बोधि-समाधि-निधान (भाग-२)
- यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है -
बोधि-समाधि-निधान
( भाग-2 )
- यशोधरचरित्र
- वरांगचरित्र
- प्रद्युम्नचरित्र
गुजराती संकलन :
जीतूभाई नागरदास मोदी
प्रशम जीतूभाई मोदी, सोनगढ़
हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन :
देवेन्द्रकुमार जैन
बिजौलियाँ, जिला-भीलवाड़ा ( राज. )
: प्रकाशक :
श्री कुन्दकुन्द-कहान पारमार्थिक ट्रस्ट
302, कृष्णकुंज, प्लॉट नं. 30, नवयुग सी.एच.एस. लि.
सी. एल. मेहता मार्ग, विलेपार्ले ( वेस्ट ), मुम्बई-400 056
फोन : ( 022 ) 26130820
आज ही अपना हित साध ले! विलम्ब न कर!!
सब अपने पूर्व के कर्मों के उदयानूसार आयुष्य और संयोग लेकर आते हैं। उसमें अन्य कोई जीव फेरफार नहीं कर सकता, एक शरणामात्र अपना आत्मा है – ऐसा विचार करके सज्जनों को आत्मिक-कार्य करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। ऐसा मनुष्य देह, पाँच इन्द्रियों और जैनधर्म मिलने के बाद आत्महित के कार्य में विलम्ब नहीं करना। आज ही करना।
—करुणासागर पूज्य गुरुदेवश्री
मरण तो आना ही है, जब सब कुछ छूट जाएगा। बाहर की एक वस्तु छोड़ने में तुझे दुःख होता है, तो बाहर के समस्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव एकसाथ छूटने पर तुझे कितना दुःख होगा? मरण की वेदना भी कितनी होगी? ‘कोई मुझे बचाओ’ ऐसा तीव्र हृदय पुकारता होगा। परन्तु क्या कोई तुझे बचा सकेगा? तू भले ही धन के ढेर लगा दे, वैद्य-डाक्टर भले सर्वे प्रयत्न कर छूटें, आसपास खड़े हुए अनेक सगे-सम्बन्धियों की ओर तू भले ही दीनता से टुकर-टुकर देखता रहे, तथापि क्या कोई तुझे शरणभूत हो ऐसा है? यदि तूने शाश्वत स्वरसंज्ञित ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मा की प्रतीति-अनुभूति करके आत्म-आराधना की होगी, आत्मा में से शान्ति प्रगट की होगी, तो वह एक ही तुझे शरण देगी। इसलिए अभी से वह प्रयत्न कर। ‘सिर पर मौत मंडरा रहा है’ ऐसा बारम्बार स्मरण में लाकर भी तू पुरुषार्थ चला कि जिससे ‘अब हम अमर भये, न मरेंगे’ ऐसे भाव में तू समाधिपूर्वक देहत्याग कर सके। जीवन में एक शुद्ध आत्मा ही उपादेय है।
—प्रशममूर्ति पूज्य बहिनश्री
चक्रवर्ती की समस्त सम्पत्ति से भी जिसका एक समय मात्र भी विशेष मूल्यवान है, ऐसा यह मनुष्य देह और परमार्थ को अनुकूल ऐसा योग समप्राप्त होने पर भी यदि जन्म-मरण से रहित ऐसे परम पद का ध्यान नहीं रहा तो इस मनुष्यत्व को अधिगृहित ऐसे आत्मा को अनन्त बार धिक्कार हो।
कृपालुदेव श्रीमद् राजचन्द्र
उत्तर क्षण में क्या परिणाम होगा, उसका वर्तमान क्षण में हमें ज्ञान नहीं, तो भविष्य के लिये क्यों व्यर्थ का कल्पना? परिणाम के अलावा शरीरधारक की क्रिया में तो हमारा कोई कर्तव्य है ही नहीं, तो फिर इनके आश्रित विभाव परिणामों का व्यर्थ बोझ क्यों लादा जाये?
—पूज्य सोगाणीजी
बोधि-समाधि-निधान, भाग-2
उपोद्घात
अकारण करुणासागर, पुरुषार्थ प्रेरणापूर्ति पूज्य गुरुदेवश्री ने साक्षात् सीमन्धरस्वामी की दिव्यध्वनि का वर्षों तक प्रत्यक्ष श्रवण करके तथा सीमन्धरस्वामी के समवसरण में पधारे हुए श्रीमद् भावकुन्दकुन्दाचार्यदेव के प्रत्यक्ष दर्शन करके, यहाँ भरत में पधारेकर, 45 वर्षों तक अध्यात्म की गंगा बहाकर अध्यात्म क्रान्ति द्वारा विषम पंचम काल का धर्म काल में परिवर्तित किया है।
अध्यात्मयुग सर्जक पूज्य गुरुदेवश्री ने प्रधानरूप से तो द्रव्यदृष्टि का मूलभूत मार्ग ही प्रकाशित किया है और साथ ही साथ उस द्रव्यदृष्टि के मार्ग में प्रमाण करने में सहायकभूत ऐसी वैराग्यभूमि तैयार करने के लिये प्रथमानुयोग के पुराणों के अनेक प्रसंगों को खूब मथकर प्रकाशित किया है। उनसे प्रेरणा लेकर श्री नागरदास बी. मोदी सम्पादक गुजराती आत्मधर्म में बावन कथाओं के साररूप प्रकाशन किया है, जिन्हें बाद में संकलित करके ‘बोधि-समाधि-निधान’ रूप से प्रकाशित किया गया था। तत्पश्चात् उसी ग्रन्थ का हिन्दी में प्रकाशन हुआ। इस प्रकार गुजराती तथा हिन्दी भाषा में इस ग्रन्थ का बारम्बार प्रकाशन यह सूचित करता है कि प्रस्तुत कथा संग्रह पुस्तक मुमुक्षु समाज में अत्यन्त रुचिकर हुई है।
अनेक परिचित मुमुक्षुओं की ओर से बोधि-समाधि-निधान जैसा दूसरा कोई कथासंग्रह पुस्तक प्रकाशित करने की माँग होने से श्री नागरदासभाई को बोधि-समाधि-निधान, भाग-2 प्रकाशित करने की भावना जागृत हुई किन्तु इस कथासंग्रह में पूर्व प्रकाशित भाग-1 की तरह अनेक कथाओं के संकलन के बदले वैराग्य से भरपूर एक-दो विस्तृत कथायें प्रकाशित करने का निर्णय किया, जिससे भव्य मुमुक्षुओं को अपने परिणाम की स्थिति में जागृति रहे और इस प्रकार पूज्य बहिनश्री चम्पाबेन के उपदेशों को—'मुमुक्षु का हृदय ‘भींगा हुआ हृदय’ होना चाहिए—इस उपदेश को मुमुक्षु आत्मपरिणत कर सके।
अपनी इस भावना के फलस्वरूप, अपने दोषीत परिणामों का कितना भाव है कैसा-कैसा कठोर फल भोगना पड़ता है, इसका हू-ब-हू चित्रण करता हुआ यशोधरचरित्र, बोधि-समाधि-निधान भाग-2 के रूप में प्रकाशित करने का उन्होंने निर्णय किया और अपनी उपस्थिति में ही उनका गुजराती अनुवाद तैयार कराया। पुराणों में कथायें तो बहुत आती हैं परन्तु यशोधरचरित्र की कथा कोई अलग ही प्रकार की है, उसमें गृहीत मिथ्यात्व की अनुमोदना पर विशेष प्रहार किया गया है।
(iv)
इसी प्रकार वरांगचरित्र एक वैराग्य प्रेरक कथा है जो कि सुप्रबुद्ध समाज में कम प्रचलित है। इसी प्रकार प्रद्युम्नचरित्र भी गुजराती मुमुक्षु समाज में बहुत कम प्रचलित है। इसका कारण यह है कि हिन्दी भाषा में तो अनेक पुराण उपलब्ध हैं, जबकि गुजराती भाषा में अधिक मात्रा में पुराणों की उपलब्धता नहीं है।
सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि में चारों अनुयोगों का उपदेश होता है, उसमें प्रथम अनुयोग का नाम प्रथमानुयोग है। द्रव्यानुयोग, चरणानुयोग और करणानुयोग में जो वर्णन है, उसकी दृष्टान्त द्वारा प्रसिद्धि, प्रथमानुयोग है। प्रथमानुयोग के अभ्यास से तीनों अनुयोगों का समझना सरल बनता है।
प्रथमानुयोग के अभ्यास से-
- पुराण-पाठों के प्रसंग पढ़ने-विचारने से दृढ़ता होती है कि क्रमबद्ध अनुसार - होनहार अनुसार परिणामते हुए परिणमन काल में उसके योग्य पुरुषार्थ होता ही है; क्रमबद्ध अनुसार पुरुषार्थ होता ही है, कर्तृत्वपूर्वक करना नहीं पड़ता परन्तु सहज रूप से उसके योग्य पुरुषार्थ हुए बिना नहीं रहता, इसलिए मुझे कर्तृत्वपूर्वक पुरुषार्थ करने का बोझ नहीं रहता। मैं तो मात्र ज्ञातास्वरूप से रहता हुआ एक ज्ञायकभाव हूँ।
- जीवों के भूतकाल के और भविष्य काल के निश्चित परिणामों का वर्णन जानकर क्रमबद्धपर्याय की यथार्थ श्रद्धा द्वारा अकर्तृत्वभाव के सन्मुख हुआ जाता है।
- संसारी जीवों के पापमय परिणामों होने पर भी उनकी क्षणिकता समझने से स्वभाव में संसार की गन्ध भी नहीं है, ऐसा महिमावन्त ज्ञानक मैं हूँ - ऐसी दृढ़ता होती है।
- एक जीव दूसरे जीव पर क्रोध करे तो उसके संस्कार भव-भव तक रहते हैं, राग करे तो उसके संस्कार भी भव-भव तक नहीं छूटते और कुदेव-गुरु-धर्म के सेवन से नरक-निगोद में चिरकाल भ्रमण करके फिर से मनुष्य होने पर कुधर्म के संस्कार पुनः जागृत हो जाना जानकर, जीव को वीतरागधर्म की आराधना की विशेष जागृति रहती है।
यशोधरचरित्र
राजा यशोधर के भवों का वृत्तान्त जानने पर, किसी भी जीव के प्रति वैरभाव करने से कितने ही भवों तक वह वैरभाव लम्बित होना जानने से जीव अपने परिणाम में वैराग्यभावनापूर्वक सावधान रहता है।
जिसके फल में अनेक भवोँपर्यन्त भीषण दुःख भोगने पड़ते हैं, ऐसे अपने मिथ्याभावों से बचने की प्रधान प्रेरणा रूप इस कथा में, पत्नी के दुष्कर्म से वैराग्य पाकर जिनदीक्षा ग्रहण करने
(v)
का इच्छुक राजा यशोधर, अपनी माता की ममता के कारण माता की आज्ञा का पालन करने के लिये आटे के मुर्गे की बलि चढ़ाता है, इससे वह मरकर वह मोर होता है। जिस माता की आज्ञा पालन करने के फल में मोर हुआ है, वही माता मरकर बिल्ली होकर पुत्र / मोर को मारती है! फिर भी कितनी ही कुयोनि के भवों में माता का जीव पुत्र के जीव को ही मारता रहा! ममता से मातृ-आज्ञा पालन में गृहीतमिथ्यात्व का पोषण या अनुमोदन करने का यह फल! इसलिए आत्महित इच्छुक जीव को किसी भी सगे-सम्बन्धी या उपकारी किसी भी व्यक्ति को लिङ्ग-शर्म में आकर अथवा मान बढ़ाई के लिये अथवा ममता या भय से उसके किसी भी मिथ्यात्ववर्धक कार्य में जुड़ना नहीं, पोषण नहीं देना अथवा अनुमोदन नहीं करना, भले ही समाज में मान न मिले। क्योंकि इस कथा में बना उस प्रकार अनेक भवपर्यन्त दुर्गति भ्रमण और भयंकर दुःख का भोग स्वयं को अकेले ही करना पड़ेगा तथा जिसकी आज्ञा पालन करने के फल में यह पाप किया, उसी माता ने भव-भव में स्वयं को मारा, वह माता भी भव के बाद अत्यन्त प्रिय ऐसी संगी बहन बनी! इसलिए करुणा से पूज्य गुरुदेवश्री कहते थे कि ‘किसको प्रसन्न करना और किससे प्रसन्न रहना! एक आत्मा का हित करने का यह भव है!’
वरांगचरित्र
निकट मोक्षगामी महा पुण्यशाली वरांग को जीवन में अनेक प्रकार की असाता भोगनी पड़ती है, तथापि समतापूर्वक किस प्रकार रहता है! तथा साता के उदय के समय कितनी वैराग्य भावना पूर्वक दीक्षित होता है! - इत्यादि वर्णन पढ़कर पाप के उदय में हताश नहीं होना और पुण्य के उदय में आत्महित के लक्ष्यपूर्वक जीवन जीना - इत्यादि धर्मभावना की विशेष प्रेरणा मिलती है।
प्रद्युम्नचरित्र
इस चरित्र में भावलिंगी मुनिराज की हिंसा करने में उद्यमी होनेवाले अग्निभूति-वायुभूति जैसे महापापी, सातवें भव में प्रबल पुण्य प्राप्त प्रद्युम्न-शम्बुकुमार के भव में गिरनार सिद्धक्षेत्र से मुक्ति प्राप्त करते हैं - इत्यादि वर्णन पढ़ते हुए कल का लकड़हारा आज केवली हो सकता है - ऐसी आत्मा की अनन्त शक्ति सामर्थ्य की प्रतीति उत्पन्न होती है।
पूज्य गुरुदेवश्री ने जीवन भर जो महान् बोध प्रदान किया है, उसकी इन तीनों कथाओं के उदाहरण द्वारा दृढ़ प्रतीति होती है। भयंकर पाप के परिणाम हुए हों या उत्कृष्ट शुभपरिणाम हुए हों; जीव को मूलभूत शक्ति में उसकी गन्ध भी प्रविष्ट नहीं होती। जब भी जीव अपने स्वभाव को
(vi)
प्रतीति करे, तब स्वयं वर्तमान में ही सर्वज्ञस्वभावी विराज रहा है, यह मूलभूत सिद्धान्त सरलरूप से समझ में आ जाता है - इत्यादि अनेक प्रकार से कथानुयोग आत्मलक्ष्यरूप बनता है।
इन वैराग्यवर्धिनी कथाओं के पठन द्वारा अपने परिणामों का विहंगावलोकन करने की जागृतिपूर्वक पूज्य गुरुदेवश्री द्वारा प्ररूपित द्रव्यदृष्टि के मार्मिक सिद्धान्तों का सरलता से भावाभासन होवे, ऐसी अन्तरभावना के साथ…
संकलनकार / अनुवादक
अनुक्रमणिका
यशोधरचरित्र 001
वरांगचरित्र 098
प्रद्युम्नचरित्र 160
ॐ
परमात्मने नमः
बोधि-समाधि-निधान
(पौराणिक जैन कथाओं का संकलन)
भाग - 2
श्री पुष्पदन्त कवकृत
यशोधरचरित्र
जो अनेक द्वीप तथा समुद्रों से वेष्टित है तथा अनेक सम्प्रदायों का स्थान है—ऐसे जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में यौधेय नामक देश है। वह देश धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थों के उपकरणों का उत्पत्ति स्थान है।
इस देश में कुकवियों की भाँति भ्रमरों के समूह भ्रमण करते हैं क्योंकि कुकवियों के हृदय भी काले हैं और भ्रमर भी काले हैं। इस देश की शोभा का वर्णन करते हुए कितना कहना ? विधाता ने स्वर्गलोक की ईर्ष्या से मानो कि दूसरा स्वर्गलोक ही बनाया है कि जिस देश में धन-धान्य, वन-वाटिका आदि से सुशोभित ग्राम-नगर आदि हैं।
इस यौधेय नामक देश में एक राजपुर नामक विशाल नगर था। उस राजपुर नामक नगर में मारिदत्त नामक राजा राज्य करता था।
वह राजा धन देने में कर्ण-समान, वैभव से इन्द्र-समान, रूप से कामदेव-समान, कान्ति से चन्द्रमा-समान, प्रचण्ड दण्ड देने में यमराज-समान और अन्य राजाओं के बलरूप वृक्ष की मूल से उखाड़ फेंकने में प्रचण्ड पवन के समान था। वह राजा धन और धान्य के रक्षण में चतुर था, परन्तु एकान्त धर्म से अनभिज्ञ था। उसमें यौवन मद और धन मद की प्रबलता थी किन्तु एक धर्म के बिना प्रचुर अन्धकार व्याप्त हो रहा था। सत्य ही
2
यशोधरचरित्र
है कि ज्ञान के उदय बिना सारभूत शुभमार्ग का अवलोकन किस प्रकार हो सकता है !! सत्य ही है कि उत्तम ज्ञानियों के बिना धर्म की प्राप्ति किस तरह हो सकती है !!
