बोधि-समाधि-निधान (भाग-२)
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बोधि-समाधि-निधान
( भाग-2 )
- यशोधरचरित्र
- वरांगचरित्र
- प्रद्युम्नचरित्र
गुजराती संकलन :
जीतूभाई नागरदास मोदी
प्रशम जीतूभाई मोदी, सोनगढ़
हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन :
देवेन्द्रकुमार जैन
बिजौलियाँ, जिला-भीलवाड़ा ( राज. )
: प्रकाशक :
श्री कुन्दकुन्द-कहान पारमार्थिक ट्रस्ट
302, कृष्णकुंज, प्लॉट नं. 30, नवयुग सी.एच.एस. लि.
सी. एल. मेहता मार्ग, विलेपार्ले ( वेस्ट ), मुम्बई-400 056
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आज ही अपना हित साध ले! विलम्ब न कर!!
सब अपने पूर्व के कर्मों के उदयानूसार आयुष्य और संयोग लेकर आते हैं। उसमें अन्य कोई जीव फेरफार नहीं कर सकता, एक शरणामात्र अपना आत्मा है – ऐसा विचार करके सज्जनों को आत्मिक-कार्य करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। ऐसा मनुष्य देह, पाँच इन्द्रियों और जैनधर्म मिलने के बाद आत्महित के कार्य में विलम्ब नहीं करना। आज ही करना।
—करुणासागर पूज्य गुरुदेवश्री
मरण तो आना ही है, जब सब कुछ छूट जाएगा। बाहर की एक वस्तु छोड़ने में तुझे दुःख होता है, तो बाहर के समस्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव एकसाथ छूटने पर तुझे कितना दुःख होगा? मरण की वेदना भी कितनी होगी? ‘कोई मुझे बचाओ’ ऐसा तीव्र हृदय पुकारता होगा। परन्तु क्या कोई तुझे बचा सकेगा? तू भले ही धन के ढेर लगा दे, वैद्य-डाक्टर भले सर्वे प्रयत्न कर छूटें, आसपास खड़े हुए अनेक सगे-सम्बन्धियों की ओर तू भले ही दीनता से टुकर-टुकर देखता रहे, तथापि क्या कोई तुझे शरणभूत हो ऐसा है? यदि तूने शाश्वत स्वरसंज्ञित ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मा की प्रतीति-अनुभूति करके आत्म-आराधना की होगी, आत्मा में से शान्ति प्रगट की होगी, तो वह एक ही तुझे शरण देगी। इसलिए अभी से वह प्रयत्न कर। ‘सिर पर मौत मंडरा रहा है’ ऐसा बारम्बार स्मरण में लाकर भी तू पुरुषार्थ चला कि जिससे ‘अब हम अमर भये, न मरेंगे’ ऐसे भाव में तू समाधिपूर्वक देहत्याग कर सके। जीवन में एक शुद्ध आत्मा ही उपादेय है।
—प्रशममूर्ति पूज्य बहिनश्री
चक्रवर्ती की समस्त सम्पत्ति से भी जिसका एक समय मात्र भी विशेष मूल्यवान है, ऐसा यह मनुष्य देह और परमार्थ को अनुकूल ऐसा योग समप्राप्त होने पर भी यदि जन्म-मरण से रहित ऐसे परम पद का ध्यान नहीं रहा तो इस मनुष्यत्व को अधिगृहित ऐसे आत्मा को अनन्त बार धिक्कार हो।
कृपालुदेव श्रीमद् राजचन्द्र
उत्तर क्षण में क्या परिणाम होगा, उसका वर्तमान क्षण में हमें ज्ञान नहीं, तो भविष्य के लिये क्यों व्यर्थ का कल्पना? परिणाम के अलावा शरीरधारक की क्रिया में तो हमारा कोई कर्तव्य है ही नहीं, तो फिर इनके आश्रित विभाव परिणामों का व्यर्थ बोझ क्यों लादा जाये?
—पूज्य सोगाणीजी
बोधि-समाधि-निधान, भाग-2
उपोद्घात
अकारण करुणासागर, पुरुषार्थ प्रेरणापूर्ति पूज्य गुरुदेवश्री ने साक्षात् सीमन्धरस्वामी की दिव्यध्वनि का वर्षों तक प्रत्यक्ष श्रवण करके तथा सीमन्धरस्वामी के समवसरण में पधारे हुए श्रीमद् भावकुन्दकुन्दाचार्यदेव के प्रत्यक्ष दर्शन करके, यहाँ भरत में पधारेकर, 45 वर्षों तक अध्यात्म की गंगा बहाकर अध्यात्म क्रान्ति द्वारा विषम पंचम काल का धर्म काल में परिवर्तित किया है।
अध्यात्मयुग सर्जक पूज्य गुरुदेवश्री ने प्रधानरूप से तो द्रव्यदृष्टि का मूलभूत मार्ग ही प्रकाशित किया है और साथ ही साथ उस द्रव्यदृष्टि के मार्ग में प्रमाण करने में सहायकभूत ऐसी वैराग्यभूमि तैयार करने के लिये प्रथमानुयोग के पुराणों के अनेक प्रसंगों को खूब मथकर प्रकाशित किया है। उनसे प्रेरणा लेकर श्री नागरदास बी. मोदी सम्पादक गुजराती आत्मधर्म में बावन कथाओं के साररूप प्रकाशन किया है, जिन्हें बाद में संकलित करके ‘बोधि-समाधि-निधान’ रूप से प्रकाशित किया गया था। तत्पश्चात् उसी ग्रन्थ का हिन्दी में प्रकाशन हुआ। इस प्रकार गुजराती तथा हिन्दी भाषा में इस ग्रन्थ का बारम्बार प्रकाशन यह सूचित करता है कि प्रस्तुत कथा संग्रह पुस्तक मुमुक्षु समाज में अत्यन्त रुचिकर हुई है।
अनेक परिचित मुमुक्षुओं की ओर से बोधि-समाधि-निधान जैसा दूसरा कोई कथासंग्रह पुस्तक प्रकाशित करने की माँग होने से श्री नागरदासभाई को बोधि-समाधि-निधान, भाग-2 प्रकाशित करने की भावना जागृत हुई किन्तु इस कथासंग्रह में पूर्व प्रकाशित भाग-1 की तरह अनेक कथाओं के संकलन के बदले वैराग्य से भरपूर एक-दो विस्तृत कथायें प्रकाशित करने का निर्णय किया, जिससे भव्य मुमुक्षुओं को अपने परिणाम की स्थिति में जागृति रहे और इस प्रकार पूज्य बहिनश्री चम्पाबेन के उपदेशों को—'मुमुक्षु का हृदय ‘भींगा हुआ हृदय’ होना चाहिए—इस उपदेश को मुमुक्षु आत्मपरिणत कर सके।
अपनी इस भावना के फलस्वरूप, अपने दोषीत परिणामों का कितना भाव है कैसा-कैसा कठोर फल भोगना पड़ता है, इसका हू-ब-हू चित्रण करता हुआ यशोधरचरित्र, बोधि-समाधि-निधान भाग-2 के रूप में प्रकाशित करने का उन्होंने निर्णय किया और अपनी उपस्थिति में ही उनका गुजराती अनुवाद तैयार कराया। पुराणों में कथायें तो बहुत आती हैं परन्तु यशोधरचरित्र की कथा कोई अलग ही प्रकार की है, उसमें गृहीत मिथ्यात्व की अनुमोदना पर विशेष प्रहार किया गया है।
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इसी प्रकार वरांगचरित्र एक वैराग्य प्रेरक कथा है जो कि सुप्रबुद्ध समाज में कम प्रचलित है। इसी प्रकार प्रद्युम्नचरित्र भी गुजराती मुमुक्षु समाज में बहुत कम प्रचलित है। इसका कारण यह है कि हिन्दी भाषा में तो अनेक पुराण उपलब्ध हैं, जबकि गुजराती भाषा में अधिक मात्रा में पुराणों की उपलब्धता नहीं है।
सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि में चारों अनुयोगों का उपदेश होता है, उसमें प्रथम अनुयोग का नाम प्रथमानुयोग है। द्रव्यानुयोग, चरणानुयोग और करणानुयोग में जो वर्णन है, उसकी दृष्टान्त द्वारा प्रसिद्धि, प्रथमानुयोग है। प्रथमानुयोग के अभ्यास से तीनों अनुयोगों का समझना सरल बनता है।
प्रथमानुयोग के अभ्यास से-
