दश धर्म प्रवचन
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प्रकाशकीय
वीतरागतत्व आलंबन के प्रतीक, शाश्वत पर्व दशलक्षण के स्वरूप पर प्रकाश डालनेवाले पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के मंगल प्रवचन ‘दश धर्म प्रवचन’ नाम से प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है।
वर्तमान शताब्दी में दृष्टिगोचर दिगम्बर जिनधर्म की प्रभावना में पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का अविस्मरणीय योगदान रहा है। पूज्यश्री ने स्थानकवासी श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय में जन्म लेकर, स्वयं बुद्ध की तरह न केवल सत्य का अनुसन्धान ही किया, उसे प्राप्त भी किया और प्रचारित भी किया। आन इसमें कोई मतभेद नहीं है कि यदि पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का उदय नहीं हुआ होता तो दिगम्बर जैन समाज में आध्यात्मिक जागृति का नितान्त अभाव ही रहता।
विक्रम सम्वत् १९७८ की वह पावन घड़ी, जिस दिन पूज्य गुरुदेवश्री के करकमलों में शासन स्तम्भ श्रीमद् भागवत् कुन्दकुन्दाचार्यदेव द्वारा विरचित समयसार परमागम आया, जिसे प्राप्त कर उन्होंने क्या नहीं पाया? क्या नहीं छोड़ा? भगवान समयसार स्वरूप शुद्धात्मा को पाया और मिथ्या मताग्रह का विष छोड़ा। तभी से लगातार ४० वर्षों तक पूज्यश्री के द्वारा वीतरागी जिनशासन की जो अविस्मरणीय प्रभावना हुई, वह आज देश-विदेश में अपनी जड़ें जमा चुकी है।
यद्यपि पूज्य गुरुदेवश्री आज भले उपस्थित नहीं हैं, तथापि उनकी वाणी कैसट्स, सी.डी. एवं डी.वी.डी. में अवतीर्ण होकर तथा सरसहित्व के रूप में प्रकाशित होकर, इस पुण्य काल के अन्त तक भव्यजीवों को मुक्तिमार्ग का बोध प्रदान करती रहेगी।
पूज्य गुरुदेवश्री के महान प्रभावना उदय में सैकड़ों जैन मन्दिरों एवं कई भव्य सद्गुणों का निर्माण हुआ है, जो उनके द्वारा प्रसारित भगवान महावीर के जीव मात्र को हितकारी आध्यात्मिक सन्देशों के व्यापक प्रचार-प्रसार में संलग्न है।
तीर्थधाम मंगलायतन भी पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के प्रभावना उदयवद्धी वटवृक्ष की एक शाखा है। अत्यन्त अल्पकाल में इस तीर्थधाम ने मात्र जैन, अपितु जैनेतर समाज के हृदय में भी अपना अमित प्रभाव स्थापित किया है। सत्य तो यह है कि तीर्थधाम मंगलायतन पूज्य गुरुदेवश्री एवं पूज्य बहिनश्री के तत्त्वज्ञान का प्रभावक ही है।
सत्साहित्य का प्रकाशन भी तीर्थधाम मंगलायतन की कई कल्याणकारी योजनाओं में से एक है। इसी के फलस्वरूप प्रस्तुत ग्रन्थ के द्वितीय संस्करण का प्रकाशन किया जा रहा है।
आचार्य भगवान श्री पद्मन्नदिव द्वारा रचित पद्मन्नदि पञ्चविंशतिका में समागत दश धर्मों के स्वरूप पर पूज्य गुरुदेवश्री ने लगभग सन् १९५०-५१ में ये प्रवचन प्रदान किये हैं, जो हिन्दी एवं गुजराती में श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़ से कई बार प्रकाशित हो चुके हैं।
दशलक्षण पर्व ही ऐसा पर्व है, जिसे सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज अत्यन्त उत्साह से मनाती है। इन दिनों वे लोग भी जिन मन्दिर आते हैं, जो वर्ष में इन दिनों के अलावा नहीं आते। मन्दिरों में जिनेंद्र पूजन, मण्डल विधान एवं स्वाध्यायादि के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। दश धर्मों के स्वरूप पर स्वाध्याय होता है। यद्यपि यह पर्व प्रत्येक वर्ष में तीन बार आता है, तथापि भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी में चतुर्दशी तक तो विशेषरूप से मनाया ही जाता है।
पर्व के इन दिनों में पूज्य गुरुदेवश्री दश धर्मों पर गम्भीर आध्यात्मिक शैली में प्रवचन प्रदान किया करते थे, उसी का सङ्कलन ब्रह्मचारी हरिलाल जैन, सोनगढ़ के प्रस्तुत ग्रन्थ के रूप में गुजराती में किया
सम्पादकीय
परम पूज्य आचार्य पद्मन्नदिव द्वारा रचित पद्मन्नदि पञ्चविंशतिका में समागत दश धर्मों के स्वरूप पर पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के अध्यात्मपूर्ण मधुर प्रवचनों का यह सम्पादित संस्करण, सद्प्रेमी साधर्मियों को समर्पित करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है।
दशलक्षण पर्व, वर्ष में तीन बार - चैत्र, भाद्रपद और माघ माह में शुक्लपक्ष की पञ्चमी में चतुर्दशी तक आता है, पर सामान्यतः भाद्रमाह में ही इसे मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है।
सत्य तो यह है कि पर्व, किसी तिथि अथवा दिनों में नहीं है, पर्व शब्द का अर्थ तो ‘पवित्रता’ होता है, जो कि मोह-राग-द्वेषरूप विकारीभावों के अभावस्वरूप वीतरागता परिणतिरूप होता है। जिस आत्म परिणति में यह पवित्रता प्रगट होती है, उसके लिए तो सदा ही पर्व है। दिनों अथवा तिथियों में पर्व नहीं, पर्व का उपचार होता है।
पर्व भी दो प्रकार के होते हैं - (१) शाश्वत् पर्व, (२) तात्कालिक पर्व। शाश्वत् पर्व में दशलक्षण, अष्टाह्निका, रत्नत्रय, सोलहकारण इत्यादि पर्व आते हैं तो तात्कालिक पर्वों में तीर्थङ्करों के कल्याणक पर्व अथवा अन्य किसी घटना विशेष से सम्बन्धित पर्व होते हैं।
