दशलक्षण पर्व की ऐतिहासिकता — जैन स्वाध्याय सामग्री | Dashlakshan Parv Ki Aitihasikta

दशलक्षण पर्व की ऐतिहासिकता

दशलक्षण पर्व की ऐतिहासिकता

प्रो. अनेकांत कुमार जैन*

प्रायः प्रत्येक पर्व का संबंध किसी न किसी घटना, किसी की जयंती या मुक्ति दिवस से होता है। दशलक्षणमहापर्व का संबंध इनमें से किसी से भी नहीं है क्योंकि यह स्वयं की आत्मा की आराधना का पर्व है। दशलक्षण पर्व आत्मा (अंतरंग) तथा उसे ज्ञान दर्शन चैतन्य स्वभावी मानने वालों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जैन परंपरा में इन दिनों श्रावक-श्राविकाएँ, मुनि-आर्यिकाएँ पूरा प्रयास करते हैं कि आत्मानुभूति को पा जाएँ, उसी में डूबें तथा उसी में रम जाएँ।

जैन परंपरा के लगभग सभी पर्व हमें सिखाते हैं कि हमें संसार में बहुत आसक्त होकर नहीं रहना चाहिए। संसार में रहकर भी उसमें भिन्न रहा जा सकता है जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी उसमें भिन्न होकर खिलता है। यह कार्य अनासक्त भाव से रहने की कला जानना वाला सम्यग्दृष्टि साधक मनुष्य बहुत अच्छे से करता है। दशलक्षण महापर्व भी एक ऐसा ही पर्व है जो हमें भेद विज्ञान करना सिखाता है, यह कहता है कि पाप से बचने का और कर्म बंधन से छूटने का सबसे अच्छा उपाय है-भेद विज्ञान की दृष्टि।

दशलक्षण पर्व वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। भाद्र, माघ तथा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक दस दिन सभी अपनी-अपनी भक्ति तथा शक्ति के अनुसार व्रत का पालन करते हैं। चातुर्मास स्थापना के कारण भाद्रों में आने वाले दशलक्षण महापर्व का महत्त्व वर्तमान में सर्वाधिक है। भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तक दस दिन यह पर्व दिगंबर संप्रदाय में विशेष रूप से मनाते हैं इसे ही दशलक्षण महापर्व कहते हैं।

दशलक्षण पर्व का आरम्भ-

दशलक्षण पर्व की शुरुआत कब से हुई? इस प्रश्न का उत्तर किसी तिथि या संवत् से नहीं दिया जा सकता। ये शाश्वत पर्व है चूँकि आत्मा द्रव्यार्थिक नय (द्रव्य दृष्टि) से नित्य अजर-अमर है और धर्म के दशलक्षणों का भी संबंध आत्मा से है। अतः जब से आत्मा है तभी से यह पर्व है। अर्थात् अनादि अनंत चलने वाला यह पर्व किसी जाति संप्रदाय या मजहब से नहीं बंधा है। आत्मा को मानने वाले तथा उसे ज्ञान दर्शन चैतन्य स्वभावी मानने वाले सभी लोग इस पर्व की आराधना कर सकते हैं।

आचार्य यातिवृषभ के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन पाँच वर्ष प्रमाण युग की पूर्णता और श्रावणकृष्णा प्रतिपदा के दिन अभिजीत नक्षत्र के साथ चंद्रमा का योग होने पर उस युग का प्रारंभ होता है। तथा उत्सर्पिणी काल के प्रारंभ में श्रावण कृष्णा प्रतिपदा से 49 दिनों तक सुवृष्टियों के माध्यम से सृष्टि की रचना प्रारंभ होती है। तब सात-सात दिन तक पुष्कर, क्षीर, अमृत, रस, औषध व सुगंधि जलादि की वर्षा होने से जली हुई भूमि शीतल हो जाती है।

  1. सात दिन पुष्कर मेघ सुखोदक जल बरसाते हैं, जिससे जली हुई, पृथ्वी शीतल हो जाती है।

  2. सात दिन क्षीर मेघ दूध की वर्षा करते हैं, इससे यह पृथ्वी उत्तमकांतियुक्त हो जाती है।

  3. सात दिन अमृत मेघ अमृत वर्षा करते हैं।

  4. सात दिन इस अमृतमयी भूमि पर लता गुल्म, पुष्प, फल आदि की वर्षा होती है।

  5. उस समय रस मेघ सात दिन तक दिव्य रस वर्षा करते हैं, इससे समस्त पृथ्वी रसमय हो जाती है।