- पुराण-पाठों के प्रसंग पढ़ने-विचारने से दृढ़ता होती है कि क्रमबद्ध अनुसार - होनहार अनुसार परिणामते हुए परिणमन काल में उसके योग्य पुरुषार्थ होता ही है; क्रमबद्ध अनुसार पुरुषार्थ होता ही है, कर्तृत्वपूर्वक करना नहीं पड़ता परन्तु सहज रूप से उसके योग्य पुरुषार्थ हुए बिना नहीं रहता, इसलिए मुझे कर्तृत्वपूर्वक पुरुषार्थ करने का बोझ नहीं रहता। मैं तो मात्र ज्ञातास्वरूप से रहता हुआ एक ज्ञायकभाव हूँ।
- जीवों के भूतकाल के और भविष्य काल के निश्चित परिणामों का वर्णन जानकर क्रमबद्धपर्याय की यथार्थ श्रद्धा द्वारा अकर्तृत्वभाव के सन्मुख हुआ जाता है।
- संसारी जीवों के पापमय परिणामों होने पर भी उनकी क्षणिकता समझने से स्वभाव में संसार की गन्ध भी नहीं है, ऐसा महिमावन्त ज्ञानक मैं हूँ - ऐसी दृढ़ता होती है।
- एक जीव दूसरे जीव पर क्रोध करे तो उसके संस्कार भव-भव तक रहते हैं, राग करे तो उसके संस्कार भी भव-भव तक नहीं छूटते और कुदेव-गुरु-धर्म के सेवन से नरक-निगोद में चिरकाल भ्रमण करके फिर से मनुष्य होने पर कुधर्म के संस्कार पुनः जागृत हो जाना जानकर, जीव को वीतरागधर्म की आराधना की विशेष जागृति रहती है।
यशोधरचरित्र
राजा यशोधर के भवों का वृत्तान्त जानने पर, किसी भी जीव के प्रति वैरभाव करने से कितने ही भवों तक वह वैरभाव लम्बित होना जानने से जीव अपने परिणाम में वैराग्यभावनापूर्वक सावधान रहता है।
जिसके फल में अनेक भवोँपर्यन्त भीषण दुःख भोगने पड़ते हैं, ऐसे अपने मिथ्याभावों से बचने की प्रधान प्रेरणा रूप इस कथा में, पत्नी के दुष्कर्म से वैराग्य पाकर जिनदीक्षा ग्रहण करने
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का इच्छुक राजा यशोधर, अपनी माता की ममता के कारण माता की आज्ञा का पालन करने के लिये आटे के मुर्गे की बलि चढ़ाता है, इससे वह मरकर वह मोर होता है। जिस माता की आज्ञा पालन करने के फल में मोर हुआ है, वही माता मरकर बिल्ली होकर पुत्र / मोर को मारती है! फिर भी कितनी ही कुयोनि के भवों में माता का जीव पुत्र के जीव को ही मारता रहा! ममता से मातृ-आज्ञा पालन में गृहीतमिथ्यात्व का पोषण या अनुमोदन करने का यह फल! इसलिए आत्महित इच्छुक जीव को किसी भी सगे-सम्बन्धी या उपकारी किसी भी व्यक्ति को लिङ्ग-शर्म में आकर अथवा मान बढ़ाई के लिये अथवा ममता या भय से उसके किसी भी मिथ्यात्ववर्धक कार्य में जुड़ना नहीं, पोषण नहीं देना अथवा अनुमोदन नहीं करना, भले ही समाज में मान न मिले। क्योंकि इस कथा में बना उस प्रकार अनेक भवपर्यन्त दुर्गति भ्रमण और भयंकर दुःख का भोग स्वयं को अकेले ही करना पड़ेगा तथा जिसकी आज्ञा पालन करने के फल में यह पाप किया, उसी माता ने भव-भव में स्वयं को मारा, वह माता भी भव के बाद अत्यन्त प्रिय ऐसी संगी बहन बनी! इसलिए करुणा से पूज्य गुरुदेवश्री कहते थे कि ‘किसको प्रसन्न करना और किससे प्रसन्न रहना! एक आत्मा का हित करने का यह भव है!’
वरांगचरित्र
निकट मोक्षगामी महा पुण्यशाली वरांग को जीवन में अनेक प्रकार की असाता भोगनी पड़ती है, तथापि समतापूर्वक किस प्रकार रहता है! तथा साता के उदय के समय कितनी वैराग्य भावना पूर्वक दीक्षित होता है! - इत्यादि वर्णन पढ़कर पाप के उदय में हताश नहीं होना और पुण्य के उदय में आत्महित के लक्ष्यपूर्वक जीवन जीना - इत्यादि धर्मभावना की विशेष प्रेरणा मिलती है।
प्रद्युम्नचरित्र
इस चरित्र में भावलिंगी मुनिराज की हिंसा करने में उद्यमी होनेवाले अग्नभूति-वायुभूति जैसे महापापी, सातवें भव में प्रबल पुण्य प्राप्त प्रद्युम्न-शम्बुकुमार के भव में गिरनार सिद्धक्षेत्र से मुक्ति प्राप्त करते हैं - इत्यादि वर्णन पढ़ते हुए कल का लकड़हारा आज केवली हो सकता है - ऐसी आत्मा की अनन्त शक्ति सामर्थ्य की प्रतीति उत्पन्न होती है।
पूज्य गुरुदेवश्री ने जीवन भर जो महान बोध प्रदान किया है, उसकी इन तीनों कथाओं के उदाहरण द्वारा दृढ़ प्रतीति होती है। भयंकर पाप के परिणाम हुए हों या उत्कृष्ट शुभपरिणाम हुए हों; जीव को मूलभूत शक्ति में उसकी गन्ध भी प्रविष्ट नहीं होती। जब भी जीव अपने स्वभाव को
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प्रतीति करे, तब स्वयं वर्तमान में ही सर्वज्ञस्वभावी विराज रहा है, यह मूलभूत सिद्धान्त सरलरूप से समझ में आ जाता है - इत्यादि अनेक प्रकार से कथानुयोग आत्मलक्ष्यरूप बनता है।
इन वैराग्यवर्धिनी कथाओं के पठन द्वारा अपने परिणामों का विहंगावलोकन करने की जागृतिपूर्वक पूज्य गुरुदेवश्री द्वारा प्ररूपित द्रव्यदृष्टि के मार्मिक सिद्धान्तों का सरलता से भावाभासन होवे, ऐसी अन्तरभावना के साथ…
संकलनकार / अनुवादक
अनुक्रमणिका
यशोधरचरित्र 001
वरांगचरित्र 098
प्रद्युम्नचरित्र 160
ॐ
परमात्मने नमः
बोधि-समाधि-निधान
(पौराणिक जैन कथाओं का संकलन)
भाग - 2
श्री पुष्पदन्त कवकृत
यशोधरचरित्र
जो अनेक द्वीप तथा समुद्रों से वेष्टित है तथा अनेक सम्प्रदायों का स्थान है—ऐसे जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में यौधेय नामक देश है। वह देश धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थों के उपकरणों का उत्पत्ति स्थान है।
इस देश में कुकवियों की भाँति भ्रमरों के समूह भ्रमण करते हैं क्योंकि कुकवियों के हृदय भी काले हैं और भ्रमर भी काले हैं। इस देश की शोभा का वर्णन करते हुए कितना कहना ? विधाता ने स्वर्गलोक की ईर्ष्या से मानो कि दूसरा स्वर्गलोक ही बनाया है कि जिस देश में धन-धान्य, वन-वाटिका आदि से सुशोभित ग्राम-नगर आदि हैं।
इस यौधेय नामक देश में एक राजपुर नामक विशाल नगर था। उस राजपुर नामक नगर में मारिदत्त नामक राजा राज्य करता था।
वह राजा धन देने में कर्ण-समान, वैभव से इन्द्र-समान, रूप से कामदेव-समान, कान्ति से चन्द्रमा-समान, प्रचण्ड दण्ड देने में यमराज-समान और अन्य राजाओं के बलरूप वृक्ष की मूल से उखाड़ फेंकने में प्रचण्ड पवन के समान था। वह राजा धन और धान्य के रक्षण में चतुर था, परन्तु एकान्त धर्म से अनभिज्ञ था। उसमें यौवन मद और धन मद की प्रबलता थी किन्तु एक धर्म के बिना प्रचुर अन्धकार व्याप्त हो रहा था। सत्य ही
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यशोधरचरित्र
है कि ज्ञान के उदय बिना सारभूत शुभमार्ग का अवलोकन किस प्रकार हो सकता है !! सत्य ही है कि उत्तम ज्ञानियों के बिना धर्म की प्राप्ति किस तरह हो सकती है !!
