धर्म के दशलक्षण (Daslaxan Mahaparva)
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अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | दश लक्षण महापर्व |
| 2 | उत्तम क्षमा |
| 3 | उत्तम मार्दव |
| 4 | उत्तम आर्जव |
| 5 | उत्तम शौच |
| 6 | उत्तम सत्य |
| 7 | उत्तम संयम |
| 8 | उत्तम तप |
| 9 | उत्तम त्याग |
| 10 | उत्तम आकिंचन |
| 11 | उत्तम ब्रह्मचर्य |
दश लक्षण महापर्व
अरहंत हैं दशधर्म धारक, धर्म धारक सिद्ध हैं।
आचार्य हैं, उवझाय हैं, मुनिराज सर्व प्रसिद्ध हैं॥
जो आत्मा को जानते, पहचानते करते रमण।
वे धर्म-धारक, धर्म-धन हैं, उन्हें हम करते नमन॥
जैनधर्म की जय हो
उत्तम क्षमा
क्षमा आत्मा का स्वभाव है। क्षमास्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में
जो क्रोध के अभावरूप शान्ति-स्वरूप पर्याय प्रकट होती है, उसे भी क्षमा
कहते हैं। यद्यपि आत्मा क्षमास्वभावी है, तथापि अनादि से आत्मा में क्षमा
के अभावरूप क्रोध पर्याय ही प्रकटरूप से विद्यमान है।
उत्तम मार्दव
क्षमा के समान मार्दव भी आत्मा का स्वभाव है। मार्दवस्वभावी आत्मा
के आश्रय से आत्मा में जो मान के अभावरूप शान्ति-स्वरूप पर्याय प्रकट
होती है, उसे भी मार्दव कहते हैं। ‘मृदोर्भावम् मार्दवम्’ मृदुता - कोमलता का
नाम मार्दव है।
उत्तम आर्जव
‘ऋजुताभावः आर्जवम्’ ऋजुता अर्थात् सरलता का नाम आर्जव है। आर्जव के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। सम्यग्दर्शन के साथ होने वाली सरलता ही उत्तमआर्जव धर्म है। उत्तमआर्जव अर्थात् सम्यग्दर्शनसहित वीतरागी सरलता।
दशलक्षण धर्म की जय हो
उत्तम शौच
‘शुचेर्भावः शौचम्’ शुचिता अर्थात् पवित्रता का नाम शौच है। शौच के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। अतः सम्यग्दर्शन के साथ होने वाली वीतरागी पवित्रता ही उत्तम शौचधर्म है। शौचधर्म की विरोधी लोभकषाय मानी गई है।
दशलक्षण धर्म की जय हो
उत्तम सत्य
उत्तमसत्य अर्थात् सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सहित वीतरागभाव। सत्य बोलना तो निश्चय से सत्यधर्म ही है नहीं, पर मात्र सत्य जानना, सत्य मानना भी वास्तविक सत्यधर्म नहीं है; क्योंकि मात्र जानना और मानना क्रमशः ज्ञान और श्रद्धा गुण की पर्यायें हैं; जबकि सत्यधर्म चारित्र गुण की पर्याय है, चारित्र की दशा है। उत्तमक्षमादि दशधर्म चारित्ररूप हैं।
दशलक्षण धर्म की जय हो
उत्तम संयम
दशलक्षण धर्म की जय हो
संयम को संयम कहते हैं। संयम अर्थात् उपयोग को परपदार्थ से समेट कर आत्मसुख करना, अपने में सीमित करना, अपने में लगाना। उपयोग की स्वसन्मुखता, स्वलीनता ही निश्चयसंयम है। अथवा पाँच व्रतों का धारण करना, पाँच समितियों का पालन करना, क्रोधादि कषायों का निग्रह करना, मन-वचन-कायरूप तीन दण्डों का त्याग करना और पाँच इन्द्रियों के विषयों को जीतना संयम है।‘’
उत्तम तप
दशलक्षण धर्म की जय हो
समस्त रागादि परभावों की इच्छा के त्याग द्वारा स्वरूप में प्रपन्न करना- विसर्जन करना तप है। तात्पर्य यह है कि समस्त रागादि भावों के त्यागपूर्वक आत्मस्वरूप में - अपने में लीन होना अर्थात् आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करना तप है।‘’ तप के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। सम्यग्दर्शन के बिना किया गया समस्त तप निरर्थक है।
उत्तम त्याग
दशलक्षण धर्म की जय हो
''णिव्वेंयगई भावे मोहं चइऊण सव्व दव्वेसु।
जो तस्स हव्वइत्यागो इदि जिणवरिंदेंहिं ॥७८॥
जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है कि जो जीव सम्पूर्ण परद्रव्यों से मोह छोड़कर संसार, देह और भोगों से उदासीनरूप परिणाम रखता है; उसके त्यागधर्म होता है।‘’
उत्तम आकिंचन
दशलक्षण धर्म की जय हो
ज्ञानानन्दस्वभावी आत्मा को छोड़कर किंचित्मात्र भी परपदार्थ तथा पर के लक्ष्य से आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह-राग-द्वेष के भाव आत्मा के नहीं हैं - ऐसा जानना, मानना और ज्ञानानन्दस्वभावी आत्मा के आश्रय से उनसे विरत होना, उन्हें छोड़ना ही उत्तमआकिंचन्यधर्म है।
उत्तम ब्रह्मचर्य
दशलक्षण धर्म की जय हो
ब्रह्म अर्थात् निजशुद्धात्मा में चरना, रमना ही ब्रह्मचर्य है। जैसाकि ‘अनगार धर्मामृत’ में कहा है -
“या ब्रह्मणि स्वात्मनि शुद्धबुद्धे चर्या परद्रव्यव्युपरतिः।
तद् ब्रह्मचर्यं व्रतसार्वाभीष्टं ये पालयन्ति ते यान्ति परं प्रमोदम॥४/६०॥
परद्रव्यों से रहित शुद्ध-बुद्ध अपने आत्मा में जो चर्या अर्थात् लीनता होती है, उसे ही ब्रह्मचर्य कहते हैं। व्रतों में सर्वश्रेष्ठ इस ब्रह्मचर्य व्रत का जो पालन करते हैं, वे अतीन्द्रिय आनन्द को प्राप्त करते हैं।”
जैनधर्म की जय हो
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 3085.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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