यहाँ वर्णित दशलक्षण पर्व, जिन्हें सामान्यतः दश धर्म भी कहा जाता है, आत्मा की उस वीतराग परिणति का नाम है, जो मिथ्यात्व, एवं क्रोधादि कषायों के अभावपूर्वक होती है। यद्यपि वीतराग परिणति का कोई प्रकार नहीं है परन्तु अनेक प्रकार के विकारी के अभाव में होने के कारण उस परिणति को अनेक नाम दिये जाते हैं, जैसे क्रोध के अभाव से क्षमा और मान के अभाव से उसी परिणति को मार्दव आदि कहा जाता है।
प्रकाशकीय
था, जिसका हिन्दी रूपान्तरण कार्य श्री मगनलाल जैन, ललितपुरवालों ने किया था।
विगत कई वर्षों से यह ग्रन्थ हिन्दी भाषा में अनुपलब्ध होने से हमने इसके प्रकाशन का निर्णय लिया है। प्रकाशन से पूर्व इसमें अनुवाद एवं सम्पादन सम्बन्धी आवश्यक संशोधन मंगलायतन के विद्वान् श्री देवेन्द्रकुमार जैन, द्वारा किये गये हैं, जिन्हें मैंने भी आद्योपान्त पढ़ा है।
इस ग्रन्थ के प्रकाशनकर्ता के रूप में हमें श्रीमती शान्तिबेन के० गाँधी परिवार, मुम्बई का आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ है - तदर्थ यह परिवार धन्यवाद का पात्र है।
सभी स्वाध्यायी आत्मौत्सुग्य इस प्रवचन ग्रन्थ का स्वाध्याय करके निज आत्महित के सम्मुख हों - इसी भावना के साथ -
दिनाङ्कः ०३ फरवरी २०१०
तीर्थधाम मंगलायतन का
सप्तम वार्षिक महा-महोत्सव
पवन जैन
श्री आदिनाथ-कुन्दकुन्द-कहान
दिगम्बर जैन ट्रस्ट
VIII
दूसरी यह बात भी है कि उत्तम वीतरागता की परिपूर्णता के अभाव में समाज के जीवन में कुछ मन्दकषायता राखी जा रही है, जिसमें क्षमा, मार्दव इत्यादि सम्यग्दर्शन मन्दप्रवर्तन रहता है - इन का आरोप करके उस वीतराग परिणति को भी उक्त नाम से सम्बोधित किया जाता है।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एक वीतराग परिणति के विविध अपेक्षाओं से दिये गये दश नाम ही दशलक्षण धर्म कहलाते हैं। इसमें वास्तव में धर्म दश नहीं, वरन् धर्म का निरूपण दश प्रकार से है। वस्तुतः धर्म तो इनमें एक वीतराग सम्यक्चारित्रभाविरूप ही है।
सम्यक्चारित्र, सम्यग्दर्शन के बिना नहीं हो सकता - यही कारण है कि प्रत्येक धर्म के पूर्व ‘उत्तम’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जो सम्यग्दर्शन की अनिवार्यता का सूचक है। तात्पर्य यह है कि सम्यग्दर्शनपूर्वक होनेवाली वीतरागचारित्ररूप परिणति ही निश्चय धर्म है और उस भूमिका में प्रवर्तमान मन्दकषायरूप राग, व्यवहार के धर्म कहा जाता है। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि सम्यग्दर्शन के बिना वीतराग परिणति का जन्म नहीं होता और वीतराग परिणति के अभाव में मात्र मन्दराग को धर्मसंज्ञा व्यवहार से भी प्राप्त नहीं होती।
इन सभी तथ्यों का पूज्य गुरुदेवश्री ने इन प्रवचनों में विस्तृत स्पष्टीकरण किया है।
पूज्य गुरुदेवश्री के ये प्रवचन हिन्दी एवं गुजराती भाषा में कई बार प्रकाशित हुए हैं परन्तु वर्तमान में काफी समय से हिन्दी में इनकी अनुपलब्धता के कारण इन्हें सम्पादित कर प्रकाशित किया जा रहा है। इनके सम्पादन में जो-जो कार्य किया गया है, वह इस प्रकार है -
- सम्पूर्ण प्रवचनों को गुजराती के साथ अनुवाद की दृष्टि से मिलाकर, आवश्यक संशोधन किये गये हैं।
- लम्बे-लम्बे गद्यांशों को छोटा किया गया है।
- भाषा को सरल-प्रवाहमयी बनाने का प्रयास किया गया है।
VIII
- प्रत्येक धर्म के प्रवचन से पूर्व, उस धर्म सम्बन्धी चित्र एवं उसका संक्षिप्त परिचय देनेवाला वाक्य दिया है, जो ‘आराधना’ पुस्तिका से लिया गया है।
- दश धर्मों का स्वरूप विविध ग्रन्थों के माध्यम से भी ज्ञात हो सके एवं स्वाध्यायी विद्वान, इन धर्मों पर स्वाध्याय करते हुए उनका उद्धरण दे सकें - तदर्थ ग्रन्थ के अन्त में ‘दश धर्म-कुछ प्रश्नोत्तर’ दिये गये हैं। ज्ञात हो कि ये सभी प्रश्नोत्तर अध्यात्मबल मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं, इन्हें आवश्यक परिवर्तन के साथ यहाँ दिया गया है।
- पूर्व संस्करण का नाम ‘दशलक्षण धर्म’ था, जिसे बोलने की सुविधा के लिए ‘दश धर्म प्रवचन’ किया गया है।
इन सभी कार्यों के शक्तिदाता परम उपकारी पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी ही हैं, उनका ही सबकुछ इस ग्रन्थ में है। साथ ही मुझे पूज्य गुरुदेवश्री के प्रति भक्ति उत्पन्न कराने में निमित्तभूत मेरे विद्यागुरु एवं पूज्य गुरुदेवश्री के अनन्यभक्त पूज्य पण्डित श्री कैलाशचन्द्रजी, अलीगढ़ हैं, जिनके पावन चरणों में रहकर मुझे तत्त्वज्ञान सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है। मेरे जीवन शिल्पी इन दोनों महापुरुषों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
इस सम्पादन कार्य को आद्योपान्त पढ़कर आवश्यक सुझाव प्रदान करते हुए श्रीमान् श्री पवन जैन एवं समय-समय पर समुचित सुझावों के लिए पण्डित श्री राकेश जैन, शास्त्री, जैनदर्शनचार्य के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।
सभी आत्माभिलषी गुरुदेवश्री की इस महा सद्भावनानी का अवगाहन करके अनन्त सुखी हों - इस पावन भावना के साथ।
- देवेन्द्रकुमार जैन
दिनाङ्क - ०९ फरवरी २०१०
तीर्थधाम मलयलायत
अतीलागढ़ (३०१०)
अनुक्रमणिका
शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म
१
उत्तम क्षमाधर्म
११
उत्तम मार्दवधर्म
३०
उत्तम आर्जवधर्म
४२
उत्तम सत्यधर्म
५०
उत्तम शौचधर्म
५८
उत्तम संयमधर्म
६३
उत्तम तपधर्म
७२
उत्तम त्यागधर्म
७९
उत्तम आकिञ्चन्यधर्म
९०
उत्तम ब्रह्मचर्यधर्म
९७
दश धर्म : कुछ प्रश्नोत्तर
११०
देहातीत होती है मुनिराज की दशा
