्य करावै, मोदक आदि भक्तिसे लावै।
भूख व्याधि नाशनको भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

[२०]


दीपक रतन थालि धरि लीजै, मनवचकाय शुद्ध करी लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दरशावै, आर्जव धरम जजै शिरनाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि.।
धूप अगरजा चंदन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्म दहनकी अगनि जराई, आर्जव भाव नमो शिर नाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि.।
ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लौंग आदि हितकारी
सिद्ध लोक वांछा मन माहीं, आर्जव धरम जजो शिरनाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.।
जल चंदन अक्षत कामादी, चरु दीपक फल धूप विधारी।
अर्घ लेय मनवचनत भाई, आर्जव धरम जजों शिर नाई।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्ग्याय अनर्घ्यपद प्राप्तयेऽर्घ्यं नि.।

प्रत्यकाव्याणि (बेसरी छन्द)

गुण चयालीस जहां प्रभु तेरा, अष्टादश तहां दोष न हेरा।
तिनपदसरल भावशिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिघ्र पावै।।
ॐ ह्रीं श्री छयालीसगुणसहितजिन चरणमनजार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
मुक्तजीव अरहंत श्रुति कीजे, मनवच कुटिल भाव तजि दीजै।
तिनपद सरलभाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीव अरहन्तपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
कर्म काटि शिवलोक सिधारे, सिद्ध सुदेव हरौ अघ सारे।
तिनपद सरल भाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।

[२१]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


सिद्ध शिला पैंतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तत्रस्थित आतम शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धशिलास्थित मुक्तात्मपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
गुण छत्तीस सुधारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य-पदनमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणन युत सूरा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य-पदपरोक्ष-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
गुण पचीस उवझाय सु माहीं, ग्यारह अंग चौदह पुरवाही।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
बहु गुण धर उवझाय सु जानौं, दूरहितै तिनको चित आनौ।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-परोक्ष-नमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
बीस आठो गुण साधन साधा, सो नहिं लहें जगत की बाधा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री साधुपदनमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
दूरहितै मुनि गुण जु चितारै, मन वच काया निज वश धारै।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री साधुपद-परोक्षनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
वरण विहीन सु जिनवर वानी, तिनको सुनि सुख पावै प्रानी।
तिनपद सरल भाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री जिनमुनि-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।

[२२]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


अतिशय क्षेत्र सु तीर्थ थामा, तातैं पुनि गात्र के पूरै कामा।
तिनस्थल सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृषजजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपद-नमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
शिखरसम्मेद आदि सिद्ध थाना, लहेंपुनि लियशिव कर्म नशाना।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपद-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
विगर किये जिनबिंब अनूपा, लक्षण चिह्ह जानि जिन रूपा।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै।।
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम-जिनचैत्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
कृत्रिम जे जिन बिंब बिराजे, विनय सहित पुन दायक छाजे।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।
ॐ ह्रीं श्री कृत्रिम-जिनचैत्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।
इत्यादिक बहु क्षेत्र सुथाना, पूजनीय तीर्थ अघ हाना।
तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै।
ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपदनमनार्जवधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.।

जयमाला - दोहा

सरल भाव सारे सरस, सुरनर पूज्य महान।
तातैं तजनी कुटिलता, आरजव भाव ल्हान।।

बेसरी छन्द

सरल भाव समता उर आनै, सरल भाव सब औगुन भानै
आरजव भाव धरे जो जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

आरजव भाव धरै जे प्राणी, तिनके होनहार शिवरानी।
दोष भाग तिनतैं नहिं छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा॥
आरजव भाव अमरपद धावै, आरजव में औगुन नहिं पावै।
कुटिलभाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धरै जे जीवा।
आरतिको आरजव ही खोवै, आरजव भाव पापमल धोवै।
रोग शोक ताको नहिं छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा।
आरजव शुद्धभाव जिन पाया, तिनने लहि पुन, पाप गमाया।
अनुभव आनन्द तानै छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा।
आरजवभाव दोष सब खोवै, आरजव कर्म कालिमा धोवै।
शुद्ध सुभाव सु तानै लीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा॥
आरजवभाव सकलको प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतैं न्यारा।
ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धरै जे जीवा॥
आरजव सुर शिवके सुख ठाने; आरजवभाव पूर्व अधभाने।
अदभुत आपापर भिनकिवा, आरजवभाव धरै जे जीवा॥

दोहा
अन्तरंग निरदोष के, प्रगटै आरजव भाव।
जाके फल मरनो मिटै, छुटै कर्म को दाव॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जव-धर्मङ्गाय-पूर्णार्घ्यं नि।
इति उत्तम आर्जव धर्मपूजा संपूर्ण।

उत्तम सत्य धर्म पूजा

अडिल्ल छन्द
सत्य सरीसो धर्म जगत् में है नहीं,
सत्य धरम परभाव लहें शिव की मही।
तातें भव दुख हरण सत्य वृष भाइये,
यहां थापि मैं जजों सत्य मन लाइये॥
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्माङ्गा अत्र अवतर संवौषट्। अत्र तिष्ठर
ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अष्ठाष्टक - त्रिभङ्गी छन्द
जो झूठ विनाशे जग विसवासे, पुण्य प्रकाशै हितदानी।
सब दोष निवारै समता धारै शिवपुर कारै गुण थानी॥
जग आदरकारी मोह निवारो, आनंदधारी जग मानो॥
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, जल ले परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व।
सति सो वृष नारो या जग माहीं, पूज्य कहाही शिव थानी।
सब औगुण धोवै पाप बिलोवै, धर्म मिलावै दुख हानी॥
पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, सुख करतारो भवि मानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, गंध ले परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्व।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

या सत्य समानो रतन न आनौ, सम्यक दानी शिवकारी।
भवदधिको नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी॥
सिधलोक नसैनी शिवसुख दैनी, ध्यावत जैनी अनलानी।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, अक्षत ले परमा जजिजानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व।
सति सो नहिं मिट्टा मिटन चिन्ता, अघ अरिहन्ता जसदाई।
सति जगत पियारो भव उद्धारो दुख जलतारो श्रुति गाई॥
याको मुनि ध्यावै शिवसुख पावै, पाप गमावै भव हानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, पुष्प परना जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व।
सति धर्म सु पूजै सब अघ धूजै, शिवमग सूजै अधिकाई।
याते वृष सारा काज संवारा, अशुभ विहारा सिद्धि दाई॥
सति सारा नीका सुखदा जीका, शिवमग टीका शुभानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, ले चरू परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि।
सति धर्म उजाला जग का पाला, विषम टाला धर्म करा।
यह ज्ञान उजाले अशुभ सु टाले, संयम पाले झूठ हरा॥
सति प्रिति उपावै बैर गमावै, जो श्रुति लावै उर ज्ञानो।
एसो सति धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमा जजि जानो॥
ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्व।
सति धर्म प्रभावे मुनि शिव जावै, जगजस गावै थुतिलाई।
सति धर्म जु मूला अघ-क्षय थूला, झूठ कुसूला दहभाई॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

सत धर्म अनूपा शुभ रस कूपा, पुण्य स्वरूपा मग मानौ।
ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परमां जजि जानौ॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मङ्ग्याय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
सतिधर्म अभ्यासी शिवथल वासी, पाप विनाशौ हितकारी।
गुण ज्ञान बढ़ावै आदर ल्यावै, पुण्य उपावै सति भारी॥
जगमें अति नीका बन्धु जीका, शिवतिय पीका गुण थानौ।
ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, ले फल परमां जजि जानौ॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मङ्ग्याय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल चन्दन नीका अक्षत टीका, फूल चुनीका माल करौ।
चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल आया अर्घ्य धरौ॥
उर भक्ति बढ़ाई मुख थुति गाई, सत सब भाई पहिचानौ।
ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, अर्घ्य परमां जजि जानौ॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं पदप्राप्तयेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रत्येक्याणि - चौपाई

क्रोध सहित जय सत नहिं कहे, झूठ वचन तैं अघ शिर लहे।
क्रोध रहित जे वचन प्रमानि, सो सतधर्म चयो जिनवानि॥
ॐ ह्रीं श्री क्रोधातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
लोभ सहित जिय झूठ बखानि, साँच धरम ताको नहिं मानि।
लोभ रहित सत धरम सुभाय, सो सत धर्म जजों थुतिगाय॥
ॐ ह्रीं श्री लोभातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
साँच न कहे भेतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव।
भयतें रहित सत्य वचन भाख, सो सत धर्म करो थुति लाख॥
ॐ ह्रीं श्री भयातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

हास्य सत्य को नाशनहार, ताते सहै महा दुख भार।
हास्य रहित सब धर्म कहाय, सो सत धर्म जजों थुति गाय॥
ॐ ह्रीं श्री हास्याचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन आज्ञा बिन भाखै बैन, पूर्वापर वच ठीक कहे न।
ऐसे दोष रहित सति भाय, सो सत धर्म जजों थुति गाय॥
ॐ ह्रीं श्री जिनाज्ञालंघननातिचाररहित-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

गीता छन्द

जा देशमें जिस वस्तुको तिस मानिए सो सति सही।
जिम भातको गुजरात मालवदेश में चौखा क ही॥
करनाटकमें कूलू कहै द्राविड़ में चौरु बखानिये।
इमजानि जनपद सत्यदो जजि हर्ष उरमें आनिये॥
ॐ ह्रीं श्री जनपद-सत्यधर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आर्दिल छन्द

बहु नर ताको कहै तिसौ ही मानिये।
रंक नाम लक्ष्मीधर जाही बखानिये॥
तो यह रूढी नाम सत्य संवृत कही।
या नयतैं सत जानि जजों सत वृष सही॥
ॐ ह्रीं श्री संवृतसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
काहु नर आकार तथा पशु के सही।
चित्र काष्ठ में थापि नाम नर पशु कही॥
यह थावर सत भेद शास्त्र में गाइयो।
ताकों सत वृष जानि जजों मन लाइयो॥
ॐ ह्रीं श्री स्थापनसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान

जाको जगमें नाम प्रसिद्ध बखानिये।
सोई ताको नाम सत्य सों मानिये॥
नाम सत्य सो जानि जिन जिन इमि कही।
ताको मन वच काय जजों शुभ सुखमही॥
ॐ ह्रीं श्री नामसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही।
रूपवान इत्यादि अंग बहुतैं कही॥
रूप सत्य सो जानि कह्यो जिनवानजी।
ऐसो सत्य सु जानि जजों सुखदानजी॥
ॐ ह्रीं श्री रूपसत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कही वस्तु यह यातें छोटी है सही।
यातें है यह बड़ी अपेक्षा इमि कही॥
याको नाम प्रतीति सत्य सो जानिये।
ताको भी है जजों भक्ति उर आनिये॥
ॐ ह्रीं श्री अपेक्षासत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो नरपति को पुत्र ताहि राजा कहै।
सो नैगमनय जानि सत्य तातैं यहै॥
यहीसत्य 'व्यवहार जिनेश्वर धुनिकही।
मैं जजिहौं कर भक्ति नाय मस्तक सही॥
ॐ ह्रीं श्री व्यवहार-सत्य-धर्मङ्ग्याय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्राक्ति इन्द्रमें इसी लोक उलटा करै।
सो तो लोक अनादि उलटी कैसे धरै॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

