दश धर्म प्रवचन - जैन स्वाध्याय सामग्री | Dash Dharm Pravachan

दश धर्म प्रवचन

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प्रकाशकीय

वीतरागतत्व आलंबन के प्रतीक, शाश्वत पर्व दशलक्षण के स्वरूप पर प्रकाश डालनेवाले पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के मंगल प्रवचन ‘दश धर्म प्रवचन’ नाम से प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है।

वर्तमान शताब्दी में दृष्टिगोचर दिगम्बर जिनधर्म की प्रभावना में पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का अविस्मरणीय योगदान रहा है। पूज्यश्री ने स्थानकवासी श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय में जन्म लेकर, स्वयं बुद्ध की तरह न केवल सत्य का अनुसन्धान ही किया, उसे प्राप्त भी किया और प्रचारित भी किया। आन इसमें कोई मतभेद नहीं है कि यदि पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का उदय नहीं हुआ होता तो दिगम्बर जैन समाज में आध्यात्मिक जागृति का नितान्त अभाव ही रहता।

विक्रम सम्वत् १९७८ की वह पावन घड़ी, जिस दिन पूज्य गुरुदेवश्री के करकमलों में शासन स्तम्भ श्रीमद् भागवत् कुन्दकुन्दाचार्यदेव द्वारा विरचित समयसार परमागम आया, जिसे प्राप्त कर उन्होंने क्या नहीं पाया? क्या नहीं छोड़ा? भगवान समयसार स्वरूप शुद्धात्मा को पाया और मिथ्या मताग्रह का विष छोड़ा। तभी से लगातार ४० वर्षों तक पूज्यश्री के द्वारा वीतरागी जिनशासन की जो अविस्मरणीय प्रभावना हुई, वह आज देश-विदेश में अपनी जड़ें जमा चुकी है।

यद्यपि पूज्य गुरुदेवश्री आज भले उपस्थित नहीं हैं, तथापि उनकी वाणी कैसट्स, सी.डी. एवं डी.वी.डी. में अवतीर्ण होकर तथा सरसहित्व के रूप में प्रकाशित होकर, इस पुण्य काल के अन्त तक भव्यजीवों को मुक्तिमार्ग का बोध प्रदान करती रहेगी।

पूज्य गुरुदेवश्री के महान प्रभावना उदय में सैकड़ों जैन मन्दिरों एवं कई भव्य सद्गुणों का निर्माण हुआ है, जो उनके द्वारा प्रसारित भगवान महावीर के जीव मात्र को हितकारी आध्यात्मिक सन्देशों के व्यापक प्रचार-प्रसार में संलग्न है।

तीर्थधाम मंगलायतन भी पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के प्रभावना उदयवद्धी वटवृक्ष की एक शाखा है। अत्यन्त अल्पकाल में इस तीर्थधाम ने मात्र जैन, अपितु जैनेतर समाज के हृदय में भी अपना अमित प्रभाव स्थापित किया है। सत्य तो यह है कि तीर्थधाम मंगलायतन पूज्य गुरुदेवश्री एवं पूज्य बहिनश्री के तत्त्वज्ञान का प्रभावक ही है।

सत्साहित्य का प्रकाशन भी तीर्थधाम मंगलायतन की कई कल्याणकारी योजनाओं में से एक है। इसी के फलस्वरूप प्रस्तुत ग्रन्थ के द्वितीय संस्करण का प्रकाशन किया जा रहा है।

आचार्य भगवान श्री पद्मन्नदिव द्वारा रचित पद्मन्नदि पञ्चविंशतिका में समागत दश धर्मों के स्वरूप पर पूज्य गुरुदेवश्री ने लगभग सन् १९५०-५१ में ये प्रवचन प्रदान किये हैं, जो हिन्दी एवं गुजराती में श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़ से कई बार प्रकाशित हो चुके हैं।

दशलक्षण पर्व ही ऐसा पर्व है, जिसे सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज अत्यन्त उत्साह से मनाती है। इन दिनों वे लोग भी जिन मन्दिर आते हैं, जो वर्ष में इन दिनों के अलावा नहीं आते। मन्दिरों में जिनेंद्र पूजन, मण्डल विधान एवं स्वाध्यायादि के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। दश धर्मों के स्वरूप पर स्वाध्याय होता है। यद्यपि यह पर्व प्रत्येक वर्ष में तीन बार आता है, तथापि भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी में चतुर्दशी तक तो विशेषरूप से मनाया ही जाता है।

पर्व के इन दिनों में पूज्य गुरुदेवश्री दश धर्मों पर गम्भीर आध्यात्मिक शैली में प्रवचन प्रदान किया करते थे, उसी का सङ्कलन ब्रह्मचारी हरिलाल जैन, सोनगढ़ के प्रस्तुत ग्रन्थ के रूप में गुजराती में किया

सम्पादकीय

परम पूज्य आचार्य पद्मन्नदिव द्वारा रचित पद्मन्नदि पञ्चविंशतिका में समागत दश धर्मों के स्वरूप पर पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के अध्यात्मपूर्ण मधुर प्रवचनों का यह सम्पादित संस्करण, सद्प्रेमी साधर्मियों को समर्पित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है।

दशलक्षण पर्व, वर्ष में तीन बार - चैत्र, भाद्रपद और माघ माह में शुक्लपक्ष की पञ्चमी में चतुर्दशी तक आता है, पर सामान्यतः भाद्रमाह में ही इसे मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है।

सत्य तो यह है कि पर्व, किसी तिथि अथवा दिनों में नहीं है, पर्व शब्द का अर्थ तो ‘पवित्रता’ होता है, जो कि मोह-राग-द्वेषरूप विकारीभावों के अभावस्वरूप वीतरागता परिणतिरूप होता है। जिस आत्म परिणति में यह पवित्रता प्रगट होती है, उसके लिए तो सदा ही पर्व है। दिनों अथवा तिथियों में पर्व नहीं, पर्व का उपचार होता है।

पर्व भी दो प्रकार के होते हैं - (१) शाश्वत् पर्व, (२) तात्कालिक पर्व। शाश्वत् पर्व में दशलक्षण, अष्टाह्निका, रत्नत्रय, सोलहकारण इत्यादि पर्व आते हैं तो तात्कालिक पर्वों में तीर्थङ्करों के कल्याणक पर्व अथवा अन्य किसी घटना विशेष से सम्बन्धित पर्व होते हैं।

यहाँ वर्णित दशलक्षण पर्व, जिन्हें सामान्यतः दश धर्म भी कहा जाता है, आत्मा की उस वीतराग परिणति का नाम है, जो मिथ्यात्व, एवं क्रोधादि कषायों के अभावपूर्वक होती है। यद्यपि वीतराग परिणति का कोई प्रकार नहीं है परन्तु अनेक प्रकार के विकारी के अभाव में होने के कारण उस परिणति को अनेक नाम दिये जाते हैं, जैसे क्रोध के अभाव से क्षमा और मान के अभाव से उसी परिणति को मार्दव आदि कहा जाता है।

प्रकाशकीय

था, जिसका हिन्दी रूपान्तरण कार्य श्री मगनलाल जैन, ललितपुरवालों ने किया था।

विगत कई वर्षों से यह ग्रन्थ हिन्दी भाषा में अनुपलब्ध होने से हमने इसके प्रकाशन का निर्णय लिया है। प्रकाशन से पूर्व इसमें अनुवाद एवं सम्पादन सम्बन्धी आवश्यक संशोधन मंगलायतन के विद्वान् श्री देवेन्द्रकुमार जैन, द्वारा किये गये हैं, जिन्हें मैंने भी आद्योपान्त पढ़ा है।

इस ग्रन्थ के प्रकाशनकर्ता के रूप में हमें श्रीमती शान्तिबेन के० गाँधी परिवार, मुम्बई का आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ है - तदर्थ यह परिवार धन्यवाद का पात्र है।

सभी स्वाध्यायी आत्मौत्सुग्य इस प्रवचन ग्रन्थ का स्वाध्याय करके निज आत्महित के सम्मुख हों - इसी भावना के साथ -

दिनाङ्कः ०३ फरवरी २०१०
तीर्थधाम मंगलायतन का
सप्तम वार्षिक महा-महोत्सव

पवन जैन
श्री आदिनाथ-कुन्दकुन्द-कहान
दिगम्बर जैन ट्रस्ट

VIII

दूसरी यह बात भी है कि उत्तम वीतरागता की परिपूर्णता के अभाव में समाज के जीवन में कुछ मन्दकषायता राखी जा रही है, जिसमें क्षमा, मार्दव इत्यादि सम्यग्दर्शन मन्दप्रवर्तन रहता है - इन का आरोप करके उस वीतराग परिणति को भी उक्त नाम से सम्बोधित किया जाता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एक वीतराग परिणति के विविध अपेक्षाओं से दिये गये दश नाम ही दशलक्षण धर्म कहलाते हैं। इसमें वास्तव में धर्म दश नहीं, वरन् धर्म का निरूपण दश प्रकार से है। वस्तुतः धर्म तो इनमें एक वीतराग सम्यक्चारित्रभाविरूप ही है।

सम्यक्चारित्र, सम्यग्दर्शन के बिना नहीं हो सकता - यही कारण है कि प्रत्येक धर्म के पूर्व ‘उत्तम’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जो सम्यग्दर्शन की अनिवार्यता का सूचक है। तात्पर्य यह है कि सम्यग्दर्शनपूर्वक होनेवाली वीतरागचारित्ररूप परिणति ही निश्चय धर्म है और उस भूमिका में प्रवर्तमान मन्दकषायरूप राग, व्यवहार के धर्म कहा जाता है। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि सम्यग्दर्शन के बिना वीतराग परिणति का जन्म नहीं होता और वीतराग परिणति के अभाव में मात्र मन्दराग को धर्मसंज्ञा व्यवहार से भी प्राप्त नहीं होती।

इन सभी तथ्यों का पूज्य गुरुदेवश्री ने इन प्रवचनों में विस्तृत स्पष्टीकरण किया है।

पूज्य गुरुदेवश्री के ये प्रवचन हिन्दी एवं गुजराती भाषा में कई बार प्रकाशित हुए हैं परन्तु वर्तमान में काफी समय से हिन्दी में इनकी अनुपलब्धता के कारण इन्हें सम्पादित कर प्रकाशित किया जा रहा है। इनके सम्पादन में जो-जो कार्य किया गया है, वह इस प्रकार है -

  • सम्पूर्ण प्रवचनों को गुजराती के साथ अनुवाद की दृष्टि से मिलाकर, आवश्यक संशोधन किये गये हैं।
  • लम्बे-लम्बे गद्यांशों को छोटा किया गया है।
  • भाषा को सरल-प्रवाहमयी बनाने का प्रयास किया गया है।

VIII

  • प्रत्येक धर्म के प्रवचन से पूर्व, उस धर्म सम्बन्धी चित्र एवं उसका संक्षिप्त परिचय देनेवाला वाक्य दिया है, जो ‘आराधना’ पुस्तिका से लिया गया है।
  • दश धर्मों का स्वरूप विविध ग्रन्थों के माध्यम से भी ज्ञात हो सके एवं स्वाध्यायी विद्वान, इन धर्मों पर स्वाध्याय करते हुए उनका उद्धरण दे सकें - तदर्थ ग्रन्थ के अन्त में ‘दश धर्म-कुछ प्रश्नोत्तर’ दिये गये हैं। ज्ञात हो कि ये सभी प्रश्नोत्तर अध्यात्मबल मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं, इन्हें आवश्यक परिवर्तन के साथ यहाँ दिया गया है।
  • पूर्व संस्करण का नाम ‘दशलक्षण धर्म’ था, जिसे बोलने की सुविधा के लिए ‘दश धर्म प्रवचन’ किया गया है।

इन सभी कार्यों के शक्तिदाता परम उपकारी पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी ही हैं, उनका ही सबकुछ इस ग्रन्थ में है। साथ ही मुझे पूज्य गुरुदेवश्री के प्रति भक्ति उत्पन्न कराने में निमित्तभूत मेरे विद्यागुरु एवं पूज्य गुरुदेवश्री के अनन्यभक्त पूज्य पण्डित श्री कैलाशचन्द्रजी, अलीगढ़ हैं, जिनके पावन चरणों में रहकर मुझे तत्त्वज्ञान सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है। मेरे जीवन शिल्पी इन दोनों महापुरुषों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।

इस सम्पादन कार्य को आद्योपान्त पढ़कर आवश्यक सुझाव प्रदान करते हुए श्रीमान् श्री पवन जैन एवं समय-समय पर समुचित सुझावों के लिए पण्डित श्री राकेश जैन, शास्त्री, जैनदर्शनचार्य के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।

सभी आत्माभिलषी गुरुदेवश्री की इस महा सद्भावनानी का अवगाहन करके अनन्त सुखी हों - इस पावन भावना के साथ।

  • देवेन्द्रकुमार जैन
    दिनाङ्क - ०९ फरवरी २०१०
    तीर्थधाम मलयलायत
    अतीलागढ़ (३०१०)

अनुक्रमणिका

शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म

उत्तम क्षमाधर्म
११
उत्तम मार्दवधर्म
३०
उत्तम आर्जवधर्म
४२
उत्तम सत्यधर्म
५०
उत्तम शौचधर्म
५८
उत्तम संयमधर्म
६३
उत्तम तपधर्म
७२
उत्तम त्यागधर्म
७९
उत्तम आकिञ्चन्यधर्म
९०
उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म
९७
दश धर्म : कुछ प्रश्नोत्तर
११०

देहातीत होती है मुनिराज की दशा

जिनके अशरीरी ज्ञायक भगवान आत्मा की दृष्टि-ज्ञान और रमणता वर्त रही है - ऐसे निर्ग्रन्थ मुनिराज को ‘मात्र देह, वह संयम हेतु होय जब’ अर्थात् संयम के निमित्तभूत शरीर है परन्तु शरीर की कुछ पड़ी नहीं है; देहातीत जैसी दशा हो गयी है - ऐसी सामान्यदशा की भावना सम्यग्दृष्टि को होती है। श्रावक भी संयम के मनोरथ का सेवन करता है।

अहा! मुनिराज को देह है परन्तु देह की कोई दरकार नहीं है। एक निजत्म-साधना के अतिरिक्त अन्य किसी की उन्हें कुछ पड़ी नहीं है। संघ, शिष्य अथवा संख्या की तो नहीं, परन्तु कदाचित् संयम के हेतुभूत ऐसे शरीर की भी कुछ नहीं पड़ी है। देह होने पर भी जिनकी दशा देहातीत वर्तती है - ऐसी सहजदशा हो जाती है।

  • (वचनामृत प्रवचन, गुजराती, ५/११५)

॥ परमात्मने नमः ॥

दश धर्म प्रवचन

शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म

‘दंसण मूलो धम्मो’ अर्थात् धर्म का मूल सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन ही प्रथम धर्म है और आत्मा के ज्ञान-चारित्रादि समस्त धर्मों का मूल है। सम्यग्दर्शन के बिना भगवान ने धर्म नहीं कहा है। सम्यग्दर्शन इस जगत में सर्वश्रेष्ठ कल्याणकारी वस्तु है। उसकी महिमा अपूर्व है।

हे भव्य! अनन्त काल में आत्मस्वरूप समझने का यह अवसर आया है। यदि सम्यग्दर्शन के द्वारा यथार्थ नहीं समझा तो कोई तुझे शरणभूत नहीं है। पुण्य-पाप रहित चैतन्यस्वभाव की प्रतीति के बिना तेरे त्यागादि सब व्यर्थ हैं, उनसे संसार के दुःखों का अन्त नहीं आयेगा।

आत्मस्वभाव की यथावत् प्रतीति ही धर्म है

आत्मस्वभाव की यथावत् प्रती

दश धर्म प्रवचन

शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म

‘शरीरदया’ नहीं कहा जाता क्योंकि शरीर, जीव नहीं है। लोग शरीर की क्रिया से माप करते हैं, वह ठीक नहीं है। जीव तो शरीर से भिन्न निरन्तर चैतन्यस्वरूप है, उसे श्रद्धा-ज्ञान स्थिरता में ही स्थिर रखना और विकार में न जाने देना, जीवदया है।

‘परजीव की रक्षा करूँ’ - ऐसी दया की वृत्ति परमार्थ से जीवहिंसा ही है, इस प्रकार प्रथम श्रद्धा में स्वीकार करना चाहिए। यद्यपि ऐसी मान्यता होने के पश्चात् भी अस्थिरता के कारण शुभविकल्प आते हैं किन्तु वे धर्म नहीं हैं।

मिथ्यादृष्टि जीव, जीवदशा के शुभावभाव के समय ऐसा मानता है कि मैं परजीव को बचा सकता हूँ तथा इस शुभावभाव से मुझे धर्म होगा। सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा जीव यदि युद्धादि कर रहा हो और उसके अशुभपरिणाम हों तो भी उसे अन्तरङ्ग में भान होता है कि यह युद्ध को या देह की क्रिया मेरी नहीं है; अशुभभाव और पुरुषार्थ के दोष से होते हैं, उतनी हिंसा है किन्तु वास्तव में वह मेरा यथास्वरूप नहीं है। उस समय इन दोनों जीवों में से मिथ्यादृष्टि जीव के अनन्त हिंसा प्रवर्तमान है और सम्यग्दृष्टि जीव के अल्प हिंसा है। अरे! श्रद्धा की अपेक्षा से तो युद्ध के समय भी वह अहिंसक है क्योंकि उसके अंशतः शुद्धचेतना परिणाम प्रवर्तमान है।

जितने अंश में शुद्ध चेतनापरिणाम प्रवर्तमान हों, उतने अंश में युद्ध के समय भी जीवदया वर्त रही है और मिथ्यादृष्टि जीव के किञ्चित् भी शुद्धचेतना परिणाम नहीं होने से उसे जीववध के भाव के समय भी जीवहिंसा ही है। यह माप तो

अनन्तशुद्धचेतना परिणामों से है। शरीर की क्रिया तो दूर रही किन्तु पुण्य-पाप के भावों पर से भी जीवदयारूपी धर्म का यथार्थ माप नहीं होता।

इस प्रकार धर्म के चारों लक्षणों में अभेदरूप से शुद्धचेतना परिणाम ही धर्म है।

परमार्थ धर्म अर्थात् निश्चय धर्म या सच्चा धर्म तो एक ही प्रकार का है, फिर उसे जीवदया कहीं अथवा वस्तुस्वभाव कहीं, उसमें मात्र शुद्ध चेतना परिणाम ही धर्म है। ‘शुद्ध चेतना को धर्म कहते हैं और कभी-कभी शुभभाव को भी धर्म कहते हैं’ - ऐसा स्वरूप निश्चय धर्म का नहीं है। निश्चय धर्म तो एक ही प्रकार का है।