महाराज मारिदत्त के धन-धान्य से पूर्ण राजपुर नगर में भैरवाचार्य का आगमन हुआ। वह भैरवाचार्य जगत् को अपने-अपने अनुकूल पुरुषों को निज मत की शिक्षा देता था। वह भैरवाचार्य कान में मुद्रा धारण करता; बत्तीस अंगुल प्रमाण दण्ड हाथ में रखता था; गले में योगपट्टि, पैर में पावड़ी धारण करता था; मृदिंगा की आवाज करता और सिंह पंछ का गुच्छा लगाकर अपने को महात्मा प्रसिद्ध करता था। लोगों के पूंछे बिना ही अपनी स्तुति करते हुए कहता था कि—
'चार युग व्यतीत होने पर भी मैं वृद्ध नहीं हुआ; नल, नहुष, वेणु आदि महाप्रतापी और पृथ्वी के भोक्ता महाराजा मेरे सामने हो गये हैं; राम और रावण के घोर संग्राम में राक्षसों का पतन मैंने देखा है; भाईयों सहित युधिष्ठिर को देखा है तथा कृष्ण की आज्ञा से विरुद्ध अभिमानी ऐसे दुर्योधन को भी देखा है। मैं चार युग से जीवित हूँ, उसमें तुम किञ्चित् भी भ्रम नहीं करो।
मैं सभी लोगों को शान्ति प्रदान करूँगा। मुझमें इतनी सामर्थ्य है कि अति प्रचण्ड वेगयुक्त दिवाकर के विमान को अवरोध कर सकता हूँ। मुझे समस्त ही विद्याओं की उपलब्धि है; यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र तो मेरे आगे-आगे चलते हैं’ - इत्यादि बातें करते हुए लोगों को रंजित करता हुआ नगर में भ्रमण करता था।
जब उसकी कथा पूरे नगर में प्रचारित हो गयी, तब महाराजा मारिदत्त को भी सुनने को मिली। उन्होंने उस समय अति कौतुकवश होकर मन्त्री से कहा कि ‘तुम एकान्त में जाकर उस गुणगरिष्ठ भैरवाचार्य को नम्रतापूर्वक यहाँ लेकर आओ।’
मन्त्री ने कहा— ‘महाराज की आज्ञा अनुसार मैं अभी उन्हें लेकर आता हूँ।’
इस प्रकार मन्त्री ने विनयपूर्वक राजा का आदेश सुनकर भैरवाचार्य से कहा— ‘अहो महात्मन् ! आपके दर्शन से महाराज को शीघ्र शान्ति हो।’
भैरवाचार्य— ‘यदि राजा की ऐसी ही इच्छा है तो मैं शीघ्र ही जाकर राजदर्शन में शान्ति स्थापित करूँगा।’ ऐसा कहकर मन्त्री के साथ वह राजदरबार में उपस्थित हुआ।
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बोधि-समाधि-निधान (भाग-2)
वहाँ उसने तेजपुंज नारायणतुल्य महाराज को सिंहासन पर विराजित देखा। तत्पश्चात् राजा ने भी अनेक आडम्बरयुक्त भैरवाचार्य को देखकर सिंहासन से उठकर, सामने जाकर दण्डवत् नमस्कार किया।
भैरवाचार्य ने आशीर्वाद मुद्रा में कहा— ‘महाराज का कल्याण हो। राजन् ! मैं साक्षात् भव हूँ, आपकी जो इच्छा हो, वह प्रगट करो, मैं उसे पूर्ण करूँगा।’
इस प्रकार सुनकर महाराज ने प्रसन्नचित्त होकर भैरवाचार्य को उच्चासन पर स्थापित किया और स्वयं उनके चरणों में बैठकर प्रार्थना करने लगा :
महाराज— ‘स्वामिन् ! मेरे कष्ट दूर करो। नाथ ! आप तो सृष्टि संहारक योगीश्वर हैं। आपके चरणों के प्रसाद से मेरे मनोभिलाषित कार्य की सिद्धि होगी। मैं आपका सेवक हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न होओ। आप जो आज्ञा करोगे, मैं उसे शिरोधार्य करके पूर्ण करूँगा।’
दुष्ट परिणामी भैरवाचार्य मन में विचार करने लगा कि मैं जो-जो उपदेश दूँगा, उससे मेरे इन्द्रियसुख की पूर्ति होगी और मैं जो आदेश करूँगा, उसका पालन होगा। इस प्रकार विचार करते हुए उसने कहा— ‘नृपवर ! मुझे समस्त ऋद्धियाँ लक्ष्मायमान से स्फुरयमान होती हैं। मुझे सभी विद्यायें सिद्ध हैं, मैं संसार में पूर्ण समर्थ हूँ, जो कोई मुझसे महान पदार्थ की याचना करता है, उसे तत्काल देता हूँ। मेरे लिये कुछ भी पदार्थ अलभ्य नहीं है।’
महाराज— ‘हे देव ! आकाशमार्ग, सुमर्ग गमन करने की मेरी अभिलाषा है।’
भैरवाचार्य— ‘नृपवर ! तुम राजकुल के प्रकाशक चन्द्रमा हो, यदि तुम निर्विकल्प चित्त से मेरा उपदेश ग्रहण करोगे तो अवश्य तुम्हें आकाशमार्ग से गमन कराऊँगा।’
सत्य है कि जो गृहीतमिथ्यात्व से लिप्त होता है, वह ज्ञानीजनों के उपदेश को ग्रहण नहीं करता। जिस प्रकार अन्धा मनुष्य, सुमर्ग-कुमर्ग का अवलोकन नहीं करता जैसे अंकुश की प्रेरणा से हाथी की सूँड़ सब ओर गमन करती है; उसी प्रकार भैरवाचार्य की प्रेरणा से मारिदत्त का चित्त जीवों की हिंसा में तत्पर होकर सब ओर गमन करने लगा। यद्यपि मारिदत्त भव्य है परन्तु अशुभोदय से कुगति के योग से कुमार्ग के प्रति गमन करने लगा।
यशोधरचरित्र
उस मारिदत्त राजा के प्रचण्ड शत्रुओं की विध्वंसकारिणी चण्डमारी नाम की कुलदेवी, बेतालकाल (सन्ध्या समय) माँस का अवलोकन करती राजपुर नामक नगर की दक्षिण दिशा में स्थित आवास में निवास करती थी। जिसने गले में नरमुण्डों की माला धारण की थी, शरीर राख से लिप्त था, सर्पाच्छादित चरणयुगल, माँस रहित भयंकर अस्थि-चर्म, मयूर शिखा समान कठोर और उन्नत केश, मृतकों की आँत से विभूषित भुजा इत्यादि महावीभत्स रूप धारण करती हुई चण्डमारी देवी, जीवों की पोषित करती हुई जिनेन्द्रमाग का तिरस्कार करती थी। वह देवी हिंसामाग को प्रगट करती हुई, दयाधर्म को दूर भगाती हुई, नग्नशरीरवाली, माँस खाने के लिये मुँह फाड़े हुए, कपाल-कवन्ध और त्रिशूल धारण करती हुई बैठी थी और उसी का भक्त मारिदत्त राजा था।
भैरवाचार्य—‘राजन! यदि आकाशमार्ग का पथिक बनना हो और विद्याधर शत्रुओं को विजय करके दिग्विजय करनी हो तो जलचर, नभचर और स्थलचर जीवों के युगली का चण्डमारीदेवी के लिये हवन करो। ऐसा करने से तुम्हारे सभी कार्य सिद्ध होंगे।’
महाराज—‘आचार्यवर! आपकी आज्ञा-अनुसार कोतवाल को भेजकर सभी प्रकार की जाति के जीवों के युगल मँगाता हूँ।’
इस प्रकार कहकर महाराज ने कोतवाल को बुलाने के लिये अमात्य से कहा कि कोतवाल को बुलाकर समस्त ही जातियों के जीवों के युगल चण्डमारीदेवी के मन्दिर में एकत्रित करो।
अमात्य—‘जैसी महाराज की आज्ञा। मैं इसी समय कोतवाल को बुलाकर आपका हुक्म सुनाता हूँ।’
कोतवाल—(अमात्य से) ‘मैं आपकी आज्ञा अनुसार उपस्थित हुआ हूँ, मेरे लिये क्या हुक्म है?’
