भगवान मल्लिनाथ
जैन चित्र कथाएँ
सुनो सुनाये सत्य कथाएँ
आशीर्वाद
परम पूज्य श्री आर्यिका 105 श्रेयांसमति माता जी
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला
कृति : भगवान मल्लिनाथ
© : सर्वाधिकार सुरक्षित
सम्पादक : ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
पृष्ठ न : 51
I.S.B.N. : 81-85834-14-8
प्रकाशन वर्ष : 2000
मूल्य : 20.00
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड
जिला गाजियाबाद (उ.प्र.)
: 914-600074
भगवान मल्लिनाथ
ज्ञान प्राप्ति करने में बाधक पाप कर्म मल्लों (पहलवानों) को नष्ट करने वाले, तीन लोक के स्वामी भगवान मल्लिनाथ को नमस्कार है। भगवान् मल्लिनाथ ऋषभ आदि तीर्थंकरों की भी नमस्कार है, क्योंकि वे सभी तीर्थंकर भी भगवान् मल्लिनाथ के ही समान धर्मचक्र को चलाने वाले हुए हैं। उन्होंने मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले समस्त जीवों को वह मार्ग बताया है जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। लोक और अलोक को प्रकाशित करने वाली भगवती सरस्वती को भी सादर प्रणाम है। हे भगवती सरस्वती! आप बाधाओं को दूर करने के लिए हमारी बुद्धि को शक्तिशाली और निर्मल बनाऐं।
इसी जंबूद्वीप अर्थात् भारत के पूर्व में विदेह क्षेत्र था, जहां धर्म का विस्तार सागर के समान था। वहां सर्वत्र धर्म की महिमा दिखाई देती थी। उसी क्षेत्र में कच्छकावती नामक एक प्रसिद्ध देश था। इस कच्छकावती देश में स्थान-स्थान पर जिनमंदिर बने हुए थे। उनसे यह देश अत्यन्त शोभायुक्त दिखायी देता था।
कच्छकावती देश के वन भी बड़े मनोहर थे। शीतल छाया देने वाले वृक्ष फलों से लदे हुए रहते थे। उनके बीच बैठकर अनेक मुनि तप साधना करते दिखलाई देते थे। इस कच्छकावती देश में सदा जैनधर्म की ही महिमा दिखाई देती थी। क्योंकि यह धर्म सदा ही दयास्वरूप रहा है। इस देश में मोक्ष के अभिलाषी लोगों को धर्म के उपदेश सुनाने के लिए मुनियों, गणधरों और केवलियों का आगमन होता रहता था।
कच्छकावती देश में क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तीनों वर्णों के लोग निवास करते थे। वे सभी जैन धर्म को मानते थे। यहां के लोग जप, तप और दान का महत्व भी जानते थे। इनका पालन करके वे स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त करते थे।
इस कच्छकावती देश में वीतशोका नामकी एक नगरी थी। वह स्वर्ग के समान
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सुन्दर थी। नगर के चारों ओर सूरमा के लिए चौड़ी और गहरी खाई बनी थी। परकोटे की दीवारें बहुत ऊँची थी। उसके द्वार और स्थान-स्थान पर बने तोरण, सुन्दर कलाकृतियों से सजे हुए थे।
इस नगर में अत्यन्त समृद्धिवान लोग थे। वे दानी लोग प्रतिदिन अपने द्वार पर मुनियों को आहार देने के लिए उनकी प्रतीक्षा करते थे। इस वीतशोक नगर के स्त्री-पुरुष जिन मंदिरों में नियमित रूप से जाते थे और भगवान् जिनेन्द्र की पूजा किया करते थे।