‘मैं आत्मा कौन हूँ’ - इस भाव के बिना शुद्ध चेतना कहाँ से लायेगा? बाह्य में जीव मरे या जिएँ, उनकी संख्या से हिंसा अथवा दया का वास्तविक माप नहीं होता। सम्यग्दर्शन होने पर अहिंसा का प्रारम्भ होता है, तथापि सम्यग्दृष्टि के भी अस्थिरता के कारण जितनी रागादिक वृत्ति उत्पन्न होती है, उतनी चारित्र अपेक्षा से हिंसा है किन्तु जो आत्मभान प्रवर्तमान है, उतनी जीवदया है। इस प्रकार साधक के आंशिक अहिंसा और आंशिक हिंसा - दोनों साथ में ही होती हैं। अज्ञानीयों के एकान्त जीवहिंसा ही है; पूर्ण वीतरागी ज्ञानी के सम्पूर्ण अहिंसा है। वस्तुस्वभाव जैनशासन में त्रिकाल धर्म का ऐसा ही स्वरूप है।

अपने भावों में अनन्त परद्रव्यों का स्वामित्व या अभिमान न होने देना और अपने ज्ञानमात्र स्वरूप को पुण्य-पाप से भिन्नरूप

दश धर्म प्रवचन

शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म

में शुद्ध में स्थिर रखना - ऐसी यथार्थ जीवदया है, उसका जगत् को माहात्म्य नहीं है और शुभराग का माहात्म्य है। जिसने पुण्य के विकल्प से अपना लाभ माना है, उसने पुण्य को अपना स्वरूप ही माना है क्योंकि जिसे अपना स्वरूप मानता है, उसी से अपने को लाभ मानता है।

जिस जीव ने पुण्य को अपना स्वरूप माना, उसने जगत् के समस्त आत्माओं के स्वभाव को भी पुण्यरूप माना। इस प्रकार जगत् के समस्त आत्माओं को विकारी माना है। उसने अपनी मान्यता में विश्व के सर्व जीवों की हिंसा की है। जीवहिंसा के इस पाप को जगत् को ज्ञान नहीं है।

महान हिंसादि के अशुभभाव करने की तो बात ही नहीं है क्योंकि अशुभभावों में तो तीव्र आकुलता है किन्तु जो शुभभाव होते हैं, उनमें भी आकुलता ही है। इन दोनों आकुलताओं में हिंसा है; उससे रहित निराकुलता और ज्ञान-चेतना का जितना अनुभव है, उतनी ही जीवदया है। अपने शुद्ध जीवपरिणाम की रक्षा करना, उसका हनन न होने देना ही शुद्ध चेतना परिणामरूप धर्म है। शुद्ध चेतना परिणाम के बिना दया अथवा दर्शन-ज्ञान-चारित्र एवं क्षमा इत्यादि कोई धर्म सच्चा होता ही नहीं है।

‘परजीव को बचाने का भाव करना, अपना कर्तव्य है’ - यह मान्यता मिथ्या है। परजीव के बचाने का भाव तो विकार है, तो क्या विकार करना आत्मा का कर्तव्य है? ज्ञानी तो जानते हैं कि मात्र ज्ञातारूप से स्वस्वभाव में स्थिर रहना हमारा कर्तव्य है। जितनी मैं अपने ज्ञातास्वभाव में स्थिर रहूँ, उतना धर्म है और ज्ञातापने के अतिरिक्त

अन्य किसी वृत्ति की उत्पत्ति होना मेरा कर्तव्य नहीं है, इस प्रकार ज्ञानी जीव ज्ञाता-दृष्टारूप से अपने चैतन्यपरिणाम को स्थिर रखता है, वही धर्म है।

उक्त सम्पूर्ण कथन का सार यह है कि वस्तुस्वरूप धर्म, उत्तमक्षमादि दशलक्षण धर्म, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप धर्म और जीवस्वरूप धर्म - इन चार प्रकारों की प्ररूपणा में शुद्ध चेतना परिणाममय एक ही प्रकार का धर्म है - ऐसा बताया है। तात्पर्य यह है कि निश्चय धर्म एक ही प्रकार का है।

सम्पत्ति विपत्ति में समभाव

जिस प्रकार चन्द्रमा आकाश में निरन्तर चक्कर लगाता रहता है और उसी प्रकार यह प्राणी संसार में सदा परिभ्रमण करता रहता है। जैसे चन्द्रमा उदय-अस्त एवं कलाओं की हानि-वृद्धि को प्राप्त होता रहता है और उसी प्रकार संसारी प्राणी भी जन्म-मरण तथा सम्पत्ति की हानि-वृद्धि को प्राप्त होता रहता है, जैसे चन्द्रमा मध्य में कलुषित (काला) रहता है उसी प्रकार संसारी प्राणी का हृदय भी पाप से कलुषित रहता है तथा जिस प्रकार चन्द्र एक राशि (मीन-मेष आदि) से दूसरी राशि को प्राप्त कर लेता है, तदनुसार संसारी प्राणी भी एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को ग्रहण करता रहता है - ऐसी स्थिति होने पर भी सम्पत्ति और विपत्ति को प्राप्त में जीव को हर्ष और विषाद किसलिए करना चाहिए? अर्थात् नहीं करना चाहिए।

  • प्रबन्धनन्द पञ्चविंशतिका

उत्तम क्षमाधर्म

राजा श्रेणिक द्वारा महा उपसर्ग किये जाने पर भी मुनिराज यशोधर, स्वरूप-आराधना से विचलित नहीं हुए; उन्होंने क्षमाभाव धारण करके राजा श्रेणिक को भी सत्धर्म प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान किया।

इधर राजा श्रेणिक ने भी धर्म की विराधनास्वरूप अनन्त क्रोधपरिणामों का परित्याग करके, सम्यग्दर्शनपूर्वक धर्म की आराधना प्रगट की। वस्तुतः यह भी उत्तम क्षमा की आराधना का एक प्रकार है।

क्रोध के बाह्य प्रबल उपस्थित होने पर भी, रञ्जय की दृढ़ आराधना के बल से क्रोध की उत्पत्ति न होने देना और वीतरागभावरूप रहना; असह्य प्रतिकूलता में भी क्रोधित होकर आराधना में भङ्ग नहीं पड़ने देना, उत्तम क्षमाधर्म की आराधना है। ऐसी क्षमा के आराधक सन्तों को हमारा नमस्कार हो।

हे सन्तो! हमें भी उत्तम क्षमाधर्म की आराधना प्रदान करो।

आज से दशलक्षणपर्व प्रारम्भ होता है। सबसे पहला दिन उत्तम क्षमा का है। चारित्रदशा में प्रवर्तमान मुनियों के उत्तम क्षमादि दश प्रकार के धर्म होते हैं। इन उत्तम क्षमादि धर्मों से ही चारित्रदशा होती है, वह चारित्र मोक्ष का कारण है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान, चारित्र के कारण हैं। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान को मोक्षमार्ग कहना उपचार है क्योंकि जिसे सम्यग्दर्शन-ज्ञान हुआ हो, उसे अवश्य ही अल्पकाल में सम्यक्चारित्र प्रगट होता है, इसलिए सम्यग्दर्शन होते ही मोक्षमार्ग कह दिया है किन्तु मोक्ष का साक्षात् कारण तो वीतरागी चारित्रदशा है। उस चारित्रदशा में क्षमादि दश प्रकार के धर्म हैं। इन उत्तम क्षमादि दश धर्मों की आराधना का पर्व आज से प्रारम्भ हो रहा है। ‘दशलक्षणपर्व’ का अर्थ है ‘मोक्ष की आराधना का महोत्सव।’

आज का दिन ‘उत्तम क्षमा’ का माना जाता है। वस्तुतः सम्यग्दर्शन के बिना उत्तम क्षमा होती ही नहीं। लोकरीति में शुभभाव को क्षमा कहते हैं, उसका निषेध करने के लिए यहाँ ‘उत्तम क्षमा’ कहा गया है। उत्तम क्षमा का अर्थ है, सम्यग्दर्शनसहित वीतरागभावरूप क्षमा।

निश्चय से अपना आत्मस्वभाव त्रिकाल जायकर्मय है, उसकी प्रतीति एवं बहुमान करना तथा राग-द्वेष क्रोधादि की रुचि को छोड़ना ही उत्तम क्षमाधर्म की यथार्थ आराधना है। आत्मस्वभाव का

दश धर्म प्रवचन

उत्तम क्षमाधर्म

अनादर करके, पुण्य-पाप की रुचि करना, क्रोध है और आत्मस्वभाव के आदर द्वारा पुण्य-पाप की रुचि को छोड़ देना ही उत्तम क्षमाधर्म है।

वस्तुतः दश दिनों को पर्व कहना तो उपचार है; आत्मस्वभाव की प्रतिपत्तिपूर्वक चारित्रधर्म की दश प्रकार से आराधना करना ही साधकजीव का सच्चा पर्व है। पर्व अर्थात् आराधना। उस आराधना का आरोप करके अमुक दिन को ‘पर्व’ कहना व्यवहार है किन्तु जो आत्मा अपने में आराधकभाव प्रगट करता है, उसके लिए व्यवहार से दिन को पर्व कहा जाता है। जिसे आत्मा का भान नहीं है, उसके अपने में ही पर्व नहीं है, तब फिर दिन में भी किसका उपचार किया जायेगा ?

आत्मा की पर्याय में होनेवाले पुण्य-पाप की रुचि ही अनन्त क्रोध है। ज्ञायक स्वभाव की रुचि के द्वारा उस क्रोध का नाश करना ही उत्तम क्षमापरु चारित्रदशा प्रगट होने का बीज है और स्वभाव की रुचि के पश्चात् विशेष स्थिरता द्वारा वीतरागभाव प्रगट करके, पुण्य-पाप का नाश करना, उत्तम क्षमा है। ऐसी उत्तम क्षमा मुनिदशा में होती है। आज उस उत्तम क्षमा की आराधना का दिन है।

मुनियों के तो उत्तम क्षमा की आराधना सदैव होती है। वह आराधना तो जीव जब चाहे उसी समय कर सकता है किन्तु आज विशेषरूप से उसका स्मरण करके साधक जीव उसकी भावना करते हैं।

आज माङ्गलिक रूप से आचार्य पद्मनन्दिकृत ‘पद्मनन्दिपञ्चविंशतिका’ में से उत्तम क्षमाधर्म के स्वरूप का प्रवचन होता है :-

उत्तम क्षमाधर्म

(शालिनी)
जड़जन्तुक्रतबाधा कोहाशा प्रयादावपि सति न विकारं यमनो याति साधोः।
अमल विपुलचित्तंरत्नमा सा क्षमादौ शिवपथपथिकानां सत्सहायात्ममेति ॥ ८२ ॥
मुख-अज्ञानियों के द्वारा वध, बन्धन, क्रोध, हास्य आदि किये जाएँ, तथापि साधु अपने निर्मल और गम्भीर चित्त से विकृत नहीं होते, वही उत्तम क्षमा है। ऐसी उत्तम क्षमा मोक्षमार्ग के पथिक सन्तों को यथार्थतया सहायता करनेवाली है।

उत्तम क्षमादि दश धर्मों में मुख्यतया तो चारित्र की ही आराधना है, अर्थात् इन दश धर्मों का पालन मुख्यत: मुनिदशा में ही होता है और श्रावक के गौणरूप से अपनी-अपनी भूमिका के अनुसार अंशतः होता है। मोक्षमार्ग तो दर्शन-ज्ञान-चारित्र की एकतारूप है, वह चारित्रदशा में ही होता है। सम्यग्दृष्टि जीवों के नियम से चारित्र प्रगट होता ही है, इसलिए चौथे-पाँचवें गुणस्थान में भी उपचार से मोक्षमार्ग कहा है। उत्तम क्षमा अर्थात् सम्यग्दर्शनसहित क्षमा। उत्तम क्षमा, मिथ्यादृष्टि के नहीं होती।

क्षमा के पाँच प्रकार हैं। उनमें से चार तो पुण्यबन्ध के कारणरूप हैं और पाँचवें को ‘उत्तम क्षमा’ कहा जाता है, वह धर्म है।

(१) ‘यदि मैं क्रोध करूँगा तो मुझे हानि होगी; यदि मैं इस समय सहन नहीं करूँगा तो भविष्य में मुझे अधिक हानि होगी’ – ऐसे भाव से क्षमा करना, रागपरूप क्षमा है। जिस प्रकार निर्बल मनुष्य, बलवान का विरोध नहीं करता, वैसे 'यदि मैं क्षमा करूँ तो

मुझे कोई हैरान नहीं करेगा’ – ऐसे भाव से क्षमा रखना, बन्ध का ही कारण है क्योंकि इसमें क्रोधादि करने की भावना दूर नहीं हुई। मेरा स्वरूप ही किसी प्रसङ्ग पर क्रोध करने का नहीं है, मैं तो ज्ञान करनेवाला ही हूँ – ऐसी प्रतीति के बिना कभी भी उत्तम क्षमाधर्म नहीं होता किन्तु शुभाशुभभाव होती है, वह बन्ध का कारण है, धर्म नहीं है।

(२) यदि मैं क्षमा करूँ तो दूसरे को और से मुझे लाभ होगा – ऐसे भाव से मालिक आदि की बातें (फटकार) सहन करे और क्रोध न करे तो वह भी वास्तविक क्षमा नहीं है।

(३) यदि मैं क्षमा नहीं करूँगा तो कर्मबन्ध होगा और नरकादि दुर्गति में जाना पड़ेगा, इसलिए मैं क्षमा करूँ तो कर्मबन्ध रुक जाए – ऐसे भाव से क्षमा करना भी सच्ची क्षमा नहीं है; वह क्षमा, बन्ध का कारण है।

(४) क्रोधादि न करने की वीतराग की आज्ञा है और शास्त्रों में भी वैसा कहा है; इसलिए मुझे क्षमा करना चाहिए, जिससे मुझे पापबन्ध न हो – ऐसे भावों से क्षमा धारण करना भी पराधीन क्षमा है, राग है; उसमें धर्म नहीं होता।

उपरोक्त चारों प्रकार की क्षमा, बन्ध का कारण है क्योंकि क्षमा के उन चारों प्रकारों में कहीं भी स्व-आत्मा का लक्ष्य नहीं आया किन्तु परलक्ष्य से ही राग को अल्प करके क्षमा धारण की है, वह सहज क्षमा नहीं है।

(५) उत्तम क्षमा तो सहज वीतरागतापरूप है। आत्मस्वरूप को भूलकर, पुण्य-पाप की रुचि करना ही महान क्रोध है और आत्मा

के त्रैकालिक स्वरूप की रुचि के द्वारा शुभाशुभभाव की रुचि को छोड़ देने से वीतरागी क्षमाभाव प्रगट होता है।

मुनिदशा में शरीर को सिंह-बाघ खाए जा रहा हो, फिर भी उस ओर की कोई वृत्ति ही उत्पन्न नहीं हो। अशुभवृत्ति तो नहीं किन्तु शुभवृत्ति भी उत्पन्न न हो – ऐसी आत्मा की उत्कृष्ट आनन्दमय वीतरागदशा ही उत्तम क्षमा है और वही धर्म है। उसमें दुःख नहीं, किन्तु आनन्द है।

इस गाथा में अज्ञानी जीवों को ‘जड़जन’ कहा है। जिन्हें चैतन्यस्वरूप आत्मा का भान नहीं है और रागादि को ही आत्मा मानते हैं, उन्हें परमार्थ से ‘जड़’ कहते हैं। उन अज्ञानियों के द्वारा कहे गये कठोर वचन, ज्ञानीजन स्वभावविहित रहकर सहन करते हैं – यह उत्तम क्षमा है। साधुजन, चाहे जैसे प्रतिकूल प्रसङ्गों पर भी अपने धीर-वीर स्वभाव से च्युत नहीं होते। आत्मस्वभाव की अरुचि जिसका लक्षण है – ऐसे क्रोध का त्याग करके जिन्होंने सावरकक्षा प्रगट की है और तत्पश्चात् स्वरूप-स्थिरता के विशेष पुरुषार्थ द्वारा धीर होकर ज्ञानस्वरूप में लीन हो गये हैं, उन सन्तों को बाह्य में कौन प्रतिकूल अथवा अनुकूल है, उससे प्रयोजन नहीं होता। जो अपने पूर्णरूप को स्वभाव में संयोजित करके समभावपूर्वक परिणमन करते हैं, उनके उत्तम क्षमा होती है। मोक्षमार्ग में विचरनेवाले साधुओं को यह उत्तम क्षमा सर्वप्रथम सहायक है।

आत्मा को मोक्षमार्ग में जाने के लिए कोई परपदार्थ सहायक नहीं है किन्तु उत्तम क्षमाधर्म अपनी निर्मल पर्याय ही अपने को सहायक है – ऐसा कहकर आचार्यदेव ने मङ्गलाचरण किया है।

दश धर्म प्रवचन

जिन्होंने अपने चैतन्यस्वरूप का भान द्वारा पुण्य-पाप दोनों को समान माना है और जिनके ज्ञायकदशा प्रगट हुई है, ऐसे मुनियों की चित्त धीर-वीर होता है। उनकी परिणति में अनन्त धैर्य प्रगट हुआ है, इस कारण मन में क्षोभ नहीं होता और पुरुषार्थ में वीरता है, इसलिए वे स्वभाव में स्थिर रहने का कार्य करती है। बाह्य में यदि कोई निन्दा करता है तो किसकी ? और स्तुति करता है तो किसकी ? बन्धन करता है तो किसे ? और यदि सेवा करता है तो किसकी ? यह शरीर तो मैं नहीं हूँ और मेरे आत्मा को कोई बन्धनादि के द्वारा हानि नहीं पहुँचा सकता, ऐसा भान तो सम्यग्दृष्टि को भी होता है परन्तु उसके पश्चात् विशेष पुरुषार्थ के द्वारा चारित्रदशा प्रगट होने पर विकल्प भी उत्पन्न न हो और सहजक्षमा प्रगट हो, वह उत्तम क्षमाधर्म है।

कोई जीव मुझे लकड़ी मारे और मैं सहन करूँ – ऐसा मानकर क्षमा रखना, धर्म नहीं है। इनका कारण यह है कि लकड़ी शरीर को लगती है, तथापि ‘मुझे लकड़ी लगी’ – ऐसा मानना ही मिथ्यात्व है। कोई कठिन से कठिन लकड़ी का ढेर हो सहन करना है अथवा बन्दूक की गोलियाँ मन शरीर पर बरसे, उन्हें भी सहन करना है, तथापि ऐसा मानता है कि ‘मैंने बहुत सहन किया है, इससे दूसरों का हित होगा, दूसरों के हित के लिए ही मैं क्षमा करता हूँ’ – तो ऐसा माननेवाला जीव मिथ्यादृष्टि है; उसके किञ्चित् भी धर्म नहीं है। परमार्थतः तो उसके स्वरूप को अरुचिरूप महा क्रोध विद्यमान है। ऐसे जीवों को रागपरूप क्षमा कभी भी मोक्ष की सहायक नहीं है किन्तु वह तो संसार का ही कारण है।