जिनके अशरीरी ज्ञायक भगवान आत्मा की दृष्टि-ज्ञान और रमणता वर्त रही है - ऐसे निर्ग्रन्थ मुनिराज को ‘मात्र देह, वह संयम हेतु होय जब’ अर्थात् संयम के निमित्तभूत शरीर है परन्तु शरीर की कुछ पड़ी नहीं है; देहातीत जैसी दशा हो गयी है - ऐसी सामान्यदशा की भावना सम्यग्दृष्टि को होती है। श्रावक भी संयम के मनोरथ का सेवन करता है।
अहा! मुनिराज को देह है परन्तु देह की कोई दरकार नहीं है। एक निजत्म-साधना के अतिरिक्त अन्य किसी की उन्हें कुछ पड़ी नहीं है। संघ, शिष्य अथवा संख्या की तो नहीं, परन्तु कदाचित् संयम के हेतुभूत ऐसे शरीर की भी कुछ नहीं पड़ी है। देह होने पर भी जिनकी दशा देहातीत वर्तती है - ऐसी सहजदशा हो जाती है।
- (वचनामृत प्रवचन, गुजराती, ५/११५)
ॐ
॥ परमात्मने नमः ॥
दश धर्म प्रवचन
शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म
‘दंसण मूलो धम्मो’ अर्थात् धर्म का मूल सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन ही प्रथम धर्म है और आत्मा के ज्ञान-चारित्रादि समस्त धर्मों का मूल है। सम्यग्दर्शन के बिना भगवान ने धर्म नहीं कहा है। सम्यग्दर्शन इस जगत में सर्वश्रेष्ठ कल्याणकारी वस्तु है। उसकी महिमा अपूर्व है।
हे भव्य! अनन्त काल में आत्मस्वरूप समझने का यह अवसर आया है। यदि सम्यग्दर्शन के द्वारा यथार्थ नहीं समझा तो कोई तुझे शरणभूत नहीं है। पुण्य-पाप रहित चैतन्यस्वभाव की प्रतीति के बिना तेरे त्यागादि सब व्यर्थ हैं, उनसे संसार के दुःखों का अन्त नहीं आयेगा।
आत्मस्वभाव की यथावत् प्रतीति ही धर्म है
आत्मस्वभाव की यथावत् प्रती
दश धर्म प्रवचन
शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म
‘शरीरदया’ नहीं कहा जाता क्योंकि शरीर, जीव नहीं है। लोग शरीर की क्रिया से माप करते हैं, वह ठीक नहीं है। जीव तो शरीर से भिन्न निरन्तर चैतन्यस्वरूप है, उसे श्रद्धा-ज्ञान स्थिरता में ही स्थिर रखना और विकार में न जाने देना, जीवदया है।
‘परजीव की रक्षा करूँ’ - ऐसी दया की वृत्ति परमार्थ से जीवहिंसा ही है, इस प्रकार प्रथम श्रद्धा में स्वीकार करना चाहिए। यद्यपि ऐसी मान्यता होने के पश्चात् भी अस्थिरता के कारण शुभविकल्प आते हैं किन्तु वे धर्म नहीं हैं।
मिथ्यादृष्टि जीव, जीवदशा के शुभावभाव के समय ऐसा मानता है कि मैं परजीव को बचा सकता हूँ तथा इस शुभावभाव से मुझे धर्म होगा। सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा जीव यदि युद्धादि कर रहा हो और उसके अशुभपरिणाम हों तो भी उसे अन्तरङ्ग में भान होता है कि यह युद्ध को या देह की क्रिया मेरी नहीं है; अशुभभाव और पुरुषार्थ के दोष से होते हैं, उतनी हिंसा है किन्तु वास्तव में वह मेरा यथास्वरूप नहीं है। उस समय इन दोनों जीवों में से मिथ्यादृष्टि जीव के अनन्त हिंसा प्रवर्तमान है और सम्यग्दृष्टि जीव के अल्प हिंसा है। अरे! श्रद्धा की अपेक्षा से तो युद्ध के समय भी वह अहिंसक है क्योंकि उसके अंशतः शुद्धचेतना परिणाम प्रवर्तमान है।
जितने अंश में शुद्ध चेतनापरिणाम प्रवर्तमान हों, उतने अंश में युद्ध के समय भी जीवदया वर्त रही है और मिथ्यादृष्टि जीव के किञ्चित् भी शुद्धचेतना परिणाम नहीं होने से उसे जीववध के भाव के समय भी जीवहिंसा ही है। यह माप तो
अनन्तशुद्धचेतना परिणामों से है। शरीर की क्रिया तो दूर रही किन्तु पुण्य-पाप के भावों पर से भी जीवदयारूपी धर्म का यथार्थ माप नहीं होता।
इस प्रकार धर्म के चारों लक्षणों में अभेदरूप से शुद्धचेतना परिणाम ही धर्म है।
परमार्थ धर्म अर्थात् निश्चय धर्म या सच्चा धर्म तो एक ही प्रकार का है, फिर उसे जीवदया कहीं अथवा वस्तुस्वभाव कहीं, उसमें मात्र शुद्ध चेतना परिणाम ही धर्म है। ‘शुद्ध चेतना को धर्म कहते हैं और कभी-कभी शुभभाव को भी धर्म कहते हैं’ - ऐसा स्वरूप निश्चय धर्म का नहीं है। निश्चय धर्म तो एक ही प्रकार का है।
‘मैं आत्मा कौन हूँ’ - इस भाव के बिना शुद्ध चेतना कहाँ से लायेगा? बाह्य में जीव मरे या जिएँ, उनकी संख्या से हिंसा अथवा दया का वास्तविक माप नहीं होता। सम्यग्दर्शन होने पर अहिंसा का प्रारम्भ होता है, तथापि सम्यग्दृष्टि के भी अस्थिरता के कारण जितनी रागादिक वृत्ति उत्पन्न होती है, उतनी चारित्र अपेक्षा से हिंसा है किन्तु जो आत्मभान प्रवर्तमान है, उतनी जीवदया है। इस प्रकार साधक के आंशिक अहिंसा और आंशिक हिंसा - दोनों साथ में ही होती हैं। अज्ञानीयों के एकान्त जीवहिंसा ही है; पूर्ण वीतरागी ज्ञानी के सम्पूर्ण अहिंसा है। वस्तुस्वभाव जैनशासन में त्रिकाल धर्म का ऐसा ही स्वरूप है।
अपने भावों में अनन्त परद्रव्यों का स्वामित्व या अभिमान न होने देना और अपने ज्ञानमात्र स्वरूप को पुण्य-पाप से भिन्नरूप
दश धर्म प्रवचन
शुद्ध ज्ञान चेतना परिणाम ही धर्म
में शुद्ध में स्थिर रखना - ऐसी यथार्थ जीवदया है, उसका जगत् को माहात्म्य नहीं है और शुभराग का माहात्म्य है। जिसने पुण्य के विकल्प से अपना लाभ माना है, उसने पुण्य को अपना स्वरूप ही माना है क्योंकि जिसे अपना स्वरूप मानता है, उसी से अपने को लाभ मानता है।
जिस जीव ने पुण्य को अपना स्वरूप माना, उसने जगत् के समस्त आत्माओं के स्वभाव को भी पुण्यरूप माना। इस प्रकार जगत् के समस्त आत्माओं को विकारी माना है। उसने अपनी मान्यता में विश्व के सर्व जीवों की हिंसा की है। जीवहिंसा के इस पाप को जगत् को ज्ञान नहीं है।