[२९
पै यह शक्ति अपेक्षा वचन प्रमाण है।
यह सम्भाव सत्य जजों स्थिति आन है॥
ॐ ह्रीं श्री सम्भावना-सत्यधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
जीव अनन्त अनादि नजर आवै नहीं।
द्रव्य अमूर्ती पांच नरक सुरकी मही॥
ये नेहि देखें नयन सूत्रसों जानिये।
भाव सत्य सो जानि जजों मन आनिये॥
ॐ ह्रीं श्री भावसत्यधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
किसी वस्तुकी उपमा जाको लाड़ये।
ज्यों दानी नर देख कल्पद्रुम गाइये।
याको उपमा सत्य नाम जानों सही।
सो मैं पूज्यों भक्ति नाय मस्तक मही॥
ॐ ह्रीं श्री उपमा-सत्यधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
इत्यादिक बहु भेद सत्य के जानिये।
कहे देव जिनराय अपनी वानिये॥
सो मैं मन वच काय शुद्ध थुति गायजी।
पूज्यों सत्य सुधर्म अरघ कर लाइजी॥
ॐ ह्रीं श्री सत्य-धर्माङ्ग्यार्घ्यं नि. स्वाहा।
जयमाला (बेसरी छन्द)
सत्य धरम जग पूज्य बतावा, सत्य श्रेष्ठ जिनधुनि गाया।
सत्य धरम भवदधिको नावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥

[३०]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सत्य धरम वर अंग प्रवीना, सत्य धरम ज्यों कंचन मीना।
सत्य धर्मका सबको चावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य धरम का राखणहारा, सत्य धरम मुनिजनको प्यारा।
सत्य शिरोमणि धर्म कहावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य समान और नहिं मिंता, सत्य धर्म मेटे भव चिंता।
सत्य करे अद्यते निरदावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य धरम अपयश क्षयकारी, सत्य सुरक्षा करें हमारी।
सतहीका सुरनर जस गावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य सहित सब सार्थक धर्मा, तासों कटै चिरंतन कर्मा।
सत्य समान और नहिं ठावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य जगतमें पूजा पावै, सत्य धरम शिव राह बतावै।
सत्य जजों सति धर्म लहावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
सत्य सरोवर में सत नीरा, सत्य धरम खोवै सब पीरा।
सत्य धरम सों कुगति न पावा, सो सत धर्म जजों शुभ भावा॥
दोहा
सत सागर में जे रमें, ते वृष नायक जोय।
जजें धर्म सतको सही, मन वच काया सोय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसत्यधर्माङ्ग्याय पूर्णार्घ्यं नि.।
इति उत्तम सत्य धर्म पूजा।

[३१]

उत्तम शौच धर्म पूजा

बेसरी छन्द।
गौच धर्म पर चाह निवारै, तनतैं हू ममता निवारै।
जग वांछा तजि निर्मल भावा, शौच धर्म पूज्यों कर चावा॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय अत्र अवतर अवतर संवौषट् अत्र तिष्ठर
ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भवर भवर।
अद्धाष्टकम् - षट्पद छन्द।
जल क्षीरसमुद्रको सुभग लाय, धरि कनकपात्र में भक्तिभाय।
तन धरन मिटै वह फल सुजान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.।
घसि बावन चंदन निर आन, अलि गुंजत मानों करत गान।
घरि कनकपियाले भक्तिमान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय संसारातपविनाशनाय चंदनं नि.।
उज्जवलअखंड शुभ गंध दाय, अक्षतअनूप लखिशशिलजाय।
कनपात्र विषे धरि भक्ति आन, मैं शौच धर्म जजि हर्षआन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि.।
जे फूल कल्पद्रुमके मनोग, असक्त भ्रमर धित करत भोग।
तेन गुंधि मालउर भक्ति ठान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.।
शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसना रंजन नैवेद्य लाय।
धरि पुष्ट थालमें भक्ति ठान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्ग्याय-क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि.।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

मणी दीपक वा घृतमय संजोय, मनुनबिडभोमु तम नाशहोय।
अरु ज्ञान प्रकाश करै महान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं नि।

धूप धूप अगरजा गंध लाय, कन धूपायन ताकों खिवाय।
मिश्रा धूम्रगों वसुविधि उड़ान, मैं शौच धर्म जजि हर्षआन॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय दृष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि।

ले फल बादाम खारुक अनूप, अरु पूंगी फलआदिक स्वरूप।
धरि भक्तिभाव मन मांहि सोय, मैं शौच जजों शुद्ध भाव होय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि।

जल गंधाक्षत वर कुसुम होय, चरु दीप धूप फल सुभगजोय।
कर अरघ धरों कनपात्र लाय, मैं जजों शौच वर भक्तिभाय॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. स्वाहा।

अथ प्रत्येककाव्याणि (चाल मणुयणन्दकी)

देवके सकल सुख जानि चंचलमयी।
आयु पल्य सागरकी तुरत ही क्षय गयी॥
जान सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै॥११॥
ॐ ह्रीं श्री देवसुखवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.

चाहै चक्रो तने सुखको उर नहीं।
सहस छिनबे तिया और षट्खंड मही॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री चक्रिपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
खण्ड तिनको जु राज नारि बहु जानिये।
चारि विधि सैन सुर नर खगादि मानिये॥
जान सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री नारायणपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
कामदेवको सुरूप देखि देव मन हरे।
भोग वांछित सकल देव सेवा करें॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री कामदेवपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
आठ परकार सपरस विषै जानिये।
द्रव्य क्षेत्रकाल अनुसार भाव मानिये।
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री स्पर्शेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
पांच परकार रस सबि जगत दुखकारजी।
भोग वांछै सभी जगत दुखकारजी।
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री रसनेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

घ्राण इन्द्रियने गंध दो हैं सही।
ताहि अनुकूल पाय जीव साता लही॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री घ्राणेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
चक्षु इन्द्रियने पांच रूप भोग हैं।
ताहि चाहें अमर नाहिं तन रोग हैं॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१८॥
ॐ ह्रीं श्री चक्षुरिन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
राग संगीत इन आदि सुर साजिये।
सम स्वर भेद कर्ण भोग मन राजिये॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१९॥
ॐ ह्रीं श्री कर्णइन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
भोग वांछित घने चित्त आधारजी।
ताहि सेयर जीव सुख लहे अपारजी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच स्थानक धरै ॥२०॥
ॐ ह्रीं श्री मनवांछितभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि.
तन अशुभ आपको सु चाम मय जानिये।
सस मल घात पूरित सु घिन आनिये॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

[३५


जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥११॥
ॐ ह्रीं तनसम्वन्धीभोगावांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
रतन नवधादि भरपूर घरमें सही।
कोटि नित दान देते सु क्षय हो नहीं॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री धनवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
रूपमें शची समान नारी घरमें धनी।
शीश आज्ञा धरै प्रीत रस में सनी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री वनिताभोगावांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
कामदेव के समान पुत्र रूप धारी।
विनयवान सर्व बलवन्त तेज सारजी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री पुत्र भोगावांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।
भ्रात बहु विनय जुत आनि-पालक सही।
संग तिन भोग भोगी जीव साता लही।
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री भ्रातृसुखवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.।

[३६]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


मन्त्र दाता विपत्ति माहि मित्र सारजी।
प्रेम अन्तरङ्ग धारि नित्य रहें लाजजी॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री मित्रानुबन्धवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.
मित्र तिय पुत्र सब घरतने दासिया।
आदि परिजन सकल और घरवासिया॥
जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करै।
पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरै ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री सकलपरिजनानुकारित्ववांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.

जयमाला - दोहा

शौच सकल उर सुख करै, हरै लोभ मद सोइ।
मोक्ष धरै मरनो टरै, ताहि जजै शिव होइ॥
शौच भावतै पुण्य बड़ोई, कटै पाप जगमें जस होई।
शौच भाव संतनको प्यारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच भाव पर-चाहै निवारै, शौच भाव दुख शोकविदारै।
शौच सरवको बड़ा सहारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच सांच के बड़ा सनेहा, शौच मुनिव्रत की इक देहा।
शौच भाव मंगल करतार, जजों शौच यह धर्म हमारा॥

[३७]

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।


शौच भावमें नाहि कषाया, शौच भाव सब जग काभाया।
शौच धर्मका शरण गहारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच धर्मको मुनिगण सेवैं, ताफल स्वयं सिद्ध थललेवैं।
शौच धर्म समता रस धारा, जजों शौच यह धर्म हमारा॥
शौच समान और नहीं चिंता, शौच भाव टारै सब चिंता।
शौच सदा सब जियका प्यारा, शौच जजों यह धर्म हमारा॥

दोहा

शौच सार संसार में करै पवित्र जु भाव।
तातें धारो शौचको, भलो मिलो यह दाव॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तम शौचधर्माङ्गाय-पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा।

इति उत्तम शौच धर्म पूजा।

उत्तम संयम धर्म पूजा

अडिल्ल छन्द
संयम धर्म अनूप दोय विधि जानिये ।
इक रक्षा षट् काय दया उर आनिये ॥
मन इन्द्रिय वश करै दूसरो संयमा ।
सो मैं पूजौं थापि लहौं उत्तम रमा ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयम धर्माङ्ग ! अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र
तिष्ठ२ ठः ठःस्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भवर वषट् ।

अथाष्टकम् बेसरी छन्द।
निर्मल नीर भाव कर भीजै, मन मनोज्ञ बासन धरि लीजै ।
जिनको जन्म मरणगद जावैं, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. ।
चन्दन शीतल भावन भाया, तापर मन भंवरा जु लुभाया।
जग आताप तासु नशि जावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि. ।
शालि अखंड अखत ले भाई, शुभ परणति भाजन भरवाई।
जो अखंड थानक ले धावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. ।
फूल प्रफुल्लित भाव सु लीजै, भक्ति तारमें माल करीजै।
मदन वाण हरि सो बल पावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं नि. ।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

अखयपद पावनै आप मनमें सही।

गन्ध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले ॥ माल तीन गूंथि कामबाण नाशक सही।

विविध स्वादमय सु धरि भक्ति उर भाइये । भूख दुख हर्ण स्वर्ण पात्र धरिके सही। जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ॥५ ॥ ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः क्षुधा रोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्व. । दीप मणि रतनमय और धृतमय सही।

धारि कनक थालमें सु आरति जु करि लही ।। धर्मज्योति मोह अन्धकार नाशिका सही। जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ॥६ ॥ ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्व. । धूप दश अङ्ग मय लायकर सारजी।

अगनि संग खेवहूं सुभक्ति उर धारजी ॥ कर्म छयकार भव वास नाशन सही।

जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ॥७ ॥ ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व. स्वाहा। श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

******************************** लोंग खारिक सु नारिकेल सुक्खकारजी। और बादाम पुंगी फलादि सारजी ॥

लेड़ निज हाथमें सु भक्ति धरिकं सही। जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ॥८ ॥ ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्व. स्वाहा। नीर गन्ध अक्षत सुफूल चरु सोईजी।