वीतरागी उत्तम क्षमा ही मोक्ष की सहायक है, उस उत्तम क्षमा

उत्तम क्षमाधर्म

चारित्र के द्वारा मुनिजन सम्पूर्ण वीतरागता प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। जिनके सम्यग्दर्शन होता है, उन्हें चारित्रदशा प्रगट करने के लिए अनन्त पुरुषार्थ करना शेष है। चारित्र, धर्म है। वह धर्म, वीतरागतापरूप है। सम्यक् आत्मभावपूर्वक स्वभाव के सेवन द्वारा वीतरागता प्रगट करना, आराधना है और वह मोक्षमार्ग है।

यह उत्तम क्षमा धर्म प्रगट करने के लिए प्रथम तो उपयोगस्वरूप आत्मा को क्रोधादि से भिन्न जानना चाहिए। इस पहिचान के पश्चात् ही उत्तम क्षमादि यथार्थ भावनाएँ हो सकती हैं।

शुभाशुभरागादिक में कर्तापने की रुचि ही अपने त्रैकालिक ज्ञायक स्वभाव की अरुचिरूप अनन्तानुबन्धी क्रोध है, आस्रव है। चैतन्यस्वरूप आत्मा की रुचि प्रगट करके शुभाशुभभावों की रुचि छोड़ देने से, स्वसन्मुखतासे वीतरागीभाव प्रगट होता है, वह उत्तम क्षमा है। यह उत्तम क्षमा साधक जीवों को मोक्षमार्ग में सहचरी है – यह बात प्रथम श्लोक में बतलायी है।

अब, उत्तम क्षमा से विरुद्ध क्रोधाभाव, मुनीश्वरों को दूर ही त्याग देना चाहिए, ऐसा श्री आचार्यदेव कहते हैं –
(बसन्ततिलका)
श्रामण्योपयुतरूपरुच्यनुगुणा यक्षाशा-
पत्रप्रसूतनिचितोऽपि फलाढ्यदन्त्या।
याति क्षयं क्षणत एव घनाग्रकोप-
दावानलात् त्यजत तं यतयोऽतिदूरम् ॥ ८३ ॥
श्री पद्मनन्दि आचार्यदेव कहते हैं कि सम्यग्दर्शनादि गुणों से युक्त मुनिवर पवित्र वृक्ष के समान हैं और उत्तम क्षमादि गुण उसकी

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उत्तम क्षमाधर्म

साधना, पत्र और फूलों के समान है। अल्पकाल में ही इस वृक्ष पर मोक्षरूपी फल आनेवाले हैं किन्तु यदि क्रोधरूपी दावाग्नि उसमें प्रवेश कर जाए तो वह मुनिदशारूपी वृक्ष, कुछ भी फल दिये बिना बात की बात में नष्ट हो जाता है; इसलिए हे मुनिराजो! क्रोधादि को दूर से ही त्याग दो।

यहाँ कहते हैं कि मुनिराज वृक्ष समान हैं और सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्र उसकी शाखाएँ तथा मोक्षदशा उसका फल है। उत्तम क्षमादि दश धर्म सम्यक्चारित्र के ही भेद हैं। सम्यक्चारित्ररूपी वृक्ष के बिना मोक्षरूपी फल नहीं आता। यदि इस चारित्ररूपी वृक्ष में क्रोधरूपी अग्नि लग जाए तो वह वृक्ष नष्ट हो जाता है और मोक्षफल नहीं आता। मुनिदशा मोक्ष की निकटतम साधक है। मुनि तो मोक्षफल आने की तैयारीवाला फूला हुआ वृक्ष है। मुनिराज उत्तम क्षमा द्वारा अल्पकाल में ही मोक्ष प्राप्त करते हैं। किन्तु यदि वे आत्मस्वभाव को भूल-ज्ञान सहित क्षमा से च्युत होकर क्रोध करें तो उस क्रोधरूपी अग्नि के द्वारा चारित्ररूपी वृक्ष जल जाता है; इसलिए क्रोध दूर से ही त्याग कर देने योग्य है अर्थात् क्रोध होने ही नहीं देना चाहिए।

यहाँ पर मुख्यतः मुनियों के लक्ष्य से कथन किया गया है, श्रावक-गृहस्थ भी क्रोधमुक्त हों। सम्यग्दृष्टि गृहस्थ के भी अंशतः उत्तम क्षमाधर्म होता है। विकार होते हुए भी, मेरा स्वरूप उससे रहित है - ऐसी प्रतीतिपूर्वक स्वभाव का आदर है और विकार का आदर नहीं है, इस कारण उनके उत्तम क्षमा है। स्वभाव को विकारयुक्त मानकर, विकार का आदर करना और विकाररहित ज्ञानस्वभाव का अनादर करना ही क्रोध है।

जो सम्यग्दर्शनपूर्वक विशेष स्वरूपस्थिरता करके मुनि हुए हैं, उन्हें अपने चारित्रस्वभाव में क्रोध को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। मुनिराज ने अनन्तानुबन्धी इत्यादि तीन प्रकार के कषायों को तो नष्ट कर ही दिया है और उतनी उत्तम क्षमा भी प्रगट हो गयी है किन्तु अभी संज्वलन कषाय है, उससे आत्मा के गुण की पर्याय जलती है। जो तीन कषाय दूर कर दिये हैं, उन्हें तो आने ही नहीं देना चाहिए और जो अत्यन्त मंदकषाय रह गयी है, उसे भी नष्ट करके सम्पूर्ण वीतरागता प्रगट करना चाहिए।

यहाँ पर किसी अन्य से क्षमा नहीं माँगना है। ‘भाई! आप मुझे क्षमा करना’ - ऐसा शुभापयोग, उत्तम क्षमा नहीं है। दूसरे से क्षमा माँगे किन्तु दूसरा क्षमा न दे तो क्या यह जीव स्वयं क्षमाभाव धारण नहीं कर सकता? जीव, वास्तविक क्षमा तो स्वयं अपने आत्मा को देता है। पहले आत्मा को रागयुक्त-विकारयुक्त मानकर, आत्मस्वभाव पर क्रोध किया था, उस दोष की आत्मा में इस प्रकार क्षमा माँगता है कि हे आत्मा! तुझे क्षमा हो। अब मैं तुझे क्षमा देता हूँ। तेरे अखण्ड ज्ञानस्वभाव में एक विकल्प भी नहीं होने दूँगा। हे आत्मा! क्षमा हो तेरे परमानन्दस्वभाव को। अब मैं तेरे आदर को छोड़कर, एक विकल्पमात्र का भी आदर नहीं करूँगा।

इस प्रकार ज्ञानी, स्वयं अपने स्वरूप को जानकर अखण्डानन्दस्वरूप में स्थिर होने की भावना करते हैं। उसमें जितना राग दूर होकर वीतरागभाव प्रगट हुआ, उतनी ही उत्तम क्षमा है, वह धर्म है और उसका फल मोक्ष है।

उत्तम क्षमा का पालन करने में श्री अरिहन्त गुरुवीर हैं। उन्होंने

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उत्तम क्षमाधर्म

साधकदशा में ऐसी उत्तम क्षमा ग्रहण की कि विकल्प को भी छोड़कर, वीतरागभाव धारण करके केवलज्ञान प्रगट कर लिया। श्री पार्श्वनाथ भगवान मुनिदशा में थे और वे आत्मध्यान में मग्न थे, उस समय कमठ ने आकर उपसर्ग किया परन्तु उन्होंने तो आत्मस्वरूप की एकाग्रतारूप उत्तम क्षमा धारण करके अन्तर्मुहूर्त में केवलज्ञान प्रगट कर लिया। उन्हें उपसर्ग करनेवाले कमठ के प्रति द्वेष का विकल्प भी उत्पन्न नहीं हुआ और न सेवा करनेवाले इन्द्र के प्रति राग का विकल्प ही हुआ। एकरूप स्वभाव में लीनता होने पर, सम्पूर्ण वीतरागभाव प्रगट होकर केवलज्ञान होता है। ऐसा वीतरागभाव ही उत्तम क्षमा है।

आत्मस्वरूप को समझकर, उसका बहुमान करना ही उत्तम क्षमा की आराधना का यथार्थ पर्व है। मेरा ज्ञानस्वभाव अन्तरङ्ग में सहज समभावस्वरूप है; क्रोध को मैं मुझमें हूँ ही नहीं - इस प्रकार अपने स्वभाव और क्रोध के भेदज्ञानपूर्वक स्वभाव की एकाग्रता, सहज क्षमा है और वही धर्म है। जो आत्मा अपने में ऐसा क्षमाभाव प्रगट करता है, वही इस पर्व की यथार्थ आराधना करनेवाला है।

अब, यह बतलाते हैं कि उत्तम क्षमा को धारण करनेवाले धर्मात्मा कैसी भावना करते हैं? -

(शार्दूलविक्रीडित)
तिष्ठाम्यद्य वमुच्यवल्लेन मनसा रागादिदोषोज्झिताः
लोकः किञ्चिदपि स्वकीयहृदये स्वेच्छाचरो मन्यताम्।
साधुत्वा शुद्धिगृहेतिहात्मनः शमवतामग्रेश्वरा दिष्टया
मित्रोणापि किमप्यशोचितफलार्थः स्वयं लप्यते ॥ ८४ ॥

धर्मात्मा जीव, उत्तम क्षमाधर्म का चिन्तवन करते हुए ऐसी भावना करते हैं - यह स्वेच्छाचारी लोक अपने हृदय में मुझे भला अथवा बुरा, जो चाहे माने किन्तु मैं तो राग-द्वेष रहित होकर अपने उज्ज्वल ज्ञान में ही स्थित रहूँगा। उत्तम क्षमा के धारक पुरुषों को मात्र अपने आत्मा की शुद्धि ही साध्य है। इस जगत में अन्य कोई मेरा हित हो अथवा मित्र हो, इससे मुझे क्या? वैरी या मित्र मेरा तो कुछ भी नहीं कर सकते। जो द्वेषरूप या प्रीतिरूप परिणाम करेगा, उसे स्वयं ही उसका फल मिल जाएगा।

धर्मात्मा भावना करता है - मेरे स्वभाव में राग-द्वेष नहीं है। मित्र के प्रति राग अथवा शत्रु के प्रति द्वेष करना, हमारे हृदय में नहीं है। वास्तव में तो इस संसार में कोई किसी का शत्रु या मित्र है ही नहीं। यह स्वेच्छाचारी लोक मुझे भला कहे या बुरा, इससे मुझे क्या? कोई भी वैरी मेरे आत्मा को हानि पहुँचाने में समर्थ नहीं है और न कोई भक्त मेरे आत्मा को लाभ कर सकता है। यदि भक्तजन भक्ति करते हैं तो अपने शुभराग के कारण और यदि वैरी निन्दा करते हैं तो अपने द्वेष परिणाम के कारण ही करते हैं। मैं तो दोनों का जाननेवाला हूँ; मेरे ज्ञान में तो दोनों ज्ञेयरूप हैं। इस प्रकार अपने ज्ञानस्वभाव की भावना के बल से ज्ञानी सन्तों के राग-द्वेष रहित क्षमाभाव होता है, वही उत्तम क्षमाधर्म है।

जिसने अपने ज्ञानस्वभाव की भावना नहीं की हो, उस जीव के कदाचित् बाह्य में शुभरूपिणाम दिखाई देते हों किन्तु वह शुभरूपिणाम को आत्मा का स्वरूप मानकर, निज ज्ञानस्वभाव के अनादररूप अनन्त क्रोधभाव का सेवन करता है। वस्तुतः सम्यग्दर्शनसहित क्षमा ही उत्तम क्षमा है और वही धर्म है।

दश धर्म प्रवचन

अथवा, विशेषरूप से यह बतलाते हैं कि उस उत्तम क्षमाधर्म को धारण करनेवाला धर्मात्मा कैसा चिन्तवन करता है? -

(मम भवतु)
दोषानाधाय लोके मम भवतु सुदीर्घं दुर्जनश्रेढनार्थी
मृत्युर्वै गच्छतुल्लिप्तृष्वपि सहसा जीवितं स्थानमद्यः।
मध्यस्थत्वेऽवमेवाखिलमिह जगजावतो सौख्यराशिः
मातो बुद्ध्याऽक्षयि कथमपि कस्यचिच्चूलुकैरोमि ॥ ८५ ॥

मेरे दोषों को लगाकर समस्त प्रगट करके संसार में दुर्जन सुखी हों; धन के लोभी मेरा सर्वस्व ग्रहण करके सुखी हों; शत्रु मेरा जीवन लेकर सुखी हों, जिसे मेरा स्थान लेना है, वह स्थान लेकर सुखवर्द्धक रहे, तथा जो राग-द्वेष रहित मध्यस्थ होकर रहना चाहे, वे मध्यस्थ रहकर सुखी रहें, इस प्रकार समस्त जगत् सुखपूर्वक रहे किन्तु किसी भी संसारी जीव को मुझसे दुःख न पहुँचे, मैं ऐसी प्रकार सबके समक्ष करता हूँ।

मैं इसमें समस्त संसार के जीवों से निरपेक्ष होकर, अपने आत्मा में वीतरागभाव से रहने की भावना है। मेरे ज्ञान में राग-द्वेष करने का स्वभाव ही नहीं है। मुनिराज स्वयं अपने आत्मा की आराधना को उग्रता करते हुए पुकार करते हैं कि - इस जगत का जीव जिसमें उन्हें सुख मिले, वैसा ही करे किन्तु मैं अपने ज्ञाताभावरूप क्षमा को नहीं छोडूंगा। कोई मेरे दोष बतलाकर या पिच्छी-कमण्डल लेकर अथवा स्थान लेकर, भले ही सुख माँगे और अन्य कोई वीतरागभावरूप रहकर ही किन्तु मुझे दोनों के प्रति समभाव है। समस्त जगत् सुखी रहे - ऐसी भावना है। जगत् का कोई भी जीव दुःखी हो -

उत्तम क्षमाधर्म

ऐसी भावना नहीं है। इस प्रकार वास्तव में वे स्वयं वीतरागरूप रहना चाहते हैं।

मुनियों के पास धन इत्यादि तो होता ही नहीं किन्तु पिच्छी-कमण्डल अथवा पुस्तक होती है। यदि कोई उसे ले जाता है तो भले ही ले जाए। पिच्छी-कमण्डलादि मेरे नहीं हैं और उन्हें ले जानेवाले के प्रति मुझे द्वेष नहीं है, मैं तो ज्ञायक हूँ। मुझे वीतरागभावरूप से मध्यस्थ रहनेवाले ज्ञानियों के प्रति राग नहीं है और प्राणाघात अज्ञानियों के प्रति द्वेष नहीं है। मेरे निमित्त से कोई जीव दुःखी न हो; मैं तो जगत में जो कुछ होता है, उसे जानता हूँ और अपने आत्मा के वीतरागभाव में स्थिर रहूँ - यही भावना है। इस प्रकार यहाँ सम्पूर्ण परिग्रहिरहित ज्ञायकभाव की भावना की पुकार है।

मुनिदशा में स्वरूपानुभव की एकाग्रता में स्थिर होकर क्रोधादिभाव उत्पन्न ही नहीं होने देना, उत्तम क्षमा है।

गृहस्थ के क्रोधादिभाव होते अवश्य हैं किन्तु क्रोधादिभाव होने पर भी ‘मेरा ज्ञानस्वरूप इन क्रोधादिभावों से भिन्न है, मेरे स्वरूप में क्रोध नहीं है; वास्तव में मेरा ज्ञान तो क्रोध भी ज्ञाता है’ - इस प्रकार क्रोध से भिन्न अपने ज्ञानस्वरूप को श्रद्धा-ज्ञान-स्थिरता रखना, उत्तम क्षमा है।

जो राग को अपना स्वरूप मानता है, वह अपने आत्मा को हिंसा करनेवाला अनन्त क्रोधी है। यहाँ पर मुख्यतः तो मुनिदशा के धर्म की बात है किन्तु इसमें गोणरूप से सम्यग्दृष्टि श्रावक की भावना भी आ जाती है - ऐसा जानना चाहिए।

अब, इस अन्तिम श्लोक में कहते हैं कि वीतरागभाव को

उत्तम क्षमाधर्म

बात यही नहीं है। ‘समस्त पर जीव अपने को क्षमा करें, तभी क्षमा कहलाती है’ – यदि ऐसा हो तो जब तक अन्य जीव क्रोध को दूर करके क्षमाभाव नहीं करें, तब तक अपने को भी वीतरागी क्षमाभाव नहीं हो सकेगा अर्थात् तब तो क्षमा पराधीन हुई किन्तु परधीनता में तो कभी भी धर्म नहीं हो सकता।

यहाँ तो स्वयं अपने ज्ञानस्वभाव को रागादि विकारों से भिन्न जानकर, चाहे जैसे अनुकूल या प्रतिकूल संयोगों में राग-द्वेष नहीं करना और वीतरागी ज्ञाताभावस्वरूप से स्थिर रहना ही उत्तम क्षमा है, वह स्वाधीन है। परजीव क्षमा दे या न दे, तो भी यह जीव स्वयं अपने में उत्तम क्षमाभाव प्रगट कर सकता है।

यहाँ तो मुनिदशा में शुभ या अशुभ विकल्प की उत्पत्ति होना भी उत्तम क्षमा में भङ्ग है। उसका अभाव करके वीतरागभाव की भावना करते हुए मुनिवर स्वयं अपने को सम्बोधन करके कहते हैं – रे आत्मा! तू अज्ञानी जीवों द्वारा किये गये उपसर्गों से दुःखित होकर क्लेश करता है तो क्या तू त्रिलोक पूज्य अपने उत्तम क्षमा को नहीं जानता? कि जिससे तू वीतरागता को छोड़कर ऐसा द्वेषभाव करता है?