महाराज मारिदत्त के धन-धान्य से पूर्ण राजपुर नगर में भैरवाचार्य का आगमन हुआ। वह भैरवाचार्य जगत् को अपने-अपने अनुकूल पुरुषों को निज मत की शिक्षा देता था। वह भैरवाचार्य कान में मुद्रा धारण करता; बत्तीस अंगुल प्रमाण दण्ड हाथ में रखता था; गले में योगपट्टि, पैर में पावड़ी धारण करता था; मृदिंगा की आवाज करता और सिंह पंछ का गुच्छा लगाकर अपने को महात्मा प्रसिद्ध करता था। लोगों के पूछे बिना ही अपनी स्तुति करते हुए कहता था कि—
'चार युग व्यतीत होने पर भी मैं वृद्ध नहीं हुआ; नल, नहुष, वेणु आदि महाप्रतापी और पृथ्वी के भोक्ता महाराजा मेरे सामने हो गये हैं; राम और रावण के घोर संग्राम में राक्षसों का पतन मैंने देखा है; भाईयों सहित युधिष्ठिर को देखा है तथा कृष्ण की आज्ञा से विरुद्ध अभिमानी ऐसे दुर्योधन को भी देखा है। मैं चार युग से जीवित हूँ, उसमें तुम किञ्चित् भी भ्रम नहीं करो।
मैं सभी लोगों को शान्ति प्रदान करूँगा। मुझमें इतनी सामर्थ्य है कि अति प्रचण्ड वेगयुक्त दिवाकर के विमान को अवरोध कर सकता हूँ। मुझे समस्त ही विद्याओं की उपलब्धि है; यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र तो मेरे आगे-आगे चलते हैं’ - इत्यादि बातें करते हुए लोगों को रंजित करता हुआ नगर में भ्रमण करता था।
जब उसकी कथा पूरे नगर में प्रचारित हो गयी, तब महाराजा मारिदत्त को भी सुनने को मिली। उन्होंने उस समय अति कौतुकवश होकर मन्त्री से कहा कि ‘तुम एकान्त में जाकर उस गुणगरिष्ठ भैरवाचार्य को नम्रतापूर्वक यहाँ लेकर आओ।’
मन्त्री ने कहा— ‘महाराज की आज्ञा अनुसार मैं अभी उन्हें लेकर आता हूँ।’
इस प्रकार मन्त्री ने विनयपूर्वक राजा का आदेश सुनकर भैरवाचार्य से कहा— ‘अहो महात्मन् ! आपके दर्शन से महाराज को शीघ्र शान्ति हो।’
भैरवाचार्य— ‘यदि राजा की ऐसी ही इच्छा है तो मैं शीघ्र ही जाकर राजदर्शन में शान्ति स्थापित करूँगा।’ ऐसा कहकर मन्त्री के साथ वह राजदरबार में उपस्थित हुआ।
3
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
वहाँ उसने तेजपुंज नारायणतुल्य महाराज को सिंहासन पर विराजित देखा। तत्पश्चात् राजा ने भी अनेक आडम्बरयुक्त भैरवाचार्य को देखकर सिंहासन से उठकर, सामने जाकर दण्डवत् नमस्कार किया।
भैरवाचार्य ने आशीर्वाद मुद्रा में कहा— ‘महाराज का कल्याण हो। राजन् ! मैं साक्षात् भव हूँ, आपकी जो इच्छा हो, वह प्रगट करो, मैं उसे पूर्ण करूँगा।’
इस प्रकार सुनकर महाराज ने प्रसन्नचित्त होकर भैरवाचार्य को उच्चासन पर स्थापित किया और स्वयं उनके चरणों में बैठकर प्रार्थना करने लगा :
महाराज— ‘स्वामिन् ! मेरे कष्ट दूर करो। नाथ ! आप तो सृष्टि संहारक योगीश्वर हैं। आपके चरणों के प्रसाद से मेरे मनोभिलाषित कार्य की सिद्धि होगी। मैं आपका सेवक हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न होओ। आप जो आज्ञा करोगे, मैं उसे शिरोधार्य करके पूर्ण करूँगा।’
दुष्ट परिणामी भैरवाचार्य मन में विचार करने लगा कि मैं जो-जो उपदेश दूँगा, उससे मेरे इन्द्रियसुख की पूर्ति होगी और मैं जो आदेश करूँगा, उसका पालन होगा। इस प्रकार विचार करते हुए उसने कहा— ‘नृपवर ! मुझे समस्त ऋद्धियाँ लक्ष्मायमान से स्फुरयमान होती हैं। मुझे सभी विद्यायें सिद्ध हैं, मैं संसार में पूर्ण समर्थ हूँ, जो कोई मुझसे महान् पदार्थ की याचना करता है, उसे तत्काल देता हूँ। मेरे लिये कुछ भी पदार्थ अलभ्य नहीं है।’
महाराज— ‘हे देव ! आकाशमार्ग, सुमर्ग गमन करने की मेरी अभिलाषा है।’
भैरवाचार्य— ‘नृपवर ! तुम राजकुल के प्रकाशक चन्द्रमा हो, यदि तुम निर्विकल्प चित्त से मेरा उपदेश ग्रहण करोगे तो अवश्य तुम्हें आकाशमार्ग से गमन कराऊँगा।’
सत्य है कि जो गृहीतमिथ्यात्व से लिप्त होता है, वह ज्ञानीजनों के उपदेश को ग्रहण नहीं करता। जिस प्रकार अन्धा मनुष्य, सुमर्ग-कुमार्ग का अवलोकन नहीं करता जैसे अंकुश की प्रेरणा से हाथी की सूँड़ सब ओर गमन करती है; उसी प्रकार भैरवाचार्य की प्रेरणा से मारिदत्त का चित्त जीवों की हिंसा में तत्पर होकर सब ओर गमन करने लगा। यद्यपि मारिदत्त भव्य है परन्तु अशुभोदय से कुगति के योग से कुमार्ग के प्रति गमन करने लगा।
यशोधरचरित्र
उस मारिदत्त राजा के प्रचण्ड शत्रुओं की विध्वंसकारिणी चण्डमारी नाम की कुलदेवी, बेतालकाल (सन्ध्या समय) माँस का अवलोकन करती राजपुर नामक नगर की दक्षिण दिशा में स्थित आवास में निवास करती थी। जिसने गले में नरमुण्डों की माला धारण की थी, शरीर राख से लिप्त था, सर्पाच्छादित चरणयुगल, माँस रहित भयंकर अस्थि-चर्म, मयूर शिखा समान कठोर और उन्नत केश, मृतकों की आँत से विभूषित भुजा इत्यादि महावीभत्स रूप धारण करती हुई चण्डमारी देवी, जीवों की पोषित करती हुई जिनेन्द्रमाग का तिरस्कार करती थी। वह देवी हिंसामाग को प्रगट करती हुई, दयाधर्म को दूर भगाती हुई, नग्नशरीरवाली, माँस खाने के लिये मुँह फाड़े हुए, कपाल-कवन्ध और त्रिशूल धारण करती हुई बैठी थी और उसी का भक्त मारिदत्त राजा था।
भैरवाचार्य—‘राजन! यदि आकाशमार्ग का पथिक बनना हो और विद्याधर शत्रुओं को विजय करके दिग्विजय करनी हो तो जलचर, नभचर और स्थलचर जीवों के युगली का चण्डमारीदेवी के लिये हवन करो। ऐसा करने से तुम्हारे सभी कार्य सिद्ध होंगे।’
महाराज—‘आचार्यवर! आपकी आज्ञा-अनुसार कोतवाल को भेजकर सभी प्रकार की जाति के जीवों के युगल मँगाता हूँ।’
इस प्रकार कहकर महाराज ने कोतवाल को बुलाने के लिये अमात्य से कहा कि कोतवाल को बुलाकर समस्त ही जातियों के जीवों के युगल चण्डमारीदेवी के मन्दिर में एकत्रित करो।
अमात्य—‘जैसी महाराज की आज्ञा। मैं इसी समय कोतवाल को बुलाकर आपका हुक्म सुनाता हूँ।’
कोतवाल—(अमात्य से) ‘मैं आपकी आज्ञा अनुसार उपस्थित हुआ हूँ, मेरे लिये क्या हुक्म है?’
अमात्य—‘महाराज ने आदेश दिया है कि जलचर, नभचर और स्थलचर तथा समस्त जाति के जीवों के युगल चण्डमारीदेवी के मन्दिर में एकत्रित करने के लिये नौकरों को आज्ञा करो।’
बोधि-समाधि-विचार (भाग-2)
कोतवाल—‘जैसी आज्ञा। अभी किंकरों को बुलाकर जीवों को लाने का आदेश विदित करता हूँ।’
इस प्रकार कहकर कोतवाल ने तत्काल किंकरों को बुलाया और समस्त जीवों के युगल लाने की आज्ञा दी। पश्चात् उन हिंसक किंकरों ने सर्वत्र भटककर समस्त जीवों के युगल चण्डमारीदेवी के मन्दिर में एकत्रित करके कोतवाल को तत्सम्बन्धी सूचना दे दी।
कोतवाल—‘श्री महाराज! आपकी आज्ञानुसार सभी युगल उपस्थित हैं। अब क्या आज्ञा है?’
महाराज—‘स्वामिन्! (भैरवाचार्य) आपकी आज्ञानुसार सर्व युगल उपस्थित हो गये हैं।’
भैरवाचार्य—‘तो अब देवी के मन्दिर की ओर चलना चाहिए।’
महाराज—‘जैसी आज्ञा।’
इस प्रकार कहकर, मन्त्री आदि सभी चण्डमारीदेवी के मन्दिर की ओर गमन करने लगे। वहाँ पहुँचकर रुधिर से व्याप्त और चक्र, त्रिशूल तथा खड्ग धारण किये हुए चण्डमारीदेवी को देखकर राजा जन्म-जन्म धनपूर्वक प्रार्थना करने लगा—‘हे परमेश्वरी! अपने निर्मलस्वभाव से मेरे पापों का हरण करो।’
तत्पश्चात् मन्दिर में स्थित नभचर, जलचर और स्थलचर जीवों के युगलों का अवलोकन करके महाराज मारिदत्त ने भैरवाचार्य से निवेदन किया—‘स्वामिन्! आपकी आज्ञानुसार समस्त युगल उपस्थित हैं, अब कार्य की शुरुआत करें।’
भैरवाचार्य—‘राजन! समस्त युगल, देवी के सन्मुख उपस्थित कराओ, मैं कार्यरम्भ करता हूँ।’
तत्पश्चात् समस्त युगल, देवी के सन्मुख उपस्थित करके हवन प्रारम्भ हुआ। मारिदत्त राजा, चण्डमारी चन्द्रिका के अग्र भाग में अनेक प्रकार के मृगादि समस्त जीवों को मारता है। वह मूढ़मति पर को मारकर अपने जीवितव्य की वाँछा और शान्ति की कामना करता है।
यशोधरचरित्र
विप्रभक्षण से जीवितव्य की आशा, बैल के सींग से दूध की आशा, शीलातल में धान्य की प्राप्ति, नीरस भोजन से कान्ति में वृद्धि, उपशमभाव बिना क्षमा, और परजीवों को मारकर शान्ति वृद्धि क्या हो सकती है? नहीं! नहीं! कदापि नहीं!!
वह अविवेकी मारिदत्त राजा जिस समय तृणभोजी गाय आदि पशुओं को मारने में तत्पर था, उस समय भैरवाचार्य समस्त युगलों का अवलोकन करके फिर राजा से कहने लगा—
भैरवाचार्य—‘नृपवर! आपने समस्त युगल तो एकत्रित किये, परन्तु मनुष्य युगल तो मँगाया ही नहीं।’
महाराज—‘आपकी आज्ञानुसार मनुष्य युगल भी मँगाता हूँ।’
—ऐसा कहकर चन्द्रकर्म कोतवाल को बुलाकर राजा ने आज्ञा दी कि प्रशंसा योग्य मनुष्य का युगल शीघ्र लेकर आओ।
कोतवाल—‘जैसी आज्ञा पृथ्वीनाथ की। मैं अभी किंकर को आदेश देकर उत्तम मनुष्य युगल मँगाता हूँ।’
—ऐसा कहकर, किंकर को बुलाकर कोतवाल ने कहा कि अति मनोज मनुष्य युगल को शीघ्र लाकर उपस्थित करो।
किंकर—‘आपके आदेशानुसार शीघ्रतर यहाँ-वहाँ से मनुष्य युगल को लाकर आपके सम्मुख उपस्थित करता हूँ।’
तत्पश्चात् अनेक किंकर नरयुगल को खोजने के लिये नदी के किनारे, नगर, उद्यान, उपवन, पर्वत और गुफा आदि में गमन करने लगे। वहाँ उस हिंसा के अवसर में पार्श्विनाथ-वन नामक वन में संघसहित सुदत्त नामक आचार्य पधारे।
मदन का नाश करनेवाले श्री सुदत्ताचार्य ने वन का अवलोकन करके इस प्रकार कहा कि यहाँ पत्र और फलों का नाश हो रहा है इससे इस वन में सम, दम और यमी सत्य पुरुषों को निवास करना उचित नहीं है।
बोधि-समाधि-विचार (भाग-2)
तत्पश्चात् उग्र तप से दैदीप्यमान आचार्यवर यमस्थानुलग्य श्मशान स्थल में पहुँचे। वह श्मशान, सियारों द्वारा विदीर्ण मृतकों के समूह और भयंकर आवाज करते हुए कौओं तथा गृद्ध पक्षियों से भरपूर था। वह श्मशान निष्फल वृक्षों के शुष्क पत्तों, राक्षसों के मुख से निकलते उष्ण श्वास तथा शूली पर चढ़ाये हुए मृतकों के कलेवर से अत्यन्त भयंकर था।
वह स्थान चोरों के समूह से व्याप्त और माँसभक्षी पक्षियों तथा निशाचरों की आवाज से गूँज रहा था। उस भयानक स्थान में इन्द्र, चन्द्र, और नागेन्द्रों के समूह द्वारा स्तुति योग्य मुनि, आर्जिका, श्रावक और श्राविका—इस प्रकार चतुर्विध संघसहित श्री सुरताचार्य प्रासुक और पवित्र शिला पर विराजमान हुए। यह मुनिसंघ जीवों की दया में तत्पर, महातपश्तरण द्वारा शरीर का शोषण करता था। श्मशानस्थल में जिनदीक्षा का पालन करते हुए शुल्लक युगल कामदेव-नाशक परम ईश्वर गुरु को नमस्कार करके, उनकी आज्ञा लेकर भिक्षा के लिये गमन करने लगे।
वह शुल्लक युगल विविध लक्षणसहित गात्र, प्रहर्षित शरीर, कमलदलनेत्र, जिनचरणों के भक्त, विषयों से विरक्त, पाप मल और मद से रहित, जैनधर्म में पूर्ण आसक्त, निज गुणों से मदान, निज शरीर की कान्ति से सूर्य को आच्छादित करते, हाथ में पात्र धारण किये हुए, नगर की ओर गमन करने लगा। उस समय निर्मल और तीक्ष्ण खड्ग हाथ में धारण किये हुए पापकर्म में तत्पर चन्द्रकर्मा किंकरों ने इन बालव्रत शुल्लक युगल को देखकर कहा :
किंकर— ‘हे बालयुगल ! तुम्हारा प्राप्त होना अत्यन्त कष्ट साध्य था, जो सहज ही प्राप्त हो गया।’ ऐसा कहकर वे युगल के निकट पहुँच गये। वहाँ दुःखनाशक, पाप विघातक, सुन्दर पात्र और लावण्यपूरित शरीरवान् युगल को देखकर किंकर परस्पर वार्तालाप करने लगे।
एक— ‘भाई ! सत्य कहना कि चाहे जितनी खोज करते तो भी कहीं ऐसा रूपवान युगल प्राप्त हो सकता था ? कभी भी नहीं।’
दूसरा— ‘मित्र ! इन्हें ले जाने से महाराज पारितोषिक तो अवश्य देंगे ही। भाई ! इनके हाथ-पैर कितने कोमल हैं ? इनका सौम्य शरीर कैसा हृदयग्राही है ? अब शीघ्र इनको लेकर चलो, विलम्ब का समय नहीं है।’
यशोधरचरित
तीसरा— ‘भाई ! देखो तो सही, हमने इन्हें घेर लिया होने पर भी इनके मुखमण्डल पर किंचित् भी मलिनता दिखायी नहीं देती।’
अन्य— ‘भाई ! तू भी मूर्ख ही है। धैर्यवानों का किसी विपत्ति में मुख म्लान होता है ? कभी भी नहीं।’
अन्य— ‘अरे भाई ! तुम सब उत्तम श्रेणी के मूर्ख हो क्योंकि जैसे-तैसे करके इच्छित वस्तु का लाभ हुआ, उसमें भी अपनी-अपनी गप्प मारते हो और व्यर्थ में विलम्ब करते हो। अब शीघ्रता से इन्हें चण्डिका के मन्दिर में ले चलो।’
इस प्रकार सभी किंकर, शुल्लक युगल को चण्डिका के मन्दिर में ले गये।
जिस समय किंकरों ने शुल्लक युगल का हाथ बाँधकर मनुष्यों को भयंकर मस्तक छेद करने की बात की, वे शब्द सुनकर मन विजेता अभयकुमार नामक शुल्लक महाराज ने अपनी शुल्लिका बहिन को इस प्रकार सम्बोधन किया—
शुल्लक— 'बहिन ! इस अवसर में मरण की शंका करके किंचित् भी भय मत करना परन्तु भगवान् वीतराग अरिहन्त देव को अपने हृदय में स्थापित करके इस प्रकार से विचार कर कि पूर्वभव में जिस अशुभकर्म का बन्धन किया है, उसके उदय से शारीरिक कष्ट अवश्य होता है; इस कारण कोई भी मेरे शरीर का छेदन करो, भेदन करो, मेरे शरीर के रस, रुधिर आदि का पान करो, माँस का भक्षण करो, गर्दन काटो परन्तु चिरकाल से जिस शान्तिभाव का अभ्यास किया है, उसके अनुसार मन को शान्त करनेवाले मुनिजन अष्ट गुण संयुक्त सिद्धपर्याय को प्राप्त हो जाते हैं।
कन्या— ‘कोई राक्षस राजा तथा किंकर यदि अपने पौद्गलिक शरीर का घात करे तो करो परन्तु वे ज्ञानयुक्त अपने आत्मा का घात नहीं कर सकते। ऐसे अवसर में जैनधर्म की ही शरण का अनुसरण करना योग्य है।’
इस प्रकार अपने शुल्लक भाई के उपदेशयुक्त वचन सुनकर वह चन्द्रमुखी शुल्लिका इस प्रकार कहने लगी—
शुल्लिका— 'भ्रातृवर ! तुमने जो जिनसूत्रानानुसार निर्मल और पवित्र उपदेश प्रदान
बोधि-समाधि-विचार (भाग-2)
किया है, वह सर्वथा योग्य है। मैंने आपके कथन से पूर्व ही यह विचार कर रखा है कि मेरे इस नाशवान शरीर का कोई भी घात करे परन्तु मैं मेरे जीवन की जीर्ण तृण समान गिनती हूँ। मैंने चिरकाल से जो उपशम का अभ्यास किया है, उसे ही निज हृदय में धारण करके कर्मोदय के फल को भोगूँगी।’
यह उपरोक्तानुसार परस्पर वार्तालाप करते हुए, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए शुल्लक युगल को, यमराज समान पदधारियों द्वारा भैरवानन्द के कुटुम्ब को आनन्दकारक देवी के मन्दिर की ओर ले जाया गया।
उस मन्दिर में वह भैरवाचार्य महाध्वनि करता हुआ, धनुष उठाता हुआ, लोहखण्ड को घुमाता हुआ, लोहखण्ड-पीतल के आभूषण धारण करता हुआ, हाथ में तीक्ष्ण छुरी रखता हुआ, अपने गुप्ताभाव को प्रगट करता, अपना महत्त्व दिखाता, समस्त शरीर पर मृगचर्म लिपटा हुआ, पैर में घुँघरू से झनकार और थपथप शब्द करता हुआ तथा अपने केशों को खोलकर पिशाच समान पूर्ण माँसभक्षी सदृश चन्द्रिका के चरित्र का वर्णन करता, नृत्य करता अपूर्व दृश्य बना रहा था।
उसी समय चण्डिका अपने निवास में मुख में मस्तक खण्ड धारण करके नृत्य कर रही थी। वह देवीगृह पशुओं के रुधिर से सिंचित, पशुओं के हड्डियों की माला लटकती हुई, पशु की जीभ के पात्र से पूजा होती हुई, पशुओं की चर्बी के दीपक से प्रकाश होते हुए इत्यादि भयंकर दशाच्युत देवीगृह में चण्डिकादेवी अनेक क्रीड़ा करती महा भयानक दृश्य दिखला रही थी।
माँस लोलुपी नरनाथ मारिदत्त भी उस देवीगृह में विराजमान था। देवीगृह में स्थित मारिदत्त महाराज ने समागत शान्तिमृदायुक अभयरुचिकुमार शुल्लक और चन्द्रमुखी शुल्लिका का अवलोकन करके, खड़े होकर इस प्रकार शब्दोच्चार किया—
महाराज— ‘श्रीमान् शुल्लक महाराज और शुल्लिकाजी को मेरा सविनय नमस्कार।’
शुल्लक— ‘हे शुद्धवंश की लक्ष्मीरूप कमलिनी के हंस ! हे राजनृपज्ञ ! हे गुणश्रेणीयुक्त योगीराज ! हे स्नेहपूर्ण दाता ! हे फलवान् वृक्षवत् नृप ! हे कलाकुलकलित कलाधर ! हे जलपूरित समुद्रतुल्य गम्भीर ! हे राजन ! तुम्हारी धर्मबुद्धि हो।’
यशोधरचरित्र
इस प्रकार पूर्ण निशाकर समान बाल्ययुगल के शान्तिपूर्ण आशीर्वाद सुनकर महाराज मारिदत्त के हृदय में से समस्त रोष का विसर्जन हो गया। उस समय महाराजा अपने हृदय में विचार करने लगे।
आहाहा! कैसा अनुपमरूप विधाता ने बनाया है! हा! दुष्ट विधाता! ये दोनों सुकुमार बालक कहाँ आ गये? इन्होंने जो स्वजनों के सुख का त्याग किया, उस समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का भोग क्यों नहीं किया?
