दसलक्षण महापर्व — उत्तम क्षमा धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Daslakshan Mahaparv — Uttam Kshama Dharm

दसलक्षण महापर्व — उत्तम क्षमा धर्म

दसलक्षण महापर्व - उत्तम क्षमा

‘To forgive’ is the character of this Dharma.
To remain fully calm & peaceful against the harsh treatment or being mocked by wicked or unknowledgeable persons even when there is the capacity to reply. Forgiveness can be practised only by a brave man and not by a coward.

पीछे दुष्ट अनेक, बाँध मार बहु विधि करें।
शांत चित्त निज कोप, कोप न कीजै धीरना ॥
उत्तम क्षमा धारो, भाई, भव भव दुःख हर सब खटाई।
गाली सुनि मन खेद न आनौ, गुन को अवगुन कहै अज्ञानौ ॥
काहे ते अपराधी एक छीनौ, बांध मार बहु विधि करै।
उत्तम क्षमा धारो, भाई, भव भव दुःख हर सब खटाई।
जो करै पूरब किये पाप, सहै सोई सोई धीरना ॥
अति क्रोध अगनि बुझाय प्राणी, साम्य-जल ले सींचरा ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम मार्दव

‘Humility’ or ‘Not to be Proud’
is the character of this Dharma.
Thus considering all the worldly possessions
to be a dream one,
become fully humble or modest to proceed
long on the eternal path of liberation.

मान महा विष रूप, करहि नीचागति जगत में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावे प्राणी सदा ॥
उत्तम मार्दव गुन मन मानौ, मान करन को कौन ठिकाना ॥
बस्यो निगोद माहिं तैं आया, दसरी रूकन भाग बिकाया ॥
रूखन विषिया बाग बधाते, इन्द्रिय इन्द्रिय इन्द्रिय ॥
उत्तम मार्दव गुण मन मानौ, मान करन को कौन ठिकाना ॥
जीवत्व जीवन धन गुमानै, कहो करे कल-बुद्धबुदा ॥
करि विनय बहु-गुन बड़े जन को, ग्यान का पावे उदा ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम आर्जव

‘Honesty’ or ‘Straight-forwardness’
is the character of this Dharma.
To speak & behave just according to what is in
heart or in other words, not to deceive the other
with sweet tout, false talks
is called as Arjav Dharma.

कपट ना कीजै कोय, चोट न दे पुर ना बरै।
सरल सुभाव सुहाय, ताके पुर बसै सम्पदा ॥
उत्तम आर्जव गति बतानी, कपट न कीजै कोय, चोट न दे पुर ना बरै।
मन में हो सो वचन उच्चारिये, वचन होय सो तन सो करिये ॥
कपट सों रिद्धि बाग बधाते, इन्द्रिय इन्द्रिय इन्द्रिय ॥
झूठ कहै जैसे जैसे जैसा, तैसा तैसा तैसा ॥
नहीं लगे लक्ष्मी अधिक एक करि, कपट कर्म विशेषता ॥
भय त्यागी दूध बिलाव पीवे, आपदा नहीं देखता ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम शौच

Shauch means ‘Holiness’ or ‘Sacredness’
which is attained by contentment.
One who remain contented with own possessions
and does not wish for the money, glamour etc.
of the other, or in other words,
remains away from all types of greed, anger,
violence etc. realizes Shauch Dharma.

धीरे हिरदे संतोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निर्दोष, धरमें बड़ो संसार में ॥
उत्तम शौच सर्व पर, धन लोभ पाप को आप तजना।
आशा-पास त्याग दुखदायी, सुख पावे संतोषी प्राणी ॥
प्राणी सदा शुचि शील जप तप, ध्यान ध्यान प्रभाते।
नित गंग जल समुद्ध काय, अशुचि दोष सुहाते ॥
ऊपर अमल गंग भयो भीतर, को विधि घट शुचि कहे।
बहु देह पेली सुद्धता, शौच गुन साधु गहे ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम सत्य

‘Truth’ is the character of this Dharma.
One should tell only the correct & true fact
but the truth should not be harsh & rude.
One must utter beneficial & pleasant words only
It is better to keep quiet rather than
speaking the truth, which can
pierce the heart of the other.