महान हिंसादि के अशुभभाव करने की तो बात ही नहीं है क्योंकि अशुभभावों में तो तीव्र आकुलता है किन्तु जो शुभभाव होते हैं, उनमें भी आकुलता ही है। इन दोनों आकुलताओं में हिंसा है; उससे रहित निराकुलता और ज्ञान-चेतना का जितना अनुभव है, उतनी ही जीवदया है। अपने शुद्ध जीवपरिणाम की रक्षा करना, उसका हनन न होने देना ही शुद्ध चेतना परिणामरूप धर्म है। शुद्ध चेतना परिणाम के बिना दया अथवा दर्शन-ज्ञान-चारित्र एवं क्षमा इत्यादि कोई धर्म सच्चा होता ही नहीं है।
‘परजीव को बचाने का भाव करना, अपना कर्तव्य है’ - यह मान्यता मिथ्या है। परजीव के बचाने का भाव तो विकार है, तो क्या विकार करना आत्मा का कर्तव्य है? ज्ञानी तो जानते हैं कि मात्र ज्ञातारूप से स्वस्वभाव में स्थिर रहना हमारा कर्तव्य है। जितनी मैं अपने ज्ञातास्वभाव में स्थिर रहूँ, उतना धर्म है और ज्ञातापने के अतिरिक्त
अन्य किसी वृत्ति की उत्पत्ति होना मेरा कर्तव्य नहीं है, इस प्रकार ज्ञानी जीव ज्ञाता-दृष्टारूप से अपने चैतन्यपरिणाम को स्थिर रखता है, वही धर्म है।
उक्त सम्पूर्ण कथन का सार यह है कि वस्तुस्वरूप धर्म, उत्तमक्षमादि दशलक्षण धर्म, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप धर्म और जीवस्वरूप धर्म - इन चार प्रकारों की प्ररूपणा में शुद्ध चेतना परिणाममय एक ही प्रकार का धर्म है - ऐसा बताया है। तात्पर्य यह है कि निश्चय धर्म एक ही प्रकार का है।
सम्पत्ति विपत्ति में समभाव
जिस प्रकार चन्द्रमा आकाश में निरन्तर चक्कर लगाता रहता है और उसी प्रकार यह प्राणी संसार में सदा परिभ्रमण करता रहता है। जैसे चन्द्रमा उदय-अस्त एवं कलाओं की हानि-वृद्धि को प्राप्त होता रहता है और उसी प्रकार संसारी प्राणी भी जन्म-मरण तथा सम्पत्ति की हानि-वृद्धि को प्राप्त होता रहता है, जैसे चन्द्रमा मध्य में कलुषित (काला) रहता है उसी प्रकार संसारी प्राणी का हृदय भी पाप से कलुषित रहता है तथा जिस प्रकार चन्द्र एक राशि (मीन-मेष आदि) से दूसरी राशि को प्राप्त कर लेता है, तदनुसार संसारी प्राणी भी एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को ग्रहण करता रहता है - ऐसी स्थिति होने पर भी सम्पत्ति और विपत्ति को प्राप्त में जीव को हर्ष और विषाद किसलिए करना चाहिए? अर्थात् नहीं करना चाहिए।
- प्रबन्धनन्द पञ्चविंशतिका
उत्तम क्षमाधर्म
राजा श्रेणिक द्वारा महा उपसर्ग किये जाने पर भी मुनिराज यशोधर, स्वरूप-आराधना से विचलित नहीं हुए; उन्होंने क्षमाभाव धारण करके राजा श्रेणिक को भी सत्धर्म प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान किया।
इधर राजा श्रेणिक ने भी धर्म की विराधनास्वरूप अनन्त क्रोधपरिणामों का परित्याग करके, सम्यग्दर्शनपूर्वक धर्म की आराधना प्रगट की। वस्तुतः यह भी उत्तम क्षमा की आराधना का एक प्रकार है।
क्रोध के बाह्य प्रबल उपस्थित होने पर भी, रञ्जय की दृढ़ आराधना के बल से क्रोध की उत्पत्ति न होने देना और वीतरागभावरूप रहना; असह्य प्रतिकूलता में भी क्रोधित होकर आराधना में भङ्ग नहीं पड़ने देना, उत्तम क्षमाधर्म की आराधना है। ऐसी क्षमा के आराधक सन्तों को हमारा नमस्कार हो।
हे सन्तो! हमें भी उत्तम क्षमाधर्म की आराधना प्रदान करो।
आज से दशलक्षणपर्व प्रारम्भ होता है। सबसे पहला दिन उत्तम क्षमा का है। चारित्रदशा में प्रवर्तमान मुनियों के उत्तम क्षमादि दश प्रकार के धर्म होते हैं। इन उत्तम क्षमादि धर्मों से ही चारित्रदशा होती है, वह चारित्र मोक्ष का कारण है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान, चारित्र के कारण हैं। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान को मोक्षमार्ग कहना उपचार है क्योंकि जिसे सम्यग्दर्शन-ज्ञान हुआ हो, उसे अवश्य ही अल्पकाल में सम्यक्चारित्र प्रगट होता है, इसलिए सम्यग्दर्शन होते ही मोक्षमार्ग कह दिया है किन्तु मोक्ष का साक्षात् कारण तो वीतरागी चारित्रदशा है। उस चारित्रदशा में क्षमादि दश प्रकार के धर्म हैं। इन उत्तम क्षमादि दश धर्मों की आराधना का पर्व आज से प्रारम्भ हो रहा है। ‘दशलक्षणपर्व’ का अर्थ है ‘मोक्ष की आराधना का महोत्सव।’
आज का दिन ‘उत्तम क्षमा’ का माना जाता है। वस्तुतः सम्यग्दर्शन के बिना उत्तम क्षमा होती ही नहीं। लोकरीति में शुभभाव को क्षमा कहते हैं, उसका निषेध करने के लिए यहाँ ‘उत्तम क्षमा’ कहा गया है। उत्तम क्षमा का अर्थ है, सम्यग्दर्शनसहित वीतरागभावरूप क्षमा।
निश्चय से अपना आत्मस्वभाव त्रिकाल जायकर्मय है, उसकी प्रतीति एवं बहुमान करना तथा राग-द्वेष क्रोधादि की रुचि को छोड़ना ही उत्तम क्षमाधर्म की यथार्थ आराधना है। आत्मस्वभाव का
दश धर्म प्रवचन
उत्तम क्षमाधर्म
अनादर करके, पुण्य-पाप की रुचि करना, क्रोध है और आत्मस्वभाव के आदर द्वारा पुण्य-पाप की रुचि को छोड़ देना ही उत्तम क्षमाधर्म है।
वस्तुतः दश दिनों को पर्व कहना तो उपचार है; आत्मस्वभाव की प्रतिपत्तिपूर्वक चारित्रधर्म की दश प्रकार से आराधना करना ही साधकजीव का सच्चा पर्व है। पर्व अर्थात् आराधना। उस आराधना का आरोप करके अमुक दिन को ‘पर्व’ कहना व्यवहार है किन्तु जो आत्मा अपने में आराधकभाव प्रगट करता है, उसके लिए व्यवहार से दिन को पर्व कहा जाता है। जिसे आत्मा का भान नहीं है, उसके अपने में ही पर्व नहीं है, तब फिर दिन में भी किसका उपचार किया जायेगा ?