दीप अरु धूप फल अरघ संजौईजी ॥

पुरट थाली विषै भक्ति करिके सही।

जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ॥९ ॥ ॐ ह्रीं श्री दशलक्षण धर्मेभ्योऽनर्घ्य पदप्राप्तयेऽर्घ्यं निर्व. स्वाहा। धर्म भवकूप तैं काढ़नेको रसी।

भव उदधि पार करतार नवका इसी।

धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही।

जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ॥१०॥ ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला-दोहा

दश वृष रतन मिलायके, माल करै भवि जोय। धरै आपने उर विषैं, ता सम और न कोय ॥१ ॥ बेसरी छन्द

दशलक्षण वृष शिवमग दीवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा। मुकति दीप पहुंचावन नावा, ये दश धर्म जजौं जुत भावा ॥ १-दीपक।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

दशविधि धरम धेरै जो कोई, करम नाशि फिर दुख नहिंहोई। धरम जु साधन और न कोई, यों दश धर्म जजौं मद खोई ॥ धरम जीवका पालनहारा, धरम मानका खण्डनवारा।

धरम थकी जावै कुटिलाई, इमि दश धर्म जजों चितलाई ॥ सांच वचन सम धरम न आनौ, धर्म भाव निर्मल पहिचानौ । धर्म जीवरख इंद्रिय जीतं इमि लखि धर्म जजौं करि प्रीतं ॥ तप ही सर्व धर्मका मूला, त्याग धरमतै क्षय अघ थूला। धर्म नगन सम और न कोई, ईमि दश धर्म जजौ मद खोई ॥ नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धरम जगतमें भाई। जो दश लक्षण मनमें आनै, सो भव तप हर शिवपद ठानै !! दश लक्षण व्रत इह विधि कीजै, उत्कृष्टै दश वास करीजै। नातर बेले पारन भाई, तथा इकंतर वास कराई ॥

शक्ति हीन है तो सुन मीता, दश एकान्त करौ धरि प्रीता । व्रत दश बरस करै मन लाई, करु उद्यापन मन वच काई ॥ नहीं उद्यापन शक्ति तुम्हारी, तों दूनौ व्रत करु सुखकारी। पीछे यथाशक्ति खरचावै, पूजन धर्म उद्योत करावै ॥ दोहा- इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश सार। पावै सुख मन भावनो, अनुक्रम ले भव पार ॥

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः पूर्णार्घ्य निर्व. स्वाहा। इति समुच्चय पूजा।

१-जीवकी रक्षा। २- आकिंचन्य धर्म।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान। [७

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

अडिल्ल छन्द

जीव तिरस थावर जेते जगमें सही।

देव नरक नर पशू चारि गतिकी मही ॥

तिन सब ऊपर दयाभाव उर मांहि जी।

सो है उत्तम क्षमा थापि जजूं याहिं जी ॥१ ॥

जल गंग नदीको विमल सोइ, धरि रतम पियाले शुद्ध होई।

यह धरम क्षमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि. । बावन चंदन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि. । अक्षत मुक्ताफल सम जु लाय, अति उज्वल नख शिख शुद्धभाय । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्व. । शुभ फूल कल्पतरुके अनूप, करि माला सुभग सुगन्ध रूप ।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय कामवाण विध्वंसनाय पुष्पं नि. । ***

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

नाना रस पूरित चरु सम्हार, शुभ मोदक आदि अनेक धार।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वंच भक्ति आन ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. । मणि दीपकसार बनाय लाय, धरि कनक थाल भरि भक्ति आय।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. । ले धूप अगरुजा गन्धकार, दुर्भाव हुताशन मांहि जार।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा। फल नारिकेल बादाम सोइ, पुंगीफल खारक भक्ति जोइ।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि. स्वाहा। जल चन्दन अक्षन फूल लाय, चरु दीप धूप फल अरघ भाय।

यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मन वच भक्ति आन ।।

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा धर्माङ्गाय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्धं नि. स्वाहा। प्रत्येकार्थ्याणि। अडिल्ल

पाप प्रकृति कर जीव, अशुभ बन्धन करयो।

थावर नामा कर्म उदय दुखको भरयो ॥

पृथ्वी माहिं सु जाय सहै बहु अघ फला।

तिनका रक्षण भाव क्षमा उत्तम भला ॥१ ॥

ॐ ह्रीं श्री पृथ्वीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान । [९

जे जलकायिक जीव ज्ञान बिन दुख लहैं। इक इन्द्रियके द्वार अतुल विपदा सहैं ।। तिनको दुखमय जानि मुनि करुणा करै।

तसु प्रसादतैं झटिति मोक्ष वनिता वरें ॥२ ॥ ॐ ह्रीं जलकायिकपरिरक्षणरुपोत्तम क्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. । अगनि काय धर जीव एक इन्द्रिय सही।

नाना दुख तन सहै जलैं सब जग मही ॥

इन पर करुणाभाव धेरै जे भवि सही।

सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही ॥३ ॥ ॐ ह्रीं अग्निकायिकपरिरक्षणरुपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. । पवन कायके जीव महा सङ्कट सहैं ।

हाथ पांव मुख वचन थकी बाधा लहैं ।। इनपर करुणाभाव जती धारै सही।

सो ही उत्तम क्षमा कही शिवकी मही ॥४॥ ॐ ह्रीं वायुकायिकपरिरक्षणरुपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. स्वाहा। हरित कायमें प्राणी अति वेदन लहै । छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहै ।।

इन पर समता भाव सुखी इनको चहै ।

सो ही उत्तम क्षमा धारी मुनि शिव लहै ॥५ ॥ ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरुपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्यं नि. । थावरकें पन भेद पाप फलतैं बने ।

सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भने ॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

*************************************** इनको दुखमय जानि दया मन लाय हैं।

सो ही उत्तम क्षमा जजौं शिर नाय है ॥६॥ ॐ ह्रीं सूक्ष्मस्थूल पंचस्थावरपरिरक्षणरुपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य नि.। लट अरु जोंक गिंडोला इल्ली जानिये । कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये । इन पर करुणाभाव जती धारै सही।

सो ही उत्तम क्षमा जजौं शिवकी मही ॥७॥ ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । चींटी कूंथा खटमल वीछु दुखमही ।

ते इन्द्रिय परजाय पाय धुण आदि ही ॥ इनको दुखमय जानि मुनि करुणा धरै । सो ही उत्तम क्षमा जजौं सब अघ जरै ॥८ ॥ ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । माखी मच्छर टीड़ी भंवरादिक सही।

बर्र ततइया मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही ॥ इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरै । सो ही उत्तम क्षमा जजौं वसुविधि जरें ॥९ ॥ ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । इन्द्रिय पांचों होय, नहीं मन जो लहै । ते जिय जानि असैनी अघ फल अति दहैं ॥ इनको दुःख भरिपूर जानि करुणा धरै । सो ही उत्तम क्षमा जजौं शिवथल धेरै ॥१० ॥ ॐ ह्रीं संज्ञी पंचेन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

नरक जीव अति दुखी पाप फलतैं सही।

छेदन भेदन पीर सहैं जात न कही ॥

इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं।

सो ही उत्तम क्षमा जजौं सुखदाय है ॥ ११ ॥ ॐ ह्रीं नारकीजीवपरिरक्षण-रुपोत्तम-क्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व.। गीता छन्द

मनुष क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घनें। बहु चाह पीडित रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिने ॥ तिन देख यतिवर दया लावे, महा दीन दयालजी। सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल, जजौं भाग्य विशालजी ॥ ॐ ह्रीं मनुष्यजीव-परिरक्षण-रूपोत्तमक्षमा-धर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व.। परकार चारों देव गतिमें, जीव सुख राचै सही। लछि देखि परकी झुरै नितही, मानते पीड़ा कही ॥ तिन देखि मुनि उर दया भावै, महा कोमल भाव जो। सो धर्म उत्तम क्षमा पूजौं अर्घ तैं कर चावजी ॥ ॐ ह्रीं चतुर्विधिदेवजीव परिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य नि.। बेसरी छन्द

थावर तिरस जीव जब जोई चहुँ गति करमनिके वशि होई। तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम क्षमा धर्म जजाई ॥ ॐ ह्रीं त्रसस्थावर-समस्तजीव-परिरक्षण-रूपोत्तम-क्षमाधर्माङ्गाय अर्घ्य। जयंमाला-दोहा

धर्म क्षमा उत्तम बंडो, सब जीवन सुखदाय। जजै जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय ॥ ***************************

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

बेसरी छन्द…

क्षमा आभूषण सार, उर में जो पहिरे सही।

ते भवसागर पार, जजों धर्म उत्तम क्षमा ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमा-धर्माङ्गाय पूर्णार्घ्यं । ॥ इति उत्तमक्षमाधर्म पूजा ॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम मार्दव धर्माङ्ग पूजा

पद्धडी छन्द

मार्दव वृष भाव विचार सोइ, जहां मान भाव दीखे न कोइ । ईहधारी मुनि शिवगामी जानि, मैं जजौं थापि मार्दव सुभानि ॐ ह्रीं श्रीउत्तममार्दवधर्म धर्माङ्ग अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र तिष्ठ२ ठः ठः स्थापनं अत्र मम सन्निहितो भव२ वषट् सन्निधिकरणं। अथाष्टकम् (मणुयणानन्द की चाल)

क्षीर सम नीर शुद्ध गाल कर लाइये।

पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये ॥

जगतफिरनौ मिटे तासु फलतै सही।

धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥ २ ॥

ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय जलं निर्व. स्वाहा। स्वच्छ नीर संग चंदनादिको मिलायजी ।

शुद्ध गंधयुक्त भक्ति भावतें चढ़ायजी ॥

जगत आताप-हर जानि ता फल सही।

धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥३ ॥

ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय चंदनं निर्व. स्वाहा। अक्षतं समुज्ज्वलं खंड बिन जानिये ।

सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये ॥

ध्रौव्य फलदाय मनलाय ध्याऊं सही।

धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥ ४ ॥

ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय अक्षतं निर्व. स्वाहा। ************************************ श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

************************************ फूल कल्पवृक्षके गंध रंग सारजी।

माल गूंथि शुद्धभाव भक्ति कर धारजी ॥ मदन मद हरन सुफल जानि यातें सही। धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥५ ॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय पुष्पं निर्व. स्वाहा। सुभग रस शुद्ध नैवेद्य मन लाइये । मोदकादि शुद्ध भक्ति भावतें चढ़ाइये ॥ धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन वचन तन सही। धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥६ ॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय नैवेद्यं निर्व. स्वाहा। दीप रतननमयी नाश तमको करा।

कनक पातर विषै भक्ति भावतें धरा ॥ नाश अज्ञान है तासु फलतैं सही।

धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।७।। ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय दीपं निर्व. स्वाहा। धूप दशगंध शुभ लेय मन मानिये ।

