बोधि समाधि निधान
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By “Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust”
(Shri Shantilal Ratilal Shah-Parivar, Mumbai)
Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
परमात्मने नमः।
श्री सीमन्धर-कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन साहित्य स्मृति संचय, पुष्प नं. 31
बोधि समाधि निधान
जैन कथा संग्रह (सचित्र)
गुजराती संकलनकार :
नागरदास बी. मोदी
उमेदराय बी. मोदी
जितेन्द्र ना. मोदी
( सम्पादक परिवार, आत्मधर्म गुजराती )
हिन्दी अनुवाद व सम्पादन :
देवेन्द्रकुमार जैन
बिजौलियाँ, जिला-भीलवाड़ा (राज.)
प्रकाशक :
श्री सुरजबेन अतुलभाई सेठ स्मृति ट्रस्ट
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Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
छह आवृत्तियाँ - 21,000 (सन् 2001 से 2006 तक)
सातवीं आवृत्ति -
( श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंच कल्याणक -
मङ्गलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के अवसर पर)
विक्रय मूल्य - 20 रुपये मात्र
प्राप्ति स्थान :
- श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट,
सोनगढ़ (सौराष्ट्र) - 364250, फोन : 02846-244334 - श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट
302, कृष्णकुंज, प्लॉट नं. 30, वी. एल. मेहता मार्ग, विलेपार्ले (वेस्ट),
मुम्बई-400056, फोन (022) 26130820 [email protected] - श्री आदिनाथ कुन्दकुन्द कहान दिगम्बर जैन ट्रस्ट (मंगलायतन)
अलीगढ़-आगरा मार्ग, सासनी-204216 (उ.प्र.) - पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट,
ए-4, बापू नगर, जयपुर, राजस्थान-302015, फोन : (0141) 2707458 - पूज्य श्री कानजीस्वामी स्मारक ट्रस्ट,
कहान नगर, लाभ रोड, देवलाली-422401, फोन : (0253) 2491044 - श्री परमागम प्रकाशन समिति
श्री परमागम श्रावक ट्रस्ट, तिड़खेड़ा, सोनागिरजी, दतिया (म.प्र.) - श्री सीमन्धर कुन्दकुन्द कहान आध्यात्मिक ट्रस्ट
योगी निकेतन प्लाट, ‘स्वशक्ति’ सवाणी होल्नी शेरीमां, निर्मला कोन्वेन्ट रोड
राजकोट-360007 फोन : (0281) 2477728, मो. 09374100508
Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का पाठ दिया गया है:
उपोद्घात
जिनके पुनीत प्रताप से यह विषम पंचम काल भी धर्मकाल में परिवर्तित हो गया, जिनकी मूसलधार उपदेश-वर्षा से बहती हुई अध्यात्म-गंगा के अमृत झरनों द्वारा पंचम काल के अन्त तक इस भरतक्षेत्र में अध्यात्म की हरियाली आत्मार्थियों के लिए हरित रहनेवाली है, उन अध्यात्मयुग सर्वसंहार उपकारमूर्ति स्वात्मानुभूति करुणासिन्धु पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी ने मूलरूप से तो, जिसकी प्राप्ति बिना जीव, बोधिरूप-सम्यग्ज्ञानरूप परिणमित नहीं हुआ - ऐसा द्रव्यदृष्टि का ही मार्ग प्रकाशित किया है और साथ ही उस बोधि बीज के अनुकूल ऐसी समाधि वैराग्य की भूमि के लिए पुराणों के सैकड़ों प्रसंगों को मिला-मिलाकर वर्णन करते उन पुराण प्रसंगों द्वारा हेय-उपादेयपने की सिद्धि करते रहते थे। उनके मूल उपदेश का संकलन तो ‘द्रव्यदृष्टि जिनेश्वर पर्यायदृष्टि विनश्वर’ द्वारा पूर्व में प्रकाशित किया ही जा चुका है परन्तु आपसी के प्रवचनों में बारम्बार पुराण प्रसंग सुनते हुए एक भावना रहा करती थी कि वह भाग पुराण तो हिन्दी में ही उपलब्ध होने से तथा विशाल ग्रन्थस्वरूप होने से सामान्य जन समुदाय के लिए उनका वाचन सुलभ न होने से, आचार्यों के महान् पुराणों में से कुछ समाधि-वैराग्य प्रेरक प्रसंग तथा कुछ पुरुषार्थ-प्रेरक प्रसंगों को गुजराती में संकलन करके प्रकाशित करना चाहिए। फलस्वरूप इन 52 कथाओं का संकलन ‘बोधि-समाधि-निधान’ प्रकाशित करने का प्रसंग बनने पर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि में चार अनुयोगों का उपदेश होता है। उसमें प्रथम अनुयोग का नाम प्रथमानुयोग है। अन्य प्रकार से कहें तो द्रव्यानुयोग, चरणानुयोग और करणानुयोग में जो वर्णन है, उसको ‘साक्षी’ यह प्रथमानुयोग है। इस कारण प्रथमानुयोग के अभ्यास से इन तीनों अनुयोगों का भाव-भासन सरल बनता है।
इस जैन कथा संग्रह की कथायें पढ़ने पर समझ में आयेगा कि :-
- जीवों के भूतकाल और भविष्यकाल के निश्चित परिणामों को जानकर, पूज्य गुरुदेवश्री के प्रिय अपर सिद्धांत, ‘क्रमबद्धपर्याय’ की यथार्थ श्रद्धा द्वारा स्वात्मसन्मुख हुआ जाता है।
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[iv]
- साक्षात् सर्वज्ञदेव की वाणी सुनने पर भी जीव हीनहार को फेर अथवा टाल नहीं सकता; होनेवाले संयोग-वियोगादि को पहले से ही जान लेने पर भी उसमें फेरफार नहीं कर सकता-यह त्रैणिक राजा, श्रीकृष्णा आदि के उद्धार और मरण प्रसंग की स्थिति से स्पष्ट समझ में आता है। इस प्रकार पूज्य गुरुदेवश्री योग्यता, पर्याय के परिणमन की स्वतन्त्रता और क्रमबद्धोपाय के उपदेश द्वारा आत्मस्वभाव की सम्यक्त्वा का जो मार्ग बतलाते गये हैं, उसका इन कथाओं के द्वारा भाव-भावनपूर्वक दृढ़ श्रद्धान होता है।
- धर्म के क्षेत्र में आकर भी जीव स्थूल मान-सम्मान की अपेक्षा से विराधाना में अनुमोदना भी कर बैठे तो उसके फल में चिरकाल तक भयंकर अधोगति प्राप्त करता है। इन प्रसंगों को पढ़ते हुए जीव को अनजाने से भी विराधाना में न जुड़ जाने की सावधानि रहती है।
- संसारी जीवों के पापमय परिणाम होते पर भी, पूज्य गुरुदेवश्री उनकी क्षणिकता बताकर, स्वभाव में संसार को गम्य भी नहीं है - ऐसा समझाते थे - यह बात इन कथाओं से दृढ़ होती है।
- पूज्य गुरुदेवश्री ने मुख्यरूप से द्रव्यदृष्टि का उपदेश देते हुए कहा कि पाप-पुण्य के परिणाम, जीव को होने पर भी वे सब पानी में तेल की बूँद की तरह ऊपर रहते होने से वे आत्मस्वभाव में प्रवेश नहीं पाते; इस कारण जब जीव, आत्मस्वभाव के समीप जाता है, तब शीघ्र मोक्ष पाता है। यह बात इन कथाओं को पढ़कर समझी जा सकती है।
- जीव के परिणाम और उनका निमित्तपना पाकर आश्चर्यकारी रीति से परिणमते कुदरत के प्रसंग पढ़ते हुए, जीव यदि पाप करे तो प्रकादि के तीव्र दुःख पाता है और पुण्य करे तो स्वर्गादिक का सुख पाता है; वीतरागता करे तो मोक्ष पाता है-इस प्रकार जीव के परिणाम के साथ कुदरत बँधी हुई है, जीव को भावना न फले-ऐसा नहीं होता, यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है।
- एक जीव दूसरे जीव के ऊपर क्रोधादि करता है तो वे क्रोधादि के संस्कार भव-भव तक रहते हैं; इस प्रकार एक जीव दूसरे जीव के प्रति रागादि करता है तो उसके संस्कार भी भव-भव तक नहीं छूटते; वैसे ही कुदेव-कुशास्त्र-कुधर्म के सेवन से नरक-निगोद में चिरकाल भ्रमण करके फिर मनुष्य होने पर कुधर्म के संस्कार पुनः जागृत हो जाते हैं - ये सब प्रसंग पढ़कर जीव को वीतराग धर्म की आराधना की विशेष भावना जागृत होती है।
- विश्व के प्रत्येक पदार्थ की व्यवस्थित व्यवस्था, उपादान-निमित्त और निश्चय-व्यवहार का स्वरूप जानने से तत्त्वश्रद्धा दृढ़ होती है।
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[v]
- जीव को रौद्रध्यानरूप तीव्र कषाय के परिणाम होने पर भी वे आत्मस्वभाव को किंचित् भी हानि नहीं कर सकते तथा जीव अति मंदकषाय के परिणाम करे तो भी उससे आत्मस्वभाव को किंचित् लाभ नहीं हो सकता। ये सब परिणाम वायु वेग के वेग के समान क्षणिक होने से आत्मस्वभाव को किंचित् लाभ-हानि नहीं कर सकते - ऐसी महिमावंत आत्मस्वभाव की दृढ़ता द्वारा स्वसमयता का पुरुषार्थ उदित होता है।
- मोक्षमार्गी महापुरुषों का भूतकाल का जीवन महावीर पापमय होने पर भी, जब वे पवित्र जैनधर्म को पाते हैं, तब परिणाम पवित्र होने से उत्कृष्ट प्रकार के पुण्यौदयपूर्वक मोक्ष प्राप्त करते हैं। यह जानने से पाप-पुण्य को तुच्छता समझ में आने से अन्तर्मुखता के प्रबल को बल मिलता है।
- पुण्य का निमित्त पाकर पुद्गल स्वयं स्वतंत्रस्वरूप से अष्टौषधि, अष्टऋद्धि के कल्पवृक्षरूप से, रत्नवृक्षरूप से, समवसरण रचना आदि अनेक प्रकार से परिणमते हैं। इन प्रसंगों द्वारा अजीवत्व की स्वतंत्रता समझी जा सकती है।
- पाप करनेवाले बड़े राजा भी मरकर नरकादि में जाते हैं और पुण्य करनेवाले पशु भी मरकर क्षण में स्वर्गादि में जाते हैं। इस प्रकार यह सब भावावली संसार नाटक के क्षणिक स्वांगमात्र होने से शाश्वत चैतन्य प्रभु की महिमा समझी जा सकती है।
- रामचन्द्र जी, लक्ष्मण, सीता, रावण, आदि के पूर्व के कितने ही भवों का वर्णन पढ़ने पर किसी जीव के प्रति वैराग्य करने से कितने भवों तक वह वैराग्य प्रवर्ता है - यह समझने से जीव अचेतन ही वैराग्यपूर्वक ऐसे भावों से चेतता रहता है।
- श्रीकृष्ण, सुदर्शन सेठ, श्रीदाममुनि, सती सीता, अंजना, चन्दना आदि महापुरुषों को भी पूर्व में बँधी हुई असाता के उदयकाल में कोई सहायक नहीं बनता। यह बात समझ में आने पर जीव को असाता के उदय में समाधान-शान्ति रखकर आत्म-आराधना करने का बोध प्राप्त होता है।
- इन कथाओं को वाँचने से स्वभावसन्मुखता की खुमारी तो जागृत होती ही है परन्तु साथ-साथ महापुरुषों के बाह्य आचरण में उत्कृष्ट प्रकार की प्रमाणिकता, न्याय-नीति, प्राण जाने पर भी धर्म की विराधाना में किंचित् भी अनुमोदना न होने देना, रात्रि भोजन त्याग इत्यादि प्रसंग पढ़ने से मुमुक्षुओं को अपने परिणाम को सँभाल लेने की महत्ता ख्याल में आती है।
- जीवों का मन बन्दर की तरह अत्यन्त चंचल होता है और चंचलता-चंचलता संसार की
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[vi]
जनक होती है। इस मनरूपी बन्दर की चपलता को शान्त करने के लिए पूर्व में हो गये महापुरुषों की भावञ्जलि का वांचन अत्यन्त हितरूप है - ऐसा अनुभव होता है।
चतुर्थ काल में साक्षात् सर्वज्ञदेव से धर्मात्मा स्वयं भी महापुरुषों के भवों का वर्णन पूछते थे क्योंकि महापुरुषों की पूर्व की महाघोर पापमय और उत्कृष्ट पुण्यमय भवावली सुनकर धर्मात्मा को भी संसार के प्रति उदासीनतापूर्वक पुरुषार्थ की वृद्धि होती थी।
इन कथाओं-पुराण प्रसंगों को वांचन से पुरुषार्थ को और वैराग्य की भावना को अत्यन्त बल मिलता है; इसलिए ही समन्तभद्र जैसे समर्थ आचार्यों ने भी कथाओं को बोधि और समाधि का निधान कहा है।
इन कथाओं के वांचन द्वारा पूज्य गुरुदेव द्वारा प्ररूपित अध्यात्म के मार्मिक सिद्धान्तों का सरलतापूर्वक भावभाषण होओ तथा इस दुर्लभ मनुष्य भव में बोधि-समाधि की उपलब्धि होओ और इस प्रकार पूज्य बहिरंगि आदि धर्मात्माओं का सत्समागम चरितार्थपने को प्राप्त होओ - ऐसी भावना के साथ इन गुजराती कथाओं का हिन्दी रूपान्तर प्रस्तुत है।
संकलनकार
सम्पादकीय
प्रथमायोग की अनेक प्रेरक कथाओं के संकलनस्वरूप ‘बोधि समाधि निधान’ का सम्पादित हिन्दी संस्करण समस्त तत्त्वप्रेमी समाज को समर्पित करते हुए प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। वर्तमान शताब्दी में आध्यात्मिक सद्पुरुष जीवनशिल्पी पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के द्रष्टृदृष्टि प्रधान आध्यात्मिक उपदेशों को परिपुष्ट करनेवाली ये प्रेरक कथाएँ समस्त साधर्मियों द्वारा बारम्बार अनुशीलन करने योग्य है।
जिनमें परमात्मा की दिव्यवाणी चार अनुयोगों में विभक्त है, जिनमें से प्रथमायोग में संसार की विचित्रता, पुण्य-पाप का फल और महन्त पुरुषों की आत्मसाधनामयी परिणति का परिज्ञान कराते हुए जीवों को धर्ममार्ग में लगाया जाता है। प्रथमानुयोग में वर्णित भव-भवान्तरों को कथन जहाँ आत्मा की नित्यता को प्रतिबिम्बित करता है, वहीं पूर्व भवों में तीव्र पापभाव करके दुर्गतिओं में परिभ्रमण करनेवाला जीव भी, स्वभाव के लक्ष्य से विभावपरिणति का परित्याग करके शाश्वत् परमपद को प्राप्त करता है - यह तथ्य इस बात का परिचायक है कि पाप और पुण्य की विकारी वृत्तियों के समक्ष भी निज सामान्य चैतन्यसत्ता में उन वृत्तियों का प्रवेश नहीं है और वे सभी विकारी वृत्तियाँ मात्र क्षणवर्ती होने से निश्चित ही विनष्ट होने योग्य है - इस परम सत्य का परिचय कराता है।
पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी भी अपने आध्यात्मिक प्रवचनों में यदाकदा महापुरुषों के जीवन चरित्रों को आधार बनाकर द्रष्टृदृष्टि का माहात्म्य बतलाते थे। उनके प्रवचनों के प्रभाव से मुमुक्षु समाज में प्रथमानुयोग के अध्ययन की रुचि भी वृद्धिगत हुई है, जिसका परिणाम प्रस्तुत ‘बोधि समाधि निधान’ ग्रन्थ का संकलन है। प्रस्तुत संकलन में 27 पुराणों के आधार पर 52 पौराणिक कथाओं का संकलन किया गया है। जो सर्व प्रथम गुजराती में प्रकाशित होकर, अब तक हिन्दी में छह आवृत्तियों के रूप में 21,000 की संख्या में प्रकाशित होकर जन-जन तक पहुँच चुका है। यह प्रस्तुत संकलन पूर्व प्रकाशित हिन्दी संकलन का पुनः सम्पादितरूप है।
इस नवीन सम्पादित संकलन में प्रत्येक कथा का भाव स्पष्ट करने के लिए प्रसंगानुसार
[viii]
रेखाचित्रों का प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण संकलन को भाषा की दृष्टि से दोबारा सम्पादित किया गया है। साथ ही प्रसंगानुसार आवश्यक तत्त्वबोधक वचनामृतों का प्रयोग कर उसे आध्यात्मिक दृष्टि से ग्राह्य बनाने का प्रयास किया है। पूर्व संकलन में समागत कथाओं के नामों में आवश्यक परिवर्तन किया गया है तथा लम्बे-लम्बे पैराग्राफ को छोटा-छोटा करके पाठकों के लिए सहज ग्राह्य बनाने का प्रयास किया है।
इस कथा संग्रह में जिन पौराणिक कथाओं का संकलन समायोजित किया गया है, उन सभी ग्रन्थों एवं ग्रन्थकारों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। महापुरुषों के प्रति भक्ति उत्पन्न करने में कारणभूत अध्यात्ममूर्ति स्वानुभवप्रतिष्ठित पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के प्रति भी इस अवसर पर हार्दिक विनयाञ्जलि समर्पित करता हूँ।
इस संकलन के गुजराती संकलनकार श्री नागरदास वी. मोदी, श्री उमेदराय वी. मोदी, श्री जितेन्द्र एन. मोदी - सम्पादक परिवार गुजराती आश्रम सोनगढ़ के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। प्रस्तुत ग्रन्थ के सम्पादन एवं अनुवाद का अवसर प्रदान करने के लिए प्रकाशक परिवार के प्रति भी हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बारम्बार ऐसे अवसरों की प्राप्ति की भावना भाता हूँ।