आत्मा की पर्याय में होनेवाले पुण्य-पाप की रुचि ही अनन्त क्रोध है। ज्ञायक स्वभाव की रुचि के द्वारा उस क्रोध का नाश करना ही उत्तम क्षमापरु चारित्रदशा प्रगट होने का बीज है और स्वभाव की रुचि के पश्चात् विशेष स्थिरता द्वारा वीतरागभाव प्रगट करके, पुण्य-पाप का नाश करना, उत्तम क्षमा है। ऐसी उत्तम क्षमा मुनिदशा में होती है। आज उस उत्तम क्षमा की आराधना का दिन है।
मुनियों के तो उत्तम क्षमा की आराधना सदैव होती है। वह आराधना तो जीव जब चाहे उसी समय कर सकता है किन्तु आज विशेषरूप से उसका स्मरण करके साधक जीव उसकी भावना करते हैं।
आज माङ्गलिक रूप से आचार्य पद्मनन्दिकृत ‘पद्मनन्दिपञ्चविंशतिका’ में से उत्तम क्षमाधर्म के स्वरूप का प्रवचन होता है :-
उत्तम क्षमाधर्म
(शालिनी)
जड़जन्तुक्रतबाधा कोहाशा प्रयादावपि सति न विकारं यमनो याति साधोः।
अमल विपुलचित्तंरत्नमा सा क्षमादौ शिवपथपथिकानां सत्सहायात्ममेति ॥ ८२ ॥
मुख-अज्ञानियों के द्वारा वध, बन्धन, क्रोध, हास्य आदि किये जाएँ, तथापि साधु अपने निर्मल और गम्भीर चित्त से विकृत नहीं होते, वही उत्तम क्षमा है। ऐसी उत्तम क्षमा मोक्षमार्ग के पथिक सन्तों को यथार्थतया सहायता करनेवाली है।
उत्तम क्षमादि दश धर्मों में मुख्यतया तो चारित्र की ही आराधना है, अर्थात् इन दश धर्मों का पालन मुख्यत: मुनिदशा में ही होता है और श्रावक के गौणरूप से अपनी-अपनी भूमिका के अनुसार अंशतः होता है। मोक्षमार्ग तो दर्शन-ज्ञान-चारित्र की एकतारूप है, वह चारित्रदशा में ही होता है। सम्यग्दृष्टि जीवों के नियम से चारित्र प्रगट होता ही है, इसलिए चौथे-पाँचवें गुणस्थान में भी उपचार से मोक्षमार्ग कहा है। उत्तम क्षमा अर्थात् सम्यग्दर्शनसहित क्षमा। उत्तम क्षमा, मिथ्यादृष्टि के नहीं होती।
क्षमा के पाँच प्रकार हैं। उनमें से चार तो पुण्यबन्ध के कारणरूप हैं और पाँचवें को ‘उत्तम क्षमा’ कहा जाता है, वह धर्म है।
(१) ‘यदि मैं क्रोध करूँगा तो मुझे हानि होगी; यदि मैं इस समय सहन नहीं करूँगा तो भविष्य में मुझे अधिक हानि होगी’ – ऐसे भाव से क्षमा करना, रागपरूप क्षमा है। जिस प्रकार निर्बल मनुष्य, बलवान का विरोध नहीं करता, वैसे 'यदि मैं क्षमा करूँ तो
मुझे कोई हैरान नहीं करेगा’ – ऐसे भाव से क्षमा रखना, बन्ध का ही कारण है क्योंकि इसमें क्रोधादि करने की भावना दूर नहीं हुई। मेरा स्वरूप ही किसी प्रसङ्ग पर क्रोध करने का नहीं है, मैं तो ज्ञान करनेवाला ही हूँ – ऐसी प्रतीति के बिना कभी भी उत्तम क्षमाधर्म नहीं होता किन्तु शुभाशुभभाव होती है, वह बन्ध का कारण है, धर्म नहीं है।
(२) यदि मैं क्षमा करूँ तो दूसरे को और से मुझे लाभ होगा – ऐसे भाव से मालिक आदि की बातें (फटकार) सहन करे और क्रोध न करे तो वह भी वास्तविक क्षमा नहीं है।
(३) यदि मैं क्षमा नहीं करूँगा तो कर्मबन्ध होगा और नरकादि दुर्गति में जाना पड़ेगा, इसलिए मैं क्षमा करूँ तो कर्मबन्ध रुक जाए – ऐसे भाव से क्षमा करना भी सच्ची क्षमा नहीं है; वह क्षमा, बन्ध का कारण है।
(४) क्रोधादि न करने की वीतराग की आज्ञा है और शास्त्रों में भी वैसा कहा है; इसलिए मुझे क्षमा करना चाहिए, जिससे मुझे पापबन्ध न हो – ऐसे भावों से क्षमा धारण करना भी पराधीन क्षमा है, राग है; उसमें धर्म नहीं होता।
उपरोक्त चारों प्रकार की क्षमा, बन्ध का कारण है क्योंकि क्षमा के उन चारों प्रकारों में कहीं भी स्व-आत्मा का लक्ष्य नहीं आया किन्तु परलक्ष्य से ही राग को अल्प करके क्षमा धारण की है, वह सहज क्षमा नहीं है।
(५) उत्तम क्षमा तो सहज वीतरागतापरूप है। आत्मस्वरूप को भूलकर, पुण्य-पाप की रुचि करना ही महान क्रोध है और आत्मा
के त्रैकालिक स्वरूप की रुचि के द्वारा शुभाशुभभाव की रुचि को छोड़ देने से वीतरागी क्षमाभाव प्रगट होता है।
मुनिदशा में शरीर को सिंह-बाघ खाए जा रहा हो, फिर भी उस ओर की कोई वृत्ति ही उत्पन्न नहीं हो। अशुभवृत्ति तो नहीं किन्तु शुभवृत्ति भी उत्पन्न न हो – ऐसी आत्मा की उत्कृष्ट आनन्दमय वीतरागदशा ही उत्तम क्षमा है और वही धर्म है। उसमें दुःख नहीं, किन्तु आनन्द है।
इस गाथा में अज्ञानी जीवों को ‘जड़जन’ कहा है। जिन्हें चैतन्यस्वरूप आत्मा का भान नहीं है और रागादि को ही आत्मा मानते हैं, उन्हें परमार्थ से ‘जड़’ कहते हैं। उन अज्ञानियों के द्वारा कहे गये कठोर वचन, ज्ञानीजन स्वभावविहित रहकर सहन करते हैं – यह उत्तम क्षमा है। साधुजन, चाहे जैसे प्रतिकूल प्रसङ्गों पर भी अपने धीर-वीर स्वभाव से च्युत नहीं होते। आत्मस्वभाव की अरुचि जिसका लक्षण है – ऐसे क्रोध का त्याग करके जिन्होंने सावरकक्षा प्रगट की है और तत्पश्चात् स्वरूप-स्थिरता के विशेष पुरुषार्थ द्वारा धीर होकर ज्ञानस्वरूप में लीन हो गये हैं, उन सन्तों को बाह्य में कौन प्रतिकूल अथवा अनुकूल है, उससे प्रयोजन नहीं होता। जो अपने पूर्णरूप को स्वभाव में संयोजित करके समभावपूर्वक परिणमन करते हैं, उनके उत्तम क्षमा होती है। मोक्षमार्ग में विचरनेवाले साधुओं को यह उत्तम क्षमा सर्वप्रथम सहायक है।
आत्मा को मोक्षमार्ग में जाने के लिए कोई परपदार्थ सहायक नहीं है किन्तु उत्तम क्षमाधर्म अपनी निर्मल पर्याय ही अपने को सहायक है – ऐसा कहकर आचार्यदेव ने मङ्गलाचरण किया है।
दश धर्म प्रवचन
