चेतो-चेतो आराधना में | cheto-cheto aradhana me

चेतो-चेतो आराधना में

देखो-देखो यह जीव की, विराधना का फल।
चेतो-चेतो आराधना में, मत बनो निर्बल ॥टेक।।

पाषाण खण्ड कह रहे, कठोरता त्यागो।
विनम्र हो उत्साह से, शिवमार्ग में लागो।।
बहते हुए झरने कहें, धोओ मिथ्यात्व मल ।।देखो-देखो…॥१॥

ईर्ष्या त्यागो जलती हुई, अग्नि है कह रही।
मत चाह दाह में जलो, सुख अन्तर में सही ।।
वायु कहे भ्रमना वृथा, होओ निज में निश्चल ।।देखो-देखो…।।२।।

जड़ता छोड़ो प्रमाद को नाशो कहें तरुवर ।
शुद्धातमा ही सार है, उपदेश दें गुरुवर ।।
समझो-समझो निजात्मा, अवसर बीते पल-पल ।।देखो-देखो…।।३।।

मायाचारी संक्लेशता का, फल कहें तिर्यंच।
जागो अब मोह नींद से, छोड़ो झूठे प्रपञ्च।।
जिनधर्म पाया भाग्य से, दृष्टि करो निर्मल ।।देखो-देखो…।।४।।

श्रृंगार अरु भोगों की रुचि का, फल कहती नारी।
कंजूसी पूर्वक संचय का, फल कहते भिखारी ।।
बहु आरम्भ परिग्रह फल में, नारकी व्याकुल ।।देखो-देखो… ॥५॥

असहाय शक्ति हीन, देखो दरिद्री रोगी।
कोइ इष्ट वियोगी, कोई अनिष्ट संयोगी।
घिनावना तन रूप, अंगोपांग है शिथिल ।।देखो-देखो…॥६॥

यदि ये दु:ख इष्ट नहीं हैं, तो निज भाव सुधारो।
निवृत्त हो विषय कषायों से, निजतत्त्व विचारो।।
चक्री के वैभव भोग भी, सुख देने में असफल ।।देखो-देखो…|७||

पाकर किंचित अनुकूलताएँ, व्यर्थ मत फूलो।
है पराधीन आकुलतामय, नहीं मोह में भूलो ।।
ध्रुव चिदानन्दमय आत्मा, लक्ष्य करो अविरल ।।देखो-देखो…॥८॥

पुण्यों की भी तृष्णायतनता, अबाधित जानो।।
बन्धन तो बन्धन ही, उसे शिवमार्ग मत मानो।।
ज्यों अंक बिन बिन्दी त्यों स्वानुभव बिन जीवन निष्फल॥देखो-देखो…॥९॥

अब योग तो सब ही मिले, पुरुषार्थ जगाओ।
अन्तर्मुख हो बस मात्र, जाननहार जनाओ।।
सन्तुष्ट निज में ही रहो, ब्रह्मचर्य हो सफल ।।देखो-देखो…।।१०।।

सब प्राप्य निज में ही अहो, स्थिरता उर लाओ।
तुम नाम पर व्यवहार के, बाहर न भरमाओ ।।
निर्ग्रन्थ हो निर्द्वन्द हो, ध्याओ निजपद अविचल ॥देखो-देखो…॥११॥

निज में ही सावधान ज्ञानी, साधु जो रहते।।
वे ही जग के कल्याण में, निमित्त हैं होते।
ध्याओ ध्याओ शुद्धात्मा, पर की चिन्ता निष्फल ॥देखो-देखो…॥१२॥

निर्बन्ध के इस पंथ में, जोड़ो नहीं सम्बन्ध।
विचरो एकाकी निष्पृही, निर्भय सहज निशंक।
निर्मूढ़ हो निर्मोही हो, पाओ शिवपद अविचल ।।देखो-देखो…॥१३॥

Artist - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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