सभी जीव प्रस्तुत ग्रन्थ में समागत पुराण प्रसंगों को पढ़कर अपने जीवन में बोधि समाधि की भावना दृढ़ करते हुए सम्यक् बोधि-समाधि को प्राप्त करें - इसी भावना के साथ।
देवेन्द्रकुमार जैन
बिजौलियाँ, जिला भीलवाड़ा (राज)
अनुक्रमणिका
- पतित से पावन 1
- देखो, संसार की विचित्रता ! 12
- चमत्कार चैतन्य का 20
- विराधक बना आराघक 27
- मत करो पाप का अनुमोदन 41
- पापी से परमात्मा 54
- वज्रबाहुकुमार का वैराग्य 58
- देशभूषण और कुलभूषण की भवावली 63
- निधान मिल गया 74
- वीतरागी मुनि नागकुमार 80
- सियार चला मुक्ति के मार्ग 84
- मुक्ति-साधक धन्यकुमार 88
- श्रीराम, लक्ष्मण, सीता आदि के पूर्व भव 109
- काम विजयी : सेठ सुदर्शन 123
- शालिभ्रव्य मच्छ के भावों की कथा 133
- मोह से मुक्ति की ओर 134
- करनी का फल 142
- वाली मुनिराज 149
- अनुमोदना का उत्तम फल 160
- देखो, देखो ! निरग्रन्थना का फल 166
- प्रद्युम्नकुमार की कथा 170
- देखो, परिणामों की विचित्रता ! 184
- भरत और श्रेणिकभूपन हार्थों की भवावली 187
- जल से भिन्न कमल है 197
- वीतरागी सन्तों का अकारण करुणा 202
- महावीर प्रभु का वैराग्य और पुरुषार्थ प्रेरक कथा 212
[ x ]
- सन्मार्ग का प्रेरक हो सच्चा मित्र 224
- राजा दण्डक की कथा 231
- वैभवाव दुःखदायी भव-भव 237
- चिलातपुत्र 240
- उपसर्गजयी कार्तिकीय मुनि 244
- मत करो किसी से बैर 248
- राजा कोचक और द्रौपदी की भवावली 250
- लोभ : पाप का बाप 254
- अभयदान का फल 257
- शूरवीर सुकौशल मुनिराज की कथा 261
- धन्य-धन्य सुकुमाल महामुनि! 268
- गुरुदत्त मुनि 274
- सीताजी को मिथ्या आक्षेप क्यों? 277
- महासती चन्दना पर विपत्तियाँ क्यों? 280
- दुःशीलवन्त अनन्तमती 283
- कसौटी धर्म श्रद्धा की 292
- विकट चक्रवर्ती श्रीपाल 298
- भाव परिवर्तन 303
- अंजन बना निरंजन 313
- परिग्रह से भयभीत एक परिवार की कथा 318
- क्षण भर में बदले परिणाम 320
- धिक-धिक जग की स्वार्थवृत्ति 327
- जिन-प्रतिमा के अनादर का भयंकर फल 332
- नाटक में एक जीव के दो स्वांग 336
- सुभौम चक्रवर्ती की कथा 345
- रात्रि भोजन-त्याग का प्रभाव 347
- 64 ऋद्धियों का स्वरूप 348
ॐ
परमात्मने नमः
बोधि-समाधि-निधान
( पौराणिक जैन कथाओं का संकलन )
भाग - 1
गौतम गणधर का जीवन चरित्र
- पतित से पावन
राजगृही नगरी में भगवान् महावीर के मौसा राजा श्रेणिक राज्य करते थे। उनमें समुद्र जैसी गम्भीरता, चन्द्रमा के समान सुन्दरता, पर्वत के समान निश्चलता और बृहस्पति के समान बुद्धिमत्ता आदि अनेक निर्मल गुण थे।
एक बार अनेक देशों में विहार करते हुए अन्तिम तीर्थङ्कर भगवान् महावीरस्वामी विपुलाचल पर्वत के मस्तक पर समवसरणरहित आकर विराजमान हुए। महाराज श्रेणिक को भगवान् के पधारने के समाचार मिलते ही वे तुरन्त परिवारसहित समवसरण में गये और भगवान् को वन्दन-नमस्कारादि करके धर्म का उपदेश सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए। उन्होंने भगवान् को हाथ जोड़कर, नमस्कार करके पूछा - ‘हे प्रभो ! यह गौतमस्वामी कौन है ? किस पर्याय से आकर यहाँ जन्म लिया है और इनको किस धर्म के प्रभाव से अनेक लब्धियाँ प्राप्त हुई हैं ? कृपा करके यह सब बातें विस्तार से बतलाने का अनुग्रह करें।’
पंडित से पावन
2
राजा श्रेणिक के प्रश्न के उत्तर में भगवान् जिनेंद्रदेव की दिव्यध्वनि में गौतमस्वामी
के जीवनचरित्र सम्बन्धी जो वर्णन आया, वह इस प्रकार है –
इस भरतक्षेत्र में अनेक नगरों से सुशोभित एक अवंति नामक देश है। उस देश के
राजा का नाम महीचन्द्र था। एक दिन इस नगरी में उपवन में अङ्गभूषण नाम महामुनिराज
पधारे। मुनिराज का आगमन जानकर, राजा महीचन्द्र अपने रनवास और नगरजनों को
साथ लेकर मुनिराज के दर्शन करने के लिए उपवन में गया। उपवन में मुनिराज के दर्शन,
पूजन, वन्दन, स्तुति करके, उन मुनिराज के धर्मवृद्धिरूप आशीर्वाद को प्राप्त करके,
उनके समीप बैठ गया। उस वन में मुनिराज से धर्मामृत पान करने के लिए विशाल जन
समुदाय एकत्रित हुआ था। वहाँ किसी शूद्र की तीन कुरूपा कन्याएँ भी शीघ्रता से आकर
बैठ गयीं।
मुनिराज ने अपने धर्मोपदेश
में पुण्य, पाप और धर्म तथा उनके
फल का विस्तारपूर्वक उपदेश देते
हुए कहा – ‘हे भव्य प्राणियों! यह
आत्मा, ज्ञान और आनन्द का पिण्ड
है। स्वभाव से ही सदा शुद्ध एवं पर
के सम्बन्ध से रहित चैतन्यमूर्ति है।
अपने चैतन्यस्वरूप का विस्मरण करके एवं संयोगरूप में प्राप्त शरीर, स्त्री, पुत्र, धनादिक
पदार्थों में अपनत्व करके ही संसार की चारों गतियों में परिभ्रमण कर रहा है।
यह अज्ञानी आत्मा कभी परलक्ष्य से पापभाव करके नरक, तिर्यञ्चगति का तो
कभी पुण्यभाव करके मनुष्य अथवा देवगति का पात्र बनता है, किन्तु अपने आत्मस्वरूप
को श्रद्धा-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय बोधि के अभाव में संसार से परिमुक्त होकर शाश्वत्
सिद्धपद को प्राप्त नहीं कर पा रहा है।
हे जीवों! यदि तुम्हें संसार परिभ्रमण का अभाव इष्ट हो तो अपने देह-देवालय में
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विराजमान निज चैतन्य भगवान् आत्मा में अपने उपयोग को लगाओ। अपने को जानो,
पहचानो, अपने में ही जम जाओ – रम जाओ – यही सुखी होने का एकमात्र उपाय है।’
मुनिराजश्री के मुखरूपी चन्द्रमा से झरते उपदेशरूपी अमृत का पान करके राजा
महीचन्द्र बहुत ही प्रसन्न हुआ। उसी जनसमुदाय के बीच शूद्र की कन्याएँ भी बैठी थीं,
उन पर राजा की नजर पड़ी। उनको देखते ही राजा के नेत्र प्रफुल्लित हो गये, मुख और
मन आनन्दित हो गये। यद्यपि वे कन्याएँ दुष्टस्वभावी थीं, दीन थीं, तीव्र दुःखों से दुःखी
थीं, काली थीं, दरिद्रहित थीं, माता-पिता, भाई-बन्धुओं से रहित थीं, फिर भी ‘इन्हें
देवनेमात्रा से मुझे प्रसन्नता क्यों हुई? – ऐसा भाव उत्पन्न होने पर राजा ने तुरन्त ही
मुनिराज से पूछा – ‘हे प्रभो! इन शूद्र कन्याओं को देखकर मेरे हृदय में अत्यन्त प्रेम क्यों
उत्पन्न हो रहा है?’
मुनिराज ने कहा ‘हे भव्य! इनके साथ तुम्हारा पूर्व भव का सम्बन्ध था, उसे मैं
कहता हूँ, तू ध्यान देकर सुन!’
इस भरतक्षेत्र में काशी नामक महाविशाल देश है। जो तीर्थङ्कर परमदेव के पञ्च
कल्याणकों सहित अनेक प्रकार की शोभा से सुशोभित है। इस काशी देश में बनारस
नामक एक नगर है। उसमें विश्वलोचन नामक राजा राज्य करता था। उस राजा के
विशालाक्षी नामक रानी थी, वह इन्द्राणी, रतिदेवी, नागाश्री अथवा देवाङ्गनाओं के समान
सुन्दर थी। राजा विश्वलोचन को वह रानी अत्यन्त प्रिय थी।
एक दिन रानी विशालाक्षी प्रसन्नता से अपनी चामरी और रङ्गिका नामक दो
दासियों के साथ राजमहल के झरोखे में खड़ी हुई थी। राजमार्ग में नाच, गान आदि से
सुशोभित एक नाटक चल रहा था, जो समस्त प्रजाजनों के मन को मोहित कर रहा था।
उस नाटक को देखते ही रानी विशालाक्षी का मन चञ्चल हो गया। वह अपने हृदय में
विचार करने लगी – ‘अरे! इस राज्यसुख से मुझे क्या लाभ है? मैं तो एक अपराधी की
तरह जेलखाने में बँधी पड़ी हूँ। संसार में ये ही स्त्रियाँ धन्य हैं, जो अपनी इच्छानुसार जहाँ-
तहाँ घूमती हैं, परन्तु मुझे पूर्व पापमोदय से इच्छानुसार घूमने-फिरने का सुख प्राप्त नहीं
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4
पंडित से पावन
हुआ; अतः अब मैं इच्छानुसार घूमने-फिरनेरूप संसार का फल शीघ्र और सदा के लिए
चाहती हूँ। इस विषय में लज्जा मेरा क्या करेगी?’
इस प्रकार विचार करके रानी ने छल-कपट में अत्यन्त चतुर अपनी दो दासियों
को बुलाकर कहा – ‘हे दासियों! इच्छानुसार घूमने-फिरने के सुख से तो मनुष्यभव
सफल होता है और वह काम-भोग को देनेवाला है। अतः अपने को शीघ्र ही यहाँ से
निकलकर इच्छानुसार घूमना-फिरना चाहिए।’
रानी की बात सुनकर दासियाँ कहने लगीं – ‘हे स्वामिनी! यह आपने बहुत उत्तम
विचार किया है। संसार में मनुष्यजन्म का फल यही है।’
तत्पश्चात् कामवासना से पीड़ित, अन्ध और दुष्ट हृदयवाली, कुलाचाररहित,
कुबुद्धि की धारक रानी अपने पापमोदय से उन दोनों दासियों के साथ घर से निकलने
का उपाय करने लगी।
झूठ बोलना, दुर्बुद्धि होना, कुटिल हृदय, छल-कपट करना और मूर्खता – यह
स्त्रियों के स्वाभाविक गुण हैं। ये सब गुण, रानी में विद्यमान थे ही; अतः रात्रि होते ही उसने
रई भरकर एक स्त्री का पुतला बनाया और उसे वस्त्र तथा गहनों से सुसज्जित करके पूरा-
पूरा स्वयं के रूप जैसा बनाकर पलङ्ग पर सुला दिया।
रानी ने द्वारपाल आदि सेवकों को भी वस्त्रभूषण, धन आदि देकर अपने वश में
कर लिया। तत्पश्चात् पूर्वकूत पापकर्मोदय से रानी ने दोनों दासियों को साथ लेकर किसी
देवी की पूजा के बहाने अर्धरात्रि के समय राजमहल का परित्याग कर दिया। उन सबने
सुन्दर वस्त्रभूषण और राज के चिह्नों को त्यागकर, भगवे वस्त्र पहनकर योगिन का रूप
धारण किया। राज्य में मिलनेवाला भोजन तो क्षुद्र ही होगा, अतः भूख शान्त करने के
लिए वे तीनों वृक्ष के फल खाकर अपनी क्षुधा शान्त करने लगीं।
जब रात्रि के समय राजा विश्वलोचन अपनी प्रिय रानी के महल में गया, तब रानी
को शृङ्गारयुक्तदशा में पलङ्ग पर सोआ देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ, परन्तु रानी के
द्वारा आदर-सत्कार न देखकर विचार करने लगा कि रानी को क्या हुआ? इस शरीर में
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कोई रोग हुआ है या अन्य कोई बात है? इसी चिन्ता में व्याकुल राजा ने पलङ्ग पर बैठकर रानी का स्पर्श किया, तब उसे ज्ञात हुआ कि यह तो रानी का पुतला है।’ रानी का किसी पापी ने हरण कर लिया है’ – ऐसा समझकर राजा बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। सेवकों द्वारा शीतोपचार से होश में आने पर राजा, रानी का गुणगान करने लगा –
‘हे चन्द्रवती! तू कहाँ गयी? तेरी रक्षा करनेवाली दोनों दासियाँ कहाँ गयीं? इस महल में तो कोई आ भी नहीं सकता, फिर भी तेरा किस उपाय से हरण कर गया? या फिर कुल – आचार से रहित दुष्ट तू स्वयं ही नष्ट हो गयी? नीच मनुष्यों की सङ्गति से सज्जन भी नष्ट हो जाते हैं। स्त्री जैसी अन्दर से होती है, वैसी बाहर से नहीं दिखती है और जैसी बाहर से दिखती है, वैसा कार्य नहीं करती है। स्त्रियों के चरित्र को भला कौन जान सकता है? अहा! समस्त गुणों को धारण करनेवाली रानी अपने दस वर्ष के पुत्र और पटरानी पद को छोड़कर कैसे चली गयी?’ इस प्रकार रानी के वियोग में बहुत समय तक दुःखी होकर राजा मर गया।
राजा के मरणोपरान्त मन्त्री आदि ने उसके पुत्र को राजगद्दी पर बिठाया।
वह राजा का जीव मरकर विशालकाय हाथी हुआ। उसके पुण्योदय से उस वन में एक अवधिज्ञानी मुनिराज पधारे। मुनि ने हाथी को धर्मोपदेश देते हुए कहा – ‘हे गजराज! तू ज्ञान और आनन्द का पिण्ड शुद्धात्मा है। यह हाथी का शरीर तो अनन्त पुद्गल परमाणुओं का पिण्ड है, इसके साथ तेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः इस शरीर के प्रति एकत्वबुद्धि का परित्याग करके निज चैतन्यसत्ता को देख! सम्यक्त्व को ग्रहण कर! श्रावक के व्रत ग्रहण कर।’
मुनिराजश्री के मुखरूप्री चन्द्र से झरते अमृत का सेवन करके हाथी ने श्रावक के व्रत धारण किये और अन्त समय में समाधिमरणपूर्वक मरकर पहले स्वर्ग में देव हुआ।
पतित से पावन
स्वर्ग के सुख भोगकर, वहाँ से च्युत होकर तू महीचन्द नाम का उत्तम राजा हुआ है। पूर्व भव के स्नेह से तुझे इन कन्याओं को देखकर अनुराग उत्पन्न हुआ है। हे भव्य! आगे चलकर तेरी मुक्ति होगी।
हे राजा महीचन्द! अब तू इन तीन स्त्रियों की कथा सुन। यह तीनों स्त्रियाँ अपनी इच्छानुसार बहुत प्रसन्नता से अनेक देशों में भ्रमण करने लगीं। इन तीनों योगिनियों के साथ अन्य अनेक योगिनियाँ थीं, जो भीख माँग-माँगकर पेट भरती थीं। ये योगिनियाँ हमेशा प्रमाद करनेवाली मदिरा पीती और शरीर को पुष्ट रखने के लिए माँस का भक्षण करती थीं। अनेक जीवों से भरे हुए महापाप को उत्पन्न करनेवाले पाँच उदम्बर फलों का सेवन करती थीं। तीनों स्त्रियाँ, कामसेवन की इच्छा से उत्पन्न होकर उत्तम अथवा नीच जो मिले, उस पुरुष का सेवन करती थीं। लोगों के सामने गीत गाती थीं और विचित्र बातें करती थीं कि हमको जोग (योग) धारण किये हुए सौ वर्ष बीत चुके हैं।
एक दिन भ्रमनाचार्य नाम के मुनिराज, आहार के लिए ईर्ष्यापथ शुद्धिपूर्वक गमन कर रहे थे। ऐसे श्रेष्ठ मुनि को देखकर तीनों स्त्रियाँ लाल-लाल आँखें करके कहने लगीं – 'अरे नग्न घूमतेवाले! हम उज्जैनी नगरी के दयालु राजा के पास धन लेने जा रही थीं, किन्तु न जाने किस पाप के उदय से तू हमारे सामने आ गया? तू दुराचारी है। क्या तूने अपनी लज्जा बेच दी है कि स्त्रियों के सामने भी तू नग्न घूमता है? हे मूर्ख योगी! तूने हमारा अपशकुन किया है, इसलिए अब हमारे कार्यों की सिद्धि नहीं होगी। अभी तो दिन है, परन्तु इस अपशकुन का फल हम तुझे रात्रि में देंगी।
इस प्रकार इन स्त्रियों के दुष्ट वचन सुनकर भी मुनिराज ने क्रोध नहीं किया। जैसे, पानी से भरी हुई पृथ्वी पर अग्नि कुछ नहीं कर सकती; उसी प्रकार क्षमाधारी पुरुष के लिए दुष्ट वचन भी कुछ नहीं कर सकता। जिस प्रकार पत्थर का मध्य भाग पानी से कभी नरम नहीं होता, उसी प्रकार योगेश्वरों का निर्मल हृदय, क्रोधाग्नि से कभी नहीं जलता।
तत्पश्चात् वे तीनों स्त्रियाँ रात्रि के समय मुनिराज के समीप गयीं और क्रोधित होकर अनेक प्रकार के उपद्रव करने लगीं। एक तो मुनिराज के समीप आकर रोने लगी; दूसरी काम-वासना से पीड़ित होकर मुनि के शरीर से लिपट गयी और तीसरी ने भुजाओं करके मुनिराज को बहुत कष्ट दिया। तत्पश्चात् कामज्वर से पीड़ित वे तीनों स्त्रियाँ अनेक प्रकार के कटाक्ष करती हुई मुनिराज के समक्ष नग्न होकर नृत्य करने लगीं और पत्थर, लकड़ी, मुक्का, लात, जूता आदि से उन्हें मारने लगीं। उन दुष्टात्माओं ने मुनिराज को बाँध लिया, तथापि मुनिराज चलायमान नहीं हुए। सत्य ही है – क्या प्रलयकाल की वायु से महान् मेरु पर्वत चलायमान होता है?