इस वीतशोक नगर में, वैश्रवण नाम का एक राजा था। वह अत्यन्त प्रतापी होने के साथ-साथ धर्मात्मा भी था। उसका रूप इन्द्र के समान सुन्दर था। वह नीति-पालक था। प्रजा का कल्याण की उसका सबसे प्रमुख उद्देश्य रहता था। इस उद्देश्य को पूरा करने में वह अपना सब कुछ समर्पित करने को तैयार रहता था। वह सदा न्याय के मार्ग पर चलता था। उसके शत्रु उससे भय खाते थे। अपने राज्य की व्यवस्था और शासन को वह भलीभाँति चलाता था। वह कभी भी अन्याय और अधर्म के मार्ग पर नहीं चलता था। उसे सदा यह ध्यान रहता था कि धर्म से ही धन की प्राप्ति होती है। धर्म से ही पुरुषार्थ सिद्ध होता है और धर्म से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
राजा वैश्रवण धर्म के मार्ग पर चलने वाला राजा था। इसलिए वह सदा धर्म ध्यान में लीन रहता था। वह सभी प्रकार के व्रत करता था। प्रतिदिन नियमित रूप से पूजा, दान आदि करता था। राजा वैश्रवण के पास विपुल संपत्ति थी। वह उसे अपने पुण्य कर्मों के फल से मिली थी।
एक दिन जब राजा वैश्रवण सिंहासन पर विराजमान थे। उनका वनपाल राज्यसभा में आया। उसने निवेदन किया, हे राजन्! मनोहर दिखने वाले चंदनवन में मुनिराज सुगुप्त आकर विराजे हैं। वह कोई साधारण मुनि नहीं, बल्कि समस्त मुनियों में श्रेष्ठ हैं। वह मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा वाले लोगों को यह बताने आए है कि मानव इसका उचित ज्ञान प्राप्त करें। उसी से उन्हें मोक्ष प्राप्त होगा।
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वनपाल से मुनिराज सुगुप्त के आने पर समाचार सुनकर राजा वैश्रवण अत्यन्त प्रसन्न हुआ। वह तत्काल मुनि दर्शन के लिए चल दिए। वहां पहुँचकर उसने मुनिराज की तीन बार प्रदक्षिणा की। फिर उनकी भक्ति पूर्वक पूजा की। मुनिराज ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
राजा वैश्रवण ने पूछा- हे मुनिराज! धर्म क्या है? कौन उसे प्राप्त कर सकता है और क्या उसका फल है?
हे राजन्! इस संसार के दुःखों से जो छुटकारा दिलाए और सुख की प्राप्ति कराए, वही धर्म है। वही मनुष्य को मोक्ष दिलाता है। इसी धर्म के बड़े-बड़े चक्रवर्ती आश्चर्यजनक गुणों और सुखों को प्राप्त करते हैं।
हे राजन्! यह धर्म सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से प्राप्त होता है। भगवान् जिनेन्द्र उनके शाश्वत तथा तप करने वाले गुरुओं के बारे में जो यथार्थ ज्ञान कराए और उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर, वह सम्यग्दर्शन कहलाता है। जिस प्रकार बलवान राजा, शत्रुओं के समूह को देखते-देखते तितर-बितर कर नष्ट कर देता है। उसी प्रकार मनुष्य भी ज्ञान प्राप्ति में बाधक पाप कर्मों को सम्यग्दर्शन नष्ट कर देता है। भगवान् जिनेन्द्र ने सम्यग्दर्शन को मोक्षरूपी अनुपम महल की पहली सीढ़ी कहा है। यही धर्म का बीज है। सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का मूल कारण भी सम्यग्दर्शन ही है। जिस व्यक्ति ने अपने हृदय में सम्यग्दर्शन रूपी रत्न जागृत कर दृष्टि में महाधनवान है। सम्यग्दर्शन जैसा न कोई संसार में भाई है, और न सदा हित करने वाला स्वामी है। सम्यग्दर्शन ही समस्त पापों का जड़ से नाश करने वाला है और धर्म को प्राप्त कराने वाला है।