अगर चंदन सबै मेली शुभ ठानिये ॥

अग्नि संग खेइये कर्म जालन सही

धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥८ ॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय धूपं निर्व. स्वाहा। श्रीफलादि लौंग पुङ्गी फलादि जानिये । शुद्ध बादाम खारक भले आनिये ॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

************************************ सिद्ध थानक लहै तासु फलतें सही।

धूप फल अर्घ कर भाव शुद्ध टीपजी ॥ लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही । धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ॥१० ॥ ॐ ह्रीं उत्तममार्दव-धर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. स्वाहा। प्रत्येकार्थ्याणि (चाल मणुयणानन्दकी) देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही ।

दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं ॥

नमत तिन पद करै धर्म मार्दव कह्यो। सो जजौं चारि गति मांहि भरमन दह्यो ॥१ ॥ ॐ ह्रीं वीतरागदेवपद नमन-मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । वीतराग देव कही वानि सो धर्म है।

ता सुनै जीव निज हरै भाव धर्म है। मन वच काय श्रुतपाद सिरनाय है।

सो जजौं धर्म मार्दव सु शिवदाय हैं ॥२ ॥ ॐ ह्रीं श्री जिनधर्मपद नमन-मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । धर्मको सेय तंप लेय कर्म जार जी।

भये सिद्ध देव तन रहित सुखकार जी ॥ Jain Education International

श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

*************************************** लेय इन नाम मन वचन शिरनाय है।

सो जजौं धर्म मार्दव सु शिवदाय है ॥३ ॥ ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमन मार्दवधर्माङ्गायअर्घ्य निर्व. स्वाहा। धारि छत्तीस गुण सूरि सुखदाय जी।

धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥४॥ ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदनमन मार्दव धर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. स्वाहा। धारि गुण पांच अरु बीस उवझायजी ।

और भी अनेक गुण पास तिन थायजी ॥

मान तजि इन चरण कायको नाइयो ।

धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥५ ॥ ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-नमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । क्षेत्र अतिशय तहां धर्म को धाय है। नमन बहु जिय करै देव गुण गाय है ॥ मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नाइयो। धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्र-पद-नमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । देव जिन की सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी । रूप द्युति ध्यान मुद्रा कही जिन जिसी ॥ मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो ।

धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥७ ॥ ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम-जिन-चैत्यपदनमन मार्दव-धर्माङ्गाय अर्घ्य निर्व. । Jain Education International

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सुरग थानक विषै देव जिनके सही।

रतनमय जैन बिंब बिगर किये है मही।

मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।

धर्म मार्दव सुं तासु फल मोक्ष पाइयो ॥८ ॥ ॐ ह्रीं श्री उर्ध्वलोकसंबंधी जिनचैत्यूपङ्गनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्य। ज्योतिषी व्यंतरा थाने मध्यलोक जी । बिन किये चैत्य जिन कहै अघ रोकजी।

मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।

बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पायजी ॥ मान तजि शीश इन चरणको सु नाइयो।

धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१०॥ ॐ ह्रीं श्रीउर्ध्वलोकसंबंधी जिनचैत्यपदनमन मार्दवधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । आदि इन पूज्य थानक बहुत हैं सही।

मार्दव धर्म मानको खोवै, ताफल जगत पूज्य फल होवैं। मार्दव सकल दोष निरबारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ।। १८] श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजें, मार्दव धरम भजै अघ धूजै । मार्दव मान हरै सुखकारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ॥ मार्दव धरम महा नर ध्यावै, मार्दव धरम हानि नहिं पावै। यह मार्दव वृष शिव थल धारै, ताफल आप तिरै अनितारै ।। मार्दव सबको राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना । मार्दव धरम जीव ले धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ।। मार्दव धरम सुरग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भव फेरा। मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ।। मार्दव मोक्षमार्गको दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता । मार्दव वृष गुणवन्ता धारै ताफल आप तिरै अनि तारै ।। मार्दव धरम कल्पतरूभाई, मार्दव मनवांछित फलदाई । मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ।। मार्दव धरम कनकमें मीना, मार्दव धारि सकै न कमीना। मान मार मार्दव वृष धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै ।। मार्दव वृष सब धर्म प्रधाना, मार्दव मोह मल्लको हाना। मार्दव माल पुरुष उर धारै, ताफल आप तिरै अनि तारै !! दोहा

मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय।

जगत छुड़ावै शिव करै, ते भारक्षक होय ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तम मार्दव धर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

उत्तम आर्जव धर्म पूजा

बेसरी छन्द

जग परपंच रहित जो भावा, सरल चित्त सबतै निरदावा। तिनको आर्जवभावसु कहियें, सो ह्यां थापि पूज फल लहिये ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जव धर्माङ्गाय अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र तिष्ठ२ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भवर वषट् सन्निधिकरणं। अथाष्टकं (बेसरी छन्द)

क्षीर समुद्रका उज्जवल नीरा, कनक पियाले घर अति धीरा। जरा रोग नाशनको भाई, आर्जव भाव नमों शिर नाई ॥

ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चदनं नि.। अक्षत मुक्ताफलसे जानो, उज्जवल खंड विवर्जित आनो । क्षय नहि होय इसी पद दाई, आर्जव भाव नमो शिर नाई ॥ ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान नि. । फूल सुगंध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया। तिनकी माला गुंथिकर लाय, आर्जव भाव नमो शिरनाई ।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं नि. । नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्तितै लावे । भूख व्याधि नाशनको भाई, आर्जव भाव नमो शिरनाई ॥

दीपक रतन थालि धरिलीजै, मनवचकाय शुद्ध करी लीजै। घाति अज्ञान ज्ञान दरशाई, आर्जव धरम जजै शिरनाई ॥ ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि. । धूप अगरजा चंदन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी। कर्म दहनकी अगनि जराई, आर्जव भाव नमौ शिर नाई ॥ ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि.। ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लौंग आदि हितकारी सिद्ध लोक वांछा मन मांही, आर्जव धरम जजौ शिरनाई ॥ ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.। जल चंदन अक्षत कामारी, चरु दीपक फल धूप विथारी। अर्घ लेय मनवचतन भाई, आर्जव धरम जजौं शिर नाई ॥ ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्माङ्गाय अनर्घ्यपद प्राप्तयेऽर्घ्यं नि. । प्रत्येकार्याणि (बेसरी छन्द)

गुण छयालीस जहां प्रभु तेरा, अष्टादश तहां दोष न हेरा। तिनपदसरल भावशिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शित्र पावै ।। ॐ ह्रीं श्री छियालीसगुणसहितजिन चरणनमनार्जवधर्माङ्गायार्घ्य नि. । मुक्तजीव अरहंत थूति कीजै, मनवच कूटिल भाव तजि दीजै। तिनपद सरलभाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीव अरहन्तपदनमनार्जवधर्माङ्गायार्घ्य नि. । कर्म काटि शिवलोक सिधारे, सिद्ध सुदेव हरौ अघ सारे । तिनपद सरल भाव शिरनावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै ॥ ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनार्जवधर्माङ्गायार्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सिद्ध शिला पैतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा। तत्रस्थित आतम शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धशिलास्थित मुक्तात्मपद नमनार्जवधर्माङ्गायार्घ्यं नि. । गुण छत्तीस सुधारक सुरा, आचारज सब गुण भरपूरा। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै ॥ ॐ ह्रीं श्री आचार्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणन युत सूरा। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै ॥ ॐ ह्रीं श्री आचार्य-पदपरोक्ष-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । गुण पचीस उवझाय सु माहीं, ग्यारह अंग चौदह पुरवाहीं। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । बहु गुण धर उवझाय सु जानौं, दूरहितै तिनको चित आनो । तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिवधावै ॥ ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपद-परोक्ष-नमनार्जवधर्माङ्गायार्घ्य नि. । बीस आठ गुण साधन साधा, सो नहि लहै जगत की बाधा। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री साधुपदनमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । दूरहितै मुनि गुण जु चितारै, मन वच काया निज वश धारै। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री साधुपद-परोक्षनमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । वरण विहीन सु जिनवर वानी, तिनको सुनि सुख पावै प्रानी। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री जिनमुनि-ममनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

अतिशय क्षेत्र सु तीरथ ठामा, यात्री गण कै पूरैं कामा। तिसथल सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृषजजि शिवधावै ॥ ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । शिखरसम्मेद आदि सिद्ध थाना, तहँमुनि लियशिव कर्म नशाना। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री सिद्ध क्षेत्रपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । विगर किये जिनबिंब अनूपा, लक्षण चिह्न जानि जिन रूपा। तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै ॥ ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिम-जिनचैत्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । कृत्रिम जे जिन बिंब बिराजे, विनय सहित पुन दायक छाजै तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै । ॐ ह्रीं श्री कृत्रिम-जिनचैत्यपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । इत्यादिक बहु क्षेत्र सुथाना, पूजनीक तीरथ अघ हाना तिनपद सरल भाव शिर नावै, सो आर्जव वृष जजि शिव धावै। ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपद-नमनार्जव-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । जयमाला - दोहा

सरल भाव सारै सरस, सुरनर पूज्य महान।

तातै तजनी कुटिलता, आरजव भाव लहान ।।

बेसरी छन्द

सरल भाव समता उर आनै, सरल भाव सब औगुन भानै

आरजव भाव धेरै जो जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

आरजव भाव धरैं जे प्राणी, तिनके होनहार शिवरानी। दोष भाग तिनतैं नहिं छीवा, आरजव भाव धेरै जे जीवा ॥ आरजव भाव अमरपद द्यावै, आरजव में औगुन नहिं पावै । कुटिलभाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धरैं जे जीवा आरतिको आरजव ही खोवै, आरजव भाव पापमल धोवै। रोग शोक ताको नहिं छीवा, आरजव भाव धेरै जे जीवा । आरजव शुद्धभाव जिन पाया, तिनने लहि पुन, पाप गमाया। अनुभव आनन्द तानै छीवा, आरजव भाव धेरै जे जीवा । आरजवभाव दोष सब खोवै, आरजव कर्म कालिमा धोवै। शुद्ध सुभाव सु तानै लीवा, आरजव भाव धेरै जे जीवा ॥ आरजवभाव सकलको प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतै न्यारा। ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धेरै जे जीवा ॥ आरजव सुर शिवके सुख ठांने; आरजवभाव पूर्व अघभाने । अद्भुत आपापर भिनकिवा, आरजवभाव धरै जे जीवा ॥ दोहा

अन्तरंग निरदोष के, प्रगटै आरजव भाव ।

जाके फल मरनौ मिटै, छुटै कर्म को दाव ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तम-आर्जव-धर्माङ्गाय-पूर्णार्घ्य नि.। इत्ति उत्तम आर्जव धर्मपूजा संपूर्ण।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम सत्य धर्म पूजा.

