बोधि समाधि निधान
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By “Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust”
(Shri Shantilal Ratilal Shah-Parivar, Mumbai)
Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
परमात्मने नमः।
श्री सीमन्धर-कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन साहित्य स्मृति संचय, पुष्प नं. 31
बोधि समाधि निधान
जैन कथा संग्रह (सचित्र)
गुजराती संकलनकार :
नागरदास बी. मोदी
उमेदराय बी. मोदी
जितेन्द्र ना. मोदी
( सम्पादक परिवार, आत्मधर्म गुजराती )
हिन्दी अनुवाद व सम्पादन :
देवेन्द्रकुमार जैन
बिजौलियाँ, जिला-भीलवाड़ा (राज.)
प्रकाशक :
श्री सुरजबेन अतुलभाई सेठ स्मृति ट्रस्ट
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Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
छह आवृत्तियाँ - 21,000 (सन् 2001 से 2006 तक)
सातवीं आवृत्ति -
( श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंच कल्याणक -
मङ्गलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के अवसर पर)
विक्रय मूल्य - 20 रुपये मात्र
प्राप्ति स्थान :
- श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट,
सोनगढ़ (सौराष्ट्र) - 364250, फोन : 02846-244334 - श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट
302, कृष्णकुंज, प्लॉट नं. 30, वी. एल. मेहता मार्ग, विलेपार्ले (वेस्ट),
मुम्बई-400056, फोन (022) 26130820 [email protected] - श्री आदिनाथ कुन्दकुन्द कहान दिगम्बर जैन ट्रस्ट (मंगलायतन)
अलीगढ़-आगरा मार्ग, सासनी-204216 (उ.प्र.) - पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट,
ए-4, बापू नगर, जयपुर, राजस्थान-302015, फोन : (0141) 2707458 - पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट,
कहान नगर, लाभ रोड, देवलाली-422401, फोन : (0253) 2491044 - श्री परमागम प्रकाशन समिति
श्री परमागम श्रावक ट्रस्ट, तिड़खेड़ा, सोनागिरजी, दतिया (म.प्र.) - श्री सीमन्धर कुन्दकुन्द कहान आध्यात्मिक ट्रस्ट
योगी निकेतन प्लाट, ‘स्वशक्ति’ सवाणी होल्नी शेरीमां, निर्मला कोन्वेन्ट रोड
राजकोट-360007 फोन : (0281) 2477728, मो. 09374100508
Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:
उपोद्घात
जिनके पुनीत प्रताप से यह विषम पंचम काल भी धर्मकाल में परिवर्तित हो गया, जिनकी मूलधार उपदेश-वर्षा से बहती हुई अध्यात्म-गंगा के अमृत झरनों द्वारा पंचम काल के अन्त तक इस भरतक्षेत्र में अध्यात्म की हरियाली आत्मार्थियों के लिए हरित रहनेवाली है, उन अध्यात्मयुग सर्वसंहार उपकारमूर्ति स्वात्मानुभूति करुणासिन्धु पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी ने मूलरूप से तो, जिसकी प्राप्ति बिना जीव, बोधिरूप-सम्यग्ज्ञानरूप परिणमित नहीं हुआ - ऐसा द्रव्यदृष्टि का ही मार्ग प्रकाशित किया है और साथ ही उस बोधि बीज के अनुकूल ऐसी समाधि वैराग्य की भूमि के लिए पुराणों के सैकड़ों प्रसंगों को मिला-मिलाकर वर्णन करते उन पुराण प्रसंगों द्वारा हेय-उपादेयपने की सिद्धि करते रहते थे। उनके मूल उपदेश का संकलन तो ‘द्रव्यदृष्टि जिनेश्वर पर्यायरदृष्टि विनश्वर’ द्वारा पूर्व में प्रकाशित किया ही जा चुका है परन्तु आपसी के प्रवचनों में बारम्बार पुराण प्रसंग सुनते हुए एक भावना रहा करती थी कि वह भाग पुराण तो हिन्दी में ही उपलब्ध होने से तथा विशाल ग्रन्थस्वरूप होने से सामान्य जन समुदाय के लिए उनका वाचन सुलभ न होने से, आचार्यों के महान पुराणों में से कुछ समाधि-वैराग्य प्रेरक प्रसंग तथा कुछ पुरुषार्थ-प्रेरक प्रसंगों को गुजराती में संकलन करके प्रकाशित करना चाहिए। फलस्वरूप इन 52 कथाओं का संकलन ‘बोधि-समाधि-निधान’ प्रकाशित करने का प्रसंग बनने पर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि में चार अनुयोगों का उपदेश होता है। उसमें प्रथम अनुयोग का नाम प्रथमानुयोग है। अन्य प्रकार से कहें तो द्रव्यानुयोग, चरणानुयोग और करणानुयोग में जो वर्णन है, उसको ‘साक्षी’ यह प्रथमानुयोग है। इस कारण प्रथमानुयोग के अभ्यास से इन तीनों अनुयोगों का भाव-भासन सरल बनता है।
इस जैन कथा संग्रह की कथायें पढ़ने पर समझ में आयेगा कि :-
- जीवों के भूतकाल और भविष्यकाल के निश्चित परिणामों को जानकर, पूज्य गुरुदेवश्री के प्रिय अपर सिद्धांत, ‘क्रमबद्धपर्याय’ की यथार्थ श्रद्धा द्वारा स्वात्मसन्मुख हुआ जाता है।
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[iv]
- साक्षात् सर्वज्ञदेव की वाणी सुनने पर भी जीव हीनहार को फेर अथवा टाल नहीं सकता; होनेवाले संयोग-वियोगादि को पहले से ही जान लेने पर भी उसमें फेरफार नहीं कर सकता-यह त्रैणिक राजा, श्रीकृष्णा आदि के उद्धार और मरण प्रसंग की स्थिति से स्पष्ट समझ में आता है। इस प्रकार पूज्य गुरुदेवश्री योग्यता, पर्याय के परिणमन की स्वतन्त्रता और क्रमबद्धोपाय के उपदेश द्वारा आत्मस्वभाव की सम्यक्त्वा का जो मार्ग बतलाते गये हैं, उसका इन कथाओं के द्वारा भाव-भावनपूर्वक दृढ़ श्रद्धान होता है।
- धर्म के क्षेत्र में आकर भी जीव स्थूल मान-सम्मान की अपेक्षा से विराधाना में अनुमोदना भी कर बैठे तो उसके फल में चिरकाल तक भयंकर अधोगति प्राप्त करता है। इन प्रसंगों को पढ़ते हुए जीव को अनजाने से भी विराधाना में न जुड़ जाने की सावधानि रहती है।
