दस लक्षण पर्व पर आराधना हेतु विचारने योग्य बिंदु
इस लक्षण पर्व पर आराधना हेतु विचारने योग्य बिंदु
मुक्ति तो जीव की दासी है जो कि आत्म तत्व को एकाग्र होकर निक्षपने जानताहै और अन्य मिथ्या वादियों की बातें आकर्षक लगने पर भी भ्रम में नहीं पड़ता व विषयों में आसक्त नहीं होता है | नेमीश्वर वचनामृत शतक श्लोक ८
यह जीव भोगों के निमित्त तो बहुत अल्प पाप करता है परन्तु तंदुल मत्स्य की तरह प्रयोजन बिना ही स्वयं के दुर्विचारों से घोर पाप करते है | जयसेन आचार्य जिनागम सार गुजराती बोल क्र १९३८ पृ ४९१
उद्देश्य
हम श्रमणोपासक है अतः अन्तरंग साधना, पञ्च इन्द्रिय विजय की दिशा में बढ़ना, विषय आसक्ति से बचना {भोजन, वस्त्र, परिग्रह, शृंगार, भ्रमण}, मुनिदशा की साधना, हठयोग से बचना, रत्नत्रय आराधना - स्वातनुभव, संयम हेतु तत्व निर्णय हेतु स्वाध्याय, चिंतन, मंथन, तत्व चर्चा, भक्ति, पूजन विधान, जागरण, सामायिक | देह एवं देह के पोषण में अनाशक्ति (eng दवाओं का त्याग, शृंगार, साबुन सोडा, १ व्रतों का अभ्यास)
साधना उग्र, समझ, व्रत-प्रतिमा, सम्पन्नता, स्वास्थ्य, (गेस, सर्दी, कफ, वात, पित्त, लकवा), अनुसार विचार करके करना चाहिए |
अनाहारी का लक्ष्य, युक्ताहारी उद्दिष्ट आहारी, शिथिलाचारी, अनाचारी |
अनिष्टकारी अभक्ष्य की पहचान
जो आत्म आराधना में प्रमत्त करें एवं अस्वस्थ करें - वे सभी भोज्य पदार्थ | परिश्रम से अधिक/कम भोजन, चिल्ड पानी एवं गर्म दूध, गर्म सब्जी-रोटी, शरीर के प्रकृति विरुद्ध भोजन,
फल/तेल एवं दूध खीर, बासा भोजन, चलित रस वाले फल एवं भोजन, रोटी ६ घंटे एवं सब्जी ३ घंटे बाद, बाजारू रस, भोज्य पदार्थ | मैदा, पोहा, बेसन, नमक, शकर, दूध एवं दूध से बने पदार्थ | अति भोजन, स्वाद बढ़ाकर भोजन करना जैसे शकर घी चावल, दाल, दूध या छाछ में रोटी गलाकर खाना, आदि से तो बचना ही चाहिए परन्तु प्रमादकारी, संयम/सामायिक में बाधक, आराधना प्रभावना में बाधक खान-पान, वार्ता, संगति से भी बचना चाहिए |
बिना हरी के भोजन करने वाले सावधानी रखें
सारे जीवन भी बिना हरी के स्वस्थ रह सकते हो | जठराग्नि मंद होने से इन दिनों ५० से १०० ग्राम अनाज से ज्यादा न खावें | कोई भी दाल गाढ़ी न बनावें | १०:१० अनाज:पानी/रसा के अनुपात में रही |
खाली पेट सूखा आंवला, सोंप, धना, बादाम का पानी, ठंडाई, गर्म जल पी सकते है | सूखा गोला नारियल का ले सकते है | दूध पचता हो तो मात्र १ से २ लीटर मात्र पर २४ घंटे रह सकते है |