जिस ज्ञान के द्वारा जीव आदि पदार्थ, शास्त्रों और गुरुओं का यथार्थ रूप से जानना होता है, तथा यह देव है, यह देव नहीं है- इस बात को अच्छी तरह पहचान होती है, वही व्यवहार नामक सम्यग्ज्ञान है। भगवान् जिनेन्द्र ने लोक और परलोक के बाह्य और अंतरंग तत्वों को परखने के लिए ज्ञान को ही नेत्र
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कहा है। जिसके यह ज्ञानरूपी नेत्र नहीं है, वह इस संसार में सर्वथा अंधा ही है।
मन, वचन और शरीर की क्रियाओं द्वारा हिंसा आदि समस्त पापों को त्याग देना ही- व्यवहार चारित्र या सम्यक्चारित्र कहा जाता है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह- ये पाँच पाप हैं। इन पाँचों पापों का त्याग ही अहिंसा आदि व्रत कहे जाते हैं।
इन व्रतों को अब मैं विस्तार से बताता हूँ। समस्त जीवों की रक्षा करना अहिंसा महाव्रत कहा जाता है। झूठ आदि का त्याग करना सत्य महाव्रत है, चोरी आदि का सर्वथा त्याग अचौर्य महाव्रत है। अपनी पत्नी और दूसरी स्त्रियों का सर्वथा त्याग ही ब्रह्मचर्य महाव्रत है। समस्त प्रकार के भौतिक पदार्थों का परिग्रह त्याग करना ही अपरिग्रह महाव्रत है। जो लोग चरित्र रूपी सिंहासन पर विराजमान हैं अर्थात् दृढ़ रूप से सम्यक्चारित्र को पालता है, उसे बड़े-बड़े इन्द्र आदि भी सेवक की तरह नमस्कार करते हैं।
इसी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को रत्नत्रय भी कहते हैं। हे राजन्! जो लोग नियम के अनुसार अपने व्यवहार में इस रत्नत्रय को धारण करते हैं, वे निश्चय ही परम सिद्धि प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार मुनिराज सुगुप्त ने महाराज वैश्रवण से कहा- हे राजन्! तुम्हारे लिए यह उपदेश है कि तुम मोह रूपी महायोद्धा को नष्ट कर चैतन्य स्वरूप आत्मा के ध्यान के साथ रत्नत्रय का सेवन करो। इसी से तुम्हारा उद्धार होगा।’
मुनिराज सुगुप्त के रत्नत्रय का महत्व सुनकर राजा वैश्रवण को परमानंद हुआ। उसने भक्ति पूर्वक रत्नत्रय व्रत धारण किया और विनय पूर्वक मुनिराज को प्रणाम कर अपने राजभवन में लौट आया।
राजा वैश्रवण ने अगले ही दिन से रत्नत्रय व्रत आरम्भ किया और पूरे विधि-विधान से उसे पूरा किया। व्रत समाप्त होने पर राजा वैश्रवण ने भगवान् जिनेन्द्र के अनेक मंदिरों का निर्माण कराया। फिर वह उन जिनमंदिरों में प्रतिदिन
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महापूजा करने लगा। वह हाथ खोलकर दान देता। जैनधर्म पालन करने वाले, किन्तु दीन और निरीह लोगों को वह विशेष रूप से सहायता और सेवा करता था। इस प्रकार राजा वैश्रवण, पुण्य देने वाले धर्म का आचरण नियमित रूप से करने लगा।
उस समय वर्षा ऋतु का आरंभ हो चुका था। वनों की शोभा दर्शनीय थी। एक दिन राजा वैश्रवण के मन में वनों की शोभा देखने की इच्छा हुई। वह अपने मंत्रियों आदि के साथ वन की शोभा देखने गए।
रास्ते में उन्हें एक बरगद का विशाल वृक्ष दिखा। हरा भरा, शीतल छाया देने वाला वह वृक्ष अत्यन्त सुन्दर था। उसकी शोभा देखकर राजा वैश्रवण अपने को रोक न सके। वह अपने साथियों से बोले- देखो…। देखो… यह वृक्ष कितना विशाल और सुन्दर है। इसने कितने ही पक्षियों को सहारा दे रखा है। इसकी शीतल छाया कितनी शान्ति देने वाली है।
राजा वैश्रवण ने कुछ देर वहाँ विश्राम किया और फिर आगे चले गए, वन में काफी समय बिताने के बाद वह राजधानी के लिए उसी मार्ग से लौटे।
