भगवान् राम - जैन स्वाध्याय सामग्री | Bhagwan Ram

भगवान् राम

अनुक्रमणिका

क्र. विवरण
1 भगवान् राम
2 भगवान् राम
3 ।। वीतरागायनमः ।।
4 भगवानराम
5 ‘भगवान् राम’
6 1. राम जन्म
7 2. सीता जन्म
8 3. राम-सीता विवाह
9 सीता का स्वयंवर
10 सीता का स्वयंवर रचा गया
11 काव्य
12 4. सीता का भाई भामण्डल से मिलाप
13 5. राजा दशरथ को वैराग्य-कैकेई का वरदान
14 6. राम का वन गमन
15 7. वन में-राम, सीता, लक्ष्मण
16 8. राम द्वारा वज्रकरण की रक्षा
17 9. “राम द्वारा देशभूषण, कुलभूषण मुनियों का उपसर्ग दूर करना।”
18 10. “राम व जटायु पक्षी”
19 11. ‘राक्षस वंश में रावण’
20 12. ‘सीता-हरण’
21 13. “रावण-चरित्रवान”
22 14. “राम का विलाप”
23 15. “वानरवंशियों में बाली मुनि”
24 16. ‘राम की सुग्रीव से मित्रता’
25 17. ‘सती सीता लंका में’
26 18. ‘हनुमान् का लंका को प्रस्थान’
27 कथा-चित्र
28 19. “हनुमान् का लंका-प्रवेश”
29 20. “राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण के शक्ति लगना”
30 21. “विशल्या द्वारा शक्ति-निवारण”
31 २२. ‘रावण को बहुरूपिणी विद्या सिद्ध’

भगवान् राम

भगवान् राम

जैन चित्रकथा के अन्तर्गत
सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ

मंगल आशीर्वाद : : : शु० राजमति माता जी

लेखक : : : डा० मूल चंद जैन, मुजफ्फरनगर

सम्पादक : : : ब्र० धर्मचंद शास्त्री

प्रथम संस्करण : : : 2000 सन् 1996

मूल्य : : : 25 रु०

I.S.B.N. : : : 81-85834-64-4

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुतग्रन्थ माला
जैन मन्दिर, गुलाब वाटिका, लोनी रोड, जि० गाजियाबाद (उ०प्र०) दिल्ली
दूरभाष : 81-66074 (S.T.D. 05762)

मुद्रक : सैनानी ऑफसेट, दिल्ली-32 दूरभाष : 2283885

।। वीतरागायनमः ।।

भगवान् राम

लेखक
डा० मूल चन्द जैन (मु० नगर)

सम्पादक
ब्र० धर्म चन्द शास्त्री

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला

भगवानराम

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला अन्तर्गत
सुनोसुनाएँ सत्य कथाएँ

लेखक
डॉ० मूल चन्द जैन

सम्पादक
ब्र० धर्म चन्द शास्त्री

मूल्य
24 रुपये

सन्
1996

प्रथमावृत्ति
2000

पुष्प नं०
3

I.S.B.N.
81-85-834-41-5

अपने बच्चों को धर्म का मर्म समझायें तथा उनके जीवन में
सदाचार व सत्य का अमृत पिलावें। बच्चों के भविष्य के लिए जैन
चित्रकथा, सुनोसुनाएँ सत्य कथाएँ, मँगा कर पढ़ें तथा पढ़ावें।

प्रकाशन सहयोगी

प्राप्ति स्थान
श्री जैन मन्दिर, गुलाब वाटिका, लोनी रोड़, दिल्ली

मुद्रक
सैनानी ऑफसेट, दूरभाष - 2283885

‘भगवान् राम’

आज भी बच्चे बच्चे के मुँह पर राम का नाम है। क्यों ? राम का जीवन आदर्श जीवन जो था।
भाइयों से प्रेम, माता की भक्ति, पिता की आज्ञा का पालन, गुरु-भक्ति प्रजा की पुकार का आदर,
न्याय की तराजू पर पत्नी को भी तोलना, शत्रु प्रबल होते हुए भी न्याय के लिए उससे भिड़ जाना,
कष्ट के समय भी कर्तव्य-पालन, मित्रों के प्रति कृतज्ञता, सभी कुछ तो मिलता है उनके जीवन में
राज्य किया तो ऐसा कि आज भी राम-राज्य के गीत गाये जाते हैं।
और जब संसार, शरीर, भोगों से वैराग्य हुआ, छोड़ दिया सभी कुछ—यहाँ तक कि वस्त्र भी,
और बन गये दिगम्बर मुनि, कष्ट कस ली कर्म शत्रुओं से लड़ने के लिए और एक दिन नष्ट कर ही
दिया इन महायोद्धा आठों कर्मों को भी और बन गये भगवान्।
यही सब कुछ है इस पुस्तक में। स्वयं पढ़ो, दूसरों को सुनावे, विशेषतः दादी माँ श्रेष्ठ जायँ
बच्चों को लेकर और सुनायें उन्हें यह राम कथा। फिर देखें हमारे बच्चे कैसे नहीं बनेंगे
राम—भगवान् राम—आज नहीं तो कल अवश्य ही बनेंगे।

1. राम जन्म

अयोध्या के राजा का नाम दशरथ था। उनकी चार रानियों के चार पुत्र थे—कौशल्या के पुत्र राम,
कैकेई के भरत, सुमित्रा के लक्ष्मण और सुप्रभा के शत्रुघ्न। इनमें सबसे बड़े थे राम। चारों माताओं
में एक दूसरे के लिए अपार प्रेम था। एक दूसरी के बच्चे को अपना बच्चा समझती थीं चारों बच्चों
में भी आपस में बड़ा प्रेम था। चारों बहुत ही सुन्दर, होनहार, दूसरों का मन मोहने वाले थे। जी
उन्हें देखता वही प्यार करता। बड़े प्यारे, दुलारे थे, ये बालक।

बालक बड़े हुए। राजा दशरथ ने उन चारों पुत्रों को विद्यायें सिखाने के लिये अति नाम के
ब्राह्मण को सौंप दिया।
चारों ही बालक सब विद्याओं को सीखकर कुछ वर्ष पश्चात् अपने घर आ गये।
ऐसे थे बालक—सब का मन मोहने वाले।

2. सीता जन्म

मिथिलापुरी के राजा जनक थे। उनकी रानी का नाम विदेहा था। विदेहा ने एक साथ एक पुत्र व
पुत्री को जन्म दिया। पहले जन्म के बैर के कारण एक देव पुत्र को हरण कर के ले गया। बाद में दया
आने पर उसे आभूषण व कुण्डल पहना कर पृथ्वी पर छोड़ दिया। चन्द्रगति विद्याधर उस बालक को
उठाकर ले गया और अपनी पत्नी को सौंप दिया। उनके कोई पुत्र नहीं था। अतः उन्होंने उसे पुत्र
की तरह पाला और उसका नाम प्रभामण्डल (भामण्डल) रखा।

पुत्री का नाम रखा जानकी (सीता)। माता-पिता को पुत्र के हरण का दुःख तो बहुत हुआ परन्तु
सीता की बचपन की खेल-कूद की लीलाओं को देख देख कर वे उस दुःख को भूले से रहने थे। सीता
बहुत सुन्दर थी और गुणवान भी।
इस प्रकार की सीता बन गई—सबकी प्रिय।

3. राम-सीता विवाह

राजा जनक सीता का विवाह दशरथ के बड़े पुत्र राम से करना चाहते थे क्यों कि उन्होंने राम की
बहुत प्रशंसा सुन रखी थी।

२

सीता का स्वयंवर

नारद ने सुना तो सीता को देखने के वे महल में पहुँच गये। सीता दर्पण में अपना मुख देख रही थी। जटाधारी नारद की परछाई दर्पण में देख कर डर गई और भाग गई। नारद ने इसे अपना अपमान समझ कर सीता से बदला लेने की ठानी। उसने सीता का बहुत सुन्दर चित्र बनाकर भामण्डल को दिखाया जिसे देखकर वह सीता पर मुग्ध हो गया।

विद्याधर चन्द्रगति ने राजा जनक से अपने पुत्र भामण्डल के साथ सीता का विवाह करने का प्रस्ताव रखा जिसके लिये राजा जनक तैयार नहीं हुए। तब चन्द्रगति ने छल कपट से राजा जनक को अपनी नगरी में बुला लिया और उसके सामने यह प्रस्ताव रखा कि “यदि हमारे दिये हुए वज्रावर्त व सागरावर्त धनुष में से वज्रावर्त धनुष को राम ग्रही देंगे तो सीता का विवाह राम के साथ कर देना वरना हम जबर्दस्ती सीता को उठाकर ले जायेंगे और भामण्डल के साथ उसका विवाह कर देंगे।” जनक को यह शर्त स्वीकार करनी पड़ी।

सीता का स्वयंवर रचा गया

दूर दूर देशों के राजकुमार आये। राम लक्ष्मण भी वहाँ पहुँचे। घोषणा हुई जो वज्रावर्त धनुष को चढ़ा देगा, सीता उसके गले में वरमाला डाल देगी।

धनुष बड़ा भयंकर था। उसमें से अग्नि की ज्वालाएँ निकल रही थीं, साँप फुंकार कर रहे थे। एक एक करके सब अपना भाग्य आजमाने लगे।

एक राजकुमार उठा, धनुष को उठाने लगा, परन्तु वहाँ गिर गया। दूसरा उठा, वह भी औंधे मुँह लुढ़क गया। तीसरे ने भी प्रयत्न किया, परन्तु डर के मारे भाग गया।

अब राम का नम्बर आया। राम को देखकर सब हँसने लगे। बड़े बड़े वीर योद्धा तो इस धनुष को चढ़ा नहीं सके, यह बेचारा क्या करेगा। परन्तु राम ज्यों ही धनुष के निकट पहुँचे, धनुष ज्वाला रहित हो गया। सर्प न जाने कहाँ चले गये। धनुष बिलकुल साधारण धनुष की तरह रह गया और राम ने धनुष को आसानी से चढ़ा दिया।

काव्य

ऐसे थे वीर-श्री राम
ऐसे थे पुण्यशाली-श्री राम

4. सीता का भाई भामण्डल से मिलाप

सीता का विवाह राम के साथ हो गया है। ऐसा जानकर भामण्डल को बहुत क्रोध आया। उसने अपने कर्मचारियों को डाँटा फटकारा कि विद्याधर होते हुए भी तुम सीता को भूमिगोचरी राम से छुड़ाकर न ला सके। फिर स्वयं अयोध्या की ओर विमान में बैठ कर चल दिया ताकि राम से युद्ध करके सीता को ले आये। परन्तु मार्ग में एक नगर विद्याधरपुर को देखकर पिछले जन्म की बात याद आ गई जिससे उसने जान लिया कि सीता तो मेरी बहिन है। उसने सब बातें अपने पिता चन्द्रगति को बतलाई। सुनकर चन्द्रगति को वैराग्य हो गया।

चन्द्रगति ने भामण्डल को राज्य दे दिया। स्वयं मुनि दीक्षा लेने के लिए चल दिये। अयोध्या के निकट महेन्द्रोदय बगीचे में पहुँच गये। कुटुम्बी जन व प्रजा के लोग साथ थे। वहाँ पहुँचकर मुनिराज सन्नमुद्रासहित से मुनि-दीक्षा ले ली।

प्रजा के लोगों ने जयकारे लगाये “राजा भामण्डल की जय”, “राजा जनक का पुत्र जयवंत होवे।” अयोध्या में मैं रह रही सीता ने सुना। सोचा हो सकता है यह मेरा भाई हो। राम सीता आदि सब बगीचे में पहुँच गये। सीता ने भामण्डल को देखा, हर्ष से फूली न समाई। भामण्डल ने आगे बढ़कर बहिन सीता को गले लगा लिया। राजा दशरथ भामण्डल को अपने नगर ले गये।

मिथिला से राजा जनक व विदेहा को भी बुला लिया। पुत्र भामण्डल को पाकर दोनों को अपार हर्ष हुआ।

रानी विदेहा ने सीता को अपने गले से लगाया और समझाया “सास-ससुर की सेवा करना, पति की आज्ञा में चलना, कोई कार्य ऐसा न करना जिससे हमारी बदनामी हो।”

माता-पिता को उनका पुत्र मिल गया। बहिन को भाई मिला। सब की खुशी का पारावार न था। राम ने साले का खूब आदर सत्कार किया। बहुत दिन अयोध्या में रखा।

पुण्य से क्या नहीं मिलता-सभी कुछ मिल जाता है।
ऐसी सीख दिया करती थी-माता अपनी पुत्री को।