अडिल्ल छन्द

सत्य सरीसो धर्म जगत में है नहीं,

सत्य धरम परभाव लहै शिव की मही।

तातैं भव दुख हरण सत्य वृष भाइये,

यहां थापि मैं जजौं सत्य मन लाइये ।।

ॐ ह्रीं श्री उत्तमसत्यधर्माङ्गा अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र तिष्ठर ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भवर वषट् । अथाष्टकं - त्रिभङ्गी छन्द

जो झूठ विनाशै जग विसवासै, पुण्य प्रकाशै हितदानी। सब दोष निवारै समता धारै शिवपुर कारै गुण थानी ।। जग आदरकारी मोह निवारी, आनंदधारी जग मानौ। एसो सति धर्मा काटत कर्मा, जल ले परमा जजि जानौ ॥ ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व. । सति सो वृष नाही या जग माहीं, पूज्य कहाही शिव थानी। सब औगुण धोवै पाप बिलोवै, धर्म मिलावै दुख हानी ॥ पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, सुख करतारी भवि मानौ। एसो सति धर्मा काटत कर्मा, गंध ले परमा जजि जानौ ॥ ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्व. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान । [२५

या सत्य समानौ रतन न आनौ, सम्यक दानौ शिवकारी । भवदधिको नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी ॥ सिधलोक नसैनी शिवसुख दैनी, ध्यावत जैनी अनलानौ । एसो सति धर्मा काटत कर्मा, अक्षत ले परमा जजिजानो ॥ ॐ ह्रीं सत्यधर्माङ्गाय-अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व. । सति सौ नहिं मिन्ता मिटन चिन्ता, अघ अरिहन्ता जसदाई । सति जगत पियारो भव उद्धारो दुख जलतारो थुति गाई ॥ याकौ मुनि ध्यावै शिवसुख पावै, पाप गमावैं भव हानौ एसो सति धर्मा काटत कर्मा, पुष्पं परना जजि जानौ ।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय नामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व. । सति धर्म सु पूजै सब अघ धूजै, शिवमग सूजै अधिकाई। यातै वृष सारा काज संवारा, अशुभ विहारा सिद्धि दाई ॥ सति सारा नीका सुखदा जीका, शिवमग टीका शुभआनौ। एसो सति धर्मा काटत कर्मा, ले चरु परमा जंजि जानौ ।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि. । सति धर्म उजाला जग का पाला, विभ्रम टाला धर्म करा। यह ज्ञान उजालै अशुभ सु टालै, संजम पालै झूठ हरा ॥ सति प्रिति उपावै वैर गमावै, जो थुति लावै उर ज्ञानौं। एसो सति धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमा जजि जानौ ॥ ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्व. । सति धर्म प्रभावै मुनि शिव जावै, जगजस गावै थुतिलाई । सति धर्म जु मूला अघ-क्षय थूला, झूठ कुसूला दहभाई ॥ ***

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सत धर्म अनूपा शुभ रस कूपा, पूण्य स्वरूपा मग मानौ। एसो सति धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परंमा जजि जानौ ।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व. । सतिधर्म अभ्यासौ शिवथल वासौ, पाप विनासौ हितकारी। गुण ज्ञान बढ़ावै आदर ल्यावै, पुण्य उपावै सति भारी ॥ जगमें अति नीका बन्धु जीका, शिवतिय पीका गुण थानौ ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, ले फल परमा जजि जानौ ।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व. । जल चन्दन नीका अक्षत टीका, फूल चुनीका माल करौ। चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल आया अर्घ धरौ ॥ उर भक्ति बढ़ाई मुख थुति गाई, सत सब भाई पहिचानौ । ऐसो सति धर्मा काटत कर्मा, अर्घ्य परमा जजि जानौ ॥ ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य पदप्राप्तयेऽर्घ्यं निर्व. स्वाहा। प्रत्येकार्थ्याणि - चौपाई

क्रोध सहित जिय सत नहिं कहै, झूठ वचन तैं अघ शिर लहै। क्रोध रहित जे वचन प्रमानि, सो सतधर्म चयो जिनवानी ।। ॐ ह्रीं श्री क्रोधातिचाररहित-सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य नि.। लोभ सहित जिय झूठ बखानि, सांच धरम ताको नहिं मानि । लोभ रहित सत धरम सुभाय, सो सत धर्म जजौं थुतिगाय ॥ ॐ ह्रीं श्री लोभातिचाररहित-सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । सांच न कहै भीतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव। भयतें रहित सत्य वच भाख, सो सत धर्म करो थुति लाख ॥ ॐ ह्रीं श्री भयातिधाररहित-सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

हास्य सत्य को नाशनहार, तातै सहै महा दुख भार। हास्य रहित सब धर्म कहाय, सो सत धर्म जजौं थुति गाय ॥ ॐ ह्रीं श्री हास्याचाररहित-सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । जिन आज्ञा बिन भाखै बैन, पूर्वापर वच ठीक कहै न । एसे दोष रहित सति भाय, सो सत धर्म जजौ थुति गाय ॥ ॐ ह्रीं श्री जिनाज्ञालंघनातिचाररहित-सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । गीता छन्द

जा देशमें जिस वस्तुको तिस मानिए सो सति सही। जिम भातकी गुजरात मालवदेश में चोखा क ही ॥ करनाटकमें कूलू कहैं द्राविड मे चौरु बखानिये । इमजानि जनपद सत्यको जजि हर्ष उरमें आनिये ।। ॐ ह्रीं श्री जनपद-सत्यधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । अडिल्ल छन्द

बहु नर ताको कहैं तिसो ही मानिये ।

रंक नाम लक्ष्मीधर जाही बखानिये ।।

तो यह रूढी नाम सत्य संवृत कही।

या नयतें सत जानि जजौं सत वृष सही ॥

ॐ ह्रीं श्री संवृतसत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। काहु नर आकार तथा पशु के सही।

चित्र काष्ठ में थापि नाम नर पशु कही ॥

यह थापन सत भेद शास्त्र में गाइयो ।

ताकों सत वृष जानि जजौं मन लाइयो ।।

ॐ ह्रीं श्री स्थापनसत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। **************** श्री दशलक्षण मण्डल विधान। ****************

जाकों जगमें नाम प्रसिद्ध बखानिये। सोई ताको नाम सत्य सो मानिये ॥

नाम सत्य सो जानि वानि जिन इमि कही। ताको मन वच काय जजौं शुभ सुखमही ॥ ॐ ह्रीं श्री नामसत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही। रूपवान इत्यादि अंग बहुतैं कही ॥ रूप सत्य सो जानि कह्यों जिनवानिजी। ऐसो सत्य सु जानि जजौं सुखदानजी ॥ ॐ ह्रीं श्री रूपसत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। कही वस्तु यह यातें छोटी है सही। यातें है यह बडी अपेक्षा इमि कही। याको नाम प्रतिति सत्य सो जानिये। ताको भी है जजौं भक्ति उर आनिये ॥ ॐ ह्रीं श्री अपेक्षासत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। जो नरपतिको पुत्र ताहि राजा कहै। सो नैगमनय जानि सत्य तातै यहै।

यहीसत्य "व्योहार जिनेश्वर धुनि कही। मैं जजिहौं कर भक्ति नाय मस्तक सही ॥ ॐ ह्रीं श्री व्यवहार-सत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। प्राक्ति इन्द्रमें इसी लोक उलटा करै। सो तो लोक अनादि उलटि कैसे धरै ॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधान । [२९

पै यह शक्ति अपेक्षा वचन प्रमान है।

यह सम्भाव सत्य जजौं थिति आन है ।।

ॐ ह्रीं श्री सम्भावना-सत्यधर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। जीव अनन्त अनादि नजर आवै नहीं।

द्रव्य अमूर्ती पांच नरक सुरकी मही ॥

ये नहि देखें नयन सूत्रसौं जानिये ।

भाव सत्य सो जानि जजों मन आनिये ॥

ॐ ह्रीं श्री भावसत्यधर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। किसी वस्तुकी उपमा जाको लाइये ।

ज्यों दानी नर देख कल्पद्रुम गाइये ।

याको उपमा सत्य नाम जानौं सही।

सो मैं पूजौं भक्ति नाय मस्तक मही ॥

ॐ ह्रीं श्री उपमा-सत्यधर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। इत्यादिक बहु भेद सत्य के जानिये ।

कहे देव जिनराय अपनी वानिये ॥

सो मैं मन वच काय शुद्ध थुति गायजीं।

पूजौं सत्य सुधर्म अरथ कर लाइजी ॥

ॐ ह्रीं श्री सत्य-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। जयमाला (बेसरी छन्द)

सत्य धरम जग पूज्य बताया, सत्य श्रेष्ठव्रत जिनधुनि गाया। सत्य धरम भवदधिको नावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।। *********

श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

सत्य धरम वर अंग प्रवीना, सत्य धरम ज्यों कंचन मीना। सत्य धर्मका सबको चावा, सो सत धर्म जजौं शुभ भावा ॥ सत्य धरम का राखनहारा, सत्य धरम मुनिजनको प्यारा। सत्य शिरोमणि धर्म कहावा, सो सत धर्म जजौं शुभ भावा ॥ सत्य समान और नहिं मिंता, सत्य धर्म मेटे भव चिंता । सत्य करै अघतै निरदावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ॥ सत्य धरम अपयश क्षयकारी, सत्य सुरक्षा करें हमारी । सतहीका सुरनर जस गावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ॥ सत्य सहित सब सार्थक धर्मा, तासौ कटैं चिरंतन कर्मा । सत्य समान और नहि ठावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ॥ सत्य जगतमें पूजा पावै, सत्य धरम शिव राह बतावै । सत्य जजौं सति धर्म लहावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ॥ धर्म सरोवर में सत नीरा, सत्य धर्म खोवै सब पीरा । सत्य धर्म सों कुगति न पावा, सो सत धर्म जजौं शुधभावा ॥ दोहा

सत सागर में जे रमें, ते वृष नायक जोय।

जजै धर्म सतको सही, मन वच काया सोय ।।

ॐ ह्रीं श्री उत्तमसत्यधर्माङ्गाय पूर्णार्घ्य नि. । इति उत्तम सत्य धर्म पूजा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान। [३१

उत्तम शौच धर्म पूजा

बेसरी छन्द ।

शौच धर्म पर चाह निवारै, तनतैं हू ममता निरवारै।

जग वांछा तजि निर्मल भावा, शौच धर्म पूजों कर चावा ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय अत्र अवतर२ संवौषट् अत्र तिष्ठर 5: ठः । अत्र मम सन्निहितो भवर वषट् ।

अथाष्टकम् - पद्धड़ी छन्द।

धरि कनकपियाले भक्तिजान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय संसारतापविनाशनाय चंदनं नि. । उज्जवलअखंड शुभ गंध दाय, अक्षतअनूप लखिशशिलजाय ।

कनपात्र विषै धरि भक्ति आन, मैं शौच धर्म जजि हर्षआन ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. । ने फूल कल्पद्रुमके मनोग, आसक्त भ्रमर थित करत भोग।

तेन गुंथि मालउर भक्ति ठान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय कामबाण विध्वंशनाय पुष्पं नि. । शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसना रंजन नैवेद्य लाय ।

धरि पुरट थालमें भक्ति ठान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय-क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