रास्ते में फिर वही वट-वृक्ष मिला। किन्तु आश्चर्य? उस वृक्ष पर अचानक आकाश से बिजली गिरी थी और वह ध्वस्त हो गया था। वृक्ष का यह हाल देखकर राजा वैश्रवण को बड़ा दुःख हुआ। अगले ही क्षण उसे लगा कि इस संसार में किसी की विशालता, सुन्दरता, यश आदि कभी स्थायी नहीं रहते। वे कभी भी नष्ट हो सकते हैं। कभी भी किसी का अभिमान स्थायी नहीं रहा। जिस प्रकार यह विशाल और शक्तिशाली वृक्ष क्षण भर में नष्ट हो सकता है, उसी तरह मनुष्य शरीर भी, चाहे वह कितना ही विशाल और पराक्रमी क्यों न हो, क्षण भर में नष्ट हो जाता है, लोग इस राज्य ऐश्वर्य, वैभव आदि को पाकर अभिमान से चूर हो जाते हैं, वह सब धूल में मिल जाता है। इसी प्रकार मोह के जाल में फंसकर लोग भाई, पिता, पुत्र, पत्नी आदि संबंधी में इतना बंध जाते हैं कि उन्हें उनकी नश्वरता का ध्यान ही नहीं रहता। इसी कारण उनसे अलग होने पर
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उन्हें दुख होता है। इसीलिए गृहस्थाश्रम का कारागार कहा गया है। यह गृहस्थाश्रम अनेक प्रकार के दुखों और चिन्ताओं से भरा हुआ है। इसलिए इस गृहस्थाश्रम से प्रेम कैसा? यह तो भूख, प्यास, रोग, क्रोध, बुढ़ापा आदि अनेक कष्टों से भरा हुआ है। इसलिए दुःखावस्था आने से पूर्व ही इस गृहस्थाश्रम को त्याग देना चाहिए।
इस प्रकार के विचार आने से राजा वैश्रवण का वैराग्य हो गया। संसार, शरीर, सुख, वैभव आदि सभी से उनका मन विरक्त हो गया। उन्होंने दिगंबरी दीक्षा लेने का संकल्प कर लिया।
राजभवन में पहुंचकर उन्होंने सभी से अपने विचार बताए और वैराग्य लेने का संकल्प बता दिया। उन्होंने अपने पुत्र को राज्यभार सौंप दिया। फिर सारा ऐश्वर्य, वैभव, धन-संपत्ति, परिवार आदि छोड़कर श्री नाग पर्वत की ओर चल दिया।
श्री नाग पर्वत पर, श्रीनाग नामक मुनिवर रहते थे। राजा वैश्रवण उन्हीं के पास गया। उसने भक्ति पूर्वक मुनिराज की तीन बार परिक्रमा की। फिर उन्हें प्रणाम किया। मुनिराज से राजा ने निवेदन किया कि आप मुझे जिनधर्म में दीक्षित करें।
इस प्रकार मुनि श्रीनाग से दिगंबरी दीक्षा लेकर तप साधना करने लगे। जैसे-जैसे वे तप और साधना करने लगे। उन्हें ज्ञान की प्राप्ति होने लगी।
मुनिराज वैश्रवण को धीरे-धीरे तप साधना में सफलता मिलती गयी। वह खंडहरों, श्मशानों, घनघोर वनों, वृक्ष के खोखलों, पर्वतों, गुफाओं आदि में निर्भय होकर तप करने लगे थे। वह मोक्ष प्राप्ति के लिए चित्त को स्थिर करके ध्यान में लीन हो जाते। वह अकेले ही वनों, गांवों, नगरों आदि में भ्रमण करते, विहार करते और उपदेश देते।
मुनि वैश्रवण ने उन सोलह भावना को जागृत कर लिया था, जिनसे तीर्थंकर बनने का फल प्राप्त होता है। यह सब उनकी साधना और तप के कारण ही संभव हुआ था। उन्होंने समस्त पापों के नाश के लिए सम्यग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान
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और सम्यक्चारित्र के साथ तप भी किया था। उन्होंने भूख, प्यास, गर्मी व सर्दी इत्यादि सभी प्रकार के कष्टों पर विजय पा ली थी। उन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट न था। चूंकि वह मोक्ष प्राप्ति करना चाहते थे, इसलिए उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता था।