मात्र वीतरागभाव ही उत्तम क्षमाधर्म है। मैं वीतराग होऊँ और राग को दूर कर दूँ – ऐसे विकल्प की भी यहाँ मुख्यता नहीं है। विकल्प क्षमा नहीं है किन्तु स्वभाव की एकाग्रता में वीतरागस्वरूप से परिणमित हो जाना और राग-द्वेष की उत्पत्ति ही न होने देना, उत्तम क्षमा है। जितने रागादि के विकल्प उत्पन्न होते हैं, उतना उत्तम क्षमा में भङ्ग पड़ता है – ऐसा उत्तम क्षमाधर्म का स्वरूप है। उसका

दश धर्म प्रवचन

छोड़कर यदि राग-द्वेष की वृत्ति उत्पन्न होती हो तो स्वभाव की उग्र भावना द्वारा उस वृत्ति को नष्ट कर देना चाहिए, वह उत्तम क्षमा है।
(शार्दूलविक्रीडित)
कि जानासि न वीतरागमखिलं त्रैलोक्यचूडामणिं
किं तद्धर्ममुपाश्रितं न भवता किंवा न लोकोऽङ्गनाः।
मिथ्यादृष्टिभरस्रजेनरपट्टभिः किञ्चिन्कृतीपस्ववात्
यत्कर्माञ्जनहे तुमस्थिरतया बाधां मनो मन्यसे ॥ ६८ ॥

अपने स्वरूप की वीतरागी स्थिरता में से बाहर निकलकर पर-सन्मुख वृत्ति होने पर, किञ्चित् राग या द्वेष का विकल्प उठे तो उसे तोड़कर, सम्पूर्ण वीतरागता प्रगट करने के लिए स्वयं अपने को सम्बोधन कर कहते हैं कि रे मन! मिथ्यादृष्टि दुर्जन मूर्खजनों द्वारा किये जानेवाले उपसर्गों से बञ्चल होकर, कर्म आने में कारणभूत वेदना का तू अनुभव करता है, तो क्या तू अपने त्रिलोक में सर्वश्रेष्ठ पूजनीय वीतरागभाव को नहीं जानता? तथा तूने जिस धर्म का आश्रय ग्रहण किया है, क्या तू उस धर्म को नहीं जानता? और यह समस्त लोक अज्ञानी-जड़ है, क्या इस बात का तुझे ज्ञान नहीं है? अर्थात् तीन लोक में वीतरागभाव ही सर्वश्रेष्ठ है – ऐसा जानकर, सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक, वीतरागभावस्वरूप चारित्र ही धर्म है, उसे पहचानकर और यह लोग जड़-मूर्ख हैं – ऐसा समझकर; हे जीव! तू मूर्ख अज्ञानियों द्वारा किये जानेवाले उपसर्गों से अपने वीतरागभाव को मत छोड़; राग-द्वेष करके दुःखी मत हो!

पर जीवों के साथ उत्तम क्षमा का सम्बन्ध नहीं है। पर जीवों को क्षमा करना अथवा पर जीव अपने को क्षमा करें – ऐसी क्षमा की

दश धर्म प्रवचन

उत्तम क्षमाधर्म

किं जानासि न वीतरागमख्लिं त्रैलोक्यचूड़ामणिं

किं तद्धर्ममुपाश्रितं न भवता किंवा न लोको जड़ः ।

मिथ्यादृग्भिरसजनैरपटुभिः किञ्चित्कुतोपद्रवात्

यत्कर्मार्जनहे तुमस्थिरतया बाधां मनो मन्यसे ॥ ८६ ॥

सम्पूर्ण रूप से पालन न कर सके तो भी उसके यथार्थ स्वरूप को पहिचानकर, श्रद्धा-ज्ञान करना और जो रागादिभाव होते हैं, उनका आदर नहीं करना भी उत्तम क्षमाधर्म का अंश है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान में अखण्ड चैतन्यस्वभाव की ओर का बल स्थिर रहते हुए जितने अंश में क्रोधदिभाव न हों, उतने अंश में सहज क्षमा है।

इस श्लोक में आचार्यदेव ने लोगों को जड़ कहा है। वहाँ लोगों पर द्वेष नहीं है किन्तु अपनी आराधकता की उग्रता है। अपना ज्ञान केवलज्ञान होने के लिए उछल रहा है, लोग क्या कहते हैं ? यह देखने की आवश्यकता नहीं है। लोग तो जड़समान हैं, वे तो चाहे जो कहेंगे किन्तु हे मुनि ! केवलज्ञान प्राप्त करने की तत्परता में तुझे जो भी उपसर्ग आएँ, उनके सन्मुख क्या देखना है ? तुझे अपने में जो शुभ विकल्प उत्पन्न होते हैं, उनका भी बल नहीं है और अपनी पर्याय के सन्मुख भी तुझे नहीं देखना है किन्तु मात्र ज्ञायकस्वभाव पूर्ण है, उसी में लक्ष्य करके लीन हो जाना है। इस प्रकार अपने ज्ञायकस्वभाव की भावना के बल से चैतन्य समुद्र फटकर मानों इसी समय केवलज्ञान होगा — ऐसी दशा मुनिराज के प्रवर्तमान है। मुझ में पूर्ण ज्ञायकत्व है, इसलिए मैं पूर्ण ज्ञायक रहकर समस्त जीवों के प्रति क्षमा करता हूँ; सबके प्रति जो राग-द्वेष है, उसे छोड़कर मैं वीतरागभाव से अपने स्वभाव में रहता हूँ; मुझे पर की उपेक्षा है और स्वभाव की एकाग्रता है। इस प्रकार अपने ज्ञायकस्वभाव की रुचि और एकाग्रता करके, आराधना करना ही महान पर्व है। पर में लक्ष्य जाकर कल्पना उत्पन्न हो कि ‘ऐसा क्यों ?’ उत्तम क्षमाधर्म

अथवा उपसर्ग पर लक्ष्य जाए कि मैं उपसर्ग सहन करूँ – यदि ऐसी वृत्ति उत्पन्न होती हो तो उसे तोड़ने के लिए कहते हैं कि अरे मुनि ! स्वभाव की एकाग्रता द्वारा तुझे केवलज्ञान क्यों नहीं और यह वृत्ति का उत्थान क्यों है ? इस प्रकार अप्रतिहतभाव से आराधना को स्थिर रखना मुनि की उत्तम क्षमा है।

उत्कृष्ट प्रयत्न करना चाहिए

इस जन्म-मरणरूप संसार में अनन्तकाल से

परिभ्रमण करता हुआ जीव मनुष्य पर्याय प्राप्त करता है अथवा नहीं भी करता अर्थात् उसे वह मनुष्य पर्याय

अत्यन्त कठिनाई से प्राप्त होती है। यदि कदाचित् वह

मनुष्यभव प्राप्त कर भी ले तथापि नीचकुल में उत्पन्न होने से उसका वह मनुष्य भव पापाचरणपूर्वक ही नष्ट

हो जाता है। यदि किसी प्रकार उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ तब भी वहाँ वह या तो गर्भ में ही मर जाता है अथवा

बाल्यावस्था में भी शीघ्र मरण को प्राप्त करता है, इससे भी धर्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। पश्चात् आयु की

अधिकता में वह धर्म प्राप्त हो जाय तो उसके विषय में उत्कृष्ट प्रयत्न करना चाहिए।

— श्री पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका

उत्तम मार्दवधर्म

ध्यानस्थ मुनिराज बाहुबली के चरणों में आकर भरत

चक्रवर्ती ने उनकी पूजन की, तब भी बाहुबली ने गर्व न करते हुए, निज ध्यान में स्थिर रहकर तत्क्षण ही केवलज्ञान प्राप्त किया। जिन्होंने निर्मल भेदज्ञान के द्वारा सम्पूर्ण जगत को अपने से भिन्न और स्वप्नवत् जाना है और जो आत्मभावना में ही तत्पर हैं, उन्हें जगत के किसी भी पदार्थ में गर्व का अवकाश कहाँ है?

जिनका चित्त रत्नत्रय की आराधना में ही तत्पर है – ऐसे मुनि भगवन्तों को चक्रवर्ती नमस्कार करे तो भी मान नहीं होता है और किसी के द्वारा तिरस्कार करने पर दीनता भी नहीं होती है – ऐसे निर्मान मुनि भगवन्तों को नमस्कार हो। पञ्च परमेष्ठी आदि धर्मात्माओं एवं गुणीजनों के प्रति बहुमानपूर्वक विनय करना भी मार्दवधर्म का एक प्रकार है। हे सन्तों! हमें भी उत्तम मार्दवधर्म की आराधना प्रदान करो।

उत्तम मार्दवधर्म

आज दशलक्षण पर्व का दूसरा दिन है। कल उत्तम क्षमाधर्म का दिन था, आज उत्तम मार्दवधर्म का दिन है। सनातन जैनधर्म के अनादिनियम के अनुसार इन भादव सुदी ५ से १४ तक से दश दिनों को ‘दशलक्षण पर्व’ कहते हैं और वही सच्चा पर्यूषण है। आज उत्तम मार्दवधर्म का दिन होने से ‘पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका’ शास्त्र से उसका वर्णन हो रहा है। उसके वर्णन के दो श्लोक हैं। उत्तम मार्दव अर्थात् उत्तम निरभिमानता । सम्यग्दर्शनसहित निरभिमानता, उत्तम मार्दवधर्म है। उत्तम क्षमा, मार्दव आदि दश धर्म सम्यग्दर्शनयुक्त जीव के ही होते हैं — ऐसा ध्यान रखना चाहिए। ( बसंततिलका )

धर्माङ्ग मेतदिह मार्दवनामधेयं

जात्यादिगर्वर्पारहारमुशन्ति सन्तः ।

तद्धार्यते किमुत बोधदृशा समस्तं

स्वप्नेन्द्रजालसदृशं जगदीक्षमाणैः ॥ ८७॥

अर्थ :- उत्तम जाति, कुल, बल, ज्ञान इत्यादि के अभिमान का त्याग, वह मार्दव है। यह मार्दव, धर्म का अङ्ग है। जो अपनी सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से समस्त जगत को स्वप्न तथा इन्द्रजाल की भाँति देखते हैं, वे उत्तम मार्दवधर्म को धारण क्यों नहीं करेंगे ? अर्थात् अवश्य धारण करते हैं।

दश धर्म प्रवचन

यहाँ मुख्यतः मुनि की अपेक्षा से कथन है। उत्तम क्षमादि दश धर्म सम्यक्चारित्र के ही भेद हैं; सम्यग्दर्शन के बिना वे धर्म नहीं होते। आत्मा, शरीर-मन-वाणी की क्रिया नहीं करता क्योंकि आत्मा उनसे भिन्न ही है। दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादि का शुभराग भी धर्म नहीं है और न वे भाव धर्म में सहायक ही हैं। आत्मा चैतन्यस्वरूप है, विकाररहित है – ऐसे अपने निश्चय स्वभाव की प्रतीति के द्वारा सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन प्रगट करने के पश्चात्, विशेष स्वरूपस्थिरता से चारित्रदशा प्रगट होती है। उस दशा में धर्मी जीव को ऐसी आत्मस्थिरता होती है कि जाति, कुल आदि के

अभिमान का विकल्प भी उत्पन्न नहीं होता – इसका नाम उत्तम मार्दवधर्म है।

जो चैतन्यस्वरूप आत्मा को नहीं पहिचानता और शरीर, कुटुम्ब, कुल, धन आदि को अपना मानता है, उसके कभी भी जातिमद

आदि दूर नहीं होते और उत्तम मार्दवधर्म नहीं होता। धर्मात्मा जीव के वास्तव में जाति, कुल, धन इत्यादि का मद नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि मैं तो चैतन्यस्वरूप आत्मा हूँ, आत्मा के शरीर ही नहीं है और माता-पिता, कुल-जाति, धन इत्यादि भी आत्मा के नहीं हैं; इस प्रकार अपने सम्यग्ज्ञान द्वारा समस्त संसार को अपने से भिन्न देखनेवाले को निरभिमानता क्यों नहीं होगी ? अवश्य होती है। आत्मा की जाति शुद्ध चैतन्यधातु नित्य आनन्दकन्द है। वीतरागता आत्मा का कुल है और आत्मा स्वयं केवलज्ञानरूप चैतन्य लक्ष्मी का स्वामी है। इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी जाति, कुल, लक्ष्मी को ज्ञानी अपना नहीं मानते; इस कारण उन्हें उसका अभिमान भी नहीं होता। ज्ञानी को शरीर या शरीर सम्बन्धी कोई भी पदार्थ अपनेरूप उत्तम मार्दवधर्म

भासित नहीं होते। राग अथवा अपूर्णज्ञान को भी वे अपना स्वरूप नहीं मानते, अपितु परिपूर्ण स्वभाव को ही अपना मानकर, उसकी श्रद्धा करते हैं; इसलिए ज्ञानी के जातिमद, कुलमद, ज्ञानमद या बलमद नहीं होता। उन्होंने जाति कुलादि को अपने से भिन्न जाना है; इसलिए उनका अभिमान नहीं होता। इस प्रकार सम्यग्ज्ञान ही उत्तम मार्दवधर्म का मूल है – ऐसा यहाँ बतलाया है।

जाति-कुल आदि से भिन्न अपना चैतन्यस्वरूप जानने के पश्चात् भी सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा गृहस्थ को अस्थिरता के कारण कुलमद इत्यादि की वृत्ति तो उठती है किन्तु उस धर्मात्मा को रागरहित स्वभाव में एकता के बल के कारण उसका निषेध वर्तता है। वह राग को अपना स्वरूप नहीं जानता। उसे राग का आदर नही है, अपितु स्वभाव का ही आदर है; इसलिए परमार्थतः तो वह सम्यग्ज्ञान के द्वारा उस वृत्ति का भी ज्ञाता ही है। इसलिए यथार्थतः धर्मी जीवों को जाति आदि मद नहीं होते हैं।

धर्मी जीव को, माता-पिता से अथवा कुल-जाति इत्यादि से पहिचानना भी ठीक नहीं है किन्तु उसके अन्तरङ्ग के श्रद्धा-ज्ञान के द्वारा पहिचानना ही यथार्थ है। धर्मी जीव किसी भी बाह्य पदार्थ से अपना बड़प्पन नहीं मानते। वे तो स्वभाव के सम्यक्श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक अभेदता होकर जितना राग दूर हो गया, उतना बड़प्पन है और जितना राग शेष रहा, उतनी हीनता है – ऐसा जानते हैं। बाह्य पदार्थों से अपने को बड़ा मानना मद है और मेरी जाति हल्की, मेरा कुल नीचा, इत्यादि प्रकार से बाह्यपदार्थों से अपने को हीन मानना भी मद ही है क्योंकि ऐसी मान्यतावाले ने जाति-कुल आदि में अहंपना / मैंपना किया है।

दश धर्म प्रवचन

यहाँ तो सर्व प्रथम सम्यक्श्रद्धा-ज्ञान करने के पश्चात्, विशेष पुरुषार्थ द्वारा स्वरूपस्थिरता प्रगट करके, सन्त-मुनिदशा में जाति - कुल आदि का विकल्प तोड़कर, वीतरागी स्थिरता बढ़ाने की बात है।

उत्तम निरभिमानता किसे किसे कहते हैं ? कहाँ से हो सकता है ? आत्मा नित्य ज्ञानघन है; देहादि अनित्य संयोग आत्मा का स्वरूप नहीं है। जिस प्रकार ‘घी का घड़ा’ – ऐसा बोला जाता है किन्तु वह यथार्थ वस्तुस्वरूप नहीं है; उसी प्रकार ज्ञानी को पहिचानने के लिए ऐसा कहा जाता है कि यह माता-पिता, यह कुल, यह जाति किन्तु वास्तविक स्वरूप ऐसा नहीं है। ज्ञानी को उसकी आत्मा से पहिचानना ही यथार्थ पहिचान है।

आत्मा का संसार, माता-पिता, स्त्री, शरीरादि में नहीं, अपितु अपनी पर्याय में जो अज्ञान और राग-द्वेष है, वह संसार है। आत्मा का संसारभाव आत्मा की दशा में ही है। अज्ञानी जीव भ्रम से ऐसा मानता है कि यह मेरी माता, यह मेरे पिता इत्यादि । उसका यह भ्रम ही संसार है। अज्ञानी जीव स्वयं अपने को चैतन्यस्वरूप से नहीं जानता; अपने को शरीरयुक्त मानता है। इससे शरीर के सम्बन्धी माता-पिता को ही अपने माता-पिता मानता है और इसी कारण जीव को शरीर के रूप इत्यादि का अभिमान होता है।

वास्तव में तो आत्मा स्वयं चैतन्यस्वरूप है और माता-पिता इत्यादि का आत्मा भी चैतन्यस्वरूप है; कोई आत्मा शरीररूप नहीं है, तब फिर कौन किसके माता-पिता और कौन किसका पुत्र ? जिनके ऐसी दृष्टि है, उन्हीं के पर का अहङ्कार दूर होता है। यह शरीर उत्तम मार्दवधर्म

तो जड़ परमाणु है-मिट्टी है। जो जीव शरीर के बल का अभिमान करता है, वह जड़ का स्वामी बनता है। मैं सदा ही शरीर से भिन्न चैतन्यस्वरूपी अरूपी स्वभाव हूँ - ऐसा उसे भान नहीं है। निज चैतन्यस्वरूप का अनादर करके, शरीर के बल इत्यादि का अहङ्कार करनेवाला जीव महान हिंसक है। शरीर मेरा है, शरीर की क्रिया मैं करता हूँ और शारीरिक शक्ति अच्छी हो तो धर्मध्यान बराबर हो सकता है - ऐसा माननेवाला जीव आत्मा की हिंसा करनेवाला है। वस्तुतः आत्मा शरीरादि का कुछ भी नहीं कर सकता। आत्मा का बल अर्थात् पुरुषार्थ या तो अज्ञानभाव से पुण्य-पाप में अटक जाता है या असङ्ग स्वभाव को जानकर उसमें राग-द्वेष रहित स्थिरता प्रगट करता है।

ज्ञानी जीव जानता है कि मात्र पूर्ण ज्ञान और आनन्द ही मेरा रूप है। जाति, कुल, शरीर, बल, विद्याएँ अथवा अपूर्णज्ञान – ये कोई भी मेरा रूप नहीं है। जहाँ ऐसा भिन्नत्व यथार्थतया जाना, वहाँ पर का अहङ्कार दूर हो गया। पश्चात् जो अल्पराग की वृत्ति उत्पन्न होती है, उसका भी ज्ञानी के निषेध है। यहाँ ऐसी बात है कि उस रागवृत्ति को उत्पन्न ही नहीं देना और वीतरागरूप स्थिर रहना, उत्तम मार्दवधर्म है और वह धर्म मोक्षमार्ग में विचरनेवाले मुनियों को सहचररूप होता है।

जैन अर्थात् जीतनेवाला। जिसने आत्मा का पर से भिन्न स्वरूप जानकर, मिथ्यात्व-अज्ञान को जीत लिया है अर्थात् नष्ट किया है तथा जिसने आत्मस्वरूप में स्थिरता द्वारा राग-द्वेष को जीत लिया है, वही जैन है। जो जैन होता है, वह ‘मैं पर का करता हूँ’ – ऐसा दश धर्म प्रवचन