5. राजा दशरथ को वैराग्य-कैकेई का वरदान

सर्व भूतहित मुनिराज का उपदेश सुनकर राजा दशरथ को संसार, शरीर, भोगों से अरुचि हो गई। विचारने लगे संसार दुःखमय है, शरीर अपवित्र है, भोग क्षणभंगुर हैं, क्या रखा है इनमें। महलों में लौट कर मंत्रियों से कहा कि मैंने निश्चय कर लिया है कि मुनि दीक्षा लूँगा। अतः आप राम के राज्याभिषेक की तैयारी करो। राम को तिलक करके मैं वन को चला जाऊँगा। मंत्रियों ने बहुत समझाया, परन्तु दशरथ अपने निश्चय पर दृढ़ रहे।

सच और उदासी छा गई। रनवास में रुदन होने लगा। भरत ने सुना, उसे भी वैराग्य हो गया। उसने भी मुनि बनने का निश्चय कर लिया।

6. राम का वन गमन

भरत को राज्य करने में कोई बाधा न आये प्रजा कोई उपद्रव न खड़ा कर दे, यह सोचकर राम ने पिता जी से यह भी कहा- “मैं अयोध्या में नहीं रहूँगा बल्कि ऐसी जगह चला जाऊँगा जहाँ मुझे कोई जान भी न सकेगा कि मैं कौन हूँ।” कितने महान् थे श्री राम।
भरत को बुलाकर दशरथ ने उसके राज्याभिषेक की बात कही परन्तु भरत तैयार न हुए क्योंकि वह तो मुनि दीक्षा लेने का विचार कर ही चुके थे। तब राम ने भरत को बहुत समझाया कि पिता जी को उनके वचनों के पालन करने में हमें सहायक होना चाहिये न कि बाधक और पिता जी की आज्ञा मानना ही हमारा कर्तव्य है।

राम ने पिता जी को प्रणाम किया और वन चले दिये। दशरथ विवश थे। मानना पड़ा।
दुःखी हृदय से राम को बुलाया, सब बातें बताईं, अपनी विवशता भी समझाई।
राम ने सहर्ष कहा “पिता जी आप राज्याभिषेक मेरा नहीं, भाई भरत का ही कीजिये।”
ऐसे थे दशरथ-वचन को निभाने वाले।
ऐसे थे राम-पिता की आज्ञा मानने वाले।

7. वन में-राम, सीता, लक्ष्मण

आगे आगे राम, बीच में सीता, पीछे लक्ष्मण चले जा रहे हैं। पीछे पीछे प्रजा के लोग-दुःखी हृदय, रोते हुए बिलखते हुए पहुँच गये जंगल में।
राम ने बहुत समझाया, परन्तु प्रजा के लोग वापिस नहीं लौटे, नहीं लौटे। अपार प्रेम जो था उन्हें राम के प्रति।

बहुत दूर जाकर वे श्री अरनाथ तीर्थंकर के चैत्यालय में ठहर गये। प्रजाजन भी रात्रि में चैत्यालय के बाहर सो गये।
रात्रि को जब सब सो रहे थे तो चल दिये चुपचाप तीनों। प्रभात होने से पहले पहल बहुत दूर निकल गये। निराश होकर प्रजा के लोग अयोध्या को लौट गये।
और उधर सभी लोगों ने व रानियों ने दशरथ को बहुत समझाया परन्तु भरत का राज्याभिषेक करके उन्होंने मुनि दीक्षा ले ही ली।
महलों में रानियाँ रह तो रही थीं परन्तु उनके दुःख का पारावार नहीं था। पति मुनि बन गये, राम, लक्ष्मण, सीता वन को चले गये, भरत राज्य करते हुए भी उदासीन रहने लगे।
कैकेई को तो बहुत ही अधिक दुःख था क्योंकि वह समझती थी कि यह सब उसके कारण ही हुआ है।

एक दिन कैकेई ने भरत से कहा कि राम लक्ष्मण के बिना अयोध्या सूनी हो गई, कौशल्या व सुमित्रा का बुरा हाल है, अतः तुम शीघ्र जाकर राम, लक्ष्मण, सीता को वापिस ले आओ और मैं भी तुम्हारे पीछे पीछे शीघ्र ही आ रही हूँ।
भरत माँ की आज्ञानुसार खोजते खोजते पहुँच गये राम के पास। घोड़े से उतरे, उन्हें प्रणाम किया, और अयोध्या लौट कर राज्य संभालने के लिए प्रार्थना की। पीछे पीछे कैकेई भी पहुँच गई।
उसने भी राम को अयोध्या लौटने के लिए बहुत कहा, परन्तु राम ने यही समझाया हमारा इस समय अयोध्या लौटना ठीक नहीं है, इससे पिता जी की आज्ञा का उल्लंघन होगा और मैं सदा के लिये तो नहीं जा रहा हूँ, तुम निश्चिन्त रहो, मैं बहुत शीघ्र ही लौट कर आ जाऊँगा।"
राम ने भरत का राज्य तिलक किया और गले से लगा लिया। विवश भरत को लौटना पड़ा।
परन्तु भरत ने यह प्रतिज्ञा कर ली कि राम के अयोध्या लौटने ही मैं मुनि दीक्षा अवश्य ले लूँगा।

ऐसे थे भरत—घर में भी वैरागी।
ऐसे थे राम—पिता की आज्ञा के सामने राज्य को भी ठुकराने वाले।

8. राम द्वारा वज्रकरण की रक्षा

वनों में घूमते घूमते राम उज्ज्वनी नगरी पहुँच गये नगर बहुत सुन्दर था परन्तु बिल्कुल उजाड़। पता करने पर मालूम हुआ कि इस नगरी का राजा सिंहोदर था। उसके अधीन था दशाणपुर का राजा वज्रकरण।
आधीन होने के कारण वज्रकरण सिंहोदर को नमस्कार किया करता था। परन्तु उसने प्रतिज्ञा ले रखी थी कि मैं जिनेंद्र देव, निर्ग्रन्थ मुनि व जिनवाणी के अतिरिक्त किसी को नमस्कार नहीं करूँगा। इसलिए उसने अपनी अंगूठी में श्री मुनिसुव्रत नाथ भगवान् की प्रतिमा जड़वा रखी थी। इस प्रकार जब उसे सिंहोदर को नमस्कार करना पड़ता था तो वह ऊपर से तो सिंहोदर को नमस्कार करता हुआ दिखाई देता था परन्तु वास्तव में वह नमस्कार करता था अपनी अंगूठी में स्थापित जिनेंद्र देव की प्रतिमा को।
किसी ने राजा सिंहोदर से उसकी शिकायत कर दी। सिंहोदर ने वज्रकरण का नगर उजाड़ दिया। और जिस किले में वज्रकरण बैठा था उसकी सेना ने उसे घेर लिया। सिंहोदर ने उससे कहलवाया कि आकर हमें नमस्कार करो।
परन्तु वज्रकरण इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
इधर लक्ष्मण भोजन सामग्री लेने के लिए दशाणपुर पहुँचे। किले में बैठे वज्रकरण ने उन्हें देखा, उनसे प्रभावित हुआ, उन्हें अपने पास बुलवाया और उनके साथ अपने सेवकों द्वारा भोजन सामग्री राम के पास भिजवाई।

राम बड़े प्रसन्न हुए। वज्रकरण को धर्मात्मा समझकर लक्ष्मण को आज्ञा दी कि जिस तरह से भी हो वज्रकरण की रक्षा होनी चाहिए।
आज्ञानुसार युद्ध के लिए चल पड़े, सिंहोदर से युद्ध हुआ, सिंहोदर को हरा दिया। उसे बांध कर राम के पास ले आये। राम ने सिंहोदर व वज्रकरण में संधि करा दी और वज्रकरण का राज्य उसे वापिस दिलवा दिया।
ऐसा था वज्रकरण—प्रतिज्ञापालन में दृढ़।
ऐसे थे राम—पर-उपकारी।

9. “राम द्वारा देशभूषण, कुलभूषण मुनियों का उपसर्ग दूर करना।”

चलते चलते राम, लक्ष्मण, सीता वंशस्थल नगर में पहुँचे। उसी नगर के पास वंशधर नाम का पर्वत था। राम ने देखा कि रात्रि प्रारम्भ होने पर वहाँ के लोग डर कर भागे जा रहे हैं। राम के पूछने पर पता चला कि तीन दिन से इस पर्वत पर बड़ा भयंकर शब्द होता है और भूत प्रेतादिक की डरावनी आकृतियाँ दिखाई देती हैं। इसलिए सब लोग रात्रि को शहर छोड़कर बहुत दूर चले जाते हैं और प्रातः होते फिर उस नगर में आ जाते हैं।

सीता बड़ी डरी। उसने राम से कहा कि हमें भी यहां से कहीं दूर चले जाना चाहिये। तब राम ने कहा कि डरने की कोई बात नहीं है। हम आज रात्रि को इस पर्वत पर ही रह कर देखेंगे कि बात क्या है।
पर्वत पर देखा तो मुनि देशभूषण कुलभूषण खड़े हुए तपस्या कर रहे हैं। कुछ देर बाद अग्निरूप नाम का असुर जो पूर्व भव में उन मुनियों का बैरी था, आया। उन मुनियों को कष्ट देने

लगा। अपनी माया से मुनियों के शरीर से सर्प विषुव आदि लपेटता दिये, अग्नि बरसाई, रक्त की वर्षा की, भयंकर भूत पिशाच आदि से भयंकर शब्द कराये, जिससे भूकंप सा आ गया, पर्वत काँपने लगा। परन्तु मुनि अपने ध्यान से न हिले।
तब राम लक्ष्मण ने अपने धनुष बाण सँभाल लिये, सर्पों आदि को हटाया, और असुर के उपद्रव से मुनियों की रक्षा करने लगे। असुर इन्हें बलभद्र नारायण जानकर वहाँ से अपनी जान बचाकर भाग गया। मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और उन दोनों मुनियों को केवलज्ञान हो गया।
केवलज्ञान होने पर उनकी दिव्य ध्वनि में विस्तार से दोनों मुनियों के पूर्व भवों का वर्णन, असुर का उनसे बैर का कारण आदि सब वृत्तान्त बताया गया। यह भी बताया गया कि इस भव में एक बार कुलभूषण व देशभूषण दोनों भाई जब विद्याभ्यास करके अपने नगर लौटे तो झरोखे में बैठी कमलोत्सुका को देखकर मोहित हो गये। परन्तु तत्काल ही जब उन्हें पता चला कि यह तो उनकी बहिन ही है तो उन्होंने अपने को बहुत धिक्कारा और घर बार छोड़ कर मुनि दीक्षा ले ली।
इन दोनों मुनियों के पूर्व भव के पिता का जीव जो मर कर गरुड़ेन्द्र हुआ था, वह भी वहाँ बैठा सब सुन रहा था। वह राम से बोला—तुमने मुनियों की सेवा की है, उनका उपसर्ग दूर किया, इससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ। जो चाहो माँग लो। तब राम ने कहा—जब आवश्यकता होगी तब आपको स्मरण करेंगे।
ऐसे थे राम—मुनि सेवा में तत्पर।
ऐसे थे राम—निडर, वीर, निष्पूही।

10. “राम व जटायु पक्षी”

कुछ दिन वंशधर पर्वत पर रहने के पश्चात् राम, लक्ष्मण, सीता वहाँ से चल दिये और जाकर दण्डक वन में ठहर गये।

11. ‘राक्षस वंश में रावण’

इक्ष्वाकुवंश, सोमवंश व हरिवंश की भाँति एक विद्याधर वंश भी था। इस वंश के मनुष्य नाना प्रकार की विद्याओं से विभूषित थे। उनके पास विमान तथा अद्भुत शस्त्रास्त्र थे। ये भूमिगोचरियों को हीन दृष्टि से देखते थे।

इन्हीं विद्याधरों में राजा मेघवाहन के वंश में रावण नाम का प्रसिद्ध राजा हुआ। उसकी मनोवेगा रानी से ‘राक्षस’ नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। उसी के नाम से उसके वंश वाले ‘राक्षस वंशी’ कहलाने लगे। ये राक्षस नहीं थे परन्तु विद्याओं से सम्पन्न मनुष्य ही थे। इस वंश में बहुत से राजा मुनि बने, बहुत से स्वर्ग गये, बहुत से मोक्ष भी गये परन्तु कुछ नर्क में भी गये।