मणि दीपक वा घृतमय संजोय, मनुनिबिडमोह तम नाशहोय । अरु ज्ञान प्रकाश करै महान, मैं शौच धर्म जजि हर्ष आन। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं नि.। शुभ धूप अगरजा गंध लाय, कन धूपायन ताकों खिवाय। मिश धूम एगें वसुविधि उड़ान, मैं शौच धर्म जजि हर्षआन ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय दृष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि.। ले फल बादाम खारक अनूप, अरू पुंगी फलआदिक स्वरूप । धरि भक्तिभाव मन मांहि सोय, मैं शौच जजौं शुध भाव होय ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि. । जल गंधाक्षत वर कुसुम होय, चरु दीप धूप फल सुभगजोय । कर अरघ धरौं कनपात्र लाय, मैं जजौं शौच वर भक्तिभाय ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। अथ प्रत्येकार्थ्याणि (चाल मणुयणानन्दकी।)

देवके सकल सुख जानि चंचलमयी ।

आयु पल्य सागरकी तुरत ही क्षय गयी ॥

जान सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ।॥ १ ॥

ॐ ह्रीं श्री देवसुखवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्य नि. । चाह चक्री तने सुखनको उर नहीं।

सहस छिनवै तिया और षट्खंड मही ।।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥२॥ ॐ ह्रीं श्री चक्रिपदभोग-वांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। खण्ड तिनको जु राज नारि बहु जानिये। चारि विधि सैन सुर नर खगादि मानिये।। जान सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥३॥ ॐ ह्रीं श्री नारायणपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। कामदेवको सुरूप देखि देव मन हरे।

भोग वांछित सकल देव सेवा करें।।

जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥४॥ ॐ ह्रीं श्री कामदेवपदभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। आठ परकार सपरस विषै जानिये।

द्रव्य क्षेत्रकाल अनुसारं भाव मानिये।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥५॥ ॐ ह्रीं श्री स्पर्शनेन्द्रिय-भोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। पांच परकार रस जानि शुभ सारजी।

भोग वांछै सभी जगत दुखकारजी।।

जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥६॥ ॐ ह्रीं श्री रसनेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

********************************** घ्राण इन्द्रियनते गंध दो हैं सही । ताहि अनुकूल पाय जीव साता लही ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥७ ॥ ॐ ह्रीं श्री घ्राणेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्य नि. । चक्षु इन्द्रियतने पांच रूप भोग हैं। ताहि चाहें अमर नाहिं तन रोग है ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥८ ॥ ॐ ह्रीं श्री चक्षुरिन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्य नि.। राग संगीत इन आदि सुर साजिये ।

सप्त स्वर भेद कर्ण भोग मन राजिये ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥९ ॥ ॐ ह्रीं श्री कर्मणेन्द्रियभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्य नि. । भोग वांछित घने चित्त आधारजी ।

ताहि सेयर जीव सुख लहे अपारजी ॥

जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच स्थानक धेरै ॥१० ॥ ॐ ह्रीं श्री मनवांछितभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्य नि. । तन अशुभ आपको सु चाम मय जानिये । सप्त मल घात पूरित सु घिन आनिये ।। Jain Education International

श्री दशलक्षण मण्डल विधान। [३५

******************************** जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करे। पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरे ॥११॥ ॐ ह्रीं श्री तनसम्बन्धीभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.। रतन नवधादि भरपूर घरमें सही।

कोटि नित दान देते सु क्षय हो नहीं॥ जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करे। पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरे ॥१२॥ ॐ ह्रीं श्री धनवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.। रूपमें शची समान नारी घरमें घनी। शीश आज्ञा धरें प्रीत रस में सनी॥ जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करे। पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरे ॥१३॥ ॐ ह्रीं श्री वनिताभोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.। कामदेव के समान पुत्र रूप धारजी विनयवान सर्व बलवन्त तेज सारजी॥ जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करे। पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरे ॥१४॥ ॐ ह्रीं श्री पुत्र भोगवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.। भ्रात बहु विनय जुत आनि-पालक सही। संग तिन भोग भोगी जीव साता लही॥ जानि सब अधिर उरभाव निर्मल करे। पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धरे ॥१५॥ ॐ ह्रीं श्री भ्रातृसुखवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्ग्यार्घ्यं नि.। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

मन्त्र दाता विपति मांहि मित्र सारजी।

प्रेम अन्तरङ्ग धारि नित्य रहें लारजी ॥ जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥१६ ॥ ॐ ह्रीं श्री मित्रानुबन्धवांछा-विहीन-शौचधर्माङ्गायार्घ्यं नि. । मित्र तिय पुत्र सब घरतने दासियां ।

आदि परिजन सकल और घरवासिया ।।

जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै।

पूजि शौच धर्मको जु शौच थानक धेरै ॥१७॥

शौच सकल उर सुख करै, हरै लोभ मद सोइ।

मोक्ष धरै मरनो टरै, ताहि जजैं शिव होइ ॥ शौच भावतें पुण्य बड़ोई, कटै पाप जगमें जस होई। शौच भाव संतनको प्यारा, जजौं शोच यह धर्म हमारा ॥ शौच भाव पर-चाहे निवारै, शौच भाव दुख शोकविड़ारे । शौच सरवको बड़ा सहारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥ शौच सांच के बड़ा सनेहा, शौच मुनिव्रत की इक देहा। शौच भाव मंगल करतारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

शौच भावमें नांहि कषाया, शौच भाव सब जग काभाया। शौच धर्मका शरण गहारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥ शौच धर्मको मुनिगण सेवैं, ताफल स्वयं सिद्ध थललेवें। शौच धर्म समता रस धारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ॥ शौच समान और नहिं मिंता, शौच भाव टारै सब चिंता । शौच सदा सब जियका प्यारा, शौच जजौं यह धर्म हमारा ।। दोहा

शौच सार संसार में करै पवित्र जु भाव।

तातैं धारो शौचको, भलो मिलो यह दाव ॥

परस्परोपग्रहो जीवानाम्

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम संयम धर्म पूजा

अडिल्ल छन्द

संयम धर्म अनूप दोय विधि जानिये ।

इक रक्षा षट् काय दया उर आनिये ॥

मन इन्द्रिय वश करै दूसरो संयमा ।

सो मैं पूजौं थापि लहौं उत्तम रमा ॥

भाव अवांछित कर नैवेद्यं, नाना रस मय ले निरखेद्यं । भूख नाशि चित साता पावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. । सम्यग्ज्ञान दीप करि भाई, शुद्ध भाव भाजन धरवाई। ताके फल अज्ञान मिटावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. । कर्म आठमय धूप करीजै, धरम सु ध्यान अगनि खेवीजै। ताफल दुष्ट कर्म नशि जावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गायदुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि.। उत्तम परिणति को फल कीजै, शुद्धभाव कन थाल धरीजै। तातै मनवांछित फल पावै, सो संयम वृष जजि शिर नावै ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयमधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.। आठौ द्रव्य अमोलिक जानी, प्रासुक भाव सहित हित दानी। पद अनार्घ्य तासु फल पावै, सो संयम वृष जजि शिरनावै ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमसंयम धर्माङ्गाय अनर्घ्य पद प्राप्तयेऽर्घ्यं नि. । प्रत्येकार्थ्याणि । ॥ चौपाई ॥

ताल कूप खाई न खुदाय, भूमि काय तब दया पलाय।

पृथ्वीकायकी रक्षा होय, संयम धर्म जजो मद खोय ॥१ ॥ ॐ ह्रीं पृथ्वीकायजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । अनगालो जल बरतै नाहिं, नदी तलाब कुड़ावै नाहिं । जलकायिक जिय रक्षा करै, संयम वृष जजि शिवतियवरै ॥ ॐ ह्रीं जलकायिकजीवरक्षणरूपसंयम-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । ४०] श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

अगनि जलावन काज न करै, नाहिं बुझावै करुणा धरै।

अगनिकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौ शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं अग्निकायजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि.। पवन कायकी रक्षा सार, पंखा आदि काज नहिं धार।

पवनकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥

ॐ ह्रीं वायुकायिकजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । फूल पात तरु तोड़े नाहिं, वन बागादि लगावै नाहिं। हरितकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥

ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिकजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । इल्लो जोंक गिंडोला जान, बाला आदि जीव पहिचान।

बे इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीवरूपरक्षणसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । चीटी कुंथवा खटमल लोक, जुआ तिबूला जिय करिठीक।

ते-इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । मक्खी भँवरा टीडी जान मच्छर आदिजीव पहिचान।

चउ-इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौ मद खोय ॥ ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । जीव असैनी बहुत प्रकार, जलचर सर्प आदि निर धार।

पंचेन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव रक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । नर सुर नारकि सब जिय संज्ञि, तिर्यच गति में संज्ञि असंज्ञि । संज्ञी जियकी रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं संज्ञीपंचेन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

सपरस इन्द्रिय विषय निवार, वीतरागता वरतै सार।

शीत उष्ण उर चाह न होय संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं स्पर्शनेन्द्रिय विषयवर्जनरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । रसनेन्द्रिय पांच भट जान, तिन वशभये सकल गुणखान । रसनेन्द्रियके वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं रसनेन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । घ्राणेन्द्रियके भट दुई जान, नित प्रसाद जिय दुख लहान । घ्रानेन्द्रियके वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं घ्राणेंद्रियविषयवर्जनरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । चक्षु विषय भट जानों पांच, ते दुख देय सकल जियसांच। चक्षु अक्षके वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं चक्षुरिन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । कर्णेन्द्रिय शुभाशुभ वैन, ता वश होय सुरासुर ऐन । शब्द शुभाशुभ वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं कर्णेन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि.। मन चंचल कपिकी गति जिसौ ताके वश जगजिय दुखफँसौ। मनके वश कबहूँ नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं मनोविषयवर्जनरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि.। सब जियमें धरि समता भाव, तप संयम करिबेको चाव।

आरत रौद्र भाव नहिं होय, संयम भाव जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं सामायिक रूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

जो प्रमादवश संयम जाय, प्रायश्चित ले पुनि थिर थाय। छेदोपस्थापन नामा सोय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं छेदोपस्थापनारूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । दोय कोष नित गमन कराय, तन निहार नहिं बहु रिध पाय। सो परिहार विशुद्धी जोय, संयम धर्म जजों शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं परिहारविशुद्धि संयम रूप धर्माङ्गायार्घ्य नि. । सकल कषाय नाश है जाय, नाम मात्र कछु लोभ रहाय। सूक्षम सांपराय है सोय, संयम धर्म जजौं मद खोय ॥ ॐ ह्रीं सूक्ष्म सांपरायरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । सकल मोह नाशै जिस काल, या उपशमै मोह जंजाल । यथाख्यातमें रहे न मोह, संयम धर्म जजौं शुचि होय ॥ ॐ ह्रीं यथाख्यातरूपसंयम धर्माङ्गायार्घ्य नि. । अडिल्ल छन्द ।

इस प्रकार बहु विधि को संयम जानिये ।

शिव-सुखदायक होय दयाकी खानिये ।।

पूरण मुनिके होय धर्म हितदायजी ।

ताहि जजौं मैं अर्घ थकी यश गायजी ।।

ॐ ह्रीं उत्तमसंयम धर्माङ्गाय महार्घ्य नि. । जयमाला। (बेसरी छन्द)