मिथ्या अभिमान नहीं करता और राग-द्वेष को अपना स्वरूप नहीं मानता ।

ज्ञानियों के ज्ञानमद नहीं होता। शास्त्र का ज्ञान या अवधि, मनःपर्ययज्ञान हो, उसका ज्ञानी को अभिमान नहीं होता। जिन्होंने पूर्ण ज्ञानस्वभाव ही जाना है, उन्हें अपूर्ण ज्ञान में सन्तोष या उसका अभिमान कैसे होगा ? बारहवें गुणस्थान तक का समस्त ज्ञान अल्प है, केवलज्ञान के अनन्तवें भागमात्र है। उस तुच्छ पर्याय का ज्ञानी को अभिमान नहीं है किन्तु वे तो अनन्त चैतन्यस्वभाव की महिमा और विनय से स्वभाव में लीन होकर, अपूर्णज्ञान का विकल्प छोड़कर केवलज्ञान प्रगट करते हैं। थोड़े से शास्त्र पढ़कर अथवा थोड़ा सा सुनकर, ‘मैं बहुत जानता हूँ’ – जिसे ऐसा अभिमान होता है, वह जीव पर्यायदृष्टिवाला मिथ्यादृष्टि है, उसने पूर्णस्वभाव को नहीं जाना है; इसलिए उसे किञ्चित् जानपने की महिमा और अभिमान होता है।

कोई जीव सत्स्वभाव की समझ के बिना, मन्दकषाय करके

निरभिमानता रखे तो वह पुण्यबन्ध का कारण है, यहाँ उसकी बात नहीं है। यहाँ तो धर्मात्मा को स्वभाव की जागृतिपूर्वक वीतरागभाव प्रगट होने से मद का विकल्प ही नहीं होता, वही सच्चा मार्दवधर्म है, उसकी बात है। स्वभाव को जाने बिना पर्याय का अभिमान दूर नहीं होता है और न उत्तम मार्दवधर्म होता है।

इन दश धर्मों का वर्णन करनेवाले श्री पद्मनन्दि आचार्य महान सन्त-मुनि हैं, छट्टे-सातवें गुणस्थान में झूल रहे हैं, उन्हें प्रचुर वीतरागता प्रगट हुई है और अल्पराग रह गया है। इस कारण वे कहते हैं कि उत्तम मार्दवधर्म

अहो ! सिद्ध भगवान का गुणगान हम क्या कर सकते हैं ? हमारा ज्ञान अत्यन्त अल्प है; हम तो मूढ़मति-जड़बुद्धि हैं। जहाँ तक पूर्ण केवलज्ञान / परमात्मदशा को प्राप्त नहीं किया, वहाँ तक पामरता है। यद्यपि आचार्य-सन्त तो महा ज्ञान के सागर हैं, अगाध बुद्धिवाले हैं, तीव्र आराधकदशा प्रगटी है, तथापि उनके कितनी निरभिमानता है ? वे ज्ञान का किञ्चित् भी गर्व नहीं करते हैं। अपूर्ण और पूर्णदशा के विकल्प को तोड़कर बारम्बार स्वरूप में लीन हो जाते हैं — इसका नाम मार्दवधर्म है।

पर्यायदृष्टि को छोड़कर, अखण्डस्वभाव के श्रद्धा-ज्ञान को स्थिर रखना, यह गृहस्थ का धर्म है किन्तु शुभराग करना या पूजा- भक्ति करना, वह कहीं गृहस्थ का धर्म नहीं है। अशुभराग से बचने के लिए धर्मी गृहस्थ के पूजा-भक्ति इत्यादि का शुभराग होता अवश्य है किन्तु वह शुभराग, धर्म नहीं है; अपितु रागरहित चैतन्यस्वभाव की श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक जितना राग दूर हुआ, उतना धर्म है। जो राग रहा, वह धर्म नहीं है।

ज्ञानी अपने ज्ञायकस्वरूप में जागृत है। मेरे स्वरूप में मान - अपमान की वृत्ति नहीं है; यह समस्त संसार इन्द्रजाल के समान और स्वप्नवत् है अर्थात् मेरे स्वभाव में समस्त जगत का अभाव है; जगत में किसी के साथ मेरा सम्बन्ध ही नहीं है — ऐसा जाननेवाले ज्ञानियों के मान कहाँ से होगा ? अर्थात् नहीं होगा। मुनि के तो मान की वृत्ति ही नहीं उठती, यह निरभिमानता है और ज्ञानी गृहस्थ के किसी मानादि की वृत्ति हो जाये तो भी वह उसका ज्ञाता ही है। उसे मानादि से भिन्न आत्मस्वरूप के श्रद्धा-ज्ञान की दृढ़ता होती है। मैं दश धर्म प्रवचन

नित्य अबन्ध चैतन्यस्वभाव हूँ – ऐसे स्वभाव की प्रभुता के समक्ष ज्ञानी को अपूर्ण पर्याय की पामरता भासित होती है, उन्हें क्षणिक पर्याय का अभिमान नहीं होता। उनको ही स्वभाव के आश्रय से वीतरागभाव होने पर उत्तम मार्दवधर्म होता है।

अब, कहते हैं कि स्व-पर के भिन्नत्व के विवेक द्वारा शरीर की अनित्यता का चिन्तवन करनेवाले मुनियों को किसी भी पदार्थ में अहङ्कार करने का अवसर ही नहीं मिलता –

( शार्दूलविक्रीड़ित )

कास्था सद्द्मनि सुन्दरेऽपि परितो दंदह्यमानेऽग्निभिः कायादौ तु जरादिभिः प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम् ।

इत्यालोचयतो हृदि प्रशमिनः शश्वद्विवेकोज्ज्वले

गर्वस्यावसरः कुतोऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि ॥ ८८ ॥ जैसे कोई महल अत्यन्त सुन्दर, शोभायमान हो किन्तु यदि वह सब ओर से अग्नि द्वारा सुलग रहा हो तो उसके बचने की अंशमात्र आशा नहीं है, वैसे ही यह शरीर वृद्धावस्थासहित है तथा प्रतिदिन एक अवस्था छोड़कर दूसरी अवस्था धारण करता है। इस प्रकार अपने हृदय में निरन्तर सम्यग्ज्ञानरूपी उज्ज्वल विवेक से शरीर की अनित्यता का चिन्तवन करनेवाले मुनि को जगत के समस्त पदार्थों में गर्व करने का अवसर ही किस प्रकार है ? अर्थात् जो ध्रुव नित्य चैतन्यस्वभाव को जानकर और शरीर की अनित्यता को समझकर, निर्मल आत्मध्यान में मग्न हैं, उन मुनियों को जगत में किन्ही भी पदार्थों का गर्व होता ही नहीं।

अत्यन्त मनोहर उद्यानयुक्त भवन हो, वह चारों ओर से अग्नि में

उत्तम मार्दवधर्म

जलने लगे और उसके बचने की किञ्चित्मात्र आशा न हो तो लोग उसका स्वामित्व छोड़कर बाहर भागते हैं – ऐसा अनित्यता का दृष्टान्त देकर, आचार्यदेव समझाते हैं कि यह शरीर अनित्य है, वृद्धावस्थायुक्त है, निरन्तर अपनी दशा को परिवर्तित करता हुआ जीर्णता को प्राप्त होता है; जैसी अवस्था आज है, वैसी कल दिखलाई नहीं देती – ऐसे इस अनित्य शरीर को किसी भी प्रकार से रोका नहीं जा सकता। जहाँ यह शरीर ही अपना नहीं है, वहाँ अन्य कौन से पदार्थ अपने हो सकते हैं ? आत्मा का चैतन्यस्वभाव ही ध्रुव और नित्य एकरूप है, वह कभी जीर्ण नहीं होता और उसमें अग्नि भी नहीं लगती। इस प्रकार शरीरादि की अनित्यता और अपने

चैतन्यस्वभाव की नित्यता का अपने अन्तरङ्ग में भेदज्ञान द्वारा विचार करनेवाले जीवों को, इस जगत में किसी भी पदार्थ के प्रति गर्व होने का अवकाश ही नहीं है। जहाँ शरीर को ही पर जान लिया, वहाँ अन्य किस का अहङ्कार करेगा ?

शरीर अपने स्वभाव से ही निरन्तर एक अवस्था को बदलकर

दूसरी अवस्था धारण करता है। शरीर की वृद्धावस्था हुई, उसका कर्ता आत्मा नहीं है। धर्मी जीव को शरीर की किसी भी अवस्था का अहङ्कार नहीं है, क्योंकि आत्मा स्वयं तो अरूपी चैतन्यस्वरूप है और शरीर जड़-परमाणुओं से निर्मित है। आत्मा ने कभी भी शरीरादि का स्पर्श नहीं किया, वह तो अस्पर्शस्वभावी है।

शरीर क्रमशः प्रतिक्षण में नाश को प्राप्त होगा, वह स्थायी नहीं रहेगा। मैं त्रिकाल ज्ञानानन्दस्वरूप हूँ, मेरे स्वरूप के आश्रय से मेरी निर्मल दशा प्रतिक्षण बदलती है। अपने स्वभाव के आश्रय से बदलकर जो केवलज्ञानदशा होगी, वह तो द्रव्य में अभेद एकाकार होकर सदा दश धर्म प्रवचन

ज्यों की त्यों रहेगी किन्तु शरीर की कोई भी अवस्था मेरे साथ रहनेवाली नहीं है। ऐसा जानकर अपने ज्ञान में स्थिरता प्रगट करके, जिन धर्मात्माओं ने देहादि के अभिमान का विकल्प छोड़ दिया है और स्वभाव की दृढ़ता को प्राप्त किया है, उनके उत्तम मार्दवधर्म होता है।

हिलना-डुलना, बोलना, स्थिर रहना, मौन रहना, खाना-पीना इत्यादि आत्मा नहीं करता, यह सब तो शरीर की क्रियाएँ हैं। वे क्रियाएँ मैं करता हूँ – ऐसा माननेवाला मिथ्यादृष्टि है, उसे जड़ के कर्तत्त्व का अहङ्कार है। देह के परमाणुओं की पर्याय प्रति समय अपने आप ही बदलती है, उसके साथ मेरा सम्बन्ध नहीं है। मेरी पर्याय का सम्बन्ध अपने त्रिकाली द्रव्य के साथ है। निर्मल ज्ञान-दर्शन और चारित्ररूप मेरी दशा, प्रति समय बदलकर ध्रुव-स्वभाव में एकता बढ़ती जाती है। इस प्रकार स्वभाव में एकता होने से ज्ञानी को पर का अभिमान कैसे हो ?

अहो ! मुनिवरों को अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त हुई हों, अवधि-मनःपर्यय ज्ञान प्रगट हुआ हो, तथापि अभिमान का किञ्चित् विकल्प भी नहीं होता, उलटे नम्र होकर स्वभावोन्मुखता द्वारा पूर्ण केवलज्ञान प्रगट करते हैं। मुनि को पर्याय की ओर लक्ष्य जाकर विकल्प उत्पन्न हो कि ‘केवलज्ञान प्रगट करूँ’ तो वह भी राग है। - ऐसे विकल्प को भी तोड़कर जो वीतराग स्वरूपस्थिरता है, वह उत्कृष्ट मार्दवधर्म है और वही मुक्ति का कारण है।

मेरे उपदेश से दूसरे ने धर्म प्राप्त किया, अथवा मैं किसी अन्य को धर्म प्राप्त करा दूँ – ऐसी बुद्धि ज्ञानियों के नहीं होती। वाणी जड़ उत्तम मार्दवधर्म

है, आत्मा उस वाणी का कर्ता ही नहीं है; तब फिर दूसरे को धर्म प्राप्त करा दूँ – यह बात ही कहाँ रही ? इसलिए पर से भिन्न अपने स्वरूप को पहिचानकर मुनिवरों को निरन्तर ज्ञायक साक्षी स्वरूप आत्मा के निर्मल स्वभाव का ही ध्यान करना चाहिए।

इस प्रकार उत्तम मार्दवधर्म का व्याख्यान पूर्ण हुआ। •

उसका विचार करे तो…

आजकल तो मोटर-रेल-हवाईजहाज आदि की

दुर्घटनाओं में कितने ही लोगों के मरने के समाचार

आते हैं। आँख खुले और स्वप्न चला जाये, तदनुसार

शरीर और भव क्षण में चला जाता है। हृदयाघात होने

से क्षण में छोटी-छोटी उम्र में मृत्यु हो जाती है। अरे! यह सं… सा… र! नरक में अन्न का दाना भी नहीं

मिलता, पानी की बूँद भी नहीं मिलती और प्रतिकूलता

का पार भी नहीं है - ऐसे ऐसे प्रतिकूल संयोगों में

अनन्तबार गया, परन्तु वहाँ से निकलने पर सब भूल

गया। उसका विचार करे तो उन सब दुःखों से छूटने

का मार्ग ढूँढे । अहा! ऐसा मनुष्यभव मिला और सत्य

समझने का योग प्राप्त हुआ, उसमें अपना आत्मा का

हित कर लेने जैसा है।

  • दृष्टि के निधान

उत्तम आर्जवधर्म

जो भव-भ्रमण से भयभीत और रत्नत्रय की आराधना में

तत्पर हैं – ऐसे मुनिराज को स्वयं की रत्नत्रय-आराधना में लगे हुए छोटे-बड़े दोषों को छिपाने की वृत्ति नहीं होती; अपितु जैसे बालक माता से सरलरूप से सब कह देता है, वैसे ही वे गुरु के समीप जाकर, अत्यन्त सरलरूप से अपने सर्व दोष प्रगट कर देते हैं। अत्यन्त सरल परिणामों द्वारा आलोचना करके उन दोषों को विनष्ट कर देते हैं तथा गुरु आदि के उपकार को सरलरूप से प्रगट करते हैं – ऐसे मुनिराजों को उत्तम आर्जवधर्म की आराधना होती है। उन आर्जवधर्म के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।

हे सन्तों! हमें भी उत्तम आर्जवधर्म की आराधना

प्रदान करो।

उत्तम आर्जवधर्म

आज दशलक्षण पर्व का तीसरा दिन है। यह उत्तम आर्जवधर्म का दिन कहलाता है। उत्तम आर्जव अर्थात् सम्यग्दर्शनसहित वीतरागी सरलता। आत्मा के ज्ञायकस्वरूप में कपट का भाव ही उत्पन्न न होने देना, उत्तम सरलता है।

आत्मा ज्ञान-आनन्द की मूर्ति है, वह क्रोध-मान-माया-लोभ रहित है। उसे यथारूप अर्थात् जैसा है, वैसा समझना और श्रद्धा में वक्रता नहीं करना, सम्यग्दर्शनरूप सरलता है और चैतन्यस्वरूप को जैसा है, वैसा नहीं मानकर, स्वरूप की वक्रता करके, पुण्य – पापयुक्त मानना, अनन्त कपट है।

किसी पर के आश्रय से अथवा पुण्य परिणाम से आत्मा को लाभ मानना, वक्रता है, अनार्यता है। आर्य अर्थात् सरल। जैसा सहज ज्ञायकमूर्ति आत्मस्वरूप है, वैसा ही मानना; किञ्चित् भी विपरीत न मानना, वह सरलता है और चैतन्यस्वरूप की प्रतीति में वक्रता करके, किसी विकल्प या व्यवहार के आश्रय से लाभ मानना, वह अनार्यता है।

व्यवहाररत्नत्रय भी रागरूप है, वह आत्मा का स्वरूप नहीं है। आत्मा का ज्ञायक स्वरूप पुण्य-पाप रहित है, व्यवहाररत्नत्रयरूप पराश्रितभाव से उसे लाभ मानना, वह अनन्त कपट का सेवन है और उस व्यवहार का आश्रय छोड़कर, निश्चय शुद्ध ज्ञातास्वभाव को दश धर्म प्रवचन

जानना-मानना और उसमें स्थिर होना, वह उत्तम आर्जवधर्म है। स्वभाव की श्रद्धा और ज्ञान होने के पश्चात् मुनिदशा में जो व्यवहाररत्नत्रय की वृत्ति उत्पन्न होती है, वह राग है; वह उत्तम आर्जवधर्म नहीं है किन्तु रागरहित होकर जितनी स्वरूप स्थिरता हुई, उतना ही उत्तम आर्जवधर्म है।

वास्तव में तो आत्मा के वीतरागभाव में ही उत्तम क्षमादि दशों धर्म आ जाते हैं। दशों धर्मों में वीतरागभाव एक ही प्रकार का है किन्तु वह वीतरागभाव होने से पूर्व क्षमा आदि जिस प्रकार का विकल्प होता है, उसी के अनुसार उत्तम क्षमादि नामों से उस वीतरागभाव को बतलाया जाता है और उस शुभ विकल्प को उपचार से उत्तम क्षमादिधर्म कहा जाता है।

यहाँ आचार्यदेव उत्तम आर्जवधर्म का वर्णन करते हैं – (आर्या)

हृदि यत्तद्वाचि बहिः फलति तदेवार्जवं भवत्येतत् ।

धर्मो विकृतिरधर्मो द्वाविह सुरसद्मनरकपथौ ॥ ८९ ॥

जो बात मन में हो, वही वचन के द्वारा प्रगट करना, उसे आर्जवधर्म कहते हैं और उससे विरुद्ध अर्थात् माया से दूसरे को ठगने का परिणाम, वह अधर्म है। इनमें से आर्जवधर्म, स्वर्ग का और अधर्म, नरक का पंथ है।

जैसा हृदय में हो, वैसा ही कहने का परिणाम तो शुभपरिणाम है। मैं वाणी से भिन्न अशब्द स्वरूपी हूँ और शुभपरिणाम भी मेरा स्वरूप नहीं है – ऐसे सम्यक्स्वभाव के भानपूर्वक जिसके शुभ – परिणाम का निषेध वर्तता है, उसके शुभपरिणाम को व्यवहार से

उत्तम आर्जवधर्म

उत्तम आर्जवधर्म कहते हैं। परमार्थ से तो जैसा शुद्ध आत्मस्वभाव जाना है, वैसा ही परिणमन पर्याय में हो जाना ही उत्तम सरलता आर्जवधर्म है। जैसा स्वभाव है, वैसा ही परिणमित हो गया; किञ्चित्मात्र भी वक्रता (विकार) नहीं हुई, वह परमार्थ से उत्तम आर्जवधर्म है और उस स्वभाव में विकृति होकर जितना रागादि उत्पन्न हो, उतना उत्तम आर्जवधर्म में भङ्ग है।