इसी राक्षसवंश में लंका के राजा रत्नश्रवा की रानी केकसी के एक पुत्र हुआ—बड़ा सुन्दर, व बलवान। जन्म के प्रथम दिन ही नवजात बालक ने एक पक्षी ही रखे रत्नहार को पकड़कर अपनी ओर खींच लिया। यह रत्नहार इसके पूर्वजों को इन्द्र ने दिया था व इस हार की रक्षा हजारों नाग कुमार देव किया करते थे। उस हार में नौ रत्न लगे हुए थे। जब उस बालक ने वह हार उठा लिया तो उस हार के नौ रत्नों में बालक के नौ मुख दिखाई देने लगे। इसलिये बालक का नाम दशानन (दस मुख वाला) रखा गया।

कुछ समय पश्चात् केकसी के कुम्भकर्ण नाम का दूसरा बालक पैदा हुआ, फिर पुत्री चन्द्रनखा हुई और फिर विभीषण नाम का पुत्र हुआ।

चन्द्रनखा का विवाह खरदूषण से हुआ। इनके दो पुत्र हुए—संमुख और सुन्दर। पिता के मना करने पर भी एक दिन संमुख सूर्यहास खड्ग सिद्ध करने के लिए दण्डक वन में पहुँच गया। एक वस्त्र पहन कर संमुख बाँसों के झुरमुट में बैठ गया, ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया, दिन में एक बार एक ही अन्न का भोजन करने का नियम साधकर साधना करने लगा।

चन्द्रनखा प्रतिदिन आती और अपने पुत्र संमुख को भोजन दे जाती। 12 वर्ष बाद जब एक दिन चन्द्रनखा भोजन लेकर आई तो सुगंधियुक्त सूर्यहास खड्ग को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई कि अब तो संमुख को खड्ग सिद्ध हो ही जायगा।

परन्तु होनहार को कौन टाल सकता है। लक्ष्मण उधर से जा रहे थे, उन्हें अनुपम सुगन्ध आई। उस ओर बढ़े, खड्ग देखी, पकड़ ली, और कौतूहलवश बाँसों के बीड़े पर ही चला कर देखने लगे। तलवार के चलने से अन्दर बैठे संमुख की गर्दन कटकर गिर पड़ी। खड्ग के रक्षक देवों ने आकर लक्ष्मण को प्रणाम किया और कहा आज से हम आपके सेवक हैं।

खड्ग को लेकर लक्ष्मण राम के पास आ गये, सब कुछ बतला दिया। राम ने कहा—अच्छा नहीं हुआ।

यह है भाग्य का खेल—विद्यासाधन करें कोई, प्राप्ति हो किसी और को।

ऐसे थे पुण्यशाली—लक्ष्मण।

12. ‘सीता-हरण’

दूसरे दिन चन्द्रनखा ने जब देखा कि उसके पुत्र का सिर कटा पड़ा है और वह खड्ग भी वहाँ नहीं है तो मूर्छित होकर गिर पड़ी। होश आया, पुत्र के मारने वाले को खोजने लगी।

खोजते खोजते पहुँच गई जहाँ राम लक्ष्मण सीता बैठे थे। राम लक्ष्मण के सुन्दर रूप को देखकर उन पर मोहित हो गई। अपने पुत्र के मरण के शोक को भी भूल गई। जब राम लक्ष्मण को विचलित न कर सकी तो अपने नाखूनों से अपने चेहरे को नोच डाला, अपने कपड़े फाड़ लिए और रोते हुए अपने पति खरदूषण के पास पहुँची। पहुँच गई।

13. “रावण-चरित्रवान”

पाँच-छः पंक्तियाँ नहीं दिख रही हैं।

पति के पूछने पर वह कहा कि जिसने हमारे पुत्र को मारा वही मेरे साथ कुकर्म भी करना चाहता था। बड़ी कठिनाई से मैं अपनी रक्षा कर पाई। उसी ने मेरी यह दुर्दशा बनाई है। सुनकर खरदूषण को बहुत क्रोध आया। मंत्रियों से सलाह की, राम लक्ष्मण से युद्ध करना निश्चित हुआ। सहायता के लिये अपने साले रावण को बुला भेजा।

इससे पहले रावण आर्य स्वयं युद्ध के लिए चल पड़ा। राम लक्ष्मण भी युद्ध के लिए तैयार हो गए। लक्ष्मण ने राम से कहा—आप भाभी सीता के पास रहो। मैं युद्ध के लिए जाता हूँ। अगर आवश्यकता पड़ी तो मैं सिंहनाद करके आपको बुला लूँगा।

उधर से रावण युद्ध के लिए आ रहा था। मार्ग में सीता को देखा उसके रूप पर मोहित हो गया। यह स्त्री मुझे मिलनी चाहिये इसके लिए उपाय सोचने लगा।

रावण ने अपनी विद्या के बल से कुछ-कुछ ज्ञान लिया। कपट से झूठा सिंहनाद किया जिसमें कहा ‘हे राम मुझे बचाओ। हे राम मुझे बचाओ।’

सिंहनाद के शब्द सुनकर राम ने जाना लक्ष्मण संकट में है। सीता जटायु पक्षी की देख-रेख में छोड़कर लक्ष्मण की सहायता के लिए युद्ध स्थल पहुँच गए।

इधर रावण आया, सीता को उठा लिया, और चलने लगा। जटायु पक्षी ने रावण पर झपट्टा मारकर सीता को छुड़ाना चाहा। परन्तु रावण की एक चपेट में ही पृथ्वी पर गिर पड़ा।

रावण सीता को पुष्पक विमान में बैठा कर लंका को उड़ चला।

यद्यपि रावण ऐसे कार्य को अत्यन्त घृणित समझता था फिर भी काम वासना के वशीभूत होकर वह विवेक शून्य हो गया, अच्छे बुरे का ज्ञान खो बैठा।

देखो काम की प्रबलता — चन्द्रनखा ने क्या क्या किया।
— रावण ने सीता का हरण किया।

रावण ने सीता का हरण किया, इससे ही उसके चरित्र को आंकना ठीक नहीं है।

रावण चरित्रवान था। उसने कभी भी परस्त्री को इच्छा नहीं की। जब रावण इन्द्र पर चढ़ाई के लिए जा रहा था तो दुर्लभपुर नगर मार्ग में पड़ा। इन्द्र ने उस नगर के राजा के लिए नलकुबेर को नियुक्त कर रखा था। यह नगर चारों ओर मायामई कोट से घिरा था जिस कारण उसमें प्रवेश पाना असम्भव था। नलकुबेर की पत्नी रम्भा उसमें प्रवेश पाने की विद्या जानती थी। उसने रावण के रूप, बल, गुण आदि की प्रशंसा सुन रखी थी जिस कारण वह रावण पर आसक्त थी।

रम्भा ने गुप्त रूप से रावण के पास संदेश भिजवा दिया कि वह उसको जी जान से चाहती है। रावण ने कोट में प्रवेश पाने का यही उपाय समझकर रम्भा से कहला दिया कि तुम्हारी इच्छा नगर में आकर महलों में पूरी करूँगा। इस रम्भा ने नगर प्रवेश की विद्या दे दी।

रावण नगर में प्रवेश कर गया। युद्ध में नलकुबेर को जीत कर बंदी बना लिया। रम्भा के पास पहुँचा। उसने रावण ने कहा—माँ, तुमने मुझे विद्या दी है इसलिए तुम मेरे गुरुनी हो और गुरुनी माँ के समान होती है। परपुरुष की इच्छा करना पाप है। मैं तुम्हारे पति नलकुबेर को मुक्त करता हूँ। तुम उसी में संतुष्ट रहो। इतना ऊँचा था रावण का चरित्र।

एक बार रावण ने अनन्तवीर्य केवली के निकट यह व्रत लिया था—जो परनारी मुझे न इच्छा उसे मैं जबरदस्ती न सेऊँ। इस प्रतिज्ञा को उसने अनन्त समय तक पूर्ण तरह निभाया। सीता को हर कर तो ले लिया परन्तु उससे जबरदस्ती नहीं की। सन्देह नहीं प्रयत्न किया कि सीता प्रसन्न हो जाये। परन्तु सीता ने उसे नहीं चाहा इसलिए सीता का शील सुरक्षित रहा।

ऐसा था रावण—चरित्र का पक्का।
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14. “राम का विलाप”

रण-भूमि में जब लक्ष्मण ने देखा कि राम आये हैं तो उसने पूछा “क्यों आये?”। राम ने उत्तर दिया—“तुम्हीं ने तो सिंहनाद किया था।” लक्ष्मण ने कहा—“मैंने तो सिंहनाद नहीं किया।”

ऐसा सुनना था राम समझ गये धोखा हुआ। फौरन वापिस लौट गये। जाकर देखा वहाँ सीता नहीं थी। इधर-उधर ढूंढ़ा पर कहीं नहीं मिली। तड़फ उठे, रोने लगे, मूर्छित होकर गिर पड़े। होश आने पर फिर ढूँढ़ने लगे।

इतने में टूटफूट पड़ी जटायु पक्षी पर। कराह रहा था बेचारा मरने के बिलकुल निकट था। झट से राम बैठ गये उसके पास, णमोकार मंत्र सुनाया, सुनते सुनते जटायु के प्राण निकल गये। शुभ परिणामों से मरकर चौथे स्वर्ग में देव हुआ।

चित्र में राम और लक्ष्मण जटायु के पास बैठे हैं। जटायु घायल है और राम उसे णमोकार मंत्र सुना रहे हैं।

जटायु के मर जाने से राम को और भी अधिक दुख हुआ। फिर मूर्छित होकर गिर पड़े फिर जब होश आया तो विलाप करने लगे। पशु पक्षियों से पूछने लगे—तुमने कहीं सीता देखी? वृक्षों से कहने लगे—तुम्हें यदि सीता का पता हो तो क्यों बता दो सीता कहाँ है? जब कोई उत्तर नहीं मिला तो फिर विलाप करने लगे। कभी इधर जायें, कभी उधर जायें, घोर विलाप ऐसा मोह था उन्हें सीता से।

यह है मोह की महिमा—महापुरुष को भी विकल बना दिया।
ऐसे वे कर्तव्यपरायण राम—दुखी होते हुए भी जटायु का समाधिमरण कराया।

15. “वानरवंशियों में बाली मुनि”

एक बार लंका के राजा श्रीतिधवल ने अपने बहनोई श्रीफैल को वानरद्वीप दिया था ताकि वहाँ
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भयंकर शत्रुओं से वह अपनी रक्षा कर सके। इस द्वीप में वानर (बन्दर) बहुत थे राजा तथा प्रजा सभी बन्दरों से अपना समाजरंजन किया करते थे।

इसी वंश में आगे चलकर अमरप्रभ राजा ने अपनी ध्वजा, मुकुट, छत्र तथा द्वारों पर वानरों के चिन्ह बनवाने प्रारम्भ कर दिये। तब से सभी नगरवासी बन्दरों को आदर की दृष्टि से देखने लगे। इसीलिये इस वंश का नाम वानरवंशी पड़ गया। वानरवंशी भी राक्षसवंशियों की तरह विद्याओं से विभूषित मनुष्य ही थे।

वानरवंशियों में किष्किंधापुर का राजा सूर्यरज हुआ। राक्षसवंशी राजा रावण से उसकी बड़ी मित्रता थी। उसके दो पुत्र—बाली व सुग्रीव।

बाली बड़ा धर्मात्मा था। उसकी प्रतिज्ञा थी कि वीतरागी देव, अहिंसा धर्म के प्रतिपादक शास्त्र, और निर्मन्थ गुरु के अतिरिक्त किसी को नमस्कार नहीं करूँगा। अतः वह रावण के दरबार में भी नहीं जाया करता था क्योंकि वहाँ जाकर रावण को नमस्कार करना पड़ता। रावण को इस बात पर क्रोध आया। बाली से कहलवाया—या तो मुझे नमस्कार करो अथवा युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। बाली ने नमस्कार करना तो स्वीकार नहीं किया, हाँ युद्ध के लिए तैयार हो गया। मंत्रियों के समझाने पर कि युद्ध में हिंसा होगी उसने युद्ध का भी विचार छोड़कर मुनि दीक्षा ग्रहण कर ली।

चित्र में बाली मुनि ध्यान कर रहे हैं और रावण रथ पर बैठा है।

एक दिन बाली मुनि कैलाश पर्वत पर तपस्या कर रहे थे। रावण पुष्पक विमान में बैठा लंका जा रहा था। जब विमान मुनि के ऊपर आया। तो विमान रुक गया। रावण नीचे उतरा, बाली मुनि को देखकर क्रोधित हुआ, विद्या के बल से पर्वत के नीचे घुसकर पर्वत को उठाने लगा। चारों ओर हाहाकार मच गया। पर्वत पर रहने वाले मनुष्य, पशु भयभीत होकर भागने लगे।
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16. ‘राम की सुग्रीव से मित्रता’