जिन्होंने अपने चैतन्यस्वरूप का भान द्वारा पुण्य-पाप दोनों को समान माना है और जिनके ज्ञायकदशा प्रगट हुई है, ऐसे मुनियों की चित्त धीर-वीर होता है। उनकी परिणति में अनन्त धैर्य प्रगट हुआ है, इस कारण मन में क्षोभ नहीं होता और पुरुषार्थ में वीरता है, इसलिए वे स्वभाव में स्थिर रहने का कार्य करती है। बाह्य में यदि कोई निन्दा करता है तो किसकी ? और स्तुति करता है तो किसकी ? बन्धन करता है तो किसे ? और यदि सेवा करता है तो किसकी ? यह शरीर तो मैं नहीं हूँ और मेरे आत्मा को कोई बन्धनादि के द्वारा हानि नहीं पहुँचा सकता, ऐसा भान तो सम्यग्दृष्टि को भी होता है परन्तु उसके पश्चात् विशेष पुरुषार्थ के द्वारा चारित्रदशा प्रगट होने पर विकल्प भी उत्पन्न न हो और सहजक्षमा प्रगट हो, वह उत्तम क्षमाधर्म है।
कोई जीव मुझे लकड़ी मारे और मैं सहन करूँ – ऐसा मानकर क्षमा रखना, धर्म नहीं है। इनका कारण यह है कि लकड़ी शरीर को लगती है, तथापि ‘मुझे लकड़ी लगी’ – ऐसा मानना ही मिथ्यात्व है। कोई कठिन से कठिन लकड़ी का ढेर हो सहन करना है अथवा बन्दूक की गोलियाँ मन शरीर पर बरसे, उन्हें भी सहन करना है, तथापि ऐसा मानता है कि ‘मैंने बहुत सहन किया है, इससे दूसरों का हित होगा, दूसरों के हित के लिए ही मैं क्षमा करता हूँ’ – तो ऐसा माननेवाला जीव मिथ्यादृष्टि है; उसके किञ्चित् भी धर्म नहीं है। परमार्थतः तो उसके स्वरूप को अरुचिरूप महा क्रोध विद्यमान है। ऐसे जीवों को रागपरूप क्षमा कभी भी मोक्ष की सहायक नहीं है किन्तु वह तो संसार का ही कारण है।
वीतरागी उत्तम क्षमा ही मोक्ष की सहायक है, उस उत्तम क्षमा
उत्तम क्षमाधर्म
चारित्र के द्वारा मुनिजन सम्पूर्ण वीतरागता प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। जिनके सम्यग्दर्शन होता है, उन्हें चारित्रदशा प्रगट करने के लिए अनन्त पुरुषार्थ करना शेष है। चारित्र, धर्म है। वह धर्म, वीतरागतापरूप है। सम्यक् आत्मभावपूर्वक स्वभाव के सेवन द्वारा वीतरागता प्रगट करना, आराधना है और वह मोक्षमार्ग है।
यह उत्तम क्षमा धर्म प्रगट करने के लिए प्रथम तो उपयोगस्वरूप आत्मा को क्रोधादि से भिन्न जानना चाहिए। इस पहिचान के पश्चात् ही उत्तम क्षमादि यथार्थ भावनाएँ हो सकती हैं।
शुभाशुभरागादिक में कर्तापने की रुचि ही अपने त्रैकालिक ज्ञायक स्वभाव की अरुचिरूप अनन्तानुबन्धी क्रोध है, आस्रव है। चैतन्यस्वरूप आत्मा की रुचि प्रगट करके शुभाशुभभावों की रुचि छोड़ देने से, स्वसन्मुखतासे वीतरागीभाव प्रगट होता है, वह उत्तम क्षमा है। यह उत्तम क्षमा साधक जीवों को मोक्षमार्ग में सहचरी है – यह बात प्रथम श्लोक में बतलायी है।
अब, उत्तम क्षमा से विरुद्ध क्रोधाभाव, मुनीश्वरों को दूर ही त्याग देना चाहिए, ऐसा श्री आचार्यदेव कहते हैं –
(बसन्ततिलका)
श्रामण्योपयुतरूपरुच्यनुगुणा यक्षाशा-
पत्रप्रसूतनिचितोऽपि फलाढ्यदन्त्या।
याति क्षयं क्षणत एव घनाग्रकोप-
दावानलात् त्यजत तं यतयोऽतिदूरम् ॥ ८३ ॥
श्री पद्मनन्दि आचार्यदेव कहते हैं कि सम्यग्दर्शनादि गुणों से युक्त मुनिवर पवित्र वृक्ष के समान हैं और उत्तम क्षमादि गुण उसकी
दश धर्म प्रवचन
उत्तम क्षमाधर्म
साधना, पत्र और फूलों के समान है। अल्पकाल में ही इस वृक्ष पर मोक्षरूपी फल आनेवाले हैं किन्तु यदि क्रोधरूपी दावाग्नि उसमें प्रवेश कर जाए तो वह मुनिदशारूपी वृक्ष, कुछ भी फल दिये बिना बात की बात में नष्ट हो जाता है; इसलिए हे मुनिराजो! क्रोधादि को दूर से ही त्याग दो।
यहाँ कहते हैं कि मुनिराज वृक्ष समान हैं और सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्र उसकी शाखाएँ तथा मोक्षदशा उसका फल है। उत्तम क्षमादि दश धर्म सम्यक्चारित्र के ही भेद हैं। सम्यक्चारित्ररूपी वृक्ष के बिना मोक्षरूपी फल नहीं आता। यदि इस चारित्ररूपी वृक्ष में क्रोधरूपी अग्नि लग जाए तो वह वृक्ष नष्ट हो जाता है और मोक्षफल नहीं आता। मुनिदशा मोक्ष की निकटतम साधक है। मुनि तो मोक्षफल आने की तैयारीवाला फूला हुआ वृक्ष है। मुनिराज उत्तम क्षमा द्वारा अल्पकाल में ही मोक्ष प्राप्त करते हैं। किन्तु यदि वे आत्मस्वभाव को भूल-ज्ञान सहित क्षमा से च्युत होकर क्रोध करें तो उस क्रोधरूपी अग्नि के द्वारा चारित्ररूपी वृक्ष जल जाता है; इसलिए क्रोध दूर से ही त्याग कर देने योग्य है अर्थात् क्रोध होने ही नहीं देना चाहिए।
यहाँ पर मुख्यतः मुनियों के लक्ष्य से कथन किया गया है, श्रावक-गृहस्थ भी क्रोधमुक्त हों। सम्यग्दृष्टि गृहस्थ के भी अंशतः उत्तम क्षमाधर्म होता है। विकार होते हुए भी, मेरा स्वरूप उससे रहित है - ऐसी प्रतीतिपूर्वक स्वभाव का आदर है और विकार का आदर नहीं है, इस कारण उनके उत्तम क्षमा है। स्वभाव को विकारयुक्त मानकर, विकार का आदर करना और विकाररहित ज्ञानस्वभाव का अनादर करना ही क्रोध है।
जो सम्यग्दर्शनपूर्वक विशेष स्वरूपस्थिरता करके मुनि हुए हैं, उन्हें अपने चारित्रस्वभाव में क्रोध को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। मुनिराज ने अनन्तानुबन्धी इत्यादि तीन प्रकार के कषायों को तो नष्ट कर ही दिया है और उतनी उत्तम क्षमा भी प्रगट हो गयी है किन्तु अभी संज्वलन कषाय है, उससे आत्मा के गुण की पर्याय जलती है। जो तीन कषाय दूर कर दिये हैं, उन्हें तो आने ही नहीं देना चाहिए और जो अत्यन्त मंदकषाय रह गयी है, उसे भी नष्ट करके सम्पूर्ण वीतरागता प्रगट करना चाहिए।