उस समय इन उदयजन्य बाह्य उपसर्गों की विषम परिस्थिति से अत्यन्त निरपेक्ष रहकर वे मुनिराज अपने हृदय में बारह अनुप्रेक्षाओं का चिन्तवन करने लगे। संसाररूप समुद्र में डूबे हुए प्राणियों को पार उतारने के लिए अनुप्रेक्षा ही नाव के समान है।
प्रातःकाल होने पर इन उपद्रवों को व्यर्थ समझकर तथा मार्ग में आते-जाते लोगों के डर से तीनों स्त्रियाँ भाग गयीं। उन्होंने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया, वह अत्यन्त दुःखदायी था। इस पापकर्म के उदय से तीनों स्त्रियों को कोढ़ हो गया। सभी लोग उनको निन्दा करने लगे। तीनों स्त्रियाँ कोढ़ के रोग से हमेशा महा दुःखी रहती थीं। आयु समाप्त होने पर रौद्रध्यानपूर्वक मरकर तीनों स्त्रियाँ नरक में उत्पन्न हुईं और नरक के असहनीय दुःखों को भोगने लगीं। नरक की आयु पूर्ण होने पर तीनों ने एक समान ही कर्मबन्ध किया हो तो तीनों जीव क्रमशः बिल्ली, सुअरी और मुर्गी की योनियों में उत्पन्न हुए, वहाँ भी वे जीवों की हिंसा करती, आपस में लड़ती-झगड़ती, घर-घर फिरती और मनुष्यों को मारकर खाती रहीं।
अन्त में आयु पूर्ण होने पर तीनों मुर्गियाँ बहुत दुःखी होकर मरकर धर्मस्थानों से सुशोभित अवनिदश के बंगाल में हल्के लोगों की बस्ती में किसी एक परिवार में कन्याएँ हुईं। इनके गर्भ में आते ही धनादि नष्ट हो गया, जन्म होते ही माता मर गयी। तीनों में एक
पतित पावन
कान्ती, एक लंगड़ी और एक काली थी। वे मुनिराज पर घोर उपसर्गों के पाप से हमेशा दुःखी रहा करती थी। इनके शरीर, अङ्ग-उपाङ्ग बेडौल थे। रोग की दुर्गन्ध से नगर में जाते ही सम्पूर्ण नगर में अत्यन्त दुर्गन्ध फैल जाती थी। तीनों कन्याएँ तीव्र भूख-प्यास से पीड़ित थीं। दुराचार करने में हमेशा तत्पर ऐसी ये तीनों कन्याएँ विदेश पर्यटन के लिए निकली थीं। रास्ते में सदा आपस में लड़ती-झगड़ती अनेक नगरों में भ्रमण करतीं, माँगतीं, खातीं अनुक्रम से इन नगर में आई हैं। यद्यपि इनके शरीर अत्यन्त ही मलिन हैं, तथापि इन्होंने प्रसन्नचित्त होकर मुनिराज के पास आकर वन्दन किया है। जिस प्रकार बादलों की गर्जना सुनकर मयूर प्रसन्न होता है, उसी प्रकार मुनिराज के मुख से अपना भूतकाल सुनकर तीनों कन्याएँ पश्चात्तापपूर्वक प्रसन्न हुई हैं।
तत्पश्चात् संसार के दुःखों से भयभीत ये तीनों कन्याएँ, मुनिराज को भक्ति से नमस्कार एवं स्तुति करके प्रार्थना करने लगीं - ‘हे प्रभो! हे स्वामिन्!! इस संसाररूप अपार समुद्र में डूबे हुए समस्त प्राणियों को पार लगाने के लिए आप जहाज के समान हैं। पूर्व भव में हमने जो घोर पाप किया था, कृपा करके उसके नाश का कोई उपाय बताओ।’
मुनिराज उन कन्याओं के शुभ वचन सुनकर तथा उन्हें निकट भव्य समझकर मीठी वाणी से कहने लगे - ‘हे पुत्रियों! आत्मा तो सदा काल सुख सम्पन्न ही है परन्तु इस जीव ने अनादि काल से पर में सुख की कल्पना कर रखी है। अपने निज सुख की उसे आज तक उपलब्धि नहीं हुई; अतः तुम अब पर से सुख की चाह मिटाकर अपने सुख को ही उपलब्ध करने हेतु लब्धिविधान करो, अर्थात् क्षयोपशम, विशुद्धि, आत्मपूर्वक देशनालब्धि द्वारा प्रायोग्यलब्धि में प्रवेश कर करणलब्धि द्वारा मिथ्यात्व का नाश कर सम्यक्त्व प्राप्त करो। सम्यग्दर्शनपूर्वक श्रावक के व्रत अङ्गीकार करो। यह व्रत कर्मरूपी शत्रुओं को नाश करनेवाला है और संसाररूपी समुद्र से पार उतारनेवाला है।’
उन कन्याओं ने मुनिराज के उपदेशानुसार श्रावकों की मदद से तत्त्वज्ञान का अभ्यास कर भेदविज्ञान की अविच्छिन्न धारा प्रवाहित करके मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी कषाय को मिटानेवाली लब्धि (करणलब्धि) प्राप्त की। इस प्रकार लब्धिविधान व्रत का उद्यापन कर, श्रावकों के व्रत धारण किये, शीलव्रत धारण किया और अन्त समय में समाधिमरण को धारण करके मृत्यु को प्राप्त हुई। यहाँ से पाँचवें स्वर्ग में जाकर स्त्रीलिङ्ग का छेद करके प्रभावशाली देव हुई और स्वर्ग में उत्तम प्रकार के भोग भोगे।
इस भरतक्षेत्र में मगधदेश में ब्राह्मण का नगर है। उसमें एक शाण्डिल्य नाम का धनी गुणवान ब्राह्मण था। उसकी स्वडिला नाम की रूपवती, सौभाग्यशाली स्त्री थी। स्वर्ग में जो बड़ा देव (रानी का जीव) था, वह आकर उनके यहाँ गौतम नाम का पुत्र हुआ और दूसरा देव भी स्वडिला के ही गार्ग्य नाम का पुत्र हुआ, तीसरा देव भी उसी ब्राह्मण की दूसरी पत्नी के उदर से भार्गव नाम का पुत्र हुआ। जैसे, कुन्ती के पुत्र पाण्डवों के बीच परस्पर अत्यन्त प्रेम था, इसी प्रकार इन तीनों भाईयों में अत्यन्त प्रेम था। तीनों भाईयों ने ब्राह्मणों की समस्त क्रिया पढ़ ली थी। तीनों में गौतम सबसे बड़ा था, वह समस्त शास्त्रों का ज्ञानवान था। गौतम ब्रह्मशाला में पाँच सौ शिष्यों का सुविख्यात उपाध्याय था।
उसी समय भगवान् महावीरस्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने आकर समवसरण की रचना की। भगवान् सिंहासन पर विराजमान हुए, परन्तु छियासठ दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी। यह देखकर सौधर्म इन्द्र ने अवधिज्ञान से देखा कि यदि गौतम यहाँ जाए तो भगवान् की दिव्यध्वनि खिरेंगी। यह विचार करके इन्द्र ने स्वयं ही एक अतिशय वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और लकड़ी के सहारे धीमें-धीमें चलते हुए गौतम के समीप आया और बोला - ‘हे विद्वान्! संसार में अपना पेट भरनेवाले तो बहुत हैं, परन्तु इस काव्य का अर्थ करनेवाले इस पृथ्वी पर कोई विरल पुरुष होंगे? मेरे गुरु इस समय आत्मध्यान में लीन हैं; अतः अभी मुझे कुछ नहीं बता सकते; इसलिए मैं इस काव्य का अर्थ समझने के लिए आपके पास आया हूँ।’
उसके उत्तर में गौतम ने कहा - ‘हे ब्राह्मण! तुम अपने काव्य का बहुत अभिमान करते हो। यदि मैं इस काव्य का अर्थ कर दूँ तो तुम मुझे क्या दोगे?’
वृद्ध ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र ने कहा - ‘यदि तुम मेरे काव्य का अर्थ कर दोगे तो मैं सबके सामने तुम्हारा शिष्य बन जाऊँगा और यदि तुम अर्थ नहीं बता सको तो अपने समस्त अभिमानी शिष्यों और भाईयों के साथ आकर मेरे गुरु के शिष्य बन जाओ।’
पतित से पावन
गौतम ने कहा - ‘हाँ, मुझे यह बात स्वीकार है।’
इन्द्र ने गौतम से काव्यरूप में पूछा - ‘द्रव्य कितने हैं? तत्त्व कितने? अस्तिकाय कितने हैं? धर्म के कितने भेद हैं? श्रुतज्ञान के अङ्ग कितने हैं?’
ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र का काव्य सुनकर गौतम थोड़ा दुःखी हुआ और मन में विचार करने लगा कि इस काव्य का क्या अर्थ कहूँ? फिर गौतम ने विचारकर वृद्ध ब्राह्मण से कहा कि ‘चलो! मेरे गुरु से विवाद करें।’ इस प्रकार कहकर सब इन्द्र के साथ चलने लगे। मार्ग में गौतम ने विचार किया कि जब मैं इस वृद्ध के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका, तब इसके गुरु तो महान् विद्वान् होंगे, उनको उत्तर मैं किस प्रकार दूँगा?
इन्द्र, गौतम को अपने गुरु के पास समवसरण में ले जाकर सन्तुष्ट हुआ। जिसने अपनी शोभा द्वारा तीनों लोकों में आश्चर्य उत्पन्न किया है - ऐसे मानस्तम्भ को देखकर गौतम ने अपना सब अभिमान त्याग दिया। उन्होंने मन में विचार किया कि जिस गुरु के सम्पूर्ण पृथ्वी में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली इतनी विभूति है, क्या वे मुझसे पराजित हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं।
तत्पश्चात् आगे जाकर वीर प्रभु के दर्शन करके गौतम अनेक प्रकार से स्तुति करने लगे तथा पाँच सौ शिष्यों और दोनों भाईयों के साथ जिनेश्वरी दीक्षा अङ्गीकार कर ली। वीरनाथ भगवान् के समवसरण में चार ज्ञान से सुशोभित ऐसे गौतम (इन्द्रभूति) अग्निभूति, वायुभूति आदि गणधर हुए और वीरनाथ की दिव्यध्वनि खिरने लगी।
तपश्चरण करते-करते एक दिन गौतम मुनिराज एकान्त प्रासुक स्थान में विराजमान होंगे और निश्चल ध्यान में लीन होकर श्रेष्ट प्रकृतियों को नष्ट करके कार्तिक वद अमावस्या के दिन सायंकाल केवलज्ञान प्राप्त करके तेरहवें गुणस्थान में विराजमान होंगे।
अहो! गौतम स्वामी का जीव पहले विश्वालोचन महाराज की पटरानी होकर दुराचारी, विषय लम्पटी, मदिभक्षी, मुनिन्दक, मुनिहिंसक, शैरध्यानी, नरकगामी हुआ और नरक में से निकलकर बिल्ली, सुअरी, कुत्ती, मुर्गी, और कानी, लंगड़ी, कुबड़ी शूद्र कन्या हुई; भीख माँगती-माँगती मुनिराज के दर्शन और उपदेश से व्रतादि धारण करके समाधिमरणपूर्वक स्त्रीलिंग का छेद करके पाँचवें स्वर्ग में उत्तम देव हुआ और वहाँ से आकर ब्राह्मण कुल में पैदा होकर वेद-वेदान्त में पारङ्गत हुआ; तत्पश्चात् इन्द्र के माध्यम से समवसरण में गया, मानस्तम्भ को देखकर मान गलित हुआ तथा दीक्षा अङ्गीकार करके चार ज्ञान प्रगट करके अन्तर्मुहूर्त में बारह अङ्ग चौदह पूर्व की रचना करनेवाले गणधर पद को प्राप्त किया, आगे क्रमशः केवलज्ञान प्रगट करेंगे।
हे श्रेणिक! इस प्रकार गौतम गणधर के अशुभ-शुभ और शुद्धपरिणाम तथा उसका फल तुझे बताया। जो भव्य जीव, आत्मा की शुद्धता को जानते हैं और उसका विश्वास करते हैं, आनन्द की अनुभूति में लीन रहते हैं, वे जीव, संसार भ्रमण से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
- (गौतमस्वामी चरित्र से)
प्रचुर संस्वदेन ही मुनि का भावलिङ्ग
अहा! सुनिष्ठा कैसी होती है? उसका विचार तो करो! छठवें-सातवें गुणस्थान में झूलनेवाले वे मुनि, स्वरूप में गुप्त हो गये हैं! प्रचुर संस्वदेन ही मुनि का भावलिङ्ग है और शरीर की नग्नता-वस्त्रपरारहित निर्ग्रन्थदशा, यह उनका द्रव्यलिङ्ग है। उनकी अपवाद-व्रतादि का शुभराग आता है, किन्तु वस्त्रत्याग का अथवा अधःकर्म तथा औद्देशिक आहार लेने का भाव नहीं होता।
- पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, विणासणो सव्वं, ११४, पृष्ठ १३०
देखो, संसार की विचित्रता!
बलभद्र, वासुदेव और उनके मोक्षगामी तीन युगल बन्धुओं की वैराग्य प्रेरक कथा
वासुदेव, भगवान् नेमिनाथ के पिता राजा समुद्रविजय के छोटे भाई थे। एक बार उन्होंने अपनी सहधर्मिणी देवकी के साथ चारणऋद्धिधारी अवधिज्ञानी मुनिराज श्रीअजितमुख्यामी को भक्तिभावपूर्वक वन्दन करके/नमस्कार करके, देवकी के होनेवाले पुत्रों की कंस के द्वारा मृत्यु सम्बन्धी शङ्का का समाधान करने के लिए पूछा। उसके उत्तर में मुनिराज ने कहा - हे भव्य! देवकी के होनेवाले पुत्रों की मृत्यु कंस के द्वारा नहीं होगी। मैं इस सम्बन्ध में जो सत्य है, वह कहता हूँ, उसे तुम ध्यान देकर सुनो!
देवकी का सातवाँ पुत्र नौवें नारायण के रूप में जन्म लेगा, और वह तीन खण्ड के राज्य का स्वामी होगा। उससे बड़े छह भाई तद्भव मोक्षगामी होंगे। उनकी मृत्यु कंस के द्वारा नहीं होगी; इसलिए तुम चिन्ता मत करो। सात पुत्र तो देवकी के होंगे और एक पुत्र रोहिणी का होगा, जो कि बलभद्र होगा। मैं इन सबके पूर्व भव तुम्हें कहता हूँ, वह तुम सुनो। उनके पूर्व भव का वृत्तान्त तुम्हारे मन को आनन्दकारी होने के साथ-साथ वैराग्य एवं आत्महित की प्रेरणा देनेवाला भी है।
बहुत समय पूर्व इस मथुरा नगरी में राजा सूरसेन राज्य करते थे। उनके राज्य में एक भानु नाम का सेठ बारह करोड़ द्रव्य का स्वामी था। उसकी पत्नी का नाम यमुना था। उसके सुभानु आदि सात पुत्र थे। भानु सेठ को संसार से वैराग्य होने पर वह अभयनन्दि मुनिराज के समीप दीक्षा लेकर मुनि हो गये और सेठानी यमुना भी जिनदत्त आर्यिका के समीप आर्यिका हो गयी।
भानु सेठ के दीक्षित होने के पश्चात् उसके सुभानु आदि सातों पुत्र, जुआ और वैश्यागमन आदि के व्यसनी हो जाने से पिता द्वारा प्रदत्त समस्त द्रव्य नष्ट हो गया। द्रव्य नष्ट हो जाने से सातों भाई चोरी करने के लिए उज्जैनी नगर में गये। सुभानु का सबसे छोटा भाई सूरसेन था। उसे महाकाल नामक श्मशान में कुल, सन्तान की रक्षा के लिए रखकर सुभानु आदि छह भाई चोरी करने के लिए नगरी में गये और छोटे भाई सूरसेन से कह गये कि यदि चोरी करते हुए हम मर जाएँ तो तू यहाँ से भाग जाना और यदि हम सकुशल वापस आ गये तो चोरी करने से जो द्रव्य आयेगा, उसमें से तुझे बराबर का हिस्सा देंगे। ऐसा कहकर छहों भाई चोरी करने चले गये और सातों छोटा भाई सूरसेन श्मशान में बैठा गया। उसी समय संसार की विचित्रता का दर्शक एक प्रसङ्ग बना -
उज्जैनी नगरी का राजा वृषभध्वज था। उसके राज्य में दुष्टिमति नाम का महायोद्धा था, उसकी पत्नी का नाम वज्रमति थी। उनके वज्रमूष्टि नाम का पुत्र था, जिसका विवाह राजा विमलचन्द्र की मञ्जूषी नाम की पुत्री के साथ हुआ था। मञ्जूषी अपने पति वज्रमूष्टि को बहुत प्रिय थी। मञ्जूषी अपनी सास को सेवा में प्रमादी थी, इस कारण उसकी सास का चित्त कलुषित रहता था; अतः सास ऐसा उपाय सोचती थी कि किसी प्रकार मेरा पुत्र अपनी पत्नी मञ्जूषी से विरक्त हो जाए अथवा मञ्जूषी मर जाए।
एक बार बसन्तऋतु के उत्सव में वज्रमूष्टि जन में क्रीड़ा करने गया, तब उपयुक्त अवसर जानकर मञ्जूषी की सास ने घड़े में सर्प रखकर कपटपूर्वक मञ्जूषी से कहा - ‘हे बहू! इस घड़े में मोतियों की माला है, तू उसे निकालकर पहिन।’
मञ्जूषी ने मोतियों की माला लेने के लिए ज्यों ही घड़े में हाथ डाला तो तुरन्त उसे सर्प
देवों, संसार की विचित्रता!