  6. विविध-रस पूर्ण औषधि सात दिन बरसती है, यह पृथ्वीसुस्वादु हो जाती है।

  7. अंत में शीतल गंध सात दिन तक बरसती है।

  8. आसाढपुण्णिमाए जुगणिप्पत्ती दु सावणो किण्हे।
    अभिजिम्मि चंदजोगे पाडिवदम्मि पारंभो।।
    -तिलोयपण्णत्ति, गाथा-7/533, भाग 3, पृष्ठ 395

तथा च,
सावणबहुले पाडिवदसुद्धे सुदीर्घे रइकिणो।
अभिइज्ज पदमगोए जुगस्स आदी इमस्स पुणो।

  • वही, गाथा 1/70, भाग 1, पृष्ठ 16
  1. पोक्खरमेघा सलिले वरिसंति दिणाणि सत्त सुहअण्णो।
    कप्पग्गिएण दद्धा भूमि सव्वत्थ से सीयल होदि।
    वरिसंति खीरमेघा खीरजल तेसिमेत्तिय दिणाणि।
    खीरजलहिं भरिदा सव्वत्था होदि सा भूमी।
    ततो अमियमेघा अमियं वरिसंति सत्तदिणयाणि।
    अमिदेण णिण्णाए महिए जायंति वल्लियमहामारी।
    ताहे रसवल्लहा दिव्वरसं परिसंति सत्तदिवा।
    दिव्वरसेणउण्णा रसवंता होति ते सव्वे।
    विविहरसोसहिरिदा भूमी सुस्वादुपरिपूण होदि।
    ततो सीयलगंधा गादिला णिसरंति गंधतिरा।

उन 49 दिनों की गणना भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी को पूर्ण होती है। इस प्रकार हुई सृष्टि की शीतल सुगंध पाकर विजयार्ध की श्रेणियों में छिपे वे मनुष्य व तिर्यंच के 72-72 युगल व संख्यात जीव राशि गुफाओं से बाहर निकल पुनः इस प्रदेश में आकर निवास करते हैं और शांति की श्वास लेते हैं। उस समय मनुष्य की तिर्यंच के समान फल फूल खाते हैं और यह आर्यखण्ड की भूमि दर्पण के समान सुन्दर हो जाती है। गुफाओं में से निकले वे मनुष्य व तिर्यंच एवं ऐसी संख्यात जीव राशि संसार की क्षणभंगुरता का विचार कर भव भोगों की असारता को प्रत्यक्ष देखते हुए वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु की शरण लेते हैं और धर्म आराधना में तत्पर हो जाते हैं। उन मनुष्यों के स्वभाव कोमल व नम्र होते हैं, वे जिनधर्म के श्रद्धालु पापीभीरु होते हैं। यह दिन मनुष्य के आयु, तेज, बुद्धि, बाहुबल, क्षमा, धैर्य आदि के विकास का मांगलिक दिन माना जाता है-

ओम् तेओ बुद्धी, बाहुबल तह से देह -उच्छेओ।।
खंति-धिदि-पडिच्छेओ, काल सहावेण बहुंति।।

चूँकि सृष्टि का बुद्धिगत सुखद प्रारंभ भाद्रपद शुक्ला पंचमी से होता है, और चतुर्दशी तक माना गया है, इसलिए इन्हीं तिथियों में आत्मधर्म विकास के मूल क्षमा आदि दशलक्षण के प्रगट होने रूप घटना को पर्व के रूप में मनाना प्रारम्भ करके आत्म विशुद्धि की भी परंपरा प्रारंभ की गई।

मनुष्य प्रत्यकाल के दुःखद अनुभव से विमुक्त होकर एक सुखद अनुभव की ओर बढ़ने तथा अपने पूर्वकृत पापकर्मा का विचार करते हुए खेद-खिन्न होते हुए संदेगभाव रूप प्रवर्तन से व्यवहार धर्म को प्राप्त होते हैं। संभवतः इसीलिए इन्हीं काल की तिथियों को धर्मायोजना की तिथि स्वीकार कर उत्तमक्षमादि धारण दशलक्षण पर्व का पुनः शुभारंभ स्वीकार किया गया।

वर्तमान में प्रचलित प्रतिक्रमण पाठ गाथाएँ कुछ हैं और श्रुत परंपरा की ही तरह वह आज भी मुनि संघों में उच्चारित होते हुए विद्यमान है, आचार्य प्रभाचंद्र जी ने उस पर एक संस्कृत टीका भी लिखी है। इस प्रतिक्रमण पाठ में दशलक्षण धर्म का उल्लेख बहुत बार हुआ है। इसकी आराधना में हुए दोषों का प्रतिक्रमण का विधान है-