यहाँ पर किसी अन्य से क्षमा नहीं माँगना है। ‘भाई! आप मुझे क्षमा करना’ - ऐसा शुभापयोग, उत्तम क्षमा नहीं है। दूसरे से क्षमा माँगे किन्तु दूसरा क्षमा न दे तो क्या यह जीव स्वयं क्षमाभाव धारण नहीं कर सकता? जीव, वास्तविक क्षमा तो स्वयं अपने आत्मा को देता है। पहले आत्मा को रागयुक्त-विकारयुक्त मानकर, आत्मस्वभाव पर क्रोध किया था, उस दोष की आत्मा में इस प्रकार क्षमा माँगता है कि हे आत्मा! तुझे क्षमा हो। अब मैं तुझे क्षमा देता हूँ। तेरे अखण्ड ज्ञानस्वभाव में एक विकल्प भी नहीं होने दूँगा। हे आत्मा! क्षमा हो तेरे परमानन्दस्वभाव को। अब मैं तेरे आदर को छोड़कर, एक विकल्पमात्र का भी आदर नहीं करूँगा।
इस प्रकार ज्ञानी, स्वयं अपने स्वरूप को जानकर अखण्डानन्दस्वरूप में स्थिर होने की भावना करते हैं। उसमें जितना राग दूर होकर वीतरागभाव प्रगट हुआ, उतनी ही उत्तम क्षमा है, वह धर्म है और उसका फल मोक्ष है।
उत्तम क्षमा का पालन करने में श्री अरिहन्त गुरुवीर हैं। उन्होंने
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उत्तम क्षमाधर्म
साधकदशा में ऐसी उत्तम क्षमा ग्रहण की कि विकल्प को भी छोड़कर, वीतरागभाव धारण करके केवलज्ञान प्रगट कर लिया। श्री पार्श्वनाथ भगवान मुनिदशा में थे और वे आत्मध्यान में मग्न थे, उस समय कमठ ने आकर उपसर्ग किया परन्तु उन्होंने तो आत्मस्वरूप की एकाग्रतारूप उत्तम क्षमा धारण करके अन्तर्मुहूर्त में केवलज्ञान प्रगट कर लिया। उन्हें उपसर्ग करनेवाले कमठ के प्रति द्वेष का विकल्प भी उत्पन्न नहीं हुआ और न सेवा करनेवाले इन्द्र के प्रति राग का विकल्प ही हुआ। एकरूप स्वभाव में लीनता होने पर, सम्पूर्ण वीतरागभाव प्रगट होकर केवलज्ञान होता है। ऐसा वीतरागभाव ही उत्तम क्षमा है।
आत्मस्वरूप को समझकर, उसका बहुमान करना ही उत्तम क्षमा की आराधना का यथार्थ पर्व है। मेरा ज्ञानस्वभाव अन्तरङ्ग में सहज समभावस्वरूप है; क्रोध को मैं मुझमें हूँ ही नहीं - इस प्रकार अपने स्वभाव और क्रोध के भेदज्ञानपूर्वक स्वभाव की एकाग्रता, सहज क्षमा है और वही धर्म है। जो आत्मा अपने में ऐसा क्षमाभाव प्रगट करता है, वही इस पर्व की यथार्थ आराधना करनेवाला है।
अब, यह बतलाते हैं कि उत्तम क्षमा को धारण करनेवाले धर्मात्मा कैसी भावना करते हैं? -
(शार्दूलविक्रीडित)
तिष्ठाम्यद्य वमुच्यवल्लेन मनसा रागादिदोषोज्झिताः
लोकः किञ्चिदपि स्वकीयहृदये स्वेच्छाचरो मन्यताम्।
साधुत्वा शुद्धिगृहेतिहात्मनः शमवतामग्रेश्वरा दिष्टया
मित्रोणापि किमप्यशोचितफलार्थः स्वयं लप्यते ॥ ८४ ॥
धर्मात्मा जीव, उत्तम क्षमाधर्म का चिन्तवन करते हुए ऐसी भावना करते हैं - यह स्वेच्छाचारी लोक अपने हृदय में मुझे भला अथवा बुरा, जो चाहे माने किन्तु मैं तो राग-द्वेष रहित होकर अपने उज्ज्वल ज्ञान में ही स्थित रहूँगा। उत्तम क्षमा के धारक पुरुषों को मात्र अपने आत्मा की शुद्धि ही साध्य है। इस जगत में अन्य कोई मेरा हित हो अथवा मित्र हो, इससे मुझे क्या? वैरी या मित्र मेरा तो कुछ भी नहीं कर सकते। जो द्वेषरूप या प्रीतिरूप परिणाम करेगा, उसे स्वयं ही उसका फल मिल जाएगा।
धर्मात्मा भावना करता है - मेरे स्वभाव में राग-द्वेष नहीं है। मित्र के प्रति राग अथवा शत्रु के प्रति द्वेष करना, हमारे हृदय में नहीं है। वास्तव में तो इस संसार में कोई किसी का शत्रु या मित्र है ही नहीं। यह स्वेच्छाचारी लोक मुझे भला कहे या बुरा, इससे मुझे क्या? कोई भी वैरी मेरे आत्मा को हानि पहुँचाने में समर्थ नहीं है और न कोई भक्त मेरे आत्मा को लाभ कर सकता है। यदि भक्तजन भक्ति करते हैं तो अपने शुभराग के कारण और यदि वैरी निन्दा करते हैं तो अपने द्वेष परिणाम के कारण ही करते हैं। मैं तो दोनों का जाननेवाला हूँ; मेरे ज्ञान में तो दोनों ज्ञेयरूप हैं। इस प्रकार अपने ज्ञानस्वभाव की भावना के बल से ज्ञानी सन्तों के राग-द्वेष रहित क्षमाभाव होता है, वही उत्तम क्षमाधर्म है।
जिसने अपने ज्ञानस्वभाव की भावना नहीं की हो, उस जीव के कदाचित् बाह्य में शुभरूपिणाम दिखाई देते हों किन्तु वह शुभरूपिणाम को आत्मा का स्वरूप मानकर, निज ज्ञानस्वभाव के अनादररूप अनन्त क्रोधभाव का सेवन करता है। वस्तुतः सम्यग्दर्शनसहित क्षमा ही उत्तम क्षमा है और वही धर्म है।
दश धर्म प्रवचन
अथवा, विशेषरूप से यह बतलाते हैं कि उस उत्तम क्षमाधर्म को धारण करनेवाला धर्मात्मा कैसा चिन्तवन करता है? -
(मम भवतु)
दोषानाधाय लोके मम भवतु सुदीर्घं दुर्जनश्रेढनार्थी
मृत्युर्वै गच्छतुल्लिप्तृष्वपि सहसा जीवितं स्थानमद्यः।
मध्यस्थत्वेऽवमेवाखिलमिह जगजावतो सौख्यराशिः
मातो बुद्ध्याऽक्षयि कथमपि कस्यचिच्चूलुकैरोमि ॥ ८५ ॥
मेरे दोषों को लगाकर समस्त प्रगट करके संसार में दुर्जन सुखी हों; धन के लोभी मेरा सर्वस्व ग्रहण करके सुखी हों; शत्रु मेरा जीवन लेकर सुखी हों, जिसे मेरा स्थान लेना है, वह स्थान लेकर सुखवर्द्धक रहे, तथा जो राग-द्वेष रहित मध्यस्थ होकर रहना चाहे, वे मध्यस्थ रहकर सुखी रहें, इस प्रकार समस्त जगत् सुखपूर्वक रहे किन्तु किसी भी संसारी जीव को मुझसे दुःख न पहुँचे, मैं ऐसी प्रकार सबके समक्ष करता हूँ।
