भूमिका
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भूमिका
- श्री गणेशायनमः -
यों तो सौभाग्य से हिन्दी-साहित्य-क्षेत्र में भी प्रति वर्ष सैकड़ों ग्रन्थ एक से एक अधिक अच्छे प्रकाशित हो रहे हैं, जिनमें कुछ दिन से नाटकों की भी भरमार है। किन्तु वे सब प्रायः हिन्दी भाषा के दूसरे ग्रन्थों की भाँति दूसरी भाषाओं से अनुवाद किये हुए ही प्रकाशित होते हैं। किन्तु किसी भी उन्नतिशील भाषा के साहित्य-भण्डारके लिये इस प्रकार के मौलिकग्रन्थों की उतनी ही आवश्यकता है कि जितनी अनुवाद किये हुए ग्रन्थों की। अस्तु, हिन्दी-साहित्य ग्रन्थ-लेखकों का प्रधान कर्तव्य है कि वे मौलिकग्रन्थ लिखने का भी उतना ही, बल्कि कहीं अधिक प्रयत्न करें कि जितना वे अनुवाद करने के लिये करते रहते हैं। इसका कारण यह है कि वास्तव में किसी भाषा की निजी सम्पत्ति तो देश-काल की आवश्यकतानुसार स्वतन्त्र रूप से लिखे हुए उसके मूलग्रन्थ ही कहे जा सकते हैं। दूसरी भाषा के अनुवाद किये हुए ग्रन्थ तो उस भाषा पर केवल ऋण-भार ही हैं। अतः इस-भाँति-जो भाषा सदा ऋणी ही रहेगी और किसी दूसरी भाषा को देने के लिये अपने मौलिकग्रन्थ न उपस्थित कर सकेगी, वह कब तक दिवालिया न होगी, यह बात हमारे ध्यान में सहज ही आ सकती है। मौलिकग्रन्थों में भी वे उपदेश-प्रद ग्रन्थ कि जो जनता पर प्रभाव डालने में सफल हों अधिक प्रशंसा के योग्य हैं।
यह तो प्रत्यक्ष है कि जनता पर अपने भावों का प्रभाव डालने को किसी भी लेखक के लिये नाटक एक सब-से अच्छा और सरल उपाय है। किन्तु, इसके साथ ही लेखक को यह भी अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि अब वह ऐसे प्रभावशास्त्रीय मार्ग का अवलम्बन करे तो ग्रन्थ की कथा भी सब भाँति पवित्र और ऐसी चुने कि जो समयानुकूल जनता को देश तथा जाति के हित ही की ओर लेजाती हो। तभी तो उस नाटककार का प्रयत्न सफल हो सकता है, नहीं तो कागज़ काला करना तो सभी के हाथ में है। प्रस्तुत पुस्तक में उपरोक्त बातों का पूर्ण ध्यान रखते हुए लेखक ने उसको बड़ी कुशलता से समाया है। पुस्तक में वर्णित घटना आज से प्रायः २४२३ वर्ष पूर्व की अति प्राचीन घटना है जब कि भगवान महावीर अपनी ९० वर्ष की अवस्था में सन्यास ग्रहण कर चुके थे और लोगों को जैन धर्म का उपदेश कर रहे थे। उन्हीं दिनों कुटिल राजा शतानक ने अपने सैन्यबल के अभिमान से अनुचित रीति से सोमा दबाने का असत्य बहाना लेकर शान्तिप्रिय तथा धर्मभीरु राजा दधिवाहन पर चढ़ाई बोलदी। दोनों राजाओं का एक दूसरे के सामने होने पर वादाविवाद हो कर घमासान युद्ध होता है। इसी बीच में कपटी राजा शतानक थकने जैसा बहाना कर पीछे की ओर हटता है और साथ ही एक बाण आकर निर्दयी राजा दधिवाहन की बगल में घुसता है। है। राजा दधिवाहन जैसे ही बाण को ओर देखता है वैसे ही कपटी राजा शतानक उसकी दूसरी बगल में तलवार भोंक देता है। राजा दधिवाहन मूर्छित होकर ज़मीन पर गिरता है और उसका प्राणान्त होजाता है। मृत राजा की समस्त स्वामि-भक्त सेना लड़ते लड़ते ही कट जाती है और राजा शतानक राजा दधिवाहनके गढ़ पर अधिकार करता है, इसी बीच में राजा शतानक का लम्पट और इन्द्रियलोलुप सेनापति रानी धारणी को यह दुःखद समाचार देता है। रानी धारणी और कुमारी चन्दन-वाला राजा के शव को देख विलाप करती हैं। अन्त में लम्पट सेनापति अपने को राजा दधिवाहन का स्वामि-भक्त सेनापति बतलाकर तथा भविष्य में राजा शतानक से इस अत्याचार का बदला लेने का मिथ्या बहाना कर रानी और राजकुमारी को उनके प्राण-रक्षा का विश्वास दिला उन्हें समीपवर्ती जङ्गल में भुरमा कर ले जाता है। यहाँ पर वह नराधम रानी धारणी से अपनी पाप-वासना प्रकट करता है। जब वह देखता है कि रानी धारणी मेरी बात अनेकानेक प्रलोभनों, भेदभरी बातों और भय दिखलाने पर भी नहीं मानती तब वह नरपिशाच रानी पर बलात्कार करने की ज्योंही चेष्टा करता है त्योंही रानी फुर्ती से सेनापति को कमर से खञ्जर निकाल लेती है। रानी के हाथ में खञ्जर देख सेनापति डर कर हट जाता है। अन्त में रानी उस नराधम को अनेक लांछनाय
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देती हुई और “जा मैं अपने धर्मानुसार तुम पर दया करती हूँ और अपना जीवन इस सतीत्व की वेदी पर बलिदान करती हूँ!” कहकर अपनी छातियों में खंजर भोंक लेती है। सेनापति आश्चर्यचकित हो जाता है और राजकुमारी मूर्छित होकर गिर पड़ती है, सेनापति का हृदय इस घटना से द्रवीभूत होता है और वह राजकुमारीको उसकी सुरक्षाके निमित्त अपने घर ले आता है। किन्तु वहाँ उसकी स्त्री इस बात की शङ्का करती है कि कहीं यह इस कुमारी से प्रेम न करने लगे, इसलिये उसे घर में न रखने के लिए अपने पति को विवश कर देती है। सेनापति इच्छा न रहते हुए भी इस भय से कि कहीं मेरी स्त्री राजा के पास यह ख़बर न भेजदे कि मैं उसके शत्रु की पुत्री का भरण-पोषण करता हूँ, राज-कुमारी को बाज़ार में ले जाकर एक वेश्या के हाथ बेच देता है। वेश्या चन्दनबाला को अपने घर ले जाना चाहती है परन्तु वह नहीं जाती, इसी बीच में देवता प्रकट होते हैं और उस कन्या की वेश्या से रक्षा करते हैं।
इसके बाद नामी धनी सेठ धनवाहा आता है और कुमारी को मोल लेलेता है। सेठ कुमारीको अपनी पुत्रीवत् स्नेह करता है किन्तु उसकी प्रौढ़ा स्त्री इस बात की शङ्का करती है कि मेरा पति कहीं इस नवबाला के प्रेम में न फँस जाय। सेठ की स्त्री कुमारी को अनेक प्रकार के कष्ट देती है किन्तु वह सब कष्टों को सुमनवत् सहन करती है। अन्त में एक दिन सेठ की स्त्री अधिक क्रुद्ध हो कुमारी का. शिर घुटवाकर तथा हाथ पैरों में हथकड़ी. और बेड़ी
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डलवा कर उसे अंधेरे तहखाने में गिरा देती है। जहाँ पर वह कुमारी ३ दिन तक बिना अन्न-जल पड़ी रहती है। तीसरे दिन भी कुमारी को न देखकर सेठ धनवाहा घबड़ाता है। दासी से पूछने पर पता चलता है, और वह दौड़कर उसे तहखानेसे निकालता है। उस समय घरमें खाने का सामान नहीं मिलता, तब सेठ धनवाहा कुमारी के सामने उड़द के घुघले रखकर हथकड़ी-बेड़ी कटाने के लिये लुहार को बुलाने को जाता है। यहाँ पर कुमारी चन्दनबाला के कष्टों की पराकाष्ठा हो जाती है और उस समय स्वयं भगवान् महावीर वहाँ आकर उसकी प्रार्थना करने पर वे उड़दके घुघलों का भोजन ग्रहण करते हैं। उसी समय देवता आकाश से मुद्राओं की वर्षा करते हैं और कुमारीकी हथकड़ी-बेड़ियाँ सोने के ज़ेवर होजाते हैं। इसी समय एक आकाशवाणी-होती है कि “ऐ राजा शतानीक और कौशाम्बी नगरी के निवा-सियो इस सारी सम्पत्ति की स्वामिनी चन्दनबाला है, जब यह पुत्री वीर प्रभु की प्रथम साध्वी होगी तब यह सम्पत्ति दान करने के काम में लायेंगे।”
यह लेख देना अनावश्यक होगा कि यद्यपि मेरे मित्र भा० शेरसिंह जी “नाग” ने इसके पूर्व उर्दू के कई नाटक लिखे हैं किन्तु हिन्दी-भाषामें उनका यह प्रथम-प्रयास है। अतः मैं लेखक महोदय को उनकी इस पुण्य-कृति के लिये अन्त में धन्यवाद देता हुआ हिन्दी भाषा-प्रेमियों से ‘नाग’ जी के उत्साह-वर्द्धन के निमित्त इसे अपनाने की उदार कृपा दिखाने की विनम्र प्रार्थना करता हूँ।
हिन्दू-संसार कार्यालय,
देहली।
२७-६-१९२७
वक्षरामसिंह भदौरिया, ‘कुमुद’
व्यवस्थापक,
‘हिन्दू-संसार’।
निवेदन
प्रेमी पाठको!
नाटक क्या वस्तु है और उसके नियम क्या हैं इत्यादि बातों को पूर्ण रूप से दिखलाने के लिये समय और अवकाश की आवश्यकता है, तथापि संक्षेप में यह बतलाना भी अनुचित होगा कि नाटक निर्माण कितना कठिन है। देखने में तो यह कार्य्य सरल मालूम पड़ता है, किन्तु लिखते समय लेखक की बुद्धि की तीक्ष्णता का भली भांति उपयोग व परीक्षा हो जाती है। प्रत्येक विषय का अनुभव और व्यवहार कुशलता की कितनी आवश्यकता है? पात्रों के भावों को कितना भावपूर्ण व व्यवहारिक बनाया जाता है? सम्पूर्ण कार्य्य अत्यन्त चित्ताकर्षक बनाने के लिये कितनी बुद्धि-प्रखरता व व्यवहार चातुर्य्य चाहिये! इन समस्त प्रश्नों का उत्तर नाटक कर्त्ता को ही प्राप्त होता है। यही कारण है कि बहुत से मनुष्यों के विचार दिल के दिल ही में समुद्र की तरङ्गों की भांति उठते और नष्ट होते रहते हैं। मुझे भी नाटक निर्माण से पूर्व इन समग्र कठिनाइयों का भीषण रूप दृष्टिगोचर हुआ।
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किन्तु कुछ तो हार्दिक इच्छा और उससे भी अधिक मित्रों का आग्रह, इन दोनों कारणों से लाचार हो इस नाटक का लिखना आरम्भ कर दिया। परन्तु निर्माण काल में जिन बाधाओं और आपत्तियों का मुझ पर आक्रमण हुआ उनसे लोहा मानना पड़ा और इच्छा होते हुए भी इस कार्य्य को छोड़ देने की उत्कटता हुई। किन्तु मित्रों और शुभेच्छुओं का विचार कर पुनः लज्जा हुई कि जिस कार्य्य को हाथ में लिया उसे अधूरा कैसे छोड़ा जाय। अतएव फिर उत्साह पूर्वक जिस भांति हो सका इसको समाप्त किया।
अब इस विषय पर ध्यान जाता है कि मैं अपने उद्देश्य में कितना सफल हुआ हूँ और मैंने उसकी सिद्धि में कहाँ तक पदार्पण किया हूँ, इन प्रश्नों का उत्तर पाठकों के प्रेम व निष्पक्ष चित्त द्वारा स्वयं मिल जायगा।
हाँ, इतना निवेदन अवश्य करूँगा कि इस नाटक में अन्य कतिपय नाटकों की भांति अनुचित मन बहलाव, शृङ्गार रस का आधिक्य व अमानुषिकता की दुर्नीति कदापि न आवेगी जिनको विद्वान् नाट्यकारों ने नाटक के दोष बतलाये हैं।
अन्त में मैं अपने सुहृदय व शुभचिन्तक लाला ऊजमल ओसवाल व प्रिय अग्रयोप्रसार ‘दास’ का अत्यन्त कृतज्ञ हूँ जिनके उत्साह दिलाने व निर्माण में सहायता देने से मैं इसे लिखने में समर्थ हुआ। वस्तुतः यदि ये सज्जन अपने प्रेममाहपूर्ण शब्दों द्वारा समय २ पर मुझे उत्साह न देते तो यह कठिन कार्य्य कदापि समाप्त न होता।
क्षमा प्रार्थी-
‘नाज़’ देहलवी।
नाटक-पात्र
[१] भगवान महावीरस्वामी - जिन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर।
[२] महाराजा नन्दीवर्द्धनजी - भगवानमहावीरस्वामी के ज्येष्ठ भ्राता।
[३] राजा दधिवाहन - एक दयालु और धर्मों राजा।
[४] राजा शतानीक - कोशाम्बी नगरी का राजा और राजा दधिवाहन का शत्रु।
[५] सेनापति - राजा शतानीक का सेवक और कामी पुरुष।
[६] सेठ धनवाहा - कोशाम्बी नगरी का एक धनवान और ज्ञानी पुरुष।
[७] सेठ मूलचन्द - ६० वर्ष का धनवान लोभी और कंजूस जो इस वृद्धावस्था में भी विवाह का इच्छुक है।
[८] गोपाला - सेठ मूलचन्द का मसखरा नौकर।
[९] लाला ज्ञानीप्रसाद - साधारण पुरुष और सुशीला का पिता।
[१०] कन्हैयालाल - ज्ञानीप्रसाद का पुत्र और अनमेल विवाह का प्रपक्षी।
[११] बनवारीलाल
[१२] श्यामलताय
[१३] महाशय रतनलाल - कन्हैयालाल के मित्र और अनमेल विवाह के प्रपक्षी।
एक लोभी, मूर्ख और अज्ञानी पण्डित
महन्त, श्रावक, मन्त्री, द्वारपाल, सिपाही, चौधरी, बराती आदि।
नाटक-पात्री
[१] रानी धारणी - राजा दधिवाहन की पतिव्रता स्त्री।
[२] चन्दनवाला - राजा दधिवाहन की गुणवती पुत्री।
[३] मूला - सेठ धनवाहा की मूर्ख और दुष्ट स्त्री।
[४] कमलावती - महाशय रतनलाल की स्त्री।
[५] रुक्मणि - ज्ञानीप्रसाद की स्त्री।
[६] जमुना
[७] कामिनी
[८] सुन्दर - कोशाम्बी नगरी की वेश्याय।
अहिला, हिंसा, सेनापति की स्त्री, चन्दनवाला की दासियां आदि।
वन्दे जिनवरम्
दान का फल
अथवा
सती चन्दनबाला।
अङ्क १ दृश्य १
अगला महल।
[राजा दधिवाहन अपनी रानी धारणी और पुत्री चन्दनवाला के साथ श्री १०८ भगवान् महावीर स्वामी की स्तुति करते हुए नज़र आते हैं]
गाना।
करूँ वन्दना आपकी महावीर भगवान्।
जिससे इस संसार में पाऊँ पूर्ण ज्ञान ॥
आप गुणों की खान हैं हम सेवक नादान।
बहुत महिमा आपकी क्यों कर करूँ बखान ॥
भवसागर के बीच मैं नाव पड़ी मँझधार।
कृपासिन्धु आप हैं कीजिये बेड़ा पार ॥
दान का फल!