अमात्य—‘महाराज ने आदेश दिया है कि जलचर, नभचर और स्थलचर तथा समस्त जाति के जीवों के युगल चण्डमारीदेवी के मन्दिर में एकत्रित करने के लिये नौकरों को आज्ञा करो।’
बोधि-समाधि-विचार (भाग-2)
कोतवाल—‘जैसी आज्ञा। अभी किंकरों को बुलाकर जीवों को लाने का आदेश विदित करता हूँ।’
इस प्रकार कहकर कोतवाल ने तत्काल किंकरों को बुलाया और समस्त जीवों के युगल लाने की आज्ञा दी। पश्चात् उन हिंसक किंकरों ने सर्वत्र भटककर समस्त जीवों के युगल चण्डमारीदेवी के मन्दिर में एकत्रित करके कोतवाल को तत्सम्बन्धी सूचना दे दी।
कोतवाल—‘श्री महाराज! आपकी आज्ञानुसार सभी युगल उपस्थित हैं। अब क्या आज्ञा है?’
महाराज—‘स्वामिन्! (भैरवाचार्य) आपकी आज्ञानुसार सर्व युगल उपस्थित हो गये हैं।’
भैरवाचार्य—‘तो अब देवी के मन्दिर की ओर चलना चाहिए।’
महाराज—‘जैसी आज्ञा।’
इस प्रकार कहकर, मन्त्री आदि सभी चण्डमारीदेवी के मन्दिर की ओर गमन करने लगे। वहाँ पहुँचकर रुधिर से व्याप्त और चक्र, त्रिशूल तथा खड्ग धारण किये हुए चण्डमारीदेवी को देखकर राजा जन्म-जन्म धनपूर्वक प्रार्थना करने लगा—‘हे परमेश्वरी! अपने निर्मलस्वभाव से मेरे पापों का हरण करो।’
तत्पश्चात् मन्दिर में स्थित नभचर, जलचर और स्थलचर जीवों के युगलों का अवलोकन करके महाराज मारिदत्त ने भैरवाचार्य से निवेदन किया—‘स्वामिन्! आपकी आज्ञानुसार समस्त युगल उपस्थित हैं, अब कार्य की शुरुआत करें।’
भैरवाचार्य—‘राजन! समस्त युगल, देवी के सन्मुख उपस्थित कराओ, मैं कार्यरम्भ करता हूँ।’
तत्पश्चात् समस्त युगल, देवी के सन्मुख उपस्थित करके हवन प्रारम्भ हुआ। मारिदत्त राजा, चण्डमारी चन्द्रिका के अग्र भाग में अनेक प्रकार के मृगादि समस्त जीवों को मारता है। वह मूढ़मति पर को मारकर अपने जीवितव्य की वाँछा और शान्ति की कामना करता है।
यशोधरचरित्र
विप्रभक्षण से जीवितव्य की आशा, बैल के सींग से दूध की आशा, शीलातल में धान्य की प्राप्ति, नीरस भोजन से कान्ति में वृद्धि, उपशमभाव बिना क्षमा, और परजीवों को मारकर शान्ति वृद्धि क्या हो सकती है? नहीं! नहीं! कदापि नहीं!!
वह अविवेकी मारिदत्त राजा जिस समय तृणभोजी गाय आदि पशुओं को मारने में तत्पर था, उस समय भैरवाचार्य समस्त युगलों का अवलोकन करके फिर राजा से कहने लगा—
भैरवाचार्य—‘नृपवर! आपने समस्त युगल तो एकत्रित किये, परन्तु मनुष्य युगल तो मँगाया ही नहीं।’
महाराज—‘आपकी आज्ञानुसार मनुष्य युगल भी मँगाता हूँ।’
—ऐसा कहकर चन्द्रकर्म कोतवाल को बुलाकर राजा ने आज्ञा दी कि प्रशंसा योग्य मनुष्य का युगल शीघ्र लेकर आओ।
कोतवाल—‘जैसी आज्ञा पृथ्वीनाथ की। मैं अभी किंकर को आदेश देकर उत्तम मनुष्य युगल मँगाता हूँ।’
—ऐसा कहकर, किंकर को बुलाकर कोतवाल ने कहा कि अति मनोज मनुष्य युगल को शीघ्र लाकर उपस्थित करो।
किंकर—‘आपके आदेशानुसार शीघ्रतर यहाँ-वहाँ से मनुष्य युगल को लाकर आपके सम्मुख उपस्थित करता हूँ।’
तत्पश्चात् अनेक किंकर नरयुगल को खोजने के लिये नदी के किनारे, नगर, उद्यान, उपवन, पर्वत और गुफा आदि में गमन करने लगे। वहाँ उस हिंसा के अवसर में पार्श्विनाथ-वन नामक वन में संघसहित सुदत्त नामक आचार्य पधारे।
मदन का नाश करनेवाले श्री सुदत्ताचार्य ने वन का अवलोकन करके इस प्रकार कहा कि यहाँ पत्र और फलों का नाश हो रहा है इससे इस वन में सम, दम और यमी सत्य पुरुषों को निवास करना उचित नहीं है।
बोधि-समाधि-विचार (भाग-2)
तत्पश्चात् उग्र तप से देदीप्यमान आचार्यवर यमस्थानुलग्य श्मशान स्थल में पहुँचे। वह श्मशान, सियारों द्वारा विदीर्ण मृतकों के समूह और भयंकर आवाज करते हुए कौओं तथा गृद्ध पक्षियों से भरपूर था। वह श्मशान निष्फल वृक्षों के शुष्क पत्तों, राक्षसों के मुख से निकलते उष्ण श्वास तथा शूली पर चढ़ाये हुए मृतकों के कलेवर से अत्यन्त भयंकर था।
वह स्थान चोरों के समूह से व्याप्त और माँसभक्षी पक्षियों तथा निशाचरों की आवाज से गूँज रहा था। उस भयानक स्थान में इन्द्र, चन्द्र, और नागेन्द्रों के समूह द्वारा स्तुति योग्य मुनि, आर्जिका, श्रावक और श्राविका—इस प्रकार चतुर्विध संघसहित श्री सुरताचार्य प्रासुक और पवित्र शिला पर विराजमान हुए। यह मुनिसंघ जीवों की दया में तत्पर, महातपश्तरण द्वारा शरीर का शोषण करता था। श्मशानस्थल में जिनदीक्षा का पालन करते हुए शुल्लक युगल कामदेव-नाशक परम ईश्वर गुरु को नमस्कार करके, उनकी आज्ञा लेकर भिक्षा के लिये गमन करने लगे।
वह शुल्लक युगल विविध लक्षणसहित गात्र, प्रहर्षित शरीर, कमलदलनेत्र, जिनचरणों के भक्त, विषयों से विरक्त, पाप मल और मद से रहित, जैनधर्म में पूर्ण आसक्त, निज गुणों से मदान, निज शरीर की कान्ति से सूर्य को आच्छादित करते, हाथ में पात्र धारण किये हुए, नगर की ओर गमन करने लगा। उस समय निर्मल और तीक्ष्ण खड्ग हाथ में धारण किये हुए पापकर्म में तत्पर चन्द्रकर्मा किंकरों ने इन बालव्रत शुल्लक युगल को देखकर कहा :