और जब उनका तप पूर्ण हुआ तो उनके महापुण्य का उदय हुआ। उन्होंने एक उज्ज्वल शिला पर बैठकर समाधि लगायी और प्रसन्न चित्त होकर प्राणों का परित्याग किया। उन्होंने इन्द्र का पद प्राप्त किया। स्वर्ग में पहुंचने वाले ऐसे लोगों के मन में स्वयं ही ‘मैं ही इंद्र हूं’ अर्थात् अहमिंद्र के विचार आते रहते हैं।
मुनिराज वैश्रवण का जीव इन्द्र बनकर सदा भगवान् जिनेन्द्र की भक्ति में लगा रहा। उसने वहां भी विविध प्रकार की धर्म आराधना को जारी रखा।
इस भरत क्षेत्र का बंग (बंगाल) प्रदेश उस समय धर्म का परम स्थान था और धन धान्य से पूर्ण था। उस समय वहां के गांवों, नगरों आदि में धर्मात्मा लोग निवास करते थे। स्थान स्थान पर वहां भगवान् जिनेन्द्र के मंदिर आकर्षित करते थे। उनके शिष्य और सौंदर्य का जितना वर्णन करो, वह कम है।
उस बंग प्रदेश के सिद्धवन, मुनियों से भरे हुए थे। उनके वृक्ष फलदार और शीतल छाया देने वाले थे।
उस बंग देश के लोग बड़े धर्म परायण थे। इसलिए वहां मुनिवर विहार करते और मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा करने वालों को उपदेश देते। कोई तीर्थ यात्रा को जाते, कोई भगवान् जिनेन्द्र की पूजा करते। कोई विद्वान पुरुष घोर तप करके मोक्ष प्राप्त करते। कोई गृहस्थ अपने धर्म का पालन करके, देवगति को प्राप्त करते।
ऐसे बंगदेश में मिथिला नाम की नगरी थी। वह अपनी शोभा और समृद्धि के कारण स्वर्गपुरी के समान थी। जिस प्रकार अयोध्यापुरी की शोभा का वर्णन शास्त्रों में मिलता है, उसी प्रकार मिथिलापुरी की भी शोभा थी। ऊंचे-ऊंचे
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भगवान मल्लिनाथ
परकोटे, बड़े-बड़े सुन्दर महल, दूर से ही आकर्षित करने वाले जिन मंदिर उसकी शोभा बढ़ाते थे।
मिथिलापुरी के निवासी बड़े धर्मपरायण थे। अनेक प्रकार के विज्ञान और कला-कौशल के जानकार थे। वे परोपकारी थे, धर्मात्मा और शीलवान थे। अच्छे व्रतों का आचरण करते थे। पुण्य देने वाले मार्ग के अनुयायी थे। परम सम्यक्दृष्टि थे। जैन धर्म में उनकी अपार श्रद्धा थी। विनयशील थे। शूरवीर थे। अच्छे-बुरे विचारों में अन्तर करना जानते थे। इस प्रकार पहले जन्म में कमाए गए पुण्य के फल स्वरूप, महान कुलों में उत्पन्न वे स्त्री-पुरुष, मिथिलापुरी के ऊँचे-ऊँचे महलों में बड़े आनन्द से निवास करते थे।
मिथिलापुरी में उस समय राजा कुंभ का शासन था। वह अनेक राजाओं का शिरोमणि था। उसकी प्रसिद्धि चारों ओर फैली हुई थी। वह अत्यन्त पुण्यवान था। वह सदा न्याय मार्ग पर चलता था। उसका आचरण व्यवहार शुद्ध एवं पवित्र था। राज्य शासन को बड़ी कुशलता से चलाता था। वह अहिंसा आदि पाँच व्रतों का पालन करता था।
राजा कुंभ चक्रवर्ती राजा के समान था। जिस प्रकार कोई चक्रवर्ती राजा नीति मार्ग से अपनी प्रजा की रक्षा करता है, उसी प्रकार राजा कुंभ प्रजा पालन करता था।
राजा कुंभ की एक सुन्दर रानी थी। उसका नाम था प्रजावती। महारानी प्रजावती अत्यन्त सुन्दर और वह व्रतों का पालन करती थी। राज्य की प्रजा उसका बहुत आदर करती थी।