शालि मुनि ने अवधिज्ञान द्वारा विचार किया कि यह काम रावण का है और इस कार्य से पतन बनने मन्दिर आदि सब नष्ट हो जायेंगे। अतः उन्होंने अपने पैर का अंगूठा ज़रा दबा दिया, जिससे रावण दब गया और वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। सभी से उसका नाम रावण पड़ा रावण की रानियों ने मुनिराज से पति के प्राणों की भिक्षा माँगी। शालि मुनि ने दया करके अंगूठा ढीला कर दिया। रावण उनके चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगा।
फिर रावण चैत्यालय में गया, भगवान् की पूजा की, अपनी भुजाओं से आने निरालम्कर वीणा की तरह उन्हें बजाकर भगवान् की स्तुति में तल्लीन हो गया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर धरणेन्द्र आया और उसके न सामने पर भी उसे ‘शक्ति’ प्रदान की जिसका प्रहार अचूक होता था।
शालि मुनि ने घोर तपस्या की जिसके फलस्वरूप उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
ऐसे होते हैं दिगम्बर जैन मुनि—महाशक्तिशाली।
ऐसे होते हैं दिगम्बर जैन मुनि—महादयावान।

बाली के दीक्षा लेने पर छोटे भाई सुग्रीव को राज्य मिला। उसने अपनी बाहन श्री प्रभा का विवाह रावण के साथ करने के लिए स्वीकृति दे दी।
एक बार साहसगति मुनि के विद्याधर ने सुग्रीव की पत्नी सुतारा को देखा, देखकर उस मोहित हो गया। उसने विद्याबल से सुग्रीव का रूप बनाया और जिस समय सुग्रीव महलों में नहीं था, सुतारा के महल में पहुँच कर वहाँ रहने लगा।
सहस्रवर्मा व वानरवासियों में मित्रता थी। अतः अपनी स्त्री को साहसगति से छुड़ाने के लिए सुग्रीव खरदूषण व सहायता के लेने के लिए चल पड़ा। परन्तु पता चला कि खरदूषण को तो

लक्ष्मण ने मार गिराया है और रावण ने राम सीता का अपहरण कर लिया है। फिर सुग्रीव सहायता के लिये हनुमान् के पास गया परन्तु वह भी कुछ न कर सका।
तब सुग्रीव निराश होकर अपने मित्र विभीषण के माध्यम से राम लक्ष्मण की शरण में पहुँच गया। पत्नी वियोग से परेशान राम ने उसकी परेशानी का समझा और उसकी सहायता करने का निश्चय कर लिया।
लक्ष्मण ने असली सुग्रीव को अपने पास रखा और नाम नकली सुग्रीव से लड़ने के लिये पहुँच गये ताकि दोनों को आमने-सामने देखकर भ्रम न हो जाये कि असली कौन है और नकली कौन ? राम को देखकर साहसगति को वैरागी विद्या भाग गई और वह अपने असली रूप में आ गया। राम ने तीक्ष्ण बाणों से साहसगति को मार गिराया और सुतारा सुग्रीव को दिला दी।
सुग्रीव ने राम से प्रतिज्ञा की कि मैं सीता का पता अवश्य लगाऊँगा। पता लगाने के लिए चारों ओर दूत भेजे गये व वह स्वयं भी खोज के लिए निकल पड़ा। खोजते खोजते रत्नजटी नाम के एक व्यक्ति से भेंट हो गई। रत्नजटी ने सुग्रीव को बताया कि उसने देखा था कि रावण विमान में बैठकर सीता को ले जा रहा है। वह सीता ‘हाय राम, हाय लक्ष्मण, हाय भाई भामण्डल’ चिल्लाने ही चली जा रही है। और जब उसने रावण से सीता को छुड़ाने का प्रयत्न किया तो रावण ने उसकी सब विद्यायें नष्ट कर दी जिससे वह पृथ्वी पर आकर गिर पड़ा।
सुग्रीव समझ बुझाकर रत्नजटी को राम के पास ले आया। राम को सीता का पता मिल गया, राम बड़े प्रसन्न हुए रत्नजटी को पुरस्कार दिया व उसे उसका राज्य वापिस दिलाने का भी आश्वासन दिया।
ऐसे थे परोपकारी राम—दूसरों का दुख पहले, अपना दुख बाद में।

17. ‘सती सीता लंका में’

रावण सीता को लंका में ले गया। उसको राजी करने का बहुत प्रयत्न किया। तरह तरह के प्रलोभन दिये। तुमसे पटरानी बना दूँगा। ऐश करोगी मेरे महलों में। बस राम का ध्यान छोड़कर मेरी हो जाओ।
वह कहकर ज्यों ही सीता की ओर हाथ बढ़ाया, सीता क्रोध में भरकर बोली—‘पापी! खबरदार, जो मुझे छुआ। इस पाप से तू नरक में पडेगा। यदि मुझे स्पर्श किया तो मेरे शीत के प्रताप से तू अभी भस्म हो जायेगा।’
रावण मन मसोस कर रह गया। फिर रावण ने अपनी माया से सर्प आदि अत्यन्त भयानक जीव दिखाकर सीता को डराना चाहा परन्तु सीता रावण की शरण में नहीं आई, नहीं आई।
रावण जबरदस्ती कर नहीं सकता था क्यों कि उसने भगवान् के सामने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जब तक कोई स्त्री राजी नहीं होगी मैं उसके साथ जबरदस्ती नहीं करूँगा। यही नियम था जिसने उसे भ्रष्ट होने से बचा लिया।
सीता को रावण ने देवांगण नामक उपवन में ठहरा दिया। चारों ओर पहरा लगा दिया। उसको प्रसन्न करने के लिए दूतियों को रख दिया। इतना ही नहीं अपनी पटरानी मंदोदरी को भी कह दिया कि यदि तुझे जीवित देखना चाहती हो तो किसी प्रकार भी सीता को मेरी पटरानी बनने के लिए तैयार कर दो।
मंदोदरी ने रावण को बहुत समझाया कि यह बड़ा भारी पाप है। तुम्हें यह शोभा नहीं देता। इससे मुँह मोड़ा। भाई विभीषण ने भी रामझाने में कोई कसर न छोड़ी, परन्तु रावण टस से मस नहीं हुआ। कहा भी ही। ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’।

बेचारी सीता उपवन में रहने लगी। निरन्तर राम के ध्यान में मग्न। सब में खूब फुसलाया, परन्तु सीता अड़ी रही। यहां तक कि उसने प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक उसे राम का समाचार नहीं मिल जायेगा, तब तक वह अन्न जल ग्रहण नहीं करेगी।
ऐसी थी सीता—सती शिरोमणि।
ऐसी होती है प्रतिज्ञा—भ्रष्ट होने से बच गया रावण।

18. ‘हनुमान् का लंका को प्रस्थान’

‘लंका कितनी दूर है, दृष्ट रावण कौन है ?’ विद्याधरों के बीच बैठे हुए राम ने जब यह प्रश्न किया तो सब विद्याधर युद्ध की आशंका से डर गये। रावण बहुत बलवान है वह किसी से जीता नहीं जा सकता, ऐसा सुनकर भी राम हिम्मत नहीं हारे, दृढ़ निश्चय कर ही लिया कि रावण को जीतना है, सीता को वापिस लाना है। लक्ष्मण ने भी कहा—‘हम देखेंगे उस पापी रावण को।’
इस पर उनमें से एक विद्याधर जामवंत बोला कि ऐसा सुना है कि रावण की मृत्यु उसी के द्वारा होगी जो अपने पराक्रम से कोटिशिला को उठा लेगा। लक्ष्मण हंस बोल उठे—‘कोटिशिला को मैं उठाऊँगा।’
परीक्षा करने के लिए सुग्रीव, विभीषण, नल, नील आदि राम लक्ष्मण को विमान में बिठाकर कोटिशिला के पास ले गये। कोटिशिला देवताओं से भी पूजित है। लक्ष्मण ने सिद्ध भगवान् का प्रणाम किया, उस शिला की पूजा की और सबके देखते देखते घुटनों तक उसे उठा लिया। निश्चित हो गया कि लक्ष्मण नारायण है और उसी के द्वारा रावण का वध होगा।
बस राम ने आज्ञा दी कि युद्ध की तैयारी करो। लंका पर चढ़ाई करो। और सीता को छुड़ा कर ले आओ। तब विराधित ने कहा—'यदि रावण को समझा बुझा कर सीता को वापिस ले आयें तो
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कथा-चित्र

आपको कोई आपत्ति तो नहीं है। राम ने यही कहा—‘मुझे तो सीता से प्रयोजन है, युद्ध से बिल्कुल नहीं।’

बहुत विचार विमर्श के बाद यह तय हुआ कि रावण को समझाने के लिए पवनजय व अंजना के पुत्र हनुमान् को ही लंका भेजा जाये, क्योंकि हनुमान् रावण के बहनोई खरदूषण का दामाद है। वह हनुमान् की दूसरी पत्नी सुग्रीव की पुत्री है। फल स्वरूप हनुमान् को सीता की खबर लाने के लिये व रावण को समझाने के लिए लंका भेजा गया।

जब हनुमान् लंका को जाने लगे तो राम ने कहा—‘तुम सीता से जाकर कहना कि राम तुम्हारे बिना बहुत दुखी हैं, न खाते हैं, न पीते हैं परेशान हो इधर उधर घूमते फिरते रहते हैं। बहुत जल्दी ही हम तुम्हें छुड़ा कर ले आयेंगे।’ सीता को विश्वास हो जाये कि राम ने ही उन्हें भेजा है इसके लिए राम ने अपनी अंगूठी उनके दे दी और जीवन की कुछ गुप्त घटनायें भी बतलाईं जिन्हें राम व सीता के अतिरिक्त कोई नहीं जानता था। राम ने यह भी कहा कि लौटते समय सीता से उसकी कोई निशानी अवश्य लेते आना।

ऐसे थे लक्ष्मण—शक्तिशाली, नारायण।
ऐसे थे राम—सीता से ही सरोकार, युद्ध से नहीं।

19. “हनुमान् का लंका-प्रवेश”

हनुमान् चल दिया लंका की ओर। देखा लंका के चारों ओर एक बहुत मजबूत कोट बना हुआ है। हनुमान् ने अपनी विद्या के बल से उस कोट को लाँघ दिया और लंका में पहुँच गया।

पहले वह विभीषण से मिला और उससे कहा कि रावण को समझाकर सीता को वापिस कर दो। विभीषण ने कहा—'मैंने रावण को बहुत समझाया परन्तु वह माना ही नहीं। आपके कहने से मैं

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20. “राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण के शक्ति लगना”

राम-लक्ष्मण का ऐलान हो गया—‘लंका पर चढ़ाई करने की तैयारी करो।’ बस लंका को कूच कर दिया गया मार्ग में अनेक राजाओं को जीतते हुए लंका पहुँच गये।

रावण सेना राम की सेना से जा पहुँची है। लंका में भी रण-भेरी बजा दी गई। रावण को युद्ध के लिए तैयार देखकर भाई विभीषण ने एक बार फिर समझाया—अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। राम को सीता दे दो और सुख से रहो। बेकार में सेना का विध्वंस कराने से क्या लाभ है। इस पर रावण का पुत्र इन्द्रजीत बहुत बिगड़ा—‘अगर आपको भय लगता है। तो घर बैठिये।’ विभीषण ने इन्द्रजीत को भी समझाया पर वह जन्म-शराप बकता ही रहा। रावण को भी क्रोध आ गया। उसने विभीषण को कह ही डाला—जा, दुष्ट, लंका से निकल जा। बस विभीषण अपनी पूरी सेना के साथ राम से जा मिला। राम ने भी उसे वचन दे दिया कि युद्ध में जीत होने पर लंका का राज्य तुम्हें ही दूँगा।

भामण्डल—सीता का भाई भी अपनी सेना लेकर राम से आ मिला। इतने लोगों के मिलने पर भी राम की सेना अब भी रावण की सेना से आधी ही थी।

राम की ओर से—नल, नील, सुग्रीव, हनुमान्, विभीषण, विराधित, भामण्डल, समुद्र, अंगद आदि आदि और रावण के पक्ष में थे—हस्त, प्रहस्त, मारीच, माली, जम्बुमाली, कुम्भकर्ण, इन्द्रजीत, मेघवाहन आदि। हाथी, घोड़े, रथ, पियादे सभी कुछ थे दोनों ओर। अग्निवर्षाण, मेघवर्षाण, तामसवर्षाण, नागफास आदि का खुलकर प्रयोग किया गया दोनों ही ओर से युद्ध भूमि खून से लथ-पथ हो गई। चारों ओर मारो-मारो, पकड़ो-पकड़ो की आवाजें आने लगीं कभी रावण पक्ष की जीत होती तो कभी राम पक्ष विजयी होता। भयंकर युद्ध, मृत्यु का तांडव नृत्य।