14
ने दस लिया, जिससे वह मूर्च्छित हो गयी। उसकी सास ने सेवकों को आज्ञा दी कि मञ्जी को श्मशान में डाल आओ। सेवक आज्ञानुसार मञ्जी को महाकाल श्मशान में डाल आया। तत्पश्चात् रात्रि में मञ्जी का पति वज्रमुष्टि घर आया और अपनी प्राणप्रिया मञ्जी को सर्प डसने आदि के समाचार जानकर अत्यन्त दुःखी हुआ। वह तुरन्त एक हाथ में नङ्गी तलवार और एक हाथ में दीपक लेकर महाकाल श्मशान में मञ्जी को खोजने चल पड़ा।
महाकाल श्मशान में उस रात्रि नग्नधर्म नाम के मुनिराज प्रतिमायोग धारण करके विराजमान थे, उन्हें देखकर वज्रमुष्टि अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने मुनिराज की तीन प्रदक्षिणा की तथा नमस्कार करके कहने लगा - ‘हे पूज्यपाद! यदि मेरी प्रिया मुझे मिल जाए तो मैं सहस्रदल कमल पुष्प से आपकी पूजा करूँगा।’
अरे रे! जगत् के अज्ञानियों के अज्ञान को धिक्कार है!! वे मुक्तिप्रदाता वीतरागी सन्त से भी विषय-कषायों की प्राप्ति की ही अपेक्षा रखते हैं।
वज्रमुष्टि को खोजते-खोजते अपनी पत्नी मिल गयी; अतः वह उसे मूर्च्छित अवस्था में उठाकर मुनिराज के चरणों के समीप ले गया। मुनिराज, ऋद्धिधारक थे, उनके प्रभाव से मञ्जी निर्विष हो गयी। वज्रमुष्टि अपनी स्त्री को निर्विष जानकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे मुनिराज के समीप बैठाकर वह सुदर्शन नामक सरोवर में से सहस्रदल कमल लेने के लिए चला गया; साथ ही मञ्जी से कह गया कि जहाँ तक मैं नहीं आऊँ, वहाँ तक तुम मुनिराज के समीप ही बैठना।
मञ्जी, मुनिराज के समीप बैठी है और उसका पति सहस्रदल कमल लेने के लिए सरोवर की तरफ गया है। इस श्मशान में रहा हुआ चोर सूरसेन, जो कि चोरों का सातवाँ भाई है वह, वज्रमुष्टि का मञ्जी पर अधिक स्नेह देखकर मन में विचारने लगा कि पति को तो पत्नी के प्रति प्रीति में कमी नहीं है, परन्तु पत्नी को पति के प्रति कैसी प्रीति है, यह तो जरा देखूँ - ऐसा विचारकर उसकी परीक्षा लेने के लिए उसने अपना रूप उस स्त्री को बताया। महारूपवान सूरसेन चोर मीठे वचनों से उसके साथ बातचीत करने लगा।
मञ्जी, सूरसेन चोर का रूप देखकर और मीठे वचन सुनकर कामाग्नि से विह्वल होकर कहने लगी - ‘हे देव! कृपा करके मुझे अङ्गीकार करो।’
तब सूरसेन चोर ने कहा - ‘हे भद्रे! तेरा पति महा बलवान योद्धा है, इस कारण मैं उससे डरता हूँ।’
तब वह स्त्री बोली कि ‘हे नाथ! तुम भय मत करो। मैं अपने पति को तलवार से मार दूँगी।’
मञ्जी की ऐसी निष्ठुरतायुक्त बात सुनकर सूरसेन ने कहा - ‘यदि तुम अपने पति को मार दोगी तो मैं तुम्हें अङ्गीकार करूँगा!’ - ऐसा कहकर वह चोर उस स्त्री का कार्य देखने के लिए छिपकर बैठ गया।
मञ्जी का पति वज्रमुष्टि, सरोवर में से कमल लाकर मुनिराज को चढ़ाकर नमस्कार कर रहा था, तभी मञ्जी पीछे से अपने पति को तलवार से मारने जा रही थी, उस समय तुरन्त ही चोर सूरसेन ने उस स्त्री का हाथ पकड़कर वज्रमुष्टि को बचा लिया और स्वयं छिप गया। इस प्रसङ्ग को देखकर सूरसेन का चित्त संसार से विरक्त हो गया। मञ्जी अपना दोष छिपाने के लिए मूर्च्छा खाकर गिर पड़ी। यह देखकर वज्रमुष्टि ने कहा - 'हे प्रिये! तू डर कैसे गयी? यहाँ भय का कोई कारण नहीं है। ऐसा कहकर, धैर्य बँधाकर, मुनिराज को वन्दन करके, पत्नी को साथ लेकर वह अपने घर चला गया।
सूरसेन चोर के जो छह भाई चोरी करने नगर में गये थे, वे चोरी करके बहुत-सा द्रव्य लाये और उनके सात भाग करके अपने छोटे भाई सूरसेन से कहा - ‘हे भाई! तू अपना भाग ले ले।’
सूरसेन ने अपना भाग नहीं लिया और कहा - ‘संसारी जीव, स्त्री-पूजादिक के लिए धन उपार्जित करता है, परन्तु स्त्री की चेष्टा तो मैंने अभी-अभी प्रत्यक्ष देखी है।’ बड़े भाई सुभानु आदि ने पूछा कि ‘हे बन्धु! तूने क्या देखा है?’ उत्तर में सूरसेन ने वज्रमुष्टि और मञ्जी का सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। संसार की स्वार्थवृष्टि का जघन्यरूप सुनकर सातों भाई संसार में विरक्त हो गये। आत्मकल्याण की भावना से वे सभी वर्धमान मुनि के समीप जिनदीक्षा अङ्गीकार करके मुनि हो गये।
कितने ही दिनों के पश्चात् वे सातों मुनि, गुरु के साथ उज्जैनी आये। वज्रमुष्टि ने उन्हें देखा और उनको कम उम्र में वैराग्य होने का कारणभूत अपनी स्त्री का वृत्तान्त सुनकर
देवों, संसार की विचित्रता!
मङ्गी की ऐसी निष्ठुरतायुक्त बात सुनकर सूरसेन ने कहा- ‘यदि तुम अपने पति को मार दोगी तो मैं तुम्हें अङ्गीकार करूँगा।’ - ऐसा कहकर वह चोर उस स्त्री का कार्य देखने के लिए छिपकर बैठ गया।
मङ्गी का पति वज्रमुष्टि, सरोवर में से कमल लाकर मुनिराज को चढ़ाकर नमस्कार कर रहा था, तभी मङ्गी पीछे से अपने पति को तलवार से मारने जा रही थी, उस समय तुरन्त ही चोर सूरसेन ने उस स्त्री का हाथ पकड़कर वज्रमुष्टि को बचा लिया और स्वयं छिप गया। इस प्रसङ्ग को देखकर सूरसेन का चित्त संसार से विरक्त हो गया। मङ्गी अपना दोष छिपाने के लिए मूर्च्छा खाकर गिर पड़ी। यह देखकर वज्रमुष्टि ने कहा - 'हे प्रिये ! तू डर कैसे गयी ? यहाँ भय का कोई कारण नहीं है। ऐसा कहकर, धैर्य बँधाकर, मुनिराज को वन्दन करके, पत्नी को साथ लेकर वह अपने घर चला गया।
सूरसेन चोर के जो छह भाई चोरी करने नगर में गये थे, वे चोरी करके बहुत-सा द्रव्य लाये और उसके सात भाग करके अपने छोटे भाई सूरसेन से कहा – ‘हे भाई ! तू अपना भाग ले ले।’
सूरसेन ने अपना भाग नहीं लिया और कहा - ‘संसारी जीव, स्त्री-पुत्रादिक के लिए धन उपार्जित करता है, परन्तु स्त्री की चेष्टा तो मैंने अभी-अभी प्रत्यक्ष देखी है।’ बड़े भाई सुभानु आदि ने पूछा कि ‘हे बन्धु ! तूने क्या देखा है ?’ उत्तर में सूरसेन ने वज्रमुष्टि और मङ्गी का सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। संसार की स्वार्थवृत्ति का जघन्यतमरूप सुनकर सातों भाई संसार में विरक्त हो गये। आत्मकल्याण की भावना से वे सभी वरधर्म मुनि के समीप जिनदीक्षा अङ्गीकार करके मुनि हो गये।
देखो, संसार की विचित्रता !
वह भी संसार से विरक्त होकर मुनि हो गया। सूरसेन आदि सातों भाईयों की स्त्रियाँ भी अपनी पति को संसार से विरक्त जानकर जिनदत्ता आर्यिका के समीप दीक्षित होकर आर्यिका हो गयी थीं, वे भी एक बार उज्जैन नगरी में आईं। मङ्गी भी उनके वैराग्य का वृत्तान्त जानकर संसार का निन्द्य समझकर अपने दुष्चरित्र की निन्दा करती हुई, गृहत्याग करके आर्यिका हो गयी। ये सभी महातप करके प्रथम स्वर्ग में एक सागर की आयुवाले देव हुए।
धातकीखण्ड के भरतक्षेत्र में नित्यलोक नामक नगर में चित्रचूल राजा की मनोहारी रानी के सातों भाईयों में से बड़ा भाई सुभानु का जीव प्रथम स्वर्ग में आकर चित्राङ्गद नामक पुत्र हुआ और छहों भाई भी उन्हीं माता-पिता के यहाँ तीन युगल पुत्र हुए। इस प्रकार यहाँ भी सातों भाईयों ने भाईरूप से ही जन्म लिया। सातों भाई महारूपवान एवं समस्त विद्याओं के पारगामी, मनुष्यों के शिरोमणि हुए।
मेघपुर नामक नगर का राजा धनञ्जय था, उसकी धनश्री नाम की रूपवान पुत्री पृथ्वी में प्रसिद्ध थी। उसके विवाह हेतु आयोजित स्वयंवर में समस्त विद्याधरकुमार आये थे। कन्या धनश्री ने अपने मामा के पुत्र हरिवाहन के गले में वरमाला पहिनाई, इसे देखकर समस्त राजा क्रोधयुक्त हो गये। वे कहने लगे – ‘यदि धनश्री को हरिवाहन को ही वरमाला पहनानी थी तो हम सबको किसलिए बुलाया गया ?’ इस प्रकार क्रोध से कन्या के लिए वे सभी राजा परस्पर लड़ने लगे और उस युद्ध में अनेक सामन्तों का नाश हुआ। इस प्रसङ्ग को देखकर राजा चित्रचूल के सातों राजकुमारों ने विषयों को पाप का कारण जानकर, विरक्त होकर भूतानन्द केवली के समीप मुनिव्रत धारण किया और सातों भाई, स्वरूप-आराधना करके चौथे स्वर्ग में सात सागर की आयुवाले देव हुए। स्वर्ग का सुख भोगकर, वहाँ से चयकर चित्राङ्गद नाम का बड़ा भाई भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर में सेठ श्रोतवाहन की पत्नी बन्धुमति के शंख नाम का पुत्र हुआ और छोटे छह भाईयों ने भी उसी नगरी के राजा गङ्गदेव की रानी नन्दियशा के तीन युगल पुत्रों के रूप में जन्म लिया। रानी नन्दियशा के चौथे गर्भ धारण में सातवाँ पुत्र निर्नामिक आया, वह आगामी जन्म में होनहार कृष्ण है। वह माता नन्दियशा का पूर्व भव का विरोधी था; अतः वह गर्भ में आया तभी से राजा को रानी अरुचिकर हो गयी; इस कारण (उसने) पुत्र को जन्मते ही छोड़ दिया। उस पुत्र का पालन रेवती नामक धाय ने किया। जब वह बड़ा हुआ, तब श्रेष्ठीपुत्र शंख के और इस निर्नामिक के स्नेह बढ़ गया, क्योंकि शंख तो होनहार बलभद्र और निर्नामिक होनहार कृष्ण नारायण है।
एक दिन निर्नामिक, शंख के साथ मनोहर नामक उद्यान में गया। वहाँ निर्नामिक के छहों भाई भोजन कर रहे थे, उन्हें शंख ने कहा – ‘यह तुम्हारा छोटा भाई है, इसे क्यों नहीं बुलाते ?’ शंख के यह वचन सुनकर छहों बड़े भाईयों ने निर्नामिक को बुलाया और प्रेमपूर्वक साथ में भोजन कराने लगे। माता नन्दियशा ने यह सब देख लिया और क्रोध में आकर उसने निर्नामिक को लात मारकर उठा दिया, इससे निर्नामिक को बहुत दुःख हुआ और शंख भी खेदखिन्न हुआ। वह निर्नामिक को लेकर द्रुमसेन नामक अवधिज्ञानी मुनिराज के पास गया और उनसे निर्नामिक के पूर्व भव के सम्बन्ध में पूछा। मुनिराज ने निर्नामिक के पूर्व भव
के विषय में बताते हुए कहा – गिरिनार
नाम के नगर का राजा चित्ररथ राज्य करता
था। वह कुबुद्धियों के सङ्ग माँसाहारी हो
गया। उसके अमृत-रसायन नाम का
रसोइया था, वह माँस की रसोई बनाने की
विधि में प्रवीण था; इस कारण राजा ने उस
पर प्रसन्न होकर दस गाँव भेंट कर दिये थे।
एक दिन राजा ने सुधर्म नामक मुनि से धर्म श्रवण करके, माँस के दोष जानकर, अपनी निन्दा करके अपने मेघरथ नाम के पुत्र को राज्य देकर तीन सौ राजाओं के साथ मुनि हो गया। मेघरथ, श्रावकव्रतों का धारक था। उसने ‘रसोइया ने मेरे पिता को अभक्ष्य भोजन कराया है’ – ऐसा जानकर, क्रोधित होकर दिये हुए दस गाँवों में से नौ गाँव Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
देखो, संसार की विचित्रता !