मैं इसमें समस्त संसार के जीवों से निरपेक्ष होकर, अपने आत्मा में वीतरागभाव से रहने की भावना है। मेरे ज्ञान में राग-द्वेष करने का स्वभाव ही नहीं है। मुनिराज स्वयं अपने आत्मा की आराधना को उग्रता करते हुए पुकार करते हैं कि - इस जगत का जीव जिसमें उन्हें सुख मिले, वैसा ही करे किन्तु मैं अपने ज्ञाताभावरूप क्षमा को नहीं छोडूंगा। कोई मेरे दोष बतलाकर या पिच्छी-कमण्डल लेकर अथवा स्थान लेकर, भले ही सुख माँगे और अन्य कोई वीतरागभावरूप रहकर ही किन्तु मुझे दोनों के प्रति समभाव है। समस्त जगत् सुखी रहे - ऐसी भावना है। जगत् का कोई भी जीव दुःखी हो -
उत्तम क्षमाधर्म
ऐसी भावना नहीं है। इस प्रकार वास्तव में वे स्वयं वीतरागरूप रहना चाहते हैं।
मुनियों के पास धन इत्यादि तो होता ही नहीं किन्तु पिच्छी-कमण्डल अथवा पुस्तक होती है। यदि कोई उसे ले जाता है तो भले ही ले जाए। पिच्छी-कमण्डलादि मेरे नहीं हैं और उन्हें ले जानेवाले के प्रति मुझे द्वेष नहीं है, मैं तो ज्ञायक हूँ। मुझे वीतरागभावरूप से मध्यस्थ रहनेवाले ज्ञानियों के प्रति राग नहीं है और प्राणाघात अज्ञानियों के प्रति द्वेष नहीं है। मेरे निमित्त से कोई जीव दुःखी न हो; मैं तो जगत में जो कुछ होता है, उसे जानता हूँ और अपने आत्मा के वीतरागभाव में स्थिर रहूँ - यही भावना है। इस प्रकार यहाँ सम्पूर्ण परिग्रहिरहित ज्ञायकभाव की भावना की पुकार है।
मुनिदशा में स्वरूपानुभव की एकाग्रता में स्थिर होकर क्रोधादिभाव उत्पन्न ही नहीं होने देना, उत्तम क्षमा है।
गृहस्थ के क्रोधादिभाव होते अवश्य हैं किन्तु क्रोधादिभाव होने पर भी ‘मेरा ज्ञानस्वरूप इन क्रोधादिभावों से भिन्न है, मेरे स्वरूप में क्रोध नहीं है; वास्तव में मेरा ज्ञान तो क्रोध भी ज्ञाता है’ - इस प्रकार क्रोध से भिन्न अपने ज्ञानस्वरूप को श्रद्धा-ज्ञान-स्थिरता रखना, उत्तम क्षमा है।
जो राग को अपना स्वरूप मानता है, वह अपने आत्मा को हिंसा करनेवाला अनन्त क्रोधी है। यहाँ पर मुख्यतः तो मुनिदशा के धर्म की बात है किन्तु इसमें गोणरूप से सम्यग्दृष्टि श्रावक की भावना भी आ जाती है - ऐसा जानना चाहिए।
अब, इस अन्तिम श्लोक में कहते हैं कि वीतरागभाव को
उत्तम क्षमाधर्म
बात यही नहीं है। ‘समस्त पर जीव अपने को क्षमा करें, तभी क्षमा कहलाती है’ – यदि ऐसा हो तो जब तक अन्य जीव क्रोध को दूर करके क्षमाभाव नहीं करें, तब तक अपने को भी वीतरागी क्षमाभाव नहीं हो सकेगा अर्थात् तब तो क्षमा पराधीन हुई किन्तु परधीनता में तो कभी भी धर्म नहीं हो सकता।
यहाँ तो स्वयं अपने ज्ञानस्वभाव को रागादि विकारों से भिन्न जानकर, चाहे जैसे अनुकूल या प्रतिकूल संयोगों में राग-द्वेष नहीं करना और वीतरागी ज्ञाताभावस्वरूप से स्थिर रहना ही उत्तम क्षमा है, वह स्वाधीन है। परजीव क्षमा दे या न दे, तो भी यह जीव स्वयं अपने में उत्तम क्षमाभाव प्रगट कर सकता है।
यहाँ तो मुनिदशा में शुभ या अशुभ विकल्प की उत्पत्ति होना भी उत्तम क्षमा में भङ्ग है। उसका अभाव करके वीतरागभाव की भावना करते हुए मुनिवर स्वयं अपने को सम्बोधन करके कहते हैं – रे आत्मा! तू अज्ञानी जीवों द्वारा किये गये उपसर्गों से दुःखित होकर क्लेश करता है तो क्या तू त्रिलोक पूज्य अपने उत्तम क्षमा को नहीं जानता? कि जिससे तू वीतरागता को छोड़कर ऐसा द्वेषभाव करता है?
मात्र वीतरागभाव ही उत्तम क्षमाधर्म है। मैं वीतराग होऊँ और राग को दूर कर दूँ – ऐसे विकल्प की भी यहाँ मुख्यता नहीं है। विकल्प क्षमा नहीं है किन्तु स्वभाव की एकाग्रता में वीतरागस्वरूप से परिणमित हो जाना और राग-द्वेष की उत्पत्ति ही न होने देना, उत्तम क्षमा है। जितने रागादि के विकल्प उत्पन्न होते हैं, उतना उत्तम क्षमा में भङ्ग पड़ता है – ऐसा उत्तम क्षमाधर्म का स्वरूप है। उसका
दश धर्म प्रवचन
छोड़कर यदि राग-द्वेष की वृत्ति उत्पन्न होती हो तो स्वभाव की उग्र भावना द्वारा उस वृत्ति को नष्ट कर देना चाहिए, वह उत्तम क्षमा है।
(शार्दूलविक्रीडित)
कि जानासि न वीतरागमखिलं त्रैलोक्यचूडामणिं
किं तद्धर्ममुपाश्रितं न भवता किंवा न लोकोऽङ्गनाः।
मिथ्यादृष्टिभरस्रजेनरपट्टभिः किञ्चिन्कृतीपस्ववात्
यत्कर्माञ्जनहे तुमस्थिरतया बाधां मनो मन्यसे ॥ ६८ ॥
अपने स्वरूप की वीतरागी स्थिरता में से बाहर निकलकर पर-सन्मुख वृत्ति होने पर, किञ्चित् राग या द्वेष का विकल्प उठे तो उसे तोड़कर, सम्पूर्ण वीतरागता प्रगट करने के लिए स्वयं अपने को सम्बोधन कर कहते हैं कि रे मन! मिथ्यादृष्टि दुर्जन मूर्खजनों द्वारा किये जानेवाले उपसर्गों से बञ्चल होकर, कर्म आने में कारणभूत वेदना का तू अनुभव करता है, तो क्या तू अपने त्रिलोक में सर्वश्रेष्ठ पूजनीय वीतरागभाव को नहीं जानता? तथा तूने जिस धर्म का आश्रय ग्रहण किया है, क्या तू उस धर्म को नहीं जानता? और यह समस्त लोक अज्ञानी-जड़ है, क्या इस बात का तुझे ज्ञान नहीं है? अर्थात् तीन लोक में वीतरागभाव ही सर्वश्रेष्ठ है – ऐसा जानकर, सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक, वीतरागभावस्वरूप चारित्र ही धर्म है, उसे पहचानकर और यह लोग जड़-मूर्ख हैं – ऐसा समझकर; हे जीव! तू मूर्ख अज्ञानियों द्वारा किये जानेवाले उपसर्गों से अपने वीतरागभाव को मत छोड़; राग-द्वेष करके दुःखी मत हो!
पर जीवों के साथ उत्तम क्षमा का सम्बन्ध नहीं है। पर जीवों को क्षमा करना अथवा पर जीव अपने को क्षमा करें – ऐसी क्षमा की
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स्रोत: Gyata संग्रह।
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