काम क्रोध और लोभ के बंधन से छुटजाएँ।
दयादृष्टि कीजिये मोक्ष मार्ग को पाएँ॥
आत्मदर्शी हम बनें परिपूर्ण हो त्याग।
छुटें राग और द्वेष से हासिल हो बैराग॥
(सब का जाना)
अंक १
दृश्य २
स्थान जंगल।
(नेपथ्य में-हाथ में तलवार लिये हुए हिंसा का प्रवेश)
हिंसा-बह रही है खून की धाराएँ मेरे काम से।
लोक और परलोक दोनों काँपते हैं नामसे॥
बुजदिली से दुश्मनी है, वीरता से प्यार है।
कुन्द पड़ सकती नहीं,यह धर्म्म की तलवार है॥
अहा! कैसा विचित्र दृश्य कितना सुहावना और अच्छा खेल है। जब तक दस चौस पशुओं, दो चार मनुष्यों को प्रति दिन खून मैं लथ-पथ ज़मीन पर तड़पते मृत्यु की वेदना से चीखते-चिल्लाते गला कटने के दुःख से हाथ पांव मारते और धड़ियाँ रगड़-रगड़ कर दम तोड़ते नहीं देख लेती, उस समय तक मेरे नेत्रों को सुख और मेरे हृदय को आनन्द प्राप्त नहीं होता। ऐसे उत्तम मनोहर और वीरता के कार्य को महापाप और अत्याचार बतलानेवाले मनुष्य वास्तव में कायर बुजदिल और डरपोक हैं जो अपने कायरपन
और बुजदिली को दया और धर्म की आड़ में छुपाना चाहते हैं। यदि इसमें कुछ झूठ है तो वह मेरी इस बात का उत्तर दें कि जहां कहीं और जब कहीं धर्म की बातचीत होती है तो बड़े मोटे मोटे शब्दों में इस अमर के साबित करने की कोशिश की जाती है कि संसार में उनसे बढ़कर किसी मनुष्य के हृदय में धर्म का प्रेम नहीं, यहां तक कि बातों बातों में हज़ारों क्या लाखों मर्तबा वह धर्म के नाम पर अपना तन, मन, धन, सब कुछ बलिदान कर देते हैं, परन्तु इसके बाद अधिक से अधिक क्या करते हैं? यही कि दुनिया की झूठी लाज और समाज में वाह! वाह! होने के विचार से दो चार पैसे, सेर दो सेर अन्न, फटा-पुराना वस्त्र धर्म के नाम पर दे दिया और मन ही मन में यह समझ लिया कि बस देवता हमसे प्रसन्न हो गये, हमारे सारे पाप धुल गये और स्वर्ग हमारी जागीर हो गया। यह मूर्ख इतना नहीं समझते कि देवता हमारे मुट्ठी दो मुट्ठी अन्न और वस्त्र के मोहताज नहीं, यदि हमारे मन में देवताओं का सच्चा प्रेम है, अगर हम धर्म को जीवन से अधिक प्यारा समझते हैं तो हमें धर्म के नाम पर अपनी जानों का बलिदान करना चाहिये, अपने लाल लाल रक्त से देवताओं की मूर्तियों के मस्तक पर टीका लगाना चाहिये। यहां और वहां दोनों लोक में उन्हें सुखद बनाना चाहिये।
कोई खञ्जर के तले तड़पे, कोई तलवार पर।
खून के छींटे नज़र आएं दरो दीवार पर॥
किस लिये करता है भय संसार इस मज़बूत से।
देवता प्रसन्न होते हैं मनुष्य के खून से॥
(अहिंसा का प्रवेश)
अहिंसा-झूठ बिल्कुल झूठ! देवता हमारे चाम, हाड़, और रक्त के भूखे नहीं, वह संसारी जीवों की तरह खाने और पीने के मोहताज नहीं।
दया की उनको तमन्ना, न दान की इच्छा।
न हाड़, मांस से मतलब न जान की इच्छा॥
भली है या कि बुरी है, सिवा है या कम है।
न उसकी इनको खुशी है न इसका कुछ गम है॥
हिंसा-(चौंककर) तू कौन?
अहिंसा-पाप और अत्याचार की दुश्मन।
हिंसा-तू यहां किस कारण आई?
अहिंसा-संसारवालों को तेरे धोके और फरेबसे बचाने के लिये।
हिंसा-कैसा धोखा? और किसका फरेब? क्या देवताओं को जीवों का बलिदान नहीं देना चाहिये?
अहिंसा-कभी नहीं! हरगिज़ नहीं, हम दान में सूखी रोटी देते हैं या मोहन भोग देवता इसको नहीं देखते।
हिंसा-(मुंह चिढ़ाकर) आई! बड़ी बेचारी उपदेश देनेवाली क्या कहा? फिर कहना, देवता इसको नहीं देखते? अच्छा देवता फिर क्या देखते हैं?
अहिंसा-वह मनुष्य के हृदय की सच्ची श्रद्धा और उसके धार्मिक प्रेम को देखते हैं।
[सती चन्दनबाला]
हिंसा-झूठी, झूठी श्रद्धा और धार्मिक प्रेम हमें कुछ लाभ नहीं पहुंचा सकता यदि हम अपनी श्रद्धा और प्रेम का सुपुत्र देना चाहते हैं तो इस श्रद्धा और प्रेम पर हमें ऐसी वस्तु का बलिदान देना चाहिये जो दुनिया में सबसे अधिक प्यारी हो, और ऐसी वस्तु जीवन के सिवा और कोई नहीं।
अहिंसा-बस ! यत्न !! यह बकवास बन्द कर अपने गन्दे मुँह से ऐसे कठोर शब्द निकालकर संसार की हवा को ज़हरीली न बना, धर्म और देवताओं के नाम पर भूखों, पशुओं और निर्दोष मनुष्योंका रक्त बहाना सब पापोंसे अधिक घोर पाप और अत्या-चार है। हमें बुद्धि और ज्ञान से काम लेकर ये विचार करना चाहिये कि जिन महा पुरुषों ने दूसरे मनुष्योंका उद्धार करने, उन्हें अन्याय, पाप और संसार की सारी बुराइयों से बचाने के लिये अपना जीवन अर्पण कर दिया, वह हमारे इस कार्य से सुखी होंगे या दुःखी।
जुल्म की आशा, दया और धर्म के अवतार से ?
देवता को वास्ता ? पाप और अत्याचार से ?
जग में जो आप, अहिंसा धर्म के प्रचार को।
है यह अनहोनी, यह, खेजे म्यान से तलवार को ॥
हिंसा-वास्तव में भारत जब से ज़मीन पर “दया” के मनहुस शब्द ने जन्म लिया है, इस देश की तमाम बढ़ाई और शोभा मिट्टी में मिल गई, भीम की गदा, अर्जुन के बाण, वीरों की वीरता और
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सूरमाओं की सूरताई एक स्वप्न था, कि आंख खुलते ही कुछ नहीं अब रक्त बहाना और युद्ध करना तो कैसा ? इनका नाम सुनते ही मनुष्य का हृदय मृत्यु के भय से थरथराने लगता है, हाथ, पांव कांपने लगते हैं, शरीर का रुंआ-रुंआ खड़ा हो जाता है।
बताओ तो यही, था और कुछ इसने किया आके।
कि जो राजा थे कल, हैं आज वह दास अपनी परजा के ॥
किसी क़ाबिल न रक्खा, आह ! तलवारों को, तीरों को।
दया ने कर दिया अफ़सोस, कायर शूरवीरों को ॥
अहिंसा-भूल है, भूल है, अरी नादान, मूर्ख, यह तेरी सबसे बड़ी भूल है। भारत की शोभा दया और धर्म का पालन करने से नहीं, बल्कि अन्याय और अत्याचार के कारण से मिटी है।
जो कुछ किया, किया है, यह पाप और भूल ने।
भारत की शान खोई है आपस की फूट ने ॥
हिंसा-ऐसा नहीं हुआ।
अहिंसा-अवश्य ऐसा ही हुआ ! एक निर्दोष अबला स्त्री को ज़बर्दस्ती भरी सभा में बुलाकर उसकी साड़ी खिंचवाना क्या संसार में इस पाप से बढ़कर और भी कोई पाप हो सकता है ? बड़े २ ज्ञानी, विद्वान्, बलवान और ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले महा पुरुषों का सभा में मौजूद होते हुए ऐसे घोर पाप और अत्याचार को देखकर गूँगे और बहरे बन जाना,
[सती चन्दनबाला]
क्या इससे बढ़ कर और कोई आश्चर्य की बात हो सकती है ? कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पांडवों का वह ज़बर्दस्त युद्ध जिसमें पिता ने पुत्र, भाई ने भाई, मित्र ने मित्र का गला अपने हाथ से काट डाला, क्या इससे बढ़कर और कोई आपस की फूट का सुबूत हो सकता है ? पूरे अठारह दिनों की लड़ाई जिसमें बड़े २ घोर और सूरमा मारे गये क्या इससे ज़्यादा और कोई बात भारत की शोभा मिटाने का कारण हो सकती है ? यदि हो सकती है, तो उसका कुछ पता निशान बता ! बता !! ओ घातकी पापन चाण्डालनी बता !!! दुर्योधन और युधिष्ठिर कौन थे ? एक दादा के दो पोते फिर उनमें युद्ध का कारण, यही संसारके झूठे राज-पाट का लोभ, धन दौलत का लालच, अगर कपटी अभिमानी और दुराचारी दुर्योधन श्रीकृष्ण महाराज के उपदेशानुसार दया और धर्म का पालन करता तो क्यों राज-पाट के साथ अपने प्राण गंवाता ? और किसलिये भारत में नाम पर हमेशा के वास्ते पाप और अत्याचार का न मिटनेवाला टीका लगता ? किस प्रकार हज़ारों घर उजड़ते, बस्तियां जंगल बन जातीं और किस कारण लाखों अबलाएं विधवा हो जातीं ?
साथ अपराधी के, निर्दोषों को मारा किस लिए।
मौत के द्वारे हज़ारों को उतारा किस लिए ॥
कट गये लाखों के सर दरिया-ए-लहू का वह गया।
मिट गये वो तो मगर करनी का जरूरा रह गया ॥
दान का फल।
हिंसा-जा जा, अपना ये उपदेश बुज़दिलों और कायरों को सुना, मेरी भक्ति और सेवा करने वाले उपदेश सुनना तो कैसा? तुझे अपने पास खड़ा तक न होने देंगे। वह जिस प्रकार आज तक मेरी आज्ञानुसार देवनाओं को प्रसन्न करने के लिए पशुओं और मनुष्यों का लहू बहाते रहे हैं। इसी प्रकार आहन्दा भी उनका रक्त बहाते रहेंगे तू कितना ही चीखे चिल्लाए कितना ही विल्विलाए और शोर मचाए, किन्तु यह मनोहर शुभ कार्य बन्द नहीं हो सका।
सुनी है अब तक न अब सुनेंगे किसी की बातें मेरे पुजारी।
है काम उनका हरएक निराला है बात उनकी हरएकन्यारी।।
उन्हें प्यारा है भ्रम जिनना नहीं है यह जिन्दगी प्यारी।
बुँदेंगी लहू की धारा बुँदेंगी रहेगा यह सैल जारी।।
भुकाएंगे क्या दया के छाँटों से इस लगी को बुझाने वाले।
कि हो गये बे निशान लाखों निशान इसका मिटाने वाले।।
अहिंसा-ओ हो! इतना घमण्ड! इतना अभिमान! याद रख घमंडी और अभिमानी मनुष्यों का अन्त में ऐसा भयानक परिणाम होता है जिसको देखकर शरीर के अन्दर छुपा हुआ मनुष्य का हृदय भी कांप उठता है। घमंडी रावण का क्या हाल हुआ, अभिमानी कंस की क्या दुर्दशा हुई? इसे दस मील मनुष्य ही नहीं बल्कि सारा संसार जानता है। जब ऐसे २ बलवान राजा जिनके कि भय से बड़े २
[ खती चन्दूमवाला।
वीर और सूरमा थर्राते थे कुलों की तरह मारे गये और उनके वंश का पृथ्वी से इस तरह खोज मिटा दिया गया कि आज के दिन कोई उनको याद करके रोने वाला नहीं, तब तू क्या और तेरा बल क्या।
हिंसा-क्या कहा मेरा बल?