जलददसममा पयवणादा अट्टारसपयवणा।

फलमूलपयणेहिं छहिदा वारंति सत्तपडिवणा।।
णाणा गोधम्मगारेण वारंति सत्तपडिवणा।

3 वही, गाथा 4/1586, भाग 4, पृष्ठ 454

तेईसवाँ जिनेन्द्र भगवान महावीर का जिनेन्द्रत्व।

दशलक्षण पर्व मनाने की परम्परा सृष्टि के आदि से ही इस प्रकार प्रवर्तित हुई कि भरतक्षेत्र के अंग देश की चम्पा नगरी के राजा का नाम ही धर्मरुचि इस कारण पड़ा क्यों कि उसे दशलक्षण धर्म पर्व की आराधना में बहुत रुचि थी और उसने भगवान महावीर से इस धर्म का स्वरूप सुनकर संयम अंगीकार किया था। महापुराणकार का कहना है कि इन उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध मूलतः मुनिवर्या से है।

भाद्रमास में इस पर्व को अधिक उत्साह से मनाया जाता है उसका कारण यह है कि इस माह को अन्य सभी माह का राजा कहा जाता है। मल्लिपुराण में कहा है -
अहो भाद्रपदोऽयं मासोऽनेकव्रताकः।
धर्महेतुपरो मध्येऽमासानां तरेदवत् ॥
अनेक पर्वों से युक्त यह भाद्रपद मास धन्य है। यह धर्म की वृद्धि करने वाला है तथा अन्य महीनों रूपी सुमाहिनियों में राजा के समान शोभायमान है।
आचार्य विद्यानंद महाराज अपनी पुस्तक ‘विश्वधर्म के दशलक्षण’ में भाद्रमास के बारे में लिखते हैं कि ‘इस मास में षोडशकारण व्रत, दशलक्षण व्रत और अनंतचतुर्दशी व्रत आदि विविध धार्मिक व्रत, पर्व, उत्सव आते हैं और जैसे किसी की जन्मकुंडली में ‘एकादशमी योग’ बैठा हो। उसी प्रकार पवित्र व्रत पर्वों की यह श्रृंखला भाद्रपद मास में बनी रहती है।’
दशलक्षणधर्म के व्रतों को पूर्ण करके सुखी होने वाले अनेक भव्य जीवों की कथायें प्रसिद्ध हैं। मृगालेखा, कमलसेना, मदनवेगा और रोहिणी नाम की कन्याओं ने दशधर्मों की आराधना मुनिराज के वचनानुसार की तो उनको भी अगले भव में इस पर्याय से मुक्ति मिली तथा आत्मोन्नति प्राप्त हुई। यह कथा पुरानी हिंदी में विस्तार के साथ ‘दशलक्षणव्रतकथा’ में मिलती है जिसकी रचना विनयसागर के शिष्य एवं कवि हरिभूषण पाण्डे ने अठारहवीं शती में भाद्र पद शुक्ल पंचमी, वि.सं.1765 में की थी, ब्रह्मज्ञानसागर जी ने भी यह कथा चौपाई छंद के 36 पदों में की है। ये दोनों ही अप्रकाशित मूल प्रतियाँ श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर दिल्ली में उपलब्ध हैं। इसके अलावा महाकवि ब्रह्म जिन्दास, ओमेदीलाल, खुशालचंदकाला, भैरोदास और विनयकीर्ति द्वारा हिंदी में रचित दशलक्षणव्रतकथा, भगवतीदास कृत दशलक्षाधिकरासा

दशलक्षण पर्व कब और कैसे करें?

वर्तमान में आधुनिकता की होड़ में दशलक्षण व्रत के तरीके भले ही बदलते जा रहे हों पर उसे करने की जो प्राचीन परम्परा शास्त्र में वर्णित है, उसका हमें अवश्य ज्ञान होना चाहिए। अतः उसकी विधि यहाँ यथावत् प्रस्तुत है - 'दशलक्षण व्रत भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की पंचमी से आरंभ किया जाता है। पंचमी तिथि को प्रोषध करना चाहिए तथा समस्त गृहारम्भ का त्यागकर जिनमंदिर में जाकर, पूजन-अर्चन, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिए। अभिषेक के लिए चौबीस भगवान की प्रतिमाओं को स्थापन कर उनके आगे दशलक्षण यंत्र स्थापित करना चाहिए। पश्चात् अभिषेक क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए। मोक्षाभिलाषी भव्य द्रव्यो से भगवान जिनेन्द्र का पूजन करना है। यह व्रत भादो सुदी पंचमी से भादो सुदी चतुर्दशी तक किया जाता है। इसमें दिन ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। इस व्रत को दस वर्ष तक पालन किया जाता है, पश्चात् उद्यापन कर दिया जाता है। इस व्रत की उत्कृष्ट विधि तो यही है कि दस उपवास लगातार अर्थात् पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक दस उपवास करना चाहिए अथवा पंचमी और चतुर्दशी का उपवास तथा शेष दिनों में एकाशन करना चाहिए, परन्तु यह व्रत विधि शक्तिहीनों के लिए बतायी गई है, यह परमार्था नहीं है।

श्लोक

ओम् ह्रीं सव्वजिणाणं आयरियउवज्झायसाहुणं।
ओम् ह्रीं पज्जुसणाणं दसलक्खणधम्मं।

सरल अर्थ

सभी जिनेन्द्र भगवन्तों को मेरा नमस्कार, सभी आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं को मेरा नमस्कार, पर्यूषण को नमस्कार और दशलक्षण पर्वों को नमस्कार।

दशलक्षण पर्व कब और कैसे करें?