यहाँ आर्जवधर्म के फल से स्वर्ग की प्राप्ति होना कहा है। सम्यग्दर्शनपूर्वक राग का अभाव करके, जितना वीतरागभावरूप आर्जवधर्म प्रगट किया है, वह तो मोक्ष का कारण है किन्तु उस समय पूर्ण वीतरागता नहीं है और अल्प राग रह जाता है, इसलिए उस शुभरागरूप आर्जवधर्म के फल में स्वर्ग मिलता है। राग के कारण बीच में भव धारण करने पड़ते हैं परन्तु जिन्हें स्वभाव का भान नहीं है और धर्म का अनादर करके वक्रता से वर्त रहे हैं, वे तो नरकगति में जाते हैं।

आत्मस्वभाव को विपरीत मानना ही सबसे बड़ी वक्रता है। आत्मा तो सरलता के शुभपरिणाम या वक्रता के अशुभपरिणाम – इन दोनों से रहित एक ज्ञायकस्वरूपी है, उसकी श्रद्धा-ज्ञान को स्थिर रखना ही धर्म है। वह धर्म प्रत्येक गृहस्थ के हो सकता है। जिनके आत्मा में ऐसे सम्यक्श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक अत्यन्त सरलता प्रगट हो गई, उनके उत्तम आर्जवधर्म है। चारित्रदशा में कपटभाव तो होने ही नहीं देना और ‘सरलता करूँ’ ऐसा शुभभाव हो तो उसे भी छोड़कर वीतरागी सरलता प्रगट करना, उत्तम आर्जवधर्म है।

अब, आचार्यदेव कहते हैं कि मायाचार करने से अहिंसा इत्यादि उत्तम गुणों का भी लोप हो जाता है –

दश धर्म प्रवचन

उत्तम आर्जवधर्म

( शार्दूलविक्रीड़ित )

मायित्वं कुरुते कृतं सकृदपि च्छायाविघातं गुणे-

ष्वाजातेर्यमिनोऽर्जितेष्विह गुरुक्लेशैः समादिष्वलम् । सर्वे तत्र यदासतेऽविनिभृताः क्रोधादयस्तत्वतः

तत्पापं बत येन दुर्गतिपथे जीवश्चिरं भ्राम्यति ॥ ९० ॥ यदि एक बार भी मायाचारी की जाये तो अत्यन्त कठिनाई से सञ्चित किए हुए मुनि के गुण सत्य-अहिंसा आदि को ढक देती है अर्थात् मायाचारी पुरुष के अहिंसादि गुण भी आदरणीय नहीं रहते और उस मायाचाररूपी मकान में क्रोधादि कषायें भी छिपी रहती हैं। उस मायाचार से उत्पन्न हुआ पाप, जीव को अनेक प्रकार की दुर्गतियों में भ्रमण कराता है; इसलिए मुनियों को मायाचार उत्पन्न ही न होने देना चाहिए।

जो अपने रागादि दोषों को दोष के रूप में नहीं जानता और उन्हें धर्म मानता है, वह वास्तव में मायाचारी है। अपने दोष को छिपाने का भाव ही मायाचार है। जिसे सज्जन पुरुषों की यथार्थ बात नहीं रुचती और अपने दोष की बात को सुनकर कहते हैं कि ‘अरे ! क्या हम कपटी हैं ? मेरे कहने का आशय दूसरा था और आप कुछ दूसरा ही समझे हैं’ - ऐसा कहकर जो अपना बचाव करना चाहता है, वह पापी-मायाचारी है। उस जीव में यदि अहिंसा, ब्रह्मचर्यादि हों तो भी वास्तव में वे प्रशंसनीय नहीं है।

मुनिराज के भी जितने अंश में राग होता है, उतने अंश में उत्तम क्षमा-निरभिमानता इत्यादि धर्मों में कमी है। पहले अपने को सत् की प्रतीति नहीं थी और जिन सत्पुरुष के पास से अपूर्व सत् की प्रतीति हुई, उन सत्पुरुष के उपकार को न माने, अपने बड़प्पन के लिए उनका नाम आदि छिपाये, उन्हें याद न करे, प्रगट न करे तो वह जीव कपटी है; वास्तव में उसने अपने स्वभाव को ही छिपाया है। यहाँ पर मुख्यतः मुनिदशा की बात है किन्तु श्रावक-गृहस्थों को भी स्वभाव के भानपूर्वक मायारहित उत्तम सरलभाव प्रगट करने का प्रयत्न करना चाहिए और उत्तम क्षमादिधर्मों का जितना हो सके, उतना पालन करना चाहिए।

यदि मुनि को कुछ दोष लग गया हो और वह दोष यदि गुरु के पास प्रगट करने में संकोच करता है तो वह माया है। यदि दोष को छिपाने की बुद्धि से गुरु के पास प्रगट नहीं करता और अपने आप प्रायश्चित्त ले लेता है अथवा ‘मैं अपना यह दोष प्रगट करूँगा तो बाह्य में मेरी निन्दा होगी’ - ऐसे भय से दोष प्रगट नहीं करता अथवा उसे अल्प करके कहता है तो वह माया है और अपने से हो गये समस्त दोषों को सरलतापूर्वक प्रगट कर देने का भाव भी शुभभाव है। उस शुभभाव का आदर नहीं है, इसलिए वह मुनि के व्यवहार से उत्तम आर्जवधर्म है और वीतरागभाव से स्थिर रहकर दोष की उत्पत्ति ही न होने देना सो परमार्थ से उत्तम आर्जवधर्म है। शुभराग से धर्म माननेवाला अज्ञानी जीव चाहे जैसी सरलता के परिणाम रखे, छोटे से छोटे दोष को भी प्रगट करके प्रायश्चित्त ले तो भी उसके किञ्चित् आर्जवधर्म नहीं है क्योंकि जहाँ राग में धर्म माना, वहाँ मूल मिथ्यात्वरूपी दोष है, इसका उसे भान नहीं है। जो दोष को ही गुण मान बैठा है, उसके सरलता कैसी ? उत्तम सरलता तो सम्यग्दर्शनपूर्वक ही हो सकती है और वही धर्म है। कोई जैसा मन में हो, वैसा ही वचन से बोलता है - ऐसी

दश धर्म प्रवचन

सरलता रखता है किन्तु मान्यता ऐसी है कि यह वचन बोलने की क्रिया मैं करता हूँ और इससे मुझे लाभ होता है तो उस जीव के यथार्थ सरलता नहीं है। उसने वक्र मान्यता करके अपने सम्पूर्ण चैतन्यस्वभाव को छिपाया है - यही परमार्थ से अनन्त कपट है। जो श्रीगुरु आदि के उपकार को छिपाता है, वह तो व्यवहार में भी सरल नहीं है, उसके उत्तम वीतरागी सरलता तो होती ही नहीं। जिसे व्यवहार सरलता प्रगटी हो, वह जीव गुरु के पास विनयपूर्वक कहता है कि प्रभो ! मैं मूढ़, पामर था, आज तक मुझे कुछ भी पता नहीं था, आपकी कृपा से ही मुझे अपूर्व सत्य प्राप्त हुआ है। इस प्रकार सीधा-सरल होकर, अर्पणता लाकर स्वभाव का बहुमान किये बिना तो व्यवहार सरलता भी नहीं होती और उसका दोष दूर होकर वीतरागता भी प्रगट नहीं होती।

प्रथम तो भले प्रकार से यह पहिचान करना चाहिए कि धर्म क्या है और दोष क्या है ? अपने परमार्थ स्वभाव को जानकर उसके आश्रय से स्थिर रहने में राग-द्वेषरूप माया की उत्पत्ति ही न हो - यह उत्तम आर्जवधर्म है। मुनियों के वैसी विशेष स्थिरता होती है किन्तु उनके जो अल्प राग होता है, उसे दूर करके वे सम्पूर्ण वीतरागी स्थिरता प्रगट करने का पुरुषार्थ करते हैं और गृहस्थों को प्रथम तो ऐसी यथार्थ पहिचान करना चाहिए तथा दोषों को टालकर स्थिरता बढ़ाने की भावना करनी चाहिए। जो अपने आत्मा में ऐसी यथार्थ प्रतीति करके वीतरागता प्रगट करता है, उसने ही सच्चा दशलक्षण पर्व मनाया कहा जाता है।

इस प्रकार उत्तम आर्जवधर्म का व्याख्यान पूर्ण हुआ। • उत्तम सत्यधर्म

वस्तुतः तो मुनिराज वचन-विकल्प का परित्याग करके

सत्स्वभाव की साधना में ही तत्पर हैं और कदाचित् यदि वचन बोलते भी हैं तो वस्तुस्वभाव के अनुसार स्व-पर हितकारी सत्य वचन बोलते हैं।

मुनिराज सम्यग्ज्ञान द्वारा वस्तुस्वभाव जानकर, उसका ही उपदेश देते हैं। उसे सुनकर श्रोताजन आत्मज्योति के सन्मुख होते हैं, उनका अज्ञान दूर होता है। वे स्वयं भी आत्मज्योति में परिणत होने के लिए सतत् उद्यमवन्त रहते हैं - ऐसे उत्तम सत्यधर्म के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।

हे सन्तों! हमें भी उत्तम सत्यधर्म की आराधना प्रदान करो।

उत्तम सत्यधर्म

उत्तम सत्यधर्म

आज दशलक्षण धर्म का चौथा दिन है। उत्तम क्षमा, मार्दव और आर्जव, इन तीन धर्मों के स्वरूप का वर्णन हो चुका है। आज उत्तम सत्यधर्म का दिन है। इन उत्तम क्षमादि धर्मों का आराधन सम्यग्दर्शनपूर्वक ही हो सकता है। इन भादव सुदी ५ से १४ तक के दश दिनों को दशलक्षण पर्व कहते हैं और वही पर्यूषण पर्व है। सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक निर्ग्रन्थ सन्त मुनिवरों के उत्तम सत्यधर्म कैसे होता है, उसका वर्णन श्री पद्मनन्दि आचार्यदेव करते हैं – (आर्या)

स्वपरहितमेव मुनिभिर्मितममृतसमं सदैव सत्यं च

वक्तव्यं वचनमथ प्रविधेयं धीघनैौनम् ॥ ९१ ॥

उत्कृष्ट ज्ञान को धारण करनेवाले मुनिवरों को, प्रथम तो मौन ही रहना चाहिए अर्थात् परमसत्य आत्मस्वभाव की एकाग्रता में रहकर बोलने का विकल्प ही नहीं होने देना चाहिए और यदि विकल्प उठे तो ऐसे वचन बोलना चाहिए कि जो सदैव स्व-पर को हितकर हों, अमृत के समान मिष्ट और सत्य हों।

सम्यग्ज्ञान ही उत्कृष्ट ज्ञान है। ऐसे सम्यग्ज्ञान के धारक मुनियों के ही उत्तम सत्यधर्म होता है। उत्तम सत्यधर्म सम्यक्चारित्र का एक प्रकार है। जिसे सम्यग्ज्ञान न हो और ऐसा मानता हो कि आत्मा पर का कर्ता है, पुण्य धर्म होता है, ईश्वर जगत का कर्ता है – वह जीव यदि लोक-व्यवहार में सत्य बोलता हो तो भी उसके उत्तम सत्यधर्म नहीं होता। यहाँ तो सम्यग्दर्शन के बाद मुनिदशा की मुख्यरूप से बात है।

उत्तम सम्यग्ज्ञान के धारक मुनिवरों को प्रथम तो मौन रहना ही श्रेष्ठ है अर्थात् चैतन्यस्वरूप में वीतरागी स्थिरता प्रगट करके वाणी की ओर का विकल्प ही नहीं होने देना चाहिए। – ऐसा वीतरागीभाव ही परमार्थ से उत्तम सत्यधर्म है और अस्थिरता के कारण जब विकल्प उठे, तब स्व और पर को हितकर, सत्य तथा प्रिय वचन बोलने का शुभराग, वह व्यवहार से उत्तम सत्यधर्म है। उसमें जो राग है, वह धर्म नहीं है किन्तु उस समय जितना वीतरागभाव है, उतना धर्म है। वाणी बोली जाए या न बोली जाए, वह तो जड़ परमाणुओं की स्वतन्त्र अवस्था है, आत्मा उसका कर्ता नहीं है। आत्मा वाणी का कर्ता है – ऐसा माननेवाला अज्ञानी है, उसके सत्यधर्म नहीं होता।

प्रश्न – यदि वाणी का कर्ता आत्मा नहीं है तो यहाँ आचार्यदेव ने ‘मुनियों को सत्य वचन बोलना’ चाहिए – ऐसा किसलिए

कहा है ?

उत्तर – यदि सम्यग्ज्ञानपूर्वक सत्य बोलने के भाव के समय वाणी निकले तो वह सत्य ही होती है – ऐसा मेल बतलाने के लिए निमित्त अपेक्षा से कहा जाता है कि ‘मुनियों को सत्य बोलना चाहिए।’ इसमें कथन का आशय यह है कि मुनियों को आत्मस्वरूप में स्थिर रहकर वाणी की ओर का विकल्प ही नहीं होने देना चाहिए और यदि विकल्प हो तो असत्य वचन की ओर का अशुभराग तो होने ही नहीं दश धर्म प्रवचन

देना चाहिए। किन्तु आत्मा जड़ वाणी का कर्ता है – ऐसा उक्त कथन का तात्पर्य नहीं है।

वाणी बोली जाए अथवा न बोली जाए – उसका कर्ता जीव

नहीं है। ज्ञानी अपने को वाणी का कर्ता नहीं मानते और सत्य बोलने का विकल्प हो, उसके स्वामी भी ज्ञानी नहीं होते; वे तो वाणी और विकल्परहित चिदानन्दस्वभाव को ही अपना स्वरूप मानकर, उसका आदर करते हैं। इस प्रकार श्रद्धा और ज्ञान की अपेक्षा से तो चौथे गुणस्थान में धर्मात्मा को भी उत्तम सत्य इत्यादि धर्म होते हैं। वस्तुस्वरूप जैसा है, वैसा ही सत्य जानना सो धर्म है। जैसी है, वैसी ही सत्य वस्तु जाने बिना धर्म हो ही नहीं सकता। सम्यग्ज्ञान से वाणी-विकल्परहित आत्मस्वरूप को जानने के पश्चात्, उस स्वरूप में स्थिरता करने में उत्तम क्षमादि दशों धर्म समाविष्ट हो जाते हैं और सत्य बोलने का, उपदेशादि का विकल्प उत्पन्न होना, व्यवहार से उत्तम सत्य है। सत्य बोलने के विकल्प को अथवा वाणी को ज्ञानी अपना स्वरूप नहीं मानते। मैं वीतरागभाव का कर्ता हूँ; इच्छा अथवा भाषा का कर्ता मैं नहीं हूँ और न वे मेरे कर्म हैं।

जो सत्य बोला जाता है, उन शब्दों का मैं कर्ता हूँ – ऐसा माननेवाला जीव बिल्कुल झूठ बोलता है क्योंकि शरीर, वाणी इत्यादि पदार्थ अपने नहीं हैं और न आत्मा स्वयं उनका कर्ता है। तथापि मैं उन पदार्थों का कर्ता हूँ – ऐसा वह असत्य मानता है और इसी प्रकार जगत के अनन्त परद्रव्यों को वह अपना मानता है, इस कारण उसके मिथ्यात्वरूप महान असत्य का सेवन है।

यहाँ आचार्यदेव कहते हैं कि ‘मुनियों को मौन रहना चाहिए।’ उत्तम सत्यधर्म

उसका यथार्थ अर्थ यह है कि मुनियों को वाणी की ओर का लक्ष्य छोड़कर आत्मा में एकाग्र रहना चाहिए। वाणी को रोकने की क्रिया आत्मा की नहीं है किन्तु जब आत्मा बोलने के विकल्प को तोड़कर, वीतरागभाव से आत्मा के अनुभव में लीन होता है, तब बाह्य में वाणी नहीं बोली जाती – ऐसा परमाणुओं का स्वतन्त्र परिणमन होता है। ‘मौन रहना’, यह तो ‘घी का घड़ा’ कहने की भाँति उपचार कथन है। वास्तव में भाषा करना या उसे रोकना, चेतन के आधीन नहीं है। मैं धर्मोपदेश करूँ, स्वाध्याय करूँ – इस प्रकार का शुभविकल्प मुनि को होता है और परम सत्य उपदेश भी होता है परन्तु उस समय सम्यक्श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक अशुभराग को छेदकर जितना वीतरागभाव है, वही धर्म है; जो शुभराग है, उसे मुनि धर्म नहीं मानते और वे उसका आदर भी नहीं करते; इसलिए उनके उत्तम सत्यधर्म है। जहाँ राग को आदरणीय माना जाए, वहाँ तो सम्यग्दर्शन भी नहीं होता और उत्तम सत्यधर्म तो सम्यक्चारित्र का भेद है, इसलिए वह तो होगा ही कहाँ से ?