वापस छीन लिये। इससे रसोईया ने मुनि के प्रति वैरभाव कर लिया कि मुनि ने मेरी आजीविका हर ली है।
इसलिए उसने बनावटी पक्का श्रावक बनकर मुनि को विषमय कड़बी तुम्बी का
आहार दिया। फलतः मुनि, समाधिमरण करके अपराजित विमान में बत्तीस सारग की स्थितिवाले अहमिन्द्र हुए और रसोईया मरकर तीसरे नरक गया। वहाँ तीन सागर तक नरक के तीव्र दुःख भोगकर, वहाँ से निकल कर तिर्यञ्चगतिरूप वन में बहुत भ्रमण करके, मलय नाम के देश के पलाश गाँव में यक्षदत्त के यहाँ यक्षलिक नाम का पुत्र हुआ। एक बार यक्षलिक, माल की गाड़ी भरकर अपने छोटे भाई के साथ जा रहा था।
रास्ते में एक सर्पिणी थी। छोटे भाई के बारम्बार मना करने पर भी बड़े भाई यक्षलिक ने सर्पिणी के ऊपर गाड़ी चला दी, जिससे उसकी देह छूट गयी और वह महादुःख से अकामनिर्जरा करके मरण को प्राप्त हुई और वहाँ से श्वेताविक नाम की नगरी में वासव राजा की रानी वसुन्दरी के नन्दियशा नाम की पुत्री हुई, जिसका विवाह राजा गङ्गदेव से हुआ है।
कितने ही दिन पश्चात् यक्षलिक मरकर रानी नन्दियशा के निर्नामिक नाम का पुत्र हुआ – इस कारण पूर्व भव के विरोध से नन्दियशा, पुत्र निर्नामिक के प्रति द्वेष रखती है। मुनिराज के द्वारा यह कथा सुनकर राजा गङ्गदेव आदि सब संसार से विरक्त हो गये, उन्होंने अपने देवनन्दि पुत्र को राज्यादि सौंपकर, दो सौ राजाओं के साथ मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली। साथ ही उनके छहों पुत्र और निर्नामिक तथा श्रेष्ठीपुत्र शंखादि भी मुनि हुए। रानी नन्दियशा, रेवती धाय और बन्धुमति सेठानी भी आर्यिका हो गयी। निर्नामिक मुनि ने उग्र तप करके नारायण पद का निदान किया और वह तप के
प्रभाव से समाधिमरण करके स्वर्ग में गया। कितने ही समय पश्चात् स्वर्ग से चयकर रेवती धाय का जीव भद्रलपुर में सुदृष्टि नामक सेठ की अलङ्का नामक स्त्री हुई; रानी नन्दियशा का जीव देवकी हुई और गङ्ग आदि पूर्व भव के छहों पुत्र स्वर्ग से आकर इस भव में भी देवकी के तीन युगल पुत्र होंगे और वे तद्भव मोक्षागामी, गुण के समुद्र होंगे। अलङ्का नामक सेठानी के तीन मृतक युगल पुत्र होंगे। इन्द्र की आज्ञा से देव, अलङ्का के यहाँ Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
देवकी के तीन युगल पुत्र को ले जाएगा और अलङ्का के मृतक तीन युगल पुत्र यहाँ लायेगा। तेरे पुत्र भद्रलपुर में सुदृष्टि सेठ के घर अलङ्का सेठानी के यहाँ युवा होंगे और नेमीनाथ जिनेश्वर के शिष्य होकर वे तीनों युगल मुनि तेरे घर भिक्षा / आहार के लिये आयेंगे। उनके प्रति तुझे पुत्रवत् स्नेह उत्पन्न होगा। वे छहों महामुनि उग्र तप करके कर्मों का अभाव करके उसी भव में सिद्धिधाम पधारेंगे। सात चोर भाईयों में से बड़ा भाई सुभानु- श्रेष्ठीपुत्र शंख, रोहिणी का पुत्र बलभद्र होगा और माँस भक्षक, मुनिहिंसक रसोईया, अर्थात् निर्नामिक का जीव, देवकी का सातवाँ पुत्र श्रीकृष्ण नारायण होगा। इस प्रकार वासुदेव अपने तीन युगल पुत्रों, बलदेव, वासुदेव और देवकी के पूर्व भव का सम्बन्ध आदि अतिमुक्तक मुनि के द्वारा सुनकर परम हर्षित होकर मुनिराज को बारम्बार वन्दन और स्तुति करके अपने घर गये।
अहो ! आश्चर्य है कि सप्त व्यसनों के व्यसनी सात चोर भाई, स्त्री-चरित्र का निमित्त पाकर मुनिराज के धर्मोपदेश द्वारा आत्मोन्नति के मार्ग में प्रयाण करते हैं। अहो ! देखो तो सही ! पूर्व भव में सङ्कल्पपूर्वक नागिन को गाड़ी के नीचे दबाकर मार देनेवाला श्रीकृष्ण का जीव मरकर उसी नागिन के जीव / रानी के गर्भ से पुत्र होकर जन्मा। क्रोध से जिस नागिन के जीव को मारा, वही माता बनी और वही जो पूर्व भव में मुनिराज को कड़वी तुम्बी का आहार कराकर मुनि हिंसा करनेवाला माँसभक्षी रसोइया था, वह कृष्ण का जीव भविष्य में तीर्थङ्कर होगा।
परम पूज्य गुरुदेवश्री फरमाते हैं कि पूर्व का महापापी जीव भी अनन्त शक्ति से परिपूर्ण ज्ञायकस्वभाव की महिमा लाकर स्वभावसन्मुख दृष्टि करके भगवान् बन जाता है।
( - श्री हरिवंशपुराण के आधार से सार-संक्षेप)
जयकुमार सुलोचना का जीवन प्रसङ्ग
चमत्कार चैतन्य का
हस्तिनापुर के महाराजा सोमप्रभ का पुत्र जयकुमार, भरत चक्रवर्ती का धर्मी और शूरवीर सेनापति था। एक दिन जयकुमार अपनी रानी सुलोचना के साथ परिवारजनोंसहित महल की छत पर बैठा हुआ था। उन्होंने ऊपर आकाश में उड़ते हुए एक कबूतर-कबूतरी को देखा, जिसे देखते ही जयकुमार के मुख से – ‘हा ! प्रभावती तू कहाँ है ?’ यह शब्द निकले और उसे मूर्च्छा आ गयी, जिससे वह बेहोश हो गया।
सुलोचना को भी उन कबूतर-कबूतरी को देखते ही जातिस्मरणज्ञान हुआ और वह भी – ‘हा ! मेरा रतिकर कहाँ है ?’ इन शब्दों को बोलकर मूच्छित हो गयी। जब वे दोनों होश में आये, तब अपने पति की आज्ञा मानकर, रानी सुलोचना ने अपने पूर्व भवों का वर्णन परिवारजनों के सामने इस प्रकार किया –
जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्पकलावती नाम का देश है। उसमें मृणालवती नगरी के राजा सुकेतु थे। उस नगरी में रतिवर्मा नाम का सेठ रहता था। उसकी स्त्री का नाम कनकश्री और पुत्र का नाम भवदेव था। भवदेव, चरित्रहीन था। उसी नगरी में श्रीदत्त नाम का सेठ रहता था, उसकी पत्नी का नाम विमलश्री और पुत्री का नाम रतिवेगा था। अशोकदेव नाम का एक तीसरा सेठ भी वहाँ रहता था, उसकी पत्नी का नाम जिनदत्ता और पुत्र का नाम सुकान्त था। सुकान्त हमेशा धर्मकार्यों में रचा-पचा रहता था। भवदेव के माता-पिता ने रतिवेगा के माता-पिता के समक्ष भवदेव के साथ रतिवेगा के विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसके फलस्वरूप दोनों पक्ष सहमत हुए।
एक बार भवदेव धन कमाने की इच्छा से परदेश जा रहा था। उस समय उसने
अपने श्वसुर श्रीदत्त सेठ से कहा - ‘हे तात ! मैं बारह वर्ष तक वापस नहीं जाऊँ तो तुम रतिवेगा का विवाह अन्यत्र कर सकते हो।’ कर्मसंयोग से हुआ भी ऐसा ही। अतः बारह वर्ष व्यतीत होने के पश्चात् श्रीदत्त सेठ ने रतिवेगा का विवाह अशोक सेठ के पुत्र सुकान्त के साथ विधिपूर्वक कर दिया। तत्पश्चात् जब भवदेव परदेश से वापस आया और उसने सारा वृतान्त सुना तो वह अत्यन्त क्रोधित हुआ, उसने सुकान्त और रतिवेगा को मार डालने का निर्णय लिया।
यह बात जानकर भय के मारे सुकान्त और रतिवेगा वन में चले गये। वहाँ एक सुन्दर सरोवर था। उस सरोवर पर शक्तिषेण नाम का राजा ठहरा हुआ था। वे दोनों शक्तिषेण की शरण में पहुँच गये और निर्भय होकर रहने लगे। उन दोनों के महान् पुण्योदय से वहाँ भी एक चारणऋद्धिधारक मुनिराज आहार के लिए पधारे। राजा शक्तिषेण ने प्रसन्नचित्त से नवधाभक्तिपूर्वक मुनिराज को आहार दिया तथा पूजा-भक्तिपूर्वक उनका सम्मान किया। इस विधि को देखकर दोनों दम्पति अत्यन्त हर्षित हुए और अनित्यादि बारह भावनाओं का चिन्तवन करते-करते, मन में दयाभाव धारण करके वहीं अपना समय व्यतीत करने लगे।
एक बार अवसर मिलते ही दुष्ट भवदेव ने वहाँ आकर दोंनो दम्पतियों को जलाकर मार डाला और राजा शक्तिषेण के सुभटों ने दुष्ट भवदेव को मार डाला। इसलिए कहावत है कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है, उसके लिए पहले से ही कुआँ तैयार रहता है। ***
पूर्व विदेह की पुण्डरीकिणी नगरी में प्रजापाल नाम का राजा राज्य करता था और वहाँ एक कुबरेमित्र नाम का सेठ भी रहता था। उस सेठ की बत्तीस स्त्रियों में धनवती नाम की सेठानी सबसे मुख्य थी। इस सेठ के घर सुकान्त का जीव, रतिकर नाम का कबूतर और रतिवेगा का जीव, रतिसेना नाम की कबूतरी हुई। यह दोनों कबूतर-कबूतरी सेठ के घर में आनन्दपूर्वक अपना समय व्यतीत करने लगे।
एक बार ऋद्धिधारी मुनिराज आकाशमार्ग से गमन करते हुए सेठ के यहाँ आहार
चमत्कार चैतन्य का
के लिए पधारे। उन्हें देखकर सेठ - सेठानी के हृदय में अत्यन्त आनन्द हुआ। उन्होंने शुद्धभाव से मुनिराज का पड़गाहन करके, नवधाभक्तिपूर्वक आहारदान दिया। उस समय कबूतर-कबूतरी के जीव ने भी भक्तिभाव से मुनिराज के चरण कमलों के दर्शन किये ओर पंख फैलाकर चरणों का स्पर्श किया। मुनिराज के दर्शनमात्र से ही दोनों को अपनी पूर्व भव का जातिस्मरणज्ञान हो गया और उन्होंने आहारदान की बहुत अनुमोदना की, जिसके प्रभाव से उनके महान् पुण्य का बन्ध हुआ।
एक बार वे दोनों कबूतर-कबूतरी, दाना चुगने के लिए दूसरे गाँव में गये। वहाँ पर उनके पूर्व भव का शत्रु भवदेव का जीव मरकर बिल्ली हुआ था, वह क्रोधावेश से इन दोनों को मारकर खा गया। इसलिए ज्ञानियों का कहना है कि कभी भी किसी के साथ वैरभाव मत करो, यह वैरभाव ही भव-भवान्तर में जीव को दुःख देनेवाला है।
विजयार्द्ध की दक्षिण श्रेणी में गङ्गाधर
देश की शींखली नामक सुन्दर नगरी का राजा
आदित्यगति और रानी शशिप्रभा थे। रतिकर नाम
का कबूतर (सुकान्त का जीव) मरकर उन
राजा-रानी का हिरण्यवर्मा नाम का पुत्र हुआ।
विजयार्द्ध की उत्तर श्रेणी के गौरी देश के भोगपुर
नाम की नगरी के विद्याधर राजा वायुधर की
स्वर्णप्रभा नाम की रानी थी। उसके गर्भ से वह
रतिसेना नाम की कबूतरी (रतिवेगा का जीव) प्रभावती नाम की पुत्री हुई। युवावस्था होने पर प्रभावती का विवाह हिरण्यवर्मा के साथ हुआ। योनानुयोग अमुक दिनों के पश्चात् प्रभावती ने एक कबूतर के जोड़े को उड़ते देखा और उसे देखते ही प्रभावती को अपने पूर्व भव की याद आ गयी। तत्पश्चात् एक दिन प्रभावती और हिरण्यवर्मा ने एक चारण ऋद्धिधारी मुनि के समीप जाकर अपने पूर्व भव का वृतान्त सुना। जिसे सुनकर अपने पूर्व भव सम्बन्धी ज्ञान होने पर उन दम्पति में अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। ***
किसी समय किसी वैराग्य प्रसङ्ग को प्राप्त
करके हिरण्यवर्मा, संसार-शरीर और भोगों से
विरक्त हो गया और अपने पुत्र को राज्य सौंपकर
स्वयं ने जिनदीक्षा धारण कर ली। अपने पति को
दीक्षित होते देखकर प्रभावती ने भी गुणवती
आर्यिका के समीप आर्यिका व्रत धारण कर लिये।
कुछ दिनों के बाद गुणवती आर्यिका के
साथ प्रभावती ने वहाँ से विहार किया और विहार करते-करते पुण्डरिकिणी नगरी में आ पहुँची। वहाँ प्रभावती को देखकर धनवती सेठानी ने गुणवती आर्यिका से पूछा – ‘हे माता ! यह कौन है, जिसे देखकर मेरे हृदय में स्नेह उत्पन्न हो रहा है ? और इसका कारण क्या है ? – वह मुझे बताओ।’
सेठानी के वचन सुनकर स्वयं प्रभावती ने कहा – ‘हे देवी! क्या तुम्हें अपने घर में रहनेवाले कबूतर युगल याद नहीं ? याद करो, मैं तुम्हारे घर में रतिसेना नाम की कबूतरी थी।’
यह बात सुनकर सेठानी को बहुत ही आश्चर्य हुआ और उसने पूछा कि रतिकर कबूतर कहाँ है ? उत्तर में प्रभावती ने कहा – ‘वह भी मरकर विद्याधरों का राजा हिरण्यवर्मा हुआ है, परन्तु अब मुनिदीक्षा धारण करके विहार करते-करते इस नगरी में आये हैं। सेठानी ने मुनि के पास जाकर भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और तत्पश्चात् प्रभावती के उपदेश से सेठानी भी आर्यिका हो गयी।’
एक बार मुनिराज हिरण्यवर्मा ने सात दिन तक श्मशान में प्रतिमा आसन से योग धारण किया। वहाँ दुष्ट बिलाड़ा (भवदेव का जीव) विद्युतचोर ने सेठानी की दासी के मुँह से इन मुनिराज के पूर्व भवों का वृतान्त सुना था, इसलिए विभङ्गावधि से मुनिराज को श्मशान में ध्यानस्थ जानकर वह विद्युतचोर वहाँ आया और मुनिराज हिरण्यवर्मा व अर्यिका प्रभावती को जलती चिता में एक साथ फेंक दिया। उस समय वे दोनों अग्नि के तीव्र ताप के परीषह से शुद्ध और समताभावों से प्राण त्यागकर अपने पुण्य-प्रताप से स्वर्ग Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
चमत्कार चैतन्य का
में ऊँची जाति के देव हुए। जब राजा को इस दुष्कृत्य का पता चला तो राजा ने विद्युतचोर को मार डालने की आज्ञा दे दी। दोनों देव-देवी ने अवधिज्ञान से राजा का यह विचार जानकर, राजा को समझाया और शान्त कर दिया।
कुछ समय व्यतीत होने पर एक
बार वे दोनों देव-देवी फिर से वहाँ आये
और उन्होंने महामुनि भीम को देखकर
नमस्कार किया, उनसे धर्मोपदेश सुना।
तत्पश्चात् देव ने कहा – 'हे स्वामिन !
आपके इस छोटी उम्र में दीक्षा लेने का
कारण क्या है ?’
उसके उत्तर में मुनिराज ने कहा - 'मैं इस पुण्डरीकिणी नगरी में एक दरिद्र कुल में जन्मा था। मेरा नाम भीम है। एक बार अवसर मिलने पर मैंने एक मुनिराज से धर्म का उपदेश सुना। उस समय मुझे जातिस्मरण ज्ञान हो गया था। जिससे मुझे अपनी पूर्व भव की सब बातों का पता चल गया। मैं विचार करने लगा कि –
● मैं अपने पहले भव में भवदेव नाम का वैश्य पुत्र था, उस भव में मैंने रतिवेगा और सुकान्त को मार दिया।
● तत्पश्चात् जब वे मरकर कबूतर-कबूतरी हुए, तब मैं बिल्ली बनकर पूर्व भव के द्वेषवश उन्हें मार दिया।
● तत्पश्चात् वे हिरण्यवर्मा और प्रभावती हुए, तब मैं विद्युतचोर बना और जब वे दोनों मुनि-आर्यिका के वेश में थे, तब मैंने उन्हें जलती हुई चिता में जला दिया। इस महापाप के कारण महादुःखो का स्थान जो नरक है, वहाँ मैं गया और अनेक प्रकार के भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि के महान् कष्ट सहन करने पड़े। नरक में से निकलकर मुझे संसारचक्र में जो चक्कर लगाने पड़े, उससे मेरा आत्मा इतना संक्लेशित हो गया कि उसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता। उसी समय मैं विरक्त होकर दिगम्बर साधु हो गया।’
इस विचित्र कथा को सुनकर इस देवयुगल को बहुत आश्चर्य हुआ और उन्हें अवधिज्ञान द्वारा समस्त बातें स्पष्टरूप से ज्ञात हो गयीं – ‘हे प्रभु! जिनको आपने पहले कितनी ही बार मारा है, वे दोनों हम ही हैं’ – ऐसा कहकर उन्होंने भीममुनि की वन्दना की और दोनों स्वर्ग में वापस चले गये। वहाँ महामुनि भीम ने बारह भावनाओं का चिन्तवन करके, कठिन तपश्चर्या करके केवलज्ञान प्राप्त किया और घाति-अघाति कर्मों का नाश करके मोक्षपद प्राप्त किया।
अहा ! देखो, भव-भव में बैर के परिणाम धारण करके मनुष्य जीव को मारा, कबूतर के जीव को मारा और मुनि-आर्यिका को जिन्दा जला दिया – ऐसे पापी भवदेव के जीव ने भी क्षणभर में संसार के दुःख से विरक्त होकर द्रव्यदृष्टि के बल से आत्मध्यान लगाकर, इन जयकुमार और सुलोचना के जीव के पूर्व ही, भीम महामुनि होकर मोक्ष प्राप्त कर लिया। अहा ! वस्तुस्वरूप की अगाध महिमा का क्या कहना ! भव-भव में अन्य जीवों को मारनेवाला, स्वयं उनके पूर्व मोक्ष चला गया। यह सब निर्दोष त्रिकाली चैतन्य सामान्य स्वभाव के आश्रय का ही प्रताप है।
इस सम्पूर्ण वृतान्त का समापन करते हुए सुलोचना अपने स्वामी / पति जयकुमार को याद दिलाती है – हे नाथ! उस समय हम महामुनि भीम की वन्दना करके स्वर्ग में चले गये थे और स्वर्ग के सुख भोगकर, स्वर्ग से चयकर आप राजा सोमप्रभ के पुत्र कुमार जयदेव हुए और मैं राजा अकम्पन की पुत्री सुलोचना हुई हूँ। यही कारण है कि कबूतरों के जोड़े को देखकर अपने को जातिस्मरणज्ञान भी हो गया है। इस प्रकार अपने पूर्व भवों की कथा सुनकर वे दम्पति और उनके परिवारजन अत्यन्त सन्तुष्ट हुए।