अनिष्ट कारक अभक्ष्य का प्रचलन समाज में चलता रहता है | व्रत उपवास में सब्जी नहीं खायेंगे | रबड़ी, खीर, ड्राई फ्रूट, खाने का प्रचलन लोगों में आलोच्य होता है | लेकिन मात्र भुट्टे, केले एवं दूध खाकर रहा जावे | इसमें कम से कम आरम्भ होगा | समय बचेगा | आराधना बढ़ेगी | लोग हमारे माध्यम से छल ग्रहण करेंगे ? इस भय से भी हम पेट खराब करके, रोज हर, त्रिफला अथवा दस्तावरे चीजें खाकर पेट
साफ करें इससे तो अच्छा है सहज जीवन | ज्ञानियों के निर्दोष मार्ग को अज्ञानी नहीं अपनाते है | वे तो छल ग्रहण करना चाहते है तो इसका क्या समाधान है |
साधकों एवं श्रावकों में अनिष्ट कारक अभक्ष्य को लेकर भारी अज्ञान व्यास है या जान बूझकर उसकी अनदेखी होती है | श्रावक आलू समीकंद नशाकारक अनुपसेव्य आदि तो नहीं देता है लेकिन स्वास्थ्य घातक भोजन देना पुण्य कारी मानता है जबकि वह जानवावरणी आदि घातियाँ कर्म की बंधक है | मुनिराजों को प्रकृति विरुद्ध भोजन देना, पाचन या जठराग्नि का ध्यान रखे बिना तला / घी शकर युक्त आहार, खीर मैदा, मावा, रबड़ी आदि देना साधू की हत्या समान पाप है | चातुर्मास में तो यह भोजन जठराग्नि की मंदता के कारण अनेकों रोगों का कारण सिद्ध हो कर संयम/सामायिक/समाधि का घातक सिद्ध होता है | यदि साधू/व्र को गेस, ऐसिड, शीतांग, बुखार, सर्दी खांसी, आँखों से कम दिखना, सर दर्द जैसी कोई भी बीमारी हो तो भूलकर भी अनाज न दें | मात्र गर्म जल में ३ ग्लास जल में १-२ निम्बू, १-२ चम्मच सूखा आंवला का रस, ४-५ ग्लास नारियल पानी मात्र दिया जाना चाहिए | ३ दिन बाद उनके स्वास्थ्य अनुसार सूप, सब्जी सलाद ३ दिन तक देना चाहिए | स्वास्थ्य पूर्णतः अच्छा होने के बाद मूंग के दाल का पानी सब्जी सलाद, अंत में ५० ग्राम हरी मूंग की दाल डेढ़ लीटर पानी में उबालकर १ लीटर रहने पर २५ से ५० ग्राम घी में छोंक लगाकर देना चाहिए | इसके बाद १ रोटी चार गुनी सब्जी सहित देना और शेष भाग सब्जी सलाद सूप देना चाहिए | अनाज दूध घी एवं इनसे बने पदार्थ देने में जल्दबाजी कभी नहीं करना चाहिए |
बीमारी के कारण - स्वादिष्ट भोजन न चबाना, कड़वा या कषायला
भोजन के प्रति अरुचि, कठोर चीजें खाने से परहेज, उबली या कच्ची
सब्जियां न खाना | खान पान की आदतें सुधारना ही साधक का कार्य है |
हरी खाने की आवश्यकता किस-२ को हो सकती है-
व्रत का उद्देश्य यदि अनाशक्ति है तो - अनंत हरियों की आशक्ति से कम हरी
की आशक्ति को भी अनाशक्ति कह सकते हैं |
रूग्गी - एवं कारण - प्राचीन काल में बलिष्ठ एवं परिश्रमी थे अतः एकाशन
में गरिष्ठ आहार भी शक्य था | परन्तु आज सुविधा भोगी विलासी आलसी
पीढ़ी है अस्वस्थ है अतः आज अनाज मात्र का आहार करना आराधना नहीं
अनिष्टकारक अभक्ष्य है |
रोगी डायबिटीज, हार्ट, लकवा, कब्जीयत, वाले लोग अनाज खायेंगे तो
बीमारी बढ़ेगी, अतः कच्ची सब्जियां, सलाद, रसाहार पर रहे हो सके तो
