दड़को बन्यो देव — जैन स्वाध्याय सामग्री | Dadko Banyo Dev

दड़को बन्यो देव

प्रस्तावना

निज आत्मस्वभावना महिमा देखाडीने, स्वानुभव प्रगट करवांनी विविध दशोर्नावनार, मुक्तिमार्गने प्रकाशनानारा परमोपकारी अध्यात्म महर्षि सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामीना चरणोमां अत्यंत भक्तिभाव पूर्वक मारो वंदन हो!

‘दडको बन्यो देव’ ए कथा रत्नकरंड श्रावकाचार ग्रंथमांथी लीधेल छे.

नाना बालको जैनधर्मनी सत्य बोधकथाओ द्वारा जैनधर्मना सिद्धांतोने सरलताथी समझ शके तेमज तेओमां धार्मिक संस्कारोनुं सिंचन थाय एवी भावनाथी कथानुं पुनर्लेखन करेल छे.

बालकोनी रसुरुचिने ध्यामां राखी कथामां शक्य एटला रंगीन चित्रोनो समावेश कर्यो छे.

कथानुं पुनर्लेखन करवामां भुल थई होय तो क्षम्य गणशो.

– डोली

प्राप्ति स्थान:
श्री भरतभाई भीमचंदभाई शेठ,
प१, गेलक्सी ओपार्टमेन्ट२, रेसकोर्ष रोड, राजकोट-३६०००१.
फोन: २४७७८९३ e: [email protected]
प्रथम आवृत्ति: जनुअरी: २०१०

ग्राफिक्स डीझाइन तथा प्रिन्टींग:
मे. कोमकृती, ३, शिवम कोम्प्लेक्स, २/१०, भक्तिनगर स्टेशन प्लॉट,
राजकोट-३६०००२. मो.: ९४२७५००१७३ e: [email protected]


श्री महावीर जिनेन्द्राय नमः
जैनधर्मनी बोध कथा

दडको बन्यो देव

‘रत्नकरंड श्रावकाचार ग्रंथना आधारे’
पुनर्लेखनकर्ता: डोली जे. शेठ
चित्रांकन: मुकेश आर. डोडीया

कहानी

ઘણાં વર્ષો પહેલાની વાત છે. રાજગૃહી નામની નગરીમાં રાજ શ્રેણિકરાજ્ય કરતા હતા. એ નગરમાં નાગદત્ત નામનો એક ધનવાન શેઠ તેની પત્નિ ભવદત્તા સાથે રહેતો હતો.

શેઠને ધર્મના સંસ્કાર જરાય ન હતા. તેનું ચિત્ત તો હંમેશા વેપાર ધંધા આદિ પ્રવૃત્તિઓમાં જ લાગેલું રહેતું. શેઠ ક્યારેય જિનેન્દ્ર દેવના દર્શન પૂજન કરવા જિનમંદિરે જતો નહિ નિજ આત્માની ઓળખાણ કરવામાટે તેની પાસે ફુરસદ જ ન હતી.

શેઠની આખીયે જિંદગી વધુને વધુ ધન કમાવાના લોભમાં પસાર થઈ ગઈ અને આ પરિણામોના ફળમાં શેઠ મરીને પોતાના જ ઘરની પાછળ આવેલ કૂવામાં દેડકો થયો.

અનાદિકાળથી જીવ પોતાનાં આત્મતત્વને ઓળખ્યા વગર ધન-વૈભવ આદિ બાહ્ય સંયોગોમાંથી જ સુખ મળશે એવી ભ્રમણામાં ચાર ગતિમાં રખડીને દુઃખી થયા કરે છે.

एक वखत भवहता शेठाणी घरनी पाछळ आवेळ कुवामां पाणी भरवा गई. टेडकाए शेठाणीने जोई. शेठाणीने जोतां ज टेडकाने पूर्व भवनुं जातिस्मरण ज्ञान थयुं. पूर्व भवनां स्नेहवश टेडको कुदको मारीने जोर जोरथी अवाज करतो शेठाणी पासे जवा लाग्यो. शेठाणीए तेने वारंवार पोताथी दूर फेंकी दीधो तो पण टेडकाए फरी फरीने शेठाणीनी नजदीक जवा घणां प्रयत्नो कर्या. टेडकानुं वर्तन जोई शेठाणी आश्चर्य पामी अने त्यांथी जती रही.