- संसारी जीवों के पापमय परिणाम होते पर भी, पूज्य गुरुदेवश्री उनकी क्षणिकता बताकर, स्वभाव में संसार को गम्य भी नहीं है - ऐसा समझाते थे - यह बात इन कथाओं से दृढ़ होती है।
- पूज्य गुरुदेवश्री ने मुख्यरूप से द्रव्यदृष्टि का उपदेश देते हुए कहा कि पाप-पुण्य के परिणाम, जीव को होने पर भी वे सब पानी में तेल की बूँद की तरह ऊपर रहते होने से वे आत्मस्वभाव में प्रवेश नहीं पाते; इस कारण जब जीव, आत्मस्वभाव के समीप जाता है, तब शीघ्र मोक्ष पाता है। यह बात इन कथाओं को पढ़कर समझी जा सकती है।
- जीव के परिणाम और उनका निमित्तपना पाकर आश्चर्यकारी रीति से परिणमते कुदरत के प्रसंग पढ़ते हुए, जीव यदि पाप करे तो प्रकादि के तीव्र दुःख पाता है और पुण्य करे तो स्वर्गादिक का सुख पाता है; वीतरागता करे तो मोक्ष पाता है-इस प्रकार जीव के परिणाम के साथ कुदरत बँधी हुई है, जीव को भावना न फले-ऐसा नहीं होता, यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है।
- एक जीव दूसरे जीव के ऊपर क्रोधादि करता है तो वे क्रोधादि के संस्कार भव-भव तक रहते हैं; इस प्रकार एक जीव दूसरे जीव के प्रति रागादि करता है तो उसके संस्कार भी भव-भव तक नहीं छूटते; वैसे ही कुदेव-कुशास्त्र-कुधर्म के सेवन से नरक-निगोद में चिरकाल भ्रमण करके फिर मनुष्य होने पर कुधर्म के संस्कार पुनः जागृत हो जाते हैं - ये सब प्रसंग पढ़कर जीव को वीतराग धर्म की आराधना की विशेष भावना जागृत होती है।
- विश्व के प्रत्येक पदार्थ की व्यवस्थित व्यवस्था, उपादान-निमित्त और निश्चय-व्यवहार का स्वरूप जानने से तत्त्वश्रद्धा दृढ़ होती है।
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[v]
- जीव को रौद्रध्यानरूप तीव्र कषाय के परिणाम होने पर भी वे आत्मस्वभाव को किंचित् भी हानि नहीं कर सकते तथा जीव अति मंदकषाय के परिणाम करे तो भी उससे आत्मस्वभाव को किंचित् लाभ नहीं हो सकता। ये सब परिणाम वायु वेग के वेग के समान क्षणिक होने से आत्मस्वभाव को किंचित् लाभ-हानि नहीं कर सकते - ऐसी महिमावंत आत्मस्वभाव की दृढ़ता द्वारा स्वसमयता का पुरुषार्थ उदित होता है।
- मोक्षमार्गी महापुरुषों का भूतकाल का जीवन महावीर पापमय होने पर भी, जब वे पवित्र जैनधर्म को पाते हैं, तब परिणाम पवित्र होने से उत्कृष्ट प्रकार के पुण्यौदयपूर्वक मोक्ष प्राप्त करते हैं। यह जानने से पाप-पुण्य को तुच्छता समझ में आने से अन्तर्मुखता के प्रबल को बल मिलता है।
- पुण्य का निमित्त पाकर पुद्गल स्वयं स्वतंत्रस्वरूप से अष्टौषधि, अष्टऋद्धि के कल्पवृक्षरूप से, रत्नवृक्षरूप से, समवसरण रचना आदि अनेक प्रकार से परिणमते हैं। इन प्रसंगों द्वारा अजीवत्व की स्वतंत्रता समझी जा सकती है।
- पाप करनेवाले बड़े राजा भी मरकर नरकादि में जाते हैं और पुण्य करनेवाले पशु भी मरकर क्षण में स्वर्गादि में जाते हैं। इस प्रकार यह सब भावावली संसार नाटक के क्षणिक स्वांगमात्र होने से शाश्वत चैतन्य प्रभु की महिमा समझी जा सकती है।
- रामचन्द्र जी, लक्ष्मण, सीता, रावण, आदि के पूर्व के कितने ही भवों का वर्णन पढ़ने पर किसी जीव के प्रति वैराग्य करने से कितने भवों तक वह वैराग्य प्रवर्ता है - यह समझने से जीव अचेतन ही वैराग्यपूर्वक ऐसे भावों से चेतता रहता है।
- श्रीकृष्ण, सुदर्शन सेठ, श्रीदाममुनि, सती सीता, अंजना, चन्दना आदि महापुरुषों को भी पूर्व में बँधी हुई असाता के उदयकाल में कोई सहायक नहीं बनता। यह बात समझ में आने पर जीव को असाता के उदय में समाधान-शान्ति रखकर आत्म-आराधना करने का बोध प्राप्त होता है।
- इन कथाओं को वाँचने से स्वभावसन्मुखता की खुमारी तो जागृत होती ही है परन्तु साथ-साथ महापुरुषों के बाह्य आचरण में उत्कृष्ट प्रकार की प्रमाणिकता, न्याय-नीति, प्राण जाने पर भी धर्म की विराधाना में किंचित् भी अनुमोदना न होने देना, रात्रि भोजन त्याग इत्यादि प्रसंग पढ़ने से मुमुक्षुओं को अपने परिणाम को सँभाल लेने की महत्ता ख्याल में आती है।
- जीवों का मन बन्दर की तरह अत्यन्त चंचल होता है और चंचलता-चंचलता संसार की
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[vi]
जनक होती है। इस मनरूपी बन्दर की चपलता को शान्त करने के लिए पूर्व में हो गये महापुरुषों की भावञ्जलि का वांचन अत्यन्त हितरूप है - ऐसा अनुभव होता है।
चतुर्थ काल में साक्षात् सर्वज्ञदेव से धर्मात्मा स्वयं भी महापुरुषों के भवों का वर्णन पूछते थे क्योंकि महापुरुषों की पूर्व की महाघोर पापमय और उत्कृष्ट पुण्यमय भवावली सुनकर धर्मात्मा को भी संसार के प्रति उदासीनतापूर्वक पुरुषार्थ की वृद्धि होती थी।
इन कथाओं-पुराण प्रसंगों को वांचन से पुरुषार्थ को और वैराग्य की भावना को अत्यन्त बल मिलता है; इसलिए ही समन्तभद्र जैसे समर्थ आचार्यों ने भी कथाओं को बोधि और समाधि का निधान कहा है।
इन कथाओं के वांचन द्वारा पूज्य गुरुदेव द्वारा प्ररूपित अध्यात्म के मार्मिक सिद्धान्तों का सरलतापूर्वक भावभाषण होओ तथा इस दुर्लभ मनुष्य भव में बोधि-समाधि की उपलब्धि होओ और इस प्रकार पूज्य बहिरंगि आदि धर्मात्माओं का सत्समागम चरितार्थपने को प्राप्त होओ - ऐसी भावना के साथ इन गुजराती कथाओं का हिन्दी रूपान्तर प्रस्तुत है।
संकलनकार
सम्पादकीय