कठिन वचन मति बोल, पर-निन्दा अरु झूठ तज।
सांच जवाहर खोल, सवादी जग में सुद्धी ॥
उत्तम सत्य सब पर, मौन धर, विश्वासघात नहीं कीजे।
सांचे झूठे भाषण देही, वचन वचन विश्वास न कीजे ॥
देखो मिलापये पुरुष सांचे, का दरब सब दीजिये।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिज्ञा, सांच गुन सब लीजिये ॥
ऊंचे सिंहासन बैठो वंदु भूप, धरम का भूपति भया।
जब झूठ तजि पूरण भयो, सुरग में नारद गया ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम संयम

‘Self-Restraint’ is the character of this Dharma.
To refrain from the violence of
Shat kaya jeevas and from the sensual pleasures
of five sense define Sanyam Dharma.
It only the self-restraint with Samyaktva
can make the human-life successful.

काय छहों प्रतिपाल, प्रवेदी मन वश करो।
संयम रतन संभाल, विषय चोर बहु फिरत है ॥
उत्तम संयम सब पर, मन रोक, भव-भव के धोखे डरे।
सुरग-नरक पशुगति में नहीं आतम ज्ञान करत भूल ठाही ॥
ठाही पृथ्वी जल आग मारुत, सब त्रस काय धरे।
सावरखन रचना धान नैना, काम मन सब वश करो ॥
जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तु कल्लो जग-काच में।
इक घरी मति विसरी करो नित, जन जन्म-मुख बीच में ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम तप

तप चाहे सुदराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादशविध सुदृढ़ता, क्यों न को निज सुकीर्ति संग ॥
उत्तम तप रत्नत्रयि बखाना, करम क्षय को जब ठाना।
बत्तीस आदि दोष निवारे, अठारह हजार शील-व्रत धारा
धारा मनुज जन महादुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता।
श्रीजिनवचनां कल्याणी, देई दिव्य-ज्ञानता ॥
धनि साधु शास्र अभ्यास, तपार्थ जो तप गहे।
नर-भव अनुपम कनक घर पर मणिमयी कलसा धरे ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम त्याग

दान चार परकार, चार संघ को दीजिए।
धन बिजली उनहार, नर-भव लाहो लीजिए ॥
उत्तम त्याग कहा जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निर्भय दान जिन निवारे, दाता को दान सुभारे ॥
दोनों हमारे क्रुप-जनसम, दवब धर्म में परिणया।
धनि हाथ दीजे साथ लीजे, क्षाय क्रोध वह गया ॥
धनि साधु शास्र अभ्यास, त्याग राग विरंग को।
बिन दान श्रावक साधु दानी, लहे मोक्ष बोध को ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम आकिंचन्य

परिग्रह चौबिस भेद, त्यागा करे मुनिराज जी।
तिनका फल दुखद, सहते जाव घटाव जी ॥
उत्तम आकिंचन्य गुण धारी, समकित चित्त दृढ़ ही मानो।
फांस तनक-सी तन में साले, चाहे छाती को दुख भाले ॥
भाले न समती सुख कभी नर, बिना मुनि-मुद्रा धरे।
धनि साधु नर धन मान ठाठ, पूर-अपर रागिनि हरे ॥
धर्मार्थि तिहुँलोक जो त्यागे, नहीं नहीं संसार सो।
बहु धन बुरा ह भला कहिये, लीन पर-उपगार सो ॥

दसलक्षण महापर्व - उत्तम ब्रह्मचर्य

‘Chastity’ or ‘Celibacy’ characterizes this Dharma.
To be stable in own soul
is the real form of this Dharma.
Without Brahmacharya
all other qualities are of no avail.

शील-बाढ नौ राख, ब्रह्म-भाव अन्तर लखो ।
करि दोनों अभिलाख, करहु सफ़ल नरभव सदा ॥
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ, माता-बहिन-सुता पहिचानौ ।
सहैं वान-वरषा बहु सूरे, टिकें न नैन-वान लखि कूरे ॥
कूरे तिया के अशुचि तन में, काम-रोगी रति करें ।
बहु मृतक सडहिं मसान माहीं, काग ज्यों चोंचें भरें ॥
संसार में विषबेलनारी, तजि गये जोगीश्वरा ।
‘द्यानत’ धरम दशपैंडि चढि कैं, शिवमहल में पग धरा ॥


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3108.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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