मेरे शुभराग से या वाणी से मुझे या अन्य को लाभ होता है अथवा मैं निमित्त बनकर दूसरे को समझा देता हूँ – ऐसा जिसका अभिप्राय है, वह जीव महा असत्य अभिप्राय का सेवन करनेवाला मिथ्यादृष्टि है। शुभराग या व्यवहार पञ्च महाव्रतों का पालन करते- करते धर्म होता है – ऐसा उपदेश अथवा निमित्त से दूसरे का कार्य होता है, पुण्य से धर्म होता है – इस प्रकार का उपदेश देनेवाले जीव असत्य वक्ता और मिथ्यादृष्टि है। यहाँ उन जीवों की बात नहीं है। यहाँ पर तो सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक, सम्यक्चारित्रदशा प्रगट करके जो मुनि हुए हैं और केवलज्ञान प्रगट करने को योग्यतावाले दश धर्म प्रवचन

हैं – ऐसे मुनिवरों को सम्बोधन करके आचार्यदेव कहते हैं कि ‘अहो मुनिवरों ! तुम्हें स्वरूप स्थिरता में लीन रहकर सम्पूर्ण वीतरागता ही प्रगट करने योग्य है। मुनियों को किसी प्रकार का शुभराग करना भी योग्य नहीं है। सत्यवाणी की ओर की आकाँक्षा की नष्ट करके, परम सत्य आत्मस्वभाव में स्थिर रहकर केवलज्ञान प्रगट करना योग्य है।’

श्री आचार्यदेव उत्तम सत्यधर्म की महिमा बतलाते हैं – सति सन्ति व्रतान्येव सूनृते वचसि स्थिते,

भवत्याराधिता सद्भिःर्जगत्पूज्या च भारती ॥ ९२ ॥

जो जीव सत्य वचन बोलनेवाला है, उसके समस्त व्रत

विद्यमान रहते हैं अर्थात् सत्यव्रत का पालन करने से समस्त व्रतों का पालन होता है और वह सत्यवादी पुरुष जगत पूज्य सरस्वती को भी सिद्ध कर लेता है।

शास्त्रों में ऐसी कथनशैली होती है कि जब जिसका वर्णन होता है, उसे मुख्य करते हैं और दूसरे को गौण रखते हैं। यहाँ सत्यव्रत का वर्णन करना है, इसलिए उसे मुख्य करके कहा है कि एक सत्यव्रत के पालन में समस्त व्रतों का समावेश हो जाता है। जब ब्रह्मचर्य का वर्णन करना हो, तब ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मचर्य व्रत में समस्त व्रत समा जाते हैं; वैसे ही जब अहिंसा का वर्णन हो रहा हो, तब ऐसा कहते हैं कि अहिंसा के पालन में ही सम्पूर्ण व्रत आ जाते हैं। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य आदि भेद व्यवहार धर्म की अपेक्षा से हैं; परमार्थ से तो मात्र वीतरागभाव में ही अहिंसा, सत्य इत्यादि समस्त धर्म आ जाते हैं।

उत्तम सत्यधर्म

सत्य-असत्य वचन की ओर का शुभ या अशुभ विकल्प भी

आत्मा का स्वरूप नहीं है। सत्य-असत्य वचन तथा उस ओर का शुभ-अशुभराग इन दोनों से भिन्न रहकर आत्मा उनका ज्ञाता है। ऐसे आत्मस्वभाव के आश्रय के बिना यथार्थ सत्यव्रत नहीं हो सकता। शुद्ध आत्मस्वभाव की श्रद्धा के पश्चात् चारित्रदशा में बढ़ने पर जो सत्य व्रतादि के विकल्प आते हैं, उन्हें उपचार से, व्यवहार से, निमित्त से उत्तम सत्यधर्म कहते हैं। परमार्थ से तो जो सत्य वचन की ओर का राग भी छोड़कर वीतरागभाव हुआ, वही उत्तम सत्यधर्म है। वह वीतरागभाव ही उत्तम अहिंसा है, वही ब्रह्मचर्यादि है और वही वीतरागभाव मोक्षमार्ग है – ऐसा वीतरागभाव मुनिवरों के होता है। जो शुभराग होता है, वह भी वास्तव में असत्य है, हिंसा है। सम्यक्श्रद्धापूर्वक वीतरागभावरूप उत्तम सत्यधर्म में अन्य समस्त धर्म आ जाते हैं। जो ऐसे उत्तम सत्य व्रत का पालन करते हैं, वे जगत पूज्य सरस्वती को प्राप्त करते हैं अर्थात् वे केवलज्ञान को प्राप्त होते हैं और उनकी दिव्यध्वनि खिरती है। सरस्वती अर्थात् केवलज्ञान और निमित्तरूप से कहा जाये तो दिव्यध्वनि सरस्वती है। भगवान की दिव्यध्वनि को सरस्वती, अम्बा इत्यादि भी कहते हैं । जीव ने लौकिक सत्य बोलने के भाव तो अनन्त बार किये हैं किन्तु परमार्थ सत्य का स्वरूप नहीं समझा है। सच्चे ज्ञान से वस्तु स्वरूप का निश्चय किये बिना परमार्थ सत्य नहीं होता। अज्ञानी जो कुछ बोलता है, वह लौकिक सत्य भले हो किन्तु परमार्थ से तो वह असत्य ही है। परमार्थ सत्य तो सम्यग्दर्शनपूर्वक ही हो सकता है। आत्मा के त्रैकालिक शुद्धस्वभाव को जानकर, उसमें विशेष स्थिरता के पुरुषार्थ द्वारा असत्य का अर्थात् शुभ-अशुभराग का अभाव ही दश धर्म प्रवचन

उत्तम सत्यधर्म है। सम्यग्दृष्टि गृहस्थों के भी श्रद्धा - ज्ञान की अपेक्षा से उत्तम सत्यादि धर्म होते हैं।

आचार्यदेव उत्तम सत्यधर्म का विशेष माहात्म्य बतलाते हुए कहते हैं —

( शार्दूलविक्रीड़ित )

आस्तामेतदमुत्र सूनृतवचाः कालेन यल्लप्स्यते

सद्द्भूपत्वसरत्वसंसृतिसरित्पाराप्तिमुख्यं फलम् ।

यत्प्राप्नोति यशः शशांकविशदं शिष्टेषु यन्मान्यतां

यत्साधुत्वमिहैव जन्मनि परं तत्केन संवर्ण्यते ॥९३ ॥

हेय-उपादेय के विवेक की सूक्ष्मतायुक्त उपरोक्तानुसार उत्तम सत्यधर्म के स्वरूप को जानकर जो सत्यवादी मनुष्य हैं, वे परभव में श्रेष्ठ चक्रवर्ती तथा इन्द्रादि पद प्राप्त करते हैं और संसार-सरिता के पार को प्राप्त होते हैं — यह उसका मुख्य फल है। परभव की बात तो दूर रही किन्तु वे इसी भव में चन्द्रमा के समान उज्ज्वल यश पाते हैं, वे सज्जन कहलाते हैं और सज्जन उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे उत्तम सत्यधर्म के फल का वर्णन किस प्रकार किया जाए ? इसलिए मुमुक्षुओं को सम्यक्श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक उत्तम सत्यधर्म का पालन करना चाहिए।

आत्मा का स्वभाव वीतराग ज्ञानमय है, वह पर की उपेक्षा

करनेवाला है। पर की उपेक्षा किये बिना वीतरागभाव प्रगट नहीं होता और वीतरागभाव के बिना उत्तम सत्यादि धर्म नहीं होते। ‘मैं पर का कर सकता हूँ, अथवा निमित्त हो तो कार्य होता है’ – ऐसी जिनकी मान्यता है, वे जीव परपदार्थों की उपेक्षा करके स्वभावोन्मुख उत्तम सत्यधर्म

नहीं हो सकेंगे। जो जीव पर से भिन्न अपने स्वभाव को जानकर परम सत्य का अर्थात् आत्मस्वभाव का आराधन करते हैं, वे जीव वीतरागभाव के फल में मुक्ति पाते हैं और साधकदशा में जो राग रह जाता है, उसके फलस्वरूप इन्द्रादि पद प्राप्त होते हैं। अज्ञानी चाहे जैसे सत्य का शुभराग करे तो भी उसे इन्द्र, चक्रवर्ती आदि लोकोत्तर पद प्राप्त नहीं होते। ज्ञानियों को साधकदशा में वर्तनेवाले राग का निषेध है, इसलिए उनको इन्द्रादि पद के योग्य उच्च पुण्य बँध जाता है और इस लोक में भी ऐसे सम्यग्ज्ञानी – सत्यवादी को सज्जन पुरुष आदर की दृष्टि से देखते हैं तथा उनकी उज्ज्वल कीर्ति सर्वत्र फैलती है। आचार्यदेव कहते हैं कि यह समस्त फल तो गौण हैं; उत्तम सत्यधर्म का मुख्य फल तो मोक्ष पद की प्राप्ति है। इसलिए सज्जनों को अवश्य ही सत्य बोलना चाहिए अर्थात् प्रत्येक वस्तु स्वतन्त्र सत् है — ऐसा समझकर वस्तुस्वभाव की सम्यक्श्रद्धा और ज्ञान प्रगट करना चाहिए और इस सम्यक्श्रद्धा- ज्ञानपूर्वक उत्तम क्षमादिभावरूप वीतरागधर्म का आराधन करना चाहिए।

इस प्रकार उत्तम सत्यधर्म का व्याख्यान पूर्ण हुआ।

उत्तम शौचधर्म

उत्कृष्टरूप से लोभ के त्यागरूप निर्मल परिणाम ही

उत्तम शौचधर्म है। जिन्होंने भेदज्ञान के द्वारा निज आत्मा को जगत् के समस्त पदार्थों से भिन्न जाना है; देह को भी अत्यन्त भिन्न जानकर, उसका ममत्व भी छोड़ दिया है और पवित्र चैतन्यतत्त्व की आराधना में तत्पर हैं - ऐसे मुनिवरों को किसी भी परद्रव्य के ग्रहण की लोभवृत्ति नहीं होती। वस्तुतः तो उन्होंने भेदज्ञानरूप पवित्र जल से मिथ्यात्वादि अशुचिता को धो दिया है, वे उत्तम शौचधर्म के आराधक हैं।

अहा! जगत के समस्त पदार्थों सम्बन्धी लोभ का परित्याग करके, मात्र चैतन्य को ही साधने में तत्पर शौचधर्मवन्त मुनिवरों को नमस्कार हो।

हे सन्तों! हमें भी उत्तम शौचधर्म की आराधना प्रदान करो।

उत्तम शौचधर्म

आज दशलक्षण पर्व का पाँचवाँ दिन है, यह उत्तम शौचधर्म का दिन कहा जाता है। उत्तम शौच अर्थात् सम्यग्दर्शनसहित पवित्रता अर्थात् निर्लोभता। यह दशों धर्म मुख्यतः मुनिदशा में होते हैं, गृहस्थों के गौणरूप से होते हैं। श्री पद्मनन्दि आचार्य पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका शास्त्र में शौचधर्म का वर्णन करते हैं –

(आर्या)

यत्परदारार्थादिषु जन्तुषु निस्पृहमहिंसकं चेतः

दुश्छेद्यान्तर्मलहृत्तदेव शौचं परं नान्यत् ॥ ९४ ॥ जो परस्त्री और परपदार्थों के प्रति निःस्पृह है, सर्व प्राणियों के प्रति अहिंसक है और दुर्भेद्य जो अन्तर का मैल है, उसे जिसने धो डाला है - ऐसा पवित्र हृदय ही उत्तम शौचधर्म है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई शौचधर्म नहीं है।

शौच अर्थात् पवित्रता। जिन्हें पवित्र आत्मा का भान नहीं है और जो देह को ही अपना मान रहे हैं - ऐसे अज्ञानी जीव, शरीर को पवित्र रखने को ही शौचधर्म मानते हैं। आचार्यदेव कहते हैं कि यह शौचधर्म नहीं है। शरीर को अपना मानना तो महान अशुचि है। जिस आत्मा ने भेदज्ञानरूपी जल से उस मिथ्यामान्यतारूपी अशुचि को धो डाला है, वही आत्मा शौचधर्म है।

जिसे पवित्र चैतन्यस्वरूप का भान नहीं है और पुण्य-पाप को दश धर्म प्रवचन

ही अपना कर्तव्य मानता है, मैं पर का कर्ता हूँ – ऐसा मानता है, वह जीव पर पदार्थों से निस्पृह नहीं हो सकता। जिसे पुण्य – पापरूप विकारी भावों की पकड़ है, उसका ज्ञान विकार से मलिन है। जो ऐसा मानता है कि पर का मैं करता हूँ, उसका ज्ञान मिथ्यात्वरूपी मैल से मलिन है। मुझे पर की सहायता है, निमित्त के आश्रय से धर्म होता है – ऐसी जिसकी मान्यता है, वह जीव परपदार्थों में आसक्त है। जो जीव पर में आसक्त है, वह जीव महान अशुचि से लिप्त है। जिसने पुण्य में और उसके फल में सुख माना है, वह जीव वास्तव में स्त्रियों के प्रति निस्पृह नहीं है। जो पुण्य में आसक्त है, उसे उसके फल में भी आसक्ति है। वह जीव, स्त्री आदि पदार्थों के प्रति निस्पृह नहीं है और उसके शौचधर्म नहीं होता।

स्नानादि से शरीर को स्वच्छ रखना, शौचधर्म नहीं है। शरीर की शुद्धि से आत्मा का धर्म मानना मिथ्यात्व है और पुण्य-पाप के भावों से आत्मा की पवित्रता होती है – ऐसा माननेवाले को किञ्चित् भी धर्म नहीं होता किन्तु उल्टी मिथ्यात्वरूपी मैल की पुष्टि होती है। शरीर से भिन्न और पुण्य-पाप से रहित पवित्र आत्मस्वरूप की यथार्थ प्रतीतिरूपी जल द्वारा मिथ्यात्वरूपी मैल को धो डालना और पवित्र आत्मस्वरूप में एकाग्रता द्वारा रागादि मैल का धो डालना ही उत्तम शौचधर्म है। ऐसा धर्म मुनियों के होता है। जितना रागादि का विकल्प हो, वह तो अशुचि है। मुनिवरों की परिणति, स्त्री, लक्ष्मी आदि से बिल्कुल निस्पृह है। वे शुभ और अशुभ दोनों भावों को एक-सा मानते हैं, दोनों भाव अशुचिरूप हैं, आत्मस्वभाव से विपरीत अशुद्धभाव हैं। मुनियों को सहज ज्ञान की एकाग्रता से वे रागादि अशुद्धभाव होते ही नहीं हैं। रागादि – रहित वीतरागभाव ही उत्तम उत्तम शौचधर्म

शौचधर्म है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई उत्तम शौचधर्म नहीं है। सज्जन पुरुषों को परस्त्री सेवन का भाव होता ही नहीं किन्तु वास्तव में तो शुभभाव भी परस्त्री है। शुभभाव से आत्मा को लाभ मानकर, शुभपरिणति का सङ्ग करना, वह परस्त्रीगमन है।

धर्मी जीव, उस शुभपरिणाम को अपना स्वरूप नहीं मानते और उसमें एकता नहीं करते; इसलिए श्रद्धा-ज्ञान की अपेक्षा से उनके भी उत्तम शौचधर्म है।

जो आत्मा में परभावों का ग्रहण करता है, वह परमार्थ से पराये धन का ग्रहण है। जिसे परभावों में ग्रहणबुद्धि है, वह जीव उसके फलस्वरूप लक्ष्मी आदि बाह्य संयोगों को भी अपना माने बिना नहीं रहता। मुनिजन ज्ञानानन्दस्वभाव के अनुभव की जागृति द्वारा परभावों की उत्पत्ति नहीं होने देते, इस कारण वे समस्त परपदार्थों और परभावों से निस्पृह हैं; परभावों से रहित उनकी पवित्र वीतरागी परिणति ही उत्तम शौचधर्म है।

बाह्य में स्नानादि करना, वह शौच नहीं है और पुण्य-परिणामों में भी आत्मा की शुचिता नहीं है। जिसे भेदना दुर्लभ है, ऐसी पुण्य- पापभावरूप मलिनता को आत्मा की पवित्रता के बल से जिसने भेद डाला है, उसके उत्तम शौचधर्म होता है।

स्नानादि से शुद्धता नहीं हो सकती – इस बात को आचार्यदेव स्पष्ट करते हैं –

( शार्दूलविक्रीड़ित )

गंगासागरपुष्करदिषु सदा तीर्थेषु सर्वेष्वपि

स्नातस्यापि न जायते तनुभृतः प्रायो विशुद्धिः परा।

दश धर्म प्रवचन

मिथ्यात्वादिमलीमसं यदि मनो बाह्येऽतिशुद्धोदकै-

र्धोतं किं बहुशोऽपि शुद्धयति सुरापूरप्रपूर्णो घटः ॥ ९५ ॥ गङ्गा नदी, समुद्र या पुष्करादि समस्त तीर्थों में सदैव स्नान करने से भी शरीर की मलिनता दूर नहीं होती। शरीर कभी पवित्र होता ही नहीं; स्वभाव से ही शरीर अशुचिरूप है। जिस प्रकार मदिरा से भरे हुए घड़े को अति स्वच्छ जल से अनेक बार धोया जाए तो भी वह स्वच्छ नहीं होता; उसी प्रकार जिसका चित्त मिथ्यात्व आदि मलिनभावों से भरा हुआ है, वह जीव बाह्य में शरीर को निर्मल जल से चाहे जितनी बार धोये किन्तु उसे पवित्रता नहीं होती। जो जीव, पुण्य से आत्मा को लाभ मानता है, वह जीव अपने आत्मा में विकार का ही लेपन करके, आत्मा की मलिनता में वृद्धि करता है। पुण्यभावों से आत्मा की शुद्धि नहीं होती। पुण्य-पाप से रहित और शरीर से भिन्न, पवित्र आत्मस्वरूप की प्रतीति से सम्यक्श्रद्धा-ज्ञान प्रगट करना ही पवित्रता है और वही उत्तम शौचधर्म है। जो स्नानादि में धर्म मानते हैं, वे अपने आत्मा को मिथ्यात्व मल से मैला करते हैं। जिसके अन्तरङ्ग में मिथ्यात्व भरा हुआ है, उस जीव के कभी भी पवित्रता नहीं हो सकती। इसलिए शरीर और पुण्य-पाप के भाव, इन सबको अशुचिरूप जानकर उनसे भिन्न परम पवित्र चैतन्यस्वभाव की श्रद्धा-ज्ञान-रमण्ता द्वारा पवित्रभाव प्रगट करना ही उत्तम दश धर्मों की सच्ची उपासना है।

इस प्रकार उत्तम शौचधर्म का व्याख्यान पूर्ण हुआ।

उत्तम संयमधर्म

जब भगवान रामचन्द्रजी मुनि होकर निजस्वरूप को

साध रहे थे, तब यतीन्द्र हुए सीता के जीव ने उन्हें आत्मध्यान से डिगाने के लिए अनेक चेष्टाएँ की; परन्तु वे अपने उत्तम संयमधर्म की आराधना में दृढ़ रहे और केवलज्ञान प्रगट किया। श्रावकोत्तम सुदर्शन सेठ ने प्राणान्त जैसा प्रसङ्ग बनने पर भी अपने संयम में दृढ़ रहे… और आगे बढ़कर, मुनि होकर केवलज्ञान प्राप्त किया।

जिनका उपयोग अन्तर्मुख होकर निज-स्वरूप में गुप्त

हो गया - ऐसे मुनिवरों को स्वप्न में भी किसी जीव के घात की अथवा इन्द्रिय विषयों की वृत्ति नहीं होती। उन उत्तम संयमधर्म के आराधक मुनिवरों को नमस्कार हो।

हे सन्तों! हमें भी उत्तम संयमधर्म की आराधना प्रदान करो।

उत्तम संयमधर्म

दशलक्षण पर्व में छठवाँ दिन उत्तम संयमधर्म का है। आत्म स्वभाव की श्रद्धा-ज्ञान पूर्वक, शुभाशुभ इच्छाओं को रोककर, आत्मा में एकाग्र होना, परमार्थ उत्तम संयमधर्म है और जब ऐसा वीतरागभाव न हो सके, तब सम्यक्श्रद्धा-ज्ञानपूर्वक अशुभराग को छोड़कर छहकाय के जीवों की रक्षा का शुभराग होता है, उसे व्यवहार संयम कहते हैं।

श्री पद्मनन्दि आचार्यदेव यहाँ संयमधर्म का वर्णन करते हैं – ( आर्या )

जन्तुकृ पार्दितमनसःसमितिषु साधोः प्रवर्तमानस्य

प्राणेन्द्रियपरिहारं

संयममाहुर्महामुनयः ॥ ९६ ॥

जिनका चित्त जीवों की दया से भीगा हुआ है और जो समिति में प्रवर्तमान है तथा इन्द्रिय-विषयों का त्याग है - ऐसे मुनियों के संयमधर्म है, इस प्रकार महामुनि कहते हैं।