ये दोनों बालक आनन्दपूर्वक प्रशंसायोग्य, विद्याधरों के इन्द्र अथवा नागेन्द्र का पाताल भेदकर आये हैं अथवा इस मध्यलोक के लक्ष्मी को देखने स्वर्ग में से सुरेन्द्र अथवा प्रभाधन चन्द्रमा आया है अथवा बालकों को वेष धारण करके मुरारी महादेव या कामदेव, इन दो में से कोई आया है अथवा अव्यक्तरूप धारण करके धृति, कान्ति, लक्ष्मी, शान्तिसहित अनेक सिद्धि की पृथ्वी है अथवा यश का स्थान, गुणों की श्रेणी, दुःखनाशक कवियों की वाणी और पुण्य की भूमि है? यह उपशान्त बदन शान्तमूर्ति चन्द्रमारीदेवी ही क्या मनुष्य का रूप धारण करके मेरी परीक्षा के लिये यहाँ आयी है अथवा मेरे कोई सम्बन्धी दीक्षा ग्रहण करके संसार का अन्त करने के लिये यहाँ उपस्थित हुए हैं? – इत्यादि चिन्तवन करते हुए महाराज मारिदत्त ने पुनः प्रगटरूप से क्षुल्लक से प्रश्न किया।
'अहो महानुभाव! आप कौन हो? क्या राज्य से भ्रष्ट होकर शत्रु के डर से, भोग रहे सुख को छोड़कर यहाँ आये हो? और यह शान्तमूर्ति महारूपवती कृपानन्ददायिनी कन्या किसकी पुत्री है? अहो! इस बाल अवस्था में व्रतपूर्वक दीक्षा, घर-घर में भिक्षा (आहार) और महान् गुणों की परीक्षा से एक एक अद्भुत लगती है।
हे राजकुमार! हे मुनि! इस हमारे शुद्ध और कीर्ति गृहस्वरूप श्रेष्ठ नगर में इस कुमारीसहित आप किस प्रकार पधारे हैं? वह आपकी पापनाशक और सुखदायक कथा ज्ञात करायें।
महाराज मारिदत्त के ऐसे वचन सुनकर, नृपति को हर्षापादक क्षुल्लक महाराज इस प्रकार कहने लगे –
बौद्धि-समाधि-विचार (भाग-२)
क्षुल्लक – ‘राजन! जिस प्रकार अन्धे के सामने नृत्य, बहरे के समीप गान, नपुंसक पुरुष के प्रति तरुणबाला के कटाक्षों का निक्षेपण, लवणरहित विविध प्रकार के व्यंजन, अज्ञानियों में तीव्र तप का आचरण, निर्बल की शरण, शुभध्यानरहित परन्तु अति रौद्रसहित पुरुष का समाधिकरण, निर्धन का नवयौवन, कृपण का धन संचय करना, निःस्नेही में कमनीय कामिनी का रमण, अपात्र को दान, मोहरूप धूल से भूंसरित मनुष्य की धर्म का व्याख्यान, दुष्ट स्वभावी पुरुष से गुणों का वर्णन तथा रण में रुदन जैसे व्यर्थ / बेकार है, उसी प्रकार आपके सम्मुख हमारा चरित्र कहना व्यर्थ है क्योंकि सिर में शूल समान, जिनेन्द्र को नहीं माननेवाले पुरुष को, जो गुरु शुद्ध वचनों द्वारा परमागम का कथन करता है, वह शुद्ध दूध को सर्प के मुख में देकर अपना नाश करता है।’
क्षुल्लक महाराज अभी कहने लगे कि – 'हे राजन! जैसे मूर्च्छित पुरुष को शीतल जल और पवन से सचेत किया जाता है; उसी प्रकार उपशान्त पुरुष को धर्मोपदेश दिया जाता है, परन्तु जिस प्रकार शुष्क वृक्ष का सिंचन व्यर्थ है; उसी प्रकार अविनयी को सम्बोधन भी व्यर्थ है।
नृपवर! मेरी जो कथा है, वह धर्मक्रिया का उपदेश है, जो उत्तम पुरुषों को श्रवण और पूजनीय है, इस कारण यदि मेरे चरित्र का श्रवण करना चाहते हो तो शान्तचित्त होकर श्रवण करो।’
इस प्रकार के अभयरुचिकुमार क्षुल्लक के वचन सुनकर उपशान्तहृदय बनकर महाराज मारिदत्त ने भस्मा, भट्टी, दुष्टनी और प्रचण्ड डमरू के शब्दों का निवारण करके, मनुष्यों की हिंसा के विनोद के निवारणपूर्वक, विनयपूर्वक क्षुल्लक महाराज से पुनः प्रार्थना की –
मारिदत्त – 'हे दयापालक! हे स्वामिन! आपकी आज्ञानुसार अभी समस्त सभा सुनने के लिए स्तब्ध हो रही है। हे श्रमणेश! देखो, सब मनुष्य विनयसहित आपकी वाणी
यशोधरचरित्र
की अभिलाषा से कैसे बैठे हैं, मानो प्रवीण चित्रकार के रचे हुए चित्र ही हैं। अब आप अपने चरित्र का वर्णन करो।’
क्षुल्लक – 'नृपवर! यदि तुम्हारी पूर्ण अभिलाषा हो तो मैं मेरा चरित्र कहता हूँ, उसे एकाग्र चित्त से श्रवण करो।
हे पृथ्वीपाल महाराज मारिदत्त! मैं दृढ़ श्रुतानुभूत रहस्य का आपके सन्मुख वर्णन करता हूँ।
इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में पृथ्वी के तिलक समान अवन्ती नाम का देश है। उस रमणीक अवन्तीदेश में स्वर्गपुरी समान उज्जयिनी नामक नगरी है। उस नगरी का राजा महाप्रतापी यशोधर था।
वह दक्षिण कर्म का धारक राजा यशोधर यौवनावस्था में ऐसा शोभित होता था मानो गुणों का समूह अथवा तप का प्रभाव या पुण्य का समूह अथवा कला का समूह या कुल का आभूषण अथवा यश का भण्डार या न्याय का मार्ग अथवा जगत् का सूर्य ही हो।
उस यशोधर नामक पृथ्वीपालक को काम की विद्या, काम की शक्ति, काम की दीप्ति, काम की कीर्ति, काम बाणों की पंक्ति, और काम के हाथ की वाणी समान चन्दनानी नामक महारानी थी। उस महारानी के उदर से सुकवि की बुद्धि से काव्यर्थ की भाँति ‘यशोधर’ नामक (मैं) पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ।
राजन! जब मैं बाल्यावस्था में आया, तब पहले तो मेरी उम्र के बालकों के साथ घर में ही खेलने लगा। पश्चात् जब पढ़नेयोग्य हुआ, तब मेरे माता-पिता ने योग्य अध्यापक के निकट मुझे पढ़ने के लिये रखा। वहाँ पहले तो वर्ण-मात्रादि क्रम का शिक्षण प्राप्त किया। तत्पश्चात् क्रमपूर्वक व्याकरण, कोष, न्याय, काव्य, छन्द, अलंकार में निपुण हुआ। पश्चात् मैंने ज्योतिष, सामुद्रिक, वैद्यक का अभ्यास किया। तत्पश्चात् संगीत विद्या और नवरसयुक्त नृत्यकला तथा वाजिन्त्र बजाने की विद्या में भी जब प्रवीण हो गया, तब रत्नपरीक्षा, गजराज, घोटक, वृषभ आदि पशुओं की परीक्षा के शास्त्रों का मनन किया।
तत्पश्चात् चित्रलेखन, और काष्ठकर्म का भी अभ्यास हो गया। पश्चात् हाथी,
बोधि-समाधि-विभाग (भाग-२)
घोटक आदि आरोहण, धनुष विद्या, युद्धकला, मल्लविद्या, जल तरण आदि अनेक कलाओं में प्रवीण हुआ। धराधाम! जब मैंने लावण्यरूप जल से सिंचित तरुता में प्रवेश किया, तब यद्यपि मैं असंरक्षित था, तथापि अनंग (कामदेव) समान दिखलायी देता था। जब माता-पिता को, मैं जवान हुआ ऐसा लगा, तब रूप-लावण्य की सरिता समान पाँच राजकन्याओं के साथ मेरा विवाह हुआ। मैं भी सुखसागर में ऐसा मग्न हुआ कि व्यतीत होते समय को किंचित् भी नहीं जान सका। तत्पश्चात् माता-पिता वैराग्य को प्राप्त हुए।
यशोधर महाराज चन्द्रमा के किरण समान उज्ज्वल केश को देखकर चिन्तवन करने लगे कि—'अरे दु:ख! रतिरूप सपत्नी को मर्थवाली और दुर्भाग्य की राशि इस वृद्धावस्था ने क्या मेरे बाल को ग्रहण कर लिया? यह सफेद बाल ही मेरी वृद्धावस्था का सूचक है। इस वृद्धावस्था में मुख से जो लार गिरती है, वह ऐसी ज्ञात होती है कि मानो पुरुष के शरीर में से शक्ति ही लार का रूप धारण कर निकल रही है तथा वृद्ध के मुख में से जो दाँत गिरते हैं, वे मानो कि पापोदय से पुण्य को क्षीण ही गिर रहे हैं।
इस वृद्धावस्था में कामिनी की गति समान दृष्टि मन्द हो जाती है, उस समय हाथ में लकड़ी स्थिर नहीं रहती। यह सत्य ही है कि नयी आयी हुई जरारूपी वनिता के संसर्ग से लकड़ीरूपी स्त्री किस प्रकार स्थिर रह सकती है? इस वृद्धावस्था में कुकवि के काव्य की भाँति पैर भी नहीं चलते अर्थात् जिस प्रकार कुकवि के काव्य के पद चलते नहीं, उसी प्रकार वृद्ध पुरुष के पैर भी नहीं चल सकते।
वृद्ध पुरुष के शरीर में से जो लावण्यता नष्ट हो जाती है, वह ऐसी ज्ञात होती है कि मानो जरारूप सरिता की अभंग तरंगों से धोयी हुई है।’
यशोधर महाराज विचार करने लगे कि ‘देश, कोष, शास्त्र, सेना, अमात्य, गढ़, और मित्र – ये राज्य के सात अंग तथा दो हाथ, दो पैर, निम्बक, कुला, पीज, और मस्तक– ये शरीर के आठ अंग किसी के भी त्रिभुवन में शाश्वत् स्थिर नहीं रहते। इसलिए मैं उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य – इन दस धर्मों का पालन करता हूँ और अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य तथा परिग्रह त्याग इन पाँच महाव्रतों को धारण करता हूँ।’
यशोधरचरित्र
मैंने मेरी अज्ञानता से विषयभोगों में मग्न होकर अपने कुटुम्बियों के स्नेह में तल्लीन होकर इतना समय व्यर्थ बिगाड़ा है। मैंने इस बात का किंचित् भी विचार नहीं किया कि ये पंचेन्द्रियों के विषय, विषमिमिश्रित मिष्ठान की भाँति प्राणघातक और दुर्गतियों में ले जाकर अनेक दु:खों का पात्र बनाते हैं।’
यशोधर महाराज ने यह भी विचार किया कि ‘यह पुत्र, मित्र, कलत्र आदि समस्त परिजनसमूह स्वार्थपरायण है। इसका विचार किये बिना उनके स्नेह में फँसकर उचित का विचार न करके पाप कार्यों में तत्पर हो रहा था परन्तु अब सर्व कार्यों का त्याग करके जिनदीक्षा ग्रहण करके महान् तपश्चरणपूर्वक संसार भ्रमण से निवृत्त हो जाऊँगा।’— इत्यादि विचार करके महाराज यशोधर ने समस्त राज कर्मचारियों को अपने आन्तरिक विचार से अवगत कराया। उस समय समस्त कर्मचारीगण यद्यपि अपने हृदय में अत्यन्त दु:खी हुए परन्तु महाराज को दृढ़ देखकर कुछ भी कहने का सामर्थ्य नहीं कर सके और महाराज की आज्ञानुसार समस्त सामग्री एकत्रित करके यशोधर अर्थात् मुझे बुलाकर राजतिलक किया। तत्पश्चात् यशोधर महाराज ने जैनपथ के पथिक बनकर वन की ओर गमन करके, वहाँ विराजमान जैनाचार्य के समीप जैनश्वरी दीक्षा प्राप्त की।
राजन! यशोधर महाराज तो कामरूप मद के विघातक होकर शिव राज्य के लिये प्रयत्न करने लगे। यशोधर ने अर्थात् वृद्ध मन्त्रियों की सहायता से आन्वीक्षिकी राज्य विद्या द्वारा इन्द्रियविजयी ज्ञान प्राप्त किया। त्रयी नाम की विद्या से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों ही वर्णों के आचार विचार जाने; दण्ड नीति नामक विद्या से खाटे मदयुक्त दुष्टों को योग्य दण्ड का स्वरूप जाना और वार्ता नामक विद्या से धनादि संचय की रीति-नीति का शिक्षण प्राप्त किया।
तत्पश्चात् लोक नीतिज्ञ और धर्मज्ञ वृद्ध पुरुषों के संसर्ग से द्यूत (जुआ), माँस, सुरा, वेश्या, चौर्य, और परंगना – इन व्यसनों का त्याग करके क्रोध, मोह, मान आदि कर्मों का विसर्जन किया।
नृपवर! उस समय यशोधर/मैं काम विनोद का नाममात्र सेवन करता था, तथापि हर्षोत्पादक अंगों से निश्चित दूर रहता था। मन्त्रियों द्वारा विग्रह, यान, आसन, आश्रय
बोधि-समाधि-विभाग (भाग-२)
आदि राज्य के अंगों का ज्ञान जिस समय मेरे हृदय में स्फायमान होने लगा, उसी समय से भूयसमूह काँपने लगा और निकायमों में तत्पर होने लगा। जो मुझसे भयभीत थे, वे नगर-ग्राम के निवास छोड़कर अरण्य में वास करने लगे। जो दुष्ट मन्त्रियों के बहकाये हुए राजा रणांगण में युद्ध के लिये आगे आये, वे चंचल बिजली के समान लुप्त हो गये और जो नम्र धराधीश थे, वे सुखपूर्वक निज जीवितव्य व्यतीत करने लगे।
नृपवर! रणांगण में यशोधर ने/मैंने दुर्निवार तलवार की धार से अन्य राजाओं का नाश किया और दिशाओं में व्याप्त अपने तेज से सूर्य और चन्द्रमा पर विजय प्राप्त की।
राजन! राजा यशोधर निज स्त्री के प्रेम में आसक्तचित्त होते हुए ऐसा विचार करने लगा कि स्वच्छगति, हेमगति, मेरी प्रिय भार्या अमृतमयी मेरे हृदय में वास करती, नेत्र के टिमटिमाकार विरह से व्याकुल हो जाती है, तो मैं भी उसके साथ भोग भोगूँगा; पश्चात् भले नृपपुण्य राज्य नष्ट हो जाये, चाहे लक्ष्मी पर वज्रपात हो, चाहे शर्म नष्ट हो जाये परन्तु उस हृदयवासिनी से एक क्षणमात्र भी पृथक् नहीं होऊँ। गुणों के समूह से युक्त और यश तथा जप का धाम यशोधर्मि नामक निजपुत्र को राज्य सिंहासन पर स्थापित करके, उसे ही राज्यभार समर्पित करके, पश्चात् इष्ट प्राप्ति के लिये अमृतगति के घर जाकर उस प्रियतमासहित विलास करूँगा और उसके साथ ही इच्छित भोजन भी करूँगा।
उस सुकोमल मनोमुग्धी प्रियासहित निर्जन वन में वास भी उत्तम है, समस्त सुखों का कारण और लक्ष्मी का निवास है, परन्तु प्रतिमा बिना स्वर्ग का वास भी अच्छा नहीं – इत्यादि अनेक विचार करने लगा।
महाराज मारिदत्त! जिस समय यशोधर महाराज ऐसा विचार कर रहे थे, उस समय सन्ध्या काल हो गया था, उस समय महाराज यशोधर के हृदय में निज प्रिया से मिलने की अत्यन्त लालसा उत्पन्न हुई, इसीलिए उन्होंने द्वारपाल को आदेश दिया कि—‘तू महारानी के महल में जाकर समाचार दे कि महाराज पधार रहे हैं।’
द्वारपाल ने विनयपूर्वक कहा—‘महाराज की जैसी आज्ञा। मैं अभी जाकर समाचार देता हूँ।’
ऐसा कहकर द्वारपाल ने महारानी के महल में जाकर महाराज के आगमन सम्बन्धी
यशोधरचरित्र
समाचार दे दिये। वहाँ की सब व्यवस्था ठीक करके वापिस आ गया।
द्वारपाल ने आकर कहा- ‘श्री पृथ्वीनाथ! स्वर्गंतुल्य महारानी के महल की ओर पधारो।’
इस प्रकार द्वारपाल का निवेदन सुनकर महाराज / मैं तत्काल जाने के लिये तैयार हुआ। उस समय तिमिरनाशक दीपक हाथ में लेकर एक सेवक आगे चल रहा था। इस प्रकार मैं मणिमय शिखरयुक्त अमृतादेवी के महल में पहुँचा। वह महल कहीं-कहीं रत्नजड़ित दीवारों से शोभित था।
राजन! जिस समय यशोधर महाराज / मैं उस अति सुन्दर मन्दिर में / महल में सात प्रकार की भूमि को देखा, उस समय मेरी बुद्धि ऐसी कम्पायमान होने लगी कि मानो नरक में ही प्रवेश किया हो!