हस्त व प्रहस्त को राम के योद्धा नल व नील ने मार गिराया कुम्भकरण ने अपनी माया से

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हनुमान्, अंगद, भामण्डल आदि को लेशमात्र कर दिया। तब सुग्रीव ने अपनी प्रतिबोधिनी विद्या से वध की निद्रा दूर कर दी।

इन्द्रजीत युद्ध में कूदा। उसने सुग्रीव के अनेकों योद्धाओं को घायल करके भूमि पर गिरा दिया। तब सुग्रीव व भामण्डल इन्द्रजीत से युद्ध करने लगे। इन्द्रजीत ने दोनों को नागपाश से बांध लिया। कुम्भकरण ने हनुमान् को पकड़ लिया। यह देखकर सुग्रीव का पुत्र अंगद झट छिपे छिपे कुम्भकर्ण के पास पहुँच गया, उसकी भुजा से निकालकर अंगद के विमान में बैठ कर उड़ गया।

विभीषण इन्द्रजीत व मेघवाहन की ओर बढ़ा। दोनों भाइयों ने उसको अपना चाचा जान उससे युद्ध करना उचित नहीं समझा। जब विभीषण ने भामण्डल व सुग्रीव को बंधा देखा तो वह बहुत दुखी हुआ परन्तु कर ही क्या सकता था।

लक्ष्मण ने राम से कहा कि यदि भामण्डल व सुग्रीव का मरण हो गया तो रावण को हराना कठिन हो जायेगा। राम को चिन्ता हुई। तब राम ने गरुड़ेन्द्र का स्मरण किया जिसने उन्हें देशभूषण कुलभूषण मुनि का उपसर्ग दूर करने पर दिया था। गरुड़ेन्द्र ने चित्तवेग नामक देव को भेजा। उसने राम को सिंहगर्तिनी व लक्ष्मण को गरुड़वाहिनी विद्या दी। साथ में और भी अनेक दिव्य शस्त्र दिये—उत्तमबाण, अग्निवर्षाण, पवनबाण, आदि आदि। इन विद्याओं के बल से राम लक्ष्मण ने भामण्डल व सुग्रीव को नागपाश से छुड़ा लिया।

फिर भामण्डल राक्षसों की सेना पर टूट पड़ा। रावण स्वयं युद्ध के लिये जा पहुँचा। उधर रावण को देखकर विभीषण भी उसके मुकाबले पर आ गया। घोर युद्ध होने लगा। विभीषण ने फिर भी कहा—‘सीता राम को सौंप दो, और आराम से रहो।’ परन्तु रावण ने माना।

उधर लक्ष्मण ने इन्द्रजीत को व राम ने कुम्भकर्ण को नागपाश से बांध लिया। रावण ने विभीषण त्रिशूल चलाया। लक्ष्मण ने अपने बाणों से उसे बीच में ही काट दिये। तब क्रोध में आकर रावण ने घोरघोर द्वारा दी हुई शक्ति लक्ष्मण पर चलाई जिससे लक्ष्मण मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

तब राम ने कहा—‘मेरे भाई लक्ष्मण को शक्ति लग गई है, अब उसका मरण निश्चित है। अब मैं जाता हूँ, उसकी दाह क्रिया करके फिर कल प्रातः युद्ध के लिए आऊँगा।’

युद्ध बन्द कर दिया गया। रावण भी लौट आया। रावण को लक्ष्मण के शक्ति लगने से बेहोश होने पर लो सतोलिया था इन्द्रजीत, मेघवाहन व कुम्भकर्ण को पकड़े जाने का बहुत दुख था।

ऐसा था राम का युद्ध—न्याय पक्ष का।
ऐसा था रावण का युद्ध—अन्याय का, दुर्नीति का।

21. “विशल्या द्वारा शक्ति-निवारण”

राम लक्ष्मण को मूर्छित देख, उनका मरण निश्चय जान स्वयं मूर्च्छित होकर गिर पड़े। जब मूर्च्छा दूर हुई तो लोगों ने समझाया—दुखी मत होओ, लक्ष्मण के शक्ति लगी है, इससे मूर्च्छित हो गये हैं, प्रातः काल तक होश में आ जायेंगे।

इतने में आकाशमार्ग से एक मनुष्य आया उसने लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करने का उपाय बताया कि राजा द्रोणमेघ की पुत्री विशल्या के स्थान के जल को लक्ष्मण के ऊपर छिड़कने से उनकी मूर्च्छा दूर हो जायेगी। फौरन राम ने हनुमान्, भामण्डल, अंगद आदि को विमान द्वारा राजा द्रोणमेघ के पास भेजा जिसने स्वयं विशल्या को ही उनके साथ भेज दिया।

विशल्या को लेकर हनुमान् आदि वीरों रावण यहाँ गये जहाँ लक्ष्मण बेशुद्ध पड़ा था। ज्यों ज्यों विशल्या कटक में पहुँच गई लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होती गई और वह भले चंगे हो गये जितने भी योद्धागण मूर्च्छित पड़े थे, घायल पड़े थे, सभी पर जल छिड़का गया। राम की आज्ञा से रावण के पक्ष के योद्धा कुम्भकर्ण आदि पर भी जल छिड़क कर उन्हें भी स्वस्थ कर दिया गया।

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२२. ‘रावण को बहुरूपिणी विद्या सिद्ध’

विशाल्या ने पूर्व भव में ३००० वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी, अनेक उपवास किये थे, सूखे पत्र, पवित्र जल व आहार लिया करती थी, मरण समय सन्लेखना धारण की थी, एक भी हाथ भूमि से परे न जाऊँ ऐसा नियम किया था। अन्न समय में एक अजगर को अभयदान दिलाया था, जिसके प्रताप से मरकर तीसरे स्वर्ग में देव हुई थी और वहाँ से मर कर राजा द्रोणमेघ की पुत्री विशाल्या हुई थी जिसके स्नान के जल से भयानक से भयानक रोग भी दूर हो जाते थे।

देव-कांपिनी शक्ति जब लक्ष्मण के शरीर में निकलकर भागने लगी, हनुमान् ने पकड़ ली। तब दिव्य स्त्री का रूप उसे अभीष्टविद्या नाम की शक्ति ने हनुमान् को बताया कि हमें तो धरणेन्द्र ने रावण की जिनेंद्रभक्ति से प्रसन्न होकर उसको सौंप दिया था। हम तो जिसके पास रहे उसी ही की सेवा करें। इसमें हमारा कोई दोष नहीं। हनुमान् ने उसे क्षमा करके छोड़ दिया।
इसके पश्चात् विशाल्या का विवाह हो गया।
ऐसे ये राम-युद्ध के समय शत्रु, परन्तु बाद में शत्रु नहीं।
ऐसा है तप का प्रभाव-स्नान जल भी औषधि का काम करे।

रावण ने सुना लक्ष्मण जीवित है, राम पक्ष के सभी योद्धा स्वस्थ हो गये हैं, कुम्भकर्ण, मेघवाहन, इन्द्रजीत अभी बंदी हैं, उसे अपनी विजय में सन्देह होने लगा। राम के पास प्रस्ताव भिजवाया-संधि कर लो, आधी लंका ले लो, अन्य अनेक कन्यायें ले लो, बस सीता मुझे सौंप दो। राम ने यही उत्तर दिया-हमें सीता के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिये, सीता हमें लौटा दो। परन्तु रावण ने न मानी।
रावण ने विचार किया यदि मैं बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर लूँ तो फिर मेरी जीत निश्चित ही है।
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विशाल्या ने पूर्व भव में 3000 वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी, अनेक उपवास किये थे, सूके पत्र, पवित्र जल व आहार लिया करती थी, मरण समय सल्लेखना धारण की थी, एक सौ हाथ भूमि से परे न जाऊँ ऐसा नियम किया था, अन्त समय में एक अजगर को अभयदान दिलाया था, जिसके प्रताप से मरकर तीसरे स्वर्ग में देव हुई थी और वहाँ से मर कर राजा द्रोणमेघ की पुत्री विशल्या हुई थी जिसके स्नान के जल से भयानक से भयानक रोग भी दूर हो जाते थे। देव-रुपिणी शक्ति जब लक्ष्मण के शरीर से निकलकर भागने लगी, हनुमान् ने पकड़ ली। तब दिव्य स्त्री का रूप रखे उस अमोघविजया नाम की शक्ति ने हनुमान् को बताया कि हमें तो धरणेन्द्र ने रावण की जिनेन्द्रभक्ति से प्रसन्न होकर उसको सौंप दिया था। हम तो जिसके पास रहें उसी ही की सेवा करें। इसमें हमारा कोई दोष नहीं। हनुमान् ने उसे क्षमा करके छोड़ दिया। इसके पश्चात् विशल्या का विवाह हो गया।

ऐसा है तप का प्रभाव - स्नान जल भी औषधि का काम करे।

  1. “रावण को बहुरूपिणी विद्या सिद्ध”

रावण ने विचार किया यदि मैं बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर लूं तो फिर मेरी जीत निश्चित ही है। रावण ने मंत्रियों को समझा दिया कि जब तक मैं विद्या साधन करता रहूँ तब तक सब नगरवासी धर्मध्यान में समय बितायें, कोई युद्ध की बात भी न करे, यदि कोई उपद्रव भी करे तो भी शांति बनाये रखें। पटरानी मन्दोदरी को पूजा पाठ का सब आयोजन सौंप, भगवान् शांतिनाथ के चैत्यालय में बैठ, विद्या साधन करने लगा। सब ओर से चित्त हटा लिया, भगवान् की भक्ति में लीन, योगी की तरह निश्चल बैठ, विद्या साधन करने लगा।

राम के कटक में चिन्ता हुई, अगर रावण को बहुरूपिणी विद्या सिद्ध हो गई तो रावण को हराना असम्भव हो जायेगा सबने राम से कहा- ऐसा विघ्न करना चाहिये जिससे रावण का ध्यान विचलित हो जाये और उसे विद्या सिद्ध न हो सके। राम ने कहा- नहीं, हम किसी के धर्म कार्य में बाधा नहीं पहुँचायेंगे भले ही हम हार जायें। राम के मना करने पर भी वानरवंशियोंनिलक्ष्मण की जानकारी में विभीषण आदि की सलाह से रावण की पूजा में विघ्न करने का निश्चय कर ही लिया। लंका में घुस कर उपद्रव किया गया, नगर को लूटा गया, सब ओर हाहाकार मच गया। रावण के मंत्रियों ने विरोध करना चाहा, उनसे लड़ना चाहा, परन्तु रावण की आज्ञा पालन करते हुए मन्दोदरी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। फिर वानरवंशी वहीं पहुँच गये जहाँ रावण बैठा था। नाना प्रकार से रावण को परेशान करने लगे, यहां तक कि रावण के सामने ही रावण की रानियों की दुर्दशा करना आरम्भ कर दिया। परन्तु रावण निश्चल रहा, रंच भी विचलित नहीं हुड़ा। और अन्त में 24 दिन पश्चात् रावण को बहुरूपिणी विद्या सिद्ध हो गई। उसे शक्ति प्राप्त हो गई। अपने जितने चाहे रूप बना ले।

ऐसे थे राम- शत्रु के धर्मसाधन में भी बाधा नहीं।

ऐसा था रावण - धुन का पक्का ।

  1. “लक्ष्मण द्वारा रावण की मृत्यु”

बहुरूपिणी विद्या सिद्ध हो जाने पर रावण एक बार फिर सीता के पास गया। राम लक्ष्मण की मृत्यु अब निश्चित ही है ऐसा भय दिखाकर सीता को फुसलाना चाहा। परन्तु सीता के अटल निश्चिय को देखकर निराश होकर पश्चाताप करने लगा कि तूने बुरा किया। मन्दोदरी आदि ने भी बहुत समझाया परन्तु विनाश काले विपरीत बुद्धि। होनहार टलती नहीं। रावण के सामने सीता अब प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी। अतः पुनः युद्ध के लिये तैयार हो गया। अनेक अपशुकन हुए, परन्तु किसी को परवाह न थी।

युद्ध फिर आरम्भ हुआ। पहले युद्धों से भी भनायक । रावण ने बहुरूपिणी विद्या के बल से 1000 हाथियों से खिंचने वाला एक रथ बनाया, जिसके साथ थे 10000 आप समान श्रेष्ठ विद्याधर । राम सिंहरथ व लक्ष्मण गारुणी रथ पर सवार होकर मुकाबले पर आ डटे ।