अहिंसा-हां! हां!! तेरा बल?
हिंसा-अभी तूने मेरा बल देखा ही कहां है जिस समय तू मेरा बल देख लेगी, उसी समय केवल यहीं नहीं कि आश्चर्य से तेरी आंखें पथरा जाएं बल्कि मृत्यु के भय से तेरा हृदय और शरीर दोनों कांप जाएंगे। यह मेरा बल नहीं तो और क्या है? जिससे युद्ध करने के लिए बड़े २ देवलोकों ने इस संसार में जन्म लिया किन्तु मेरे बल पर विजय न पा सके।
अहिंसा-ये बात है! अच्छा तो न अब मालूम हो गया कि तेरा हो खंडन करने और अभिमान का मर्दन करने के लिए भगवान महावीर स्वामी ने कुण्डलपुर के महाराजा सिद्धार्थ की पटरानी त्रिशला देवी के गर्भ से जन्म लिया है उनके एक ही धर्म उपदेश के प्रभाव से संसार में दया का तेज फैल जाएगा। और तमाम मनुष्य अहिंसा धर्म का व्रत धारण करने लगेंगे इस कारण और थोड़े दिनों तक यह पाप और अत्याचार करले।
दान का फल।
भगवान के उपदेश से पापों की जड़ कट जायगी।
पाखण्डियों की आवक संसार में घट जायगी।।
शक्ति दया की देख कर छाती तेरी फट जायगी।
यह जुल्मकी काली घटा इक आनमें हट जायगी।।
यह धर्म है ये है दया सब को नज़र आ जायगा।
जो सह रहा है आज दुःख कल शांति वह पायगा।।
हिंसा-मैं! अगर मैं हूं!! तो कभी ऐसा न होने दूंगी।
(हिंसा का जाना)
अहिंसा-तू क्या? अगर तेरे तमाम चेले यदि मिलकर अपना जोर लगाएं, तब भी ये होनी होकर ही रहेगी।
(अहिंसा का जाना)
अंक १ दृश्य २
राजा दधिवाहन का बाग़।
राजकुमारी चन्दनबाला अपनी दो सहेलियों चम्पा और दुर्गावती के साथ सैर कर रही है।
गाना।
अपने मुखड़े का चमत्कार दिखाओ भगवन् ॥
मूर्छित देखने वालों को बनाओ भगवन् ॥
सब पे हो जाय अहिंसा की चढ़ाई परगट ॥
जग में जिन धर्म का सम्मान बढ़ाओ भगवन् ॥
फिर न इच्छा हो किसी और के दर्शनकी इन्हें।
यह दृश्य तुम मेरी आँखों को दिखाओ भगवन् ॥
मित्र हो जाय वोह सब, हैं जो लहू के प्यासे।
मंत्र हमको कोई इस ढंगका सिखाओ भगवन् ॥
दान दो अपनी दया का कि दयालु तुम हो।
“नाज़” को भी कोई उपदेश सुनाओ भगवन् ॥
चम्पा-राजकुमारी जी! मैं कई दिनों से देख रही हूँ कि आप का मन किन्हीं गहरी चिन्ता में फँसा हुआ है, यह चाँद सा मुखड़ा जो हर समय फूलों की तरह हँसता हुआ रहता था, उदास और कुम्हलाया हुआ दिखाई देता है। आख़िर इन बातों का कोई न कोई कारण?
दान का फल !
चन्दनबाला-प्यारी सखियो! मैं आज आठ दस रातों से बराबर नींद में डरावने और भयानक स्वप्न देख रही हूँ। जिसकी वजह से मेरा सुख, सन्तोष, चैन सब जाता रहा है। दिनका हँसना बोलना उड़ गया, रात को नींद जाती नहीं, हर समय इसी चिन्ता में रहती हूँ कि मेरे और मेरे माता-पिता के भाग्य में क्या लिखा है और अन्त में हमारी क्या दशा होने वाली है?
दुर्गा-आप भय न करें सब अच्छा ही होगा।
चम्पा-वाह, राजकुमारी जी आप इतनी चिड़चिड़ी दानवती होकर स्वप्न में देखी हुई बातों की चिन्ता करती हो।
चन्दनबाला-चिन्ता की बात नहीं, वह स्वप्न ऐसा ही भयानक है कि मेरी जगह यदि पुरुष भी होता तो उसका यही हाल होता। मैं सत्य कहती हूँ, जिस समय मुझे उन स्वप्नोंका ध्यान आता है, कलेजा काँपने लगता है और संसार में चारों ओर मुझे अन्धकार ही अन्धकार दिखाई देता है।
दुर्गा-आख़िर वह कैसे स्वप्न हैं; ज़रा हम भी तो सुनें।
चम्पा-हाँ, हाँ, सुनाइये और अवश्य सुनाइये।
चन्दनबाला-मेरी अच्छी सहेलियो तुम उसे न सुनो!
दुर्गा-कारण?
चन्दनबाला-कारण येही, कि तुम दोनों मुझ से जितना प्रेम करती हो वह मैं अच्छी तरह जानती हूँ। इस लिये जिन
सती चन्दनबाला।
स्वप्नों को देख कर मेरी यह दशा हो रही है उनको सुन कर तुम मुझ से भी अधिक दुःखी हो जाओगी, और इस बात को मैं धर्म के अनुसार अच्छा नहीं समझती कि दूसरों को भी बिना कारण अपना सा दुःखी बनाऊँ।
चम्पा-अच्छे मनुष्य दूसरों को भी अच्छा समझते हैं। यह आप की कृपा और मन की बड़ाई है जो हम दासियों का इतना मान बढ़ाती है। परन्तु राजकुमारी जी हम आपकी दासियाँ हैं हमारे जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य ये है कि जहाँ तक बन पड़े आपका दुःख दर्द मिटाने का उपाय करें, इस प्रकार हम आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करती हैं कि जब आप अपने सुखों में हमको बराबर का शरीक समझती हैं तो दुःखों में भी हमें अपना शरीक बनाइये।
किया है जैन जब हमने, तो दुःख भी हम उठायेंगे।
न होगा और कुछ हमको, तो जीवन ही गँवायेंगे ॥
पला है आपके भोजन के, टुकड़ों से बदन अपना।
यह सबकुछ आपका है, न तन अपना न मन अपना ॥
चन्दनबाला-अच्छा, नहीं मानती हो तो सुनो, कभी देखती हूँ कि जङ्गल की तरफ़ से एक बहुत बड़ा अजगर आया और मुझे निगल गया, कभी देखती हूँ कि राजमहलों के चारों तरफ़ आग लगी हुई है, कभी देखती हूँ कि लहू का सागर बह रहा है, और मेरे माता पिता उसमें डूब रहे हैं। वह हरचन्द अपने बचाव का यत्न करते हैं किन्तु उस समय
[ १५
कोई मनुष्य उनकी सहायता को नहीं पहुँचता। प्यारी सखियो ! जब कोई मनुष्य और फिर एक निर्बल अबला स्त्री हर रात ऐसे ही डरावने स्वप्न देखे तो तुमही न्याय करो कि उसके मन में शान्ति और सुख उत्पन्न होंगे, या डर और भय ?
चम्पा-आपका यह कहना ठीक है, परन्तु राजकुमारी जी दासी इन स्वप्नों का कारण समझ गई और अच्छी तरह समझ गई।
दुर्गा-बहन चम्पा ! तुम क्या कह रही हो ?
चम्पा-मैं जो कुछ कह रही हूँ, ठीक कह रही हूँ।
चन्दनवाला-क्या मेरे इन स्वप्नों का कोई ख़ास कारण हूँ ?
चम्पा-है ! और अवश्य है !
चन्दनवाला-फिर इसका इलाज ?
चम्पा-बहुत ही सहल।
चन्दनवाला-मेरी अच्छी चम्पा मुझे यह इलाज बतादे।
चम्पा-घबड़ाइये नहीं मैं इन स्वप्नों का कारण और इलाज दोनों बातें बताऊँगी किन्तु पहले आप इस बात का वचन दें कि मेरी बात सुन कर क्रोध और गुस्सा तो नहीं करेंगी।
दुर्गा-आश्चर्य बहुत और बड़ा आश्चर्य भला संसार में कौन मनुष्य ऐसा होगा जो अपने लाभ की बात सुन कर प्रसन्न होने के बदले उल्टा क्रोधित होगा।
चम्पा-अरी युवती क्या तूने नहीं सुना कि सत्य बात सब को कड़वी मालूम होती है।
[ १६
सती चन्दनवाला।
दुर्गा-आखिर वह ऐसी कौन सी बात है ?
चम्पा-वह बात ऐसी है कि एक हमारी राजकुमारी जी क्या जिससे भी कहोगे उसे बुरा मालूम होगा परन्तु थोड़ी देर के लिए और वह भी हमें तुम्हें दिखाने के लिए किन्तु इस बात को सुनकर मन में कितना सुख और आनन्द प्राप्त होता है इसका हाल वही जान सकता है।
चन्दनवाला-बस बस मैं समझ गई !
चम्पा-आप क्या समझ गई ?
चन्दनवाला-यही कि तुम दोनों को मेरी बातों का विश्वास नहीं हुआ इस कारण मेरा ठट्ठा उड़ाना चाहती हो ?
चम्पा-( हाथ जोड़ कर ) नहीं राजकुमारी जी ईश्वर की सौगन्ध यह बात नहीं मैं ठट्ठा नहीं कर रही किन्तु जो कुछ भी इस समय कह रही हूँ वह सत्य कह रही हूँ। बड़े बूढ़ों की कहावत है कि मनुष्य दिन के समय जैसी भली या बुरी चिन्ताओं में फंसा रहता है रात के समय नींद की हालत में उसे वही बातें स्वप्न में दिखाई देती हैं। दूसरा कारण यह भी होता है कि जब मनुष्य अकेला होता है तो उस के मन में तरह तरह की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं वही भावनाएँ उसे स्वप्न में दिखाई देती हैं।
चन्दनवाला-यदि यह बातें सत्य मान भी ली जाएँ तो भी मुझ से ऐसी बातों का वास्त ?
चम्पा-शास्ता, यही कि आप को लिखने पढ़ने का बहुत शौक है,
[ १७
दिन भर आप पुस्तकों ही पढ़ती रहती हैं, उन पुस्तकों में अनेक प्रकार की बातें होती हैं ! कहीं आप ने किसी युद्ध या अग्नि का हाल पढ़ा होगा, बस वही बात आप के मस्तक में समा गई। जो स्वप्न में दिखाई दीं।
चन्दनवाला-फिर इसका उपाय ?
चम्पा-मैं बताऊँ ?
चन्दनवाला-हाँ हाँ तुम बताओ !
चम्पा-इधर देखिये, ये भौंरा जो इस कमल के फूल पर मंडला रहा है इसका कारण जानती हो ?
चन्दनवाला-नहीं,
चम्पा-यह इस पर मोहित हो गया है !
चन्दनवाला-फिर ?
चम्पा-फिर यही कि अब तक कोई भौंरा (राज कुमारी के कपोलों की तरफ संकेत करके) इन फूलों पर मोहित नहीं होता, उस समय तक आप को ऐसे ही डरावने और भयानक स्वप्न दिखाई देंगे।
चन्दनवाला-( चिढ़ कर ) मुझे ऐसी बातें अच्छी नहीं मालूम होतीं मैं तो पहले ही कह रही थी तुम दोनों मेरी बातों को झूठ समझ कर मेरा ठट्ठा उड़ाना चाहती हो।
दुर्गा-राज कुमारी जी पद्मात्मा की सौगन्ध, जो मुझे ज़रा भी यह बात मालूम हो, सारी शरारत इन्हीं की है।
[ २० ]
[ सती चन्दनबाला ।
चम्पा-मैं तो पहले ही कहती थी कि सभी बात सब को बुरी
मालूम होती हैं!
दुर्गा-अरी वाहरी वातुर, बड़ी सच्ची बात कही।
चम्पा-क्यों इस में झूठ ही क्या है? क्या राजकुमारी जी की
अवस्था अठारह वर्ष की नहीं हो गई।
दुर्गा-हो गई और अवश्य हो गई।
चम्पा-जब इसी अवस्था में विवाह न हुआ तो क्या बुढ़ापे में
होगा।
चन्दनवाला-तुमने फिर वही निकम्मी बातें शुरू कीं।
चम्पा-जी हां! यह ऐसी ही निकम्मी बातें हैं जिनको सुनकर और
तो क्या कहूं किन्तु आपका मन कमल के फूल के समान
खिल उठा होगा। मैं आज ही भोजन के समय महारानी जी
से कहूंगी कि शीघ्र ही हमारी राजकुमारी जो का विवाह
होना चाहिए, कारण यही कि वह रात के समय निद्रावस्था
में बुरे २ स्वप्न देखकर डरती हैं।
दुर्गा-क्योंरी, ढेला, इन स्वप्नों का विवाह से क्या सम्बन्ध?