प्रथमायोग की अनेक प्रेरक कथाओं के संकलनस्वरूप ‘बोधि समाधि निधान’ का सम्पादित हिन्दी संस्करण समस्त तत्त्वप्रेमी समाज को समर्पित करते हुए प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। वर्तमान शताब्दी में आध्यात्मिक सद्पुरुष जीवनशिल्पी पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के द्रष्टृदृष्टि प्रधान आध्यात्मिक उपदेशों को परिपुष्ट करनेवाली ये प्रेरक कथाएँ समस्त साधर्मियों द्वारा बारम्बार अनुशीलन करने योग्य है।
जिनमें परमात्मा की दिव्यवाणी चार अनुयोगों में विभक्त है, जिनमें से प्रथमायोग में संसार की विचित्रता, पुण्य-पाप का फल और महन्त पुरुषों की आत्मसाधनामयी परिणति का परिज्ञान कराते हुए जीवों को धर्ममार्ग में लगाया जाता है। प्रथमानुयोग में वर्णित भव-भवान्तरों को कथन जहाँ आत्मा की नित्यता को प्रतिबिम्बित करता है, वहीं पूर्व भवों में तीव्र पापभाव करके दुर्गतिओं में परिभ्रमण करनेवाला जीव भी, स्वभाव के लक्ष्य से विभावपरिणति का परित्याग करके शाश्वत् परमपद को प्राप्त करता है - यह तथ्य इस बात का परिचायक है कि पाप और पुण्य की विकारी वृत्तियों के समक्ष भी निज सामान्य चैतन्यसत्ता में उन वृत्तियों का प्रवेश नहीं है और वे सभी विकारी वृत्तियाँ मात्र क्षणवर्ती होने से निश्चित ही विनष्ट होने योग्य है - इस परम सत्य का परिचय कराता है।
पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी भी अपने आध्यात्मिक प्रवचनों में यदाकदा महापुरुषों के जीवन चरित्रों को आधार बनाकर द्रष्टृदृष्टि का माहात्म्य बतलाते थे। उनके प्रवचनों के प्रभाव से मुमुक्षु समाज में प्रथमानुयोग के अध्ययन की रुचि भी वृद्धिगत हुई है, जिसका परिणाम प्रस्तुत ‘बोधि समाधि निधान’ ग्रन्थ का संकलन है। प्रस्तुत संकलन में 27 पुराणों के आधार पर 52 पौराणिक कथाओं का संकलन किया गया है। जो सर्व प्रथम गुजराती में प्रकाशित होकर, अब तक हिन्दी में छह आवृत्तियों के रूप में 21,000 की संख्या में प्रकाशित होकर जन-जन तक पहुँच चुका है। यह प्रस्तुत संकलन पूर्व प्रकाशित हिन्दी संकलन का पुनः सम्पादितरूप है।
इस नवीन सम्पादित संकलन में प्रत्येक कथा का भाव स्पष्ट करने के लिए प्रसंगानुसार
[viii]
रेखाचित्रों का प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण संकलन को भाषा की दृष्टि से दोबारा सम्पादित किया गया है। साथ ही प्रसंगानुसार आवश्यक तत्त्वबोधक वचनामृतों का प्रयोग कर उसे आध्यात्मिक दृष्टि से ग्राह्य बनाने का प्रयास किया है। पूर्व संकलन में समागत कथाओं के नामों में आवश्यक परिवर्तन किया गया है तथा लम्बे-लम्बे पैराग्राफ को छोटा-छोटा करके पाठकों के लिए सहज ग्राह्य बनाने का प्रयास किया है।
इस कथा संग्रह में जिन पौराणिक कथाओं का संकलन समायोजित किया गया है, उन सभी ग्रन्थों एवं ग्रन्थकारों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। महापुरुषों के प्रति भक्ति उत्पन्न करने में कारणभूत अध्यात्ममूर्ति स्वानुभवप्रतिष्ठित पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के प्रति भी इस अवसर पर हार्दिक विनयाञ्जलि समर्पित करता हूँ।
इस संकलन के गुजराती संकलनकार श्री नागरदास वी. मोदी, श्री उमेदराय वी. मोदी, श्री जितेन्द्र एन. मोदी - सम्पादक परिवार गुजराती आश्रम सोनगढ़ के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। प्रस्तुत ग्रन्थ के सम्पादन एवं अनुवाद का अवसर प्रदान करने के लिए प्रकाशक परिवार के प्रति भी हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बारम्बार ऐसे अवसरों की प्राप्ति की भावना भाता हूँ।
सभी जीव प्रस्तुत ग्रन्थ में समागत पुराण प्रसंगों को पढ़कर अपने जीवन में बोधि समाधि की भावना दृढ़ करते हुए सम्यक् बोधि-समाधि को प्राप्त करें - इसी भावना के साथ।
देवेन्द्रकुमार जैन
बीजौलियाँ, जिला भीलवाड़ा (राज)
अनुक्रमणिका
- पतित से पावन 1
- देखो, संसार की विचित्रता ! 12
- चमत्कार चैत्य का 20
- विरागधक बना आराघक 27
- मत करो पाप का अनुमोदन 41
- पापी से परमात्मा 54
- वज्रबाहुकुमार का वैराग्य 58
- देशभूषण और कुलभूषण की भवावली 63
- निधन मिल गया 74
- वीतरागी मुनि नागकुमार 80
- सियार चला मुक्ति के मार्ग 84
- मुक्ति-साधक धन्यकुमार 88
- श्रीराम, लक्ष्मण, सीता आदि के पूर्व भव 109
- काम विजयी : सेठ सुदर्शन 123
- शालिभ्रव्य मच्छ के भावों की कथा 133
- मोह से मुक्ति की ओर 134
- करनी का फल 142
- बाली मुनिराज 149
- अनुमोदना का उत्तम फल 160
- देखो, देखो ! निरग्रन्थना का फल 166
- प्रद्युम्नकुमार की कथा 170
- देखो, परिणामों की विचित्रता ! 184
- भरत और श्रेणिकभूपन हार्थों की भवावली 187
- जल से भिन्न कमल है 197
- वीतरागी सन्तों का अकारण करुणा 202
- महावीर प्रभु का वैराग्य और पुरुषार्थ प्रेरक कथा 212
[ x ]
- सन्मार्ग का प्रेरक हो सच्चा मित्र 224
- राजा दण्डक की कथा 231
- वैभवाव दुःखदायी भव-भव 237
- चिलातपुत्र 240
- उपसर्गजयी कार्तिकीय मुनि 244
- मत करो किसी से बैर 248
- राजा कोचक और द्रौपदी की भवावली 250
- लोभ : पाप का बाप 254
- अभयदान का फल 257
- शूरवीर सुकौशल मुनिराज की कथा 261
- धन्य-धन्य सुकुमाल महामुनि! 268
- गुरुदत्त मुनि 274
- सीताजी को मिथ्या आक्षेप क्यों? 277
- महासती चन्दना पर विपत्तियाँ क्यों? 280
- दुःशीलवन्त अनन्तमती 283
- कसौटी धर्म श्रद्धा की 292
- विकट चक्रवर्ती श्रीपाल 298
- भाव परिवर्तन 303
- अंजन बना निरंजन 313
- परिग्रह से भयभीत एक परिवार की कथा 318
- क्षण भर में बदले परिणाम 320
- धिक-धिक जग की स्वार्थवृत्ति 327