अनाज का त्याग करें, मीठा नमकीन का त्याग करें | दूध खीर रबड़ी का
त्याग करें |
गिलकी, तोरई, लौकी, भुट्टा, केला, नाशपाती, सेव, मौसंबी, ककड़ी खीरा,
तुलसी, सहजन अर्थात मुनगा के पत्ते, आम, जामुन, अमरूद के पत्ते लगभग
२०० से ५०० ग्राम दिन भर में ले लेवें तो यह दिन अंग्रेजी दवा से जीवन
भर को बचा सकते हैं |
रोगी लोग निभ्रातनुसार हिरन क्रीडित उपवास या व्रत साधना भी कर
सकते हैं | पहले दिन गर्म जल, दुसरे दिन निम्बू/सुखा आवला का पानी एवं
जल, तीसरे दिन सब्जी/या दाल का पानी, चौथे दिन फलों/मुनक्का
किसमिस का रस, पांचवे दिन दूध-जल, छठे दिन सुखा आवला पानी,
सातवे दिन गर्म जल पर रहें इससे आप आजीवन बीमार भी नहीं होगें और
शक्ति पूरी बनी रहेगी | शेष दिन (चाहे तो आजीवन प्रति माह भी)
सामान्य आहार ले सकते हैं | वात पित्त कफ असंतुलित होने पर फिर हिरन
क्रीडित व्रत किया जा सकता है |
युक्त आहार-
सदा गर्म जल खाएं अर्थात खूब चबाएं एवं भोजन को पियें अर्थात प्रत्येक
पदार्थ लार में मिक्स हो इस तरह अच्छे से चबा कर खाएं | घी रबड़ी खीर
एक ऊँगली से चाटें | दूध रस आदि स्निग्ध अथवा सबसे छोटी चम्मच से पियें,
मुख में खूब लार बने, पेट में एक विशेष बेचैनी हो तब ही भोजन
करें | वह भी तब तक करें जब तक कि भोजन चबाने एवं गुटकने में सहजता
लगे | भोजन की अरुचि पेट भरने की सुचना है | डकार आने पर भी इसके बाद
भोजन न लेना चाहिए | आगे मन या स्वाद के वशीभूत होकर किया गया भोजन
कब्जीयत बढ़ायेगा, बदहजमी से स्वास्थ्य सामाजिक में प्रमाद होगा | पठन-पाठन
में मन न लगेगा |
लार के कारण स्वाद बढ़ता है, भोजन रसीला होकर गले से
उतरता है एवं रस ग्रंथि आदि के कारण रक्तादी धातु ठीक से बनती है | भरे पेट
स्वादिश्र मिश्रान्न भी स्वादिष्ट नहीं लगता है उसका कारण लार का समाप्त- अभाव
होता है | इस अवस्था में लोग निम्बू, गुड़, घी शकर से रोटी चावल खाकर पेट का
कार्य बढ़ाते है | जिससे पेट बढ़ने लगता है |
प्यास की बेचैनी होने पर पानी शरीर/जिव्हा के तापमान स्तर
का पानी पीएं-२ भरकर पानी पीवें | अन्यथा ठन्डे पानी की तब तक मुख में रखें जब
तक उस पानी का तापमान गले में विशेष ठंडा न लगे | आधा एक ग्लास पानी
पर्याप्त होता है इससे ज्यादा पानी पेट पर भार बनकर किडनी को प्रभावित करेगी |
गर्मी में प्रायः मटके-फ्रिज का पानी बिना श्वास लेने से आहार नाली से लेकर पाचन
तंत्र एवं किडनी ख़राब करती है | इससे भोजन के तैयार रस मूत्र में बह जाते है |
फोक पदार्थ कठोर मल में बदल कर आंतों में अटकता है सड़ता है जिससे पाइल्स
कब्जीयत आदि हो जाती है |
मात्र एक बार आहार लेने वाले भोजन के समय फल सलाद
खाकर प्यास बुझावें उस समय अधिक पानी न पीवें वह भी भोजन के रस भी पोषक