पृथ्वीनाथ! उस समय काम के उद्दीप्त से विषसहित सर्प की भाँति मेरे सर्वांग में कम्प उत्पन्न हुआ और मुझे प्रिया तक पहुँचना कठिन हो गया।
प्रजापालक! तत्पश्चात् मैं द्वारपाल के हाथ का अवलम्बन लेकर रानी के महल में अन्दर पहुँच गया। अन्दर प्रवेश होते ही देव ने मेरी बुद्धि हरण कर ली। उस समय निज प्रिया के मुख से सुगन्धि स्वादयुक्त वचनालाप सुनकर मैंने अपने कान और नाक को आघ्राणित किया। उसके अति उत्तम रूप का अवलोकन करके नेत्र को तृप्त किया। उस चन्द्रवदनी के अधरामृत के स्वाद से जीभ को सन्तोषित किया और सुकोमल शरीर के स्पर्श से सर्व अंग सुखपूर्ण किये।
राजन! उस समय का अवलोकन, संभाषण, दान, आलिंगन, विश्वास, प्रिया का मिलाप और रतिक्रीड़ा, अमृतादेवी के संसर्ग से जो मुझे प्राप्त हुए, वे दूसरे किसी को प्राप्त नहीं हुए होंगे।
न्यायमूर्ति समस्त क्रीड़ा से निश्चिन्त होकर मैं शयनस्थ हुआ। मैं आँख बन्द करके उस कमलदना, चन्द्रवदनी, गजगामिनी प्रिया का स्मरण कर रहा था, इतने में वह परपुरुष-आसक्त मेरे बाहुपाश में से निकलकर धीमे-धीमे गमन करने लगी। तत्काल मैं भी उठकर देखने लगा कि इतनी अर्धरात्रि में यह कहाँ जाती है? ऐसा विचार करके हाथ
बोधि-समाधि-विधान (भाग-2)
में तलवार लेकर मैं गुप्त रीति से उसके पीछे जाकर देखता हूँ कि वह कुबड़े (कुरूपवान) के सामने हाथ जोड़कर खड़ी है।
पृथ्वीनाथ! वह कुबड़ा, पुरुषार्थ में अग्रुद्यमी, सर्वजन निन्दा, बड़े दाँतवाला, बहुत बड़े और विषम होंठ, खुरदरे और कठोर हाथ-पैर, सूक्ष्म और कठोर हृदय, रूक्ष बालों से भयानक, दूसरों के जूतों का रक्षण करनेवाला, हाथों-चोंचों के बचे हुए अन्न से पेट भरता था। ऐसे महा भयानक कुबड़े ने जैसे ही अमृतादेवी को देखा, तुरन्त ही वक्रदृष्टि से बोलने लगा।
कुबड़ा- ‘सद्भाविरहित दासी! तूने इतनी देर क्यों लगायी? प्रतिदिन की भाँति शीघ्र क्यों नहीं आयी?’ इत्यादि वक्-वक् करते हुए चाबुक में लेकर अमृतादेवी को मारने लगा। तत्पश्चात् केश पकड़कर जमीन पर पछाड़कर लात मारने लगा। उस समय कुबड़े के चरणों में नमस्कार करती हुई अमृतादेवी नम्र भाव से कहने लगी-
अमृतादेवी- 'स्वामी! आज वर के कार्य से अवकाश न मिलने के कारण थोड़ा विलम्ब हो गया है। नाथ! आप कामदेव समान मेरे हृदय में निवास करते हो, इस कारण आपके नाराज होने से मेरे छत्र, चैंवर, आसन, महल, हाथी, घोड़ा, रथ, प्यादा, वस्त्र, आभूषण और समुद्रान्त पृथ्वी का राज्य-यह सब ही व्यर्थ है।
प्राण वल्लभ! आपके बिना कुमकुम का विलेपन, रत्न-स्वर्णजड़ित आभूषण, उत्तम बहुमूल्य वस्त्र और मुक्ताहार-यह सब ही अग्नि ज्वाला समान सर्वांग को दाहकारक है। हे विधाता! तूने इन्हें उत्तम कुल में उत्पन्न करके मेरा पति क्यों नहीं बनाया? और ऐसा ही किया तो मुझे जीवित क्यों रखा?
प्रियवर! आपके बिना जो दिन व्यतीत होता है, वह ऐसा लगता है कि पूर्व संचित पापक्रम का फल आज भोगती हूँ।
यदि कदाचित् यशोधर महाराज यमपुर पहुँच जाये तो मैं नृत्य करूँगी और चैत्र माह में नैवेद्य से कात्यायिनी देवी की पूजा करूँगी।’
राजन! वह अमृतादेवी उपरोक्त प्रकार से नम्र वचनों द्वारा अपने प्रेमी कुबड़ा को
यशोधरचरित्र
सन्तोषित करके गाढ़ आलिंगन करने लगी। उस समय दोनों प्रेमी प्रेम सागर में निमग्न होकर भय और लज्जा को एकदम भूल गये।
नृपवर! उस समय उन दोनों की अवस्था देखने से मेरे / यशोधर के क्रोध का पार नहीं रहा। मैं तत्काल तलवार बाहर निकालकर दोनों को मारने हेतु उद्यत हुआ ही था कि उसी समय मन में विचार आया कि जिस तलवार से वीरों का संहार किया, जिस तलवार से राजाओं का विनाश किया, जिस तलवार से महा भयंकर सिंहों का नाश किया, उसी तलवार से इन दोनों को किस प्रकार मारूँ? जिस तलवार से योद्धाओं को मारा है, उस तलवार से ऐसे रंक को किस प्रकार मारूँ? इत्यादि प्रकार से चिन्तन करके मैंने क्षमास्वरूप जल से क्रोधाग्नि को शान्त किया। तत्पश्चात् तलवार को म्यान में रखकर, जिस प्रकार आया था, उसी प्रकार गुप्त रीति से जाकर शैय्या पर सोते-सोते हृदयवासिनी दुष्टा के चरित्र का स्मरण करने लगा। कि- हा! धिक्कार है तुम्हारी बुद्धि को! तुम्हें यह भी विचार नहीं आया कि कहाँ तो मेरा उच्च क्षत्रिय कुल और कहाँ तो उसका रंक कुल? कहाँ तो समुद्रान्त पृथ्वी के अधिपति की प्राणवल्लभ और कहाँ तो यह हाथी-घोड़ों की बची हुई जूठन में आजीविका चलाकर पेट भरनेवाला दरिद्री कुबड़ा।
हा! धिक्कार! तूने यह भी विचार नहीं किया कि मेरा पति राजाधिराज है और एक नवयौवन पुत्र विद्यमान होने पर भी ऐसे नीच, दरिद्री, उच्छिष्ट भोजी, मलिन गात्र, कुबड़ा के साथ किस प्रकार रमण करती है?
हा! अमृता! तेरी बुद्धि एक साथ ही नष्ट हो गयी। तुझे यह नीच कुल्य करते हुए किंचित् भी लज्जा नहीं आयी। जिस वृक्ष की शाखा पर हंस बैठता है, उसी वृक्ष की शाखा पर बगुला भी बैठता है!
राजन! उपरोक्त विचार करते-करते यशोधर महाराज गोपवती, वीरवती और रक्ता, इन दुराचारी स्त्रियों के चरित्र का स्मरण करने लगे।
गोपवती का चरित्र
यशोधरचरित्र
हा ! धिक्कार ! तूने यह भी विचार नहीं किया कि मेरा पति राजाधिराज है और एक नवयौवन पुत्र विद्यमान होने पर भी ऐसे नीच, दरिद्री, उच्चिष्ठ भोजी, मलिन गात्र, कूबड़ा के साथ किस प्रकार रमण करती हूँ ?
गोपवती का चरित्र
किसी एक गाँव में महाव्यभिचारिणी कुलटा गोपवती नामक स्त्री अपने पति के यशोधरचरित्र
हाय..! मेरे पति ने मेरा होंठ काट लिया। उसकी आवाज सुनकर परिवार के सभी लोग एकत्रित हो गये। जब सबेरा हुआ तब, राजदरबार में जाकर राजा के समक्ष सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। राजा ने तुरन्त ही सुदत्त को आरोपी जानकर शूली पर चढ़ाने का आदेश दिया। जब राज कर्मचारी सुदत्त को लेकर चलने लगे, तब एक वीरभट नामक पथिक ने, जो कि वीरवती के दुष्चारित्र का पूर्णतः जानकार था, उसने राजा को समस्त रहस्य कह दिया। कहा कि श्री महाराज ! यदि मेरी बात सत्य न लगती हो तो मृतक अंगारक का मुँह देखा जाये, उसमें वीरवती के कटे हुए होंठ का टुकड़ा अवश्य होगा। यह सुनकर जब महाराज की आज्ञानुसार मृतक अंगारक का मुख देखा गया तो उसमें से होंठ का टुकड़ा निकला।
तत्पश्चात् राजा ने वीरवती का चरित्र जानकर सुदत्त को दण्डमुक्त घोषित किया और वीरवती को शूली की सजा सुनायी। उस समय सब लोगों ने कुलटा वीरवती का साहस देखकर अत्यन्त आश्चर्य से कहा कि, देखो ! इस पापिनी ने अपना दुष्कर्म छुपाने के लिये बेचारे निरपराध सुदत्त को अपराधी प्रसिद्ध किया।
रक्तारानी की कथा
अयोध्या के राजा देवरति की रानी का नाम रक्ता था। वह बहुत ही सुन्दर थी। राजा, विषय लम्पटी होने से सदा रानी के पास ही बैठा रहता था। राज्यकाज में कुछ भी ध्यान नहीं देता था। धर्म, अर्थ और मोक्ष पुरुषार्थ का परित्यागकर विषय-वासना का दास बने रहने से दुर्गति होती है, देवरति की भी ऐसी ही दशा हुई।
मन्त्रियों को उसकी उदासीनता बहुत ही खराब लगने लगी। उन्होंने राजा से राज्य संभालने की प्रार्थना भी की, परन्तु फल कुछ भी नहीं निकला। इस कारण देवरति के पुत्र जयसेन को राजा नियुक्त करके, देवरति को रानीसहित देश से निष्कासित कर दिया गया।
अरे…रे ! इस विषय-वासना को धिक्कार है कि जिससे मान-मर्यादा धूल में मिल जाती है और कष्ट भी सहन करना पड़ता है।
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
राजा देवरति अयोध्या से निकलकर एक भयानक जंगल में आ गया। वहाँ रानी को तीव्र भूख लगी, इसलिए रानी को यमुना के किनारे एक वृक्ष के नीचे बिठाकर राजा भोजन के लिये समीप के गाँव में गया। यमुना के किनारे एक सुन्दर बगीचा था। उसमें कोई अपंग मधुर आवाज में गीत गा रहा था। उसके गाने की मधुर आवाज रक्तारानी के कान में पड़ी। रानी गानेवाले पर मोहित हो गई और वह लाज-शर्म छोड़कर अपंग के पास गई। उसके समक्ष अपनी काम वासना प्रगट की। यद्यपि वह अपंग कोई सुन्दर नहीं था, तथापि रानी उस पर मुग्ध हो गई। सत्य ही है, काम जात-पात नहीं देखता। रानी की पाप वासना सुनकर अपंग घबरा गया और बोला हे देवी ! मैं एक भिखारी हूँ और आप राज रानी हो। यदि राजा अपने को एकसाथ देखेगा तो जीवित नहीं रहने देगा। आपके तेजस्वी और शूरवीर पति की याद आते ही मेरा शरीर काँप उठता है; अतः मुझे क्षमा करो।
रानी ने उसे धैर्य बँधाकर कहा कि तुम चिन्ता मत करो, मैं अभी राजा को मार दूँगी। अहो ! कुलटा क्या-क्या अनर्थ नहीं कर सकती ?
उसी समय राजा भोजन लेकर आ गया। उसे देखते ही रानी माया फैलाकर रोने लगी। राजा, रानी को रोते हुए देखकर, भोजन को एक तरफ रखकर रानी के पास गया और बोला कि हे प्रिय ! तुम क्यों रोती हो ? क्या किसी ने तुम्हारा अपमान किया है ? अकस्मात् तुम्हारे रुदन से मेरा धीरज छूटा जा रहा है। अपने रोने का कारण शीघ्र ही मुझको बताओ। रानी एक लम्बी श्वांस लेकर बोली - प्राणनाथ! आपके रहते कौन मुझे कष्ट दे सकता है ? परन्तु मुझे इस बात का बड़ा दुःख होता है कि आज आपका जन्मदिन है और मेरे पास एक फूटी कोड़ी भी नहीं है। मैं आज आपके जन्म का उत्सव किससे मनाऊँ ? रानी की प्रेम भरी बात सुनकर राजा का हृदय भी भर आया और आँख में से आँसू टपकने लगे। राजा ने रानी से प्यार भरे शब्दों में कहा कि प्रिये ! उसके लिये क्या चिन्ता है ? कभी वह दिन भी आ जायेगा, जब तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। तुम्हारे जैसी भाग्यशालिनी जिसकी प्रिया हो, जिसके लिये मैंने राज-पाट को तुच्छ समझा, उसे ऐसी छोटी-छोटी बातों से क्या दुःखी होना चाहिए ?
यशोधरचरित्र
राजा को यह स्वप्न में भी पता नहीं था कि यह कुलटा निष्कपट प्रेम का बदला प्राण लेकर लेगी।
देव की गति विचित्र है। राजा के ऐसे सच्चे प्रेम का उस पापिनी के पत्थर हृदय पर जरा भी असर नहीं हुआ। रानी ऊपर से प्रेम दर्शाते हुए बोली नाथ ! जो बात नहीं हो सकती, उसकी चिन्ता करना व्यर्थ है, तो भी मैं अपने चित्त की शान्ति के लिये इस पवित्र पुष्पमाला से आपके जन्मदिन का उत्सव मनाऊँगी।
ऐसा कहकर रानी ने फूल गूँथने की डोरी से राजा को बाँध दिया। राजा समझा कि रानी जन्मदिन की विधि पूर्ण कर रही है; अतः राजा एक भी शब्द नहीं बोला। राजा को अत्यन्त मजबूती से बाँधकर रानी ने ईशारे से अपंग को बुलाया और उसकी सहायता से यमुना के किनारे ले जाकर राजा को नदी में फेंक दिया और कुलटा रानी उस अपंग के साथ वह अपनी कुत्सित मनोवृत्ति पूर्ण करने लगी। नीचता और कुलटापन की हद हो गयी।
जब पुण्य का उदय होता है तो मनुष्य भयंकर दुःखों से भी बच जाता है। राजा देवरति के भी कोई ऐसा पुण्य-उदय हुआ कि जिससे वह नदी से बच गया। वह नदी से निकलकर मङ्गलपुर शहर के समीप पहुँचा। कितने ही दिनों से चलते रहने के कारण वह थक गया था; इस कारण अपनी थकावट दूर करने के लिए एक छायादार वृक्ष के नीचे सो गया। मानो कि जैनधर्म की छत्रछाया में नींद ले रहा हो।
मङ्गलपुर का राजा श्रीवर्धन निःसन्तान था। उसकी उस समय मृत्यु हो गई, इसलिए मन्त्रियों ने विचार-विमर्श करके एक हाथी को जल से भरा हुआ कलश देकर छोड़ा कि यह हाथी जिसका अभिषेक करेगा, वह राजा बनेगा। कर्म की लीला अपरम्पार है। कर्म, राजा को रंक और भिखारी को राजा बना देता है। जब देवरति का समय प्रतिकूल था, तब उसे रास्ते का भिखारी बना दिया और पुण्योदय होने पर उसे राजगद्दी पर बैठा दिया।
देवरति, वृक्ष के नीचे सो रहा था, उसी समय हाथी ने आकर उसका अभिषेक किया। उसे धूमधामपूर्वक शहर में लाकर राज सिंहासन पर बिठाया गया। बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
पुण्य का उदय होने पर आपत्ति भी सुखरूप हो जाती है; इस कारण सुख की इच्छा करनेवालों को सदा धर्म पर विश्वास रखकर पूजा, दान आदि शुभकार्य करना चाहिए।
देवरति फिर से राजा हो गया, परन्तु उसकी दशा पहले जैसी नहीं रही। वह स्वयं राजकाज सँभालने लगा। जिन बुराइयों के कारण राज्य से भ्रष्ट हुआ था, वह उनको अपने पास फटकने भी नहीं देता था। स्त्री नाम से भी उसको घृणा थी। वह कुल कलंकी का बदला लेकर सभी स्त्रियों को कुल कलंकी कहने लगा। इसमें उसका दोष भी क्या था ? दूध से जला हुआ मनुष्य छाछ को भी फूंक-फूंककर पीता है। वह दान देता था लेकिन किसी भी लूले-लँगड़े को एक दाना भी देना पाप समझता था। वह एक अपंग के पाप का फल है।
इधर रक्ता रानी ने कितने ही दिन अपंग के साथ रहकर मजा किया। फिर अपंग को एक टोकरी में डालकर देश-विदेश घूमने लगी। वह जहाँ भी जाती, अपने को एक महासती प्रसिद्ध करती और कहती कि माता-पिता ने मुझे जिसके हाथ सौंपा, वही मेरा प्राणनाथ है। इस ठगाई में लोग बहुत धन देते थे। इस प्रकार भिक्षावृत्ति करते-करते वह मङ्गलपुर पहुँच गई। वहाँ भी लोगों को उसके सतीत्व पर अत्यन्त श्रद्धा हो गई। सत्य है, स्त्रियों ने जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देवताओं को भी ठग लिया, तब उनके जाल में सामान्य मनुष्य ठगा जाये तो उसमें आश्चर्य ही क्या है !!