- जिन-प्रतिमा के अनादर का भयंकर फल 332
- नाटक में एक जीव के दो स्वांग 336
- सुभौम चक्रवर्ती की कथा 345
- रात्रि भोजन-त्याग का प्रभाव 347
- 64 ऋद्धियों का स्वरूप 348
ॐ
परमात्मने नमः
बोधि-समाधि-निधान
( पौराणिक जैन कथाओं का संकलन )
भाग - 1
गौतम गणधर का जीवन चरित्र
- पतित से पावन
राजगृही नगरी में भगवान महावीर के मौसा राजा श्रेणिक राज्य करते थे। उनमें समुद्र जैसी गम्भीरता, चन्द्रमा के समान सुन्दरता, पर्वत के समान निश्चलता और बृहस्पति के समान बुद्धिमत्ता आदि अनेक निर्मल गुण थे।
एक बार अनेक देशों में विहार करते हुए अन्तिम तीर्थङ्कर भगवान महावीरस्वामी विपुलाचल पर्वत के मस्तक पर समवसरणरहित आकर विराजमान हुए। महाराज श्रेणिक को भगवान के पधारने के समाचार मिलते ही वे तुरन्त परिवारसहित समवसरण में गये और भगवान को वन्दन-नमस्कारादि करके धर्म का उपदेश सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए। उन्होंने भगवान को हाथ जोड़कर, नमस्कार करके पूछा - ‘हे प्रभो ! यह गौतमस्वामी कौन है ? किस पर्याय से आकर यहाँ जन्म लिया है और इनको किस धर्म के प्रभाव से अनेक लब्धियाँ प्राप्त हुई हैं ? कृपा करके यह सब बातें विस्तार से बतलाने का अनुग्रह करें।’
पंडित से पावन
2
राजा श्रेणिक के प्रश्न के उत्तर में भगवान जिनेंद्रदेव की दिव्यध्वनि में गौतमस्वामी
के जीवनचरित्र सम्बन्धी जो वर्णन आया, वह इस प्रकार है –
इस भरतक्षेत्र में अनेक नगरों से सुशोभित एक अवंति नामक देश है। उस देश के
राजा का नाम महीचन्द्र था। एक दिन इस नगरी में उपवन में अङ्गभूषण नाम महामुनिराज
पधारे। मुनिराज का आगमन जानकर, राजा महीचन्द्र अपने रनवास और नगरजनों को
साथ लेकर मुनिराज के दर्शन करने के लिए उपवन में गया। उपवन में मुनिराज के दर्शन,
पूजन, वन्दन, स्तुति करके, उन मुनिराज के धर्मवृद्धिरूप आशीर्वाद को प्राप्त करके,
उनके समीप बैठ गया। उस वन में मुनिराज से धर्मामृत पान करने के लिए विशाल जन
समुदाय एकत्रित हुआ था। वहाँ किसी शूद्र की तीन कुरूपा कन्याएँ भी शीघ्रता से आकर
बैठ गयीं।
मुनिराज ने अपने धर्मोपदेश
में पुण्य, पाप और धर्म तथा उनके
फल का विस्तारपूर्वक उपदेश देते
हुए कहा – ‘हे भव्य प्राणियों! यह
आत्मा, ज्ञान और आनन्द का पिण्ड
है। स्वभाव से ही सदा शुद्ध एवं पर
के सम्बन्ध से रहित चैतन्यमूर्ति है।
अपने चैतन्यस्वरूप का विस्मरण करके एवं संयोगरूप में प्राप्त शरीर, स्त्री, पुत्र, धनादिक
पदार्थों में अपनत्व करके ही संसार की चारों गतियों में परिभ्रमण कर रहा है।
यह अज्ञानी आत्मा कभी परलक्ष्य से पापभाव करके नरक, तिर्यञ्चगति का तो
कभी पुण्यभाव करके मनुष्य अथवा देवगति का पात्र बनता है, किन्तु अपने आत्मस्वरूप
को श्रद्धा-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय बोधि के अभाव में संसार से परिमुक्त होकर शाश्वत्
सिद्धपद को प्राप्त नहीं कर पा रहा है।
हे जीवों! यदि तुम्हें संसार परिभ्रमण का अभाव इष्ट हो तो अपने देह-देवालय में
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बोधि-समाधि विधान
3
विराजमान निज चैतन्य भगवान आत्मा में अपने उपयोग को लगाओ। अपने को जानो,
पहचानो, अपने में ही जम जाओ – रम जाओ – यही सुखी होने का एकमात्र उपाय है।’
मुनिराजश्री के मुखरूपी चन्द्रमा से झरते उपदेशरूपी अमृत का पान करके राजा
महीचन्द्र बहुत ही प्रसन्न हुआ। उसी जनसमुदाय के बीच शूद्र की कन्याएँ भी बैठी थीं,
उन पर राजा की नजर पड़ी। उनको देखते ही राजा के नेत्र प्रफुल्लित हो गये, मुख और
मन आनन्दित हो गये। यद्यपि वे कन्याएँ दुष्टस्वभावी थीं, दीन थीं, तीव्र दुःखों से दुःखी
थीं, काली थीं, दरिद्रहित थीं, माता-पिता, भाई-बन्धुओं से रहित थीं, फिर भी ‘इन्हें
देवनेमात्रा से मुझे प्रसन्नता क्यों हुई? – ऐसा भाव उत्पन्न होने पर राजा ने तुरन्त ही
मुनिराज से पूछा – ‘हे प्रभो! इन शूद्र कन्याओं को देखकर मेरे हृदय में अत्यन्त प्रेम क्यों
उत्पन्न हो रहा है?’
मुनिराज ने कहा ‘हे भव्य! इनके साथ तुम्हारा पूर्व भव का सम्बन्ध था, उसे मैं
कहता हूँ, तू ध्यान देकर सुन!’
इस भरतक्षेत्र में काशी नामक महाविशाल देश है। जो तीर्थङ्कर परमदेव के पञ्च
कल्याणकों सहित अनेक प्रकार की शोभा से सुशोभित है। इस काशी देश में बनारस
नामक एक नगर है। उसमें विश्वलोचन नामक राजा राज्य करता था। उस राजा के
विशालाक्षी नामक रानी थी, वह इन्द्राणी, रतिदेवी, नागाश्री अथवा देवाङ्गनाओं के समान
सुन्दर थी। राजा विश्वलोचन को वह रानी अत्यन्त प्रिय थी।
एक दिन रानी विशालाक्षी प्रसन्नता से अपनी चामरी और रङ्गिका नामक दो
दासियों के साथ राजमहल के झरोखे में खड़ी हुई थी। राजमार्ग में नाच, गान आदि से
सुशोभित एक नाटक चल रहा था, जो समस्त प्रजाजनों के मन को मोहित कर रहा था।
उस नाटक को देखते ही रानी विशालाक्षी का मन चञ्चल हो गया। वह अपने हृदय में
विचार करने लगी – ‘अरे! इस राज्यसुख से मुझे क्या लाभ है? मैं तो एक अपराधी की
तरह जेलखाने में बँधी पड़ी हूँ। संसार में ये ही स्त्रियाँ धन्य हैं, जो अपनी इच्छानुसार जहाँ-
तहाँ घूमती हैं, परन्तु मुझे पूर्व पापमोदय से इच्छानुसार घूमने-फिरने का सुख प्राप्त नहीं
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4
पंडित से पावन
हुआ; अतः अब मैं इच्छानुसार घूमने-फिरनेरूप संसार का फल शीघ्र और सदा के लिए
चाहती हूँ। इस विषय में लज्जा मेरा क्या करेगी?’