राजा वैश्रवण का जीव, जो इन्द्र के रूप में स्वर्गलोक में रह रहा था, उसकी आयु वहां केवल छह मास रह गयी थी। उसे अगले जन्म में भगवान् मल्लिनाथ तीर्थंकर के रूप में जन्म लेना था। ऐसा नियम है कि भगवान् तीर्थंकर के जन्म से पहले, उनकी जन्म भूमि में कुबेर द्वारा रत्नों की वर्षा की जाती है। अस्तु इन्द्र ने कुबेर को आज्ञा दी कि वह इस कार्य के लिए मिथिलापुरी जाए।
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मिथिलापुरी में आकर कुबेर ने सर्वत्र रत्न वर्षा की। उसे देखकर मिथिला के नागरिकों ने साक्षात् धर्म-फल समझा।
उधर एक रात महारानी प्रजावती ने सोलह स्वप्न देखे। सबसे पहले स्वप्न में उसने इन्द्र का ऐरावत हाथी देखा जो सफेद और विशाल था। दूसरे स्वप्न में एक सफेद बैल देखा जो अपनी कांति का प्रकाश फैला रहा था। तीसरे स्वप्न में अत्यन्त बलशाली सिंह देखा। चौथे स्वप्न में लक्ष्मी जी को देखा जो मनोहर सिंहासन पर बैठी थीं और दो हाथी उन्हें जल से भरे घड़ों से स्नान करा रहे थे। इसके बाद दो पुष्प मालाएं देखी जिनकी सुगंध से चारों दिशाएं चमक रही थीं। छठवें स्वप्न में महारानी प्रजावती ने आकाश में अत्यन्त मनोहारी अखंड चंद्रमा देखा जो कि अपने तारा समूह के साथ भरा हुआ था। सातवें स्वप्न में अत्यन्त देदीप्यमान सूर्य देखा जिसकी प्रभा से समस्त अंधकार समाप्त हो रहा था। इसके बाद दो सोने के घड़े देखे जिनका मुख कमल पुष्पों से ढका हुआ था। नवें स्वप्न में कमल के फूलों से भरा तालाब देखा जिसमें मछलियों का जोड़ा किलोल कर रहा था। फिर दसवें स्वप्न में कमल के फूलों से भरा हुआ एक विशाल सरोवर देखा। ग्यारहवें स्वप्न में महारानी प्रजावती ने एक विशाल सागर देखा जिसका जल किनारे तक बढ़कर आ रहा था। बारहवें स्वप्न में एक स्वर्ग-सिंहासन देखा। तेरहवें स्वप्न में देवों का स्थान स्वर्ग में विमान देखा जो कि अपनी जगमगाती हुई कांति से शोभायमान था। चौदहवें स्वप्न में नागेन्द्र का भवन देखा जो कि कांति से जगमगाता हुआ अत्यन्त विशाल था। पन्द्रहवें स्वप्न में रत्नों की राशि देखी जिनके प्रकाश से अंधेरा दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता था। उसके बाद सोलहवें स्वप्न में आग की ज्वालाएं देखीं, किन्तु उनमें धुआं न था।
इन सोलह स्वप्नों को देखने के बाद महारानी प्रजावती ने अंत में देखा कि एक अत्यन्त सुन्दर हाथी उनके मुख में प्रवेश कर रहा है। इन स्वप्नों को देखने के बाद महारानी प्रजावती की नींद खुल गयी। वह बड़ी देर तक इनके बारे में सोचती रही। पर कुछ समझ न सकी।
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प्रातः काल जब महाराज कुंभ अपनी राजसभा में पहुँचे तो देखा कि महारानी प्रजावती भी सुन्दर सिंगार करके वहां पधार रही हैं, उन्हें देखकर राजा कुंभ अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्होंने पूरे शिष्टाचार से महारानी का स्वागत किया। फिर उन्हें अपने ही साथ सिंहासन पर बिठाया।
महारानी प्रजावती ने कहा, हे स्वामी! आज मैं एक विशेष कारण से आपको कष्ट देने आयी हूँ। आप मुझे क्षमा करें और अपने मन की बात निवेदन करने की अनुमति दें।
राजा कुंभ ने प्रसन्न होकर कहा- अवश्य कहिए महारानी!