एक दिन वे दोनों गाते-गाते राजमहल के सामने आये। द्वारपाल ने राजा से प्रार्थना की कि हे महाराज ! एक स्त्री अपने अपंग पति को टोकरे में लेकर खड़ी है। वे दोनों बहुत ही सुन्दर गीत गाते हैं और महाराज के दर्शन करना चाहते हैं। यदि आपकी आज्ञा हो तो उनको अन्दर आने दें। सभासदों ने भी उनको देखने की इच्छा जाहिर की। राजा ने परदा आड़े लगाकर उन दोनों को अन्दर आने की आज्ञा दी। तथाकथित सती सिर के ऊपर टोकरा लेकर अन्दर आई और उसने गीत गाया, जिससे सभी मुग्ध हो गये। राजा ने आवाज सुनकर उस सती की सत्यता को पहचान लिया। परदा दूर करके यशोधरचरित्र
कहा - अहा ! यह तो महासती हैं,
अच्छी तरह जानता हूँ। तत्पश्चात् राजा ने अपनी
हकीकत (आत्मकथा) सभा को सुनाई। लोग इस
हकीकत को सुनकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये
और रक्ता को शहर से बाहर निकाल दिया गया।
स्त्रियों का चरित्र देखकर राजा देवरति को वैराग्य
हो गया। उसने अपने पुत्र जयसेन को अयोध्या से
बुलाकर इस राज्य का भार भी सौंप दिया और स्वयं
यमधर आचार्य के समीप दीक्षा लेकर तपश्चर्या करने
लगा। अन्त में समाधिपूर्वक शरीर त्यागकर स्वर्ग में
ऋद्धिधारी देव हुआ।
रक्ता रानी जैसी रानी का घृणित चरित्र देखकर, सांसारिक सुख को क्षणिक समझकर, जिस देवरति राजा ने मुनिपद ग्रहण किया, वे सर्वगुण सम्पन्न मुनिराज मुझे मोक्ष प्रदान करें।
इस प्रकार स्त्रियों का चरित्र अत्यन्त ही अगाध है।
मारीदत्त महाराज से क्षुल्लक महाराज पुनः कहने लगे- 'राजन! इस प्रकार व्यभिचारिणी स्त्रियों के दुष्चरित्र का चिन्तवन करते हुए जब मैं - यशोधर सो रहा था, तब ही पसीने से भींगे हुए शरीर से वह अमृतादेवी अपने प्रेमी कूबड़ा से रमण करके मलिन मुख लेकर मेरे बाहुपाश में आकर सो गयी, जो मुझे विषपूर्ण सर्पिणी समान लगी अथवा मृतक डाकिनी ही मेरे निकट आयी, ऐसा मुझे लगा।
नृपवर ! उस समय यद्यपि वह मेरे बाजु में ही सो रही थी, तथापि मैं मन में चिन्तवन करने लगा कि- 'जैसे खाज खुजलाने में सुख होने के बाद वह दुःखी करता है, उसी प्रकार विषय सेवन में सुख होता है, वह वस्तुतः दुःख ही है। जो आभरणों का भार है, सर्व अंगों का दमन करता है और नृत्य आहार का दमन करता है। जो शरीर की लावण्यता है, बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
वह अशुचि रस को उत्पन्न करनेवाली है। जो स्नेह का बन्धन है, वह दुः ख का कारण है। जो स्त्री के रूपादिक का अवलोकन है, वह काम ज्वर को बढ़ानेवाला है। प्रिया का आलिंगन है, वह शरीर को पीड़ा करनेवाला है।
जो स्त्री के निरन्तर अनुबन्ध में राग है, वह दुःखपूरित कारागृह / जेल है और जो प्रेम है, वह ईर्ष्या की अग्नि है, उसमें जलता हुआ पुरुष आकुलित होता है और स्त्री -सेवनादि क्रिया से उत्पन्न होनेवाला काम है, वह स्त्रियों के हाथ का तीक्ष्ण हथियार है। उसके द्वारा ही दुष्टा व्यभिचारिणी पर पुरुषरता वनिता अपने पति का घात करके पश्चात् स्वयं भी मरण को प्राप्त होकर संसारवन में भ्रमण करती है।
जीवों को जो बाधाकारक विस्तीर्ण और उत्कृष्ट दुष्कृत्य का घर तथा भारी दुः ख है, उस इन्द्रियजनित सुख का पण्डित लोग किस प्रकार सेवन करें ? कभी भी नहीं करते। यह जो मनुष्य का शरीर है, वह रोगों का स्थान है क्योंकि यह शरीर धोने पर भी पवित्र नहीं होता, सुगन्धित करने पर भी सौरभित नहीं होता परन्तु शरीर के संसर्ग से उत्पन्न सुगन्धित पदार्थ भी दुर्गन्धमय हो जाते हैं।
यह क्षणभंगुर शरीर पुष्ट करने पर भी बलवान नहीं होता, प्रसन्न करने पर भी अपना नहीं होता, दीक्षा से दीक्षित करने पर भी क्षुधा के लिये अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं, अनेक उत्तम शिक्षा देने पर भी अवगुणों में रमण करने लगता है, शान्त करने पर भी दुःखी रहता है, धर्म शिक्षा देने पर भी धर्म से विमुख रहता है।
यह नाशवान शरीर तेलादिक का मर्दन करने पर भी रूक्ष रहता है, दवा का सेवन करने पर भी प्रचुर रोगों से घिर जाता है, अल्पाहार करने पर भी अजीर्ण से व्याप्त हो जाता है, शीतल पदार्थों का सेवन करने पर भी पित्तादि से व्याकुल होता है, वातनाशक तेलादि का मर्दन करने पर भी वात व्याधि से पीड़ित रहता है, अनेक प्रकार से प्रक्षालन करने पर भी कोढ़ से गलता रहता है।
अधिक कहाँ तक कहना ? यह शरीर अनेक प्रकार से रक्षित करने पर भी यमराज
के मुख का ग्रास बन जाता है। यद्यपि यह शरीर उपरोक्त प्रकार से विपरीत प्रवर्तमान होता है, तथापि रागी पुरुष इस शरीर के लिये अनेक प्रकार के पाप कर्मों में तत्पर रहते हैं। यशोधरचरित्र
इस प्रकार मेरे जैसा मूर्ख मनुष्य अपनी स्त्री के वश होकर पापकर्म करता और व्यापारादि में संलग्न होकर नरक में जाता है।
इस शरीर की यह अवस्था है और जिसके लिये अनेक पापकर्म करता हूँ, उस
प्रियतमा की भी यह दशा है तो अब मुझे भी समस्त कार्यों का त्याग कर देना चाहिए। इसलिए अब प्रातःकाल होते ही नगर, परिवार और राज्यलक्ष्मी का त्याग करके गहन वन में और सघन पर्वतों की गुफाओं का आश्रय करूँगा तथा देवेन्द्र, धरणेन्द्र, और नागेन्द्रों द्वारा पूजित मुनिपद धारण कर महातप का आचरण करूँगा।’
धरानाथ ! इस प्रकार चिन्तवन करते-करते प्रातः काल हो गया, तब प्रातः सम्बन्धी वाजन्त्रों की आवाज सुनकर शैय्या का परित्यागकर खड़ा हुआ। पश्चात् स्नानादि नित्य क्रियायें निपटाकर मैंने विचार किया कि जब कि अब मुझे इस शरीर से ही ममत्व नहीं है तो फिर इन रत्नजड़ित आभूषण और बहुमूल्य वस्त्रों से क्या प्रयोजन है ? इस शरीर संस्कार से काम की वृद्धि होती है, जिस कामदेव का फल मुझे प्रत्यक्ष प्राप्त हो गया है। इसलिए इसे धारण करना सर्वथा अनुचित है। उसी समय दूसरा यह भी विचार आया कि यदि मैं अभी ही सर्व आभूषणों का परित्याग करूँगा तो सम्पूर्ण अन्तःपुर में यह वार्ता विस्तरित हो जायेगी कि महाराज ने अवश्य कुछ अमनोज्ञ देखा है, इसलिए उदासचित्त होकर आभूषणों का त्याग किया है तथा मेरी सभा की पण्डित मण्डली समस्त अभिप्रायों की ज्ञाता है, अतः उनसे यह बात किसी भी प्रकार से गुप्त नहीं रह सकेगी। तदुपरान्त यह बात अनेकरूप धारण करके समस्त नगर में फैल जायेगी तो
प्रजाजनों के चित्त में अनेक प्रकार के विकल्प उत्पन्न होने लगेंगे; उनमें भी यदि अमृतादेवी को ज्ञात होगा तो स्वयं तो मरेगी ही परन्तु मुझे मारने का षड्यन्त्र भी करेगी। इस प्रकार अनेक विचार करके मैंने पूर्ववत् सभी वस्त्राभूषण धारण किये। वे मुझे ऐसे लगते थे मानो कि सर्व दुःखों का समूह मेरे सर्वांग में चिपट रहा हो।
राजन ! सर्व शुभाशुभ, जीवन, मरण, लाभ-अलाभ, सुख-दुःख और शत्रुकृत
घात के ज्ञाता, विपुल बुद्धि के धारक तथा समस्त ऋद्धि के समूह जिसे हस्तगत है, ऐसे योगीश्वर भी स्त्रियों के चरित्र को नहीं जान सकते तो फिर अन्य पुरुषों की तो बात ही क्या ?
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
हाथी, बाँधा जा सकता है; सिंह, रोका जा सकता है और संग्राम में प्रबल शत्रु भी जीता जा सकता है, परन्तु पर पुरुषासक्त स्त्री के चित्त को कोई भी बाँध नहीं सकता। नृपवर ! इस प्रकार के विचार करता हुआ मैं उदासचित्त सभा में गया और वहाँ रत्नजड़ित सिंहासन पर उपस्थित हुआ। उस समय की समस्त सभा यद्यपि सुखकर थी, तथापि मुझे—यशोधर महाराज को दुःखकर लगती थी।
राजन ! उस समय विद्वान् पण्डितों ने सरल वार्ता करना शुरु किया, जिससे मेरे हृदय में हर्ष उत्पन्न होने लगा। उस समय सभा मण्डप में सुकवि के काव्य की भाँति मेरी माता चन्द्रमती का शुभागमन हुआ। उस समय मैंने तपश्चरण का उपाय मन में विचारकर मिथ्या स्वप्न का वृत्तान्त माता को कहा।
मैंने कहा—'हे माता ! आज रात्रि को मैंने एक भयानक स्वप्न देखा है। मैंने देखा एक विकराल पुरुष हाथ में शस्त्र लेकर मेरे सन्मुख खड़ा था और मुझे कह रहा था कि तू जिनराज की दीक्षा धारण कर, नहीं तो मैं तुझे यमपुर पहुँचा दूँगा। ऐसा कहकर वह तुरन्त ही अदृश्य हो गया। माता ! वह विकराल मूर्ति अभी भी मेरे नेत्रों के समक्ष तैर रही है; इसलिए मुझे कुछ नहीं रुचता। किसकी पृथ्वी और किसका राज्य ? किसकी स्त्री और किसका पुत्र ? मुझे किसी से कुछ प्रयोजन नहीं है। अब तो केवल आत्मकल्याण ही इष्ट है। इसलिए मैं समस्त परिग्रह का त्याग करके और दुःसह्य इन्द्रियों पर विजय प्राप्तकर जिनदीक्षा धारण करके महातप करूँगा।
हे माता ! रात्रि को मैंने जो निकृष्ट स्वप्न देखा है, उससे मैंने यह निश्चित किया है कि यशोमति नामक मेरा जो पुत्र है, उसे राज्य के पद पर स्थापित करना योग्य है। माता ! दुष्ट स्वप्न की शान्ति के लिये जिनदीक्षा के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है।’ मेरे ऐसे वचन सुनकर मुनि के गुणों का घात करनेवाली और मिथ्यात्व के विष से दूषित मेरी माता कहने लगी—
‘पुत्र ! चिन्तित मनोरथ और समस्त आज्ञाओं को पूर्ण करनेवाली कुलदेवी-चण्डमारी के निकट समस्त जीवों के युगलों की बलि देने से दुःख, क्लेश, कलह और दुःस्वप्न आदि समस्त कष्ट शान्त हो जाता है, अतः तुझे भी अवश्य शान्ति होगी; इसलिए हे पुत्र ! तू भी कुल देवी की सेवा में तल्लीन होकर शान्ति करने का उपाय कर।’
यशोधरचरित्र
क्षुल्लक—अहो राजन मारीदत्त ! जब मेरी माता ने दयारहित उपर्युक्त वचन कहे, उस समय करुणा से कम्पित हृदय मैंने (यशोधर राजा ने) इस प्रकार कहा— 'अहो माता ! महापाप के कारणरूप प्राणियों का वध करना किस प्रकार उचित है ? क्योंकि जीव-हिंसा के समान न तो कोई पाप हुआ है और न होगा। जो दूसरे जीव का अकल्याण-बुरा करके अपनी रक्षा करना चाहता है, वह अग्नि से शीतलता की चाह करता है।
यह तो प्रत्यक्ष है कि जो दूसरे का भला करता है, उसका भला होता है और जो दूसरे का बुरा करता है, उसका बुरा होता है; उसका भला तीन काल में नहीं हो सकता क्योंकि जीव घात में तो प्रत्यक्ष पाप है और पाप का फल दुःख है; अतः उससे शान्ति कैसे होगी ? कभी भी नहीं होगी।
मातुश्री ! जो जीव का घातक है, वह उस जीव से अनेक प्रकार से घाता जाता है इस प्रकार पापरूपी नौका में बैठकर विघ्नरूपी नदी किस प्रकार पार की जा सकती है ? इसके अतिरिक्त एक बात यह भी विचारणीय है कि यदि जीवघात में ही धर्म हो और उससे ही विघ्नों की शान्ति होती हो तो पाप किस कार्य में होगा ? इस बात को सभी धर्मवाले मानते हैं और यह वाक्य हमेशा बोला जाता है कि ‘अहिंसा परमोधर्मः’। इस वाक्य से विरोधी कोई नहीं है तो फिर ‘जीवघात में धर्म होता है’ ऐसा कहनेवाला कौन होगा ?
माता ! पूर्व काल में असंख्य महापुरुष, काल का ग्रास होकर परलोकवासी हो गये हैं, तो क्या उस समय चण्डमारी देवी नहीं थी अथवा नैवेद्य और पशुओं का समूह नहीं था ? अथवा मद्य-माँस का सरस भक्षण नहीं था ? या फिर इस विधि का कोई ज्ञाता नहीं था कि जो चण्डमारी देवी को पशु तथा मद्य आदि की बलि देकर, सन्तुष्ट करके मरण से बच जाये ?