वर्तमान में आधुनिकता की होड़ में दशलक्षण व्रत के तरीके भले ही बदलते जा रहे हों पर उसे करने की जो प्राचीन परम्परा शास्त्र में वर्णित है, उसका हमें अवश्य ज्ञान होना चाहिए। अतः उसकी विधि यहाँ यथावत् प्रस्तुत है - 'दशलक्षण व्रत भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की पंचमी से आरंभ किया जाता है। पंचमी तिथि को प्रोषध करना चाहिए तथा समस्त गृहारम्भ का त्यागकर जिनमंदिर में जाकर, पूजन-अर्चन, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिए। अभिषेक के लिए चौबीस भगवान की प्रतिमाओं को स्थापन कर उनके आगे दशलक्षण यंत्र स्थापित करना चाहिए। पश्चात् अभिषेक क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए। मोक्षाभिलाषी भव्य द्रव्यो से भगवान जिनेन्द्र का पूजन करना है। यह व्रत भादो सुदी पंचमी से भादो सुदी चतुर्दशी तक किया जाता है। इसमें दिन ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। इस व्रत को दस वर्ष तक पालन किया जाता है, पश्चात् उद्यापन कर दिया जाता है। इस व्रत की उत्कृष्ट विधि तो यही है कि दस उपवास लगातार अर्थात् पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक दस उपवास करना चाहिए अथवा पंचमी और चतुर्दशी का उपवास तथा शेष दिनों में एकाशन करना चाहिए, परन्तु यह व्रत विधि शक्तिहीनों के लिए बतायी गई है, यह परमार्था नहीं है।

फुटनोट

  1. प्रतिक्रमण ग्रंथवली, गौतम स्वामी विरचित, संपादक -पंडित मोतीचंद, प्रका.जिनसेन भट्टारक शालापुर, प्रथम संस्करण, और निर्वाण -2473, पृष्ठ-50
  2. महापुराण, 76.8-29
  3. महापुराण, 61.1
  4. मल्लिपुराण, 2/39
  5. ‘विश्वधर्म के दशलक्षण’ - आचार्य विद्यानंद मुनि, प्रकाशक-कुन्दकुन्दभारती, दिल्ली, तृतीय संस्करण 1999, पृष्ठ -4
  6. हमें उपलब्ध होता है। यह कथा व्रत विधि विधान संग्रह में भी उपलब्ध है। इन हिंदी कथाओं का मूल आधार कोई प्राचीन साहित्य अवश्य रहा होगा -ऐसा विश्वास है तथा वह अनुसंधेय है।
  7. इसके अलावा भी अनेक कथाएँ हो सकती हैं जिनसे यह पता लगता है कि सम्यग्दर्शन पूर्वक दशलक्षण धर्म की आराधना करने वाले जीवों को मुक्ति प्राप्त हुई।
  8. डॉ.कस्तूरचंद जी कासलीवाल जी ने इस पर्व के सामाजिक स्तर पर मनाने सम्बन्धी तथ्यों की काफी छानबीन की है और उनमें प्राप्त तथ्यों में वि.संवत 1350 (ईस्वी 1253) से लेकर संवत 1833 (ईस्वी 1776) तक का उल्लेख किया है, जिसमें दशलक्षण व्रत की समाप्ति पर उद्यापन समारोह विशेष रूप से मनाये गए, ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ करवा कर भेंट की गई तथा ग्रन्थ लेखकों ने अपने ग्रन्थ की समापन तिथि में इस दशलक्षण पर्व की तिथियों को भी चुना।
  9. ऐसा लगता है कि दशलक्षण व्रत और पर्व शुद्ध आध्यात्मिक होने से यह विशेष रूप से मुनि संतों का व्रत रहा किन्तु चातुर्मास में होने से उनका लाभ समाज को भी विशेष प्रेरणा से मिला। तदन्तर श्रावकों में भी विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से उन्हीं दस धर्मों की विशेष आराधना व्रत, पूजा-पाठ, प्रवचन, सामायिक, प्रतिक्रमण के रूप में विकसित हुआ। जिस प्रकार वही महाव्रत ही श्रावकों के लिए अणुव्रत कहलाते हैं, उसी प्रकार मुनि धर्म की सुव्यवस्था में कथित दश धर्म, श्रावकों के हित में होने से उपचार में श्रावकों के लिए भी कहे जाने लगे। अभ्यास हेतु उनके जीवन में भी ये प्रेरणादायक और हितकारक थे अतः उनके अनुरूप अणुव्रत की तरह इसका कथन भी श्रावकों के लिए किया जाने लगा। आचार्य अनेकंत मुनि राजवातिक में ऐसा ही अभिप्राय व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ये धर्म चौथे व पाँचवें गुणस्थान वाले के क्रोधादि की निवृत्तिरूप यथासंभव है तथा मुनियों के प्रधानता से होते हैं किन्तु अज्ञानी मिथ्यादृष्टि के नहीं होते। यही अभिप्राय पञ्चास्तिका में भी अभिव्यक्त है -
    आवोत्तसमया यत्तो सो धम्मो दसेदवाओ।
    श्रावकैरपि सेव्योऽसौ यथाशक्ति यथागमम् ॥
  10. दिगंबरी जैन व्रत कथा साहित्य - डॉ.पद्मकुमार जैन, हर्षित प्रकाशन, दिल्ली, 2015, पृष्ठ 112,113,156
  11. पर्यूषण के दस दिन, मुनि श्री समता सागर जी महाराज, संपा.ब्र.पीयूष शास्त्री, 1999, प्रथम संस्करण, पृष्ठ -6
  12. रा.वा.9/6/688
  13. दम्मसारो, गाथा-1, प्रो अनेकंत कुमार जैन, प्रका.जिन फाउंडेशन, नई दिल्ली, 2003, पृष्ठ 7
  14. दशलक्षणिकव्रते भाद्रमासे शुक्ले वीचिपंचमीदिने प्रोषधः कार्यः, सर्वगृहारम्भं परित्यज्य जिनालये गत्वा पूजाभिषेकादिकं कार्यम्। चतुर्विंशतिनां प्रतिमां समारोप्य जिनवरग्रे दशलक्षणिकं यन्त्रं तदग्रे स्थापये, ततश्च कृत्वा कुर्यात्, मोक्षः मोक्षाभिलाषी अष्टद्रव्यैर्जिनवरः जिनं पूजयेत्। पंचमीनिमारभ्य चतुर्दशीपर्यन्तं व्रत कार्यम्, ब्रह्मचर्यविधिना स्वात्मभूः इदं दशवर्षपर्यन्तं करणीयम्, ततोऽद्यापनं कुर्यात्। अथवा

