चित्त! चेतनकी यह विरियां रे । Chitt Chetan ki Yah viriya re

चित्त! चेतनकी यह विरियां रे

(राग सोरठ)

चित्त! चेतनकी यह विरियां रे ।।टेक ।।
उत्तम जनम सुतन तरूनापौ, सुकृत बेल फल फरियां रे ।।
लहि सत-संगतिसौं सब समझी, करनी खोटी खरियां रे ।
सुहित संभाल शिथिलता तजिदैं, जाहैं बेली झरियां रे ।।१ ।।
दल बल चहल महल रूपेका, अर कंचनकी कलियां रे ।
ऐसी विभव बढ़ी कै बढ़ि है, तेरी गरज क्या सरियां रे ।।२ ।।
खोय न वीर विषय खल साटैं, ये क्रोड की घरियां रे ।
तोरि न तनक तगा हित `भूधर’ मुकताफलकी लरियां रे ।।३ ।।

रचयिता: कविवर श्री भूधरदास जी

Source: आध्यात्मिक भजन संग्रह (प्रकाशक: PTST, जयपुर )

अर्थ

हे चेतन ! जरा चिंतवन करो, यह मनुष्य जन्म एक सुअवसर है, समय है। सुनो, उत्तम जन्म पाया है, यौवन पाया है, जिसमें कुलीनवंश की सन्ततिरूप फल-फूल खिल रहे हैं।

जब सुयोग से सत्संगति मिली तब ही अपने किए के अच्छे-बुरे की समझ हुई। अपने हित के लिए गोष्ठी, प्रमाद व ढिलाई को तजते ही आत्मीयता के निर्झर फूटने लगते हैं। समाज, बल, आनंद, महल, सम्पति, रुपया, सोने की कलियाँ आदि सभी वैभव निरंतर बढ़ते जावें तो उससे तेरे किस प्रयोजन की सिद्धि होगी !

हे वीर पुरुष ! तू विषयरूपी खल के बदले करोड़ों रुपये के मूल्य का समय - अनमोल समय मनुष्य-जन्म मत खो अर्थात् दुष्ट विषयों के लिए अपने अनमोल बहुमूल्य समय को मत खो। भूधरदास कहते हैं कि तू धागे के लिए (धागा पाने के लिए) मोती की माला को मत तोड़।

शब्दार्थ: बिरिया - समय। सुजत - कुलीन। संभा - गोष्ठी। शिथिलता - ढीलापन। झरिया - आत्मीयता का सम्बोधन। चहल - आनन्द। साटै - बदले में। कोरन - करोड़ों की। तगा - धागा। लड़ो = माला।

स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 61।

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