एक बार अनेक राजाओं द्वारा पूजित राजा जयकुमार का चित्त संसार की क्षणभङ्गुरता की तरफ गया और इतना वैराग्यचित्त हो गया कि उन्होंने संसार को एकदम अनित्य समझकर जिनदीक्षा धारण करने का निर्णय कर लिया। अपने निर्णयानुसार वे श्री आदिनाथस्वामी के समवसरण में पहुँचे। भगवान् के श्रीमुख से धर्म श्रवण करते-करते, संसार शरीर और भोगों से विरक्त होकर दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली तथा थोड़े ही दिनों Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
चमत्कार चैतन्य का
में आदिनाथस्वामी के बहत्तरवें (72 वें) गणधर बनकर घातिकर्मों का नाश करके, केवलज्ञानी बन गये। सुलोचना भी आर्यिका व्रत धारणकर स्वर्ग में गयी और वहाँ से आकर मनुष्य होकर मुक्ति प्राप्त करेगी।
इस कथा से हमें यह बोध प्राप्त होता है कि एक समय के पापपरिणाम से पूर्णतः आत्मतत्त्व पापी नहीं हो जाता। पापपरिणाम के काल में भी निज शुद्ध चैतन्यसत्ता तो पाप के अभावस्वभावरूप विद्यमान है। उस शुद्ध चैतन्यसत्ता का अवलम्बन लेनेवाला जीव, पर्याय में पवित्रता प्रगट कर परमात्मा बन सकता है। इसलिए पात्र आत्मार्थी जीवों को स्वयं को एवं पर को भी पर्यायदृष्टि से देखने की आदत का परित्याग करके सबको द्रव्यस्वभाव से ही देखने की आदत डालना चाहिए। सम्यग्दर्शन एवं वीतरागता की प्राप्ति का यही एकमात्र उपाय है।●●
( - आदिपुराण भाग 2 में से)
जङ्गल में भी मुनिराज परम सुखी
किसी को ऐसा लगे कि जङ्गल में मुनिराज को अकेले कैसे अच्छा लगता
होगा? अरे भाई ! जङ्गल के बीच निजानन्द में झूलते मुनिराज तो परम सुखी हैं; जगत् के राग-द्वेष का शोरगुल वहाँ नहीं है। किसी परवस्तु के साथ आत्मा का मिलन ही नहीं है, इसलिए पर के सम्बन्ध बिना आत्मा स्वयमेव अकेला आप अपने में परम सुखी है। पर के सम्बन्ध में आत्मा को सुख हो – ऐसा उसका स्वरूप नहीं है। सम्यग्दृष्टि जीव अपने ऐसे आत्मा का अनुभव करते हैं और उसी को उपादेय मानते हैं। - पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, गुरुदेवश्री के वचनामृत, १७६, पृष्ठ १०९ Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
उअशोक-रोहिणी की कथा
विराधक बना आराधक
एक बार विपुलाचल पर्वत पर भगवान् महावीर प्रभु का समवसरण आया,
उसमें महावीर प्रभु गणधरों के साथ विराजमान थे। यह समाचार भगवान् महावीर के मौसा राजा श्रेणिक को प्राप्त होते ही वे तुरन्त समवसरण में गये और भगवान् महावीर को नमस्कार-स्तुति आदि करके वासूपूज्य भगवान् के गणधर अमृताश्रव का (अशोक का) चरित्र जानने की अभिलाषा व्यक्त की और उत्सुकतापूर्वक भगवान् का उत्तर सुनने लगे।
भगवान् कहते हैं कि - हे राजन्! इस देश में हस्तिनापुर नाम का सुन्दर नगर है। उसमें बीतशोक नाम का महागुणवान राजा राज्य करता था। उसकी विद्युतप्रभा नाम की सुन्दर और गुणवान रानी थी। इन दोनों के अशोक नामक गुणवान पुत्र था। उसी समय चम्पा नाम की एक नगरी थी। उसके राजा का नाम मधवा था।
उसकी श्रीमती नाम की रानी थी। उनके आठ पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्री का नाम रोहिणी था। रोहिणी गुणवान और रूपवती युवती थी। एक बार वह अष्टाह्निका पर्व में उपवास करके, उत्साह से जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करके, जिनधर्मी साधुओं को नमस्कार करके सभाभवन में बैठे हुए माता-पिता आदि के समीप आई। पिता ने स्नेहवश पुत्री रोहिणी को गोद में बिठाया। पिता, पुत्री को युवा हुई देखकर विचारने लगा कि ‘इस रूपवान कन्या को इसी के समान रूपवान किस वर को प्रदान करूँ ?’ राजा ने अपने मन्त्रियों को बुलाया और जब कन्या के लिए वर खोजने के विषय में चर्चा की, तब मन्त्री ने कहा - 'हे राजन! इस सुन्दर कन्या को इसके
विराधक बना आराधक
योग्य वर शोधने के लिए स्वयंवर मण्डप का अयोजन करके कन्या की पसन्द के योग्य वर से उसका विवाह करना उचित होगा।’ यह बात राजा को रुचिकर प्रतीत हुई; अतः देश-विदेश के राजकुमारों को आमन्त्रण भेजे गये। अनेक राजकुमार चम्पानगरी में आ पहुँचे। उनके लिए उचित आसन और खान-पान की व्यवस्था की गयी, साथ ही मणिमय सिंहासन संग्रहीत कर सभामण्डप तैयार किया गया। सभी राजकुमार सभामण्डप में आकर अपने-अपने आसन स्थान पर विराजमान हो गये। रोहिणी भी बहुमूल्य वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित होकर अपनी दासियोंसहित सभामण्डप में आ पहुँची। रोहिणी का रूप देखते ही, ‘मानो साक्षात् इन्द्राणी हो’ – ऐसा लगने से समस्त राजकुमार उसे उत्सुकता से टकटकी लगाकर देख रहे थे। दासी एक-एक राजकुमार का परिचय देती हुई आगे बढ़ती जा रही थी किन्तु रोहिणी का मन किसी राजकुमार पर नहीं ठहरता था। आगे बढ़ती हुए दासी ने कहा – ‘हे स्वामिनी ! यह बीतशोक राजा का पुत्र अशोक है, जो समस्त गुणों का सागर है। इसका रूप सहज ही कामदेव को पराजित करनेवाला है, मानो किसी देव अथवा विद्याधर जैसा रूप है।’ रोहिणी ने कुमार अशोक के रूप-गुण से प्रभावित होकर तुरन्त ही अशोककुमार को वरमाला पहना दी।
रोहिणी के पिता ने अशोककुमार के साथ उसका विवाह निश्चित कर दिया और अशोककुमार ने जिनेन्द्र भगवान् की महामह पूजा करके, मङ्गल मुहूर्त में राजकुमारी के साथ विवाह किया। तत्पश्चात् कितने ही समय तक अपने श्वसुर के यहाँ ही रहे। कुछ समय पश्चात् अशोक-रोहिणी ने अपने हस्तिनापुर नगर में आकर माता- पिता आदि परिवारजनों को प्रणाम किया। एक दिन पिता बीतशोक को उल्कापात देखकर वैराग्य भावना जागृत हुई। उन्होंने पुत्र अशोक को राजगद्दी पर बैठाकर जिनदीक्षा अङ्गीकार कर ली और उग्र तप करके कर्म नाश कर मुक्तावस्था को प्राप्त किया। पिता के दीक्षित होने पर अशोककुमार को हुआ शोक कुछ दिनों में दूर हुआ और उसने भले प्रकार राज्यभार सम्भाल लिया।
कालान्तर में रोहिणी के सुन्दर आठ पुत्र और चार पुत्रियाँ हुई। उनमें से सबसे छोटे पुत्र का नाम लोकपाल था। एक बार अशोक-रोहिणी अपने समस्त पुत्र-पुत्रियों के साथ राजमहल की छत पर बैठे हुए, मीठी-मीठी आनन्दकारी बातें कर रहे थे। इतने में रोहिणी ने नीचे गली में देखा कि अनेक स्त्रियाँ बालों को बिखेरकर घेरा बनाकर छाती कूटती हुई रुदन कर रही थी, आक्रन्द कर रही थी। यह देखकर रोहिणी को आश्चर्य हुआ कि यह किस प्रकार का नाटक-गान-तान है ? मुझे तो बहत्तर कलाओं का ज्ञान है परन्तु उनमें तो मैंने ऐसा नाटक-गान-तान देखा नहीं है; इस कारण उसने विस्मयतापूर्वक दासी से पूछा – ‘हे भद्रे ! यह किस प्रकार का नाटक अथवा गान-तान है ?’
दासी ने रोहिणी का भोलापन देखकर कहा – ‘पुत्री ! यह नाटक अथवा गान- तान नहीं, परन्तु कुछ दुःखी जीव, दुःख और शोक मना रहे हैं।’
रोहिणी फिर पूछती है – ‘दुःख और शोक क्या वस्तु है ?’
रोहिणी का ऐसा प्रश्न सुनकर गुस्से में आकर दासी बोली – ‘हे सुन्दरी ! तुझे उन्माद हुआ है। सत्य है, पाण्डित्य और ऐश्वर्य ऐसा ही होता है। अरे ! क्या तुझे लोकातिशयी सौभाग्य है कि तू दुःख और शोक क्या है – यह भी नहीं जानती और स्वर व भाषा को अलंकृत कर नाटक-नाटक बक रही है। क्या तुम इसी क्षण इस धरती पर जन्म ले रही हो ?’
दासी बसन्ततिलका की क्रोधपूर्ण बात सुनकर रोहिणी कहने लगी – ‘हे भद्रे ! तू मुझ पर क्रोध न कर, मेरे लिए आज भी यह प्रसङ्ग अदृष्ट और अश्रुत है; इसी कारण मैंने आपसे प्रश्न किया है, इसमें अहङ्कार की कोई बात नहीं है।’ तब दासी कहती है – ‘हे वत्स ! यह नाटक, प्रयोग अथवा सङ्गीत स्वर नहीं है परन्तु इष्ट बन्धु की मृत्यु से रोनेवाले को जो दुःख होता है, उसे शोक कहते हैं।’ रोहिणी फिर से पूछती है – ‘हे भद्रे ! मैं रुदन का अर्थ भी नहीं जानती; अतः रुदन का क्या अर्थ है, यह बता ।’
रोहिणी का यह प्रश्न पूरा होते ही राजा अशोक ने कहा कि 'शोक से जो Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
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रुदन होता है, उसका अर्थ मैं तुझे बताता हूँ’ - ऐसा कहकर उसने छोटे लोकपालकुमार को रोहिणी के हाथ से खींचकर छत से नीचे डाला, तब रोहिणी को बहुत ही दुःख और शोक हुआ। कुमार लोकपाल को तो देवियों ने आकर फूल की तरह झेल लिया और अभिषेक आदि से लोकपाल का सम्मान करके देवियाँ चली गयीं।
एक बार हस्तिनापुर में रूपकुमम और स्वर्णकुमम नामक दो चारण ऋद्धिधारी मुनियों का शुभागमन हुआ। मुनियों के आगमन से अत्यन्त हर्षित वनपाल ने राजा को यह शुभ समाचार दिये। समाचार सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने परिवारसहित वन में जाकर भक्तिपूर्वक मुनिराज की वन्दना की। तत्पश्चात् अवधिज्ञानी रूपकुमम मुनिराज से विनयपूर्वक प्रश्न किया - ‘हे महाराज ! मैंने और मेरी रानी रोहिणी ने पूर्व भव में प्राणियों पर दया करनेवाले किस प्रकार के उत्तम धर्म का सेवन किया था, वह कृपा करके बतलाओ ।’
उत्तर स्वरूप मुनिराज ने
कहा 'हे भव्य ! इस हस्तिनापुर में
पहले वसुपाल नाम का राजा था,
उसकी रानी का नाम वसुमति था,
उसका भाई धनमित्र था जो कि
राजसेठ था, उसके पूतिगन्धा
नामक एक कन्या थी। पूतिगन्धा
के शरीर में से मरे हुए कोढ़ी कुत्ते
के शरीर की दुर्गन्ध जैसी भीषण दुर्गन्ध निकलती थी, इस कारण आकाश भी दुर्गन्धमय हो जाता था।
उसी नगर में एक वसुमित्र नाम का धनवान सेठ रहता था। उसकी पत्नी का नाम वसुमति था। उन दोनों के श्रीषेण नाम का पुत्र था, वह सप्त व्यसनी, महापापी था। एक बार उसको चोरी करते हुए कोतवाल ने पकड़ लिया और उसे मजबूत Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
साँकल में बाँधकर नगर में घूमा रहा था। उसी समय पूतिगन्धा के पिता ने श्रीषेण से कहा कि – ‘यदि तुम मेरी पुत्री के साथ विवाह करो तो मैं तुम्हें इन बन्धन से छुड़ा दूँगा।’
मार के भय से त्रसित श्रीषेण ने कहा – ‘हे मामा! यदि तुम मुझे छुड़ाओगे तो मैं तुम्हारी पुत्री के साथ विवाह करूँगा।’
पूतिगन्धा के पिता ने राजा से प्रार्थना करके श्रीषेण को बन्धनमुक्त करा दिया और पूतिगन्धा से उसका विवाह कर दिया। विवाहोपरान्त पूतिगन्धा की उसकी दुर्गन्ध के कारण वह एक रात्रि भी उसके साथ नहीं रह सका; इस कारण प्रातःकाल होते ही उसे छोड़कर चल दिया। इस घटना से व्यथित हुई पूतिगन्धा दीन-हीन होकर पिता के घर में अपने दिन व्यतीत करने लगी।
एक बार पिहितास्रव नामक चारणऋद्धिधारक मुनिराज संघसहित नगरी में पधारे। उनके आगमन के समाचार मिलते ही राजा आदि सब मुनि-वन्दना करने के लिए वन में गये। उनके साथ पूतिगन्धा भी अपने माता-पिता के साथ मुनि वन्दना के लिए गयी। पूतिगन्धा ने मुनिराज की वन्दना करके उपदेश सुनने के पश्चात् विनय से प्रश्न किया – ‘हे प्रभु! मुझे अपने पूर्व भव का वह वृत्तान्त बताओ, जिसके कारण में पूतिगन्धा होकर महान् दुःख भोग रही हूँ।’
मुनिराज महान् वैराग्य को उत्पन्न करनेवाली पूतिगन्धा के पूर्व भव की बात बताते हुए कहने लगे – 'हे पुत्री! मैं तुझे दुर्गन्धमयी शरीर की प्राप्ति का कारण बताता हूँ, तू उसे ध्यान देकर सुन!
भरतक्षेत्र में सौराष्ट्र नाम के देश में गिरनार नाम का एक नगर था। उसके राजा का नाम भूपाल था और वह विशुद्ध सम्यग्दृष्टि था। उस राजा के राज्य में एक गङ्गदत्त नाम का सेठ था, उसकी पत्नी का नाम सिन्धुमति था। सिन्धुमति को अपने रूप-यौवन-विलास आदि का बहुत गर्व था।
एक बार अनेक महिनों के उपवासी समाधिगुप्त मुनिराज पारणा के लिए निकले Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
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थे। उस समय राजा के साथ वन में जा रहे गङ्गदत्त सेठ ने मुनि को अपने घर की तरफ आते देखकर अपनी पत्नी से कहा - ‘हे प्रिये ! मुनिराज आहार के लिये पधार रहे हैं, तुम उन्हें विधिपूर्वक आहार देने के बाद वन में आ जाना।’ पति के कहने से सिन्धुमति वापिस तो लौट गयी, परन्तु उसे मन ही मन बहुत ही क्रोध आ गया। वह मुनिराज का पड़गाहन करके अपने घर में गयी और भैंस के लिए बनाये हुए खूब मीठा आदि डाले हुए खाने के साथ कड़वी तुम्बी मिलाकर देने को तैयार हुई। उसकी दासी द्वारा बहुत रोके जाने पर भी उसने क्रोध से मुनिराज को वह आहार दे दिया। मुनिराज ने हमेशा के लिए आहार का प्रत्याख्यान लेकर, समाधिमरणपूर्वक आराधनाओं का आराधन करके देवपर्याय को धारण किया।
जब राजा वन में से वापस आये और उन्हें ज्ञात हुआ कि गङ्गदत्त की पत्नी सिन्धुमति ने कड़वी तुम्बी का आहार देकर मुनिराज की हत्या की है तो उन्होंने क्रोधित होकर सिन्धुमति का सिर मुण्डवाकर गधे पर बैठाकर उस दुराचारिणी को मारते-मारते समस्त नगरजनों को दिखाने के लिए नगर में घुमाया। तत्पश्चात् पापोदय से सिन्धुमति को उदम्बर कोढ़ हो गया और सातवें दिन वह मरकर छठवें नरक में बाईस सागर की आयुष्य की धारक नारकी हुई। तत्पश्चात् सिंहनी होकर सातों नरकों में परिभ्रमण किया। वहाँ से निकलकर दो बार तिर्यञ्चगति में कुत्ती हुई, सूकरी हुई, सियालनी हुई, चुहिया हुई, हथिनी हुई, गधी हुई और फिर वैश्या होकर, इस भव में दुःखों से परिपूर्ण दुर्गन्ध शरीरवाली और परिवारजनों से निन्दनीय तू पूतिगन्धा हुई है।’
मुनिराज के मुख से पूर्व भव की कथा सुनकर पूतिगन्धा का मन संसार में अतिविरक्त हो गया और उसने मुनिराज से पूछा - ‘भगवान् ! आप कृपा करके बताओ कि मैं पूर्व में किये हुए पापकर्मों से किस पुण्य कार्य से छूटूंगी ?’ पूतिगन्धा की विनती सुनकर करुणासागर मुनिराज ने कहा - 'बेटा ! यदि तू वास्तव में संसार के दुःखों से छूटना चाहती हो और सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति प्रीति चाहती हो तो रोहिणी
नक्षत्र में उपवास कर ! इससे तू फिर
से दुःखों को प्राप्त नहीं करेगी।’
तत्पश्चात् मुनिराज ने उसे
रोहिणी नक्षत्र में उपवास की विधि
बताई, तद्नुसार स्वीकार करते हुए
भक्तिरस से प्रसन्न होती पूतिगन्धा
की आँखों में आँसू आ गये।
पूतिगन्धा ने पुनः पूछा – ‘भगवान् ! मेरी ही तरह अन्य किसी ने रोहिणी व्रत का अनुष्ठान किया हो तो कृपा करके कहो।’
उत्तर में मुनिराज ने कहा – 'हे पुत्री ! समस्त दुःखों को दूर करनेवाले इस व्रत का विधान पूतिगन्धकुमार ने बहुत ही उत्साह से पालन किया है, उसकी कथा इस प्रकार है –
जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में शटकपुर नाम के देश के सिंहपुर नागर में सिंहसेन राजा के पुत्र पूतिगन्धकुमार को तेरी तरह ही शरीर में बहुत दुर्गन्ध निकलती थी। एक बार विमलवाहन मुनिराज को केवलज्ञान प्रगट होने पर देवतागण आकाशमार्ग के केवलज्ञान कल्याणक का उत्सव मनाने जा रहे थे। उस समय पूतिगन्धकुमार राजभवन के शिखर पर बैठे थे। उन्होंने प्रभा से शोभित देवकुमारों को जाते देखा और देखते ही मूच्छित हो गये। जब चन्दन आदि शीतोपचार करने से उनकी मूर्च्छा दूर हुई तो उन्हें तुरन्त ही जातिस्मरण हो गया और वे अपने पिता के साथ केवली भगवान् के दर्शन करने गये।
दोनों पिता-पुत्र केवली भगवान् का भक्ति से दर्शन-पूजनादि करके उपदेश सुनने बैठ गये। उपदेश पूर्ण होने पर सिंहसेन महाराज ने भक्तिपूर्वक जिनराज से मनोगत बात पूछी – ‘हे प्रभो! मेरा पुत्र किस कारण पूतिगन्ध हुआ और मूच्छित होकर सचेत होकर यहाँ आया; यह सब वृतान्त कृपा करके कहो ?’