किंकर— ‘हे बालयुगल ! तुम्हारा प्राप्त होना अत्यन्त कष्ट साध्य था, जो सहज ही प्राप्त हो गया।’ ऐसा कहकर वे युगल के निकट पहुँच गये। वहाँ दुःखनाशक, पाप विघातक, सुन्दर पात्र और लावण्यपूरित शरीरवान् युगल को देखकर किंकर परस्पर वार्तालाप करने लगे।
एक— ‘भाई ! सत्य कहना कि चाहे जितनी खोज करते तो भी कहीं ऐसा रूपवान युगल प्राप्त हो सकता था ? कभी भी नहीं।’
दूसरा— ‘मित्र ! इन्हें ले जाने से महाराज पारितोषिक तो अवश्य देंगे ही। भाई ! इनके हाथ-पैर कितने कोमल हैं ? इनका सौम्य शरीर कैसा हृदयग्राही है ? अब शीघ्र इनको लेकर चलो, विलम्ब का समय नहीं है।’
यशोधरचरित
तीसरा— ‘भाई ! देखो तो सही, हमने इन्हें घेर लिया होने पर भी इनके मुखमण्डल पर किंचित् भी मलिनता दिखायी नहीं देती।’
अन्य— ‘भाई ! तू भी मूर्ख ही है। धैर्यवानों का किसी विपत्ति में मुख म्लान होता है ? कभी भी नहीं।’
अन्य— ‘अरे भाई ! तुम सब उत्तम श्रेणी के मूर्ख हो क्योंकि जैसे-तैसे करके इच्छित वस्तु का लाभ हुआ, उसमें भी अपनी-अपनी गप्प मारते हो और व्यर्थ में विलम्ब करते हो। अब शीघ्रता से इन्हें चण्डिका के मन्दिर में ले चलो।’
इस प्रकार सभी किंकर, शुल्लक युगल को चण्डिका के मन्दिर में ले गये।
जिस समय किंकरों ने शुल्लक युगल का हाथ बाँधकर मनुष्यों को भयंकर मस्तक छेद करने की बात की, वे शब्द सुनकर मन विजेता अभयकुमार नामक शुल्लक महाराज ने अपनी शुल्लिका बहिन को इस प्रकार सम्बोधन किया—
शुल्लक— 'बहिन ! इस अवसर में मरण की शंका करके किंचित् भी भय मत करना परन्तु भगवान वीतराग अरिहन्त देव को अपने हृदय में स्थापित करके इस प्रकार से विचार कर कि पूर्वभव में जिस अशुभकर्म का बन्धन किया है, उसके उदय से शारीरिक कष्ट अवश्य होता है; इस कारण कोई भी मेरे शरीर का छेदन करो, भेदन करो, मेरे शरीर के रस, रुधिर आदि का पान करो, माँस का भक्षण करो, गर्दन काटो परन्तु चिरकाल से जिस शान्तिभाव का अभ्यास किया है, उसके अनुसार मन को शान्त करनेवाले मुनिजन अष्ट गुण संयुक्त सिद्धपर्याय को प्राप्त हो जाते हैं।
कन्या— ‘कोई राक्षस राजा तथा किंकर यदि अपने पौद्गलिक शरीर का घात करे तो करो परन्तु वे ज्ञानयुक्त अपने आत्मा का घात नहीं कर सकते। ऐसे अवसर में जैनधर्म की ही शरण का अनुसरण करना योग्य है।’
इस प्रकार अपने शुल्लक भाई के उपदेशयुक्त वचन सुनकर वह चन्द्रमुखी शुल्लिका इस प्रकार कहने लगी—
शुल्लिका— 'भ्रातृवर ! तुमने जो जिनसूत्रानानुसार निर्मल और पवित्र उपदेश प्रदान
बोधि-समाधि-विचार (भाग-2)
किया है, वह सर्वथा योग्य है। मैंने आपके कथन से पूर्व ही यह विचार कर रखा है कि मेरे इस नाशवान शरीर का कोई भी घात करे परन्तु मैं मेरे जीवन की जीर्ण तृण समान गिनती हूँ। मैंने चिरकाल से जो उपशम का अभ्यास किया है, उसे ही निज हृदय में धारण करके कर्मोदय के फल को भोगूँगी।’
यह उपरोक्तानुसार परस्पर वार्तालाप करते हुए, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए शुल्लक युगल को, यमराज समान पदधारियों द्वारा भैरवानन्द के कुटुम्ब को आनन्दकारक देवी के मन्दिर की ओर ले जाया गया।
उस मन्दिर में वह भैरवाचार्य महाध्वनि करता हुआ, धनुष उठाता हुआ, लोहखण्ड को घुमाता हुआ, लोहखण्ड-पीतल के आभूषण धारण करता हुआ, हाथ में तीक्ष्ण छुरी रखता हुआ, अपने गुप्ताभाव को प्रगट करता, अपना महत्त्व दिखाता, समस्त शरीर पर मृगचर्म लिपटा हुआ, पैर में घुँघरू से झनकार और थपथप शब्द करता हुआ तथा अपने केशों को खोलकर पिशाच समान पूर्ण माँसभक्षी सदृश चन्द्रिका के चरित्र का वर्णन करता, नृत्य करता अपूर्व दृश्य बना रहा था।
उसी समय चण्डिका अपने निवास में मुख में मस्तक खण्ड धारण करके नृत्य कर रही थी। वह देवीगृह पशुओं के रुधिर से सिंचित, पशुओं के हड्डियों की माला लटकती हुई, पशु की जीभ के पात्र से पूजा होती हुई, पशुओं की चर्बी के दीपक से प्रकाश होते हुए इत्यादि भयंकर दशाच्युत देवीगृह में चण्डिकादेवी अनेक क्रीड़ा करती महा भयानक दृश्य दिखला रही थी।
माँस लोलुपी नरनाथ मारिदत्त भी उस देवीगृह में विराजमान था। देवीगृह में स्थित मारिदत्त महाराज ने समागत शान्तिमृदायुक अभयरुचिकुमार शुल्लक और चन्द्रमुखी शुल्लिका का अवलोकन करके, खड़े होकर इस प्रकार शब्दोच्चार किया—
महाराज— ‘श्रीमान् शुल्लक महाराज और शुल्लिकाजी को मेरा सविनय नमस्कार।’
शुल्लक— ‘हे शुद्धवंश की लक्ष्मीरूप कमलिनी के हंस ! हे राजनृपज्ञ ! हे गुणश्रेणीयुक्त योगीराज ! हे स्नेहपूर्ण दाता ! हे फलवान् वृक्षवत् नृप ! हे कलाकुलकलित कलाधर ! हे जलपूरित समुद्रतुल्य गम्भीर ! हे राजन ! तुम्हारी धर्मबुद्धि हो।’
यशोघरचरित्र
इस प्रकार पूर्ण निशाकर समान बाल्ययुगल के शान्तिपूर्ण आशीर्वाद सुनकर महाराज मारिदत्त के हृदय में से समस्त रोष का विसर्जन हो गया। उस समय महाराजा अपने हृदय में विचार करने लगे।
आहाहा! कैसा अनुपमरूप विधाता ने बनाया है! हा! दुष्ट विधाता! ये दोनों सुकुमार बालक कहाँ आ गये? इन्होंने जो स्वजनों के सुख का त्याग किया, उस समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का भोग क्यों नहीं किया?