इससे यह निश्चित होता है कि चण्डमारी देवी में ऐसी शक्ति नहीं है कि किसी जीव को काल से बचा सके और उसे शान्ति प्रदान कर सके।
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
वास्तविकता तो यह है कि संसार में जितने जीव हैं, वे अपने-अपने कर्मों के आधीन सुख-दुःख का भोग करते हैं। कोई भी किसी का उपकार नहीं करता परन्तु शुभाशुभकर्म ही अपकार और उपकार के कर्ता होते हैं।’
राजन् ! इस प्रकार मेरे वचन सुनकर माता कहने लगी—
'प्रिय पुत्र ! समस्त जगत् में धर्मरूप वृक्ष का मूल वेद है; इसलिए वेद द्वारा जो मार्ग सम्पादित है, राजाओं को उसी का पथिक बनना उचित है और वेद में देवताओं के लिये पशुओं का घात करना पूजनीय और प्रशंसनीय कहा गया है, इसलिए जीववध, पुण्य माना गया है और उसे करनेवाले महापुरुष स्वर्ग के अधिकारी माने गये हैं।
जो पशुओं का घात करता है और माँस का भक्षण करता है, वह स्वर्ग और मोक्ष की ओर गमन करता है। जैसा ब्रह्मा ने वर्णन किया है, उसी प्रकार विपुलमति के धारक सुगुरु भैरवाचार्य प्रतिपादन करते हैं।
प्रिय पुत्र ! उपर्युक्त कथनानुसार कुल देवी चण्डमारी के लिये पशुओं का बलिदान देकर शान्ति की स्थापना कर। उस महादेवी के समक्ष जीवों का हवन करने से तेरे समस्त शत्रुगण त्रासयुक्त होते हुए तेरे चरणों में नमस्कार करेंगे और तेरा यश समस्त दिशाओं में व्याप्त हो जायेगा।’
राजन् ! मेरी – यशोधर की - माता उपरोक्त उपदेश देकर जब मौन हो गयी, तब मैंने फिर से कहा—
'प्रिय माता ! तूने जो कुछ भी कहा, वह सब सर्वथा अनुचित और मिथ्या है, क्योंकि जो हिंसामार्ग के प्ररूपक, हिंसा के प्रणेता और हिंसा के उपदेश के श्रोता हैं, वे महाघोरतर पाप के करनेवाले महापापी हैं; और जो पुरुष तीक्ष्ण खड्ग की धार से पशुओं का घात करता है, वह निकृष्ट और पापी है।
जो पुरुष दीन पशुओं को बन्धन में डालकर त्रास देता है, उन्हें मारकर उनके माँस का भक्षण करता है तथा मद्य-पान करके देवता की भक्ति में लीन होकर नृत्य करता है, गीत गाता है और वादित्र बजाता है, वह सातों ही नरक की भूमि में उत्पन्न होकर ताड़ण, मारण, शूलीरोहण आदि असंख्य कष्टों का पात्र बनता है। जब वहाँ से बाहर निकलकर यशोधरचरित्र
कोई हिंसक तिर्यंच होकर अति रौद्र दुःखरूप कुयोनियों में भ्रमण करके किसी पुण्य के योग से यदि मनुष्य पर्याय धारण करे तो क्षुधावन्त, मूक, पंगु, बहरा, अन्धा, निर्बल, दीन, दरिद्री, दुःख से पीड़ित, नपुंसक, शक्तिहीन, तेजरहित, अविवेकी, गौ आदि पशुओं का घातक, चाण्डाल, नीच कर्म से आजीविका करनेवाला, हिंसक और क्रूर परिणामी होता है। तत्पश्चात् मरकर सिंह, शार्दूल, मार्जर, आदि पशु तथा सर्प, गृद्ध, आदि पक्षियों की योनियों में भ्रमण करके महावेदना भोगता है। पशुओं का वध करने से और पर की हिंसा से ही यदि धर्म होता हो तो बहुगुणी और मुनियों को पापी जीव किसलिए नमस्कार करते हैं ? मन्त्र संस्कारपूर्वक तीक्ष्ण खड्ग की धार से पशुओं का वध करो, दिशाओं में बलि चढ़ाकर अग्नि में हवन करके मुण्डन कराकर कसायले लाल वस्त्र धारण करो, अनेक नदियों में-सरोवरों में स्नान करके शरीर पर राख लगाओ, बड़ी जटा धारण करो, इन्द्रियों का दमन करके पंचाग्नि तप तपो, धूमपान करो, नग्न मुद्रा धारण करो, वन-पर्वत और गुफाओं में वास करो, आतापन-चन्द्रायण और शुद्धोदन आदि व्रतों का चिरकाल के लिये पालन करो, इत्यादि दूसरे अनेक दुष्कर तपों आचरण करो परन्तु जीव दया के बिना सब निष्फल ही नहीं, अपितु उनके धारक, घोर वेदनायुक्त नरकों के कष्टों को सहन करके अनन्त काल तक भ्रमण करते हैं।
करोड़ों शास्त्रों का सार एक ही है कि जो पाप है, वह हिंसा में है और जो धर्म है, वह जीवदया में है।
जो जीव, जीवों की हिंसा करता है, वह अनेक जन्मों में अनेक रोगों से ग्रसित होता हुआ अत्यधिक भार को सहन करनेवाला होता है। जो परजीवों को त्रास देता है, वह अनेक भवों में अनेक दुःखों का भोक्ता होता है।
हे माता ! मैं भी अमर तो नहीं, तो फिर इस शरीर के लिये परजीवों का घात किस प्रकार किया जा सकता है ?’ - ऐसा कहकर तीक्ष्ण खड्ग म्यान में से निकालकर निज मस्तक काटने के लिये उद्यत हुआ कि तुरन्त ही मेरी माता के हाहाकर करने से निकट बैठे हुए नर रत्नों ने मेरी तलवार पकड़ ली।
तत्पश्चात् वृद्ध माता ने मेरे पैर में गिरकर कहा- 'हे पुत्ररत्न ! मैंने वास्तव में बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
असत्य कहा है परन्तु जीव चेतनतत्त्व गुण विशिष्ट है और शरीर अचेतन है। इस कारण शरीर का घात करने से पौद्गलिक शरीर को ऐसा पता नहीं पड़ता कि मुझे काटा जा रहा है अथवा मेरे शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा होती है । तदुपरान्त शरीर का नाश होने से नित्य आत्मा का नाश नहीं होता।
इसलिए हे पुत्र ! अपनी कुल परम्परा से चला आया हुआ जो मार्ग है, उसे स्वीकार करना ही सर्वथा उचित है।’
पैरों में गिरी हुई माता ने ऐसा कहा तब मैंने-यशोधर महाराज ने कहा कि- ‘हे माता ! यद्यपि इस कार्य में अधर्म ही है, तथापि तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा, तत्पश्चात् तपश्चरण धारण करूँगा।’ यह सुनकर मेरी माता सहर्ष खड़ी हो गयी।
तत्पश्चात् लेपकार को बुलाकर आटे का मुर्गा लाने का आदेश दिया। मेरी माता ने जब हास्यपूर्वक लेपकार से आटे का मुर्गा मँगाया कि तुरन्त ही वह उत्कृष्ट वर्ण का धारक मुर्गा ले आया। उस मुर्गे के रंग-रूप को देखकर ऐसा ही लगता था कि यह आटे का नहीं परन्तु सचमुच ही जीवित मुर्गा है और अभी चलने लगेगा।
महाराज ! जब मेरी-यशोधर महाराज की दृष्टि उस मुर्गे पर पड़ी तो तुरन्त ही मेरी माता के आदेश से ढोल, नगाड़े, मृदंग, शंख, बाँसुरी ओर झांझर आदि वादित्रों की आवाज से आकाश गुंजायमान हो गया।
राजन मारिदत्त ! उस समय मेरी माता ने कहा कि- ‘प्रिय पुत्र ! अब विलम्ब का समय नहीं है। अब तुरन्त ही देवी के लिये बलि चढ़ाना चाहिए।’ इस प्रकार माता की आज्ञानुसार उठकर समस्त मण्डली तथा पूजा करनेवाले ब्राह्मणों के समूह के साथ हम महोत्सवपूर्वक कुल देवी के मन्दिर की ओर रवाना हुए। वहाँ हम दोनों माता-पुत्र ने देवी की प्रदक्षिणा करके सामग्री से देवी का पूजन किया; तत्पश्चात् देवी के समक्ष तीक्ष्ण छुरी से मुर्गे का घात करके उसमें से प्रवाहित लाल रंग के पानी में रुधिर की कल्पना करके देवी के अंगों का सिंचन किया और उस आटे से बने हुए शरीर में माँस की कल्पना करके देवी के सन्मुख चढ़ा दिया। तत्पश्चात् हम दोनों माता-पुत्र ने देवी से प्रार्थना की कि -
यशोधरचरित्र
‘हे माता ! यह अपूर्व कार्य पूर्ण हो।’ इस प्रकार तीन बार कहकर फिर घी, मद्य आदि मिश्रित उस आटे के मुर्गे में माँस की कल्पना करके देवी का प्रसाद गिनकर सबको बाँट दिया और सबने खाया।
आहा ! उस संकल्पी हिंसा और कल्पनामात्र माँस भक्षण से जो पाप का बन्ध होगा, वह वचन अगोचर है।
तत्पश्चात् देवी को नमस्कार करके मैंने कहा कि- ‘हे माता ! तुम्हें देखकर सन्तोषी मनुष्य सन्ताप से मुक्त हो जाता है। हे देवी! तेरी कृपा से मुझे जंघाबल, बाहुबल, और अचल जीवितव्य प्राप्त हो । हे सुरेश्वरी ! भयंकर रण, अतिकष्ट और प्रियजन वियोग में मेरी रक्षा करो।’ इस प्रकार प्रार्थना करते हुए देवी के शरण को प्राप्त हुआ, परन्तु निकट आयी हुई मृत्यु को किंचित् भी जान नहीं सका।
तत्पश्चात् वापिस महल में आकर अपने पुत्र का स्वर्ण कलशों से अभिषेक
कराकर राज्यासन पर स्थापित किया। जिस समय मैं समस्त कार्यों से निश्चिन्त होकर तपोवन जाने के लिये उद्यत हुआ ही था कि इतने में अमृतादेवी ने अपना संकल्प दृढ़ किया अर्थात् वह अपने हृदय में विचार करने लगी कि रात्रि के समय कूबड़ा के साथ जो क्रिया की थी, वह स्वामी को ज्ञात हो गयी है और इसीलिए सामन्त, मन्त्री और समुद्रान्त पृथ्वी का राज्य छोड़कर तपश्चरण की इच्छा करते हैं। मैंने महाराज का भाव उनके शरीर की आकृति से जान लिया है। इस प्रकार चिन्तवन करती हुई अमृतादेवी अपने हृदय में दृढ़ संकल्प करके मेरे निकट आकर कहने लगी -
'स्वामी ! आपने जो यह दीक्षा अंगीकार करने का संकल्प किया है, वह अति उत्तम है परन्तु मेरी एक प्रार्थना है, उसे सहर्ष स्वीकार करने के पश्चात् तपोवन की ओर प्रयाण करें - ऐसी प्रार्थना है।
प्राणेश्वर ! आपकी मंगल कामना के लिये समस्त अन्तःपुर और नगर निवासी
लोगों को आमन्त्रण दिया है तो आप भी देवी के प्रसाद का भोजन ग्रहण करें। तत्पश्चात् हम दोनों जिनदीक्षा धारण करेंगे, क्योंकि आपके बिना इस जीवितव्य को मैं किस प्रकार रख सकूँगी ?
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
प्राणनाथ ! आज का दिन अभी घर में रहें, प्रातः काल होते ही जैसे कामदेव को रति, इन्द्र को शची, नारायण को लक्ष्मी, रामचन्द्र को सीता तथा महामुनि को शुद्ध बुद्धि अनुगामिनी होती है, उसी प्रकार आपके चरणों की दासी आपके पीछे तपोवन में चलेगी।
नाथ ! आपके साथ ही मैं तपश्चरण धारण करूँगी। यम-नियम का पालन करूँगी। प्रिय पते ! आपके बिना सब लोग मेरी जवानी पर ऊँगली करेंगे कि जिसका पति तो समस्त परिग्रह का त्यागी होकर वनवासी हो गया और यह अभी घर में रहकर सुख का भोग करती है।’
राजन मारिदत्त ! भवितव्य अत्यन्त ही बलवान है, मेरे चरणों में पड़ी हुई अमृतादेवी के वचन सुनकर, यद्यपि मेरा मन तो उससे अत्यन्त विरक्त हो गया था, तथापि भवितव्यता अनुसार फिर से उसके प्रेमजाल में फँस गया। नृपवर ! उस समय मैं फिर से ज्ञाननेत्र विहीन होकर उस परपुरुषासक्त दुष्टनी के रात्रिकृत कर्म को स्वप्न सदृश जानने लगा। तत्पश्चात् चरणों में गिरी हुई अमृता के कोमल हाथ को पकड़कर, उसे खड़े करके कहा कि— ‘प्रिये ! मैं तेरी इच्छा पूर्ण करूँगा।’ यह सुनकर वह कपटवेशा प्रफुल्लित होती हुई, हास्यपूर्वक रसोईया को उत्तमोत्तम भोजन तैयार करने की आज्ञा करते हुए कहने लगी कि ‘भोजन में क्या विलम्ब है ? शीघ्र तैयार करो।’
रसोईदार ने हाथ जोड़कर कहा— ‘स्वामिनी ! भोजन तो तैयार है। बस, महाराज के पधारने की देरी है।’
अमृतादेवी— ‘प्राणपति ! रसोई तैयार है, जीमने के लिये शीघ्र पधारें क्योंकि जब आपका भोजन हो जायेगा, तब दूसरों को भोजन कराया जायेगा।’
महाराज मारिदत्त ! इस प्रकार के प्रेमपूर्ण अमृतादेवी के वचन सुनकर, हर्षित होते हुए, कर्मों से प्रेरित मैं अमृता के महल की ओर गमन करने लगा। वहाँ स्फटिकभूमि में उज्ज्वल आसन पर माता सहित विराजमान हुआ। स्वर्ण के थाल में सरस व्यंजन समूह सुकवि के काव्य की तरह सरस अति मनोज्ञ दिखने लगे तथा भोजन के समय की सभा भी काव्य की भाँति सरस्वती लगती थी।
यशोधरचरित्र
वह अति कोमल, सरस, निर्मल और श्वेत उत्तम भात का भोजन कृतघ्नी जैसा लगता था। उस समय नये स्वर्णमयी छिलकेसहित और दो भागवाली दाल मेरी थाली में रखी हुई ऐसी लगी कि मानो खण्ड किये हुए यमराज के बाण ही न हों ! राजन् ! उस रसोईया ने, गरम दूध, घी, और उत्तम दही मेरी थाली में रखा, वे ऐसे लगते थे मानो दुष्ट गृहिणी के संगम में यमपुर का मार्ग ही एकत्रित हुआ है।
तत्पश्चात् मोदक भी दिया गया। वह तीव्र विषयुक्त मोदक, वही अमृतादेवी ने प्रेमपूर्वक दिया। उसने कहा—‘प्राणनाथ ! यह मोदक मेरी माता ने भेजा था, जो मैंने आपके लिये रखा हुआ था। आज आपको देती हूँ; इसलिए आप सर्व प्रथम इस अमृतमय अति स्वादिष्ट मोदक का स्वाद लीजिये ।’ तत्पश्चात् अनेक मसालों सहित तीक्ष्ण तलवार जैसी सब्जियाँ भी परोसी गयीं।
नृपवर ! यद्यपि मैं दुष्ट पत्नी के चरित्र से विरक्त था, तथापि उसकी प्रेमसहित की मोहनी बातों से मोहित होकर ज्ञानशून्य हो गया। उस समय मुझे कुछ भी विचार नहीं रहा अर्थात् समस्त उत्तम व्यंजनों को छोड़कर सर्व प्रथम मोदक का ही हम दोनों माता-पुत्र ने भक्षण किया।
उस तीव्र विष की वेदना से दोनों का सिर घूमने लगा। जब मैंने जान लिया कि इसमें हलाहल विष है, तब मेरे मुँह से वैद्य… वैद्य… शीघ्र वैद्य को बुलाओ… इतने ही शब्द निकल सके और मैं तुरन्त ही मूर्च्छित होकर धराशायी हो गया।
उसी समय वह दुष्टा-कपटी मेरी पत्नी अमृता, हा नाथ ! हा नाथ ! शब्द बोलती हुई दहाड़ मारने लगी। तत्पश्चात् मुझ पर गिरकर अत्यन्त कठोरता से मेरा गला दबाकर मुझे मार दिया।
राजन ! पश्चात् उसने विचार किया कि यदि वैद्य आयेगा तो मेरा कपट पकड़ा जायेगा, इसलिए कुछ ऐसा विचार करूँ कि वैद्य आ जाने से भी मेरी मायाचारी का किसी को ज्ञान न हो सके। इस प्रकार विचारकर उसने अपने दाँत से मेरा गला दबाकर मुझे मारा और ‘हा नाथ ! हा नाथ !’ करके लोगों को दिखाने के लिये दहाड़ मारकर रुदन करने लगी। उसकी आवाज से समस्त परिवार और समस्त अन्तःपुर एकत्रित हो गया। बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
राजन ! जो पुरुष व्यभिचारिणी कुलटा के वचनों का विश्वास करता है, वह मेरी तरह नष्ट हो जाता है।
उस समय सज्जन पुरुषों के मन और नेत्रों को आनन्ददायक मेरे पुत्र को सूचना मिलते ही शरीर कम्पित होने लगा और वह धरती पर इस प्रकार गिर पड़ा मानो वज्रपात से पर्वत गिर पड़ता है।
तत्पश्चात् सचेत होकर 'हा नाथ! हाय पिता! आपके बिना समस्त जगत्
अन्धकारमय ज्ञात होने लगा है। अब इस अवन्ति का स्वामी कौन होगा ? हे पिता ! आपके बिना यह राज्य अब रुचिकर होने के बदले दुःखदायक हो गया है। हे पिता ! इस विशाल राज्य पर अब वज्रपात हो तो भी मुझे कुछ प्रयोजन नहीं है।’ इत्यादि प्रकार से रुदन करते-करते पुकार करने लगा।
हे राजन! उस समय मेरे पुत्र की ऐसी दशा देखकर वृद्ध मन्त्री, सेनापति आदि मुख्य कर्मचारीगण और वृद्ध कुटुम्बीजन उसे सम्बोधन करने लगे कि—'हे पृथ्वीनाथ ! जैसे बने वैसे इस दुःखसहित अश्रुपात को रोककर चित्त में समाधान करो। इस समस्त संसार में जितने महापुरुष हुए, वे सब ही काल का ग्रास बन गये हैं। इस पृथ्वी पर महाराज नल, नहुष, सगर, आदि बड़े-बड़ प्रजापालक हुए परन्तु सब ही काल के वश होकर मृत्यु को प्राप्त हुए हैं। इस पृथ्वी पर वेणुपाल आदि महाबली राजा हुए, उनका भी काल ने नाश किया। महाराज ! पूर्व में नारायण, प्रतिनारायण, हलधर, चक्रवर्ती और कामदेव आदि महाप्रतापी तीन खण्ड और छह खण्ड के नाथ अनेक राजा हुए। उन्होंने पृथ्वी पर अनेक अद्भुत कार्य किये परन्तु वे भी यमराज के मुख का ग्रास हो गये।
हे चिरंजीवी ! जो जन्म धारण करता है, वह मरण को साथ ही लाता है; इसलिए संसार की अवस्था जानकर शोक का परित्याग करो और शान्तचित्त से निज पिता और दादी का विधिपूर्वक अग्नि संस्कार करो।’
इस समय समस्त कर्मचारियों के सम्बोधन से यशोमति शोक का त्यागकर पिता और दादी के अग्निदाह का प्रबन्ध करने लगा। उस समय समस्त कुटुम्बियों के मुखमण्डल यशोधरचरित्र
की कान्ति नष्ट हो गयी, परन्तु उस दुष्टा अमृतादेवी ने यद्यपि बाह्य दिखावट से रुदन किया, तथापि उसके मुख की शोभा प्रसन्न ज्ञात होने लगी।
उदासचित्त यशोमति पुनः मन में सन्तप्त होने लगा और कहने लगा कि—‘पिता के बिना क्या जीवितव्य है ?’
पृथ्वीनाथ ! मेरे शोक से सम्पूर्ण अन्तःपुर की स्त्रियाँ शोक सूचक लाल वस्त्र धारण करके अनेक लोगों के साथ मेरे मृत देह के पीछे आती हुई ऐसी लगती थी मानो सूर्य के पीछे सन्ध्या गमन करती हो। मेरे शव के साथ जाते हुए सभी लोग ऐसे प्रतीत होते थे, जैसे कि चन्द्रमा के साथ अनेक नक्षत्र समूह गमन करते हैं। इसी प्रकार रुदन करते-करते महाकाल नामक यक्ष के मन्दिर की दक्षिण दिशा की ओर श्मशान में ले गये। वहाँ समस्त ही परिवारजन, अन्य देश के राजा और अन्य गाँव के लोग आये, परन्तु मलिनभाव की धारक दुष्टा, पापिनी कूबड़ा में आसक्त अमृता नहीं आयी।
नृपवर ! उपरोक्त समुदाय के बीच यशोमति ने पिता-दादी दोनों का अग्नि संस्कार किया। तत्पश्चात् मेरे नाम से अनेक ब्राह्मणों को एकत्रित करके उन्हें अनेक गायें, रत्न, स्वर्ण हार, बहुमूल्य उत्तम वस्त्र और अनेक गाँव प्रदान किये। अन्धे, लूले, लँगड़े, भिखारी, दरिद्री जीवों को अनाज दिया, वस्त्रादि दिये। तत्पश्चात् परिवार के लोगों को उत्तम भोजनादि से सन्तुष्ट किया।
पृथ्वीनाथ ! मेरे लिये यशोमति ने अनेक प्रकार के दान किये, तथापि मैं समस्त योनियों में उत्कृष्ट मनुष्य पर्याय को प्राप्त नहीं हुआ।
राजन ! देखो, संसारी जीव मिथ्यात्वकर्म के उदय से कैसे मोहित हो रहे हैं कि जिन्हें इस बात का भी परिज्ञान नहीं है कि जीव अपने ही शुभाशुभभावों से अनेक प्रकार के कर्म बाँधकर संसार में भ्रमण करता है और उसके लिये अन्य जन कितना भी दान- पुण्य करे, तथापि उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता, अपितु मिथ्यात्व का बन्ध होता है। यह अज्ञानी प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि पिता के खाने से पुत्र का पेट नहीं भरता, उसी प्रकार पुत्र के भोजन करने से पिता का पेट नहीं भरता। जब निकट बैठे हुए का पेट नहीं भरता तो फिर जो दूसरी गति में चला गया है, उसके निमित्त से जो कुछ भी दिया जाये, वह उसके पास किस प्रकार पहुँच जायेगा ?