विराधक बना आराधक
राजा के प्रश्न के उत्तर में जिनराज
ने कहा – 'हे राजन् ! तेरे पुत्र ने पूर्व भव
में मुनिराज की हत्या की थी, उस पापोदय
के कारण यह अनेक योनियों में भ्रमण
करते हुए तुम्हारे यहाँ पूतिगन्ध हुआ है और
आकाश में जाते हुए देवकुमारों को देखकर
इसे जातिस्मरणज्ञान होने से नरक की वेदना
का स्मरण होने पर अत्यन्त भयभीत होकर
मूच्छित हुआ था।
सिंहसेन राजा ने जिनराज से पूछा – ‘हे देव ! पूर्व भव में पूतिगन्ध ने किस कारण से मुनिराज की हत्या की थी ?’
उत्तर में जिनराज ने कहा – 'विन्ध्याचल पर्वत पर दिव्य अशोकवन है। उसमें दो मदोन्मत्त हाथी रहते थे। एक बार वे दोनों हाथी उसी प्रदेश की विशाल नदी में गये और जल के लिए परस्पर लड़ पड़े। वे इतने जोर से लड़े कि लड़ते – लड़ते मर गये। मरकर एक बिलाव हुआ दूसरा चूहा; दूसरी बार एक भयङ्कर सर्प हुआ और दूसरा नेवला; तत्पश्चात् बाज और बगुला और फिर दोनों कबूतर हुए। कनकपुर नगर में सोमभ्रम राजा था, उसके नाम का पुरोहित सोमभूति था। वे दोनों कबूतर मरकर सोमभूति के यहाँ पुत्र हुए। उनमें से एक का नाम सोमशर्मा और दूसरे का नाम सोमदत्त था। वे विद्याभ्यास करके विज्ञान में पारङ्गत हुए। पिता सोमभूति की मृत्यु होने पर छोटे भाई सोमदत्त को पुरोहित पद मिला। जो बड़ा भाई सोमशर्मा था, उसने छोटे भाई सोमदत्त की स्त्री लक्ष्मीमति के साथ अनुचित सम्बन्ध स्थापित किया था। इसलिए सोमशर्मा की भोली पत्नी दीपा सोमदत्त को बारम्बार कहती थी कि तुम्हारी दुराचारिणी स्त्री के साथ मेरे पति का अनुचित सम्बन्ध है। यह जानकर सोमदत्त को अत्यन्त वैराग्य हुआ और उसने धर्मसेन मुनिराज के समीप जिनदीक्षा अङ्गीकार कर ली।
जब राजा को सोमदत्त के दीक्षा ले लेने के समाचार ज्ञात हुए तो उसने उसके बड़े भाई सोमशर्मा को पुरोहित का पद दे दिया।
शकटदेश के वसुपाल राजा के यहाँ एक सुन्दर हाथी था। सोमप्रभ राजा ने दूत को भेजकर उस हाथी की माँग की, किन्तु राजा वसुपाल ने उसे देने से इन्कार कर दिया; इस कारण क्रोधित होकर सोमप्रभ राजा ने राजा वसुपाल पर चढ़ाई कर दी। सन्ध्या के समय राजा की सेना ने वन में पड़ाव डाला। पुरोहित सोमशर्मा की नजर वहाँ ध्यानस्थ मुनिराज सोमदत्त पर पड़ी। मुनिराज को देखते ही सोमशर्मा क्रोध में लाल-पीला हो गया और उसने सोमप्रभ राजा से कहा – ‘हे राजन् ! हम बलवान राजा पर चढ़ाई करने निकले हैं किन्तु इन नग्न मुनि के दर्शन से अपशकुन हुआ है; इस कारण हमें इस मुनि को मारकर इसका खून दशों दिशाओं में अर्पण करके शान्ति विधान करना चाहिए।’
पुरोहित के हिंसामय वचन सुनकर राजा ने कान बन्द कर लिये। तब एक निमित्तज्ञ विश्वदेव ब्राह्मण ने राजा से कहा - ‘राजन् ! सोमशर्मा को शकुन-अपशकुन का कुछ भी ज्ञान नहीं है। अरे ! यह मुनिराज तो समस्त प्राणियों का हित करनेवाले हैं, इनके दर्शन से तो अपना इच्छित कार्य तुरन्त पूर्ण हो जाए – ऐसे शकुन हुए हैं।’ इस सन्दर्भ में उसने अनेक शास्त्राधार और युक्तियाँ देकर अपनी बात की पुष्टि करते हुए कहा – 'राजन! इन मुनिराज के महान् शकुन होने से तो वसुपाल राजा स्वयं हाथी देने के लिए यहाँ आना
चाहिए – ऐसा यह महान् शकुन है।’
प्रभात होते ही वसुपाल राजा
ने सोमप्रभ राजा को हाथी भेंट करके
सम्मान किया और प्रसन्न होकर राजा
ने वापिस अपने नगर की तरफ
प्रस्थान कर दिया।
विराधक बना आराधक
पुरोहित सोमशर्मा ने पूर्व के वैर के कारण ध्यानाविष्ट मुनिराज की तलवार से हत्या कर दी। प्रातःकाल जब महाराज सोमप्रभ को ज्ञात हुआ कि सोमशर्मा ने मुनिराज की हत्या की है तो इस दुष्कृत्य से कुपित होकर राजा ने सोमशर्मा को मुनिहिंसा के कारण पाँच प्रकार का दण्ड दिया और दुष्ट बुद्धि सोमशर्मा को मुनिहिंसा के पाप से गलित कोढ़ निकल आया। वह सात दिन तक भयानक पीड़ा भोगते हुए मरकर तुरन्त ही सातवें नरक पहुँच गया।
वह महादुःख भोगकर नरक से निकलकर एक हजार योजन का मच्छ हुआ।
वहाँ अनेक प्रकार की पीड़ा सहन करके मरकर छठवें नरक गया। वहाँ बाईस सागर तक महान् दुःख भोगकर, वहाँ से निकलकर भयानक सिंह हुआ और वहाँ की आयु पूर्व करके पाँचवें नरक गया। वहाँ भी असहनीय दुःख भोगकर बाघ हुआ वहाँ से मरकर तीसरे नरक का नारकी हुआ। वहाँ से निकलकर दुष्ट विकराल पक्षी हुआ और वहाँ से मरकर दूसरे नरक का नारकी हुआ। वहाँ भी दुःख भोगकर सफेद बगुला हुआ, वहाँ भी पाप करके पहले नरक गया। हे राजन् ! वहाँ एक सागर पर्यन्त दुःख भोगकर वहाँ से निकलकर तुम्हारे यहाँ पूतिगन्धकुमार हुआ है।’ इस प्रकार पूर्व भव के पापों की बात सुनकर विनय-भक्तिपूर्वक पूतिगन्ध कहने लगा – ‘हे जिनराज ! पूर्व में किये हुए पापों का नाश किस प्रकार हो सकता है ?’ जिनराज ने कहा – ‘हे कुमार ! यदि तू दुःखों से छूटना चाहता है तो रोहिणी नक्षत्र में उपवास का विधान कर।’
इस प्रकार जिनराज के उपदेश से पूतिगन्धकुमार ने सम्यक्त्व प्राप्त करके रोहिणी व्रत धारण किया ओर धर्म का पालन करते-करते मात्र एक माह ही हुआ था कि उसे अत्यन्त विरक्ति होने से अपने विजय नाम के पुत्र को राजगद्दी पर बैठाकर जिनदीक्षा लेकर चार प्रकार की आराधना करके सल्लेखनामरण प्राप्त कर प्राणत स्वर्ग में बाईस सागर की स्थितिवाला ऋद्धिधारी देव हुआ। बाईस सागर तक स्वर्ग में विपुल भोग-भोगकर वहाँ ये चयकर विदेहक्षेत्र में पुष्पकलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में विमलकीर्ति राजा का अर्ककीर्ति नाम का पुत्र हुआ।
अर्ककीर्ति अत्यन्त रूपवान, लोगों के मन को हरनेवाला था। अर्ककीर्ति को प्राणों से प्रिय मेघसेन नाम का मित्र था। दोनों मित्र एक साथ ही विद्याभ्यास करके पारङ्गत हुए।
एक बार मथुरा में सुमन्दिर नाम के सेठ पुत्र का विवाह सुशीला और सुमति नाम की दो कन्याओं के साथ हो रहा था। उन कन्याओं को राजकुमार अर्ककीर्ति ने देख लिया और उसके द्वारा मित्र मेघसेन को सङ्केत करने पर मेघसेन उन दोनों कन्याओं को उठा लाया, परन्तु मेघसेन को उन कन्याओं को उठाते हुए ग्रामवासियों ने देख लिया; अतः गाँव के लोगों ने मेघसेन से उन कन्याओं को तो छुड़ा लिया और पुण्डरीकिणी नगरी में आकर विमलकीर्ति राजा को यह सारा वृतान्त कह सुनाया। राजा ने क्रोधित होकर राजकुमार और उसके मित्र को देश से निष्कासित कर दिया। दोनों मित्र वहाँ से निकलकर वीतशोकपुर आये। वहाँ के राजा विमलवाहन की जयमति आदि आठ रूपवान, गुणवान कन्याएँ चन्द्रबेध करनेवाले को विवाही जानी थी। इसके लिए अनेक राजकुमार आये थे, परन्तु किसी से भी चन्द्रबेध नहीं हो सका था। तत्पश्चात् अर्ककीर्ति ने आकर चन्द्र का भेदन किया; इस कारण राजा ने प्रतिज्ञानुसार आठों कन्याओं का विवाह अर्ककीर्ति के साथ कर दिया। विवाहोपरान्त कितने ही समय अर्ककीर्ति अपने श्वसुर के यहाँ रहा।
एक बार अर्ककीर्ति ने उपवास करके जिनमन्दिर में भगवान् की पूजा की और रात्रि में मन्दिर में सो गया। वहाँ सिमलेखा नाम की एक विद्याधरी आई और निद्राधीन कुमार को लेकर विजयार्द्ध पर्वत के ऊपर जिनमन्दिर में छोड़ गयी। जब अर्ककीर्ति जागृत हुआ तब ‘अपने को विजयार्द्ध के जिनमन्दिर में’ जानकर वहाँ के मन्दिर में दर्शन करने चला गया। उसके पुण्य-प्रभाव से वहाँ के वज्रमय कपाट खुल गये। उसको पुण्यवन्त जानकर वहाँ के राजसेवक राजा के पास ले गये और राजा ने उसका स्वागत किया तथा अपनी वीतशोका नाम की प्रिय पुत्री के साथ-साथ अपनी इकतीस कन्याओं का विवाह भी उसके साथ कर दिया।
अर्ककीर्तिकुमार ने पाँच वर्ष वहाँ सुखपूर्वक व्यतीत किये।
विराधक बना आराधक
एक दिन पिता की याद आने पर वह अपने देश के लिए रवाना हुआ। रास्ते में अञ्जनगिरी नाम के नगर में पहुँचा। वहाँ पागल हाथी को वश में करके अपने पराक्रम से वहाँ के राजा की आठ कन्याओं से विवाह किया और अपनी पुण्डरीकिणी नगरी में आ गया।
एक दिन कुमार अर्ककीर्ति ने नटनी का रूप धारण करके पिता की सभा में जाकर लोगों के मन में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला नृत्य किया और तत्पश्चात् अपने पिता राजा विमलकीर्ति की गायों को घेर लिया। तब राजा ने गायों को छुड़ाने के लिए उससे युद्ध किया। पिता-पुत्र आमन-सामने लड़ने लगे। तब अनेक जीवों का घात होता देखकर कुमार ने अपना नाम लिखित बाण पिता को भेजा। उसे देखकर, पत्र पढ़कर पिता का हृदय आनन्द से भर गया और दोनों पिता-पुत्र एक-दूसरे से अत्यन्त स्नेहपूर्वक मिले, क्षेम-कुशल पूछा और आनन्दपूर्वक राजभवन में गये। महाराज विमलकीर्ति ने अपने पुत्र के आगमन की प्रसन्नता में इच्छानुसार दान दिया और अपने विजयी प्रिय पुत्र अर्ककीर्ति को राज्यलक्ष्मी समर्पित करके स्वयं श्रीधर मुनिराज के समीप जिनदीक्षा अङ्गीकार करके, कठिन तपश्चर्या करके अन्त में निर्वाण पधारे।
कुमार अर्ककीर्ति भी क्रम-क्रम से चक्रवर्ती की विभूति प्राप्त करके आनन्द से साम्राज्य में रहे। एक दिना संसार की क्षणभङ्गुरता का प्रसङ्ग देखकर अत्यन्त ही वैराग्य होने पर, अपने पुत्र को राज्यभार सौंपकर, जिनदीक्षा लेकर उग्र तपश्चर्यापूर्वक आत्मसाधना करने लगे। अन्त समय में सल्लेखनामरणपूर्वक शरीर का परित्याग कर बाईस सागर की स्थितियुत अच्युत स्वर्ग में देव हुए।
पूतिगन्धा ने भी श्रावकों के व्रत का पालन किया तथा रोहिणी व्रत के पालन से समाधिमरण करके अच्यूत स्वर्ग में पन्द्रह पल्योपम स्थितियुत, पूर्व के अर्ककीर्ति कुमार जो देव हुए थे, उनकी महादेवी हुई और उनके साथ मनोवाञ्छित भोग भोगे। फिर वहाँ से चयकर उस देव का तो अशोककुमार के रूप में जन्म हुआ और पहले Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
भव की पूतिगन्धा स्वर्ग में से चयकर चम्पानगरी के मधवा राजा की रोहिणी नाम की पुत्री हुई, जो तुम्हारे पास ही बैठी है।
राजा अशोक, मुनिराज द्वारा अपने भवान्तरों को सुनकर अपने शुभाशुभपरिणामों व उनके फलों को जानकर संसार से उदास होकर भी दीक्षा न ले सके और रानी रोहिणी भी पूर्व भवों को सुनकर अन्तर में उदास हो गयी, पर राजा अशोक से अतिराग होने के कारण दीक्षा लेने का भाव होने पर भी दीक्षा न ले सकी। अतः वे दोनों मुनिराज को नमस्कार करके तब तो लौटकर हस्तिनापुर आ गये।
एक दिन की बात है कि राजा-रानी सिंहासन पर बैठे थे, इतने में रोहिणी ने अशोक के कान के पास चमकता हुआ सफेद बाल देखा और वह बाल तोड़कर राजा अशोक के हाथ में दिया। सफेद बाल देखकर, अशोक को एकदम वैराग्य जागृत हो गया और वह संसार, शरीर, भोगों की निन्दा करने लगा। उसी समय वनपाल ने आकर राजा से कहा -
‘हे राजन् ! भगवान् वासूपूज्य अपने उद्यान में पधारे हैं।’ राजा से यह सुखद समाचार सुनकर सिंहासन से उतरकर भगवान् की दिशा में नमस्कार किया, वनपाल को ईनाम दिया और सम्पूर्ण नगर में आनन्दभैरी बजाकर भगवान् के पधारने की सूचना दी।
राजा अशोक सम्पूर्ण राज्यलक्ष्मी, लोकपालकुमार को देकर वासूपूज्य भगवान् के समवसरण में पहुँचे। वहाँ भगवान् की तीन प्रदक्षिणा करके भक्तिपूर्वक नमस्कार करके जिनदीक्षा अङ्गीकार की और वासूपूज्य भगवान् के अमृतास्रव नामक गणधर हुए। उग्र तपश्चर्या करके अन्त में समस्त कर्मों का अभाव करके निर्वाणधाम पधारे। महारानी रोहिणी ने भी समस्त परिग्रह छोड़कर भगवान् को नमस्कार करके सुमति आर्यिका से दीक्षा ग्रहण की और कठोर तपश्चर्या करके अन्त में सल्लेखनापूर्वक शरीर का परित्याग करके अच्युत स्वर्ग में देवपर्याय धारण की और वहाँ से आकर मुक्ति प्राप्त करेगी।
विराधक बना आराधक
इस प्रकार घोर पाप करनेवाले
जीव भी, जिनधर्म की शरण लेने पर
शाश्वत सुख-मोक्षलक्ष्मी को वरते हैं।
पूज्य गुरुदेवश्री कहते हैं कि हे
भाई! घोर विकारभाव भी आत्मा के
ऊपर-ऊपर तैरते हैं, वे आत्मस्वभाव में
कभी भी प्रवेश नहीं करते, पर्याय में ही
रहते हैं और पर्याय स्वयं क्षणवर्ती है।
अतः यदि यह जीव अपने स्वभाव पर दृष्टि करे तो पर्याय के दुःख स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं क्योंकि वे स्वप्न के समान अत्यन्त क्षणभङ्गुर हैं। नट के स्वाङ्गों की तरह क्षणिक स्वाङ्गरूप होने से अगले ही समय बदल जाते हैं। आत्मा की शक्ति सामर्थ्य तो सदा शुद्ध ही है, उस शुद्ध परमेश्वर शक्ति का विश्वास करने पर, स्वानुभूति करने पर आत्मा पर्याय में साक्षात् परमेश्वर हो जाता है। ऐसा अद्भुत आश्चर्यकारी आत्मा का स्वरूप है।
कुमार अशोक की तरह हमें भी ऐसे अपने अद्भुत आत्मस्वरूप को पहिचान कर उसमें अपनापन स्थापित कर शाश्वतसुख को प्राप्त करना चाहिए। •
यशोधर और चन्द्रमति की कथा
5 मत करो पाप का अनुमोदन
एक दिन की बात है कि यशोमति अपने अन्तःपुर के साथ उद्यान में क्रीड़ा करने के लिए आया। उसी समय चन्द्रकर्मा भी मुर्गा युगल को लोहखण्ड के पिंजरे में बन्द करके उद्यान में आया। यहाँ आकर चन्द्रकर्मा ने रेशमी वस्त्र के समान अनेक रङ्गों से उज्ज्वल एक मनोहर भवन देखा। चन्द्रकर्मा ने इस प्रसाद के पूर्व द्वार में स्थित मणियों से उज्ज्वल, आकाश के समान स्वच्छ और विचित्र पट मण्डप में परस्पर प्रेमासक्त इस मुर्गा युगल को छोड़ दिया तथा वह मुर्गा युगल की मन्द-मन्द बाँग पुकारने लगा। इतने में ही चन्द्रकर्मा ने अशोकवृक्ष के नीचे
खड़गासन में स्थित एक मुनिराज को देखा। मुनिराज के
दोनों हाथ नीचे की ओर लटक रहे थे और दृष्टि नासाग्र
थी। वे दयालु थे, उन्होंने समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त
कर ली थी।
चन्द्रकर्मा ने मुनिराज को देखा और मन बिना
उनकी वन्दना की तथा निष्ठुर हृदय से उनके सम्बन्ध में
विचारने लगा कि मनुष्य के मन में डर उत्पन्न करनेवाले
प्रचण्ड सर्प के समान इस मुनि ने राजा के निवास स्थान को अपवित्र किया है। वह इस प्रकार विचार कर ही रहा था, इतने में मुनिराज को योग पूर्ण हो गया। चन्द्रकर्मा ने मुनिराज को ध्यान में से बाहर आते देखा और अत्यन्त निष्ठुर मन से उन कामदेव विजेता मुनिराज से कहा कि - 'हे मुनिराज ! आप लोक प्रसिद्ध हो और Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
मत करो पाप का अनुमोदन
जनता आपको मानती है-पूजती है, फिर भी आप क्या ध्यान करते हो ?’