ये दोनों बालक आनन्दपूर्वक प्रशंसायोग्य, विद्याधरों के इन्द्र अथवा नागेन्द्र का पाताल भेदकर आये हैं अथवा इस मध्यलोक के लक्ष्मी को देखने स्वर्ग में से सुरेन्द्र अथवा प्रभाधन चन्द्रमा आया है अथवा बालकों को वेष धारण करके मुरारी महादेव या कामदेव, इन दो में से कोई आया है अथवा अव्यक्तरूप धारण करके धृति, कान्ति, लक्ष्मी, शान्तिसहित अनेक सिद्धि की पृथ्वी है अथवा यश का स्थान, गुणों की श्रेणी, दुःखनाशक कवियों की वाणी और पुण्य की भूमि है? यह उपशान्त बदन शान्तमूर्ति चन्द्रमारीदेवी ही क्या मनुष्य का रूप धारण करके मेरी परीक्षा के लिये यहाँ आयी है अथवा मेरे कोई सम्बन्धी दीक्षा ग्रहण करके संसार का अन्त करने के लिये यहाँ उपस्थित हुए हैं? – इत्यादि चिन्तवन करते हुए महाराज मारिदत्त ने पुनः प्रगटरूप से क्षुल्लक से प्रश्न किया।
'अहो महानुभाव! आप कौन हो? क्या राज्य से भ्रष्ट होकर शत्रु के डर से, भोग रहे सुख को छोड़कर यहाँ आये हो? और यह शान्तमूर्ति महारूपवती कृपानन्ददायिनी कन्या किसकी पुत्री है? अहो! इस बाल अवस्था में व्रतपूर्वक दीक्षा, घर-घर में भिक्षा (आहार) और महान गुणों की परीक्षा से एक एक अद्भुत लगती है।
हे राजकुमार! हे मुनि! इस हमारे शुद्ध और कीर्ति गृहस्वरूप श्रेष्ठ नगर में इस कुमारीसहित आप किस प्रकार पधारे हैं? वह आपकी पापनाशक और सुखदायक कथा ज्ञात करायें।
महाराज मारिदत्त के ऐसे वचन सुनकर, नृपति को हर्षापादक क्षुल्लक महाराज इस प्रकार कहने लगे –
बौद्धि-समाधि-विचार (भाग-२)
क्षुल्लक – ‘राजन! जिस प्रकार अन्धे के सामने नृत्य, बहरे के समीप गान, नपुंसक पुरुष के प्रति तरुणबाला के कटाक्षों का निक्षेपण, लवणरहित विविध प्रकार के व्यंजन, अज्ञानियों में तीव्र तप का आचरण, निर्बल की शरण, शुभध्यानरहित परन्तु अति रौद्रसहित पुरुष का समाधिकरण, निर्धन का नवयौवन, कृपण का धन संचय करना, निःस्नेही में कमनीय कामिनी का रमण, अपात्र को दान, मोहरूप धूल से भूंसरित मनुष्य की धर्म का व्याख्यान, दुष्ट स्वभावी पुरुष से गुणों का वर्णन तथा रण में रुदन जैसे व्यर्थ / बेकार है, उसी प्रकार आपके सम्मुख हमारा चरित्र कहना व्यर्थ है क्योंकि सिर में शूल समान, जिनेन्द्र को नहीं माननेवाले पुरुष को, जो गुरु शुद्ध वचनों द्वारा परमागम का कथन करता है, वह शुद्ध दूध को सर्प के मुख में देकर अपना नाश करता है।’
क्षुल्लक महाराज अभी कहने लगे कि – 'हे राजन! जैसे मूर्च्छित पुरुष को शीतल जल और पवन से सचेत किया जाता है; उसी प्रकार उपशान्त पुरुष को धर्मोपदेश दिया जाता है, परन्तु जिस प्रकार शुष्क वृक्ष का सिंचन व्यर्थ है; उसी प्रकार अविनयी को सम्बोधन भी व्यर्थ है।
नृपवर! मेरी जो कथा है, वह धर्मक्रिया का उपदेश है, जो उत्तम पुरुषों को श्रवण और पूजनीय है, इस कारण यदि मेरे चरित्र का श्रवण करना चाहते हो तो शान्तचित्त होकर श्रवण करो।’
इस प्रकार के अभयरुचुकुमार क्षुल्लक के वचन सुनकर उपशान्तहृदय बनकर महाराज मारिदत्त ने भस्मा, भट्टी, दुष्टनी और प्रचण्ड डमरू के शब्दों का निवारण करके, मनुष्यों की हिंसा के विनोद के निवारणपूर्वक, विनयपूर्वक क्षुल्लक महाराज से पुनः प्रार्थना की –
मारिदत्त – 'हे दयापालक! हे स्वामिन! आपकी आज्ञानुसार अभी समस्त सभा सुनने के लिए स्तब्ध हो रही है। हे श्रमणेश! देखो, सब मनुष्य विनयसहित आपकी वाणी
यशोघरचरित्र
की अभिलाषा से कैसे बैठे हैं, मानो प्रवीण चित्रकार के रचे हुए चित्र ही हैं। अब आप अपने चरित्र का वर्णन करो।’
क्षुल्लक – 'नृपवर! यदि तुम्हारी पूर्ण अभिलाषा हो तो मैं मेरा चरित्र कहता हूँ, उसे एकाग्र चित्त से श्रवण करो।
हे पृथ्वीपाल महाराज मारिदत्त! मैं दृढ़ श्रुतानुभूत रहस्य का आपके सन्मुख वर्णन करता हूँ।
इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में पृथ्वी के तिलक समान अवन्ती नाम का देश है। उस रमणीक अवन्तीदेश में स्वर्गपुरी समान उज्जयिनी नामक नगरी है। उस नगरी का राजा महाप्रतापी यशोधीर था।
वह दक्षिण कर्म का धारक राजा यशोधीर यौवनावस्था में ऐसा शोभित होता था मानो गुणों का समूह अथवा तप का प्रभाव या पुण्य का समूह अथवा कला का समूह या कुल का आभूषण अथवा यश का भण्डार या न्याय का मार्ग अथवा जगत का सूर्य ही हो।
उस यशोधीर नामक पृथ्वीपालक को काम की विद्या, काम की शक्ति, काम की दीप्ति, काम की कीर्ति, काम बाणों की पंक्ति, और काम के हाथ की वाणी समान चन्दनानी नामक महारानी थी। उस महारानी के उदर से सुकवि की बुद्धि से काव्यर्थ की भाँति ‘यशोधर’ नामक (मैं) पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ।
राजन! जब मैं बाल्यावस्था में आया, तब पहले तो मेरी उम्र के बालकों के साथ घर में ही खेलने लगा। पश्चात् जब पढ़नेयोग्य हुआ, तब मेरे माता-पिता ने योग्य अध्यापक के निकट मुझे पढ़ने के लिये रखा। वहाँ पहले तो वर्ण-मात्रादि क्रम का शिक्षण प्राप्त किया। तत्पश्चात् क्रमपूर्वक व्याकरण, कोष, न्याय, काव्य, छन्द, अलंकार में निपुण हुआ। पश्चात् मैंने ज्योतिष, सामुद्रिक, वैद्यक का अभ्यास किया। तत्पश्चात् संगीत विद्या और नवरसयुक्त नृत्यकला तथा वाजिन्त्र बजाने की विद्या में भी जब प्रवीण हो गया, तब रत्नपरीक्षा, गजराज, घोटक, वृषभ आदि पशुओं की परीक्षा के शास्त्रों का मनन किया।
तत्पश्चात् चित्रलेखन, और काष्ठकर्म का भी अभ्यास हो गया। पश्चात् हाथी,
बोधि-समाधि-विभाग (भाग-२)
घोटक आदि आरोहण, धनुष विद्या, युद्धकला, मल्लविद्या, जल तरण आदि अनेक कलाओं में प्रवीण हुआ। धराधाम! जब मैंने लावण्यरूप जल से सिंचित तरुता में प्रवेश किया, तब यद्यपि मैं असंरक्षित था, तथापि अनंग (कामदेव) समान दिखलायी देता था। जब माता-पिता को, मैं जवान हुआ ऐसा लगा, तब रूप-लावण्य की सरिता समान पाँच राजकन्याओं के साथ मेरा विवाह हुआ। मैं भी सुखसागर में ऐसा मग्न हुआ कि व्यतीत होते समय को किंचित् भी नहीं जान सका। तत्पश्चात् माता-पिता वैराग्य को प्राप्त हुए।
यशोधर महाराज चन्द्रमा के किरण समान उज्ज्वल केश को देखकर चिन्तवन करने लगे कि—'अरे दु:ख! रतिरूप सपत्नी को मर्थवाली और दुर्भाग्य की राशि इस वृद्धावस्था ने क्या मेरे बाल को ग्रहण कर लिया? यह सफेद बाल ही मेरी वृद्धावस्था का सूचक है। इस वृद्धावस्था में मुख से जो लार गिरती है, वह ऐसी ज्ञात होती है कि मानो पुरुष के शरीर में से शक्ति ही लार का रूप धारण कर निकल रही है तथा वृद्ध के मुख में से जो दाँत गिरते हैं, वे मानो कि पापोदय से पुण्य को क्षीण ही गिर रहे हैं।