जिनके आत्मभानपूर्वक वीतरागभावरूप अकषायी करुणा प्रगट हुई है, उन्हें किसी प्राणी को दुःख देने का विकल्प ही नहीं होता; इसलिए ऐसा कहा जाता है कि उनका चित्त दयार्द्र है। वस्तुतः रागभाव सो हिंसा है, क्योंकि उसमें अपने आत्मा के चैतन्य-प्राणों का घात होता है, अतः उसमें स्वजीव की दया नहीं है। वीतरागभाव ही सच्ची दया है, क्योंकि उसमें स्व या पर किसी जीव की हिंसा का उत्तम संयमधर्म

भाव नहीं है। जिनका चित्त ऐसी वीतरागी दया से भरा है, उन मुनिवरों को उत्तम संयमधर्म है और सम्पूर्ण वीतरागभाव न हो तथा राग की वृत्ति उठे, उस समय पञ्च समिति में प्रवर्तनरूप शुभभाव होता है, उसे भी संयमधर्म कहते हैं। परमार्थ से तो वीतरागभाव ही धर्म है; राग है, वह धर्म नहीं है।

मुनि के इन्द्रिय-विषयों का अथवा जीवहिंसा का विकल्प तो होता ही नहीं, किन्तु देखकर चलना इत्यादि प्रकार के शुभविकल्प आयें, उन्हें भी तोड़कर स्वभाव की ओर उन्मुख होने का प्रयत्न वर्तता है। उन्होंने जितने अंश में विकल्प का अभाव किया, उतने ही अंश में वीतरागी संयमधर्म है।

श्रीमद् राजचन्द्रजी ‘अपूर्व अवसर’ में कहते हैं कि – 'संयम ही के लिए योग की वृत्ति हो,

निज आश्रय से, जिन आज्ञा अनुसार जब ।

वह प्रवृत्ति भी क्षण-क्षण घटती जाएगी,

होऊँ अन्त में निज स्वरूप में लीन जब ॥

अपूर्व अवसर ऐसा किस दिन आयेगा ॥’

इसमें उन्होंने ऐसी भावना की है कि जब तक वीतरागभाव से स्वरूप में स्थिर न हो सके, तब तक स्वरूप के लक्ष्य से और जिन आज्ञा के अनुसार संयम के हेतु से योग का प्रवर्तन हो। यहाँ पर जिन आज्ञा की ओर का लक्ष्य है, वह भी शुभभाव है। उस शुभभाव की भावना नहीं है किन्तु पर की ओर का वह विकल्प भी क्षण-क्षण में घटता जाये और क्रमशः उसका अभाव होकर सम्पूर्ण वीतरागभाव से आत्मस्वरूप में लीनता प्रगट होकर केवलज्ञान हो - ऐसी दश धर्म प्रवचन

भावना है। सर्व प्रथम ऐसे वीतरागभाव की पहिचान करना चाहिए। वीतरागभाव ही उत्तमधर्म है।

अब, आचार्यदेव संयम की दुर्लभता बताकर उसकी प्रशंसा

करते हैं —

( शार्दूलविक्रीड़ित )

मानुष्यं किल दुर्लभं भवभृतस्तत्रापि जात्यादयः

तेष्वेवाप्तवचः श्रुतिः स्थितिरतस्तस्याश्च दृग्बोधने। प्राप्ते ते अतिनिर्मले अपि परं स्यातां न येनोज्झिते

स्वर्मोक्षैकफलप्रदे स च कथं न श्लाघ्यते संयमः ॥ ९७ ॥ इस संसाररूपी गहन वन में भ्रमण करते हुए जीव को मनुष्यत्व महादुर्लभ है। मनुष्यत्व में भी उत्तम जाति इत्यादि मिलना कठिन है। यदि उत्तम जाति मिले तो भी श्री अरिहन्त भगवानादि आप्त पुरुषों के वचन सुनने का सुयोग प्राप्त होना अत्यन्त दुर्लभ है।

यहाँ आचार्यदेव ने देशनालब्धि का नियम बताया है। जिस

जीव को ज्ञानी पुरुष के पास से शुद्ध आत्मतत्व के उपदेश की प्राप्ति नहीं हुई, वह जीव धर्म प्राप्त नहीं कर सकता। इससे कहीं जीव की पराधीनता नहीं होती है। जिस जीव के शुद्धात्मस्वभाव को समझने की योग्यता हो, उस जीव को ज्ञानी से शुद्धात्मा का उपदेश मिलता ही है। ज्ञानी पुरुष के उपदेश की रुचि, बहुमान और विनयपूर्वक सुने बिना, मात्र शास्त्र वाँचकर अथवा अज्ञानी का उपदेश सुनकर कभी भी कोई जीव धर्म प्राप्त नहीं कर सकता। जो जीव धर्म प्राप्त करता है, उसे या तो वर्तमान साक्षात् ज्ञानी की वाणी का योग होता है और कदाचित् वैसा योग न हो तो पूर्व में जो ज्ञानी का समागम किया हो, उसके संस्कार वर्तमान में स्मरण होते हैं।

उत्तम संयमधर्म

जीव को ज्ञानी का उपदेश तो अनन्त बार मिला है किन्तु

जिज्ञासापूर्वक सत् का श्रवण कभी नहीं किया; इसलिए परमार्थतः उसने सत् का श्रवण कभी भी किया ही नहीं। जिज्ञासापूर्वक सन्त पुरुषों की वाणी का श्रवण महादुर्लभ है। इतना होने तक भी धर्म नहीं है; इतना होने पर तो व्यवहारशुद्धि हुई कहलाती है अर्थात् उसमें धर्मी होने के लिए पात्रता प्रगट हुई कहलाती है। जिसमें इतना न हो, वह जीव तो धर्म प्राप्त कर ही नहीं सकता। जो कुगुरु-कुदेव-कुशास्त्र को मानते हैं, वे तो तीव्र मिथ्यादृष्टि हैं। सच्चे देव-गुरु-शास्त्र का स्वरूप जानकर, कुदेवादि की मान्यता को छोड़ देने पर गृहीत मिथ्यात्व दूर होता है।

जिसे महाभाग्य से ज्ञानी के सच्चे धर्म का श्रवण प्राप्त हुआ है, उसे उसमें दृढ़ स्थित होना दुर्लभ है। ज्ञान में यथार्थ निर्णय करना, महादुर्लभ है। यदि सत् का श्रवण करे किन्तु निर्णय न करे तो यथार्थ फल नहीं मिलता। यहाँ तक आने के पश्चात् अब अपूर्व आत्मधर्म कैसे हो ? उसकी बात करते हैं।

अनन्त काल में दुर्लभ मनुष्यत्व प्राप्त करके, सत्धर्म का श्रवण प्राप्त करके और ज्ञान में उसका निर्णय करके शुद्धात्मा का अनुभव करना अपूर्व है। जो पहले अनन्त काल में कभी नहीं किया हो, ऐसा निश्चय सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान प्रगट करना, महान् पुरुषार्थ है। यहाँ से अपूर्व धर्म का प्रारम्भ है। जिसने एक समयमात्र भी सम्यग्दर्शन-ज्ञान की प्राप्ति की है, वह जीव अल्पकाल में अवश्य ही मुक्ति प्राप्त करता है। ऐसे पवित्र सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति परम पुरुषार्थ द्वारा करने के पश्चात् भी वीतरागी संयम की प्राप्ति सबसे दुर्लभ है।

दश धर्म प्रवचन

यहाँ पर आचार्यदेव उत्कृष्ट बात बतलाना चाहते हैं। मोक्ष का सीधा कारण वीतराग चारित्र है । सम्यग्दर्शन-ज्ञान होने पर भी जब तक वीतरागी संयमदशा प्रगट न करे, तब तक केवलज्ञान प्रगट नहीं होता; इसलिए वीतरागी संयमधर्म परम प्रशंसनीय है। सम्यग्दर्शन- ज्ञान को गौणरूप से मोक्षमार्ग कहा जाता है।

प्रवचनसार की सातवीं गाथा में कहा है कि ‘चारित्तं खलु धम्मो’ अर्थात् सम्यग्दर्शनपूर्वक चारित्र ही धर्म है। चारित्रदशा के बिना उस भव में मोक्ष होता ही नहीं। आचार्यदेव के चारित्रदशा विद्यमान है, उन्हें प्रचुर वीतरागभाव प्रगट हुआ है किन्तु वे ऐसे चारित्र की भावना करते हैं कि उत्कृष्ट वीतरागी संयम प्रगट होकर, उसी भव में केवलज्ञान प्रगट हो जाए। इस काल में साक्षात् केवलज्ञान की प्राप्ति करा दे - ऐसे उत्कृष्ट चारित्र का पुरुषार्थ नहीं है। श्रद्धा की अपेक्षा से तो चौथे गुणस्थान से ही वीतरागभाव है; ऐसी सम्यक्श्रद्धापूर्वक वीतरागभाव प्रगट करना, अत्यन्त प्रशंसनीय है। भावसंयम के बिना उच्च स्वर्गपद अथवा मोक्षपद की प्राप्ति नहीं होती। यदि वीतरागी संयमदशा प्रगट न कर सके तो उसकी

प्रतीतिपूर्वक निर्मल सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान को स्थिर रखना चाहिए। सम्यग्दर्शन-ज्ञान भी धर्म की आराधना है और वह गृहस्थ भी कर सकते हैं।

‘जो चारित्र है, सो धर्म है’ - ऐसा कहा है, वह कौन सा चारित्र ? लोग घरबार छोड़कर, कपड़े बदलकर निकल जाते हैं, वह कहीं चारित्र नहीं है। किसी प्रकार का वेष धारण करना अथवा वस्त्रों का परित्याग करना, उसमें कोई चारित्र नहीं है। शुभराग भी

उत्तम संयमधर्म

चारित्र नहीं है किन्तु शरीर और विकार से भिन्न, निज आत्मस्वभाव का अनुभव करके, उस स्वभाव में विचरना ही चारित्र है। वह चारित्र सम्यग्दर्शनपूर्वक ही होता है और वही मुक्ति का कारण है। जिस जीव को ज्ञानी पुरुषों के द्वारा सत्धर्म का श्रवण ही प्राप्त नहीं हुआ, उसके यथार्थ संयम नहीं होता। जिसने सच्चे देव-गुरु की पहिचान करके गृहीत मिथ्यात्व का भी त्याग नहीं किया – ऐसा जीव, यदि बाह्य में दिगम्बर त्यागी भी हो जाए, तब भी उसे द्रव्यलिङ्गी भी नहीं कहा जाता क्योंकि द्रव्यलिङ्ग तो उस समय कहा जाता है, जबकि गृहीत मिथ्यात्व का अभाव करके व्यवहार पञ्च महाव्रत का यथार्थ रीति से पालन करता हो। यह द्रव्यलिङ्ग भी धर्म नहीं है। मिथ्यादृष्टि जीवों को साधुरूप से मानने में तो गृहीत मिथ्यात्व ही है। सच्चा गुरु कैसा होता है, इसका भी उसे विवेक नहीं है। निमित्तरूप से भी जिसने कुगुरु-अज्ञानी को स्वीकार किया है, वह जीव स्वयं अज्ञानी अर्थात् गृहीत मिथ्यादृष्टि है। ऐसा जीव, कितना ही शुभभाव करे तो भी वह आठवें स्वर्ग के ऊपर जा सके, वैसे शुभभाव उसके नहीं होते क्योंकि जिसने निमित्तरूप से ही कषाययुक्त देव-गुरु-शास्त्र को स्वीकार किया है, उसे अपने भावों में उतनी कषाय की मन्दता करने की शक्ति ही नहीं है कि वह आठवें स्वर्गलोक से ऊपर जा सके।

जिसने गृहीत मिथ्यात्व का त्याग करके निर्दोष अकषायी अर्थात् वीतरागी देव-गुरु-शास्त्र को माना है, उस जीव के इतनी कषाय की मन्दता हो सकती है कि वह नौवें ग्रैवेयक तक जा सकता है। जिसने यथार्थ निमित्तों को नहीं जाना, उस जीव के व्यवहार सम्यग्दर्शन भी दश धर्म प्रवचन

नहीं होता तथा व्यवहार चारित्र भी नहीं होता। वह गृहीत मिथ्यादृष्टि जीव यदि नग्न-दिगम्बर हो जाए, तब भी उसके द्रव्यलिङ्ग भी यथार्थ नहीं है तो फिर संयमधर्म कैसा ? वह तो मिथ्यादृष्टि है। सामान्यरूप से धर्म में जीव का माप करने की एक यह रीति है कि जिसे धर्मी जीव का साक्षात् उपदेश न मिला हो, अथवा पूर्वभव के धर्म श्रवण के संस्कार भी जागृत न हुए हों, उस जीव को धर्म नहीं होता। यदि कोई जीव ऐसा मानता है कि मुझे धर्म प्राप्त हुआ है तो यह निश्चित् करना चाहिए कि तू किस ज्ञानी धर्मात्मा के पास से धर्म को समझा है ? तुझे किस ज्ञानी का समागम हुआ है ? क्या तू अपने आप स्वच्छन्दता से धर्म समझा है ? स्वच्छन्दता से धर्म नहीं समझा जा सकता; न अज्ञानी जीव से धर्म समझा जा सकता है; अपने आप शास्त्र वाँचने से भी धर्म नहीं समझा जा सकता। धर्मी जीव से ही धर्म समझा जा सकता है। जो जीव अपने में धर्म समझने की पात्रता प्रगट करता है, उस जीव को धर्मी का ही उपदेश निमित्तरूप होता है – ऐसा नियम है। यद्यपि निमित्त कुछ करता नहीं है किन्तु धर्म प्राप्त करने में धर्मी जीव का ही निमित्त होता है; अधर्मी का निमित्त नहीं होता – ऐसा मेल है। इसलिए मुमुक्षु जीवों को सत्-असत् निमित्तों की पहिचान करना चाहिए।

पहले सत्समागम द्वारा आत्मा की पहिचान करके, सम्यग्दर्शन - ज्ञान प्रगट करने के पश्चात् ही वीतरागभावरूप उत्तम संयमधर्म होता है। उत्तम क्षमादि दश धर्मों के यथार्थ स्वरूप को पहिचानना चाहिए, उनके मूलस्वरूप को जाने बिना, मात्र रूढ़ि प्रमाण से बोलने अथवा शास्त्र वाँचने से आत्मा को कोई लाभ नहीं होता।

उत्तम संयमधर्म

भाई ! तू दशलक्षण धर्म का स्वरूप जाने बिना, उस धर्म का उद्यापन किस प्रकार करेगा ? दशलक्षण धर्म का स्वरूप जैसा है, उसे वैसा ही जानकर, अपने आत्मा में जितने अंश में वैसा वीतरागभाव प्रगट करे, उतने अंश में वास्तविक दशलक्षण पर्व का अपने आत्मा में उद्यापन किया है। जो धर्म के मूल स्वरूप को नहीं जानता और मात्र राग को ही धर्म मानता है, उसने वास्तविक धर्म के पर्व का उद्यापन नहीं किया किन्तु मिथ्यात्व का ही पोषण किया है। इसलिए सत्समागम द्वारा धर्म के यथार्थ स्वरूप को जानकर, ऐसी मिथ्या- मान्यताओं को छोड़ना चाहिए।

इस प्रकार उत्तम संयमधर्म का व्याख्यान पूर्ण हुआ।

तत्त्व ज्ञान से रहित…

तत्काल प्राणों को हरनेवाला विष खा लेना अच्छा,

भयङ्कररूप से सुलगती हुई अग्नि में प्रवेश करके

जलकर राख हो जाना अच्छा और अन्य किसी कारण

द्वारा यमराज की गोद में समा जाना अच्छा, परन्तु

तत्त्वज्ञान से रहित होकर इस संसार में जीना अच्छा

नहीं है।

  • श्री सुभाषितरत्नसन्दोह

उत्तम तपधर्म

चैतन्य के ध्यान में लीन बाहुबली मुनिराज ने एक वर्ष तक गर्मी-सर्दी और वर्षा में अविचलरूप से उपसर्ग सहन किये, चैतन्य के उग्र प्रतपन द्वारा विकार का अभाव करके केवलज्ञान प्रगट किया।

शत्रुञ्जयगिरि पर ध्यानस्थ पाण्डव मुनि भगवन्तों पर तप्तायमान अग्नि का उपसर्ग होने पर भी, वे अपने उत्तम ध्यानरूपी तप से विचलित नहीं हुए।

घोर उपसर्ग होने पर भी पार्श्वनाथ प्रभु निजस्वरूप के ध्यानरूप तप से विचलित नहीं हुए। न तो उन्होंने धरणेन्द्र के प्रति राग किया और न कमठ के प्रति द्वेष किया। वीतरागी रहकर केवलज्ञान प्रगट किया।

इस प्रकार स्वसन्मुख उपयोगरूप उग्र प्रतपन द्वारा कर्मों का अभाव करनेवाले उत्तम तपधर्म के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।

हे सन्तों! हमें भी उत्तम तपधर्म की आराधना प्रदान करो।

उत्तम तपधर्म

आज उत्तम तपधर्म का दिन है। भादव सुदी पञ्चमी को दिन ‘उत्तम क्षमाधर्म’ कहा जाता है और एकादशी के दिन ‘उत्तम तपधर्म’ कहलाता है किन्तु उससे ऐसा नहीं समझना चाहिए कि पञ्चमी के दिन उत्तम क्षमा के अतिरिक्त दूसरे धर्म होते ही नहीं हैं और एकादशी के दिन मात्र तपधर्म ही होता है। वास्तव में तो आत्मा के वीतरागीभाव में उत्तम क्षमादि दशों धर्म एक ही साथ हैं। पहले दिन पहला धर्म और दूसरे दिन दूसरा धर्म – ऐसा नहीं है परन्तु एक ही साथ दशों धर्मों का व्याख्यान न हो सकने के कारण क्रमशः एक-एक धर्म का व्याख्यान करने की पद्धति है। पञ्चमी-छठ इत्यादि दिन तो काल की अवस्था है - जड़ है, उसमें कहीं उत्तम क्षमादि धर्म नहीं भरे हैं। सम्यग्दर्शनपूर्वक आत्मा के वीतरागभाव में उत्तम क्षमादि धर्म विद्यमान हैं।

जिसे आत्मा की यथार्थ प्रतीति नहीं है, उसके उत्तम क्षमादि एक भी धर्म नहीं होता। उत्तम क्षमादि धर्म, सम्यक्चारित्र भेद हैं। मुख्यतः ये धर्म मुनिदशा में होते हैं।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2413.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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