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
विषयासक्त जीव तब तक अति घोर संसार में ही भ्रमण करता है, जब तक
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को प्राप्त नहीं करते या उनका चिन्तवन नहीं करते। प्रजापति ! यह तो निश्चय है कि समस्त जीव अपने किये हुए कर्मों के अनुसार संसार में भ्रमण कर अनेक योनियों में उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार मैं अपने कर्मों के आधीन मृत्यु प्राप्त करके हिमवान पर्वत की दक्षिण दिशा के क्षुद्र वन में मयूर के उदर में उत्पन्न हुआ। वह वन बाघ, सिंह, हाथी, गैंडा, हिरण और भालुओं के समूह से भयानक है। उस वन में बाघ के समूह हिरणों का घात करते हैं और सिंहगण मदोन्मत्त हाथियों के समूह से युद्ध करते हैं।
उस निर्जन वन में कहीं गिद्ध आदि पक्षियों के समूह निवास करते हैं, कहीं सर्प और नेवला युद्ध करते हैं; कहीं भीलों का समूह राहगीर को लूटने के लिये इन्तजार करके खड़े हैं, कहीं बन्दर और लंगूर वृक्ष की शाखाओं को कम्पित करते हुए घोर शब्द करते हैं, कहीं अष्टापद के समूह विचरते हैं, कहीं कस्तूरी के लिये हिरणों के घात में अनेक दुष्टजन विचार रहे हैं।
वृक्षों के समूह से सघन वन में अश्रु परिणामों के योग से दुःख से व्याप्त मयूर कुल में मुझे कुकर्म ने उत्पन्न किया।
राजन ! उस भयानक वन में मयूरी के तीव्राग्नियुक्त उदर में उत्पन्न हुआ। मैं वहाँ, जिस प्रकार दुष्टजनों के वचन से सज्जन पुरुष जलते हैं अर्थात् दाह को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार मयूर की उदराग्नि में जलने लगा। जिस प्रकार तपी हुई कढ़ाई में नारकी दुःखी होते हैं, उसी प्रकार मैं भी दुःखी हुआ। फिर मेरी माता मयूरी ने मुझे जन्म देकर विलाव आदि हिंसक जीवों के भय से काँटेवाले वृक्षों के खण्ड से आच्छादित रेत में अपने पँखों से ढाँककर पेट की गर्मी से संतप्त किया।
तत्पश्चात् दिन पूर्ण होने पर मुझे अण्डे में से बाहर निकाला। फिर जब तक मैं चलने और उड़ने योग्य नहीं हुआ, तब तक मेरी माता ने मुझे अपने चोंच से अन्न-कण खिलाये, उनसे ही मेरा उदर पूर्ण होता था।
यशोधरचरित्र
इस प्रकार काल व्यतीत करते-करते एक दिन वन में भ्रमण करती हुई माता को दुष्ट भील ने मार दिया और मुझे जीवित ही पकड़ लिया। फिर माता को एक वस्त्र में बाँधा और मुझे दूसरे वस्त्र में लपेटकर अपने घर की ओर चल दिया।
नृपवर ! उस समय मैं अनेक प्रकार से रुदन भी करता था परन्तु उस दुष्ट शिकारी के हृदय में जरा भी दया नहीं आयी। उस भील ने गाँव में जाकर मेरी मृत माता को तो कोतवाल को बेच दिया और मुझे अपने घर ले जाकर पिंजड़े में बन्द कर दिया। तत्पश्चात् मुझे देखकर भीलनी ने अपने पति से इस प्रकार कहा-
‘रे दुष्ट पापिष्ट ! तू इस बालक को क्यों लाया ? इसे मारने से क्या होगा ? इसका एक ग्रास भी नहीं होगा। क्या इससे पेट भर जायेगा ? तू बड़ी मयूरी तो कोतवाल को दे आया और छोटा बालक यहाँ लाया है। अब क्या तुझे खाऊँ ? रे नीच ! अब तू मेरे सामने से चला जा, मुझे अपना मुख मत दिखा।’
इस प्रकार अपनी पत्नी के कठोर और रूक्ष वचन सुनकर भील कहने लगा-
‘अरे दुष्टनी ! तू क्यों घबराती है ? अभी जाकर इस बच्चे को भी बेच आता हूँ। उससे जो कुछ पैसा मिलेगा, उसका अनाज लाकर तुझे देता हूँ, फिर अच्छी तरह से पेट भर लेना।’ ऐसा कहकर भील ने मुझे (मयूर बालक) को भी ले जाकर कोतवाल को बेच दिया। कोतवाल ने मुझे मारा नहीं परन्तु मेरा पालन-पोषण किया तथा कुत्ते, बिल्ली आदि जीवों से मेरी रक्षा की।
पृथ्वीनाथ ! उस कोतवाल के घर में मैं हंस की भाँति उसकी जैसी कान्तियुक्त शरीरवाला हुआ। मैं वहाँ अनाज के दाने खाकर मनुष्यों को आनन्दित करते हुए सुमधुर शब्द करता था।
नरश्रेष्ठ ! पापी जीवों के शरीर भी आहार के साथ बँधे हुए होते हैं। मैंने कोतवाल के घर में पेट भर भोजन किया, जिससे पंच वर्ण के रत्नों की माला जैसे पंख हुए तथा मेरा समस्त शरीर अति शोभायुक्त हो गया। मुझे देखकर हर्षित होकर कोतवाल ने विचार किया कि इस बालक को उज्जैनी नगरी ले जाकर महाराज यशोमति को भेंट करूँगा।
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
मदमति चन्द्रमति नामक मेरी माता का जीव उसी उज्जैनी नगरी में विसरस कुत्ते की योनि में उत्पन्न हुआ।
राजन ! मेरी माता चन्द्रमति जो कि विष्णु के चरणों की भक्त, ब्राह्मणों को भोजन के बाद बचे हुए माँस का भोजन करनेवाली, ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करनेवाली, निरन्तर चण्डिकादेवी को पूजनेवाली, देवी के लिये अनेक पशुओं को मारनेवाली, गंगा नदी के पानी को पवित्र माननेवाली, बकरा-हिरण-पाड़ा आदि से कुलदेवी और मृत पितृजनों को तृप्त करनेवाली और जैन मतानुयायी जीवमात्र के रक्षक नग्न दिगम्बर मुनियों की हमेशा निन्दा करनेवाली थी। वह अपने अशुभकर्मों की प्रेरणा से कुत्ते की योनि में उत्पन्न हुई। वह श्वान महाबलवान पवन समान वेग का धारक, चंचल और कुटिल वज्रसमान
कर्कश नखवाला, जो हाथ के प्रहार से हिरणों के समूह का विदारक था। वह महा विकराल और पाप क्रिया में रत श्वान, महाराज यशोमति को भेंट में आया और उसी दिन मुझे अर्थात् मयूर को भी कोतवाल ने ले जाकर महाराज को प्रदान किया।
राजन ! इन दोनों को देखकर महाराज यशोमति अति हर्षित हुआ और मुझे घर की शोभा बनाया अर्थात् महल में रखने का आदेश दिया। उस समय मेरे पुत्र यशोमति ने प्रेमपूर्वक मेरे समस्त अंगों पर हाथ फिराया और अत्यन्त प्रसन्नता करते हुए अपने हृदय में इस प्रकार विचार करने लगा—
निपुण विधाता ने यह कैसा मनोरंजक मयूर बनाया है ! जैसा मनोज्ञ मयूर है, वैसा ही मनोरंजक श्वान भी है। यह तो सिंह समान बलवान, अपने वेग से हिरणों के समूह का घातक है तथा मुझे तो ऐसा लगता है कि इस श्वान के समक्ष तो विष्णु महाराज का सूकर भी नहीं बच सकेगा !
राजन ! इस प्रकार विचार करते हुए तुरन्त ही कुत्ते को श्वान पालकों को हस्तगत किया। उन्होंने उसे यमराज तुल्य जानकर स्वर्ण की साँकल से बाँधा। मुझे महल के बीच छोड़ दिया। जिससे मैं आकाश में उड़ते हुए महल के शिखर पर क्रीड़ा करने लगा। उस समय आकाश में गर्जना करते हुए और ग्रीष्मरूप राजा को भगाने के लिये इन्द्र धनुष का धनुष धारण करते हुए बादलों को देखा।
यशोधरचरित्र
उस समय वर्षाकाल का आडम्बर देखकर मैं रोमांचित होकर नृत्य करने लगा।
पश्चात् जन्मान्तर का जातिस्मरण होने से अश्रुपात करते हुए रुदन करने लगा। उसी समय जमीन पर बैठा हुआ कूबड़ा, उसके प्रति आसक्त अमृतारानी को देखा। तत्काल पूर्व के बैर से ईर्ष्या के आवेश में मैं उन पर गिरा। पूँछ और नख से तथा चोंच द्वारा घात करने लगा। उसी समय रुधिर की धारा से व्याप्त अति विह्वल होकर दोनों व्यक्ति हाथ ऊँचे करके हाहाकार करते हुए पृथ्वी पर गिरे। फिर अमृतादेवी ने तुरन्त ही उठकर मणि की माला से मेरा पैर तोड़ दिया, इसलिए मैं विचार करने लगा—
जिस समय मैं सामर्थ्यवान अद्वितीय राजा था, उस समय तो इसका घात नहीं किया परन्तु इस समय इस कूबड़े पर प्रहार किया, इसलिए संक्लेश का कारण हुआ। राजन ! ऐसा विचार करते हुए मैं, यद्यपि मेरा पैर टूट गया था, तथापि वहाँ से जैसे- तैसे करके भागा परन्तु अमृता की आवाज पड़ने से अनेक दासियाँ मेरे पीछे दौड़ पड़ी और जिनके हाथ में जो आया, वह लेकर मुझे मारने लगीं। अनेक दासियाँ विविध प्रकार से मुझे मारने लगी, तथापि मैं भागता ही गया परन्तु देव ने फिर प्राण बचने नहीं दिये। माता के जीव कुत्ते ने अचानक आकर इस प्रकार से मेरा गला पकड़ा कि जिससे मैं प्राण विहीन हो गया। अरे रे ! देखो, संसार की विचित्रता ! जो माता मेरे अशोभन में विह्वल हो जाती थी, उसी माता के जीव कुत्ते ने दाँत से मुझे ऐसा पकड़ा कि मेरे पुत्र ने—महाराज यशोमति ने— मुझे छुड़ाने के लिये बहुत मेहनत की, तथापि उस दुष्ट कुत्ते ने नहीं छोड़ा, तब यशोमति ने क्रोधित होकर कुत्ते के सिर पर ऐसा दण्ड प्रहार किया कि तत्काल सिर के दो भाग हो गये और कुत्ते के प्राण भी निकल गये।
नृपवर ! देखो, कर्मों का विकार कैसा विचित्र है ? कि माता के जीव कुत्ते ने पुत्र के जीव मयूर को मारा और पौत्र ने दादी के जीव कुत्ते को मारा, फिर विलाप किया। महाराज ! उस समय मेरे मृत शरीर को देखकर यशोमति इस प्रकार विलाप करने लगा कि 'हा मयूर ! हा घर की लक्ष्मी के आभूषण ! तेरे बिना महल के शिखर और ध्वजाओं की शोभा कहाँ है ?
हा शिखिराज ! तेरे बिना घर की बावड़ी में घूमते हुए सर्प किस प्रकार नष्ट होंगे ? बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
हा शिखण्ड ! तेरे बिना विचित्र पुष्पों के बीच कामिनियों के शब्द सुनकर कौन नृत्य करेगा’ – इत्यादि। इस प्रकार मयूर के शोक से निवृत्त नहीं हुआ कि इतने में कुत्ते का मृत शरीर देखकर विह्वल होता हुआ विलाप करने लगा।
‘अहो श्वान ! केसर पत्र का भक्षण और स्वच्छ जल को क्यों नहीं पीता। हा श्वान ! अब यहाँ किस प्रकार शयन कर रहा है ? मेरे कुरुबिन्दु नामक वन में निवास क्यों नहीं करता ? क्या मेरे एक ही दण्ड प्रहार से मुझसे नाराज हो गया ? यह देख, स्वर्ण के पात्र में उत्तम भोजन दूध मिश्रित रखा हुआ है, वह क्यों नहीं खाता ? शीघ्रता से भागनेवाले हिरण वन में स्वेच्छाचारी हो रहे हैं। इसलिए हे श्वान ! इस समय उन हिरणों को मारने के लिये तेरे सिवाय दूसरा कौन समर्थ है ?’
राजन ! उपरोक्त प्रकार से चिन्तवन करने के पश्चात् जिस प्रकार से यशोधर और चन्द्रमति का अग्नि संस्कार हुआ था, उसी प्रकार मयूर और श्वान का अग्नि संस्कार किया गया। तत्पश्चात् उसी प्रकार पिण्ड दान, ब्राह्मण भोजन आदि समस्त कार्य किया गया। नराधीश ! देखो, मोहवश होकर सुपुत्र वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि सामग्री ब्राह्मणों को इस कामना से देता है कि मेरे मृत पिता के पास पहुँच जायेंगे परन्तु वहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता। ब्राह्मणों के वाणी जाल में फँसकर लोग ऐसा करते हैं, जिसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है।
धराधीश ! जिस समय मैं प्राणरहित हुआ कि तत्काल सुवेलगिरि के पश्चिम भाग में महाशुभ अरण्य के मध्य में कानी नेवली के गर्भ में उत्पन्न हुआ। उस निर्जन और भयंकर वन में उस क्षुधा-तृषा से पीड़ित शुष्क स्तना नेवली के उदर से जैसे ही मेरा जन्म हुआ कि मैं भी उसके दूधरहित स्तनों को चाटने लगा, परन्तु दूधरहित मेरी तृप्ति किस प्रकार होती ? फिर ग्रीष्म की ज्वाला से संतप्त होते हुए मैंने एक तुच्छ सर्प देखा और तुरन्त ही मैं उसे निगल गया।
उस समय मुझे सर्प का स्वाद अच्छा लगा; इसलिए मैंने बहुत सर्पों को खाया। अब मैं – नेवला, सर्पों को खाते हुए वृद्धि को प्राप्त होकर समय व्यतीत करने लगा। यशोधरचरित्र
धराधीश ! मेरी माता का जीव श्वान की पर्याय में से उसी वन में सूक्ष्म जीवों का भक्षण करते हुए तीक्ष्ण विष का धारक भयंकर सर्प हुआ। वह विषधर वन में क्रीड़ा करते हुए जैसे अपने बिल में जाने लगा कि तुरन्त ही मैंने उसकी पूँछ का भाग मुख से पकड़ लिया और उसे खाने लगा।
राजन ! ज्यों ही मैंने उसकी पूँछ काटी, उसने तत्काल पीछे घूमकर विकराल फण के घात से मेरे मुँह में विषाग्नि छोड़ दी, पश्चात् मजबूत दाँतों से मेरी पीठ की चमड़ी और हड्डियाँ तोड़ डाली, जिससे खून की धारा बहने लगी।
यह अवस्था देखकर फिर वापस मैंने उछलकर उसके फण को ऐसा काट खाया
कि वह तत्काल मरणान्त हो गया और मैंने भी उसके जहर के कारण अपने प्राण विसर्जित कर दिये।
नरश्रेष्ठ ! इस संसार में ऐसा कौन है कि जो कर्मों के फल का उल्लंघन कर सके ? इस कर्म के अनुसार ही असंख्य जीव एक-दूसरे के भक्षक बन रहे हैं। जिस प्रकार स्थावर-जंगम जीवों का दो-तीन-चार इन्द्रिय जीव भक्षण करते हैं, उसी प्रकार इन विकलेन्द्रिय जीवों को पंचेन्द्रिय जीव भक्षण करते हैं। जिस प्रकार पूर्व वैर के कारण जीव एक-दूसरे को मारते रहते हैं, उसी प्रकार मेरी माता के जीव सर्प और मेरे जीव नेवले ने परस्पर एक-दूसरे को मारकर कुयोनियों में उत्पन्न होकर बहुत दुःखों का अनुभव किया। राजन ! इस प्रकार कोई मेरे कथन को सुनकर यदि हिंसा का त्याग करेगा तो वह मदरहित परमात्मदशा को प्राप्त करेगा।
राजन ! उज्जैनी नगरी में क्षिप्रा नामक नदी है। मैं उस निष्ठुर सर्प के घात से मरण को प्राप्त होकर वापिस क्षिप्रा नदी में मछली के गर्भ में आकर स्थिर रहने लगा। तत्पश्चात् मछली के गर्भ से जन्म लेकर क्रमपूर्वक वृद्धिगत होते हुए बड़े-बड़े मगरमच्छों के शरीर को चीरने में समर्थ तथा आकाश में उछलना, उलटे गिरना, पानी में घूमना इत्यादि कार्यों में अति प्रवीण हो गया। इस प्रकार क्षिप्रा नदी के अति निर्मल स्वच्छ और चंचल जल में विचारते-तैरते और मछलियों के समूह को निगलते हुए काल व्यतीत करने लगा।
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
महाराज ! मेरी माता का जीव, जो कि सर्प हुआ था, वह मेरे घात से मरकर घोर कर्मानुसार उसी नदी में जीवों का अधिपति शंशुमार हुआ। देवयोग से मुझे देखकर पूर्व बैर के कारण जहाँ मुझे तीव्र नख और दाँतों से पकड़कर मारना शुरु किया था, कि इतने में महाराज यशोमति के महल की कोमलांगिनी चन्द्रवदना दासी निज-नुपुरों के शब्दों की झंकार करती हुई, सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभरणों से शोभायमान, दिव्य सुगन्ध से पूरित, कण्ठगत मुक्ताहार की पंक्ति से दिव्य रूपाकार, विनोदपूर्वक सरिता के स्वच्छ जल में क्रीड़ा करने लगी।
इस प्रकार जल में निश्चल तैरते-तैरते एक दासी ने दूसरी दासी को धक्का मारा तो दैव की विचित्रता देखो कि वह मेरे ऊपर आकर गिरी। उस समय शंशुमार ने जो मुझे पकड़ा था, वह मुझे तो छोड़ दिया परन्तु तत्काल उस दासी को पकड़कर नख और दाँत से विदारण करने लगा।