चम्पा-बहुत बड़ा सम्बन्ध, धर्म और वैद्यक की बड़ी २ पुस्तकों
में स्पष्ट लिखा है कि इस उम्र में पहुंच कर पुरुष हो या स्त्री
दोनों के रक्त में एक ख़ास तरह का उफान पैदा होता है;
जैसे २ घबराहट होती है मन में अनेक प्रकार के विचार
उत्पन्न होते हैं! रातों को सोते सोते चौंक पड़ते हैं, जब ऐसी
दान का फल ]
[ १८
बातें मालूम हों तो माता पिता का कर्तव्य है कि वह उनका
विवाह करदें, विवाह से यह फायदा होता है कि एक का
दूसरे की बातों से दिल बहल जाता है लहू का वह उफान
कम हो जाता है। मन और मस्तक दोनों को शान्ति और
सुख मिल जाता है।
चन्दनवाला-( और ज़्यादा बिगड़ कर ) देलोजो में फिर कहे
देती हूं कि यदि अब ऐसी बातें करोगी तो मैं यहां से
चली जाऊंगी।
चम्पा-अजी वाह! इसमें बिगड़ने की क्या बात है, क्या आप
कभी विवाह न करेंगी? क्या विवाह कोई गाली है जिससे
आप इतना बिगड़ती हैं।
चन्दनवाला-नहीं भाती मुझे यह छेड़खानी, क्यों सताती हो।
तुम्हारा क्या लिया है मैंने, क्यों मुझको जलाती हो ॥
चम्पा-खुशी से खिल उठा मन, आगई गालों पै भी लाली।
अजी रहने भी दो ये व्यर्थ, ‘क्यों बातें’ बनाती हो ॥
दुर्गा-वह होंठों पर हंसी आई, वह आंखें झुक गई देखा?
जो मन में है तुम्हारे, दासियों से भी छुपाती हो ॥
चन्दनवाला-चली जाऊंगी मैं अबकी, ओ छेड़ोगी मुझे सखियो!
च० और दु०-परंतु यह तो कहती जाओ क्या शर्मा के जाती हो ॥
चन्दनवाला-नहीं भाती मुझे यह छेड़खानी …॥
( सब जाती हैं )
[ १६ ]
[ सती चन्दनबालाः
मनोरंजन
अङ्क १
दृश्य ४
महाशय रतनलाल का मकान
( महाशय रतनलाल की बड़चड़ी और बदमिज़ाज
स्त्री कमलावरती का प्रवेश )
गाना
कमलावती-अनेक दुःख हैं इन्हें किस तरह उठाऊं मैं।
कहां तक अपनी जवानी यूंही गंवाऊं मैं ॥
जो दिल पै बीत रही है वह कोई क्या जानें।
कहानी दुःख भरी अपनी किसे सुनाऊं मैं ॥
जला दिया मेरा तन मन विरह की अग्नि ने।
कोई बतावे तो क्यों कर इसे बुझाऊं मैं ॥
दया की जिस से थी आशा वह निर्दई निकला।
तड़प तड़प के यह जीवन न क्यों बिताऊं मैं ॥
नहीं है इसके सिवा अब कोई यतन ये “लाजो”।
कि अपने साथ मैं औरों को भी रुलाऊं मैं ॥
हाय! हाय! क्या करूं और क्या न करूं माता पिता ने
न जाने क्या समझ कर इस निठुर के पल्ले मुझे बांध दिया
इसकी तो वही कहावत है “काम का न काज का सेर भर
अनाज का” तड़का होते ही बगल में पुस्तक दवाई और
दान का फल ।
[ २०
निकल खड़ा हुआ, घर में आते ही “भोजन लाओ”
“भोजन लाओ” की बीन पुकार, फिर फुलका कच्चा रह
गया, दालमें पानी बहुत है, सागमें नमक ज्यादा पड़ गया,
एक स्वांस में पचास बातें, जब देखो गाली गलौच डांट
डपट, घुड़की भिडकी, मांगों सीधे मुंह बात करना ही नहीं
जानता में धर्म और शास्त्र के अनुसार ब्याही हुई स्त्री हूं
या इसके बाप दादा की दासी, जो प्रति दिन इसी प्रकार
की बातें सुना करूं बस बहुत हो चुकी आज से मैंने भी
यह ठान ली है कि वह शुभा एक कहेगा तो में दस
सुनाऊंगी, वह मारने को लकड़ी उठाएगा तो में झाडू
संभालूंगी यदि वह एक पंडित का पुत्र है तो में भी एक
पंडितानी की पुत्री हूं’ वह अपने नाम का महाशय है तो में
भी अपने नाम की महाशणी हूं’
महाशय रतनलालजी वहां में पोथी पत्रा दखाए एक हाथ
से माला जपते और दूसरे हाथ को उंगलियों
से कुछ हिसाब लगाते हुए आते हैं
कमलावती छिपकर देखती है.
म० रतनलाल-कुम्भ-वृश्चिक-कर्क-कन्या-तुला-मिथुन-सिंह
वृष-मकर-मीन-मेष-धन, ओहो ! अन्त में धन हां, हां, धन
चाहिए में और चाहे मेरा भाग अन्त में धन !
कमलावती-(एक तरफ होकर) ये आज इसे क्या हो गया है जो
बहकी बहकी बात कर रहा है।
[ २१
सती चन्दनबाला ।
म० रतनलाल-विद्वानों की लिखी हुई पुस्तकें झूठी हो सकती हैं
धर्म के बताये हुए नियम और देवताओं के बनाये हुए शास्त्र
ये सब झूठे हो सकते हैं परन्तु नहीं हो सकता तो, महाशय
रतनलाल जी का लगाया हुआ हिसाब कदापि झूठा नहीं
हो सकता ।
कमलावती-(आड़ में से) लो और सुनो, कैसे बेअर्थ शब्द
मुंह से निकाल रहा है ।
म० रतनलाल-आज तड़के ही तड़के में घर से निकला तो
पहले मेरी सीधी आंख फड़की और साथ ही खींचा स्वर
भी चलने लगा थोड़ी दूर गया था कि सामने से भट्टी आता
हुआ दिखाई दिया परन्तु उसके पीछे पीछे एक नक्टा पुरुष
भी आ रहा था और इस समय जैसे ही मैंने घर के द्वारे
में पांव रक्खा कि हाथ की हथेली और साथ ही सिर की
चंविया खुजलाई समझ गया, बिलकुल समझ गया और
अच्छी तरह समझ गया कि आज कहीं न कहींसे अवश्य धन
मिलेगा किन्तु जरा दुःख उठाने के बाद, ओहो ! चिंता करने
की कुछ जरूरत नहीं, दुःख उठाना पड़े या कष्ट परन्तु धन
मिले धन “भज कल्लदारम् भज कल्लदारम्”
कमलावती-(आड़ में से) धन तो मिलेगा जब मिलेगा किन्तु
थोड़ी देर में खोपड़ी पर जूते अवश्य पड़ने वाले हैं ।
म० रतनलाल-हिन्दू जाति में सब से उत्तम और बड़ी पदवी
किस की ? ब्राह्मण देवता की ? और ब्राह्मण भी कौन ब्राह्मण
[ २२
दान का फल ।
कुलीन ब्राह्मण, आहा ! परमात्मा ने ब्राह्मण का
भाग भी कैसा विचित्र बनाया है कि बड़े २ क्षत्री शूरवीर
और महा पुरुष पुण्य में अपना शीश नवाते हैं ।
ब्राह्मण देवता को न कमाने की चिंता और न चाकरी की
आवश्यकता, घर बैठे दोनों समय मोहन भोग के ग्रास
निगल लीजिये और दान दक्षिणा से घर के सारे भांड़ वर्तन
भर लीजिये इस संसारमें जन्म लेते समय बहेतरा ही परमात्मा
ने जोर लगाया सारे देवताओं और देवियों ने समझाया
कि में किसी वैश्य अथवा शूद्र के घर जन्म लेऊं परन्तु में
भी अपनी हठ का एक ही था, किसी की बात न सुनी
और ब्राह्मण देवता के घर में जन्म लेकर ही रहा । क्या में
ऐसा मूर्ख था जो किसी दूसरी जाति में जन्म लेकर समस्त
जीवन दुःख उठाता और कष्ट भोगता । प्रिय बन्धुओ ! तुम्हें
प्रार्थना करो कि जो आनन्द और सुख एक ब्राह्मण के भाग्य में
है वह क्या किसी दूसरे मनुष्य को प्राप्त हो सकता है ?
कदापि नहीं ।
द्रव्यं कमलं दलिनं सरोजं सरसो रहम् ।
गणिका ललिका दगल रूपा जीवास्य सलिलम् ॥
“भज कल्लदारम् भज कल्लदारम्”
(कमलावती *आड़ में से निकलकर पीठ पर एक दौहड़द
जमाती है)
सती चन्दनबाला
कमलावती-गुण भज कल्दाराम के पुत्र यह तो बता तड़के का गया, गया, अब आया है इस समय तक तू कहाँ था और क्या कमाकर लाया और यह पगलू पगलू का कौन सा राग अलाप रहा है ?
म० रतनलाल-अरी ओ पगलू की बच्ची क्या अपने पति का इसी प्रकार स्वागत करते हैं यह तेरा दोहत्थड़ था अथवा भीम की गदा, जिसने मेरी कमर की एक एक हड्डी हिला दी वह तो मैं ही था जो इस चोट को सहन कर गया, कोई और होता तो अब तक कभी का परलोक सिधार गया होता।
कमलावती-वाह रे मर्दूप तेरा नखरा एक स्त्री के कमर पर हाथ रख देने से हड्डी २ हिल गई यदि मैं एकआध लट्ठ जमा देती तो कलचूर ही बन जाता।
म० रतनलाल-क्या कहा ? ‘लट्ठ जमा देती’ बाप रे, यह स्त्री है या राक्षसी यह तो बता तू एक पंडित की पुत्री और एक पंडित की स्त्री होकर क्षत्राणी कब से बन गयी ?
कमलावती-अब से तूने घर में रहने और कमाने धमाने को तिलान्जली देदी।
म० रतनलाल-मेरे चाहर फिरने और कमाने न कमाने से तुझे मतलब ?
कमलावती-मतलब क्यों नहीं, क्या मैं तेरी पत्नी और इस घर की मालकिन नहीं हूँ ?
दान का फल
म० रतनलाल-अवश्य है।
कमलावती-यदि तू इसी प्रकार फिरना रहेगा और कुछ कमाई करके न लाएगा तो खाने पहनने को कहाँ से आवेगा।
म० रतनलाल-पण्डित को इसकी नो चिन्ता ही न करनी चाहिये ईश्वर की कृपा से ब्राह्मण देवता कभी भूखे और नंगे नहीं रह सकते।
कमलावती-कारण ?
म० रतनलाल-कारण पूछ कर क्या लेगी ? तुझे आम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से ? बना आज क्या भोजन बनाया है जल्दी ला मुझे बड़ी ही भूख लगी है “भज कल्दाराम भज कल्दाराम”
कमलावती-मैंने तो आज कुछ भी नहीं बनाया।
म० रतनलाल-क्यों नहीं बनाया ?
कमलावती-धनानी कहाँ से घर में एक पैसा तक तो था ही नहीं।
म० रतनलाल-ओह ! परमात्मा मेरा अन्धेर ! (कमलावती से) कल ही तो मैंने तुझे पांच रुपये लाकर दिये थे क्या वो समस्त रुपये तूने खर्च करडाले। भजकलदाराम भजकलदाराम
कमलावती-और नहीं तो क्या मैंने तजूरी में बन्द करके अगले जन्म के लिये रख छोड़े हैं कल रात्री के समय हलवा पूरी जो खाई थी।
सती चन्दनबाला
म० रतनलाल-तो क्या पांचों रुपये इसमें उड़ गये ?
कमलावती-नहीं एक रुपया उड़ा था।
म० रतनलाल-और बाकी चार रुपये कहां गये ?
कमलावती-अरे कहां ! मैंने आज उन रुपयों की अपने लिये एक साड़ी मोल लेली।
म० रतनलाल-( मुंह बना कर ) मैंने साड़ी मोल लेली ! अच्छा यह बता, अब खायेंगे कहां से ?
कमलावती-ब्राह्मण देवता खाने पहनने की चिन्ता नहीं करते।
म० रतनलाल-क्यों नहीं करते क्या वो जीवन नहीं रखते।
कमलावती-मैं क्या जानूं तुम्हें तो अभी कह रहे थे कि ब्राह्मण देवता को इसकी चिन्ता नहीं होती।
म० रतनलाल-परन्तु इसका यह अर्थ कहां से निकला कि पण्डित को भोजन की इच्छा ही नहीं होगी।
कमलावती-फिर क्या अर्थ हुआ ?
म० रतनलाल-‘पगली’ इसका यह अर्थ है कि पण्डित को ईश्वर की दया और उसके उपकार पर विश्वास रखते हुए संसार की चिन्ताओं को अपने पास भी न फटकने देना चाहिये। “भज कल्दाराम भज कल्दाराम”
कमलावती-आज तुम भी ऐसा ही करके देखो।
म० रतनलाल-( एक तरफ होकर ) हाय हाय यह तो आज
[ २६
भूका मार मार कर मेरे प्राण लेना चाहती है (कमलावती की
ओर देख कर बड़े ही प्रेम से) प्रिये बस दिल्लगी हो चुकी
जल्दी से भोजन लाओ और किसी प्रकार की चिन्ता मत
करो देखो तो सही आज तुम्हारे घर में “हुन” की वर्षा
होगी, वर्षा।
कमलावती–यह तो बड़ी ही अच्छी बात है 'देखो प्राणनाथ जिस
समय “हुन” की वर्षा हो तो वो समस्त “हुन” तुम अपने पास
रख लेना और उसमें से एक रुपये की पूरी कौधौड़ी मोल ले
आना हम तुम दोनों बड़े आनन्द के साथ पेट भर कर
खायेंगे, और रात के लिये भी दो चार पूरियाँ रख छोड़ेंगे
क्यों ठीक है ना? “भज कलदारम् भज कलदारम्”
म० रतनलाल–लो और सुनो रांड की बातें, पत्नी होकर पति
का मखौल करती और मेरी बातों को असत् जानती है मैं
सत्य कहता हूँ कि आज का शगुन बड़ा ही उत्तम और
आज का दिन बड़ा ही भगवान है और साथ ही मेरे लगाये
हुए हिसाब से भी यही प्रगट होता है कि आज कहीं न कहीं
से अवश्य ही हमें बड़ा लाभ होगा।
कमलावती–निश्चय तुम ऐसे ही विद्वान और ज्ञानी हो ना?