तत्त्वों को मूत्र द्वार से निकाल देगा | अनाज एवं गरिष्ठ आहार न लेवें | इसमें
पेयाहार अधिक लेवें |
राग एवं स्वाद बढ़ाने वाले उपाय अधर्म है |
खटाई मिठाई लेने
ही नहीं चाहिए | इनके वशीभूत होकर हम भोजन अतिरिक्त कर डालते है | नमकीन
एवं तीखे मसालों से बचना चाहिए | घी शक्कर चावल अनिष्ट कारक अभक्ष्य बन
जाता है यदि इसे खाने का मन है तो उस दिन मात्र सब्जी सलाद फल सूप ही लेना
चाहिए | दाल छाछ दूध सब्जी में रोटी मेस करके गला कर नहीं खाना चाहिए |
अच्छा हो कि रोटी रूखी खायी जावे चबाने के बाद दाल सब्जी आदि चम्मच या
उँगलियों से खाई जावे |
छोटे से छोटा रोग हो सर्वे प्रथम अन्न आहार बंद कर देना
चाहिए भरपेट सब्जी ले | या मात्र जल या सब्जी का पानी पर रहें | दूध न ले |
उपवास करे तो अति उत्तम है | भोजन में दालें बेसन पोहा, अधिक श्रम से
पचने वाले पदार्थ न लेवें | साथ ही ठन्डे जल की पट्टी पेडू एवं सर पर रखें | धूप
स्नान हल्की व्यायाम प्राणायाम करें |
मुख के छाले पेट ख़राब होने के सूचक है | सलाद मीठा पर आ जावें |
गरम पानी से अन्नचवान ले ले या निम्बू बनाकर तथा उबलाकर खकर सेवे तथा
नमक लगाकर छले पर लगावें तत्काल लाभ होगा | ध्यान रखिये यह तात्कालिक
उपाय है | स्थाई नहीं |
उपवास कैसे करें ?
उपवास अर्थात २४-४८ घंटे में भोजन का विकल्प मात्र तक न जन्मे |
उनादर अर्थात २४-४८ घंटे में मात्र एक बार भोजन का विकल्प एवं प्रवृत्ति |
पात्रता
उपवास करने का उद्देश्य विषय सेवन से समय बचाकर स्वाध्याय ध्यान भक्ति चर्चा में विशेष उपयोग लगाना है | इसे न जानकर लोग रोगी की भाँति काल गंवाते हैं या हठयोग, खींचातानी या कपाय पूर्वक उपवास काल व्यतीत करते हैं | जैसे डेम टूटने पर जल का प्रवाह तीव्र होता है उसी प्रकार उपवास पूर्ण होने पर या करने से पूर्व तीव्र शुद्धता पूर्वक भोजन आदि करते देखे जाते हैं | इसमें उपवास का लक्ष्य तो पूर्ण नहीं होता उलटे स्वास्थ्य और खराब हो जाता है | जिस दिन उपवास करना हो उस दिन के शरीर की स्थिति एवं उसे अनुकूल भोजन पानी आदि का निर्णय करना चाहिए |
निम्न पात्रता विचारें -
१- साधकों को उपवास करना चाहिए देहवास नहीं | जहाँ आपका उपयोग वहीं आपका वास होता है | परन्तु १० प्राण का पोषण या शोषण करने की अनुमति जिनागम में नहीं दी गई है | सम धातु विषम होकर साधना में बाधा करें तो ही विशेष व्रत/उपवास करना चाहिए | ख्याति लाभ के लिए तो कदापि नहीं |
२- देहवास अर्थात देह के लक्ष्य, स्वास्थ्य, ख्याति आदि के लिए निराहार रहना है | अनाहारी आत्मा की आराधना में लक्ष्य से निराहारी रहना ही उपवास है |