संयम सार जगतमें भाई संयमतें जिय शिव सुख पाई। संयम सम्यक्ता साखनहारा, संयम है शिखिरताज हमारा ।। श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

प्रम सकलजीव सुखदाई, संयम जगत जीव बड़भाई। प्रम जगत गुरुनिको प्यारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ ण संयम मुनिजन पावै, संयमतें ही शिवमग धावै। प्रम अघनाशन असिधारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ प्रम मुकुट धर्मधर धारै, संयमतें विषधर उर हारै। प्रम जामन मरण निवारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ प्रम के सब दास बताये, संयम बिना जगत भरमाये। प्रम मोह सुभटको मारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ प्रम मनका जीतनहारा, संयम इन्द्रिय रोग निवारा । प बेलिको नाशनहारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ प्रम जग-विरक्त जिय भावै, संयमको मुनि जन जसगावै । प्रम धर्म बहू अघ जारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ प्रम भवसागर नवका सी, संयम धरि जिय शिवपुर जासी । प्रम कर्म कलंक निवारा, संयम है शिरताज हमारा ॥ दोहा

संयम जगका बन्धु है, संयम मात रु तात।

संयम भवभव शरण है, नमों ‘टेक’ अघ जात ॥

ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्माङ्गाय पूर्णार्घ्यं नि. । इति उत्तम संयम धर्म पूजा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम तपो धर्म पूजा

अडिल्ल - छन्द ।

अन्तर बाहर भेद कहे तप सारजी।

दुविध भाव अघहार करन भव पारजी ॥

तप बारह परकार कर्म गज केहरी ।

मैं पूजौं इस थानि जानि नित शुभ धरी ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमतपोधर्माङ्ग ! अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र तिष्ठ२ ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भव२ वषट् । अथाष्टकम् । (चौपाई।)

भवजलतरण नाव तप भाव, करि अघनाश जु दैव उछाव ऐसो तप निर्मल जल लाय, पूजौं जामन मरण नशाव। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि. । त्रिभुवन में तप तिलक समान, याको मुनि धेरै हित ठान तपहर चन्दन सुभग मँगाय, मैं पूजौं भव तप नशि जाय। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय संसारताप-विनाशनाय चदनं नि. । बेसरी छन्द ।

तपपै निरत लखे बहुतेरे, तपको जपै जु साहब मेरे ऐसो तप अक्षत शुभ आनो, पूजौं फल अक्षय उपजानो। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान नि. । पद्धडी छन्द ।

यह तप त्रिभुवन में पूज्य सार, यह तप नाना मंगल सुधार ऐसो तप बहु शुभ फूल लाय, मैं पूजौं तसु फल मदन जाय। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

प सुर वंछे पै नाहिं पाय, तातै सुर पूजै तप सुभाय। सो तप चरु ले भक्ति लाय, मैं पूजौं तसु फल क्षुधाजाय ।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. । प कल्पवृक्ष वांछित सुदेई, तप दीप अनोपम तम हरेई। ।। तपको दीपक रतन लाय, मैं पूजौं तसु फल ज्ञान पाय ॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि.। प ही तै तीर्थङ्कर जु होय, तप ही तैं शिव लहि कर्म खोय। सो तपको शुभ धूप लाय, मैं पूजौं विधि ईधन जराय ॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय दुष्टाष्ट कर्मदहनाय धूपं नि.। प पूजत जग करि पूज्य होय, तप औषधि दुखगद हरन जोय। ना तपको बहुविधि फलमंगाय, मैं पूजौं तसुफल शिवलहाय ।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि.। नपतैं उर करुणा भाव होय, तप तपैं जगत में पूज्य सोय। ना तप को उत्तम अर्घ लाय, मैं पूजौं पद अनर्घ लहाय ॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय अनर्घ पदप्राप्तयेऽर्घ्यं नि. । प्रत्येकार्थ्याणि । गीता छन्द ।

नप सार जगमें भेद बारह भव उदधिको नाव है।

पाप दाहक तप करन हित साधु मन उच्छाव हैं ॥

तप देय सुख दुख दूरि करि है, और कहँ लग गाइये। इमि जानि पूजौं अर्घ लेकर, तासु फल शिव जाइये. ॥ ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. ।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

बेसरी छन्द ।

जिन गुण सम्पति है तप मीता, त्रेसठ वास होय जिन गीत भिन२ तिथियनमें सुखदाई, यह तप अनशनजजिगुणगाई ॐ ह्रीं जिनगुणसम्पत्ति तपोधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । कर्म क्षपण तपके उपवासा, इकसो अड़तालिस जिन भास भिन२ तिथियनमें सुखदाई, यह तप अनशन जजि गुण गाई ॐ ह्रीं कर्मक्षपणतपोधर्माङ्गाय अर्घ्य नि. । जोगी रासा।

सिंह निष्क्रिडित तप दिन सौ, अरु जान सतत्तरिभा तिनमें इकसौ जानि पैतालिस, वास कहै सुखदाई बाकी बत्तिस जानि पारणा यह विधि जिन धुनिमांर्ह यह अनशन तप जानि जजों मैं अर्घ लेय हित ठांहीं ॐ ह्रीं सिंहनिष्क्रीडित तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि. । भद्र सर्वतो तपके शुभ दिन एक सैकड़ा जाने है उपवास पचत्तर अद्भुत पारण पचविस मानों इसकी विधि भिन२ जिन भासी सो तप अनशन गाय अर्घ लेय मैं पूजौं मन वच काय भक्ति जुत भाया ॐ ह्रीं सर्वतोभद्र-तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । महा सर्वतो भद्र बडो तप दिन दोसै पैंतार्ल इकसौ छिनवै वास कहे जिन पारण गिन नव चाली श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

ताकी विधि जिन शासनमें लखि,विधिजुत करताभाई यह अनशन तप जानि जजौं मैं, अर्घ लेय हितदाई ॥ ॐ ह्रीं महासर्वतोभद्र तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा । लघु निष्क्रीडितके दिन जिन धुनि बीसी चारि कहे हैं। तिन में बीस जु कहे पारणा साठि उपास लहे हैं ॥ करनेकी विधि जिन धुनिमें लखि ताको करिये भाई। यह तप अनशन जानि जजौं मैं अर्घ आनि सुखदाई ॥ ॐ ह्रीं लघुनिष्क्रीडित तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि.। बेसरी छन्द ।

नव पारण उपवास पचीसा दिन चौंतीस कहे जगदीशा। मुक्तावलितपविधिजिनगाई, यहअनशनतपजजिसुखदाई ॥ ॐ ह्रीं मुक्तावली तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । मास मासके छह उपवासा, एक वरष दुइ सत्तरि खासा । यहकनकावलीविधिश्रुतगाई, यहतपअनशनजजिसुखदाई। ॐ ह्रीं कनकावलि तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । सो अनशन पारन उनईसा, इकसौ उनईस दिन शुभ दीसा। जिन भाषित आचामल भाई, यह अनशन तपजजि सुखदाई ॐ ह्रीं आचाम्ल तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । चौबिस वास, पारना चौई, सब दिन अड़तालीस गिनोई। तपजुसुदरशनविधिश्रुतजानो, यहअनशनतपजजिसुखदानी ।। ॐ ह्रीं सुदर्शन-तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

एक वरस तक वास करंता, उत्तम तप जिनवाणी भणंता। ताके भेद बहुत है भाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई ॥ ॐ ह्रीं उत्कृष्ट-तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। भूख प्रमाण थकी लघु खईये, सो अवमौदर तप वरनईये। यह तप विधि भूधर पवि माना, सो मैं जजौं अरघ कर आना ॥ ॐ ह्रीं अवमौदर्य तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। आज इसी विधि भोजन पइये, तो हम लेय नतर थिर रहिये। ऐसी विधि प्रतिज्ञा ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै ॥ ॐ ह्रीं व्रतपरिसंख्यान तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। त्यागै इक दुई त्रय रस भाई, चार पांच षट् तजि नहिं खाई। ऐसो रस परित्याग सु ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै ॥ ॐ ह्रीं रस परित्याग तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। आशन दिढ़ भू सोधि करावै, थिरता भजै सु तन न हिलावै। शय्यासन तप या विधि ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै ॥ ॐ ह्रीं श्रीविविक्तशय्याशन तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। काय कसैं मन आनन्द पावै, सो तप काय कलेश कहावै। शोक हरै सुख करै महानो, सो तप जजौं कर्म गिरि भानों ॥ ॐ ह्रीं श्री कायकलेश तपोधर्माङ्गायार्घ्यं नि.। अडिल्ल छन्द।

मुनिको जो परमादवशी दूषण लगै।

तत्क्षण गुरुपै जाय जु प्रायश्चित मंगै ॥

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

********************************** जो आचारज दण्ड देय सो लेय ही।

तप प्रायश्चित जजौं अरघ शुभ देय ही ॥ ॐ ह्रीं श्री प्रायश्चित तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । देव धर्म गुरु और थान जो पूज हैं। तीरथ अतिशय सिद्धक्षेत्र अघ धूज हैं। तिनकी विनय अनूप करै तजि मानजी। सो तप विनय विचार जजौं शिवदानजी ॥ ॐ ह्रीं श्री विनय तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । जो मुनिको मग चलत तथा तप करत ही। उपजै तनमें खेद कर्मबलतैं सही ॥ तो मुनिके करि पांव चम्पिये जो सुधी। सो तप वैय्यावृत्य जजौं नाशक कुधी ॥ ॐ ह्रीं श्री वैय्यावृत्यतपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । जिन धुनि वाचै सुनै हरष करि चिंतवै। धरि जिनकी आम्नाय पाप मलको चवै ॥ सो तप है स्वाध्याय ज्ञान उर लावनो। सो यह तप मैं जजौं स्वर्ग सुख पावनो ॥ ॐ ह्रीं श्री स्वाध्याय-तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । काय ममतको त्याग यतिश्वर थिति करै। काय त्याग तप धार कर्म अरि मद हरें ॥ तप व्युत्सर्ग महान जानिं मन भावनो। सो मैं पूजौं अर्घ धारि कर पावनो ॥ ॐ ह्रीं श्री व्युत्सर्ग-तपोधर्माङ्गायार्घ्य, नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

मन वच काय एक थान थिरि लाइये ।

आरत रौद्र कुभाव सबै ढाइये ॥

या वपुतै जिय भिन्न शुद्ध जानै सही।

सो तप ध्यान अनूप पूजि लूं शिवमही ॥

ॐ ह्रीं श्री ध्यान तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । इमि धारि तपके भेद बारह सकल कर्म विनाशियो। यह कर्म भूधर नाश कारण वज्रसम जिन भाषियो ॥ मैं जीव चाहें तरन भवदधि, ते लहैं तप सारजी हम शक्तिहीन न कर सकत, तातै जजै उर धारजी ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तम तपोधर्माङ्गायार्घ्य नि. । जयमाला । दोहा।

