दशधर्म की प्यारी कविताएं — जैन स्वाध्याय सामग्री | Dashdharm Ki Pyari Kavitayen

दशधर्म की प्यारी कविताएं

दशधर्म की प्यारी कविताएँ

उत्तम क्षमा धर्म

क्षमा धर्म है सबसे प्यारा,
आतम का स्वभाव है न्यारा ।।

क्रोध धिक्कारी भाव है,
उससे होते पाप हैं ।।

क्षमा जीव का गहना है,
मुनिराजों का कहना है ।।

क्रोध बढ़े तो शांत रहो,
अपने में विश्राम करो ।।

  • विराग शास्त्री

उत्तम मार्दव धर्म

मान करे सबको हैरान,
अज्ञानी जीवों की शान ।

मान करे सब सत्यानाश,
जीव दुःखी हो और निराश ।

मान कषाय का करना त्याग,
मैं पूरा हूँ हो विश्वास ।।

मार्दव भाव हृदय में धार,
दशधर्मों की जय जयकार ।।

  • विराग शास्त्री

उत्तम आर्जव धर्म

आर्जव अर्थ सरलता जान,
सच्चे जैनी की पहचान ॥
मायाचारी कभी न करना,
प्रेम भाव से मिल-जुल रहना ॥
सरल भाव है शुद्धात्म,
जानो बनना परमात्म ॥
कपट भाव दुखदाई मान,
सरल भाव से हो सन्मान ॥
त्याग कपटता बनो महान,
पा जाओगे सुख की खान ॥

  • विराग शास्त्री

उत्तम शौच धर्म

पापाजी ओ पापाजी,
हमको भी बतलाना जी,
शौच धर्म क्या होता है ?
कैसे पाला जाता है ?
पापा- बेटेजी ओ बेटेजी,
शौच धर्म शुद्धि परिणाम,
इसमें नहीं लोभ का काम ।
लोभी व्यक्ति सदा दुःखी,
संतोषी ही सदा सुखी ।
हो मुनिवर की भक्ति जी
सुनलो प्यारे बेटेजी,
नहीं कभी भी लोभ करो,
जो पाया संतुष्ट रहो ।
लोभ सदा ही बंध करे,
दुर्गति में भ्रमण करे ।
देव एवजाना चेतन जी,
सुनलो प्यारे बेटेजी,
बच्चा- नहीं मांगू मैं भोग विलास,
चेतन वैभव मेरे पास ।
शौच धर्म मैं पालूंगा,
निज आतम को ध्याऊंगा
परमातम बन जाऊँ जी,
पापाजी ओ पापाजी ।

उत्तम सत्य धर्म

हम नन्हें मुन्ने बच्चे हैं,
दांत हमारे कच्चे हैं ।
झूठ कभी ना बोलेंगे,
दिल न किसी का दुखायेंगे ।
सत्य वचन हितकारी हैं,
सबको आनंदकारी है ।
परम सत्य शुद्धात्म मान,
बन जाना जल्दी भगवान ॥

  • विराग शास्त्री

उत्तम संयम धर्म

जिनवाणी जो कहती है, सुन लो जी।
उत्तम संयम जीवन में पालो जी।
कभी जीव हिंसा नहीं करना,
इंद्रिय भोग में मन न रमाना।
जैनी बन कर धर्म निभाना जी।
सदा छानकर पानी पीना,
भोजन शुद्ध सदा ही करना।
उत्तम संयम सदा ही पालो जी।
जिनवाणी माँ हमें जगाए,
सभी जीव भगवान बताए।
मन में अपने करुणा धारो जी।

  • विराग शास्त्री

उत्तम तप धर्म

मम्मी जी ओ मम्मी जी,
मेरी प्यारी मम्मी जी।
जल्दी से बतलाना जी
मुझको भी समझाना जी।
उत्तम तप क्या होता है?
कैसे पाला जाता है?
उत्तम का मतलब है क्या?
भेद तपों के होते क्या?
बेटा! सुनो ध्यान से बात,
उत्तम तप का श्रवण साथ।

उत्तम आत्म दर्शन है,
कहते सम्यक दर्शन है।
तप से हो जीवन श्रृंगार,
तप से हो कर्मों की हार।
अंतर-बाहर छह-छह भेद,
तप करने में करो ना खेद।
जितनी शक्ति उतना तप,
सब पापों से रहना बच।
तप से होता कर्म विनाश,
उत्तम तप दे मुक्ति प्रकाश।

  • विराग शास्त्री

उत्तम त्याग धर्म

बच्चे बोले धरम-धरम,
धरम मार्ग में नहीं शरम।
खोटी आदत का हो त्याग,
उत्तम त्याग से स्वयं विकास।
पाप कषाय का होवे त्याग,
दुःखमय होते भोग विलास।
मुनिराजों का त्याग महान,
निज आतम प्रभुता की ध्यान।
शक्तिपूर्वक करना त्याग,
शीघ्र बसो सिद्धों के साथ।

  • विराग शास्त्री

उत्तम आकिंचन्य धर्म

कुछ नहीं बाहर में मेरा है, सुनलो जी।
आकिंचन्य धर्म बताता जी।
मैं हूँ अनंत गुणों की खान,
हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम।
अपना गौरव गरिमा पा लो जी।
नहीं बनूँ मैं पर का दास,
मैं पूरा हूँ हो विश्वास।
सिद्ध समान स्वयं को ध्या लो जी।

– विराग शास्त्री

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

श्री मुनिवर से पूछें हम सब ब्रह्मचर्य क्या होता है?
ब्रह्मचर्य से क्या मिलता है, कैसे पाला जाता है?
श्री मुनिवर समझाते हैं, शील स्वयं भी ध्याते हैं।
सदा शील गुण धारना, और कुशील भी त्यागना।
गंदी बातें गंदे दोस्त, गंदी सोच भी छोड़ना।
टीवी, पिक्चर खोटे भाव, कभी न नाता जोड़ना।
अपना आतम ही है ब्रह्म, इसमें रमना कहे चरण।
ब्रह्मचर्य शिवधाम करें, भवसागर का अंत करें।

– विराग शास्त्री


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 1904.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है