Corrupts, Rapists, Terrorists - शुभ या अशुभ परिणाम?


#1

All corrupts must be sentenced for life.
All rapists must be hung.
All terrorists must be killed.

What kind of परिणाम are these? शुभ या अशुभ?

I’m with शुभ. What do you think? Let’s discuss.


#2

Sanyam Jain:
Asubh bhav hi hai hamare liye toh.

Bhale hi aage aane wale bahut saare logo ki life easy ho jayegi par hamare paridaam to kharaab hi ho rahe hai.


#3

Mere khyaal se behtar yeh hoga ki hum unko unke haal pe chhod de. Yahi sabse acche parinaam honge. Unki mrityu ki iccha hona toh krishna leshya jaise parinaam maalum padte hai.


#4

“पाप से घृणा करो पापी से नहीं”
ऐसा सुवाक्य अन्य दर्शनों में भी सुनने मिलता है | जैन धर्म में तो पाप और पापी दोनों से घृणा, द्वेष भाव रखने के अभाव स्वरुप समता भाव की शिक्षा दी जाती है |

किसी ने बुरा कार्य किया, तो हमे उस कार्य को तो कभी अच्छा मानना ही नहीं है | इसके आलावा उस पापी से द्वेष भाव रखने से वह ना तो सुधर जायेगा न ही उसके द्वारा किया बुरा कार्य भी अब अच्छे कार्य में परिवर्तित होगा | बल्कि इससे हमारे परिणाम ख़राब होंगे की देखो ये व्यक्ति कितना बुरा है इसने इतना घृणित कार्य किया | ऐसे अशुभ भाव करके उस व्यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ेगा |

ये जो कार्य प्रश्न में बताये गए हैं , इन्हे अच्छा कार्य और इन्हे करने वालो को अच्छा मानना तो इन पापियों को बुरा मानने से भी ज्यादा बड़ा अशुभ परिणाम है |


#5

Even a नारकी can attain सम्यक्त्व and as per करणानुयोग, there always अशुभ लेश्या and असंख्यात सम्यकदृष्टि in नरक. लेश्या doesn’t define शुभ - अशुभ परिणाम.

It really great to think like that but the question was more about how we can categories different types of परिणाम because in many situations, despite having similar परिणाम, किसीको पुण्य बंध हो रहा है किसीको पाप बंध। Understanding this will also help us to evaluate our own परिणाम.

I hope you all read the प्रथमानुयोग story of pig fighting with a tiger to save a Jain monk. Both of them were dead fighting. How will you categorize the परिणाम of that pig? शुभ या अशुभ?

Another example, सम्यकदृष्टि duo Ram-Lakshman fought with Ravan to save one woman. Many soldiers were died in the fight, leaving out thousands of women being a widow. How will you categorize the परिणाम of Ram-Lakshman? शुभ या अशुभ?

Here’s my stance: अभिप्राय का फल अधिक हैं इसलिए उपरोक्त कहे गए परिणामों को शुभ कहा जा सकता हैं।

Corrections are warmly welcomed :slight_smile:


#6

Mera taatparya Vicharo se tha. Leshya se vichaar toh pata chalte hai. Agar leshya ashub hui toh vichaar ashub huye. Vichaar ashubh hone par parinaamo mai nirmalta kaise banegi?

Agar galat bol raha hun toh please correct me!


#7

Hi,
अभिप्राय का फल अधिक हैं ye bikul hi sahi hai.
What is in this abhipraay?
Those people are culprit? They must be punished. I can punish them. Punishing them will do good to others. I can do good to others if i can punish them.
Or
You see them as god soul. See their samanya dhravya and ignore the vishesh. I cannot punish them. (akarta swabhav). Nischay se aatma ka hit ahit kabhi nahi hota. Jaisa hai vaisa rehta hai. Surakshit. Aur sabko aaisa tatva mile aaisa subh bhaav.

Phele likhe gaye abhipraay me sabkuch swabhaav se viprit hai aur dusreme aaisa nahi. Phir bhale hi unko maro, pito ya latkao. (said with a good motive) Bina abhipraay thik hue karya hua, toh ashubh. Abhipray thik hue, dwesh ki bhaav aaye bina nahi rehenge. Aur ek baat, khud ko nimit bhi mat manlena ki unki dasha ka upadaan na dikh paye.

Tabhi toh mandir me pooja karta mithya drashti se acha toh dukan me bitha hua, cash le raha samyag drashti hai.