दशलक्षण धर्म -

आचार्य कुन्दकुन्द (प्रथम शती) ने सारमातृवेख्या में गाथा 71 से 80 तक क्रमशः दश धर्मों का स्वरूप समझाया है, इसी प्रकार कार्तिकेयानुप्रेक्षा में भी 394 से गाथा 403 तक क्रमशः दशधर्मों का स्वरूप समझाया है। तत्पश्चात् तथा उसके टीकाकारों ने उत्तमक्षमादि दश धर्मों का उल्लेख किया है, इसके अलावा भी अनेक ग्रंथों में दशधर्म की चर्चा विद्यमान है। ज्ञानार्णव में भी उल्लिखित है - दशलक्ष्मयुतोः सौख्यं जिनैर्धर्मः प्रकीर्तितः।15 जिनेंद्र भगवान् ने धर्म को दशलक्षण युक्त कहा है। टीकाकारों ने इसमें सम्मिलित ‘उत्तम’ विशेषण पर भी चर्चा की है, आचार्य पूज्यपाद ने स्पष्ट लिखा है कि उत्तम विशेषण का प्रयोग दुष्ट प्रयोजन की निवृत्ति के अर्थ में है - दुष्टप्रयोजनपरिवर्तनादुत्तमविशेषणम्।16 यही अभिप्राय आचार्य अकलंक ने भी प्रगट किया है।17 चारित्रसार में इसका अर्थ और अधिक खोल कर प्रगट करते हुए कहा गया कि ख्याति व पूजादि की भावना की निवृत्ति के अर्थ उत्तम विशेषण दिया है। अर्थात् ख्याति पूजा आदि के अभिप्राय से भारी गंदी क्षमा आदि उत्तम नहीं है।18 उत्तम विशेषण का एक अर्थ ‘सम्यग्दर्शन’ भी किया गया है यद्यपि इसका कोई सीधा प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है किन्तु चूंकि ये धर्म मूलतः मुनिराज के ही माने गए हैं और सम्यग्दृष्टि आदि के उपचार से इनका धारण माना गया है अतः इस उत्तम विशेषण से सम्यग्दर्शन की उपस्थिति का अर्थ लगाया जा सकता है।