इस वृद्धावस्था में कामिनी की गति समान दृष्टि मन्द हो जाती है, उस समय हाथ में लकड़ी स्थिर नहीं रहती। यह सत्य ही है कि नयी आयी हुई जरारूपी वनिता के संसर्ग से लकड़ीरूपी स्त्री किस प्रकार स्थिर रह सकती है? इस वृद्धावस्था में कुकवि के काव्य की भाँति पैर भी नहीं चलते अर्थात् जिस प्रकार कुकवि के काव्य के पद चलते नहीं, उसी प्रकार वृद्ध पुरुष के पैर भी नहीं चल सकते।
वृद्ध पुरुष के शरीर में से जो लावण्यता नष्ट हो जाती है, वह ऐसी ज्ञात होती है कि मानो जरारूप सरिता की अभंग तरंगों से धोयी हुई है।’
यशोधर महाराज विचार करने लगे कि ‘देश, कोष, शास्त्र, सेना, अमात्य, गढ़, और मित्र – ये राज्य के सात अंग तथा दो हाथ, दो पैर, निम्बक, कुला, पीज, और मस्तक– ये शरीर के आठ अंग किसी के भी त्रिभुवन में शाश्वत् स्थिर नहीं रहते। इसलिए मैं उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य – इन दस धर्मों का पालन करता हूँ और अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य तथा परिग्रह त्याग इन पाँच महाव्रतों को धारण करता हूँ।’
यशोधरचरित्र
मैंने मेरी अज्ञानता से विषयभोगों में मग्न होकर अपने कुटुम्बियों के स्नेह में तल्लीन होकर इतना समय व्यर्थ बिगाड़ा है। मैंने इस बात का किंचित् भी विचार नहीं किया कि ये पंचेन्द्रियों के विषय, विषमिमिश्रित मिष्ठान की भाँति प्राणघातक और दुर्गतियों में ले जाकर अनेक दु:खों का पात्र बनाते हैं।’
यशोधर महाराज ने यह भी विचार किया कि ‘यह पुत्र, मित्र, कलत्र आदि समस्त परिजनसमूह स्वार्थपरायण है। इसका विचार किये बिना उनके स्नेह में फँसकर उचित का विचार न करके पाप कार्यों में तत्पर हो रहा था परन्तु अब सर्व कार्यों का त्याग करके जिनदीक्षा ग्रहण करके महान तपश्चरणपूर्वक संसार भ्रमण से निवृत्त हो जाऊँगा।’— इत्यादि विचार करके महाराज यशोधर ने समस्त राज कर्मचारियों को अपने आन्तरिक विचार से अवगत कराया। उस समय समस्त कर्मचारीगण यद्यपि अपने हृदय में अत्यन्त दु:खी हुए परन्तु महाराज को दृढ़ देखकर कुछ भी कहने का सामर्थ्य नहीं कर सके और महाराज की आज्ञानुसार समस्त सामग्री एकत्रित करके यशोधर अर्थात् मुझे बुलाकर राजतिलक किया। तत्पश्चात् यशोधर महाराज ने जैनपथ के पथिक बनकर वन की ओर गमन करके, वहाँ विराजमान जैनाचार्य के समीप जैनश्वरी दीक्षा प्राप्त की।
राजन! यशोधर महाराज तो कामरूप मद के विघातक होकर शिव राज्य के लिये प्रयत्न करने लगे। यशोधर ने अर्थात् वृद्ध मन्त्रियों की सहायता से आन्वीक्षिकी राज्य विद्या द्वारा इन्द्रियविजयी ज्ञान प्राप्त किया। त्रयी नाम की विद्या से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों ही वर्णों के आचार विचार जाने; दण्ड नीति नामक विद्या से खाटे मदयुक्त दुष्टों को योग्य दण्ड का स्वरूप जाना और वार्ता नामक विद्या से धनादि संचय की रीति-नीति का शिक्षण प्राप्त किया।
तत्पश्चात् लोक नीतिज्ञ और धर्मज्ञ वृद्ध पुरुषों के संसर्ग से द्यूत (जुआ), माँस, सुरा, वेश्या, चौर्य, और परंगना – इन व्यसनों का त्याग करके क्रोध, मोह, मान आदि कर्मों का विसर्जन किया।
नृपवर! उस समय यशोधर/मैं काम विनोद का नाममात्र सेवन करता था, तथापि हर्षोत्पादक अंगों से निश्चित दूर रहता था। मन्त्रियों द्वारा विग्रह, यान, आसन, आश्रय
बोधि-समाधि-विभाग (भाग-२)
आदि राज्य के अंगों का ज्ञान जिस समय मेरे हृदय में स्फायमान होने लगा, उसी समय से भूयसमूह काँपने लगा और निकायमों में तत्पर होने लगा। जो मुझसे भयभीत थे, वे नगर-ग्राम के निवास छोड़कर अरण्य में वास करने लगे। जो दुष्ट मन्त्रियों के बहकाये हुए राजा रणांगण में युद्ध के लिये आगे आये, वे चंचल बिजली के समान लुप्त हो गये और जो नम्र धराधीश थे, वे सुखपूर्वक निज जीवितव्य व्यतीत करने लगे।
नृपवर! रणांगण में यशोधर ने/मैंने दुर्निवार तलवार की धार से अन्य राजाओं का नाश किया और दिशाओं में व्याप्त अपने तेज से सूर्य और चन्द्रमा पर विजय प्राप्त की।
राजन! राजा यशोधर निज स्त्री के प्रेम में आसक्तचित्त होते हुए ऐसा विचार करने लगा कि स्वच्छगति, हेमगति, मेरी प्रिय भार्या अमृतमयी मेरे हृदय में वास करती, नेत्र के टिमटिमाकार विरह से व्याकुल हो जाती है, तो मैं भी उसके साथ भोग भोगूँगा; पश्चात् भले नृपपुण्य राज्य नष्ट हो जाये, चाहे लक्ष्मी पर वज्रपात हो, चाहे शर्म नष्ट हो जाये परन्तु उस हृदयवासिनी से एक क्षणमात्र भी पृथक् नहीं होऊँ। गुणों के समूह से युक्त और यश तथा जप का धाम यशोधर्मि नामक निजपुत्र को राज्य सिंहासन पर स्थापित करके, उसे ही राज्यभार समर्पित करके, पश्चात् इष्ट प्राप्ति के लिये अमृतगति के घर जाकर उस प्रियतमासहित विलास करूँगा और उसके साथ ही इच्छित भोजन भी करूँगा।
उस सुकोमल मनोमुग्धी प्रियासहित निर्जन वन में वास भी उत्तम है, समस्त सुखों का कारण और लक्ष्मी का निवास है, परन्तु प्रतिमा बिना स्वर्ग का वास भी अच्छा नहीं – इत्यादि अनेक विचार करने लगा।
महाराज मारिदत्त! जिस समय यशोधर महाराज ऐसा विचार कर रहे थे, उस समय सन्ध्या काल हो गया था, उस समय महाराज यशोधर के हृदय में निज प्रिया से मिलने की अत्यन्त लालसा उत्पन्न हुई, इसीलिए उन्होंने द्वारपाल को आदेश दिया कि—‘तू महारानी के महल में जाकर समाचार दे कि महाराज पधार रहे हैं।’
द्वारपाल ने विनयपूर्वक कहा—‘महाराज की जैसी आज्ञा। मैं अभी जाकर समाचार देता हूँ।’
ऐसा कहकर द्वारपाल ने महारानी के महल में जाकर महाराज के आगमन सम्बन्धी
यशोधरचरित्र
समाचार दे दिये। वहाँ की सब व्यवस्था ठीक करके वापिस आ गया।
द्वारपाल ने आकर कहा- ‘श्री पृथ्वीनाथ! स्वर्गंतुल्य महारानी के महल की ओर पधारो।’
इस प्रकार द्वारपाल का निवेदन सुनकर महाराज / मैं तत्काल जाने के लिये तैयार हुआ। उस समय तिमिरनाशक दीपक हाथ में लेकर एक सेवक आगे चल रहा था। इस प्रकार मैं मणिमय शिखरयुक्त अमृतादेवी के महल में पहुँचा। वह महल कहीं-कहीं रत्नजड़ित दीवारों से शोभित था।
राजन! जिस समय यशोधर महाराज / मैं उस अति सुन्दर मन्दिर में / महल में सात प्रकार की भूमि को देखा, उस समय मेरी बुद्धि ऐसी कम्पायमान होने लगी कि मानो नरक में ही प्रवेश किया हो!