३- आप पूर्ण स्वस्थ हों, पेट में कब्जीयत न हो, खुश्की, गर्मी, पित्त न भड़के इस प्रकार उपवास/एकाशन करें | पेट पूरा साफ हो, सर पर पेट पर एक साथ ठंडी पट्टी रखना चाहिए | आवश्यकता हो तो २०० ग्राम पानी का एनिमा लेकर पेट साफ करना ठीक रहता है |
४- उपवास के बाद पाड़ना में गरिष्ठ भोजन लेने के स्थान पर दूध गोंद काली मिर्च का पानी या नीबू पानी लेकर उपवास खोलना चाहिए | इस दिन गरिष्ठ भोजन से बचना चाहिए |
५- ऊनोदर में आधा पेट रस/पेय/पानी एवं एक चौथाई अन्न तथा एक चौथाई खाली छोड़ना चाहिए | अघाहार एवं गरिष्ठ भोजन जैसे लड्डू, बाटी, चूरमा, रबड़ी आदि से बचना चाहिए | उपवास के पूर्व दिवस भी शरीर को पेय
ज्यादा देना योग्य होता है | इससे आत्मोत्साह बना रहता है | एकाग्रता बढ़ती है प्रसाद एवं अनुग्रह से बसते हैं |
६- जो निरंतर उपवास ऊनोदर रूप प्रवर्तते हैं परिवार/समाज के आग्रह अनुसार आहार न लें अपने शरीर की प्रकृति को पहचानें | जैन - ऊष्ण प्रकृति हो तो नारियल चटनी, मूंगफली, क्रियामिश्र, अधिक उष्ण हो तो भीगी बादाम, अखरोट, दूध दही छाछ, दलिया मूंगफली का पेस्ट की तरह नहीं | रोटी दूध-दही-छाछ में गलाकर कभी न खावें | संतुलित एवं अनुकूल आहार ग्रहण करें तो तन-मन स्वस्थ रहता है |
७- सहज पचने योग्य भोजन ही ग्रहण करें | मन एवं मान को मार कर आहार लें | स्वयं की तीव्र शुद्धता एवं अज्ञानियों का मोह त्यागियों को बीमार करता है | जिससे ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनीयकर्म, असाता कर्म मुख्यता से बंधते हैं | इससे ब्रह्मचारी/बकागणी बीमार होकर स्वाध्याय प्रवचन आराधना से वंचित हो जाते हैं |
८- तलवारधारक उपवास करें | परन्तु लेखक/टीकाकार/प्रवचनकार उपवास के स्थान पर पेयाहार करें जिससे उन्हें ज्यादा पचाने के लिए शरीर श्रम भी न करना पड़े और शक्ति भी पर्याप्त मिलती रहे | उन्हें तो तत्वोपकार ही मुख्य है |
९- गर्भवती या गोद में शिशु हो उन्हें उपवास नहीं करना चाहिए | वे ऊनोदर में पेयाहार ज्यादा ले सकते हैं | घर में अधिक श्रम करने वाली महिलाओं को निर्जल उपवास शरीर कमजोर करता है | देह में अधिक चर्बी हो तो उपवास किया जा सकता है लेकिन दुर्बल देह में नहीं |
१०- रोगी को जलाहार या पेयाहार लेकर उपवास करना योग्य है | गृहस्थों को अष्टम चौदह एवं धार्मिक पर्वों अथा नित्यका, दशलक्षण आदि में उपवास ऊनोदर योग्य है |
११- उपवास ऊनोदर से आराधना-ज्ञान-ध्यान, एकाग्रता न घटे |
१२- उपवास के समय प्रमाद वृद्धि न हो | खेल -कूद, भोजन आदि ४ विकथा न हो |
दीर्घ शंका
