छांडत क्यौं नहिं रे, हे नर! रीति अयानी ।
बारबार सिख देत सुगुरु यह, तू दे आनाकानी ।।छांडत… ।।टेक।।
विषय न तजत न भजत बोध व्रत, दुख सुखजाति न जानी ।
शर्म चहै न लहै शठ ज्यौं घृतहेत विलोवत पानी ।।१ ।।छांडत. ।।
तन धन सदन स्वजनजन तुझसौं, ये परजाय विरानी ।
इन परिनमन विनश उपजन सों, तैं दु:ख सुख-कर मानी ।।२ ।।छांडत. ।।
इस अज्ञानतैं चिरदुख पाये, तिनकी अकथ कहानी ।
ताको तज दृग-ज्ञान-चरन भज, निजपरनति शिवदानी ।।३ ।।छांडत. ।।
यह दुर्लभ नर-भव सुसंग लहि, तत्त्व लखावत वानी ।
`दौल’ न कर अब पर में ममता, धर समता सुखदानी ।।४ ।।छांडत. ।।
Artist- पं.दौलतराम जी
अर्थ
हे नर ! तू अपनी ज्ञानरहित क्रियाओं को क्यों नहीं छोड़ता ! तुझे बार-बार सत्गुरु समझाते हैं, पर तू उसे मानता ही नहीं है।
विषय न तजत न भजत बोध तत, दुग्तसुखजाति न जानी।
तू न इंद्रिय-विषयों को छोड़ता न ज्ञान और तप की आराधना करता। तू दुःख व सुख की जाति को नहीं जानता, उनको नहीं पहचानता। तू शान्ति चाहता है, पर उसके लिए तू कुछ उपाय नहीं करता, तू उस मूर्ख की भाँति क्रिया करता है जो पानी को बिलोकर घृत (घी) निकालने की कामना करता है।
तन धन सदन स्वजनजन तुझसौं, ये परजाय विरानी।
ये देह, धन, घर-बार, कुटुंबी-परिवारजन सब तुझसे भित्र हैं, भिन्न पर्याय के हैं; इनके उत्पाद-व्यय में, जन्म-मरण में, संयोग वियोग में तू सुख और दुःख की मान्यता करता है।
इस अज्ञानतैं चिरदुख पाये, तिनकी अकथ कहानी।
इस अज्ञान के कारण तू दीर्घकाल से दुःख पा रहा है, जिनकी कथा कही नहीं जा सकती। उन सबको अब छोड़; रत्नत्रय (दर्शन-ज्ञान चारित्र) की आराधना कर। अपने स्वभाव में रमण ही मोक्ष को देनेवाला है।
स्रोत: दौलत भजन सौरभ।
मूल पृष्ठ (छवि):
प्रूफरीडिंग बाकी है