मंगलाचरण
जो क्रोध मद माया अपावन, लोभ रूप विभाव है
जिनके अभाव स्वभावमय, उत्तम क्षमादि स्वभाव है।
उत्तम क्षमादि स्वभाव ही, इस आत्मा के धर्म हैं
है सत्य शाश्वत ज्ञानमय, निज धर्म शेष अधर्म हैं।
निज आत्मा में रमण संयम, रमण ही तप त्याग है
निज रमण आकिंचन्य है, निज रमण परिग्रह त्याग है।
निज रमणता ब्रह्मचर्य है, निज रमणता दश धर्म है
निज जानना पहचानना, जमना धरम का मर्म है।
दस धर्म का मूल सूत्र
तत्त्वार्थसूत्र — अध्याय ९, सूत्र ६
उत्तम-क्षमा-मार्दवार्जव-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्याग-आकिञ्चन्य-ब्रह्मचर्याणि धर्मः।
अर्थात् — उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य — ये दश धर्म हैं।
इस थ्रेड में
दसलक्षण पर्व (१५–२४ सितम्बर २०२६) के दस दिन, इस एक ही थ्रेड में प्रतिदिन एक धर्म क्रम से प्रस्तुत किया जाएगा — उसका स्वभाव-आधार और जीवन में उतारने योग्य सरल भाव। दस दिन, दस गुण, एक ही लक्ष्य: निज आत्मा में रमण। ![]()