चेतन जो अगर चाहते हो शांति | Chetan jo agar chahte ho shanti

चेतन जो अगर चाहते हो शांति को पाना ?
कर्तृत्व बुद्धी में न कभी चैन गंवाना।।
चेतन जो अगर चाहते हो शांति को पाना ।
एकाग्रता से आत्मा का ध्यान लगाना।।

गया एक रोज मंदिर में लखी जिनराज की मूरत ।
जगत सरताज की मूरत सुखद समनट की मूरत ।
गया झुक खुद व खुद देख मुद्रा वीतरागी की ।।
यही संदेश देती थी.प्रभु तू ज्ञाता है अब भी ।। चेतन।।

निजानंद रस में डूबे थे, नहीं चिंता थी तन मन की।
बोले हमको न भय कुछ है व्यवस्थित हुई मति मेरी ।
किया षट् द्रव्य का निर्णय न करना है वहाँ बाकी ।
सभी निरपेक्ष परिणमते, न करते आश पर बाकी ।। चेतन।।

अनादि काल से लेकर अनंत काल तक के काम ।
सभी अति ही सुनिश्चित है बताओ अब बचा क्या काम ?
ये जिन शासन है जिनवर का, यहां जो भव्य आते है ।
सभी कर्तृत्व के भूतों को गुरूवर श्री भगाते हैं।।चेतन।।

कर्ता कर्मादि षटकारक के मंतर जब सुनाते है ।
समाजाते समय में जो समय का सार पाते हैं ।
समाटों सिद्धों की बस्ती में वो मस्ती मनाते हैं ।
अनंते काल तक बंशी वो आनंद की बजाते हैं।। चेतन।।