तप तारें भव उदधिसों, टारै पाप असाधि।

धरै महा सुख थल विषै, देहे ध्यान समाधि ॥ तप ही सार धरम है भाई, तप ही तै मुनिवर शिव पाई। सिद्धक्षेत्र जे सिद्ध सजै हैं, ते सब पहिले तपहि भजे हैं ॥ तप भव उदधि तरण नवकाया, तपको जस गणधरनेगाया। ये तपही जग जिन सुखदाई, तात मात स्वामी तप भाई ॥ तपको तो तीर्थङ्कर ध्यावै, तप बिन मोक्ष कभी नहिं पावै । तप शिव महल तनों मग जानों, तपहीतैं सब कर्म हरानों। तप सा तीर्थ और नहिं कोई, तप ही तारन सब विधि होई ॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

तप शिव वाट दिखावन दीवा, तपहीतै सुख होय अतीवा। तपतें इन्द्री मन भट हारै, तप निज बलतें मोह निवारें। तपको कायर जिय नहिं पावैं, तपको महत पुरुष उमगावै। अविचल तपतै सुख बहु होई, तपतै लच्छि अखै पुनिजोई॥ तपतै खानपान परमाना, तपहीतै रस बिन सब खाना। दिढ़ आसन तन तपतै जानों, काय कष्टतै जिय सुख जानों। तप ही लगे पापको धोवै, तपतैं विनय भाव उर होवै॥ धरमी काय तनी सुश्रुषा, तप ही करवावै अघ-लूसा। शास्त्र पठन है तप सुखकारा, यातै होवै वपुतैं न्यारा॥ तप ही मन इन्द्रिय वश आनै, ध्यान धरत वसु कर्म हराने। यातै तप लागत है प्यारा, शुद्ध भावतै है अघ छारा॥ दोहा

तप मेटत भव तापको, शान्त भाव दिढ़ होय।

हरै भरम देवै धरम, सो तप पूजौं लोय॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तम तपोधर्माङ्गाय-पूर्णार्घ्य निर्व.। इति उत्तम तप-धर्म पूजा।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

उत्तम त्याग धर्म पूजा

चौपाई।

त्याग धरममें ममत न कोई, त्याग धरम सुरतरु अवलोई। वांछा त्याग धरममें नाहीं, सो वृष थापि जजों इस ठाहीं ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्ग ! अत्र अवतरर संवौषट् । अत्र तिष्ठ२ ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भवर वषट् सन्निधिकरणं । अथाष्टकम् ।

मणुयणानंद की चाल

नीर शुभ क्षीरदधि सार सो लाइजी ।

साधु चित तुल्य निर्मल सु मन भायजी ॥

कनक झारी भरी भक्ति मन लाइयो ।

त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि.। चन्दनादि गन्ध सार नीरमें रलाइयो ।

अमर सौरभ थकी भक्ति भरवाइयो ॥

कनक पातर विषै धार ढरवाइयो ।

त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय संसारतापविनाशनाय चंदनं नि. । तन्दुलं समुज्जवलं जु अक्षतं सुहायजी।

खण्ड बिन सोहने विलोकि हलषायजी ।।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान ।

थाल कंचन भरौ भाव शुभ लाइयो । त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. । पुष्प नाना प्रकार गन्धजुत सारजी। कल्पवृक्षादिके हेम थाल धारजी ॥ माल करि सोहनी भक्ति उर लाइयो । त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय कामबाण विध्वंशनाय पुष्पं नि. । लाय नैवेद्य बिन खेद अति सोहना । मोदकादि सरल सार धार मन मोहना ।। स्वर्ण भाजन विषै भक्ति भर लाइयो । त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. । रत्नमय दीप कर ज्योति परकाशिया । मोह अन्धकार तासु तेजतैं विनाशिया ॥ हेमथाल धारि भक्ति भाव चित्त लाइयो । त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि. । धूप दश गन्धकी सार सौरभि भरी। चन्दनादि ले कनक धूप-आयन धरी ॥ अग्नि संग खेय मिस धूम विधि जाइयो। त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि. । श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

********************************** श्रीफल सु लौंग पुंगीफल जु सारजी। खारक बादाम नारियल सु मनहारजी ॥

धारि स्वर्णपात्र में सु भक्ति उर लाइयो। त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय मोक्षफलप्राप्तये फलं नि.। नीर गन्धाक्षतं पुष्प चरु सारजी। दीप अरु धूप फल अर्घ मनहारजी ॥

भक्ति भाजन विषै धारि चढ़वाइयो।

त्याग धर्म जजौं स्वर्ग शिवदाइयो ॥ ॐ ह्रीं श्री उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अनर्घ्यपदप्राप्तयेऽर्घ्यं नि.। प्रत्येकार्थ्याणि । चाल मणुयणानन्दकी। कामदेव के समान काय सुन्दर घनी।

सुभग आकार मनुदेव तनसी बनी ॥

जानि पुद्गलीक जिमि चपल चञ्चल सही। मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिवलही ॥ ॐ ह्रीं तनममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि.। मात रज मेल मिलि कर्म वश थायजी।

गर्भमें रह्यो सु मास नव दुख पायजी ॥ दूध माँगे बिना न देइ निज मातही। मोह तजि तासुकों पूजि त्याग शिव लही ॥ ॐ ह्रीं जननीममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि. स्वाहा। बाप वीरज थकी आप मैलों भयो।

काल्माप्पाव्य है जुल्दा न सांगा त्ताबको रयो ॥॥ श्री दशलक्षण मण्डल विधान। [५५

******************************** कौन का को भयो सर्व स्वारथ सही।

मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ॥ ॐ ह्रीं पितृममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । पुत्र रूपवंत पूर्व पुण्यतैं लहाइये । पापके विपाकतें सुशीघ्र नशि जाइये ॥ मोहवश होय जिय लहै दुख धाम ही।

तासुको ममत्व त्यागधर्म पूजि शिव लही ॥ ॐ ह्रीं पुत्रममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । पाप साजि राज काज भाग्यतैं लहाइये । तासु रक्षोपहार में स्वतन गमाइये ॥ भोग परिजन करै आप स्वभ्र धाम ही।

मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ॥ ॐ ह्रीं राज्यममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । रत्न सुवरण रजत आदि धन पाइये ।

घोटका विमान वाहनादि हूं लहाइये । जानि चपला समान अथिर दुखधाम ही।

मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ।। ॐ ह्रीं धनवाहनादिममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि. । सहस छिनवै तिया जानि अपछर जिसी।

विनय भरपूर रुपरंग रंभा जिसी।

जानि सन्धति सकल पाप विपदा महीं।

मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ॥ ॐ ह्रीं स्त्रीममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्य नि. ।। श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

*************************************** संग परिजन मनो हाट मेलौं बनो।

धर्मशाला विषै तीर्थयात्री मनो ॥

जानि गृह मोहकी सांकली है सही।

मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ॥ ॐ ह्रीं गृहकुटुम्बममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्यं नि. । मूल वसु कर्मको कषाय भाव मानिये । तासुके प्रसंग चार योनीमें भ्रमानिये ॥ सकल संसारका भार यह ही सही।

मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ॥ ॐ ह्रीं कषायभावत्यागधर्माङ्गायार्घ्यं नि. । राग अरु द्वेष दोय मोह विधिर्तें बने । तासु वश जीव जगमें लहै दुख घने ॥

पाप पुण्यको प्रसार तासुतैं ही सही। राग द्वेष मोहको सु त्याग पूजि शिवलही ।। ॐ ह्रीं श्री रागद्वेषत्यागधर्माङ्गायार्घ्यं नि. । मात सुत नारि धन राज तन सारजी ।

राग अरु द्वेष सर्व दुःख कर्तारजी ॥ पाप पुण्य धारि संसार दुख धाम ही। मोह तजि तासुको सु पूजि त्याग शिव लही ।। ॐ ह्रीं ममत्वत्याग-धर्माङ्गायार्घ्यं नि. । जयमाला। (दोहा।)

त्याग तरण तारण सही, भव सागरमें नाव। त्याग बने नहिं देव पै, मनुज लह्यो यह दाव ।। श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

बेसरी छन्द ।

त्याग जोग सबही संसारा, पुद्गल द्रव्य त्याग निरवारा। त्याग रतन कंचन भंडारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ हाथी घोटक रथ सब त्यागा, साधु आप आतम रस लागा। मात ताततैं नेह निवारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ त्याग राज बन्धन दुखदाई, नारि पुत्रतै नेह तुड़ाई । अनुभव रस मारग विस्तारा जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ आरत भाव त्यागि दुखदाई, त्याग योग्य सब मान बड़ाई। रौद्र ध्यान त्यागै अधिकारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ क्रोध मान छल लोभ गमावै, सो उत्कृष्टा त्याग कहावै। हास्य शोक भय भाव निवारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ मद मत्सरको त्याग कराया, त्याग अरति रति बिसन बताया। राग द्वेषका तजै प्रसारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ परमें ममत त्यागिकै भाई, निज परिणतिमें प्रिति लगाई। त्याग पाप परिणतिकी धारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ जगतें विरचित आप रस भीना, तिनने शिवमग नीकैचीना। त्याग जगत दुखतें सिर भारा, जो त्यागै सो गुरु हमारा ॥ सोरठा- त्याग धरम तप सार, भव भव शरणो में गहों। जजौं त्याग भवतार, ता प्रसादतैं शिव लहों ।॥ ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्माङ्गाय पूर्णार्घ्य नि. । इति उत्तम त्याग धर्म पूजा संपूर्ण।

श्री दशलक्षण मण्डल विधान।

उत्तम आकिंचन्य धर्म पूजा

आकिंचन वृष नगन अवस्था है सही।

तामें दुविध परिग्रह त्याग सु धुनि कही ॥ धन धान्यादिक बाह्य राग अन्तर गिनो।

इनतैं रहित सु नगन धरम जजि अघ हनो ॥

ॐ ह्रीं उत्तमाकिंचन्यधर्माङ्ग ! अत्र अवतर२ संवौषट् । अत्र तिष्ठ२ ठःठः । अत्र मम सिन्नर्हितो भवर वषट् । अथाष्टकं त्रिभंगी छन्द ।

जल लाया नीका सुरतरिणीका उज्जवल ठीका धार करी। अति गंध सुहाई निर्मल भाई हर्ष बढ़ाई पाप हरी ॥ ले कनक सु झारी भक्ति उचारी भव दुखहारी हाथ लई। आकिंचन धर्मा जजि शुभ कर्मा दे फल परमा थानसही ॥ ॐ ह्रीं उत्तमाकिंचन्यधर्माङ्गाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि. । शुभ चन्दन आनी घसि सँगपानी गन्ध सुहानी हाथ धरि। अलि ऊपर आवै वासु लुभावै शुद्ध करावे नेह भरी ॥ एसी गंध लावो हरष बढ़ाओ ज्ञान जगावो मोक्ष मही। आकिंचन धर्मा जजि शुभ कर्मा दे फल परमा थानसही ॥ ॐ ह्रीं उत्तमाकिंचन्यधर्माङ्गाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि. । शुभ अक्षत लाया विमल सुहाया खंडें बिन भाया सुखदाई।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3095.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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