भाग्य बिना कछु हाथ न आवै| Bhagya Bina kacchu Hath na Aave

सिंधु धसै गिरि पै निवसै, अति दुर्गम कानन छानि छवावै।
फूंकतधातु बनाय रसायन, खोदत भूमि सुरंग लगावै।।
वैद्यक ज्योतिष मंत्र करै नित, व्यंतर भूत पिशाच मनावै।
यों तृष्णावश मूढ़ फिरैं पर, भाग्य बिना कछु हाथ न आवै।।1।।

मात पिता सुत नारि सहोदर, छोड़ि विदेश कमावन जावै।
काटत काठ पढ़ावत पाठ, लगावत हाट कपाट बनावै।।
कृत्य कुकृत्य करै बनि भृत्य, दिखावत नृत्य बजाय रिझावै।
यों तृष्णावश मूढ़ फिरैं पर, भाग्य बिना कछु हाथ न आवै।।2।।

शीत सहै तन धूप दहै अति, भार बहै भरि पेट न खावै।
देश विशेद फिरै धरि भेष, महेन बनौ उपदेश सुनावै।।
पाचक वाचक याचक नाचक, गायक नायक रूप बनावै।
पीर फकीर बजीर बनै, तकदीर बिना कछु हाथ न आवै।।3।।

इन्द्र नरेन्द्र फणीन्द्रन के सुख, भोगन को नित जी ललचावै।
कंचन धाम करूँ बिसराम, सदा मम नाम तिहुँ जग छावै।।
नूतन भोग शरीर निरोग, न इष्ट वियोग न रोग सतावै।
यों दिन रात विचार करै पर, भाग्य बिना कछु हाथ न आवै।।4।।

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