दोनों और की सेनाओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया। लाशों के अम्बार लग गये। हाथी और घोड़ों की चीत्कार से युद्ध भूमि गर्जन कर उठी। राजा मय ने राम पर अनेक वाण चलाये परन्तु राम ने उन्हें प्रभावहीन कर दिया। फिर रावण युद्ध में कूद पड़ा। उसे ललकारते हुए लक्ष्मण सामने आ गये। रावण व लक्ष्मण के बीच जलवाण, पवनवाण, अग्निवाण, नागवाण आदि अनेक वाणों से घोर युद्ध हुआ। दस दिन तक घोर युद्ध होता रहा।

रावण ने लक्ष्मण पर विघ्नवाण चलाया। विघ्नवाण का निवारण करने वाला सिद्धवाण लक्ष्मण को याद न आया। चिन्तित होकर आकाश की ओर देखने लगा। आकाश में विद्याधर की 8 पुत्रियां विमान में बैठी लक्ष्मण को देख रही थी क्यों कि वह लक्ष्मण से विवाह करना चाहती थी। उन्होंने लक्ष्मण को देखकर कहा ‘हे नाथ तुम्हारा कार्य सिद्ध हो ।’ ‘सिद्ध’ शब्द सुनकर लक्ष्मण को ‘सिद्धवाण’ याद आ गया और उसने वह वाण चला दिया जिससे विघ्नवाण का प्रभाव दूर हो गया। रावण ने बहुरूपिणी विद्या से अपने अनेक शरीर बना लिये ।

ज्यों ज्यों लक्ष्मण रावण के अनेक सिर व भुजायें छेदता रहा रावण के अनेक सिर व भुजायें बनती रही। परन्तु लक्ष्मण के आगे बहुरूपिणी विद्या का बल न चल सका क्यों कि इस विद्या का प्रभाव चक्रवर्ति व अर्धचक्री (नारायण) के सामने नहीं रहता।

तब रावण ने अन्य दिव्य व सामान्य शस्त्रों का प्रयोग किया परन्तु उनसे भी लक्ष्मण जीता न जा सका। तब रावण ने चक्ररत्न का चिन्तवन किया, झट वह रावण के हाथ में आ गया और रावण ने क्रोध में आकर उसे लक्ष्मण पर चला ही दिया। राम, सुग्रीव, भामण्डल, हनुमान् सभी ने उस चक्र को अपने अपने आयुद्धों से रोकने का भरसक प्रयत्न किया परन्तु रोक न सके। चक्ररत्न लक्ष्मण तक आ ही गया। परन्तु लक्ष्मण पर वार करने की बजाये वह लक्ष्मण की भू प्रदिक्षणा देकर लक्ष्मण के हाथ में आ गया। रावण यह देखकर बड़ा दुखी हुआ, अपने किये पर पछताने लगा, अपनी मृत्यु निश्चित जान अपने को धिक्कारने भी लगा।

रावण यह सोच ही रहा था कि लक्ष्मण ने गरज कर कहा- रावण ! अब भी कुछ नहीं बिगड़ा, अब भी सीता राम को सौंप दे और आराम से लंका का राज्य कर। परन्तु रावण का अहं जाग्रत हो उठा, उसने कह ही डाला - चक्र चला, मैं हारने वाला नहीं। बस लक्ष्मण ने रावण पर चक्र चला ही दिया। चक्र ने रावण के वक्षस्थल को चीर डाला, रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

रावण के मरते ही सेना भागने लगी। राम के आदेश से हनुमान् ने सेना को कहा- आप लोग डरे नहीं, राम की आज्ञा है कि आराम से रहें, आपको कोई कष्ट न होगा।

भई के मरने का विभीषण को बहुत दुख हुआ। मन्दोदरी आदि सभी रानियां आ गई। जोर जोर से विलाप करने लगी। राम ने सबको समझाया, धैर्य बंधाया, वानरवंशियों ने मिलकर चिता सजाई और रावण का दाह संस्कार कर दिया गया।

राम ने कुम्भकर्ण, इन्द्रजीत, मेघवाहन आदि को बंधनमुक्त कर दिया और कहा—अब आप स्वतन्त्र हैं, आनन्द से अपना राज्य संभाले। मैं तो सीता को लेकर यहां से चला जाऊँगा। इसी अवसर पर आचार्य अनन्तवीर्य 5600 मुनियों सहित लंका के कुसुमायुद्ध बन में आकर विराजे। उसी रात्रि को उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई। सब राक्षसवंशी व वानरवंशी विद्याधर इन्द्रजीत, मेघवाहन, कुम्भकर्ण, विभीषण, मन्दोदरी आदि राम लक्ष्मण के साथ केवली भगवान् के दर्शनों को चल दिये। उन्हें नमस्कार किया, धर्मोपदेश सुना, अपने अपने पूर्व भव का वृतान्त जाना, और संसार, शरीर, भोगों से अरुचि हुई। इन्द्रजीत, मेघवाहन, कुम्भकर्ण, मारीच, राजा भय ने अनेक राजाओं के साथ मुनि दीक्षा ग्रहण की। मन्दोदरी आदि अनेक रानियों ने आर्यिका के व्रत अंगीकार किये। घोर तपश्चरण के फल से इन्द्रजीत व मेघवाहन चूलगिरि (बड़वानी) से व कुम्भकर्ण रेवा नदी के तट से मोक्ष गये।

ऐसे थे राम—जीत में भी विनम्र।

ऐसे थे लक्ष्मण—महापुण्यशाली।

ऐसे थे कुम्भकर्ण आदि—कर्मयोद्धाओं को भी पछाड़ने वाले।

  1. “राम-सीता मिलाप”

रावण को युद्ध में जीत, राम हाथी पर बैठ लक्ष्मण, हनुमान् आदि सहित लंका में पधारे। सबसे पहले सीता के पास गये। सीता प्रसन्न हो उठी। बड़े प्यार से रावण के महलों की ओर बढ़े। भगवान् शांतिनाथ के चैत्यालय में भक्तिपूर्वक भगवान् के दर्शन किये, उनका गुणानुवाद किया। विभीषण के निमन्त्रण पर उनके यहां भोजन किया और सुखपूर्वक महलों में रहने लगे। राम के मना करने पर भी विभीषण आदि ने राम-लक्ष्मण का संयुक्त अभिषेक कर ही दिया। राम की आज्ञा से विभीषण लंका का राज्य करने लगा। 6 वर्ष तक राम लक्ष्मण सीता आदि लंका में रहे।

एक दिन नारद अयोध्या पहुँचे। राम की माता कौशल्या को दुखी देखकर उनका समाचार पूछने लगे। कौशल्या ने आदि से अन्त तक सब समाचार सुनाया। फौरन नारद राम से मिलने को लंका को चल दिये।

राम को अयोध्या के सब समाचार सुनाये। कहा—तुम्हारी माता तुम्हारे वियोग में बहुत दुखी हैं। उनका विलाप सुनकर पत्थर दिल भी पिघल जाता है। मालूम नहीं वह तुम्हारे वियोग में कब प्राण त्याग दें। लक्ष्मण की माता जी भी मरण तुल्य हो गई हैं। कैकेई व सुप्रभा भी शोक से व्याकुल हैं। तुम्हारे जैसे आज्ञाकारी व मातृभक्त पुत्रों के होते हुए मातायें कष्ट पावें, देखा नहीं जाता। सुनकर राम बहुत दुखी हुए। माता की याद से बेचैन हो उठे। तब राम ने विभीषण से कहा—हमारी इच्छा अयोध्या जाने की है। विभीषण ने कुछ दिन और रहने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर राम ने 16 दिन वहाँ पर और बिताये परन्तु चित्त माता की ओर ही लगा रहा। माता से बिछुड़े हुए भी बहुत समय हो गया था।

ऐसे थे राम—राज्य से सरोकार नहीं।

ऐसे थे राम—मातृ-भक्त।

  1. “राम अयोध्या में—भरत मुनि बने”

दूतों द्वारा अयोध्या में समाचार भेज दिये गये। माताओं को राम लक्ष्मण सीता के आगमन की सूचना से बड़ी प्रसन्नता हुई। भरत भी फूले नहीं समाये। उनके स्वागत के लिये अयोध्या को खूब सजाया गया ।

पुष्पक विमान में बैठकर राम, लक्ष्मण, सीता विशल्या आदि अनेक विद्याधरों के साथ अयोध्या पहुंच गये। मातायें द्वार पर आ गई। दोनों भाइयों ने माता को प्रणाम किया। सीता, विशल्या आदि रानियों ने सासुओं के चरण स्पर्श किये। भरत तो वैरागी थे ही। राज्य तो किया परन्तु उदासीन रहते हुए यही मन में था कि कब राम लौटकर आये और मैं मुनि बन कर आत्मकल्याण करूँ । राम के आने पर भरत ने यही कहा – भैया अब तुम राज्य संभालो। और मुझे मुनि दीक्षा लेने की आज्ञा दो। यह सुनकर माता कैकेई विलाप करने लगी। राम लक्ष्मण ने भरत को समझाया – अभी तुम्हारी आयु मुनिव्रत पालन करने की नहीं है। अतः अभी राज्य तुम्हीं करो। हम आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे।

परन्तु भरत न माने, घर छोड़कर चलने लगे। लक्ष्मण ने हाथ पकड़ लिया, कैकेई रोने लगी परन्तु भरत तो वैराग्य से ओत-प्रोत थे। उन्होंने जल-क्रीड़ा में कोई रुचि नहीं दिखलाई, न ही किसी पर जल ही डाला। वह सरोवर के किनारे बने जिन मन्दिर में पूजन करने लगे । इतने में त्रैलोक्य मंडन नाम का हाथी बंधन तुड़ाकर अयोध्या में उपद्रव मचाने लगा। राम लक्ष्मण आदि सभी ने उसे वश में करने का प्रयत्न किया। परन्तु वह सबको भयभीत करता हुआ भरत की तरफ बढ़ता गया और भरत को देखकर एक दम शांत हो गया क्योंकि भरत को देखकर उसे अपना पूर्व जन्म याद आ गया जिसमें यह हाथी और भरत का जीव दोनों छठे स्वर्ग में मित्र थे। जब भरत ने उससे पूछा कि तुम्हें क्रोध क्यों आया तो वह हाथी रोने लगा। पश्चाताप करने लगा और विचारने लगा कि ऐसा उपाय करूँ जिससे मेरा आत्म-कल्याण हो ।

जाने वाले को भला कौन रोक सकता है। अयोध्या से बाहर, उद्यान में देशभूषण व कुलभूषण के बाहर भरत आदि दर्शनार्थ वहाँ पहुँचे। केवल भगवान् द्वारा अपने पूर्व भव का वृतान्त सुन भरत का वैराग्य और बढ़ा। वहीं सब प्रकार का परिग्रह त्याग, केशलौंच कर, दिगम्बर मुनि दीक्षा ले ली। फिर भरत ने घोर तपश्चरण किया। फलस्वरूप वह भी कर्मों को काट मुक्त हो गये। श्रावक के व्रत अंगीकार किये।

ऐसे थे भरत—घर में भी वैरागी।

  1. ‘‘राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक और राम राज्य’’

भरत के मुनि दीक्षा लेने के बाद अनेक राजा तथा विद्याधर राम के पास आये। उनसे राज्याभिषेक कराने की प्रार्थना की। श्री राम ने कहा—आप लक्ष्मण के पास गये और राम का संदेश उन्हें सुनाया। लक्ष्मण उन्हें लेकर राम के पास आये और बोले—मैं तो आपका सेवक हूँ, राज्याभिषेक तो आपका ही होना चाहिये। अन्त में यही निश्चत हुआ कि राज्याभिषेक राम लक्ष्मण दोनों का ही होना चाहिये।

राम-लक्ष्मण का एक ही आसन पर बैठाकर राज्याभिषेक कर दिया गया।

लंका विभीषण को, किष्किंधापुर सुग्रीव को, श्रीनगर व हनुरुद्धद्वीप हनुमान् को व औरों को भी अनेक राज्य दिया राम ने शत्रुघ्न का राज्य मांगा। मथुरा पर राजा मधु का राज्य था और वह त्रिशूल रत्न का स्वामी था अतः उसे जीतना आसान नहीं था। राम के मना करने पर भी शत्रुघ्न ने मथुरा पर ही राज्य किया।

जिस समय राजा मधु मथुरा से बहर उपवन में रानियों सहित भोगों में मस्त था तभी शत्रुघ्न ने आधी रात्रि को मथुरा में प्रवेश किया और मधु की आयुधशाला को अपने अधिकार में कर लिया। मधु को पता चला, नगर की ओर आया, परन्तु शत्रुघ्न की सेना ने घुसने न दिया। त्रिशूलरत्न से सहित होने पर भी राजा मधु युद्ध के लिए तैयार हो गया।