पृथ्वीनाथ! उस समय काम के उद्दीप्त से विषसहित सर्प की भाँति मेरे सर्वांग में कम्प उत्पन्न हुआ और मुझे प्रिया तक पहुँचना कठिन हो गया।
प्रजापालक! तत्पश्चात् मैं द्वारपाल के हाथ का अवलम्बन लेकर रानी के महल में अन्दर पहुँच गया। अन्दर प्रवेश होते ही देव ने मेरी बुद्धि हरण कर ली। उस समय निज प्रिया के मुख से सुगन्धि स्वादयुक्त वचनालाप सुनकर मैंने अपने कान और नाक को आघ्राणित किया। उसके अति उत्तम रूप का अवलोकन करके नेत्र को तृप्त किया। उस चन्द्रवदनी के अधरामृत के स्वाद से जीभ को सन्तोषित किया और सुकोमल शरीर के स्पर्श से सर्व अंग सुखपूर्ण किये।
राजन! उस समय का अवलोकन, संभाषण, दान, आलिंगन, विश्वास, प्रिया का मिलाप और रतिक्रीड़ा, अमृतादेवी के संसर्ग से जो मुझे प्राप्त हुए, वे दूसरे किसी को प्राप्त नहीं हुए होंगे।
न्यायमूर्ति समस्त क्रीड़ा से निश्चिन्त होकर मैं शयनस्थ हुआ। मैं आँख बन्द करके उस कमलदना, चन्द्रवदनी, गजगामिनी प्रिया का स्मरण कर रहा था, इतने में वह परपुरुष-आसक्त मेरे बाहुपाश में से निकलकर धीमे-धीमे गमन करने लगी। तत्काल मैं भी उठकर देखने लगा कि इतनी अर्धरात्रि में यह कहाँ जाती है? ऐसा विचार करके हाथ
बोधि-समाधि-विधान (भाग-2)
में तलवार लेकर मैं गुप्त रीति से उसके पीछे जाकर देखता हूँ कि वह कुबड़े (कुरूपवान) के सामने हाथ जोड़कर खड़ी है।
पृथ्वीनाथ! वह कुबड़ा, पुरुषार्थ में अग्रुद्यमी, सर्वजन निन्दा, बड़े दाँतवाला, बहुत बड़े और विषम होंठ, खुरदरे और कठोर हाथ-पैर, सूक्ष्म और कठोर हृदय, रूक्ष बालों से भयानक, दूसरों के जूतों का रक्षण करनेवाला, हाथों-चोंचों के बचे हुए अन्न से पेट भरता था। ऐसे महा भयानक कुबड़े ने जैसे ही अमृतादेवी को देखा, तुरन्त ही वक्रदृष्टि से बोलने लगा।
कुबड़ा- ‘सद्भाविरहित दासी! तूने इतनी देर क्यों लगायी? प्रतिदिन की भाँति शीघ्र क्यों नहीं आयी?’ इत्यादि वक्-वक् करते हुए चाबुक में लेकर अमृतादेवी को मारने लगा। तत्पश्चात् केश पकड़कर जमीन पर पछाड़कर लात मारने लगा। उस समय कुबड़े के चरणों में नमस्कार करती हुई अमृतादेवी नम्र भाव से कहने लगी-
अमृतादेवी- 'स्वामी! आज वर के कार्य से अवकाश न मिलने के कारण थोड़ा विलम्ब हो गया है। नाथ! आप कामदेव समान मेरे हृदय में निवास करते हो, इस कारण आपके नाराज होने से मेरे छत्र, चैंवर, आसन, महल, हाथी, घोड़ा, रथ, प्यादा, वस्त्र, आभूषण और समुद्रान्त पृथ्वी का राज्य-यह सब ही व्यर्थ है।
प्राण वल्लभ! आपके बिना कुमकुम का विलेपन, रत्न-स्वर्णजड़ित आभूषण, उत्तम बहुमूल्य वस्त्र और मुक्ताहार-यह सब ही अग्नि ज्वाला समान सर्वांग को दाहकारक है। हे विधाता! तूने इन्हें उत्तम कुल में उत्पन्न करके मेरा पति क्यों नहीं बनाया? और ऐसा ही किया तो मुझे जीवित क्यों रखा?
प्रियवर! आपके बिना जो दिन व्यतीत होता है, वह ऐसा लगता है कि पूर्व संचित पापक्रम का फल आज भोगती हूँ।
यदि कदाचित् यशोधर महाराज यमपुर पहुँच जाये तो मैं नृत्य करूँगी और चैत्र माह में नैवेद्य से कात्यायिनी देवी की पूजा करूँगी।’
राजन! वह अमृतादेवी उपरोक्त प्रकार से नम्र वचनों द्वारा अपने प्रेमी कुबड़ा को
यशोधरचरित्र
सन्तोषित करके गाढ़ आलिंगन करने लगी। उस समय दोनों प्रेमी प्रेम सागर में निमग्न होकर भय और लज्जा को एकदम भूल गये।
नृपवर! उस समय उन दोनों की अवस्था देखने से मेरे / यशोधर के क्रोध का पार नहीं रहा। मैं तत्काल तलवार बाहर निकालकर दोनों को मारने हेतु उद्यत हुआ ही था कि उसी समय मन में विचार आया कि जिस तलवार से वीरों का संहार किया, जिस तलवार से राजाओं का विनाश किया, जिस तलवार से महा भयंकर सिंहों का नाश किया, उसी तलवार से इन दोनों को किस प्रकार मारूँ? जिस तलवार से योद्धाओं को मारा है, उस तलवार से ऐसे रंक को किस प्रकार मारूँ? इत्यादि प्रकार से चिन्तन करके मैंने क्षमास्वरूप जल से क्रोधाग्नि को शान्त किया। तत्पश्चात् तलवार को म्यान में रखकर, जिस प्रकार आया था, उसी प्रकार गुप्त रीति से जाकर शैय्या पर सोते-सोते हृदयवासिनी दुष्टा के चरित्र का स्मरण करने लगा। कि- हा! धिक्कार है तुम्हारी बुद्धि को! तुम्हें यह भी विचार नहीं आया कि कहाँ तो मेरा उच्च क्षत्रिय कुल और कहाँ तो उसका रंक कुल? कहाँ तो समुद्रान्त पृथ्वी के अधिपति की प्राणवल्लभ और कहाँ तो यह हाथी-घोड़ों की बची हुई जूठन में आजीविका चलाकर पेट भरनेवाला दरिद्री कुबड़ा।
हा! धिक्कार! तूने यह भी विचार नहीं किया कि मेरा पति राजाधिराज है और एक नवयौवन पुत्र विद्यमान होने पर भी ऐसे नीच, दरिद्री, उच्छिष्ट भोजी, मलिन गात्र, कुबड़ा के साथ किस प्रकार रमण करती है?
हा! अमृता! तेरी बुद्धि एक साथ ही नष्ट हो गयी। तुझे यह नीच कुल्य करते हुए किंचित् भी लज्जा नहीं आयी। जिस वृक्ष की शाखा पर हंस बैठता है, उसी वृक्ष की शाखा पर बगुला भी बैठता है!
राजन! उपरोक्त विचार करते-करते यशोधर महाराज गोपवती, वीरवती और रक्ता, इन दुराचारी स्त्रियों के चरित्र का स्मरण करने लगे।
गोपवती का चरित्र
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 1855.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है