नृपवर ! उस समय हाहाकार करती हुई भयंकर कम्पित होती हुई सभी दासियाँ पानी से भागने लगीं। तत्पश्चात् रानी के सेवकों ने महाराज यशोमति के समक्ष जाकर विज्ञप्ति की कि श्री महाराज ! आपकी मान्य कुब्जा दासी को जलकेलि करते हुए माँसलुब्ध शंशुमार नामक नदी का जीव नख और दाँतों से चीरने लगा है।’
यह सुनकर क्रोधित होकर महाराज यशोमति ने कहा कि ‘ऐसा जीव किसे प्रिय होगा ? जिसने सूकर, मांसर, आदि वनवासी जीवों को जलपान करते समय भक्षण किया तथा स्नान क्रीड़ा करते समय अनेक स्त्री-पुरुषों को खाया, ऐसे दोष की खान इस शंशुमार नामक जीव को तुरन्त ही नेत्रों को असुन्दर और अग्नि की ज्वाला समान यमराज के नगर में पहुँचा दो।’
इस प्रकार कहकर, अनेक योद्धाओं सहित महाराज यशोमति ने स्वयं नदी के किनारे जाकर धीवरों को आदेश दिया कि ’ अत्यन्त शीघ्रता से इस नदी के गहरे बिल में से जिस प्रकार बने, उस प्रकार खोजकर शंशुमार को पकड़ो ।’
नृपवर ! महाराज यशोमति के क्रोधपूर्ण शब्दों से आकाश गुंजायमान हो गया। यह सुनकर अनेक धीवर शीघ्र ही शिप्रा नदी में कूद पड़े, तत्पश्चात् धीवर घूमते-घूमते कोलाहल शब्द करके शंशुमार को पकड़कर उसका कण्ठ छेदकर बाहर किनारे पर ले आये । यशोधरचरित्र
नृपवर ! उस समय शंशुमार को देखकर क्रोधित भाव में महाराज ने आदेश दिया कि ‘इस दुष्ट जीव को अग्नि में सेंको।’ यह सुनकर किंकरों ने अग्नि प्रज्वलित करके शंशुमार को अग्नि में हवन कर दिया।
राजन ! जब मैं नदी में क्रीड़ा कर रहा था, उतने में जिन्होंने मारने का विकल्प किया है, ऐसे धीवर हा-हाकार करते हुए आगे आये। उन धीवरों ने सघन जाल मुझ पर डाल दिया, जिससे मैं युद्ध में पराजित शत्रु की भाँति जाल में फँस गया। उस समय मैं, जिस प्रकार तीव्र मोह के उदय के वश होकर संसार जीव पीड़ित होता है, उसी प्रकार जाल में फँसकर धीवरों के पैर के प्रहार से अत्यन्त क्लेश को प्राप्त हुआ।
पृथ्वीनाथ ! जिस समय धीवरों ने जाल में फँसाकर मुझे नदी के किनारे रखा, उसी समय एक पुरुष ने कहा कि इस मत्स्य को मत मारो क्योंकि इसे मारने से अत्यन्त दुर्गन्ध व्याप्त हो जायेगी। ऐसा कहकर पूर्व भव के पुत्र यशोमति को दिखाया। यशोमति ने मेरा शरीर देखकर आगम वेदी ब्राह्मणों से मेरा शारीरिक वर्णन करने के लिये कहा, तब ब्राह्मणों ने मुझे उलट-पुलट कर सामुद्रिक शास्त्र से लक्षण इस प्रकार कहने लगे—
‘यह पाण्डुरोहित जाति का क्रूर मच्छ नदी के प्रवाह सन्मुख तैरता है तथा यह मच्छ देव और पितृजनों की बलि के योग्य है। श्री विष्णु भगवान् ने जगत् की रक्षा के लिये मत्स्यावतार धारण करके छह अंगयुक्त वेद को समुद्र में से निकाला है। इसलिए ब्राह्मणों ने वेद को अति पवित्र माना है’, इत्यादि कहकर ब्राह्मणों ने राजा को सम्मति दी कि यह मच्छ महारानी अमृतादेवी के महल में भेजना चाहिए। फिर क्या था, तुरन्त ही महाराज ने मच्छ को महल में ले जाने की आज्ञा प्रदान कर दी। इसलिए दुष्ट कर्मा किंकरों ने मुझे (अर्थात् मच्छ को) अमृतादेवी के मन्दिर में (महल में) पहुँचा दिया और बहुत समय तक मुझे जीवित रखा।
नृपवर ! वहाँ पहुँच जाने से ब्राह्मणों का प्रयोजन सिद्ध हो गया अर्थात् किसी एक प्रसंग पर ब्राह्मणों ने अमृता से कहा—‘हे माता ! परमार्थतः यह रोहित मच्छ समस्त मच्छों में उत्तम माना गया है, इसकी पूँछ का यदि ब्राह्मणों को भोजन कराया जाये तो अवश्य ही पितृजनों को तृप्ति होती है।’
बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
पृथ्वीनाथ ! उस समय ‘ब्रह्मवाक्यं जनार्दनः’ की कहावत सत्य सिद्ध करते हुए, अमृता ने मेरी पूँछ कटाकर सोंठ, मिर्च आदि मसाले में पकाकर ब्राह्मणों को प्रदान की, जिससे उन उन सभी ब्राह्मणों ने पेट भरकर भोजन किया और आशीर्वाद देते हुए अपने गृह की ओर प्रस्थान किया।
तत्पश्चात् मेरे बचे हुए शरीर को अनेक मसालों में मिलाकर गर्म तेल के कढ़ाई में जिस समय पकाया गया, हे राजन! उस समय की जो वेदना हुई, वह मैं ही जानता हूँ अथवा केवली भगवान् ही जान सकते हैं।
राजन ! जिस समय तपे हुए तेल में पड़ा हुआ मैं पकाया जा रहा था, उसी समय जातिस्मरण होने से मैंने पूरे परिवार को पहिचान लिया। जिससे एक तो मानसिक दुःख और दूसरा शारीरिक कष्ट-इस प्रकार दोनों प्रकार के क्लेश का अनुभव किया। नरश्रेष्ठ ! तुम भी इस बात का अनुभव कर सकते हो कि जिस समय नमक, मिर्च आदि मसालों में मिलाकर मुझे गर्म तेल में पकाया गया होगा, उस समय की वेदना क्या नरक की वेदना से किसी प्रकार कम हो सकती है ? कभी भी नहीं। नरकों में तो केवल गर्म तेल में ही पकाया जाता है, परन्तु मुझे तो नमक, मिर्च, सोंठ आदि तीक्ष्ण मसालों में मिश्रित करके पकाया गया, जिसमें एक तो अग्नि की वेदना और दूसरी मसाले का कष्ट; उसमें भी पक्व हो गया है या नहीं, उसकी परीक्षा के लिये लोहे के नोंकदार सुईयों से बार- बार छेदना इत्यादि कष्टों का कहाँ तक वर्णन करूँ ! अरे ! जिन दुःखों को वाग्वादिनी भी नहीं कह सकती। पक रहे मेरे शरीर को कलछियों से हिला-हिलाकर रसोईयों ने मुझे पकाया। तत्पश्चात् बहुत ही जीरा, मिर्च, नमक आदि डालकर मेरे शरीर के स्वाद को चखने लगे। राजन ! उस समय सातवीं नरक के नारकी की भाँति उछाल-उछालकर
पकाया गया, तत्पश्चात् पके हुए शरीर को छुरी से टुकड़े करके लोहे के काँटों से ब्राह्मणों ने खाया। तत्पश्चात् मेरे पुत्र यशोमति, मेरी स्नेहवती अमृतादेवी तथा उसका कूबड़ा आदि समस्त परिवार ने भोजन किया।
नृपश्रेष्ठ ! देखी, संसार की विचित्रता ! कि पितृ के निमित्त से मुझे ही खाया, यह अशोभनीय कर्म जिह्वा लम्पटी माँसभक्षी, विषयासक्त ब्राह्मणों का ही कर्तव्य है, क्योंकि यशोधरचरित्र
ब्राह्मणों के उपदेश से सभी अज्ञानी लोग हिंसा के कार्य को धर्म मानकर अंगीकार करते हैं, इस कारण समस्त ही दोष ब्राह्मणों पर ही है।
मेरी माता का जीव जो शंशुमार के शरीर में से निकलकर पार्श्वगाम में बकरी हुई थी, मैं भी मच्छ की पर्याय से प्राण त्याग करके दैवयोग से उसी बकरी के गर्भ से उत्पन्न होकर बकरा हुआ।
तत्पश्चात् क्रमपूर्वक वृद्धिगत होते हुए जब जवान हुआ, तब कामान्ध होकर अपनी माता बकरी के साथ ही मैथुन कर्म करने लगा। उसी समय यूथ के स्वामी बकरी ने ईर्ष्यायुक्त क्रोध के आवेश से मुझे मार दिया। वहाँ से मरकर मैं अपने ही वीर्य से उसी बकरी के गर्भ से पुनः बकरा हुआ।
यहाँ कोई शंका करे कि अपने ही वीर्य से अपना जन्म किस प्रकार हो सकता है ? तो उसका समाधान इस प्रकार है कि जिस समय मादा का रुधिर और नर के वीर्य का संयोग होता है, उस समय से सात दिन तक उसमें जीव आता है, जो सात दिन तक मिला हुआ रहता है और यदि सात दिन के अन्दर जीवोत्पत्ति न हो तो वह पृथक् होकर खिर जाता है।
इस प्रकार जिस समय बकरी का रुधिर और बकरे के वीर्य का संयोग हुआ, उसी समय बकरे का मरण हुआ। जिससे वह तुरन्त ही उसके गर्भ में जाकर उत्पन्न हो गया और फिर दूसरे भव में भी बकरा ही हुआ है।
राजन ! तिर्यंचों में शर्म नहीं होती। माता को स्त्री बना लेना सहज होता है। उसी प्रकार मैंने भी माता के साथ भोग किया। जिस समय मुझे इस बात का स्मरण आता है, तब मुझे तीव्र वेदना होती है। जब मैं फिर से बकरी के गर्भ में आया और क्रमपूर्वक वृद्धि को प्राप्त होने लगा, तब यशोमति महाराज शिकार करने के लिये वन में आये। उन्होंने हिरण के लिये पूरे वन में परिभ्रमण किया परन्तु एक भी हिरण नहीं मिला।
उस समय जब घूमकर वापस आये तो क्या देखा कि मेरी माता बकरी और यूथ
नायक बकरा – ये दोनों मैथुन कर्म कर रहे थे। उस समय क्रोध के आवेश में यशोमति बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
महाराज ने अपने भाले से दोनों का घात कर दिया। पश्चात् निकट आकर देखते हैं कि बकरा-बकरी दोनों दो भाग होकर रुदन करते हुए मर गये और गर्भ में रहे हुए मेरे आठों ही अंग कम्पायमान दिखायी दिये।
उस समय यशोमति महाराज ने बकरी के गर्भ में से बाहर निकलवाकर मुझे बकरा पालक को हस्तगत किया। उसने सावधानीपूर्वक अन्य बकरियों से दूध पिलाकर मेरा पालन-पोषण किया, जिससे मैं उनके घर में वृद्धि को प्राप्त हुआ, परन्तु पशु योनि सम्बन्धी अज्ञानदशा के कारण माता, पुत्री और बहिन के साथ मैथुन सेवन करते यूथ का स्वामी बनकर सुखपूर्वक काल व्यतीत करने लगा। इतने में…
एक दिन यशोमति महाराज ने कुलदेवी के सन्मुख इस प्रकार प्रार्थना की— ‘हे माता ! हे भट्टारके ! हे महिष विदारणी ! हे भगवती ! तेरी कृपा से मुझे हिरण का लाभ होगा तो वेगवान बकरे की बलि चढ़ाऊँगा।’ ऐसा कहकर राजा ने शिकार के लिये महारण्य में प्रवेश किया और वहाँ तुरन्त ही शिकार का लाभ हुआ। तत्पश्चात् वापिस घर आकर उन्होंने देवी के लिये स्थूल बकरा बुलवाया और उसे मारकर उसका माँस देवी को चढ़ाया।
उसी समय रसोईदारों ने मुझे यूथ नायक बकरे को लाकर वहीं बाँध दिया, जिससे दैवयोग से कोई चील पक्षी ने किसी जन्तु का माँस लाकर मेरे बगल में डाल दिया, जिससे सूंघकर मैं तुरन्त ही उछल गया, तब मुझे फिर लम्बी डोरी से इस प्रकार बाँधा गया, जिस प्रकार संसारी जीव कर्मों के बन्धन से बँध जाता है।
राजन ! अज्ञानी लोग हिंसा कार्य करते हुए किंचित् भी भयभीत नहीं होते। उन मिथ्यामार्गियों के हृदय में इस बात का पूर्ण विश्वास है कि दीन पशुओं की बलि देने से देवी प्रसन्न होकर समस्त कार्यों की सिद्धि करती है।
हा ! धिक्कार है उन मूर्खों की बुद्धि को, जो कि पर जीवों का घात करके अपने कार्य की सिद्धि मानते हैं।
तत्पश्चात् अन्य लोगों के लिये बकरे के माँस के ग्रास दिये गये और क्षुधा दूर करनेवाले अनेक रसयुक्त मदिरा तथा मूँग की दाल भी दी गयी। तत्पश्चात् अनेक वस्त्र यशोधरचरित्र
और गायों का दान करके यशोमति महाराज ने कहा कि यह हमारा समस्त ही धन स्वर्ग में विराजित हमारे पिता के पास पहुँचे।
राजन ! उस समय क्षुधा-तृषा से पीड़ित मैं - बकरा - उसी स्थान पर दृढ़ डोरी से बँधा हुआ था, इसलिए महाराज यशोमति के वाक्यों से जातिस्मरण प्रगट होने से मैं अपने हृदय में विचार करने लगा कि इस समय तो मैं वस्त्र-अलंकार से रहित, भूखा-प्यासा, रस्सी से बँधा हुआ हूँ। मेरे पुत्र ने गर्वसहित अनेक प्रकार का दान किया, जो निकट ही बैठे हुए मुझे कुछ नहीं मिला तो अन्य दूर स्थित जीवों को कैसे मिलता होगा ? राजन ! उस समय मेरा पूरा परिवार अनेक रसयुक्त बानगियों का भोजन कर रहा था और मैं वहीं भूख-प्यास से पीड़ित सबके मुख के सामने देख रहा था। परन्तु किसी ने ऐसा नहीं कहा कि एक ग्रास इसे भी दें। मेरे निमित्त से बहुत ही धन का दान दिया गया और निकट में ही बैठे हुए मुझे कुछ नहीं मिला तो निश्चय हुआ कि यह समस्त दान ब्राह्मणों के उदर की पूर्ति के लिये ही होता है, किसी जीव को नहीं मिलता।
श्रीनाथ ! जिस समय मेरा पुत्र यशोमति निज मातासहित भोजन करते हुए निकट के जीवों को रंजित कर रहा था, उस समय मैंने समस्त परिवार तथा अन्तःपुर को देखा परन्तु निज प्रिया अमृतादेवी को नहीं देखा। इतने में सड़े हुए माँस की तीव्र दुर्गन्ध आयी। उस समय दासियाँ वार्ता कर रही थीं कि -
प्रिय बहिन ! कैसी मरे हुए बकरे के सड़े हुए माँस की दुर्गन्ध आ रही है। इतनी दुर्गन्ध कहाँ से आ रही है ?
दूसरी दासी ने कहा- ‘अरे ! तू निश्चित भोली लगती है। ऐसी दुर्गन्ध बकरे की थोड़े ही होती है ? बहिन ! यह तो मछली के सड़े हुए माँस की दुर्गन्ध है।’ तीसरी दासी बोली- अरे ! यहाँ से चलो। इस दुर्गन्ध से उल्टी होती है। मुझे तो लगता है कि महारानी अमृतादेवी के गलित कोढ़ की यह विभत्स दुर्गन्ध आती है। अन्य दासी ने कहा- अरे ! तुम सब पागल हो गयी हो क्या ? तुम्हें कुछ खबर है या ऐसे ही बोले जा रही हो ? सुनो ! मैं तुमसे कहती हूँ वैसा है। तुम सब कसम खाओ कि बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
मेरा नाम किसी को नहीं कहोगी। इस दुष्टा अमृतावती ने प्रिय जार कूबड़ा के कारण अपने पति यशोधर महाराज और अपनी सास चन्द्रमती को भोजन में हलाहल जहर देकर मार डाला है। इस पाप के उदय से उसका पूरा शरीर गलित कोढ़ से गल रहा है और यह उसी की दुर्गन्ध है।
नृपवर ! उपरोक्त प्रकार से दासी के वचन सुनकर मेरी नजर भी घर में स्थित अमृता की ओर गयी। उस समय उसका मुँह देखा तो मुझे ऐसा लगा कि भोजन के समय का माँस का पिण्ड ही क्यों न हो ? उस समय अशुभ गात्रा अमृता को मैंने देखा परन्तु मैं उसे पहिचान ही नहीं सका।
पृथ्वीनाथ ! उस समय की रानी की दशा देखकर ऐसा ही निर्णय होता था कि पर -पुरुषासक्त व्यभिचारिणी से नाराज होकर कर्मों ने उसकी यह अवस्था बनायी है अर्थात् जो होंठ जार की दृष्टि में बिम्बा फल जैसे लगते थे, वे गल गये थे, जो नख, प्रिय जार के वक्षस्थल को चिह्नित करते थे, वे अतिशय नष्ट-भ्रष्ट हो गये, जो आँख जार की दृष्टि में कमलतुल्य थी, वह फूटी कौड़ी तुल्य हो गयी। तात्पर्य यह है कि जो-जो अंग प्रिय जार कूबड़ा ने अपने हाथ से स्पर्श किये थे, वे सर्व गात्रकर्मों ने क्रोधित होकर कर्म का फल दिखाने के लिये नष्ट-भ्रष्ट कर डाले।
नृपवर ! अति तीव्र पाप का फल प्रत्यक्ष होता है और यदि ऐसा न होता तो सम्पूर्ण दुनिया क्यों पाप से डरती ! परन्तु प्रत्यक्ष देखते हुए भी दुष्ट लोगों को बोध नहीं होता तो वह उनके भवितव्य का दोष है अर्थात् उनकी ऐसी ही होनहार है।
नृपवर ! जब मैं इन विचारों में मग्न था, इतने में तो पापिनी अमृता ने रसोईदार को बुलाकर कहा—
'जो देव और ब्राह्मणों के लिये भोग चढ़ाया गया था, वह घृणास्पद, ग्लानिकारक, बकरे का माँस जो मुझे दिया, वह मुझे नहीं भाता है। अब मेरे लिये सूकर या हिरण का माँस शीघ्रता से दो। जिसे मैं प्रेमपूर्वक खाऊँगी।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1855.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है