इस प्रकार विचार करके रानी ने छल-कपट में अत्यन्त चतुर अपनी दो दासियों
को बुलाकर कहा – ‘हे दासियों! इच्छानुसार घूमने-फिरने के सुख से तो मनुष्यभव
सफल होता है और वह काम-भोग को देनेवाला है। अतः अपने को शीघ्र ही यहाँ से
निकलकर इच्छानुसार घूमना-फिरना चाहिए।’
रानी की बात सुनकर दासियाँ कहने लगीं – ‘हे स्वामिनी! यह आपने बहुत उत्तम
विचार किया है। संसार में मनुष्यजन्म का फल यही है।’
तत्पश्चात् कामवासना से पीड़ित, अन्ध और दुष्ट हृदयवाली, कुलाचाररहित,
कुबुद्धि की धारक रानी अपने पापमोदय से उन दोनों दासियों के साथ घर से निकलने
का उपाय करने लगी।
झूठ बोलना, दुर्बुद्धि होना, कुटिल हृदय, छल-कपट करना और मूर्खता – यह
स्त्रियों के स्वाभाविक गुण हैं। ये सब गुण, रानी में विद्यमान थे ही; अतः रात्रि होते ही उसने
रई भरकर एक स्त्री का पुतला बनाया और उसे वस्त्र तथा गहनों से सुसज्जित करके पूरा-
पूरा स्वयं के रूप जैसा बनाकर पलङ्ग पर सुला दिया।
रानी ने द्वारपाल आदि सेवकों को भी वस्त्रभूषण, धन आदि देकर अपने वश में
कर लिया। तत्पश्चात् पूर्वकूत पापकर्मोदय से रानी ने दोनों दासियों को साथ लेकर किसी
देवी की पूजा के बहाने अर्धरात्रि के समय राजमहल का परित्याग कर दिया। उन सबने
सुन्दर वस्त्रभूषण और राज के चिह्नों को त्यागकर, भगवे वस्त्र पहनकर योगिन का रूप
धारण किया। राज्य में मिलनेवाला भोजन तो क्षुद्र ही होगा, अतः भूख शान्त करने के
लिए वे तीनों वृक्ष के फल खाकर अपनी क्षुधा शान्त करने लगीं।
जब रात्रि के समय राजा विश्वलोचन अपनी प्रिय रानी के महल में गया, तब रानी
को शृङ्गारयुक्तदशा में पलङ्ग पर सोआ देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ, परन्तु रानी के
द्वारा आदर-सत्कार न देखकर विचार करने लगा कि रानी को क्या हुआ? इस शरीर में
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बोधि-समाधि-निधान
कोई रोग हुआ है या अन्य कोई बात है? इसी चिन्ता में व्याकुल राजा ने पलङ्ग पर बैठकर रानी का स्पर्श किया, तब उसे ज्ञात हुआ कि यह तो रानी का पुतला है।’ रानी का किसी पापी ने हरण कर लिया है’ – ऐसा समझकर राजा बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। सेवकों द्वारा शीतोपचार से होश में आने पर राजा, रानी का गुणगान करने लगा –
‘हे चन्द्रवती! तू कहाँ गयी? तेरी रक्षा करनेवाली दोनों दासियाँ कहाँ गयीं? इस महल में तो कोई आ भी नहीं सकता, फिर भी तेरा किस उपाय से हरण कर गया? या फिर कुल – आचार से रहित दुष्ट तू स्वयं ही नष्ट हो गयी? नीच मनुष्यों की सङ्गति से सज्जन भी नष्ट हो जाते हैं। स्त्री जैसी अन्दर से होती है, वैसी बाहर से नहीं दिखती है और जैसी बाहर से दिखती है, वैसा कार्य नहीं करती है। स्त्रियों के चरित्र को भला कौन जान सकता है? अहा! समस्त गुणों को धारण करनेवाली रानी अपने दस वर्ष के पुत्र और पटरानी पद को छोड़कर कैसे चली गयी?’ इस प्रकार रानी के वियोग में बहुत समय तक दुःखी होकर राजा मर गया।
राजा के मरणोपरान्त मन्त्री आदि ने उसके पुत्र को राजगद्दी पर बिठाया।
वह राजा का जीव मरकर विशालकाय हाथी हुआ। उसके पुण्योदय से उस वन में एक अवधिज्ञानी मुनिराज पधारे। मुनि ने हाथी को धर्मोपदेश देते हुए कहा – ‘हे गजराज! तू ज्ञान और आनन्द का पिण्ड शुद्धात्मा है। यह हाथी का शरीर तो अनन्त पुद्गल परमाणुओं का पिण्ड है, इसके साथ तेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः इस शरीर के प्रति एकत्वबुद्धि का परित्याग करके निज चैतन्यसत्ता को देख! सम्यक्त्व को ग्रहण कर! श्रावक के व्रत ग्रहण कर।’
मुनिराजश्री के मुखरूप्री चन्द्र से झरते अमृत का सेवन करके हाथी ने श्रावक के व्रत धारण किये और अन्त समय में समाधिमरणपूर्वक मरकर पहले स्वर्ग में देव हुआ।
पतित से पावन
स्वर्ग के सुख भोगकर, वहाँ से च्युत होकर तू महीचन्द नाम का उत्तम राजा हुआ है। पूर्व भव के स्नेह से तुझे इन कन्याओं को देखकर अनुराग उत्पन्न हुआ है। हे भव्य! आगे चलकर तेरी मुक्ति होगी।
हे राजा महीचन्द! अब तू इन तीन स्त्रियों की कथा सुन। यह तीनों स्त्रियाँ अपनी इच्छानुसार बहुत प्रसन्नता से अनेक देशों में भ्रमण करने लगीं। इन तीनों योगिनियों के साथ अन्य अनेक योगिनियाँ थीं, जो भीख माँग-माँगकर पेट भरती थीं। ये योगिनियाँ हमेशा प्रमाद करनेवाली मदिरा पीती और शरीर को पुष्ट रखने के लिए माँस का भक्षण करती थीं। अनेक जीवों से भरे हुए महापाप को उत्पन्न करनेवाले पाँच उदम्बर फलों का सेवन करती थीं। तीनों स्त्रियाँ, कामसेवन की इच्छा से उत्पन्न होकर उत्तम अथवा नीच जो मिले, उस पुरुष का सेवन करती थीं। लोगों के सामने गीत गाती थीं और विचित्र बातें करती थीं कि हमको जोग (योग) धारण किये हुए सौ वर्ष बीत चुके हैं।
एक दिन भ्रमनाचार्य नाम के मुनिराज, आहार के लिए ईर्ष्यापथ शुद्धिपूर्वक गमन कर रहे थे। ऐसे श्रेष्ठ मुनि को देखकर तीनों स्त्रियाँ लाल-लाल आँखें करके कहने लगीं – 'अरे नग्न घूमतेवाले! हम उज्जैनी नगरी के दयालु राजा के पास धन लेने जा रही थीं, किन्तु न जाने किस पाप के उदय से तू हमारे सामने आ गया? तू दुराचारी है। क्या तूने अपनी लज्जा बेच दी है कि स्त्रियों के सामने भी तू नग्न घूमता है? हे मूर्ख योगी! तूने हमारा अपशकुन किया है, इसलिए अब हमारे कार्यों की सिद्धि नहीं होगी। अभी तो दिन है, परन्तु इस अपशकुन का फल हम तुझे रात्रि में देंगी।
इस प्रकार इन स्त्रियों के दुष्ट वचन सुनकर भी मुनिराज ने क्रोध नहीं किया। जैसे, पानी से भरी हुई पृथ्वी पर अग्नि कुछ नहीं कर सकती; उसी प्रकार क्षमाधारी पुरुष के लिए दुष्ट वचन भी कुछ नहीं कर सकता। जिस प्रकार पत्थर का मध्य भाग पानी से कभी नरम नहीं होता, उसी प्रकार योगेश्वरों का निर्मल हृदय, क्रोधाग्नि से कभी नहीं जलता।
तत्पश्चात् वे तीनों स्त्रियाँ रात्रि के समय मुनिराज के समीप गयीं और क्रोधित होकर अनेक प्रकार के उपद्रव करने लगीं। एक तो मुनिराज के समीप आकर रोने लगी;
बोधि-समाधि-निधान
दूसरी काम-वासना से पीड़ित होकर मुनि के शरीर से लिपट गयी और तीसरी ने भुजाओं करके मुनिराज को बहुत कष्ट दिया। तत्पश्चात् कामज्वर से पीड़ित वे तीनों स्त्रियाँ अनेक प्रकार के कटाक्ष करती हुई मुनिराज के समक्ष नग्न होकर नृत्य करने लगीं और पत्थर, लकड़ी, मुक्का, लात, जूता आदि से उन्हें मारने लगीं। उन दुष्टात्माओं ने मुनिराज को बाँध लिया, तथापि मुनिराज चलायमान नहीं हुए। सत्य ही है – क्या प्रलयकाल की वायु से महान मेरु पर्वत चलायमान होता है?