म० रतनलाल–तो क्या तुझे मेरे विद्वान और ज्ञानी होने में भी कुछ
सन्देह है।
कमलावती–सन्देह कैसा? मुझे तो पूरा पूरा विश्वास है।
[ २७
[ सती चन्दनबाला।
म० रतनलाल–किस बात का?
कमलावती–इस बात का कि तुम पक्के मूर्ख और अज्ञानी हो।
म० रतनलाल–एक पण्डित का ऐसा अपमान स्त्री के हाथों पुरुष
का ऐसा अनादर क्या करूँ कोई ब्राह्मण होता तो अभी
तुझे शास्त्रार्थ करके बता देता कि मैं कैसा विद्वान हूँ।
कमलावती–विद्वान होते तो पल्ल्म् वल्ल्म् और भजकलदारम्
के हेतुके राग क्यों अलापते!
म० रतनलाल–क्या ये बेतुके राग हैं?
कमलावती–और नहीं तो क्या वेद के मन्त्र अथवा गीता के
श्लोक हैं।
म० रतनलाल–ये ऐसे मन्त्र हैं कि जो पुरुष और स्त्री इन्हें सिद्ध
करले वह जीवन के अन्त तक कदापि किसी प्रकार का
दुःख न भोगे 'यह इसी मन्त्र का कारण है कि म० रतनलाल
जो मेहनत मजदूरी और किसी की चाकरी किये बिना दोनों
समय मोहन भोग उड़ाते हैं। “भज कलदारम् भज कलदारम्”
कमलावती–ईश्वर जिमानों का भला करे, चाहे एक ब्राह्मण का
पुत्र और घर का पुराना पुरोहित समझ कर दान दक्षिणा
देते रहते हैं यदि दो दिन खाने को न मिले तो आधे दाल का
भाव मालूम हो जाय और मन्त्र वन्त्र सब रखा रहजाय।
(सेठ मूलचन्दजी का नौकर ‘गोपाला’ द्वारे पर आकर पुकारता है)
गोपाला–महाशय रतनलाल जी घर के भीतर विराजमान हों तो
[ २८
उनके पवित्र चरणों में सेठ मूलचन्द जी के विद्वान और
ज्ञानी नौकर शूरवीर गोपाला का प्रणाम पहुँचे और वोह न
हों तो देवी पण्डितानी जी को बहुत २ नमस्कार।
म० रतनलाल–कौन! गोपालासिंह।
गोपाला–जी गोपालासिंह नहीं ‘गोपाला’
म० रतनलाल–अच्छा अच्छा, शूरवीर गोपाला भीतर आजाओ।
गोपाला–जो आज्ञा।
म० रतनलाल–(कमलावती से) अब देख लेना कि मेरे मानने
वाले मेरा कितना आदर और सम्मान करते हैं।
गोपाला–(अन्दर आकर) महाशय महाराज, सेठ जी ने हाथ
जोड़ कर प्रणाम कहा है और प्रार्थना की है कि यदि आपको
तकलीफ न हो तो थोड़ी देर के लिये पधारिये क्यों कि एक
कार्य में आपसे सलाह करनी है।
म० रतनलाल–क्या कार्य है तुम्हें कुछ मालूम है?
गोपाला–इतना जानता हूँ कि सिडानी जी की मृत्यु से सेठ
जी बहुत उदास हैं और किसी दूसरे विवाह की चिन्ता
में हैं।
म० रतनलाल–अच्छा तुम चलो मैं अभी भोजन करके आता हूँ
भज कलदारम् भज कलदारम्।
गोपाला–जो आज्ञा
(जाता है)
म० रतनलाल–(कमलावती से) क्यों देखा मेरे मन्त्रों का बल
सती चन्दनवाला
२६
मैं तो पहिले ही कहता था कि आज का दिन बड़ा भागवान् है अब क्या है पौवारा हैं एक ही दाव में हज़ार बारह सौ रुपये महाशय रतनलाल जी के हाथ में होंगे, ले अब तो भोजन करादे, घबरा नहीं, आज शाम तक रुपये ही रुपये. हो जावेंगे । भज कलदारम् भज कलदारम् ।
कमलावती-सारे रुपये मुझे लाकर देना।
म० रतनलाल-हां हां सब तुझी को दूंगा ।
(जाना)
[ सती चन्दनवाला ।
हिंसा-क्या कहा मेरा बल ?
अहिंसा-हां ! हां !! तेरा बल ?
हिंसा-अभी तूने मेरा बल देखा ही कहाँ हैं जिस समय तू मेरा बल देख लेगी, उसी समय केवल यही नहीं कि अश्वर्य से तेरी आंखें पथरा जाएं बल्कि मृत्यु के भय से तेरा हृदय और शरीर दोनों कांप जाएँगे । यह मेरा बल नहीं तो और क्या हैं? जिससे युद्ध करने के लिए बड़े २ देवतोओं ने इस संसार में जन्म लिया किन्तु मेरे बल पर विजय न पा सके ।
दान का फल । ]
भगवान के उपदेश से पापों की जड़ कट जायगी । पाखण्डियों की आवरू संसार में घट जायगी ॥ शक्ति दया की देख कर छाती तेरी फट जायगी । यह जुल्मकी काली घटा इक आनमें हट जायगी ॥ यह धर्म है ये है दया सब को नज़र आ जायगा । जो सह रहा हैं आज दुःख कल शांति वह पायगा ॥ हिंसा-मैं ! अगर मैं हूँ !! तो कभी ऐसा न होने दूंगी (हिंसा का जाना)
अहिंसा-तू क्या ? अगर तेरे तमाम चेले चांटे मिलकर अपना’ जोरलगाऐ’, तब भी ये होनी होकर ही रहेगी। (अहिंसा का जाना)
[ सती चन्दनबाला ।
अङ्क १
दृश्य ३
राजा दधिबाहन का बाग़ ।
गाना ।
अपने मुखड़े का चमत्कार दिखाओ भगवन् ।
मूर्छित देखने वालों को बनाओ भगवन् ॥
सब पे हो जाय अहिंसा की बड़ाई परगट ॥
जग में जिन धर्म का सन्मान बढ़ोओ भगवन् ॥ फिर न इच्छा हो किसी और के दर्शनकी इन्हें । वह दृश्य तुम मेरी आंखोंको दिखाओ भगवन् ॥ मित्र हो जायं बोह सव, हैं जो लहू के प्यासे । मंत्र हमको कोई इस ढंगका सिखाओ भगवन् ॥ दान दो अपनी दया का कि दयालु तुम हो।
“नाज़” को भी कोई उपदेश सुनाओ भगवन् ॥
'दान का फल ! !
चन्दनवाला-प्यारो सखियो ! मैं आज आठ दस रातों से बराबर नींद में डरावने और भयानक स्वप्न देख रही हूं। जिसकी वजह से मेरा सुख, सन्तोष, चैन सब जाता रहा है। दिनका हँसना बोलना उड़ गया, रात की नींद जाती रही, हर समय इसी चिन्ता में रहती हूं कि मेरे और मेरे माता-पिता के भाग्य में क्या लिखा है और अन्त में हमारी क्या दशा होने वाली है ?
दुर्गा-आप भय न करें सब अच्छा ही होगा।
दुर्गा-आखिर वह कैसे स्वप्न हैं; जरा हम भी तो सुनें । चम्पा-हां, हां, सुनाइये और अवश्य सुनाइये ।
चन्दनवाला-कारण येही, कि तुम दोनों मुझ से जितना प्रेम करती हो वह मैं अच्छी तरह जानती हूं। इस लिये जिन [ सती चन्दनवाला ।
किया है चैन जब हमने, तो दुःख भी हम उठायेंगे । न होगा और कुछ हमसे, तो जीवन ही गँवायेंगे ॥ पला है आपके भोजन के, टुकड़ों से बदन अपना । यह सबकुछ आपही का है, न तन अपना न मन अपना ॥ चन्दनवाला-अच्छा, नहीं मानती हो तो सुनो, कभी देखती हूं कि जङ्गल की तरफ से एक बहुत बड़ा अजगर आया और मुझे निगल गया, कभी देखती हूं कि राजमहलों के चारों तरफ आग लगी हुई है, कभी देखती हूं कि लहू का सागर बह रहा है, और मेरे माता पिता उसमें डूब रहे हैं । वह हरचन्द अपने बचाव का यत्न करते हैं किन्तु उस समय दान का फल ।]
कोई मनुष्य उनकी सहायता को नहीं पहुंचता । प्यारी सखियो ! जब कोई मनुष्य और फिर एक निर्बल अबला स्त्री हर रात ऐसे ही डरावने स्वप्न देखे नां तुमही न्याय करो कि उसके मन में शान्ति और सुख उत्पन्न होंगे, या डर और भय ?
चम्पा-मैं जो कुछ कह रही हूं’ ठीक कह रही हूं’ । चन्दनकला-क्या मेरे इन स्वप्नों का कोई ख़ास कारण है ? चम्पा-है ! और अवश्य है !
चन्दनवाला-फिर इसका इलाज ।
चम्पा-बहुत ही सहल ।
चन्दनवाला-मेरी अच्छी चम्पा मुझे वह इलाज बतादे । चम्पा-घबराइये नहीं मैं इन स्वप्नों का कारण और इलाज दोनों बातें बतादूंगी किन्तु पहले आप इस बात का वचन दें कि मेरी बात सुन कर क्रोध और गुस्सा तो नहीं करेंगी। दुर्गा-आश्चर्य बहुत और बड़ा आश्चर्य भला संसार में कौन मनुष्य ऐसा होगा जो अपने लाभ की बात सुन कर प्रसन्न होने के बद्ले उल्टा क्रोधित होगा ।
१५ ।
[ सती चन्दनवाला ।
दुर्गा-आखिर वह ऐसी कौन सी बात है ?
चन्दनवाला-बस बसं मैं समझ गई !
चम्पा-आप क्या समझ गई ?
चन्दनवाला-यही कि तुम दोनों को मेरी बातों का विश्वास नहीं हुआ इस कारण मेरा ठठ्ठा उड़ाना चाहती हो ?
चन्दनबाला-यदि यह बातें सत्य मान भी ली जाएँ तो भी मुझ से ऐसी बातों का वास्ता ?
चम्पा-वास्ता, यही कि आप को लिखने पढ़ने का बहुत शौक़ हैं, दान का फल । ]
[.१६
चन्दनवाला-फिर इसका उपाय ?
चम्पा-मैं बताऊँ ?
चन्दनवाला-हाँ हाँ तुम बताओ !
चम्पा-इधर देखिये, ये भौंरा जो इस कमल के फूल पर मडला रहा है इसका कारण जानती हो ?
चन्दनवाला-नहीं,
चम्पा-यह इस पर मोहित हो गया है !
चन्दनवाला-फिर ?
भयानक स्वप्न दिखाई देंगे।
चन्दनवाला-(बिगड़ कर) मुझे ऐसी बातें अच्छी नहीं मालूम होतीं मैं तो पहले ही कह रही कि तुम दोनों मेरी बातों को झूठ समझ कर मेरा उट्टा उड़ाना चाहती हो।
दुर्गा-राज कुमारी जी परमात्मा की सौगन्ध, जो मुझे ज़रा भी यह बात मालूम हो, सारी शरारत इसी की है।
[ सती चन्दनबाला ।
चम्पा-मैं तो पहले ही कहती थी कि सच्ची बात सब को बुरी मालूम होती है!