वस्त्र बदल कर जावें | समय से जावें भोजन के बाद अथवा सोते समय जाना शोभा नहीं देता है | लघु - दीर्घ शंका को कभी भी रोकें नहीं | दो समय भोजन करने वालों को २ समय दीर्घ शंका को जाना चाहिए | अन्यथा मल संचित होने से पेट में गर्मी बढ़ेगी जिससे काम विकार एवं रोगों की उत्पत्ति होती है | इसकी आवश्यकता दृढ़ता से समझिये - भोपाल से सुबह एवं शाम को चलने वाली ट्रेन एक साथ दिल्ली नहीं पहुँच सकती है | उसी प्रकार दो समय का भोजन एक साथ अगले दिन सुबह कैसे पहुँच सकता है | कब्जीयत एसिडिटी से बचने को इस बात का ध्यान अवश्य करें |
अधिक पानी पीकर या दवा (पर्पटी, हर्र आदि) लेकर पेट साफ करना ठीक नहीं है इससे आंत खराब होती है | प्रारम्भ में तो दबाव से काम हो जाता है परन्तु शरीर की आदत भी खराब हो जाती है | एनिमा की आदत न बनावें | कभी कभार सफाई के लिए ठीक है | इसके बाद सारे शरीर या लिंग की शुद्धि अवश्य करें | इस के लिए पानी छानकर प्रयोग करें | नल तथा फ्लश का पानी इस्तेमाल न करें | अनंत जीवों की विराधना करने से साता वेदनीय का बंध एवं उदय अशक्य है |
विहार
ब्रह्मचर्य प्रतिदिन पैदल नंगे पाँव चलें | जिनमंदिरों की प्रातः/सायं काल वन्दना, शिरोनती, आवर्त, समस्त प्रतिमाओं को ३ बार निहारिये, वेदी पर पंचांग या गो आसन से नमस्कार कीजिए | षडासन से सामायिक कीए | खडे-२ पूजा ताली बजाकर उत्साह से प्रज्ञाल जिनवाणी एवं पूजा के वर्तन सामग्री को सावधानी पूर्वक आदान निक्षेपण करने से स्वतः ही ऊपाकाल का पर्यटन - मौनिसन, आसन प्राणायाम व्यायाम हो जाता है | दूरवर्ती, घनी बस्ती, प्रदूषित बस्ति के मंदिरों की तुलना में खुले प्राकृतिक वातावरण वाले निकटवर्ती मंदिरों के दर्शन अवश्य करें |
jainopathy क्या है ?
पानी, प्रकृति, पवन, प्राणायाम, परिश्रम, पंचेन्द्रिय विजय | आत्मा एवं देह के स्वस्थ होने की एक ही विधि है |
संवर पूर्वक निर्जरा मोक्ष का हेतु है उस ही प्रकार रोग के कारण रोके बिना स्वास्थ लाभ कभी नहीं हो पाता है | एलोपेथी में रोग इसीलिए बढ़ता है क्योंकि डॉ के पास रोगी को समझने समझाने की फुर्सत नहीं है | मेडिकल रिपोर्ट निकलाकर स्वयं जिम्मेदारी से बचते है | और अंततः मरीज धन एवं तन दोनों खो देता है |
अनेकों रोगों की डॉ के पास कोई दवा नहीं है | ओपरेशन अर्थात अंग सड़ने तक इन्तजार इसके बाद सड़े भाग को काटकर अलग कर देना | किडनी, लीवर, हर्ट आदि अंग फ़ैल होने के बाद भी रिकवर हो सकते हैं | कैसे ??? आइये जानेंगें jainopathy से |
jainopathy रोग उत्पन्न होने से रोकती है | उत्पन्न हो जावे तो समता से उसे दूर करती है | भविष्य में अनंत काल तक रोग उत्पन्न ही नहीं होगा इसको सुनिश्चित करता है | क्योंकि रोग एवं रोग के कारण दोनों को जड से दूर करती है ।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3102.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है