उस समय इन उदयजन्य बाह्य उपसर्गों की विषम परिस्थिति से अत्यन्त निरपेक्ष रहकर वे मुनिराज अपने हृदय में बारह अनुप्रेक्षाओं का चिन्तवन करने लगे। संसाररूप समुद्र में डूबे हुए प्राणियों को पार उतारने के लिए अनुप्रेक्षा ही नाव के समान है।
प्रातःकाल होने पर इन उपद्रवों को व्यर्थ समझकर तथा मार्ग में आते-जाते लोगों के डर से तीनों स्त्रियाँ भाग गयीं। उन्होंने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया, वह अत्यन्त दुःखदायी था। इस पापकर्म के उदय से तीनों स्त्रियों को कोढ़ हो गया। सभी लोग उनको निन्दा करने लगे। तीनों स्त्रियाँ कोढ़ के रोग से हमेशा महा दुःखी रहती थीं। आयु समाप्त होने पर रौद्रध्यानपूर्वक मरकर तीनों स्त्रियाँ नरक में उत्पन्न हुईं और नरक के असहनीय दुःखों को भोगने लगीं। नरक की आयु पूर्ण होने पर तीनों ने एक समान ही कर्मबन्ध किया हो तो तीनों जीव क्रमशः बिल्ली, सुअरी और मुर्गी की योनियों में उत्पन्न हुए, वहाँ भी वे जीवों की हिंसा करती, आपस में लड़ती-झगड़ती, घर-घर फिरती और मनुष्यों को मारकर खाती रहीं।
अन्त में आयु पूर्ण होने पर तीनों मुर्गियाँ बहुत दुःखी होकर मरकर धर्मस्थानों से सुशोभित अवनिदश के बंगाल में हल्के लोगों की बस्ती में किसी एक परिवार में कन्याएँ हुईं। इनके गर्भ में आते ही धनादि नष्ट हो गया, जन्म होते ही माता मर गयी। तीनों में एक
पतित पावन
कान्ती, एक लंगड़ी और एक काली थी। वे मुनिराज पर घोर उपसर्गों के पाप से हमेशा दुःखी रहा करती थी। इनके शरीर, अङ्ग-उपाङ्ग बेडौल थे। रोग की दुर्गन्ध से नगर में जाते ही सम्पूर्ण नगर में अत्यन्त दुर्गन्ध फैल जाती थी। तीनों कन्याएँ तीव्र भूख-प्यास से पीड़ित थीं। दुराचार करने में हमेशा तत्पर ऐसी ये तीनों कन्याएँ विदेश पर्यटन के लिए निकली थीं। रास्ते में सदा आपस में लड़ती-झगड़ती अनेक नगरों में भ्रमण करतीं, माँगतीं, खातीं अनुक्रम से इन नगर में आई हैं। यद्यपि इनके शरीर अत्यन्त ही मलिन हैं, तथापि इन्होंने प्रसन्नचित्त होकर मुनिराज के पास आकर वन्दन किया है। जिस प्रकार बादलों की गर्जना सुनकर मयूर प्रसन्न होता है, उसी प्रकार मुनिराज के मुख से अपना भूतकाल सुनकर तीनों कन्याएँ पश्चात्तापपूर्वक प्रसन्न हुई हैं।
तत्पश्चात् संसार के दुःखों से भयभीत ये तीनों कन्याएँ, मुनिराज को भक्ति से नमस्कार एवं स्तुति करके प्रार्थना करने लगीं - ‘हे प्रभो! हे स्वामिन्!! इस संसाररूप अपार समुद्र में डूबे हुए समस्त प्राणियों को पार लगाने के लिए आप जहाज के समान हैं। पूर्व भव में हमने जो घोर पाप किया था, कृपा करके उसके नाश का कोई उपाय बताओ।’
मुनिराज उन कन्याओं के शुभ वचन सुनकर तथा उन्हें निकट भव्य समझकर मीठी वाणी से कहने लगे - ‘हे पुत्रियों! आत्मा तो सदा काल सुख सम्पन्न ही है परन्तु इस जीव ने अनादि काल से पर में सुख की कल्पना कर रखी है। अपने निज सुख की उसे आज तक उपलब्धि नहीं हुई; अतः तुम अब पर से सुख की चाह मिटाकर अपने सुख को ही उपलब्ध करने हेतु लब्धिविधान करो, अर्थात् क्षयोपशम, विशुद्धि, आत्मपूर्वक देशनालब्धि द्वारा प्रायोग्यलब्धि में प्रवेश कर करणलब्धि द्वारा मिथ्यात्व का नाश कर सम्यक्त्व प्राप्त करो। सम्यग्दर्शनपूर्वक श्रावक के व्रत अङ्गीकार करो। यह व्रत कर्मरूपी शत्रुओं को नाश करनेवाला है और संसाररूपी समुद्र से पार उतारनेवाला है।’
उन कन्याओं ने मुनिराज के उपदेशानुसार श्रावकों की मदद से तत्त्वज्ञान का अभ्यास कर भेदविज्ञान की अविच्छिन्न धारा प्रवाहित करके मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी कषाय को मिटानेवाली लब्धि (करणलब्धि) प्राप्त की। इस प्रकार लब्धिविधान व्रत का उद्यापन कर, श्रावकों के व्रत धारण किये, शीलव्रत धारण किया और अन्त समय में
बोधि-समाधि-विधान
समाधिमरण को धारण करके मृत्यु को प्राप्त हुई। यहाँ से पाँचवें स्वर्ग में जाकर स्त्रीलिङ्ग का छेद करके प्रभावशाली देव हुई और स्वर्ग में उत्तम प्रकार के भोग भोगे।
इस भरतक्षेत्र में मगधदेश में ब्राह्मण का नगर है। उसमें एक शाण्डिल्य नाम का धनी गुणवान ब्राह्मण था। उसकी स्वडिला नाम की रूपवती, सौभाग्यशाली स्त्री थी। स्वर्ग में जो बड़ा देव (रानी का जीव) था, वह आकर उनके यहाँ गौतम नाम का पुत्र हुआ और दूसरा देव भी स्वडिला के ही गार्ग्य नाम का पुत्र हुआ, तीसरा देव भी उसी ब्राह्मण की दूसरी पत्नी के उदर से भार्गव नाम का पुत्र हुआ। जैसे, कुन्ती के पुत्र पाण्डवों के बीच परस्पर अत्यन्त प्रेम था, इसी प्रकार इन तीनों भाईयों में अत्यन्त प्रेम था। तीनों भाईयों ने ब्राह्मणों की समस्त क्रिया पढ़ ली थी। तीनों में गौतम सबसे बड़ा था, वह समस्त शास्त्रों का ज्ञानवान था। गौतम ब्रह्मशाला में पाँच सौ शिष्यों का सुविख्यात उपाध्याय था।
उसी समय भगवान महावीरस्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने आकर समवसरण की रचना की। भगवान सिंहासन पर विराजमान हुए, परन्तु छियासठ दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी। यह देखकर सौधर्म इन्द्र ने अवधिज्ञान से देखा कि यदि गौतम यहाँ जाए तो भगवान की दिव्यध्वनि खिरेंगी। यह विचार करके इन्द्र ने स्वयं ही एक अतिशय वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और लकड़ी के सहारे धीमें-धीमें चलते हुए गौतम के समीप आया और बोला - ‘हे विद्वान्! संसार में अपना पेट भरनेवाले तो बहुत हैं, परन्तु इस काव्य का अर्थ करनेवाले इस पृथ्वी पर कोई विरल पुरुष होंगे? मेरे गुरु इस समय आत्मध्यान में लीन हैं; अतः अभी मुझे कुछ नहीं बता सकते; इसलिए मैं इस काव्य का अर्थ समझने के लिए आपके पास आया हूँ।’
उसके उत्तर में गौतम ने कहा - ‘हे ब्राह्मण! तुम अपने काव्य का बहुत अभिमान करते हो। यदि मैं इस काव्य का अर्थ कर दूँ तो तुम मुझे क्या दोगे?’
वृद्ध ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र ने कहा - ‘यदि तुम मेरे काव्य का अर्थ कर दोगे तो मैं सबके सामने तुम्हारा शिष्य बन जाऊँगा और यदि तुम अर्थ नहीं बता सको तो अपने समस्त अभिमानी शिष्यों और भाईयों के साथ आकर मेरे गुरु के शिष्य बन जाओ।’
पतित से पावन
गौतम ने कहा - ‘हाँ, मुझे यह बात स्वीकार है।’
इन्द्र ने गौतम से काव्यरूप में पूछा - ‘द्रव्य कितने हैं? तत्त्व कितने? अस्तिकाय कितने हैं? धर्म के कितने भेद हैं? श्रुतज्ञान के अङ्ग कितने हैं?’
ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र का काव्य सुनकर गौतम थोड़ा दुःखी हुआ और मन में विचार करने लगा कि इस काव्य का क्या अर्थ कहूँ? फिर गौतम ने विचारकर वृद्ध ब्राह्मण से कहा कि ‘चलो! मेरे गुरु से विवाद करें।’ इस प्रकार कहकर सब इन्द्र के साथ चलने लगे। मार्ग में गौतम ने विचार किया कि जब मैं इस वृद्ध के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका, तब इसके गुरु तो महान विद्वान् होंगे, उनको उत्तर मैं किस प्रकार दूँगा?
इन्द्र, गौतम को अपने गुरु के पास समवसरण में ले जाकर सन्तुष्ट हुआ। जिसने अपनी शोभा द्वारा तीनों लोकों में आश्चर्य उत्पन्न किया है - ऐसे मानस्तम्भ को देखकर गौतम ने अपना सब अभिमान त्याग दिया। उन्होंने मन में विचार किया कि जिस गुरु के सम्पूर्ण पृथ्वी में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली इतनी विभूति है, क्या वे मुझसे पराजित हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं।
तत्पश्चात् आगे जाकर वीर प्रभु के दर्शन करके गौतम अनेक प्रकार से स्तुति करने लगे तथा पाँच सौ शिष्यों और दोनों भाईयों के साथ जिनेश्वरी दीक्षा अङ्गीकार कर ली। वीरनाथ भगवान् के समवसरण में चार ज्ञान से सुशोभित ऐसे गौतम (इन्द्रभूति) अग्निभूति, वायुभूति आदि गणधर हुए और वीरनाथ की दिव्यध्वनि खिरने लगी।
तपश्चरण करते-करते एक दिन गौतम मुनिराज एकान्त प्रासुक स्थान में विराजमान होंगे और निश्चल ध्यान में लीन होकर श्रेष्ट प्रकृतियों को नष्ट करके कार्तिक वद अमावस्या के दिन सायंकाल केवलज्ञान प्राप्त करके तेरहवें गुणस्थान में विराजमान होंगे।
अहो! गौतम स्वामी का जीव पहले विश्वालोचन महाराज की पटरानी होकर दुराचारी, विषय लम्पटी, मदिभक्षी, मुनिन्दक, मुनिहिंसक, शैरध्यानी, नरकगामी हुआ और नरक में से निकलकर बिल्ली, सुअरी, कुत्ती, मुर्गी, और कानी, लंगड़ी, कुबड़ी शूद्र कन्या हुई; भीख माँगती-माँगती मुनिराज के दर्शन और उपदेश से व्रतादि धारण करके
बोधि-समाधि-विधान
सम्यग्दर्शनपूर्वक स्त्रीलिंग का छेद करके पाँचवें स्वर्ग में उत्तम देव हुआ और वहाँ से आकर ब्राह्मण कुल में पैदा होकर वेद-वेदान्त में पारङ्गत हुआ; तत्पश्चात् इन्द्र के माध्यम से समवसरण में गया, मानस्तम्भ को देखकर मान गलित हुआ तथा दीक्षा अङ्गीकार करके चार ज्ञान प्रगट करके अन्तर्मुहूर्त में बारह अङ्ग चौदह पूर्व की रचना करनेवाले गणधर पद को प्राप्त किया, आगे क्रमशः केवलज्ञान प्रगट करेंगे।
हे श्रेणिक! इस प्रकार गौतम गणधर के अशुभ-शुभ और शुद्धपरिणाम तथा उसका फल तुझे बताया। जो भव्य जीव, आत्मा की शुद्धता को जानते हैं और उसका विश्वास करते हैं, आनन्द की अनुभूति में लीन रहते हैं, वे जीव, संसार भ्रमण से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
- (गौतमस्वामी चरित्र से)
प्रचुर संस्वदेन ही मुनि का भावलिङ्ग
अहा! सुनिष्ठा कैसी होती है? उसका विचार तो करो! छठवें-सातवें गुणस्थान में झूलनेवाले वे मुनि, स्वरूप में गुप्त हो गये हैं! प्रचुर संस्वदेन ही मुनि का भावलिङ्ग है और शरीर की नग्नता-वस्त्रपरारहित निर्ग्रन्थदशा, यह उनका द्रव्यलिङ्ग है। उनकी अपवाद-व्रतादि का शुभराग आता है, किन्तु वस्त्रत्याग का अथवा अधःकर्म तथा औद्देशिक आहार लेने का भाव नहीं होता।
- पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, विणासणो सव्वं, ११४, पृष्ठ १३०
देखो, संसार की विचित्रता!
बलभद्र, वासुदेव और उनके मोक्षगामी तीन युगल बन्धुओं की वैराग्य प्रेरक कथा
वासुदेव, भगवान नेमिनाथ के पिता राजा समुद्रविजय के छोटे भाई थे। एक बार उन्होंने अपनी सहधर्मिणी देवकी के साथ चारणऋद्धिधारी अवधिज्ञानी मुनिराज श्रीअजितमुख्यामी को भक्तिभावपूर्वक वन्दन करके/नमस्कार करके, देवकी के होनेवाले पुत्रों की कंस के द्वारा मृत्यु सम्बन्धी शङ्का का समाधान करने के लिए पूछा। उसके उत्तर में मुनिराज ने कहा - हे भव्य! देवकी के होनेवाले पुत्रों की मृत्यु कंस के द्वारा नहीं होगी। मैं इस सम्बन्ध में जो सत्य है, वह कहता हूँ, उसे तुम ध्यान देकर सुनो!
देवकी का सातवाँ पुत्र नौवें नारायण के रूप में जन्म लेगा, और वह तीन खण्ड के राज्य का स्वामी होगा। उससे बड़े छह भाई तद्भव मोक्षगामी होंगे। उनकी मृत्यु कंस के द्वारा नहीं होगी; इसलिए तुम चिन्ता मत करो। सात पुत्र तो देवकी के होंगे और एक पुत्र रोहिणी का होगा, जो कि बलभद्र होगा। मैं इन सबके पूर्व भव तुम्हें कहता हूँ, वह तुम सुनो। उनके पूर्व भव का वृत्तान्त तुम्हारे मन को आनन्दकारी होने के साथ-साथ वैराग्य एवं आत्महित की प्रेरणा देनेवाला भी है।
बोधि-समाधि-विधान
बहुत समय पूर्व इस मथुरा नगरी में राजा सुरसेन राज्य करते थे। उनके राज्य में एक भानु नाम का सेठ बारह करोड़ द्रव्य का स्वामी था। उसकी पत्नी का नाम यमुना था। उसके सुभानु आदि सात पुत्र थे। भानु सेठ को संसार से वैराग्य होने पर वह अभयनन्दि मुनिराज के समीप दीक्षा लेकर मुनि हो गये और सेठानी यमुना भी जिनदत्त आर्यिका के समीप आर्यिका हो गयी।
भानु सेठ के दीक्षित होने के पश्चात् उसके सुभानु आदि सातों पुत्र, जुआ और वैश्यागमन आदि के व्यसनी हो जाने से पिता द्वारा प्रदत्त समस्त द्रव्य नष्ट हो गया। द्रव्य नष्ट हो जाने से सातों भाई चोरी करने के लिए उज्जैनी नगर में गये। सुभानु का सबसे छोटा भाई सुरसेन था। उसे महाकाल नामक श्मशान में कुल, सन्तान की रक्षा के लिए रखकर सुभानु आदि छह भाई चोरी करने के लिए नगरी में गये और छोटे भाई सुरसेन से कह गये कि यदि चोरी करते हुए हम मर जाएँ तो तू यहाँ से भाग जाना और यदि हम सकुशल वापस आ गये तो चोरी करने से जो द्रव्य आयेगा, उसमें से तुझे बराबर का हिस्सा देंगे। ऐसा कहकर छहों भाई चोरी करने चले गये और सातों छोटा भाई सुरसेन श्मशान में बैठा गया। उसी समय संसार की विचित्रता का दर्शक एक प्रसङ्ग बना -
उज्जैनी नगरी का राजा वृषभध्वज था। उसके राज्य में दुष्टिमति नाम का महायोद्धा था, उसकी पत्नी का नाम वज्रमति थी। उनके वज्रमूष्टि नाम का पुत्र था, जिसका विवाह राजा विमलचन्द्र की मञ्जूषी नाम की पुत्री के साथ हुआ था। मञ्जूषी अपने पति वज्रमूष्टि को बहुत प्रिय थी। मञ्जूषी अपनी सास को सेवा में प्रमादी थी, इस कारण उसकी सास का चित्त कलुषित रहता था; अतः सास ऐसा उपाय सोचती थी कि किसी प्रकार मेरा पुत्र अपनी पत्नी मञ्जूषी से विरक्त हो जाए अथवा मञ्जूषी मर जाए।
एक बार बसन्तऋतु के उत्सव में वज्रमूष्टि जन में क्रीड़ा करने गया, तब उपयुक्त अवसर जानकर मञ्जूषी की सास ने घड़े में सर्प रखकर कपटपूर्वक मञ्जूषी से कहा - ‘हे बहू! इस घड़े में मोतियों की माला है, तू उसे निकालकर पहिन।’
मञ्जूषी ने मोतियों की माला लेने के लिए ज्यों ही घड़े में हाथ डाला तो तुरन्त उसे सर्प
देवों, संसार की विचित्रता!