दुर्गा-अरी बाहरी वातुर, बड़ी सच्ची बात कही।
चम्पा-क्यों इस में झूट ही क्या है? क्या राजकुमारी जी की अवस्था अट्ठारह वर्ष की नहीं हो गई।
दुर्गा-होगई और अवश्य होगई ।
दुर्गा-क्योंरी, छैला, इन स्वप्नों का विवाह से क्या सम्बन्ध ? चम्पा-बहुत बड़ा सम्बन्ध, धर्म और वैद्यक की बड़ी २ पुस्तकों में स्पष्ट लिखा है कि इस उम्र में पहुंच कर पुरुष हो या स्त्री दोनों के रक्त में एक ख़ास तरह का. उफान पैदा होता है, बैठे २ घबराहट होती है मन में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं! रातों को सोते सोते चौंक पड़ते हैं, जब ऐसीः दान का फल । ]
चन्दनवाला-( और ज़्यादा बिगड़ कर ) देखोजी में फिर कहे देती हूं कि यदि अब ऐसी बातें करोगी तो में यहां से चली जाऊंगी ।
चम्पा-अजी चाह ! इसमें बिगड़ने की क्या बात है, क्या आप कभी विवाह न करेंगी ? क्या विवाह कोई गाली है जिससे आप इतना चिड़ती हैं ।
गाना ।
चंदनवाला-नहीं भाती मुझे यह छेड़खानी, क्यों सताती हो । तुम्हारा क्या लिया है मैंने, क्यों मुझको जलाती हो ॥ चम्पा-खुशी से खिलउठा मन, आगई गालों पै भी लाली । अजी रहने भी दो वेअर्थ, क्यों’ बातें’ बनाती हो ॥ दुर्गा- वह होंटों पर हँसी आई, वह आंखें झुक गई’ देखा ? जो मन में है तुम्हारे, दासियों से भी छुपाती हो ॥ चंदनवाला-चलीजाऊँगी मैं अबकी, जो छेड़ोगी मुझे सखियो ! च० और दु०-परंतु यह तो कहती जाओ क्या शर्मा के जाती हो ॥ चन्दनवाला-नहीं भाती मुझे यह छेड़खानी … ५ ( सब जाती हैं )
मनोरंजन
अङ्क १
। सती चन्दनबालाः।
दृश्य ४
महाशय रतनलाल का मकान
( महाशय रतनलाल की चड़चड़ी और बदमिज़ाज स्त्री कमलावंती का प्रवेश )
गाना
कमलावती-अनेक दुःख हैं इन्हें किस तरह उठाऊँ मैं । कहां तक अपनी जवानी युंही गंवाऊँ मैं ॥ जो दिल पे बीत रही है वह कोई क्या जानें । कहानी दुःख भरी अपनी किसे सुनाऊँ मैं ॥ जला दिया मेरा तन मन विरह की अग्नि ने । कोई बताये तो क्यों कर इसे बुझाऊँ मैं ॥ दया की जिस से थी आशा वह निर्देई निकला । तड़प तड़प के यह जीवन न क्यों बिताऊँ मैं ॥ नहीं है इसके सिवा अब कोई यतन ऐ “नाज़”। कि अपने साथ मैं औरों को भी रुलाऊँ मैं ॥ हाय ! हाय ! क्या करू और क्या न करू माता पिता ने न जाने क्या समझ कर इस निसटू के पल्ले मुझे बांध दिया इसकी तो वही कहावत है “काम का न काज का सेर सर अनाज का” तड़का होते ही बग़ल में पुस्तक दबाई और (
दान का फल । ]
निकल खड़ा हुआ, घर में आते ही “भोजन लाओ”
“भोजन लाओ” की चीख पुकार, फिर फुलका कच्चा रह गया, दालमें पानी बहुत है, सागमें नमक ज़्यादा पड़ गया, एक स्वांस में पचासों बातें, जब देखो गाली गलौच डांट डपट, घुड़की झिड़की, मानों सीधे मुंह बात करना ही नहीं जानता में धर्म और शास्त्र के अनुसार व्याही हुई स्त्री हूं या इसके बाप दादा की दासी, जो प्रति दिन इसी प्रकार की बातें सुना करूं बस बहुत हो चुकी आज से मेने भी यह ठान ली है कि वह मुआ एक कहेगा तो मैं दस सुनाऊँगी, वह मारने को लकड़ी उठाएगा तो मैं झाड़ संभालूंगी यदि वह एक पंडित का पुत्र है तो मैं भी एक पंडितानी की पुत्री हूं वह अपने नाम का महाशय है तो में भी अपने नाम की महाशनो हूं’ ।
से कुछ हिसाब लगाते हुए आते हैं
कमलावती छिपकर देखती है।
म० रतनलाल-कुम्भ-वृष्विक-कर्क-कन्या-तुला-मिथुन-सिंह • वृष-मकर-मीन-मेख-धन, ओहो ! थन्त में धन हां, हां, धन बाहरे मैं और बाहरे मेरा भाग अन्त में धन ! कमलावती-(एक तरफ होकर) ये आज इसे क्या हो गया है जो वहकी बहकी बात कर रहा है।
[ सती चन्दनबाला ।
म० रतनलाल-आज तड़के ही तड़के जब मैं घर से निकला तो पहले मेरी सीधी आंख फड़की और साथ ही सीधा स्वर भी चलने लगा थोड़ी दूर गया था कि सामने से भङ्गी आता हुआ दिखाई दिया परन्तु उसके पीछे पीछे एक नकटा पुरुष भी आ रहा था और इस समय जैसे ही मैंने घर के द्वारे में पांव रक्खा कि हाथ की हथेली और साथ ही सिर की चॅदिया खुजलाई समझ गया, बिलकुल समझ गया और
अच्छी तरह समझ गया कि आज कहीं न कहींसे अवश्य धन मिलेगा किन्तु जरा दुःख उठाने के बाद, ओह ! चिंता करने की कुछ ज़रूरत नहीं, दुःख उठाना पड़े या कष्ट परन्तु धन मिले धन “भज कलदारम् भज कलदारम्”
और ब्राह्मण देवता के घर में जन्म लेकर ही रहा। क्या में ऐसा मूर्खथा जो किसी दूसरी जाति में जन्म लेकर समस्त • जीवन दुःख उठाता और कष्ट भोगता । प्रिय बन्धुओ ! तुम्हीं न्याय करो कि जो आनम्द और सुख एक ब्राह्माण के भाग्य में है क्या वह किसी दूसरे मनुष्य को प्राप्त हो सक्ता है ? कदापि नहीं ।
'द्वयं कमलं नलिनं सरोजं सरसी रुहम् ।
गणिका लंजिका पगलं रुपा जीवास्य संतिमम्॥
“भज कलदारम् भज कलदारम्”
(. कमलावती आड़ में से निकलकर पीठ पर एक दौहत्तड़ * जमाती हैं)
[ सती चन्दनबाला.
कमलावती-मुए भज कलदारम के पुत्र यह तो बता तड़के का गया, गया, अब आया हैं इस समय तक तू कहां था और क्या कमाकर लाया और यह पगलम् वगलम् का कौन सा राग अलाप रहा है ?
म० रतनलाल-अरी ओ पगलम् की बच्ची क्या अपने पति का इसी प्रकार स्वागत करते हैं यह तेरा दौहत्तड़ था अथवा भीभ की गदा, जिसने मेरी कमर की एक एक हड्डी. हिला दी वह तो में ही था जो इस चोट को सहन कर गया, कोई और होता तो अब तक कभी का परलोक सिधार गया होता। कमलावती-वाह रे मर्दुप तेरा नखरा एक स्त्री के कमर पर हाथ रख देने से हड्डी २ हिल गई यदि मैं एकआध लट्ठ जमा देती तो कचूमर ही बन जाता ।
म० रतनलाल-क्या कहा ? ‘लठ्ठ जमा देती’ बाप रे, यह स्त्री है या राक्षसी यह तो बता तू एक पंडित की पुत्री और एक पंडित की स्त्री होकर क्षत्राणी कब से वन गयी ? कमलावती-जब से तूने घर में रहने और कमाने, धमाने को तिलांजली देदी ।
कमलावती-मतलब क्यों नहीं, क्या मैं तेरी पत्नी और इस घर की मालकन नहीं हूँ’ ?
दान का फल । ]
म० रतनलाल-अवश्य है ।
कमलावती-यदि तू इसी प्रकार फिरता रहेगा और कुछ कमाई करके न लाएगा तो खाने पहनने को कहां से आवेगा । म० रतनलाल-पण्डित को इसकी नो चिन्ता ही न करनी चाहिये ईश्वर की कृपा से ब्राह्मण देवता कभी भूके और नंगे नही रह सक्ते ।
कमलावती-कारण ?.
कमलावती-मैंने तो आज कुछ भी नहीं बनाया ।
म० रतनलाल-क्यों नहीं बनाया?
कमलावती-श्नाती कहां से घर में एक पैसा तक तो था ही नहीं ।
म० रतनलाल-ओह ! परमात्मा ऐसा अन्धेर ! ’ कमलवतो से) कल ही तो मैंने तुझे पांच रुपये लाकर दिये थे क्या वो समस्त रुपये तूने खर्च करडाले । भजकलदारम् भजकलदारम् कमलावती-और नहीं तो क्या मैंने तजूरी में बन्द करके अगले जन्म के लिये रख छोड़े हैं कल रात्री के समय हलवा पूरी जो खाई थी।
२५. ]
[ सती चन्दनवाला ।.
म० रतनलाल-तो क्या पांचों रुपये इसमें उठ गये ? कमलावती-नहीं एक रुपया उट्टा था ।
म० रतनलाल-और बाक़ी चार रुपये कहां गये ?
म० रतनलाल-(मुंह बना कर) मैंने साड़ी मोल लेली ! अच्छा यह बता, अब खांयें कहां से ?
कमलावती-फिर क्या अर्थ हुआ ?
म० रतनलाल-‘पगली’ इसका यह अर्थ हैं कि पण्डित को ईश्वर की दया और उसके उपकार पर विश्वास रखते हुए संसार की चिन्ताओं को अपने पास भी न फटकने देना चाहियेः । "भज कलदारम् भज कलदारम् "
कमलावती-आज तुम भी ऐसा ही करके देखो ।’
म० रतनलाल-(एक तरफ होकर) हाय हाय यह तो आज
दान का फल
म० रतनलाल-लो और सुनो रांड की बातें, पत्नी होकर पति का मखौल करती और मेरो बातों को असत् जानती है मैं. सत्य कहता हूँ’ कि आज का शगुन बड़ा ही उत्तम और आज का दिन बड़ा ही भागवान हैं और साथ ही मेरे लगाये हुए हिसाब से भी यही प्रगट होता है कि आज कहीं न कहीं से अवश्य ही हमें वड़ा लाभ होगा ।
कमलावती-निश्चय तुम ऐसे ही विद्वान और ज्ञानी हो ना ? म० रतनलाल-तो क्या तुझे मेरे विद्वान और ज्ञानो होनेमें भी कुछ सन्देह है।
• कमलावती-सन्देह कैसा ? मुझे तो पूरा पूरा विश्वास है। [ सती चन्दनबाला ।
म० रतनलाल-किस बात का ।
म० रतनलाल-क्या ये बेतुके राग हैं ?
उनके पवित्र चरणों में सेठ मूलचन्द जी के विद्वान और ज्ञानी चाकर शूरवीर गोपाला का प्रणाम् पहुंचे और वोह न हों तो देवी पण्डितानी जी को बहुत २ नमस्कार । म० रतनलाल-कौन ! गोपालसिंह ।
गोपाला-जी गोपालसिंह नहीं ‘गोपाला’
म० रतनलाल-( कमलावती से ) अब देख लेना कि मेरे मानने वाले मेरा कितना आदर और सन्मान करते हैं ।
म० रतनलाल-अच्छा तुम चलो मैं अभी भोजन करके आता हूं भज कलदारम् भज कलदारम् ।
गोपाला-जो आज्ञा
( जाता है )
स० रतनलाल-( कमलावती से ) क्यों देखा मेरे मन्त्रों का बल [ सती’ चन्दनवाला।
कमलावती-सारे रुपये मुझे लाकर देना।
म० रतनलाल-हां हां सब तुझी को दूंगा ।
'(जाना)
दान का फल । ]
अङ्क १
दृश्य ५
कुण्डलपुर का राजभवन ।
[ भगवान् महावीर स्वामी गृहस्थाश्रम को त्यागकर सन्यास धारण करने का विचार करते हैं और उनके ज्येष्ट
भ्राता महाराजा नन्दिवर्द्धनजी समझाते हैं ]
भगवान् महावीर-क्या जलसे भरे हुए अधाहसागर में कूदकर यह विचार कर लेने से कि हम नैरना नहीं जानने पर भी डूब नहीं सकते, किनारे पर पहुंच सकते हैं ? जलती हुई अग्नि में प्रवेश करके अपने मनमें यह समझ लेने से कि हमारे खासों की हवा से यह बुझ जायगी, वोह अग्नि बुझ सकती है ? संसार में रहकर गृहस्थाश्रम के मज़े उड़ाते हुए यह आशा रखना कि हमें अवश्य मुक्ति प्राप्त होगी, ठीक हो सकता है ? नहीं और कभी नहीं। प्राचीन समय में श्रीऋषभादि जो तीर्थकर हुए हैं उनकी आयु बहुत होती थी, इसलिये उन्होंने सब कुछ कर लिया और उसको छोड़कर जो कुछ भी वह
चाहते कर सकते थे। परन्तु दुःख तो इस बात का है कि आजकल के मनुष्य यह जानते हुए भी कि हमारी आयु बहुत थोड़ी है न कुछ कार्य करते हैं और न करना चाहते हैं। सच पूछो तो इस संसार में हित की इच्छा रखने और थोड़ी आयु वाले पुरुषों को सम्यक्त चारित्र के विना एक पल भी वृथा न [ सती चन्दनबाला ।
जाने देना चाहिये । जो थोड़ी आयु पाकर भी तपस्या के बिना अपने जीवन को व्यर्थ ही गँवा देते हैं वह अन्त में दुःख ही दुःख भोगते हैं । जब कभी स्वयम् मैं सोचता हूं’ कि मुझे संसार में जन्म लिये हुए २८ वर्ष हो गये किन्तु इस समय तक मैंने अपने लद्धार का क्या उपाय सोचा ? उस समय मेरे हृदयको असह्य वेदना होने लगती है कि मैं तीन ज्ञानरूपा नेत्रवाला इस संसार की प्रत्येक वस्तु को नाशवान समझने वाला होकर भी अज्ञानियों की तरह संयम के बिना गृहस्था- श्रम रूपी दलदल में फंसकर व्यर्थ ही अपना जीवन गवां रहा हूं’ । धिक्कार है उस जीवन पर जो तीन ज्ञान रखते हुए भी अपने को इस मायाजाल से न छुड़ा सका । वास्तव में ज्ञान पाने का उत्तम फल उन्हीं पुरुषों को प्राप्त होता है, जो मोहा- न्धकार का नाश करके जैनेश्वरी दीक्षा धारण करते हैं । जिस प्रकार नेत्रवाला मनुष्य कुएं में गिर पड़े तो उसके नेत्र व्यर्थ हैं, उसही प्रकार जो मनुष्य ज्ञानी होकर मायाजाल में फँस जाय तो उसका ज्ञान पाना भी किसी काम का नहीं । अज्ञानता से यदि कोई पाप हो जाय तो सम्भव है उससे सहज में छुटकारा मिल जाय, किन्तु जान बूझकर जो पाप- कर्म किये जायं उनसे क्या छुटकारा मिल सकता है ? हर- गिज़ नहीं । अतएव ज्ञानी पुरुषों को विषय वासनाओं में फँसने के लिये मोह जैसा निन्दनीय कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि मोह से राग, द्वेष, और राग, द्वेष से घोर पाप दान का फल । ]
होते हैं तथा पापों के कारण दुर्गतियों में जन्न लेकर अनेक दुःख सहन करने पड़ते हैं।
हज़ारों वार आएंगे, हजारों बार जाएंगे।
कभी संसार के चक्कर से छुटकारा न पायेंगे ॥
यहां के चैन, सुख, सम्बन्धसे मुंह मोड़ना होगा । यदि मुक्तिकी इच्छा है तो सबको छोड़ना होगा॥
( महाराजा नन्दिवर्द्धनजी, का प्रवेश )
नन्दिवर्द्धनजी-मैं तुम्हें कई दिनों से हर समय उदास और किसी गहरी चिन्ता में मग्न देखता हूं. तुहारे कमल के समान को- मल हृदय को क्या दुःख पहुंचा है? यदि यता सक्ते हो तो मुझे अवश्य बताओ। मेरे प्यारे भ्राता ! मैं अपने ऊपर पड़े हुए अनेक दुःखों को बड़ी सरलता से सहन कर सकता हूँ, परन्तु तुम्हारे दुःख को देखने की मुझमें सामर्थ नहीं ।
भगवान् महावीर-मैं जानता हूं कि आपको मेरे साथ इतना ही प्रेम है परन्तु मेरा दुःख संसारी मनुष्यों का सा नहीं है जो वैद्यों की औषधि तथा कुटुम्बियों की दौड़-धूप से जा सके। नन्दिवर्द्धनजी-तुम्हारे शब्दों ने तो मुझे और भी आश्चर्य में डाल दिया क्या संसार में कोई ऐसा भी दुःख हो सकता है जिसका कोई उपाय न हो ?