‘मिच्छामि दुक्कडं’ और ‘पर्युषण’ पर्व कहना गलत नहीं है -

वर्तमान में दिगंबर जैन समाज में व्यवहार में मूल प्राकृत आगमों के शब्दों के प्रायोगिक अभ्यास के अभाव के कारण कई प्रकार की भ्रांतियां उत्पन्न हो रही हैं जिस पर गम्भीर चिन्तन मनन आवश्यक है। मैं इस विषय में कुछ स्पष्टीकरण देना चाहता हूँ -

१. एक भ्रान्ति यह फैल रही है कि ‘मिच्छामि दुक्कडं’ शब्द श्वेताम्बर परम्परा से आया है। कारण यह है कि श्वेताम्बर श्रावकों में मूल प्राकृत के प्रतिक्रमण पाठ पढ़ने का अभ्यास ज्यादा है। दिगंबर परम्परा में यह कार्य मात्र मुनियों तक सीमित है। दिगंबर श्रावक भगवान् की पूजा

दशोपवासः कार्याः। अथवा पञ्चमीतुष्टोऽष्टोपवासमयं क्षेममेकान्तमिति केषाञ्चिन्मतम्, तत्तु शक्तिहीनतयाऽगृहीत न तु परमो मार्गः।… (स्रोत-Website-Encyclopedia of Jainism)
15 ज्ञानार्णव/2-10/2, तथा प.वि./1/7; कार्तिकेयानुप्रेक्षा-478; द्रव्यसंग्रह टीका/35/101/8; द्रव्यसंग्रह टीका/35/145/3; दर्शनपाहुड़ टीका /9/8/4
16 सर्वार्थसिद्धि/9/6/413/5
17 राजवार्तिक /9/6/26/598/29
18 उत्तमग्रहण ख्यातिपूजाऽनिवृत्त्यर्थी- चारित्रसार/58/1

ज्यादा करते हैं कुछ श्रावक प्रतिक्रमण करते हैं तो हिंदी अनुवाद ही पढ़ते हैं, मूल प्राकृत पाठ कम श्रावक पढ़ते हैं अतः ‘मिच्छामि दुक्कडं’ का प्रयोग श्वेताम्बर समाज में ज्यादा प्रचलन में आ गया जबकि दिगंबर परम्परा के सभी प्रतिक्रमण पाठों में स्थान स्थान पर ‘मिच्छामि दुक्कडं’ का प्रयोग भरा पड़ा है, अतः यह कहना कि यह श्वेताम्बरों से आया है बिल्कुल गलत है। वास्तविकता यह है कि प्रतिक्रमण पाठ गौतम गणधर के काल से यथावत चल रहा है जब श्वेताम्बर दिगंबर का भेद भी नहीं हुआ था। यह पाठ प्रतिदिन करणीय था इसलिए वास्तव में दिगंबर-श्वेताम्बर परम्परा के मुनियों ने अपने कंधों में इसे श्रुतपरम्परा की भांति आज तक सुरक्षित रखा हुआ है, इसलिए वह कुछ पाठ भेद के बाद भी दोनों जगह लगभग एक सा है।

२. दूसरी भ्रान्ति यह फैल रही है कि दशलक्षण पर्व को ‘पर्युषण’ पर्व कहना गलत है क्यों कि यह श्वेताम्बर परम्परा में मनाया जाता है। यह धारणा भी ठीक नहीं है। यद्यपि श्वेताम्बर परम्परा में यह शब्द ज्यादा प्रचलित है तथा श्वेताम्बर आगमों में इसका उल्लेख भी बहुतायत से मिलता है किन्तु दिगंबर साहित्य में भगवती आराधना और मूलाचार में साधुओं के जिनकल्पी और स्थविरकल्पी - ये दो भेद बताये हैं और स्थविरकल्प के दस भेद बताते हुए लिखा है -

अचेलेक्कद्विसंयसेजाहररयंपिंडियरिमो।
जेठ्ठपडिकम्मे वि य मासो पसोवणकप्पो।।19

विजयोदया टीका में लिखा है कि 'पजोसवणकप्पो नाम दशमः। वर्षाकालस्य चतुर्षु मासेषु एकैकंवादशवाने श्रमणत्वात्।20 अर्थात् पजोसवण नाम का दसवां कल्प है जिसका अभिप्राय है वर्षा काल के चार मासों में श्रमण त्यागकर एक ही स्थान पर निवास करना। इस हिसाब से देखें तो चातुर्मास को पर्युषण कहते हैं और इस दौरान जो भी पर्व आते हैं उन्हें पर्युषण पर्व कहते हैं।