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ने दस लिया, जिससे वह मूर्च्छित हो गयी। उसकी सास ने सेवकों को आज्ञा दी कि मञ्जी को श्मशान में डाल आओ। सेवक आज्ञानुसार मञ्जी को महाकाल श्मशान में डाल आया। तत्पश्चात रात्रि में मञ्जी का पति वज्रमुष्टि घर आया और अपनी प्राणप्रिया मञ्जी को सर्प डसने आदि के समाचार जानकर अत्यन्त दुःखी हुआ। वह तुरन्त एक हाथ में नङ्गी तलवार और एक हाथ में दीपक लेकर महाकाल श्मशान में मञ्जी को खोजने चल पड़ा।
महाकाल श्मशान में उस रात्रि नग्नधर्म नाम के मुनिराज प्रतिमायोग धारण करके विराजमान थे, उन्हें देखकर वज्रमुष्टि अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने मुनिराज की तीन प्रदक्षिणा की तथा नमस्कार करके कहने लगा - ‘हे पूज्यपाद! यदि मेरी प्रिया मुझे मिल जाए तो मैं सहस्रदल कमल पुष्प से आपकी पूजा करूँगा।’
अरे रे! जगत् के अज्ञानियों के अज्ञान को धिक्कार है!! वे मुक्तिप्रदाता वीतरागी सन्त से भी विषय-कषायों की प्राप्ति की ही अपेक्षा रखते हैं।
वज्रमुष्टि को खोजते-खोजते अपनी पत्नी मिल गयी; अतः वह उसे मूर्च्छित अवस्था में उठाकर मुनिराज के चरणों के समीप ले गया। मुनिराज, ऋद्धिधारक थे, उनके प्रभाव से मञ्जी निर्विष हो गयी। वज्रमुष्टि अपनी स्त्री को निर्विष जानकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे मुनिराज के समीप बैठाकर वह सुदर्शन नामक सरोवर में से सहस्रदल कमल लेने के लिए चला गया; साथ ही मञ्जी से कह गया कि जहाँ तक मैं नहीं आऊँ, वहाँ तक तुम मुनिराज के समीप ही बैठना।
मञ्जी, मुनिराज के समीप बैठी है और उसका पति सहस्रदल कमल लेने के लिए सरोवर की तरफ गया है। इस श्मशान में रहा हुआ चोर सुरसेन, जो कि चोरों का सातवाँ भाई है वह, वज्रमुष्टि का मञ्जी पर अधिक स्नेह देखकर मन में विचारने लगा कि पति को तो पत्नी के प्रति प्रीति में कमी नहीं है, परन्तु पत्नी को पति के प्रति कैसी प्रीति है, यह तो जरा देखूँ - ऐसा विचारकर उसकी परीक्षा लेने के लिए उसने अपना रूप उस स्त्री को बताया। महारूपवान सुरसेन चोर मीठे वचनों से उसके साथ बातचीत करने लगा।
मञ्जी, सुरसेन चोर का रूप देखकर और मीठे वचन सुनकर कामाग्नि से विह्वल होकर कहने लगी - ‘हे देव! कृपा करके मुझे अङ्गीकार करो।’
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तब सुरसेन चोर ने कहा - ‘हे भद्रे! तेरा पति महा बलवान योद्धा है, इस कारण मैं उससे डरता हूँ।’
तब वह स्त्री बोली कि ‘हे नाथ! तुम भय मत करो। मैं अपने पति को तलवार से मार दूँगी।’
मञ्जी की ऐसी निष्ठुरतायुक्त बात सुनकर सुरसेन ने कहा - ‘यदि तुम अपने पति को मार दोगी तो मैं तुम्हें अङ्गीकार करूँगा!’ - ऐसा कहकर वह चोर उस स्त्री का कार्य देखने के लिए छिपकर बैठ गया।
मञ्जी का पति वज्रमुष्टि, सरोवर में से कमल लाकर मुनिराज को चढ़ाकर नमस्कार कर रहा था, तभी मञ्जी पीछे से अपने पति को तलवार से मारने जा रही थी, उस समय तुरन्त ही चोर सुरसेन ने उस स्त्री का हाथ पकड़कर वज्रमुष्टि को बचा लिया और स्वयं छिप गया। इस प्रसङ्ग को देखकर सुरसेन का चित्त संसार से विरक्त हो गया। मञ्जी अपना दोष छिपाने के लिए मूर्च्छा खाकर गिर पड़ी। यह देखकर वज्रमुष्टि ने कहा - 'हे प्रिये! तू डर कैसे गयी? यहाँ भय का कोई कारण नहीं है। ऐसा कहकर, धैर्य बँधाकर, मुनिराज को वन्दन करके, पत्नी को साथ लेकर वह अपने घर चला गया।
सुरसेन चोर के जो छह भाई चोरी करने नगर में गये थे, वे चोरी करके बहुत-सा द्रव्य लाये और उनके सात भाग करके अपने छोटे भाई सुरसेन से कहा - ‘हे भाई! तू अपना भाग ले ले।’
सुरसेन ने अपना भाग नहीं लिया और कहा - ‘संसारी जीव, स्त्री-पूजादिक के लिए धन उपार्जित करता है, परन्तु स्त्री की चेष्टा तो मैंने अभी-अभी प्रत्यक्ष देखी है।’ बड़े भाई सुभानु आदि ने पूछा कि ‘हे बन्धु! तूने क्या देखा है?’ उत्तर में सुरसेन ने वज्रमुष्टि और मञ्जी का सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। संसार की स्वार्थवृष्टि का जघन्यरूप सुनकर सातों भाई संसार में विरक्त हो गये। आत्मकल्याण की भावना से वे सभी वर्धमान मुनि के समीप जिनदीक्षा अङ्गीकार करके मुनि हो गये।
कितने ही दिनों के पश्चात् वे सातों मुनि, गुरु के साथ उज्जैनी आये। वज्रमुष्टि ने उन्हें देखा और उनको कम उम्र में वैराग्य होने का कारणभूत अपनी स्त्री का वृत्तान्त सुनकर
देवों, संसार की विचित्रता!
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— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 134.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है