[ सती चन्दनबाला ।
भगवान् महावीर-महाराज मैं यह नहीं कहता कि मेरे दुःख का कुछ उपाय है ही नहीं, नहीं नहीं, उसका उपाय है और अवश्य है । परन्तु ज़रा कठिन है ।
नन्दिवर्द्धन जी-कठिन है तो इसकी चिन्ता न करो, मुझे केवल इतना मालूम हो जाना चाहिये कि तुम्हें क्या दुःख है ? और उस दुःख के दूर करने का क्या उपाय है ? इसके बाद उस दुःख को दूर करना मेरा कर्तव्य है । मैं इसके लिये अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पण करने को तय्यार हूं’ । भगवान महावीर-इन बातों से वह दुःख दूर नहीं हो सकता, इस पर भी आप सुनना हो चाहते हैं तो सुनिये मैं हर घड़ी इसी चिन्ता में रहता हूं’ कि यदि इस संसार में जन्म लेने का अर्थ यही है कि अच्छे २ भोजन खायें और अच्छे २ वस्त्र पहिनें, विवाह करके गृहस्थ जीवन का पूरा २ सुख उठाएं और समय आने पर मर जाएं तो यह समस्त बातें पशुओं में भी पाई जातीं हैं फिर एक मनुष्य और एक पशु के जीवन में क्या अन्तर रहता है ?..
नन्दिवर्द्धन जी-इसका तात्पर्य ?
भगवान महावीर-तात्पर्य यही कि हम जो ऐसा समझ रहे हैं यह हमारी भूल है मनुष्य के जन्म लेने का कारण कुछ और ही है, उसी कारण का पता लगाना हमारा सब से बड़ा कर्तव्य है । क्यों कि जब तक हम उस कारण की : दान का फल ।]
खोज न करेंगे, तो कदापि हमारा जीवन सुफल न होगा। नन्दिवर्द्धन जी-निश्चय ऐसा ही है, परन्तु इसके लिये इतनी चिन्ता की क्या आवश्यकता है ? अरिहंत देव के उपदेशा- नुसार चलने से यह सब कुछ हो सकता है।
भगवान महावीर-हो सकता है और अवश्य हो सकता है, किन्तु गृहस्थाश्रम में रह कर नहीं ।
नन्दिवर्द्धन जी-फिर क्यों कर ?
भगवान महावीर-संसार के समस्त बाह्य और अन्तरंग आड- म्बरों को त्याग कर सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र रत्नत्रय का पालन करके ।
नन्दिवर्द्धन जी-(घबरा कर) तुम ! तुम !! यह क्या कहते हो ? भगवान महावीर-धीरज रखिये, महाराज धीरज रखिये, पहले आप यह बताइये कि राजा अपनी प्रजा की, पिता अपने पुत्र की भलाई चाहता है या बुराई।
नन्दिवर्द्धन जी-जो राजा अपनी प्रजा की भलाई न चाहे वह वास्तव में राजा नहीं चाण्डाल है, राक्षस है। इसी तरह जो पिता अपने पुत्र की भलाई न चाहे वह किसी प्रकार पिता कहलाने का अधिकारी नहीं ।
भगवान महावीर-अच्छा एक बात और बताइये आप मेरा दुःख मिटाना चाहते हैं ?
नन्दिवर्द्धन जी-अवश्य ।
[ सनी बन्दनवाला ।
भगवान महावीर-अच्छा सुनिये ! आप राजा हैं और मैं प्रजा ह’ ज्येष्ट भ्राता होने के कारण इस समय आप मेरे पिता के समान हैं। इसलिये धर्म शास्त्र और राजनीत्यानुसार मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मेरा हित चाहते हैं तो कृपा करके मुझे आशा दीजिये कि मैं राजपाट और संसार के झगड़ों को त्याग कर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर आत्मकल्याण करु ।
नन्दिवर्द्धन जी-प्यारे भाई अभी चहुत दिन नहीं हुए कि माता. पिता का स्वर्गवास हो गया हैं, और इस समय तुमने दीक्षा लेने का निश्चय कर लिया है। यह किसी प्रकार उचित नहीं है। एक साथ मैं दो २ विछोह सहन नहीं कर लकता, इस लिये मुझे, जो पहिले से दुःखी हो रहा हूं’ और अधिक दुःखी न बनाओ ! तुम्हारे सिवाय मेरा और कोई सहोदर नहीं जिसके साथ में कुछ मन्त्रणा कर सकूं तथा अपने दुःखों को सुना सकूं ।
उधर महलों में शोभा, इस तरफ दर्बार में शोभा । तुम्हारे दम से है इस राज की संसार में शोभा ॥ तुम्हीं शक्ती तुम्हीं बल हो, तुम्हीं इसका सहारा हो। अगर मैं राज की आंखें तो तुम आंखों का नारा हो ॥ भगवान महावीर-आपका कहना सत्य है, परन्तु महाराज ये दान का फल । ]
सारे सम्बन्ध इस जीवन के साथ हैं जो आंख दन्द होते ही समाप्त हो जाते हैं। इसलिये मैंने इस मोह माया को छोड़ने का दृढ़ संकल्प कर लिया है क्यों कि बगेर मोहनीय कर्म के नाश किये यह जीव सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सक्ता । नन्दिवर्द्धन जी-यह सब कुछ तुम राजभवन में रहकर भी कर सक्ते हो क्या गृहस्थाश्रम में धर्म का पालन नहीं हो सक्ता । क्या मुनि वृत्ति ही में विशेष धर्म हो सकता है। क्या जो आत्मा संसार में रहता हुआ भी राग, मोह, काम, कपट और विपयादि त्यागदे वह साधु कहलाने योग्य नहीं हैं? अवश्य हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य मुनिराज होकर भी रागादि से निवृत्ति नहीं कर सक्ता क्या वह गृहस्थाश्रम का त्याग करने मात्र से ही साधु बनसक्ता है ? कदापि नहीं। इस लिये मेरे ऊपर कृपा करके समता भाव से गृहस्थाश्रम में रहकर ही जीवन बिताओ ।
बड़ाई इसमें हैं जङ्गल के बदले, घर में पाओ तुम । जो औरों से न अबतक होसका वह कर दिखाओ तुम ॥
बचा सक्ते हो अपने धर्म को, दुनियां में रह कर भी । कर्मल ही को न देखो, जल के अन्द्र भी हैं वाहर भी ॥ भगवान महावीर-पूज्य प्राप्ता जिस प्रकार एक ऐसे मैदान में जिसमें कहीं जाल बिछे हुए हों, कहीं कांटे पड़े हुए हों, किसी जगह पत्थरों के ढेर हों और कहीं बड़े २ गढ़े हों [ सती चन्दनबाला ।
किसी अन्धे पुरुष के हाथ में केवल एक लकड़ी देकर उसे वहां छोड़ दिया जाए तो क्या वह किसी नेत्रों वाले की सहायता के विना उस जंगल से ज़िन्दा निकल जायगा ? कदापि नहीं । जाल के फन्दों से बच गया तो कांटों में उल- झेगा और यदि कांटों से भी बचा, तो पत्थरों से अवश्य ठोकर खाकर गिरेगा । और अन्त में गढ़े तो उसकी जान लेकर ही छोड़ेंगे । इसी प्रकार यह मनुष्य भी जिसके जीवन के साथ २ राग के फन्दे, लोभ के कांटे, कपट के पत्थर और काम के अन्धेरे गढ़े मौजूद हैं सिर्फ बुद्धि के बल से बिना तप जप किए मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता और असली तप जप नभी हो सक्ता है जब संसार के समस्त झगड़ों को त्याग दिया जाए । इस लिये क्षमा कीजिये यदि में यह कहूं कि में आपकी इस आज्ञा का पालन करने से मजबूर हूं’ । नन्दिवर्द्धन जी-(उदास हो कर) नहीं मैं तुम्हें मजबूर नहीं करता यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है ।
भगवान महावीर-तो मेरी इच्छा यही है कि आप मुझे तपोवन जाने की आज्ञा दें ।
नन्दिवर्द्धन जी-तुमने मेरी पहली बात अस्वीकार करदी परन्तु मुझे आशा है कि मेरी दूसरी बात को तो अवश्य स्वीकार करोगे ।
भगवान महावीर-वह क्या ?
दान का फल । ]
नन्दिवर्द्धन जी-यही कि ज़्यादा नहीं केवल दो वर्ष तक तुम मेरे पास और रहो क्यों कि अभी माना पिता के मरने का दुःस नहीं भूला हूं दो वर्ष बीत जाने पर जो तुम्हारे मन में है वही करना ।
भगवान महावीर-(गर्दन झुका कर) जो आपकी आमा । (दोनों का जाना)
अङ्क १
दृश्य ६
( राजा शतानीक का दरवार)
सहेलियों का नाच गाना
कहो ऐ जैनियो मन में तुम्हारे क्या समाई है। यह कैसी फूट है अपनों से किस कारण लड़ाई है ॥ दिगम्बर या श्वेत-अम्बर हो कुछ हो फिर भी जैनी हो । गले मिलकर रहो मिन्टकर ही रहने में भलाई है ॥ हसइ भूट और चोरी अत्याचार और मक्कारी । तुम्हीं चोलो बड़ाई है कि इस में जग हंसाई है ॥ कभी जिनके सबब संसार में भारत की थी शोभा । उसी जिन धर्म की यह दुर्गति तुम ने बनाई है ॥ राजा शतानीक-सेनापति !
सेनापति-महाराज ।
[ सती चन्दनबाला ।
शतानीक-तुम्हारा क्या विचार है ?
सेनापति-अन्नदाता किस मामले में ।
शतानीक-इसी सरहद वाले झगड़े में राजा दधिवाहन हमारी तमाम बातें स्वीकार कर लेगा या युद्ध के लिए तलवार उठाएगा ।
सेनापति – जहां तक मेरा विचार है वह सर झुकाने के बदले तलवार से इसका फैसला करना ज़्यादह पसन्द करेगा । शतानीक-यह तुम्हारी भूल है जो ऐसा विचार करते हो वह हरगिज़ ऐसा नहीं कर सकता उसकी इतनी शक्ति नहीं कि राजा शतानीक जैसे बलवान मनुष्य से युद्ध कर सके । तीर दिल पर तेग मुंह पर गुर्ज़ सर पर झेलना । काम हर एक का नहीं इन सब की टक्कर झेलना ॥ कौन ऐसा है कि दूभर जिसको अपनी जान हो।
वोह लड़े हाथी से उस जैसा ही. जो बलवान हो ॥ सेनापति-महाराज सत्य कहते हैं परन्तु आन और लाज पर मरने वाला मनुष्य बल और शक्ति से कभी भय नहीं करता राजा दधिवाहन किसी नीच जाति में नहीं क्षत्रियों के ऊंचे कुल में पैदा हुआ है वह युद्ध में लड़कर प्राण दे देगा किन्तु आन न देगा ।
शतानीक-इसका परिणाम ?
दान का फल । ]
सेनापति—क्षमा कीजिये, महाराज क्षत्री पुत्र युद्ध के समय “इस युद्ध का अन्त में क्यो परिणाम होगा ?” इसका विचार नहीं करता उसे केवल इस बात की चिन्ता होतीहै कि उसकी आन और कुल पर कलङ्क का टीका न लगने पाये । अन्नदाता राजा दधिवाहन कैसा मनुष्य है’ आज्ञा हो तो जो कुछ आपके इस सेवकने उसकी निस्वन सुना है साफ २ अर्ज करे । शतानीक—कहो और अवश्य कहो ।
सेनापति—महाराज इस में शक नहीं कि उसका राज हमारे राज से बहुत छोटा है उसकी सेना भी हमारी सेना से थोड़ी और कमजोर है परन्तु जिस प्रकार दधिवाहन एक वीर और सच्चा क्षत्री है उसी प्रकार उसकी सेना का एक २ मनुष्य हमारी सेना के दो दो चार चार मनुष्यों पर भारी है इसके अलावा राजा दधिवाहन ने अपने सच्चे प्रेम और दया के स्वभाव से यही नहीं कि केवल सारी सेना ही के मनों को मोह लिया है बल्कि जहां तक आप के दास को मालूम हुआ है वह यह है कि सेना के अलावा प्रजा का बच्चा बच्चा उसके गुण गाता है।
दया का धर्म का नेकी का पालन हार गिनती है।
वह राजा है मगर प्रजा उसे अवतार गिनती है ॥
बड़े छोटे बुरे अच्छे सब उस पर जान देते हैं। वह पूजा के समय भी तो उसी का नाम लेते हैं ॥ | सती चन्दनवाला ।
शतानीक-इसका तात्पर्य ?
सेनापति-यही कि राजा दधिवहन से हमारा युद्ध हुआ तो बड़ी भारी मुसीबत का सामना होगा ।
शतानीक-क्यों ?