मिथ्यात्व अने आत्मस्वरूपनां अज्ञानने लीधे कषायोनां फळमां जीव हलकी गतिने पामे छे.

एक दिवस ए नगरमां सुप्रत नामना अवधिशानी मुनिराज पधार्या. मुनिराजे नगरजनोने उपदेश आप्यो के “आ जगतमां सम्यग्दर्शन ज सर्व रत्नोमां सारभूत रत्न छे. जिनेंद्र भगवाने बतावेल पोताना चैतन्य स्वभावनुं लक्ष करी संसाररूपी चार गतिनां दुःखोनो नाश करो अने सम्यक्त्वने पामो.” मुनिराज पासेथी सम्यक्त्वनो उपदेश पामी सौ हर्ष पाम्या.

धर्मश्रवण कर्या बाद शेठाणीए मुनिराजने टेडका विशे पूछ्युं त्यारे मुनिराजे कह्युं के “आखी जिंदगी आर्त्तध्याननां परिणामो करी तेना फळमां तारो पति नागदत्त शेठ मरीने कुवामां टेडको थयो छे”.

आ सांभळी शेठाणीने खूब आश्चर्य थयुं. त्यारबाद ते टेडकाने पोताना पतिनो जीव जाणी, घरमां लावी, खूब स्नेहपूर्वक राखवा लागी.

सम्यग्दर्शन विना संसार समुद्रनो पार आवे एम नथी.

ઘણાં સમય બાદ એ નગરમાં વૈભાર પર્વત પર
મહાવીર જિનેન્દ્ર ભગવાનનું સમવસરણ આવ્યું.
રાજા શ્રેણિકે આખા નગરમાં આનંદભેરી વગડાવી.
સૌ નગરજનો તથા રાજા શ્રેણિક ખૂબ ઉત્સાહ અને
ઉલ્લાસ પૂર્વક જિનેન્દ્ર ભગવાનના દર્શન કરવા
નિકળ્યા.

તિર્થંકર ભગવાનની ધર્મસભાની શી વાત!

મનુષ્ય-દેવ-તિર્યંચ સર્વેને ભગવાનની વાણી
પોત પોતાની ભાષામાં સમજાઈ જાય એવી
અલૌકિક તિર્થંકર ભગવાનની વાણીનો અતિશય
હોય છે. વીતરાગી ભગવાનની વાણી ઘણા જીવોને
સમ્યગ્દર્શન થવામાં નિમિત્ત થાય છે.

લોકોનો આવો ઉત્સાહ અને ઉમંગ જોઈ દેડકાને
પણ જિનેન્દ્ર ભગવાનનાં દર્શન કરવાની ભાવના
જાગી. દેડકો પોતાના મોઢામાં ફૂલ લઈ ઉછળતો –
કૂદતો જિનેન્દ્ર ભગવાનનાં દર્શન કરવા ચાલી
નીકળ્યો.

પરિણામોની કેવી વિચિત્રતા છે!

જે જીવ મનુષ્ય
પર્યાય તથા બાહ્ય અનુકૂળ સંયોગોમાં આત્માને
ઓળખવાની દરકાર કરી નહોતી, તે જીવ તિર્યંચ
ગતિમાં દેડકાની પર્યાયમાં ભગવાનના દર્શન કરવા
અને વીતરાગી પરમાત્માનું શરણ લેવા આવ્યો.

अरे ! आ शुं थयुं ! नानो एवो डेंडको रस्तामां राज श्रेणिकना हाथीना पग नीचे आवी कुचडाई ने मरी गयो. जिनेंद्र भगवाननां दर्शन करवानी डेंडकानी भावना फळी नहीं.

जिनेंद्र भगवाननां दर्शन अने वाणीनो लाभ मळवो दुर्लभ छे. माटे तेने स्वेच्छाथी थईने गुमाववो नहीं.

अहो ! जिनेंद्र भगवाननां दर्शन करवानी भावनाना फळमां हुं आ देव गतिने पाम्यो हुं. एम जिनेंद्र भगवानना दर्शननो महिमा जाणी, डेंडकानो जीव अति भक्तिभाव पूर्वक स्वर्गनी देवी सामग्रीओ लई महावीर भगवाननां समवसरणमां दर्शन अने पूजन करवा गयो.