युद्ध हुआ। युद्ध में राजा मधु का पुत्र मारा गया। पुत्र को प्राण रहित, अपने को त्रिशूलरहित व शत्रुघ्न को अजेय जान राजा मधु ने समझ लिया कि अब मृत्यु निकट ही है। उसे संसार, शरीर और भोगों की निस्सारता दिखाई देने लगी। युद्ध भूमि में हाथी पर चढ़े चढ़े ही वह भावों से मुनि बन गया। सर्व प्रकार के परिग्रह का त्याग कर, केशलौंच कर लिया। समाधि मरण कर तीसरे स्वर्ग में देव हुआ ।

जब स्वामी नहीं रहा तो त्रिशूलरत्न को देव उठाकर ले गये और चमेरन्द्र को वापस सौंप दिया। चमरेन्द्र ने मधु की मृत्यु का समाचार सुना और मथुरावासियों को मधु की मृत्यु पर हर्ष मनाते देखा तो उसके क्रोध में आकर मथुरा में मरी रोग फैला दिया। प्रजा बहुत दुखी हुई। उस मरी रोग का निवारण हुआ सप्त चारण ऋद्विधारी ऋषियों-सर्व श्री सुरमन्यु, श्री मन्यु, श्री निचय, सर्व सुन्दर, जयवान, विनयलाल, और जयमित्र के मथुरा में पधारने से वह उनके आदेशानुसार शत्रुघ्न द्वारा मथुरा में जिनमन्दिरों का निर्माण कराने से।

राम लक्ष्मण अयोध्या के राजा बने। राम का राज्य आदर्श था। सब हिल-मिल कर रहते थे। एक दूसरे के सुख दुख में बराबर हाथ बंटाते थे। कहीं चोरी नहीं, डकैती नहीं, व्यभिचार नहीं। कोई भूखों नहीं मरे, कोई किसी को सताये नहीं। न रिश्वत, न मिलावट, न कम माप तौल, न और किसी प्रकार की अनीति । राम का द्वार सबके लिये, हर समय खुला रहता। कोई आये, कभी आये, अपना दुख दर्द कहे। कोई फरियाद करे, पूरी छूट थी उसे। राम के राज्य में कोई छोटा बड़ा नहीं, सब एक समान । तभी तो आज भी याद किया जाता है- राम राज्य ।

ऐसे थे राम-उपकारी के प्रति कृतज्ञ । ऐसा था राम-राज्य - सब सुखी, सब सन्तुष्ट । 27. “सीता का परित्याग”

राम सीता के साथ आनन्दपूर्वक रह रहे थे। सीता का गर्भ रहा। उसे तीर्थयात्रा करने की इच्छा हुई। परन्तु दुर्भाग्य ने उसका पीछा न छोड़ा। राम दरबार में बैठे थे। प्रजा के कुछ लोग आये। राम ने पूछा-क्या बात है। बहुत संकोच के बाद उन्होंने कहा- देश में अनाचार फैलता जा रहा है। आज घर घर में चर्चा चल रही है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने रावण द्वारा हरण की गई सीता को फिर घर में रहने की आज्ञा दे दी तब हमें ऐसा करने में क्या दोष है। कहते हैं यथा राजा तथा प्रजा। कृपया आप ही इस अपवाद को रोकने का उपाय कीजिये।

सुनकर राम को धक्का लगा। एक ओर शीलवंती सती सीता का प्रेम-दूसरी ओर लोकोपवाद। घोर चिन्ता हुई। कर्तव्य को ऊँचा समझ राम ने सीता का परित्याग करना ही ठीक समझा। लक्ष्मण को बुलाया, सब बातें कहीं। लक्ष्मण बहुत क्रोधित हुआ। परन्तु राम अपने निश्चया पर दृढ़ रहे और लक्ष्मण को समझा बुझाकर शांत कर दिया।

कृतान्तवक्र सेनापति को बुलाकर सीता को तीर्थयात्रा करा कर भयानक बन में छोड़ आने की आज्ञा दी। सेनापति विवश था। सीता को रथ में बैठाकर तीर्थयात्रा कराते हुए भयानक जंगल में पहुंच गया। रोते रोते सीता को उसने परित्याग की बात कही। वह मूर्च्छा खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। होश आने पर अपने कर्मों का दोष बताते हुए सेनापति से बोली-राम को जाकर मेरा एक संदेशा सुना देना कि जिस प्रकार लोकोपवाद के कारण आपने मुझे छोड़ दिया है, इसी प्रकार लोगों के कहने पर धर्म को न छोड़ देना।

सेनापति आँसू बहाता हुआ लौट गया। सीता जंगल में भयानक जानवरों के बीच दिन काटने लगी। गर्भवती, ऊपर से यह कष्ट बिताने लगी।

एक दिन बेचारी रुदन कर रही थी। उधर से पुण्डरीकपुर का राजा वज्रजंघ अपने साथियों सहित हाथी को पकड़ता पकड़ता उधर आ निकला। उसने सीता का रुदन सुना, पास आया, उसे धैर्य बंधाया, अपना परिचय दिया और अपने साथ सीता को पुण्डरीकपुर ले गया। वहाँ सीता को कोई कष्ट न था परन्तु राम के बिना सब सूना सूना सा लगता था।

ऐसे थे राम- कर्तव्यपरयण ।

ऐसी थी सीता - किसी को दोषी नहीं अपने भाग्य को दोषी समझने वाली ।

  1. “लव-कुश का जन्म व उनका राम लक्ष्मण से यद”

नौ महीने पूरे होने पर सीता ने युगल पुत्रों को जन्म दिया। राजा वज्रजंघ ने बड़े ठाट-बाट से पुत्रों का जन्मोत्सव मनाया। एक का नाम अनंगलवण व दूसरे का नाम मदनांकुश रखा। ये दोनों ही लव-कुश के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

जब बड़े हुए तो भाग्य से सिद्वार्थ नाम के क्षुल्लक महाराज ने इन्हें सब कुछ पढ़ाया लिखाया । सब विद्याओं में निपुण हो गये। युवा होने पर दोनों का विवाह कर दिया।

एक दिन नारद अयोध्या पहुँचे। वहाँ सीता के परित्याग की बात सुनी. बड़ा दुख हुआ। सीता की खोज करने के लिये चल दिये, खोजते खोजते पुण्डरीकपुर पहुँच गये। लव-कुश को बन में खेलते देखा। नारद इनके पास आये। लव-कुश ने इन्हें प्रणाम किया। नारद ने उन्हें आशीर्वाद दिया - जैसी राम लक्ष्मणके विभूति है वैसे तुम्हारे भी हो। लव-कुश ने पूछा- ‘राम-लक्ष्मण कौन हैं ?’ नारद ने सब वृतान्त कहा। राम लोकापवाद से सीता को जंगल में छुड़वा दिया, यह जानकर लव-कुश को क्रोध आया और उन्होंने राम लक्ष्मण से युद्ध करने की ठानी। सीता ने सुना, रोने लगी, लव-कुश को राम लक्ष्मण से युद्ध करने के लिये मना किया परन्तु वह न माने । अन्त में युद्ध हुआ। सीता क्षुल्लक सिद्धार्थ व नारद के साथ विमान में बैठी युद्ध देख रही थी। घमासान युद्ध हुआ। लव राम से लड़ने लग। कुश लक्ष्मण से भिड़ गया। न वह सेना हारी न वह सेना हारी। लव के सामने राम के शस्त्र बेकार हो गये और कुश के सामने आपने शस्त्रों को प्रभावहीन देखकर राम को बड़ी निराशा भी हुई व आश्चर्य भी.

राम लक्ष्मण को परेशान देख सिद्वार्थ विमान से नीचे उतरे और लक्ष्मण को बताया- ये दोनों राम के पुत्र हैं, और चक्र आदि कुटुम्बियों पर वार नहीं करते इसलिए किसी प्रकार की शंका मन में मत लाओ। तुम्हीं नारायण हो या निश्चित ही समझो। सुनकर लक्ष्मण ने हथियार फेंक दिये। राम को पता चला, उन्होंने भी हथियार फेंक दिये और दोनों पुत्रों को गले से लगा लिया। राम-लक्ष्मण का लव-कुश से परिचय कराया गया। लव-कुश राम लक्ष्मण के चरणों में गिर पड़े।

लव-कुश को लेकर राम-लक्ष्मण अयोध्या लौट गये और सीता वापस पुण्डरीकपुर चली गई। ऐसे थे लव-कुश - अभिमानी।

ऐसे थे लव-कुश - पिता समान ही वीर।

  1. 'सीता की अग्नि परीक्षा

एक दिन विभीषण, सुग्रीव, हनुमान् आदि मिलाकर राम के पास आये और विनती करने

लगे - सीताजी आपके बिना बहुत दुखी हैं, अब तो उन्हें अयोध्या बुला लीजिये। राम बोले- मैं जानता हूँ सीता सती है, निर्दोष है, परन्तु मैंने उसे लोकापवाद के कारण घर से निकाला है, उसे वापिस कैसे बुला लूँ। हाँ, अगर वह अपनी निर्दोषिता का प्रमाण प्रजा के सामने दे सके तो मैं आपने घर में रख सकता हूँ।

बस राम की आज्ञा से विभीषण भामण्डल, सुग्रीव, हनुमान् आदि सीता के पास पहुँचे, समझा- बुझाकर पुष्पक विमान में बैठाकर सीता को अयोध्या ले आये। परन्तु जब वह राम के निकट आने लगी तो राम को क्रोधित सा देखकर ठिठक कर रुक गई। तब राम क्रोध में बोले- हे सीते ! मेरे सामने से दूर हो। तू यहाँ क्यों आई ? तू बहुत दिनों तक रावण के यहाँ रही, अब तुझे घर में कैसे रखूं ? मैं जानता हूँ तू निर्दोष है, परन्तु जब तक प्रजाजन तुझे निर्दोष न मान लें, तब तक मैं तुझे स्वीकार नहीं कर सकता। तब सीता ने कहा- आप महापंडित हो, फिर भी आपने कुटिलता से तीर्थयात्रा कराने का बहाना लेकर मेरे गर्भवती होने पर भी मुझे भयानक वन में अकेली छुड़वा दिया। यह आपने उचित नहीं किया। यदि वहाँ मेरा कुमरण हो जाता तो आपको क्या मिल जाता। अगर आपको मेरा त्याग ही करना था तो किन्हीं आर्यिका के निकट छुड़वा देते मेरा भला तो होता। खैर, अब भी जिस प्रकार आप आज्ञा दें मैं परीक्षा देने के लिए तैयार हूँ। राम की आज्ञा हुई - अग्नि प्रवेश के द्वारा अपने शील की परीक्षा दो। सीता ने स्वीकार कर लिया।

यह सुनकर नारद, विभीषण, हनुमान्, लक्ष्मण, लव-कुश आदि सभी चिन्तातुर हो गये। सबने राम को बहुत समझाया कि अग्नि का क्या भरोसा, परन्तु राम टस से मस नहीं हुए। एक तीन सौ हाथ चौकोर गड्‌ढा खोद कर उसमें ईंधन डालकर अग्नि लगा दी गई और सीता को उसमें कूदने को कहा गया। सीता उठी, भगवान् का स्मरण किया और बोली- हे अग्नि ! मन से, वचन से, काय से, स्वप्न में या जाग्रत अवस्था में श्री राम के सिवा मैंने यदि कभी किसी पर पुरुष की इच्छा भी की हो तो तू मुझे अवश्य जला देना। अन्यथा मत जलाना।

उसी समय मेधकेतू नाम का एक देव सकलभूषण मुनि का केवलज्ञानमहोत्सव मनाने के लिए महेन्द्र नाम के उद्यान में जा रहा था। उससे सीता सती का दुख न देखा गया। अपने प्रभाव से अग्नि को शांत करके उसके स्थान पर शीतल जल का सरोवर बना दिया। उसमें हजारपत्तों वाले कमल पर रत्नमय सिंहासन बनाकर उस पर सीता को विराजमान कर दिया।

सीता परीक्षा में सफल हुई। चारों ओर जय जयकार होने लगा। सब ओर से ध्वनि आने लगी ‘सीता सती है, सीता निर्दोष है।’