सेनापति-क्योंकि लोहे को लोहे से काटना पड़ेगा । शतानीक-ऊंह देखा जायगा ।
सेनापति-महाराज इसे टाले’ नहीं वल्कि जो कुछ यह दास अर्ज करता है उसे सुनें’ और सुनकर उसका उपाय करें’ । शतानीक-आख़िर तुम्हें इतनी चिन्ता क्यों है क्या राजा दधि- वाहन के नाम से डरते हो ?
सेनापति-अन्नदाता क्षत्री का पुत्र डरने के लिए नहीं बल्कि मरने के लिए इस संसार में जन्म लेता है परन्तु यह पुरानी कहावत हैं कि अकेला चना भाड़को नहीं फोड़ सकता । आप हों या यह दास उस वक्त तक राजा दधिवहन का कुछ नहीं बिगाड़ सक्ते जब तक हमारी सारी सेना भी उसकी सेना की तरह निर्भय और वीर न हो । महाराज जब से सेनापति की पदवी मुझे मिली हैं मैं तो प्रति दिन यही देखता हूं’ कि यों तो हमारी सेना का एक एक मनुष्य अपने आप को रावण और भीष्मपितामह से ज़्यादह बलवान और अर्जुन से बढ़कर धनुर्धारी जानता है परन्तु जब कोई कठिन समय दान का फल । ]
आ पड़ता है तो इस तरह मुंह छुपाने और जान यन्त्राते फिरते हैं जिस तरह बिल्ली को देखकर चूहे भागते हैं। शतानीक - यह नो ठीक है फिर भी एक की और दस की बराबरी क्या ? में अपनी सेना की इस कमी को इस तरह पूरा कर दूंगा कि राजा दधिवाहन के एक एक सिपाही के मुकाबले में मेरी सेना के दस २ सिपाही होंगे और जिस प्रकार एक टिट्टी को सैकड़ों च्यूटियां लिपट जाती है उसी प्रकार उसके आदमियों को मेरे मनुष्य चिपट जाएंगे । तलवार और तीर भला क्या चलाएंगे ।
दम लेने का समय भी वह दम भर न पाएंगे ॥
घिर जायंगे वह आते ही यों मेरी फौज में।
फंस जाय जैसे नाव समुन्दर की मौज में ॥
( राजा शतानीक का एलची जो राजा दचिवाहन के पास अपने मालिक का पत्र लेकर गया था
वापिस आना है)
एलची - दिन ब दिन इस राज को शोभा बड़े संसार में। काट पहले से भी दूना हो तेरी नलबार में ।
सूरमा भो सर झुकाकर आप इस दरवार में।
लाभ हासिल हो तुझे इस जंग के व्यवहार में ॥ देखकर गुस्सा तेरा दुश्मनका किस्सा पाक़ हो। तेरे बाहू बल से धरती का कलेजा चाक हो ॥
शतानीक-क्यों राजा दधिवाहन ने मेरे पत्र का क्या जवाब दिया ? [ सती चन्दनबाला ।
एलची–महाराज उस अभिमानी ने कहा, जाओ अपने राजा से कह दो कि राजा दधिवाहन क्षत्रो पुत्र है वह इसका उत्तर जवान से नहीं बल्कि तलवार और खांडे से देना चाहता है । शतानीक–( क्रोधित होकर ) तो क्या वह मुझ से युद्ध करना चाहता है ?
एलची–जी हां ।
शतानीक–अच्छी बात है ! सेनापति !
सेनापति–अन्नदाता ।
शतानीक–जाओ और अपनी तमाम सेना को मेरा यह हुक्म सुना दो कि राजा दधिवाहन के गढ़ पर चढ़ाई है जो इस समय अपने राजा और अपने देश को खिदमत करेगा मैं उसको मालामाल कर दूंगा ।
सेनापति–जो आज्ञा ।
शतानीक–चूंटी हाथी का मुक़ाबिला करती है, गीदड़ शेर के मुंह आता है राजा दधिवाहन और मुझसे युद्ध ! देखा जाएगा । पृथ्वी पर खून की धारा बहा दूं तो सही ।
आग बन कर आग पानी में लगा दूं तो सही ॥
जिससे वह फूला हुआ है वह भुला दूं तो सही । नाम तक संसार से उसका मिटा दूं तो सही ॥
सूरमाओं का जिगर फट जाय मेरे वार से ।
कांप उठता है जगत तलवार की झनकार से ॥(पटाक्षेप) . =
दान का फल । ]
अङ्क १
दृश्य ७
राजा दधिवाहन का महल ।
राजा दधिवाहन-( टहलते हुए ) नहीं हो सक्ता ! शेर लोमड़ी के आगे शीश नवाये, हाथी मच्छर के सामने गिड़गिड़ाये, आकाश धरती से मात खाये, समुद्र झील से घबराये, पहाड़ मिट्टी के ढेर से दवजाय, सूरज का चमत्कार चिराग़ की ज्योति से शरमाये एक वीर और क्षत्री पुत्र, किसी निर्दयी और कायर मनुष्य से डर जाय ऐसा इस संसार के अन्त -समय तक नहीं हो सक्ता ।
अधेरा रात का दिन के, उजाले पर विजय पाये । अनी फौलाद की टूटे हुए कांटे से घबराये ॥
न हो कुछ खोट जिस सोने में, वह पीतलसे शरमाये । गधे के रेंकने से शेर की, आवाज़ दव जांये ॥ बदल जायें नियम सारे, कभी यह हो नहीं सक्ता । जो सच्चा वीर हैं वह, लाज अपनी खो नहीं सक्ता ॥ ( रानी धारणी का प्रवेश )
रानी धारणी-निश्चय, स्वामी जी ! सच्चा क्षत्री अपनी लाज जीवन के अन्त तक नहीं खो सक्ता । परन्तु इस समय लाज की चिन्ता कैसी और आज आप इतनी रात बीत जाने पर भी अकेले यहां क्या विचार कर रहे हैं ?
[ सती चन्दनबाला ।
राजा दधिवाहन-जिन बातों के सुनने से तुम्हारे कोमल और नाजुक हृदय को दुःख प्राप्त हो उन्हें पूछकर क्या करोगी ? रानी धारणी-क्या कहा ? मुझे दुःख प्राप्त होगा और वह भी किस से तुम्हारी बातों से-अपने मालिक, अपने पतिदेव, अपने स्वामी के शब्दों से ?
राजा दधिवाहन-वो बातें ही ऐसी दुःख भरी हैं.कि केवल तुम्हीं क्या जो भी सुनेगा वह दुःखी होगा ।
रानी धारणी-जब तो मैं सुनूंगी और अवश्य सुनूंगी । राजा दधिवाहन-कारण ?
रानी धारणी-कारण यही कि धर्म और समाज के अनुसार स्त्री अपने स्वामी के दुःख सुख में बराचर की हिस्सेदार है जिस प्रकार जब आप अपने सुख में मुझे हिस्सा देते हैं तो अपने दुःख में भी इस दासी को शरीक कीजिये ।
रही हूँ’ आज तक सुख में, तो अब दुःख भी उठाऊंगी। मैं जग में स्त्री की लाज को, शोभा, बढ़ाऊंगी ॥ पति सेवा का आज उपदेश, दुनियां को सुनाऊंगी ।
बताया है जो मुझको धर्म ने, सब को वताऊँगी ॥
न अच्छे वस्त्रों से है, न आदर उसका भूषण से ।.. जो है कुछ मान औरत. का, तो है स्वामी के जीवन.से ॥ राजा दधिवाहन-आहा ! कैसी विदुषी और ज्ञानवती स्त्री है, दान का फल । ]
जिस तरह इसकी सुन्दर मुखड़ा नेत्रों को लुभाने वाला है उसी प्रकार इसका पवित्र हृदय भी प्रेम और मनोहरना की शक्ति से मन को परचाने वाला है।
रानी धारणी-आपने मेरी बान का कुछ उत्तर नहीं दिया । • राजा दधिवाहन-सुन्दरी ! क्या उत्तर दूं न तो मेरा मन ही ठिकाने है और न मेरी बुद्धि ही कुछ काम देनी है यह बान तो तुम्हें भी अच्छी तरह मालूम है कि ‘कौसाम्बी’ नगरी का राजा शतानीक मेरे साथ बैर रखता है अतएव उसने विना कारण सरहद (सीमा) का झगड़ा खड़ा करके मेरे पास एलची भेजा है कि मैं अपनी प्रजा के दो चार निर्दोष मनुष्य जिनका वह नाम बताये और तीन लाख रुपये दण्ड स्वरूप उसको दूं और साथ हो पत्र लिख कर क्षमा मागूं । रानी धारणी-फिर आपने क्या उत्तर दिया ?
राजा दधिवाहन-मैंने उस घमण्डी राजा को साफ़ २ लिख दिया कि एक क्षत्री पुरुष से यह आशा न रखना कि वह किसी कायर और अन्यायी मनुष्य से डर कर विना अपराध क्षमा मांगेगा, साथ ही यह भी लिख दिया कि तूने जिस प्रकार एक क्षत्री का अपमान किया है उसका उत्तर यदि तू यहां होता तो ज़बान के बदले तलवार से दिया जाता। रानी धारणी-(हँस कर) अवश्यमेव आपको ऐसा ही उत्तर देना चाहिये था, अव आपको किस बात की चिन्ता और • किस चीज़ का भय हैं जो इतना विचार कर रहे हैं.? [ सती चन्दनबाला ।
राजा दधिवाह्न-प्रिये तुम्हें नहीं मालूम कि उस दुष्ट ने मेरा उत्तर सुन कर क्या किया ?
रानी धारणी-क्या किया ।
राजा दधिवाहन-उसने गुप्त रीति से चम्पापुरी पर चढ़ाई करदी जिस कारण मैं अपनी सेना का कुछ बन्दोवस्त न कर सका । अब मुझे अपनी मृत्यु या राजपाट छिन जाने का इतना भय नहीं जितना दो बातों का मेरे हृदय को दुःख है। एक तो यह कि सब लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि मैं अपनी प्रजा का कितना ध्यान रखता हूं और किस तरह अपनो सन्तान से भो अधिक प्यारा समझ कर उनको
पालन-पोषण करता हु, अफ़सोस कि इस अन्यायी और
निर्दयी के कारण उन निर्दोषों को तलवार की भेट चढ़ाना पढ़ेगा, दूसरे यह चिन्ता है कि यदि राजकुमारी चन्दनवाला का विवाह कहीं हो गया होता तो आज मुझे इस बात का भय न होता कि मेरी मृत्यु के बाद इस गरीब कन्या की क्या दुर्गति होगी ?
रानी धारणी-महाराज ! हिन्दू स्त्री का धर्म है कि वह अपने पतिं की आज्ञा का पालन करे वह अपने स्वामी को शिक्षा तथा उपदेश देने का अधिकार नहीं रखती फिर भी यह दासी हाथ जोड़ कर प्रार्थना करती है. कि आप दोनों बातों की चिन्ता छोड़दें धर्म और शास्त्रों में लिखा हुआ हैं कि दान का फल । ]
जिस प्रकार राजा का कर्तव्य है कि वह अपनो प्रजा की देखभाल प्रेम, दया, खभाव से करे उसो प्रकार प्रजा का भी यह कर्तव्य हैं कि जिस देश और राजा पर कोई कष्ट आचे तो वह उस कट के दूर कर देने में अपना जीवन गवादे । अब रहो हमारी पुत्री चन्दनवाला सो स्वामी जी में आप जैसे क्षत्री राजा की रानो और गजा चेटक जैसे राजा की पुत्री हैं, आप निश्चिन्त रहें जब तक मेरे शरीर में आत्मा और बाहों में चल मौजूद है उस वक्त तक किसी की इतनी शक्ति नहीं जो उसके हृदय को दुःख पहुंचा सकेः-
भय नहीं इस बात का, राजा हो या धनवान हो।
भीम जैसा बीर रावण की तरह बलवान हो ॥
जिसने इस को दुःख दिया, जग से मिटादूंगी उसे । स्त्री कर सक्ती है क्या क्या, दिखाटू ंगी उसे ॥ राजा दधिवाहन-हृदयेश्वरी ! तुम्हारे इन वीरता के शब्दों से मेरा मन बहुत ही प्रसन्न हुआ वास्तव में सची क्षत्राणियों को इसी प्रकार अपनी और दूसरों को रक्षा करनी चाहिये, अब मैं तुम्हारी और चन्दनवाला की तरफ से निर्भय होकर शत्रुओं से युद्ध करूंगा।
रानी धारणी-अच्छा तो अब चलकर विश्राम कीजिये । राजा दधिवाहन-प्रिये ! मुझे अभी मंत्रीजी से मंत्रणा करनी है मैंने उन्हें इसो समय बुलाया है इसलिये मैं उनके पास जा रहा हूं। ( राजा दद्धिवाहन सनी धारणी को छोड़कर जाता है) [ सती. चन्दनबाला ।
रानी धारणी-है प्रभू, दीनानाथ, विश्वोद्धारक, पतितपावन, हमारे धर्म और लाज की रक्षा कीजिये, हमें दुष्ट पापियों के फन्दे से बचाइये ।
गाना ।
यही तो है समय ऐ वीर स्वामी, जल्द आओ तुम । जगत को अत्याचार और पापों से बचाओ तुम ॥ हुए हैं तुम से पहले, 'तीर्थंकर और जितने भी । अकेले उन सभों का रूप, धारण करके आओ तुम ॥ दद्यालू हो दया करके, मिटाओ बोज हिंसा का । अहिंसा धर्म की संसार में, शोभा बढ़ाओ तुम ॥ बुराई के भँवर में फँस गई, जिन धर्म की नैया । 'इसे ऐ जग के खेवय्या, किनारे पर लगाओं तुम ॥ ये क्या अन्धेर है भाई का, भाई हैं यहां वैरी। मिटा कर बेर हृदय से, गले इन को मिलाओ तुम ॥ दुराचारी हों या पापी, बनें सब धर्म के सेवक । वह उत्तम और प्यारे शब्द, ऐ भगवन सुनाओ तुम ॥ यही है नाज़ की आशा, यही है कामना इसकी ।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 317.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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