देखे श्री जिनराज, आज सब विघन नशाये।
देखे श्री जिनराज, आज सब मंगल आये॥
देखे श्री जिनराज, काज करना कुछ नाहीं।
देखे श्री जिनराज, हौंस पूरी मन माहीं॥
तुम देखे श्री जिनराज पद, भौजल अंजुलि जल भया।
चिंतामणि पारस कल्पतरु, मोह सबनि सौं उठि गया॥१॥
देखे श्री जिनराज, भाज अघ जाहिं दिसंतर।
देखे श्री जिनराज, काज सब होंय निरन्तर॥
देखे श्री जिनराज, राज मनवांछित करिये।
देखे श्री जिनराज, नाथ दुःख कबहुँ न भरिये॥
तुम देखे श्री जिनराज पद, रोम-रोम सुख पाइये।
धनि आज दिवस धनि, अब घरी, माथ नाथ कों नाइये॥२॥
धन्य-धन्य जिनधर्म, कर्म कों छिन में तोरै।
धन्य-धन्य जिनधर्म, परमपद सौं हित जोरै॥
धन्य-धन्य जिनधर्म, भर्म को मूल मिटावै।
धन्य-धन्य जिनधर्म, शर्म की राह बतावै॥
जग धन्य-धन्य जिनधर्म यह, सो परकट तुमने किया।
भवि खेत पापतप तपत कौं, मेघरूप ह्वै सुख दिया॥३॥
तेज सूर-सम कहूँ, तपत दुःखदायक प्रानी।
कांति चन्द-सम कहूँ, कलंकित मूरत मानी॥
वारिधि-सम गुण कहूँ, खार में कौन भलप्पन।
पारस-सम जस कहूँ, आप-सम करै न पर तन॥
इन आदि पदारथ लोक में, तुम-समान क्यों दीजिये।
तुम महाराज अनुपमादर्श, मोहि अनूपम कीजिये॥४॥
तब विलम्ब नहिं कियो, चीर द्रौपदी को बाढ्यौ।
तब विलम्ब नहिं कियो, सेठ सिंहासन चाढ्यौ॥
तब विलम्ब नहिं कियो, सीय’ पावकतैं टार्यौ।
तब विलम्ब नहिं कियो, नीर मातंग उबार्यौ॥
इह विधि अनेक दुःख भगत के, चूर दूर किय सुख अवनि।
प्रभु मोहि दुःख नासनि विषै, अब विलंब कारण कवनि।५॥
कियो भौनतैं गौन, मिटी आरति संसारी।
राह आन तुम ध्यान, फिकर भाजी दुःखकारी॥
देखे श्री जिनराज, पाप मिथ्यात विलायो।
पूजाश्रुति बहु भगति, करत सम्यक् गुण आयो॥
इस मारवाड़ संसार में, कल्पवृक्ष तुम दरश है।
प्रभु मोहि देहु भौ भौ विषैं, यह वांछा मन सरस है॥६॥
जय जय श्री जिनदेव, सेव तुमरी अघनाशक।
जय जय श्री जिनदेव, भेव षट्द्रव्य-प्रकाशक॥
जय जय श्री जिनदेव, एक जो प्रानी ध्यावै।
जय जय श्री जिनदेव, टेव अहमेव मिटावै॥
जय जय श्री जिनदेव प्रभु, हेत करम-रिपु दलन कौं।
हूजै सहाय सँघ रायजी, हम तयार सिव-चलन कौं॥७॥
जय जिनंद आनंदकंद, सुरवृंद वंद्य पद।
ज्ञानवान सब जान, सुगुन मनिखान आन पद॥
दीनदयाल कृपाल भविक भौ-जाल निकालक।
आप बूझ सब सूझ, गूझ नहिं बहुजन पालक॥
प्रभु दीनबन्धु करुणामयी, जग उधरन तारन तरन।
दुःख रास निकास स्वदास कौं, हमें एक तुम ही सरन॥८॥
देखनीक लखि रूप, वंदिकर वंदनीक हुव।
पूजनीक पद पूज ध्यान करि ध्यावनीक ध्रुव॥
हरष बढ़ाय बजाय, गाय जस अन्तरजामी।
दरब चढ़ाय अघाय, पाय संपति निधि स्वामी॥
तुम गुण अनेक मुख एक सौं, कौन भाँति वरनन करौं।
मन-वचन-काय बहु प्रीति सौं, एक नाम ही सौं तरौं॥९॥
चैत्यालय जो करै, धन्य सो श्रावक कहिये।
तामैं प्रतिमा धरै, धन्य सो भी सरदहिये॥
जो दोनों विस्तरै, संघ नायक ही जानौं।
बहुत जीव कों धर्म मूल कारन सरधानौं॥
इस दुखमकाल विकराल में, तेरो धर्म जहाँ चले।
हे नाथ! काल चौथो तहाँ, ईति भीति सब ही टलै॥१०॥
दर्शन दशक कवित्त, चित्त सौं पढ़ै त्रिकालं॥
प्रीतम सनमुख होय, खोय चिंता गृह-जालं॥
सुख में निसि-दिन जाय, अन्त सुरराय कहावै।
सुर कहाय शिव पाय, जनम-मृतु-जरा मिटावै॥
धनि जैन-धर्म दीपक प्रकट, पाप तिमिर छयकार है।
लखि ‘साहिबराय’ सु आँख सौं, सरधा तारनहार है॥११॥
Artist: श्री साहिबरायजी