इस प्रकरण में पंडित कैलाशचंद शास्त्री जी ने एक स्पष्टीकरण भी दिया है -

  • प्राकृत में दसवें कल्प का नाम ‘पजोसवण’ है उसका संस्कृत रूप पर्युषणकल्प है। इसी से भादों के दशलक्षण पर्व को पर्युषण पर्व भी कहते हैं। श्वेताम्बर परम्परा में भी इसका उत्कृष्ट काल आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चार मास है। जघन्य काल सत्तर दिन है। भाद्रपद शुक्ला पंचमी से कार्तिक की पूर्णिमा तक सत्तर दिन होते हैं। संभवतः इसी से

19 देखें - भगवती आराधना -गाथा 623, पृष्ठ 320, प्रका. जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर, २००६ तथा मूलाचार, अधिकार-१०, गाथा-१८
20 भ.आरा.विजयो.टीका पृष्ठ 333

दिगंबर परम्परा में पर्युषण पर्व भाद्रपदशुक्ला पंचमी से प्रारंभ होते हैं। इस काल में साधु विहार नहीं करते। 21

एक निवेदन यह भी है कि आजकल हम लोग बहुत सी प्रचलित परम्पराओं और अनुष्ठानों तथा पर्वों को लेकर यह कहने लग गए हैं कि यह तो अन्य परम्परा से हमारे यहां आई है, यह हमारी नहीं है। हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। तथा सोच समझ कर कथन करना चाहिए। हमारा बहुत सा साहित्य नष्ट हो गया है, किन्तु परम्परा में कई आवश्यक विधान हमारे आचार्यों/विद्वानों ने इसमें सम्मिलित ‘उत्तम’ विशेषण पर भी चर्चा की है, आचार्य पूज्यपाद ने स्पष्ट लिखा है कि उत्तम विशेषण का प्रयोग दुष्ट प्रयोजन की निवृत्ति के अर्थ में है - दुष्टप्रयोजनपरिवर्तनादुत्तमविशेषणम्।16 यही अभिप्राय आचार्य अकलंक ने भी प्रगट किया है।17 चारित्रसार में इसका अर्थ और अधिक खोल कर प्रगट करते हुए कहा गया कि ख्याति व पूजादि की भावना की निवृत्ति के अर्थ उत्तम विशेषण दिया है। अर्थात् ख्याति पूजा आदि के अभिप्राय से भारी गंदी क्षमा आदि उत्तम नहीं है।18 उत्तम विशेषण का एक अर्थ ‘सम्यग्दर्शन’ भी किया गया है यद्यपि इसका कोई सीधा प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है किन्तु चूंकि ये धर्म मूलतः मुनिराज के ही माने गए हैं और सम्यग्दृष्टि आदि के उपचार से इनका धारण माना गया है अतः इस उत्तम विशेषण से सम्यग्दर्शन की उपस्थिति का अर्थ लगाया जा सकता है।

  • जैनदर्शन विभाग
    श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
    [email protected]

प्राकृत भाषा में दशधर्म का सार

दसदम्मसारो

(प्रो डॉ. अनेकांत कुमार जैन, नई दिल्ली)

मंगलाचरण

(गाथा)
णमो हु सव्वजिणाणं आयरियोवज्झायसाहुणं ।।
णमो य पज्जुसणाणं णमो दसलक्खणधम्माणं ।।१।।
सभी जिनेंद्र भगवन्तों को मेरा नमस्कार, सभी आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं को
मेरा नमस्कार, पर्युषण को नमस्कार और दशलक्षण धर्मों को नमस्कार।
(उग्गहा)
धम्ममउसो धम्मो वत्थुसहावो खलु जीववरक्खणं।
चारित्तं सुद्धं? धम्मा य सुद्धी य सुद्धी य सव्वपावाणं ।।२।।
दर्शन का मूल धर्म है, वस्तु का स्वभाव धर्म है, जीवों की रक्षा ही धर्म है, चारित्र धर्म
है, श्रुत धर्म है, दया धर्म है और विशुद्ध वीतरागभाव धर्म है - ऐसा जानो।

धम्मस्स दसलक्खणं

धम्मस्स दसलक्खणं खमा मद्दवज्जवसच्चसंजमा ।।
संजमतवचागाकिंचण्हं बंभ य जिणेहिं उत्तं ।। ३ ।।

21 देखें - भगवती आराधना पृष्ठ 334

जिनेंद्र भगवान् ने धर्म के दस लक्षण कहे हैं - उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।

उत्तमक्षमा

खमा हु अप्पसहावो कोहाभावे य जायइ अप्पम्मि।
मिच्छत्तस्साभावे जट्टा य सम्मत्तं हवइ अप्पम्मि ॥१४॥
क्षमा आत्मा का स्वभाव है, वह क्रोध कषाय के अभाव स्वरूप आत्मा में उत्पन्न होती है जैसे मिथ्यात्व के अभाव में सम्यक्त्व आत्मा में प्रगट होता है।

