दशलक्षण महापर्व — जैन स्वाध्याय सामग्री | Dashlakshan Mahaparv

दशलक्षण महापर्व

दश लक्षण महापर्व

“उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः।”

“धन्य मुनिदशा”

त्याग-विराग काष्ठ-खण्डों से बनी हुई उत्तम सीढ़ी।
क्षमा आदि दस पाद-स्थल युत, मोक्षमहल को है जाती॥
मुक्ति-कामिनी वांच्छक नर को, यही नसैनी योग्य कही।
सुरपति से उन वन्द्य धर्म दश, धरने में नहीं हर्ष किसे?॥

दश लक्षण महापर्व

“उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः।”

उत्तम क्षमा

Supreme Forgiveness

स्वेच्छाचारी लोक हमें, चाहे जैसा माने मन में।
राग-द्वेषदि रहित हम, अपना निर्मल चित्त रखें॥
राग-द्वेष परिणामों का फल, सबको मिलता अपने आप।
प्रशमभावयुत मुनिजन को बस! आत्मशुद्धि ही होती साध्य॥

उत्तम मार्दव

Tenderness or Humility

सुन्दर घर भी जले चतुर्दिश, तो बचने की क्या आशा?।
प्रतिदिन जर्जर होती काया, के टिकने की क्या आशा?॥
अतः मुनीश्वर निर्मल उर में, नित विवेक से करें विचार।
जाति ज्ञान कुल आदि विषय में, मद का अवसर कैसे आय?॥

उत्तम आर्जव

Straight-forwardness or Honesty

अति कष्टों से हुआ उपार्जित, जीवन भर का सद्-गुण-कोष।
पूर्ण नष्ट हो जाता है यदि, एक बार हो माया-दोष॥
क्रोधादिक सारे दुर्गुण ही, कपटभाव में छिपे रहें।
उत्तम माया से उत्पन्न पाप से, जीव चतुर्गति-भ्रमण करें॥

दश लक्षण महापर्व

उत्तमक्षमा मार्दव आर्जव सत्य शौच संयम तप त्याग आकिंचन्य ब्रह्मचर्य दश धर्म।

उत्तम शौच

Contentment or Purity

गंगा-सागर पुष्करादि, तीर्थों में यदि स्नान करें।
किन्तु विशुद्धि न मन में हो तो, प्राणी सदा अशुद्ध रहें ॥
मिथ्यात्वादि मलों से मैला, मन हो शुद्ध कहे कैसे ?।
मद्य भर घट शुचि कैसे हो, कितना भी धोएँ जल से ॥

उत्तम सत्य

Truthfulness

नरपति हो या सुरपति अथवा, हो जाए भव-सागर-पार।
ये फल तो आगामी भव में, सत् वक्ता को होते प्राप्त ॥
किन्तु इसी भव में वे पाते, उज्ज्वल कीर्ति चन्द्र-समान।
कैसे वर्णन करें सुफल का, सज्जन गण करते सम्मान ॥

उत्तम संयम

Self-restraint

यह नरभव मिलना दुर्लभ है, उसमें भी दुर्लभ उत्तम जाति।
उत्तम आगम वचन सुनना दुर्लभ है, उसमें भी दुर्लभ दीक्षाए ॥
ये सब होवें प्राप्त किन्तु, दुर्लभ है सम्यग्दर्शन-ज्ञान।
इनसे भी अति दुर्लभ संयम, क्यों न प्रशंसा करें सुजान ?॥

दश लक्षण महापर्व

“उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः।”

उत्तम तप

Penance or Austerities

विषय-कषायरूप तर कर हों, उद्धत और महाबलवान्।
किन्तु सुभट तप-सन्मुख हो तो, तत्क्षण ही होते निष्प्राण ॥
धर्मरूपी लक्ष्मी से शोभित, योगी तप-योद्धा के संग।
शिवपुर-पथ में गमन करें वे, अति सुख से होकर निःशंक ॥

उत्तम त्याग

Renunciation

निर्मोही हो चारु चरित-धर, निज-हित में ही लीन रहें।
मोक्षहेतु गृह-त्याग करें तप, ऐसे साधु विरले हैं ॥
स्वयं तप तप अन्य मुनी को, शास्त्रादिक दे करें सहाय।
दुर्लभ से दुर्लभ हैं ऐसे, मुनिवर जो जग को सुखदाय ॥

उत्तम आकिंचन्य

Non-attachment

श्रुत की व्याख्या करना एवं, निर्ग्रन्थों को ग्रन्थ प्रदान।
प्रतिसाहिति यति को दे संयम-साधन, यह श्रावक का दान ॥
‘किंचित् भी नहीं मेरा’ ह ऐसा, हो विचार तन से निर्मम।
आकिंचन्यधर्म यह भव-नाशक है श्रेष्ठ कहें सज्जन ॥

दश लक्षण महापर्व

“उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ।”

उत्तम ब्रह्मचर्य

जिसका संग अधिकरण जगत् का, तीव्र दुःखों की पैनी धार।
प्राणी भ्रमते मृत-पिण्डीवत्, परयहिं धर विविध प्रकार ॥
उस नारी को जो मुमुक्षु यति, लखें मोह को कर उपशांत।
माता-बहन-सुता-सम वे ही, पाते हैं व्रत ब्रह्म परम ॥

दश लक्षण महापर्व

“उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ।”

क्षमा-वाणी

क्रोधादिक हों कर्मोदय से, ये आतम के नहीं विकार।
लाल फूल के आश्रय से ज्यों, स्फटिकमणि दिखता है लाल ॥
उपजे जो हुआ चित्त वह पर है, कर्म हेतु है विकृति का।
मैं अविकारी ज्ञान-स्वरूपी, मैं हूँ उनसे भिन्न सदा ॥

दश लक्षण महापर्व

“उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ।”

क्षमा-वाणी

दुर्जन होय सुखी मम दोषों, को दुनिया में घोषित कर।
धन-लोभी सर्वस्व ग्रहण कर, बैरी मम जीवन लेकर ॥
मध्यस्थ गहें मेरी पदवी सब, जीव जगत् के सुखी रहें।
करूँ प्रकार जगत् में मुझसे, नहीं किसी को दुःख पहुँचे ॥


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3107.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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