Abhipray se band aur abhipray se moksh!
Correct me if said something wrong and sorry if any words are misspelled or wrongly used.


#8

I also used to have such thoughts, I found that the triggers are the south Indian movies and news channel. South Indian movies contain action where corrupts, rapists, terrorists are killed, if you watch these movies with lot of interest then this may emerge same emotions in you…this is childish. From other perspective, this is देश कथा, so not useful in आत्महित

मैंने सुदृस्टितरंगणी में पड़ा था कि जिस देश में राजा नहीं होता वहाँ कि प्रजा दुखी रहती है, ऐसा नियम है । और ऐसे देश में मुनि नहीं रहते क्योंकि मुनि के दया बहुत है सो मुनि प्रजा का दुःख नहीं देख सकते और अन्याय अनाचार बहुत होने से वहाँ मुनि का धर्म नहीं पलता ।
इसीलिए मुनी धर्म, श्रावक धर्म कि रक्षा करने के लिए बड़े राजा युद्ध करते है और दंड देते है, इसका विशेष पद्मपुराण में पढ़े, वहाँ प्रसंग है जब राजा जनक राजा दसरथ के पास दूत भेजते है कि मलेछ ने आक्रमण किया है, वे दुस्ट प्रजा को यातना करे है, उस दूत के शब्द पड़ने लायक है उसमे राजधर्म दिखाया है वहाँ से पढ़ना तो इन्हे मारने कि इच्छा होगी |

और एक दूसरा प्रसंग है जब खरदूषण और लक्ष्मण के बीच युद्ध के बाद सुग्रीव वहाँ पहुंचे और युद्ध भूमि का दृस्य देखकर विचार करने लगे, यह भी पड़ने लायक है, इसे पड़ना तो मारने कि इच्छा नस्ट होगी ।
और लगेगा कि अब चाहे मेरे सामने अपराधी हो, मलेछ हो तो भी मैं तलवार से उनकी जाँघे नहीं काटूंगा, हाथी कि सूंड नहीं काटूंगा, घोड़ो कि टाँगे नहीं काटूंगा, यदि मेरे सामने बसंततिलका जैसी पति पर झूठा आरोप लगाने वाली भी हो तो भी मैं उसे सूली पर नहीं चढ़ाऊँगा और तुम बाली कि तरह बन जाओगे, रावण को पटक देने कि ताक़त तो बाली के एक हाथ में ही थी पर बाली ने दीक्षा ले ली युद्ध नहीं किया ।
मैंने एक महाराज से सुना था कि Jesus भारत आये थे और जैन मुनि से शिक्षा ली थी, सो जो तुम्हारे हाथो में कील ठोंके और मस्तक विदारे और जाँघे छील दे उसे भी कस्ट पहुचाने के भाव नहीं होंगे, धन्य है ऐसा हृदय, once in a frustration I prepared a note and saved it, this helps me in overpowering these thoughts, Sharing here

आकुलता होती है, परिणाम नहीं सुधरते, इच्छाए कम नहीं होती, संयम नहीं होता, भक्ति तत्त्वआदि में रूचि नहीं होती, भीतर संसार का ताप है, जीवन में विध्न बहुत है, पाप बड़ रहा है, मिथ्यात्व का पार नहीं है, समय आयु बीत रही है, बुद्धि काम नहीं कर रही, हे जिनवाणी माँ ! मैं कहा जाऊ? अपना हित कैसे करू? हे तीन लोक के नाथ ! क्या मेरे भवदधि का कभी पार नहीं आएगा? क्या इस संसार में अभी मेरे बहुत जन्म बाक़ी है? हे प्रभु ! क्या आपका कहा हुआ आत्म तत्त्व कभी मेरे अनुभव में आएगा? मेरे चारो ओर पापी है, दुखियो को शरणभूत यतीश्वर मुझे कहा मिलेंगे? कहा है ऐसे मुनिराज? हे भगवन ! क्या मुझे आपके साक्षात् दर्शन मिलेंगे? मैं इस संसार में एक भव भी नहीं रुकना चाहता, इन कसायो ने मेरे अंतर् को रौंध दिया है । हे दया निधान ! हे हितोपदेशी ! हे तारणहार ! मैं विश्व के किसी भी जीव को कस्ट नहीं देना चाहता, मुझे किसी से बैर नहीं, मैं धर्म चाहता हूँ, मैं कर्मो से मुक्ति चाहता हूँ, मैं अपनी निर्दोष लक्ष्मी को निर्विकल्प हो भोगना चाहता हूँ । हे प्रभु ! मैं अनादि से मिथ्यादृस्टि हूँ इसमें मेरा क्या दोष? मेरे अनादि से कर्म बंधन है इसमें मेरा क्या दोष? मैं अनादि से कसायो में क्यों जल रहा हूँ?..