राम को बड़ा पश्चाताप हुआ। सीता के पास आये। उससे क्षमा मांगी और घर चलने की प्रार्थना करने लगे। परन्तु सीता ने यही कहा—आपका कोई अपराध नहीं, अपराध तो मेरे कर्मों का है। अब मैंने संसार को देख लिया है। भोगों से अब मेरा मन ऊब गया है। अब तो मेरी यही इच्छा है कि मैं ऐसा उपाय करूँ जिससे भविष्य में मुझे स्त्री पर्याय ही न मिले। ऐसा कहकर उसने अपने सिर के बाल उखाड़ कर फेंक दिये। राम बालों को देखकर मूच्छित हो गिरं पड़े। और जब तक उन्हें होश आया, सीता पृथ्वीमती आर्यिका से आर्यिका के व्रत ले चुकी थी। राम लक्ष्मण आदि सब सकलभूषण केवली के दर्शन करने चल दिये। वहां पर उनका उपदेश जुना, उपदेश में राम-लक्ष्मण, रावण, सीता आदि के पूर्व भव बताये गये, जिसे सुनकर अनेकों ने संसार से विरक्त होकर मुनि-दीक्षा ले ली।

कृतान्तवक्र सेनापति ने राम से कहा—मैं भी मुनि दीक्षा लेना चाहता हूँ। तब राम ने उससे कहा—यदि तुम्हें किसी कारण मोक्ष की प्राप्ति न होकर स्वर्ग में देवपद मिल जाये तो संकट के समय तुम मुझे उपदेश द्वारा सावधान करते रहना। कृतात्तवक्र ने सब परिग्रह का त्याग करके निर्ग्रन्थ दीक्षा ले ली। तपश्चरण के प्रभाव से मरण का चौथे स्वार्ग में देव हुआ । सीता ने भी घोर तप किया। जब तेतींस दिन की आयु बाकी रही तो अनशन व्रत धारण कर लिया। समाधिमरण किया, मरकर सोलहवें स्वर्ग में प्रतीन्द्र बना ।

ऐसी थी सीता—महा सती ।

ऐसे थे राम—पत्नी की भी परीक्षा ली।

  1. “लक्ष्मण का मरण व राम का शोक”

एक दिन स्वर्ग में सौधर्म इन्द्र की सभा में चर्चा चली कि राम-लक्ष्मण में अटूट प्रेम था। कौतूहलवश दो देव उनकी परीक्षा के लिये अयोध्या आ गये। राम के महलों में अपनी विक्रिया से महल की रानियों का रुदन शब्द कराया, सब ओर शोर का वातारण बना दिया और विक्रिया से द्वारपाल, मंत्री मुँह लटकाये लक्ष्मण के पास पहुँचा दिये और कहलवा दिया कि राम का मरण हो गया।

भाई की मृत्यु के पूरे शब्द भी न सुन पाये थे लक्ष्मण ने ‘हाय’ कहा और अपने प्राण छोड़ दिये। उनका मृत शरीर पृथ्वी पर लुढ़क पड़ा। लक्ष्मण की मृत्यु के समाचार से चारों ओर हाहाकार मच गया।

राम ने सुना, दौड़ आये, भाई लक्ष्मण के मृत शरीर से लिपट कर जोर जोर से रोने लगे। लोगों के समझाने पर भी न माने उनके मृत शरीर को कंधे पर रखे छह महीने तक घूमते रहे कभी उसे नहलावें, कभी उसके मुँह में खाना देवें, कभी उससे बातें करें। यह मानने को तैयार ही न हों कि लक्ष्मण मर गया है। पागल से हो गये। राज काज से भी अरुचि हो गई। सब ने समझाया कि लक्ष्मण की दाह क्रिया कर दो, परन्तु राम ने किसी की एक न सुनी।

आखिर जटाऊ पक्षी व कृतान्तवक्र सेनापति के जीव जो स्वर्ग में देव हुए थे, उनको समझाने के लिए आये। सूके वक्ष को सींचने लगे, मृतक बैल से हाल चलाने लगे, शिला के ऊपर बीज बोने लगे, पानी को बिलो कर घी निकालने लगे, रेत को घानी में पेल कर तेल निकालने लगे, इन अनहोनी क्रियाओं को दिखाकर राम को समझाने लगे। फिर अपना परिचय दिया तब कहीं जाकर राम की समझ में आया और वह लक्ष्मण की दाह-क्रिया करने को राजी हो गये। लक्ष्मण के शरीर का दाह-संस्कार कर दिया गया।

ऐसा है मोह—राम जैसों को भी नहीं छोड़ा।

ऐसा होता है प्रेम—एक की मृत्यु सुनी, दूसरे ने प्राण छोड़ दिये।

  1. ‘राम की मुनि-दीक्षा’

उन देवों ने और भी अनेक प्रकार से राम को संबोधा। राम को बड़ा आनन्द मिला। विचारने लगे—जीवन ओस की बूंद के समान क्षणभंगुर हैं। मैंने अपना मनुष्य जन्म यूँ ही व्यर्थ खो दिया। यहाँ पर कौन किस का भाई, कौन किसका पुत्र, कौन किसकी स्त्री, और किस का कुटुम्बी। जीव ने इस संसार में अनन्त सम्बन्ध पाये बस एक ज्ञान पाना ही दुर्लभ है। अब तो मुझे इन सब से मन को हटाकर वह राह पकड़नी चाहिये जिससे जन्म-मरण का चक्कर ही सदा के लिये छूट जाये। निश्चय कर लिया दिगम्बर मुनि बनकर आत्म कल्याण करूंगा।

भाई शत्रुघ्न को राज्य संभालने के लिए कहा परन्तु वह भी मुनि दीक्षा लेने के लिये उत्सुक थे। निराश उन्होंने लव के पुत्र को राज्य दिया और पहुंच गये मुनिराज सुव्रत के निकट। मुनिराज की तीन प्रदिक्षणा दी, हाथ जोड़कर उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की। मुनिराज की आज्ञा से सब वस्त्राभूषण को उतार फेंका, नग्न दिगम्बर घास-फूस की तरह बालों को उजाड़ कर फेंक दिया और जैनश्वरी दीक्षा अंगीकार कर ली।

पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति आदि का पालन करते हुए कल्याण पथ पर चलते चले गये। जटाऊ व कृतान्तवक्र के जीवों ने बहुत उत्सव मनाया, पंचाश्चर्य किये, दुन्दुभी बाजे बजाये। श्री राम के साथ शत्रुघ्न, सुग्रीव, नाल, नील, आदि ने भी मुनि दीक्षा ग्रहण की। अनेक स्त्रियों ने आर्यिका के व्रत ग्रहण किये।

कुछ दिनों पश्चात् गुरू की आज्ञा लेकर राम अकेले विहार करने लगे। घोर तपश्चरण के प्रताप से अवधि ज्ञान की प्राप्ति हुई ।

पांच दिन का उपवास करने के बाद मुनि राम आहार के लिये नगर में आये। स्त्रियां व पुरुष उनके सुन्दर रूप को देखकर व्याकुल हो इधर उधर दौड़े दौड़े फिरने लगे। चारों ओर शोर सा मच गया। हाथी, घोड़े भी बंधन तुड़ा तुड़ा कर भागने लगे। मुनि राम अन्तराय समझकर बन को लौट आये। और यह प्रतिज्ञा कर ली कि अब आहार के लिये नगर में नहीं जाया करेंगे जंगल में आहार मिलेगा तो लेंगे वरना नहीं।

भाग्योदय से राजा प्रतिनंद को दुष्ट घोड़ा लेकर उसी जंगल में पहुंच गया। ढूंढ़ते ढूंढ़ते उनकी पटरानी भी वहाँ पहुंच गई। दोनों ने मुनि राम को भक्तिपूर्वक पड़गाहा और सानन्द आहार कराया। मुनि राम अक्षीण महाऋद्धि के धारक थे अतः उस दिन राजा की रसोई में अटूट भोजन हो गया। देवों ने पंचाश्चर्य किये — रत्नों की वर्षा हुई, पूष्प बरसे, सुगन्ध पवन चली, दुंदुभी बजी, जय जयकार हुआ ।

एक दिन विहार करते हुए मुनि राम कोटि शिला पर पहुंच गये और वहाँ ध्यान करने के लिये बैठ गये।

ऐसे थे राम—रागी भी कमाल के, वैरागी भी बे मिसाल ।

  1. “राम को केवलज्ञान की प्राप्ति”

सीता का जीवन जो अच्युत नाम के सोलहवें स्वर्ग में स्वयंप्रभ नाम का प्रतीन्द्र बना था, अवधिज्ञान द्वारा राम के विषय में सब कुछ जानकर राम को ध्यान से डिगाने का विचार करने लगा ताकि राम मुक्ति को प्राप्त न होकर यही मेरे पास स्वर्ग में आ जायें और हम बाईस सागर तक साथ साथ रहकर नन्दीश्वर द्वीप आदि क्षेत्रों की यात्रा करें।

बस वह प्रतीन्द्र वहाँ पहुँच गया जहाँ राम ध्यानमग्न बैठे थे। उसने अपनी माया से बसन्त ऋतु की छटा प्रकट कर दी और स्वयं सीता का रूप बनकर अपने हाव-भाव से व अन्य उपाय द्वारा राम का ध्यान डिगाने का प्रयत्न करने लगा। परन्तु राम न डिगे, न डिगे। शुक्लध्यान में मग्न होकर चारों घातिया कर्मों—ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनी, अन्तराय—का नाश करके केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया साथ में अनन्तदर्शन, अनन्तसुख व अनन्तवीर्य के भी धनी बन गये। इस प्रकार 25 वर्षों तक मुनिव्रत का पालन करने के पश्चात् वह अरहंत बन गये।

देवता लोग केवलज्ञान कल्याणक-उत्सव-मनाने के लिये वहाँ आ पहुँचे। देवों ने उनकी गंधकुटी की रचना की जिसमें वह स्वर्ण कमल के ऊपर कमल को भी न छूते हुए विराजमान हुए। बिना किसी इच्छा के स्वयमेव उनका उपदेश होने लगा जिसे दिव्यध्वनि कहते हैं। सब सुनने लगे। सीता का जीव प्रतीन्द्र भी उपदेश सुन रहा था। उसे अपनी भूल पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने भगवान् राम से कहा—हे भगवान्! यह आपने क्या किया ? मुझे तो अकेले संसार बन में छोड़ दिया और आप संसार सागर से पार हो गये। मेरा भी उद्धार कीजिये। तब भगवान् राम की वाणी खिरी—जो राग में लगे हैं, उन्हें तो संसार में रुलना ही पड़ेगा। उन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी। अतः यदि संसार से तिरना चाहते हो तो राग को छोड़ो। राग ही दुःख की जड़ है। और कोई किसी को मोक्ष में नहीं ले सकता। स्वयं ही पुरुषार्थ करना पड़ेगा। राग को छोड़ना पड़ेगा। अपना वीतराग भाव ही मोक्ष को प्राप्त करा सकता है।

ऐसे थे राम—क्यों को नष्ट किया और भगवान् बन गये।

  1. “भगवान् राम का मोक्ष-गमन”

भगवान् राम का अनेक देशों में विहार हुआ। अन्त में तुंगीगिरि पर पहुँचे। उत्कृष्ट शुक्ल ध्यान

में लीन हो गये जिसके प्रताप से तीनों योगी—मन, वचन, काय का निरोध हो गया। बाकी बचे चार अघातिया कर्म, आयु, नाम, गोत्र वेदनीय—इनसे भी छुटकारा मिल गया।

उनकी आयु 17000 वर्ष की थी। आयु का अन्त होते ही उनकी आत्मा इस नश्वर शरीर को छोड़कर लोक के अग्र भाग में पहुँच गई। अर्थात् उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो गई। मोक्ष अर्थात् मुक्ति—सब कर्मों से, राग द्वेष आदि विकारों से, यहां तक कि शरीर से भी। कुछ समय के लिये नहीं, हमेशा, हमेशा के लिये। अब वह कभी संसार में नहीं आयेगा। जन्म-मरण से भी छुटकारा मिल गया और दुखों से भी। बस अब वह कृत कृत्य हो गये।

उन्हें वह सुख सदा के लिये मिल गया जिसे संसार का हर एक प्राणी चाहता है और जिसका लक्षण है अनाकुलता अर्थात आकुलता का न होना। यही नहीं जिसे हर प्राणी प्राप्त भी कर सकता है क्यों कि सुख आत्मा का स्वभाव है। बस विकार हटाते जाइये, हटाते जाइये, सुख प्रकट होता जायेगा, प्रकट होता जायेगा और एक दिन पूर्ण सुखी बन जाओगे। पूर्ण सुखी यानि भगवान्। जैसे राम बने, इसी प्रकार हम तुम भी भगवान् बन सकते है।ो भगवान् बन सकते हैं।

इस प्रकार राम बने—भगवान्।

आओ प्रयत्न करें और

हम भी बने—भगवान्।

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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