उत्तममार्दव

मज्जवप्पसहावो य माणाभावे य जायइ अप्पम्मि।
मिच्छत्तस्साभावे जट्टा य सम्मत्तं हवइ अप्पम्मि ॥१५॥
मार्दव आत्मा का स्वभाव है, वह मान कषाय के अभाव स्वरूप आत्मा में उत्पन्न होता है जैसे मिथ्यात्व के अभाव में सम्यक्त्व आत्मा में प्रगट होता है।

उत्तमआर्जव

अज्जवप्पसहावो य मायाभावे य जायइ अप्पम्मि।
मिच्छत्तस्साभावे जट्टा य सम्मत्तं हवइ अप्पम्मि ॥१६॥
आर्जव आत्मा का स्वभाव है, वह माया कषाय के अभाव स्वरूप आत्मा में उत्पन्न होता है जैसे मिथ्यात्व के अभाव में सम्यक्त्व आत्मा में प्रगट होता है।

उत्तम-संजम

सउच्वम्मे य सड्ढे ववणे अत्थि भओ जिणधम्मम्मि।
पढमो वत्थुसहावो दुवे अत्थि महव्वयं साहूणं ॥१८॥
शौच जिन धर्म में उत्तम सत्य धर्म और सत्य वचन में भेद है। एक (उत्तम सत्य धर्म) तो वस्तु का स्वभाव है और दूसरा (सत्य वचन) मुनियों का महाव्रत है।

उत्तम-संयमो

संजमणमेव संजम जो सो खलु हवइ समतापुणाइ।
णियाणुभवच्छिण्णेण ववहारोण पंचेदियरोहो ॥१९॥
संयमन ही संयम है जो निश्चित ही सम्यक्त्व का अनुभवी होता है। निश्चयनय से निजअनुभव और व्यवहार से पंचेन्द्रिय निरोध संयम कहलाता है।

उत्तम-तवो

इच्छाणिरोहो तवो कम्मक्खइ संमग्गुरूवाणं।
णियव्विहयेण भेत्तुं खीणं परमत्तदीढं ॥२०॥
इच्छा का निरोध तप है, कर्म क्षय के लिए अपने स्वरूप में रमण करना तप है। तप छह अन्तरंग और छह बहिरंग के भेद से बारह प्रकार का होता है उनमें भी ध्यान को परम तप कहा गया है।

उत्तम-त्याग

सगवत्थूण य दाणं चागरपरवत्थुसु रागाभावो।
णाणवत्थूणं ण होइ य भेयणाणं अस्थि पच्चक्खाणं ॥२१॥
स्व वस्तुओं का दान होता है और पर वस्तुओं में रागद्वेष का अभाव त्याग है। निश्चित ही ज्ञान का त्याग नहीं होता है (जबकि दान होता है) और वास्तव में पर द्रव्यों से भेदज्ञान होना ही प्रत्याख्यान-(त्याग) है।

उत्तमआकिंचन्य

परकिदित्ति मज्झ गच्छि भावणायिण्णं णगहरेहिं।
अंतकदिग्गिणयागो अणसत्तो हवइ अप्पसयेण ॥२२॥
पर पदार्थ कुछ भी मेरा नहीं है ऐसी भावना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है - ऐसा गणधरों के द्वारा कहा गया है। अन्तरंग और बहिरंग परिग्रहों का त्याग और उनके प्रति अनासक्ति आत्मा के आश्रय से उत्पन्न होती है।

उत्तमब्रह्मचर्य

बंभणि चरणं बंभं जीवो विमुक्कपरदेहतिस्ससिस्स।
विंदरीयगिणेसु खलु आणात्ति कारणं य भवदुक्खस्स ॥२३॥
जीव का परदेह की सेवा से रहित होकर अपनी शुद्ध आत्मा में रमण करना ब्रह्मचर्य है। निश्चित रूप से विपरीत लिंग में आसक्ति ही भव दुःख का मूलकारण है।

क्षमापर्व

जीवखमयंति सव्वं खमादियेसे च याचइ सव्वेहिं।
‘मिच्छा मे दुक्कडं’ य बोल्लइइ मेरे मउणं णिएणयम्मि ॥
क्षमा दिवस पर जीव सभी जीवों को क्षमा करते हैं सबसे क्षमा याचना करते हैं और कहते हैं मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हो तथा मेरा किसी से भी बैर नहीं है।

धम्मसागे

धरइ जो दसमधम्मो पंचमकाले णियस्सत्तिखेवण।
सो अणिंदियाणं णहइ ‘अणयंत’ सरुवं अप्पं ॥२५॥
इस विषय पंचम काल में भी जो इस दस धर्मों को यथा शक्ति धारण करता है, वह अतिनिंदित आनन्द और ‘अनेकांत’ स्वरूपी आत्मा को प्राप्त करता है।


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2407.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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