ऐसे चिंतन से कसाय गल जाती है और मन कोमल हो जाता है, पर यह आवाज ह्रदय से उठनी चाहिए, शब्दो से नहीं, जब हमारे पास जिनशासन है तो हमारा हित क्यों नहीं होगा? हम वीतरागी क्यों नहीं बनेंगे?
सोगानी जी ने कहा है - हे विकल्प भागजा मैं अभी तेरा नास किये देता हूँ, राय चंद्र जी ने कहा है इस देह में भी वीतरागी हुआ जा सकता है, ग्रंथो में लिखा है की आत्मा के स्मरण मात्र से आत्मानुभूति होती है फिर हमे क्यों नहीं होगी? अमृतचन्द्र आचार्य ने कहा है कि जब हम तुझे सही उपाय बताते है और जब तू सही उपाय करेगा तो तुझे सम्यक्त्व प्राप्त क्यों नहीं होगा? जब आचार्यो को मार्ग पर, अपने बनाये हुए ग्रंथो पर confidence है फिर हमे क्यों नहीं…मार्ग यही है… हे मन ! तू जिनवर द्वारा कहे गए तत्त्व का मंथन कर और हे जीव तू बार बार शुद्ध स्वरूप का अनुभव कर,

हे प्रभु ! जैसे सुदर्शन जी जीवन भर णमो अरिहंताणं बोलते रहे और एक ही भव में मुक्त हो गए, ऐसे मैं भी पल पल आपका सुमिरन करूंगा, आपका भक्त संसार में दुखी नहीं रह सकता, आपके तो चरणों कि धूल भी पवित्र है, फिर आपका सुमिरन करने वाला मन पवित्र क्यों नहीं होगा? आपके निकट शत्रु नहीं आते, फिर आपके भक्त के निकट यह कर्म शत्रु कैसे आएंगे? जैसे सुर्यदास ने अपनी आखें फोड़ ली थी ऐसे मैं इस खोटे मन को side में रखकर बस दिन रात आपका सुमिरन करूँगा, मेरे मन में बस तत्त्व कि ही तरंगे उठेंगी, मुझे शीग्र मुक्त जो होना है । कैसी होगी मेरी मुक्ति? जहाँ गंभीर शांति होगी, जहाँ अंतरंग निर्मल होगा, अकलंक होगा, पवित्र होगा, जहाँ कोई दोष नहीं होगा, जहाँ चोरी का नहीं अपना सुख होगा, जहाँ समता होगी, जो शास्वत होगी ।

It is good to just get rid of these thoughts-- शुभ अशुभ का मिस्र होगा, जब प्रजा पर दया के भाव होंगे तो शुभ, जब अपराधियों पर क्रोध होगा तब अशुभ, दोनों में जिसकी मुख्यता अधिक हुई उसका अनुभाग ज्यादा, पर क्रोध में दया में आकुलता बनी रहेगी


#9

This is very mesmerizing. Very well written.


#10

चूंकि जिस व्यक्ति को ठगा गया है , जिस महिला के साथ रेप किया गया है और जिन लोगों को बेरहमी से आतंकवादियों के द्वारा मार दिया गया है उनके प्रति दया का भाव होना और जो कोई भी सजा उन्हें मिलनी चाहिए उसका विचार करना शुभ की श्रेणी में जायेगा । वो इसलिए क्योंकि यह दया युक्त परिणाम है ।
किन्तु उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए , न मिलने पर अपने परिणामों का खराब होना , क्लेषित होना इत्यादि रूप से निरंतर वैसा ही विचार करना तो वह अशुभ की श्रेणी में आएगा । क्योंकि सजा दूसरे व्यक्ति को मिलनी ही चाहिए यह उसके प्रति क्रूरता का भाव है ।

दूसरी बात इनके प्रति दया और सजा का भाव आना हमारी भूमिका में तो उचित है , अतः किसी अपेक्षा शुभ नाम भी पाता है , किन्तु मुनिराज की भूमिका में ऐसा विचार निश्चित रूप से अशुभ के श्रेणी में ही जायेगा ।
क्यों जाएगा ? इसका विचार में आप पर ही छोड़ता हूँ ।