मुनिराज, चन्द्रकर्मा का यह प्रश्न सुनकर विशुद्ध हृदय से उसे कहने लगे - ‘हे भद्र ! तूने जो बात पूछी है, वह तुझे बताता हूँ, तू सावधान होकर एक चित्त से सुन । भद्र ! मैंने अपने ध्यान में यह विचार किया कि इस असार संसार में परिभ्रमण करते हुए अनन्त शरीर धारण किये और छोड़े तथा अनेक योनियों में जो दुःख सहन किये, उन दुःखों से मुक्ति कैसे पायी जा सकती है ?’
मुनिराज की बात सुनकर चन्द्रकर्मा पूछने लगा- ‘हे साधु ! क्या शरीर से अन्य भी कोई जीव वस्तु है ? शरीर उससे भिन्न है ?’
मुनिराज अवधिज्ञानी तथा ग्यारह अङ्ग के धारक थे और समस्त प्रकार के सन्देह को दूर करनेवाले थे। जब उन्होंने चन्द्रकर्मा का प्रश्न सुना तो स्पष्ट शब्दों में कहने लगे - ‘हे भोले मानव ! तुझे इस सम्बन्ध में जरा भी सन्देह नहीं करना चाहिए। तू विश्वास रख कि शरीर एक अलग वस्तु है और जीव एक अलग वस्तु है।’
परन्तु चन्द्रकर्मा नहीं माना और वह मुनिराज से कहने लगा- ‘योगिराज ! न तो जीव अलग है और न शरीर अलग है, परन्तु अनेक योनिरूप वृक्षों से मण्डित संसाररूपी वन में घूमनेवाले प्राणियों की जो सजीव वस्तु है, वह शरीर ही है।’ वह एक उदाहरण देकर अपनी बात कहने लगा- ‘मुनिराज ! मैंने एक चोर को एक कोठी में बन्द कर दिया और उस कोठी के चारों ओर लाख जड़ दी, फिर उसमें एक छेद किया, अब उस कोठी में पड़ा हुआ चोर मर गया, परन्तु मुनिराज ! मैंने कहीं भी उस छेद में से उसके जीव को निकलते नहीं देखा। अतः योगीराज ! मैं तो इस घटना से यह सत्य समझता हूँ कि वही जीव है और वही शरीर है, दोनों भिन्न-भिन्न नहीं हैं।’
योगीराज ने जब चन्द्रकर्मा की बात सुनी तो वे कहने लगे कि - 'हे भद्र ! तू उसी कोठी में एक मनुष्य को शंख देकर बैठा दे और उससे कह कि तू बहुत प्रसन्नता से उस शंख को फूँक। जब वह शंख बजाने लगे, तब उसकी आवाज को तू अवश्य सुनेगा, परन्तु उस आवाज को तू उस छिद्र में से निकलते हुए नहीं देख सकेगा, अन्य कोई भी नहीं देख सकेगा। भद्र ! जिस प्रकार आवाज बाहर निकलने पर भी देखी नहीं जा सकती; उसी Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
प्रकार शरीर में से बाहर निकलते हुए जीव को भी कोई नहीं देख सकता।’ चन्द्रकर्मा, मुनिराज का यह दृष्टान्त सुनकर कहने लगा - ‘योगीराज ! अब मैं जो दृष्टान्त आपसे कहनेवाला हूँ, उससे मेरी बात की सत्यता का स्पष्टीकरण होता है। मुनिराज ! मैंने एक सजीव चोर को तराजू में तोला, फिर उसको जीव रहित कर दिया परन्तु दोनों स्थितियों में वजन एक समान ही रहा। हे मुनिराज ! मेरे इस कथन से आप विश्वास करें कि जीव है, वही शरीर है, अर्थात् दोनों एक हैं।’
मुनिराज ने चन्द्रकर्मा का दृष्टान्त बहुत ही ध्यान से सुना, फिर उससे कहने लगे कि - ‘भद्र ! अब तू मेरा मनोहारी उदाहरण सुन ! एक गोपाल ने चमड़े की थैली हवा से भरी और उसे तराजू में तोला, फिर उसमें से हवा निकालकर तराजू में तोला - दोनों अवस्थाओं में वजन एक समान ही रहा। इसलिए हे भद्र ! जिस प्रकार चमड़े की थैली हवा से भरने पर भी उतनी ही रहती है, उसी प्रकार अजीव और सजीव मनुष्य भी उतना ही रहता है। जीव, शरीर में रहे अथवा न रहे; वजन में कोई अन्तर नहीं पड़ता।’ मुनिराज कहने लगे - ‘हे भद्र ! मेरी बात पर विश्वास कर कि जीव अलग वस्तु है और शरीर अलग वस्तु है - दोनों एक नहीं हैं।’
योगीराज की यह बात सुनकर
चन्द्रकर्मा कहने लगा कि - 'हे महाराज !
मेरी बात सुन लो, मैंने एक चोर के शरीर
को काट दिया और उसके बहुत छोटे-
छोटे टुकड़े किये तो शरीर के बाहर या
अन्दर कहीं जीव नाम की वस्तु नहीं दिखी।
मुनिराज ! जिस प्रकार एक शरीर के छोटे-
छोटे टुकड़े करने पर भी जीव नहीं दिखता है, अतः इससे ही सिद्ध होता है कि शरीर और जीव एक है।’
योगीराज ने चन्द्रकर्मा का यह उदाहरण सुना और फिर वे कहने लगे कि - 'भद्र ! अब मेरा भी एक अत्यन्त स्पष्ट उदाहरण सुन ! एक मनुष्य एक अरणी बाँस को काटता Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
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है, परन्तु उसके भीतर रहनेवाली अग्नि उसे नहीं दिखती । तत्पश्चात् वह अरणी बाँस के छोटे-छोटे टुकड़े भी कर देता है, तथापि उसके भीतर की अग्नि उसे नहीं दिखती ।’ मुनिराज कहने लगे कि – हे भद्र ! जिस प्रकार अरणी बांस में अग्नि होने पर भी उसको अग्नि नहीं दिखती; उसी प्रकार खण्ड-खण्ड शरीर में जीव विद्यमान होने पर भी इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं होने से मनुष्य को नहीं दिखता है । हे आर्य ! इस दृष्टान्त से तू मेरी बात को सत्य समझ कि जीव और शरीर अलग-अलग है ।’
मुनिराज की यह बात सुनकर चन्द्रकर्मा कहने लगा कि – ‘हे देव ! मैं तो निरुत्तर हो गया । अब आप बताओ कि मैं क्या करूँ ? भगवान् ! अब आप मुझ पर प्रसन्न होओ ।’ चन्द्रकर्मा की बात सुनकर मुनिराज उसके प्रति दयार्द्र हो गये और कहने लगे – ‘महाभाग ! अब तुम धर्म करो, क्योंकि धर्म ही समस्त प्राणियों का बन्धु है ।’ तब चन्द्रकर्मा ने मुनिराज की सेवा में निवेदन किया कि – ‘भगवान् ! आप मुझे स्पष्टरूप से धर्म और अधर्म का फल समझाओ ।’
मुनिराज कहने लगे कि – ‘सौभाग्य, सम्पत्ति, दीर्घायु, निर्मलयश, वशीकरण, आरोग्य – यह सब मनुष्य को धर्म से प्राप्त होते हैं और दरिद्रता, कुरूपता, दुर्भाग्य, बन्धुहीनता आदि सब मनुष्य को अधर्म से प्राप्त होता है ।’
चन्द्रकर्मा ने जब मुनिराज से धर्म-अधर्म का फल सुना तो मुनिभक्ति के कारण उसका शरीर रोमाञ्चित हो गया और वह फिर कहने लगा – ‘भगवान् ! आप तो संसार समुद्र पार करानेवाले हो, अतः मेरे गृहस्थ जीवन में मुझसे जो धर्म हो सके, उस विषय में कुछ उपदेश दो ।’
चन्द्रकर्मा की विनती सुनकर ज्ञानी योगीराज के मन में करुणा उत्पन्न हुई । वह कहने लगे – ‘वत्स ! यदि तेरी धर्म पालन की इच्छा है तो सम्यक्त्वपूर्वक पाँच अणुव्रतों का पालन कर ।’
मुनिराज की बात सुनकर चन्द्रकर्मा निवेदन करने लगा कि – ‘महाराज ! आप मुझे स्वर्ग और मोक्ष के हेतुभूत तथा सुख-सम्पत्ति प्रदाता पाँच अणुव्रतों का स्वरूप संक्षेप में समझाओ ।’
मुनिराज ने पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत, मधुत्याग, पाँच उदम्बर त्याग, रात्रि भोजन त्याग, पञ्च नमस्कार मन्त्र, सम्यक्त्व और गुरु पूजा इत्यादि समस्त गृहस्थधर्म का उपदेश संक्षेप में दिया।
मुनिराज का उपदेश सुनकर चन्द्रकर्मा कहने लगा - ‘स्वामिन ! मैंने सम्यक्त्वपूर्वक अन्य सब व्रत तो ले लिये, परन्तु मैं अहिंसाव्रत नहीं ले सकता, क्योंकि जीवघात करना हमारा कुलधर्म है।’
यह सुनकर मुनिराज कहने लगे - ‘चन्द्रकर्मा ! तू सत्य कहता है; जीवघात करना तुम्हारा कुलधर्म है परन्तु तुझे पता नहीं है कि अनन्त पापार्जन का कारण यह तेरा जीवघात जन्य कुलधर्म ही है। जब तक तू अपने कुलधर्म को नहीं छोड़ेगा, तब तक तू भी अनन्त दुःख देनेवाली मृत्यु परम्परा को उसी प्रकार प्राप्त करेगा जिस प्रकार इन मुर्गे-मुर्गी के युगल ने जीवघात जन्य अपना कुलधर्म नहीं छोड़ा और अनन्त दुःख देनेवाली मृत्यु परम्परा को प्राप्त किया।’
मुनिराज की यह बात सुनकर चन्द्रकर्मा का मन आश्चर्य से भर गया तथा वह कौतूहल के साथ पूछने लगा कि - ‘योगीराज ! इन मुर्गे-मुर्गी के युगल ने पूर्व भव में कुलधर्म नहीं छोड़ने के कारण किस प्रकार की मृत्यु परम्परा प्राप्त की।’ ***
चन्द्रकर्मा का यह प्रश्न सुनकर मुनिराज कहने लगे कि - ‘चन्द्रकर्मा ! तुम एकाग्रचित्त से सुनो, मैं इनके भवान्तर बताता हूँ। भद्र ! यह मुर्गा यशोमतिकुमार राजा का पूर्व जन्म का पिता यशोधर नरेश है और यह मुर्गी यशोधर राजा की पूर्व जन्म की दादी चन्द्रमति है। इन्होंने अपना कुलधर्म नहीं छोड़ा और बहुत भक्ति के साथ चन्द्रिकादेवी की पूजा के लिए आटे का मुर्गा बनाकर उसका वध किया। उस पाप का यह परिणाम है। वे मुर्गा-मुर्गी के युगलरूप में उत्पन्न हुए तथा इसी कारण शान्तचित्त से इस समय धर्म श्रवण कर रहे हैं। वे दोनों पूर्व के यशोधर और चन्द्रमति एक भव में मोर और कुत्ता हुए, दूसरे भव में सर्प और नेवला हुए, तीसरे भव में मत्स्य और मगर हुए, चौथे भव में बकरी और बकरा हुए, पाँचवें भव में भँवरा और भँवरी हुए और छठवें भव में यह मुर्गा और मुर्गी हुए हैं।’
मत करो पाप का अनुमोदन
योगीराज की यह बात सुनकर चन्द्रकर्मा के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। उसका सम्पूर्ण शरीर भय से काँपने लगा। वह मुनिराज से कहने लगा – ‘भगवान् ! मैं इसी समय मन, वचन और काया से अपना जीवघातरूप कुलधर्म त्यागता हूँ और सर्वोत्तम अहिंसक जैनधर्म स्वीकार करता हूँ; इसके सिवाय मैंने सम्यक्त्व और अणुव्रतादि व्रत भी स्वीकार कर लिये हैं। अब मैं सच्चा श्रावक हूँ और मेरे देव एकमात्र जिनेन्द्र भगवान् ही हैं।’ मुर्गे-मुर्गी युगल ने भी मुनिराज के श्रीमुख से सर्वोत्तम धर्म सुनकर और अनेक दुःखों से परिपूर्ण अपने भवान्तर सुनकर भक्तिपूर्वक जैनधर्म स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात् उनको इतना सन्तोष हुआ कि उसे व्यक्त करने के लिए अत्यन्त मधुर बाँग पुकारी। ठीक उसी समय यशोमतिकुमार राजा अपनी प्रियतमा कुसुमावली के साथ
पटमण्डप में बैठा था। मुर्गे-मुर्गी की बाँग सुनकर वह अपनी पत्नी से कहने लगा कि – ‘हे प्रिया ! तू मेरी धनुर्विद्या की कौशल्यता देख। मैं एक ही बाण की चोट से इस मुर्गे युगल को मार दूँगा।’ ऐसा कहकर उसने एक बाण निकालकर धनुष की डोरी पर
चढ़ाया, बाण को कान तक खींचकर मुर्गे युगल पर चला दिया और उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी।
जिनधर्म परायण इस युगल ने समता के साथ प्राणों का त्याग किया; अतः
यशोमतिकुमार राजा की रानी कुसुमावली के गर्भ में आये और उसके गर्भ से कुमार व कुमारी के रूप में जन्म धारण किया। दोनों कला, गुण और सौन्दर्य में बहुत वृद्धिगत हुए। ***
एक दिन सुदत्त मुनिराज अपने विशाल संघसहित उज्जैनी नगरी में पधारे। उसी समय राजा यशोमति भी शिकार खेलने की इच्छा से अपने परिवार के साथ उज्जैनपुरी से निकला। जैसे ही यशोमति ने सुदत्त नामक आचार्य को एक वृक्ष के नीचे विराजमान देखा, उसने अपने पाँच सौ कुत्ते उन पर छोड़ दिये।
वे कुत्ते ज्यों ही दौड़ते हुए मुनिराज के समीप आये तो मुनिराज की शान्तमुद्रा को देखकर वे कुत्ते भी मुनिराज की प्रदक्षिणा देकर आनन्द के साथ उनके समक्ष बैठ गये। यशोमतिकुमार ने जब कुत्तों को शान्तभाव से बैठा देखा तो उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं और वह स्वयं तलवार निकालकर मुनिराज को मारने दौड़ा, परन्तु सम्यग्दृष्टि कल्याणमित्र नाम के साहूकार ने उसे समझाया और मुनिराज के समीप ले गया। आचार्य महाराज को देखकर यशोमतिकुमार का मन प्रसन्न हो गया और वह विचारने लगा कि - ‘मुझ पापी ने किसलिए मुनिराज को मारने का विचार किया ? इस पाप का केवल एक ही प्रायश्चित्त है कि मैं अपनी आत्मविशुद्धि के लिए अपना सिर काटकर मुनिराज के चरणों में अर्पित कर दूँ।’
उस समय अपने दुष्कृत्यरूप पाप के पश्चाताप से यशोमतिकुमार का आत्मा पवित्र हो गया था। वह जैसे ही अपना सिर काटने को तैयार हुआ कि तुरन्त ही मुनिराज ने उसे रोककर कहा - ‘हे राजन! तुम्हे ऐसा अशोभनीय कार्य नहीं करना चाहिए।’ जब यशोमतिकुमार को पता चला कि मुनिराज उसका अभिप्राय समझ गये हैं तो वह अत्यन्त लज्जित हुआ और मुनिराज को नमस्कार करने लगा। उस समय यशोमति को अत्यन्त वैराग्य हुआ। वह मुनिराज से प्रार्थना करने लगा - ‘हे भगवन ! आप मुझ अभागे के दुश्चरित्र को क्षमा कर दो।’
यशोमति की बात सुनकर मुनिराज कहने लगे कि - 'हे वत्स ! तू बहुत भोला है। अरे ! हमारे जैसे मुमुक्षुओं को तो संसार की
समस्त जनता की बात सहन करनी चाहिए,
परन्तु तुम्हारे समान राजा को तो विशेष
प्रकार से सहनशील होना चाहिए।’
जब राजा ने मुनिराज की बात सुनी
तो वह मुनिराज से निवेदन करने लगा -
'भगवन ! आप मुझे स्पष्ट कहो कि मैं अभी
क्या विचार कर रहा था ?’
मुनिराज अवधिज्ञानी थे। वे कहने लगे - 'राजन ! एक चित्त से सुन । मैं तेरी मन चिन्तित बात कहता हूँ। तुम विचार कर रहे थे कि संसार में मुनि वध करने का एक ही प्रायश्चित्त है, और वह यह है कि अपना सिर काटकर मुनिराज के चरणों में अर्पण कर दूँ, Shree Kundkund-Kahan Parmarthik Trust, Mumbai.
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 134.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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