भगवाननुं शरण लेतां मंद कषायनां फळमां जो जीव स्वर्गादि पुण्यना सुखने पामे, तो चैतन्य स्वभावनुं शरण लेतां, गतिना अभावमां जे आत्मिक सुख मळे तो शुं वात !

स्वर्गनां तेमज मनुष्योनां त्रण काळना इंद्रिय सुखो भेगा करो तो पण तेनी बराबरी सिद्धप्रभुनां एक क्षणनां सुख साथे न थाय. आत्मिक सुख अमाप अने अनंत छे. तेनी साथे तुच्छ इंद्रिय सुखोनी सरखामणी थईज न शके.

समवसरण

समवसरणमें भगवानकी दिव्यध्वनिमें आवुं के
“देहथी भिन्न चैतन्य स्वभावनी श्रद्धा थतां
अनादिकालना संसारनो अंत आवे छे ने जीव
अनंत सुखने पामे छे. सुख ते आत्मा नो स्वभाव
छे. कोइपण संयोगनी अपेक्षा राख्या वगर ज
आत्मा पोते स्वभावथी ज सुखरूप परिणमे छे,
माटे पोताना चैतन्य स्वभावनी दृष्टि करो.”

जिनेंद्र भगवाननी वाणीमां निज आत्मांनुं
स्वरूप सांभळी देव हर्ष पाम्यो अने सम्यक्त्व
प्रगटकर्यु.

अति भक्तिभावपूर्वक दर्शन पूजन करतां ए देवने
देखी समवसरणमां सौ विस्मय पाम्या. राज
श्रेणीकदेवने तेनो परिचय पूछ्यो.

अति विनय पूर्वक पोतानो परिचय आपतां देवे
कहुं के “हे राजन ! पूर्वभवमां हुं आपना ज
नगरमां टेडको हतो. हुं पण समवसरणमां जिनेंद्र
भगवाननां दर्शन करवा जतो हतो एवामां आपना
हाथीना पग नीचे आवी कुचडाइ गयो अने मरीने
स्वर्गनो देव थयो हुं.”

आम देवनां मुखेथी जिनेंद्र भगवाननां दर्शननो
महिमा जाणी सौ हर्ष पाम्या.

हे बाळमित्रो ! तमो पण दररोज जिनेंद्र भगवानना
दर्शन करवा मंदिररओ जाअो अने भगवानने बतावेला
निज चैतन्य देवनुं शरण लेजो.

बोध

देव - शास्त्र - गुरुनुं शरण ज जीवने सुखकारी छे.

देवदर्शननी विधि

धोईने नहाई, स्वच्छ वस्त्रो पेहेरी नित्य
मंदिरजीए आववुं जोईए.

जिनमंदिरमां स्वच्छ पाणीथी हाथपग
धोईने भगवाननो जयजयकार करता अने
त्रणवार निःसही बोलता मंदिरमां
प्रवेश करवो जोईए.

त्यारबाद भगवाननी वेदी सामो ऊभा
रही जय जय नमोस्तु नमोस्तु
नमोस्तु अने णमोकार मंत्र अने
चत्तारि मंगल आदि पाठ बोली
जिनेंद्र भगवानना अष्टांगनमस्कार
करी भगवाननी स्तुति बोलता त्रण
प्रदक्षिणा करवी जोईए अने शरीरे
णमोकार नमस्कारमंत्र बोली
कायोत्सर्ग करवो जोईए. आ रीते
देवदर्शन करवा जोईए.

त्यारबाद शांतिथी बेसी ओछामं ओछु
अर्धकलाक शास्त्र वाचन करवुं जोईए अने
जो मंदिरजीमां प्रवचन थतुं होय तो ते
सांभळवुं जोईए. शास्त्रमां जे वाच्युं होय
अथवा प्रवचनमां जे सांभळ्युं होय तेनुं
थोडी वार बेसीने मनन करवुं जोईए तथा
विचारवुं जोईए के हुं कोण हुं? भगवान
कोण छे? हुं पोते भगवान केवी रीते बनी
शकुं?

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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