द्रव्यसंग्रह ग्रन्थ की गाथा-44 की टीका में कहा कि दर्शन आत्म ग्राहक है। यह दो अपेक्षा से ले सकते हैं-
1.आत्मा प्रतिसमय जान रहा है, तो जब तक जाननेवाला स्वयं अपनी सत्ता को नहीं स्वीकारेगा (सत्ता का अवलोकन नहीं करेगा) तब तक ‘आत्मा ने जाना’-ऐसा स्वीकार नही हो सकता।
जिसप्रकार कोर्ट में किसी केस का आंख गवाह हो तो उससे सबसे पहले यही पूछा जाता है कि ‘क्या आप वहाँ पर थे?’ यदि वह अपनी सत्ता स्वीकारता है तो ही उससे उस केस संबंधी जानकारी पूछते हैं। उसीप्रकार यहॉ समझना।
2.जब एक ज्ञेय से दूसरा ज्ञेय बदलता हैं तो by nature दर्शन आत्मा का अवलोकन करता है।
-परन्तु श्रुतज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान के पहले तो दर्शन होता नही तब दर्शन क्या करता है?
उ० धवल में कहा है कि ज्ञान और दर्शन दो गुण नही है, बस एक चेतना गुण है उसकी ज्ञान-दर्शन रूप पर्याय है।
-इससे उपर उठे प्रश्न का तो समाधान हो गया परन्तु केवलज्ञान के साथ यह बात नही बैठेगी। क्योंकी केवली भगवान् को ज्ञान और दर्शन एक साथ होते हैं, और चेतना एक गुण माना, तो एक गुण की एक साथ दो भिन्न-भिन्न पर्याय होने का प्रसंग आ जायगा।
इस विषय पर ग्रन्थों में भी ज़्यादा चर्चा नहीं आई है।
विशेष तो केवलीगम्य है।
खोज: ‘Darshan Matra Atm Ko Grahan Karta Hai’- Yah Kis Apeksha Kaha Gaya
ऐसा कथन अभी तक धवला में ही पढ़ने मिला है कि दर्शनोपयोग से आत्मा का ग्रहण होता है और ज्ञानोपयोग से पर का।
लेकिन ऐसा नही है। क्योंकि ज्ञान को सर्वत्र स्वपरग्राही कहा है। और ये बात सभी समझते भी हैं।
वहाँ किस अपेक्षा वह कथन किया इसका कोई मूल आधार अभी तक ज्ञात नही हुआ है।
हाँ शुद्ध निश्चय नय से ऐसा कहा जा सकता है कि आत्मा का दर्शन गुण मात्रा स्वग्राही ही है , क्योंकि श्रद्धा दर्शन गुण की पर्याय है और जिस तरह का श्रद्धान (तन्मयता पूर्वक) आत्मा के संबंध में होता है वैसा अन्य पर पदार्थो के संबंध में नही होता। लेकिन ज्ञान का काम जानना है सो वह सभी को तटस्थ भाव से जानता है।
विशेष किसी को ज्ञात हो तो कृपया बताएं।
यह द्रव्यसंग्रह की गाथा-43 है जिसकी टीका में लिखा है कि दर्शन और श्रध्दा गुण अलग अलग हैं ।
दर्शन आत्माग्राहक है ऐसा मात्र द्रव्यसंग्रह ( गाथा-44 की टीका ) में कथन आया है।
आपका कहना बिल्कुल सही है । लेकिन टीका में लिखा हुआ है की सिद्धांत अभिप्राय से ऐसा कथन है। इसका अर्थ यह हुआ की उन्होंने ने भी सिद्धांत ग्रंथ के आधार से लिखा है। और सिद्धांत ग्रंथ धवला ही है।
दूसरी बात गाथा में तो ऐसा कोई अर्थ प्रतिभासित होता नही है। टीका में भी अंत में लिखा है की परमत खंडन के लिए सामान्य ग्राही ओर विशेष ग्राही का भेद किया है।
फिर वे लिखते हैं कि, सिद्धांत में मुख्यता स्वासमय का व्याख्यान होता है, इसलिए सूक्ष्म व्याख्यान के कारण आचार्य ने जो आत्मा को ग्रहण करता है वह दर्शन है ऐसा कथन है। इससे विशेष कुछ और नही है।
इसमे तो कोई शंका है ही नही। दोनो अलग अलग ही है।
ज्ञानोपयोग-दर्शनोपयोग के संबंध में प्रमाण-नय-निक्षेप
May be this one can help…
★ ये एक शोधपत्र है , जिसके last में दर्शनोपयोग के संबंध में विचार किया गया है ,
● धवला और द्रव्यसंग्रह कि चर्चा भी सम्मिलित है ,
तथा कुछ निष्कर्ष भी प्रेषित किये हैं ।
@anubhav_jain ji




● तथा स्व-पर प्रकाशकता के ऊपर भी एक आलेख है ।
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