तब महारानी प्रजावती ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया- हे देव! आज प्रातः काल, जबकि रात्रि का कुछ भाग शेष रह गया था, मैंने सोलह स्वप्न देखे। हे स्वामी उन स्वप्नों का फल क्या है, कृपाकर मुझे बताइए। मैं उन फलों को जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ। इस प्रकार महारानी ने एक-एक कर सभी स्वप्न बताए।
महाराज कुंभ ने प्रसन्न होकर कहा- हे देवि! स्वप्न में तुमने जो हाथी देखा है, उसका फल यह है कि तुम्हारे एक महान् पुत्र होगा, जिसे बड़े-बड़े देव तक आकर पूजेंगे और अपने को धन्य समझेंगे। विशाल बैल देखने का यह अर्थ है कि वह तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र होगा। उसे तीनों लोकों में सम्मान मिलेगा। सभी उसकी आज्ञा का पालन करेंगे। वह धर्म का स्वामी होगा। वह धर्म को आगे बढ़ाएगा।
हे देवि! आपने स्वप्न में जो सिंह देखा है, उसका फल यह है कि वह पुत्र, जिस प्रकार सिंह ताकत वाला होता है, उसी प्रकार ताकत वाला होगा। दो सुन्दर मालाएं बताती हैं कि आपका वह पुत्र धर्म तीर्थ का प्रवर्तक होगा- अर्थात् धर्म को चलाने वाला तीर्थंकर होगा। इसी प्रकार जल से स्नान करती लक्ष्मी का अर्थ है कि बड़े-बड़े देव आकर तुम्हारे पुत्र को मेरु पर्वत के मस्तक पर ले जाकर स्नान करावेंगे। स्वप्न में आपने जो पूर्ण चन्द्रमा देखा है, उसका फल यह है कि जिस प्रकार चंद्रमा जीवों को आनंद प्रदान करने वाला है और अंधकार का
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नाशक है, उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भी संसार को आनंद प्रदान करने वाला और मोहरूपी अंधकार का सर्वथा नाश करने करने वाला होगा।
हे महारानी! आपने जो सूर्य देखा है उसका फल यह है कि जिस प्रकार सूर्य अँधेरे को मिटाता है- अर्थात् उसके उदय होते ही संसार के समस्त पदार्थों में चेतना आ जाती है, और सारा जगत् प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार तुम्हारा पुत्र भी समस्त अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाला होगा। उसका प्रताप सूर्य के प्रकाश के समान सर्वत्र फैलेगा।
आपने जो दो सोने के घड़े देखे हैं, उनका फल यह है कि तुम्हारा पुत्र निधियों का स्वामी होगा। तालाब में खिलोल करती दो सुन्दर मछलियों का अर्थ है कि वह पुत्र परम सुख देने वाला होगा। जल से भरे हुए कमल-पुष्प युक्त सरोवर का किनारे तक जल से बहाने वाले सागर का अर्थ है कि तुम्हारा पुत्र समस्त लोकों को प्रकाश देने वाला केवल ज्ञान का स्वामी होगा।
स्वर्ण सिंहासन को देखने का फल यह है कि तुम्हारा पुत्र साम्राज्य पद के योग्य होगा और समस्त जगत् उसे नमस्कार करेगा। स्वप्न में जो स्वर्ग देखा है, उसका अर्थ है कि वह स्वर्ग से तुम्हारे गर्भ में आवेगा। जगमगाते हुए नागेन्द्र भवन का फल यह होगा कि वह अवधिज्ञान रूपी नेत्र वाला होगा। रत्नराशि का फल यह है कि वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का भंडार होगा। बिना धुएँ की अग्नि देखने का फल यह है कि समस्त जगत् का स्वामी, तुम्हारा पुत्र, ज्ञान के शत्रुओं को जला डालेगा।
हे देवि इन स्वप्नों के अन्त में, आपने अपने मुख कमल से हाथी को प्रवेश करते देखा है। उसका फल यह है कि तुम्हारे निर्मल गर्भ में उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान् मल्लिनाथ जिनेन्द्र स्वयं जन्म लेंगे।
राजा कुंभ को भूत-भविष्य-वर्तमान की घटनाओं का जानने का ज्ञान प्राप्त था। इसलिए उन्होंने इन स्वप्नों का अर्थ बिल्कुल सही समझा दिया था। उनके
भगवान् मल्लिनाथ
उत्तर से महारानी प्रभावती इतनी प्रसन्न हो गयी कि मानों उन्हें तत्काल ही पुत्र-रत्न मिल गया हो।
चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन शुभ लग्न में, राजा वैश्रवण का जीव जो इन्द्र के रूप में था, वह भगवान् मल्लिनाथ के रूप में रानी प्रभावती के गर्भ में आ गया।
भगवान् मल्लिनाथ के गर्भ में आते ही हर ओर प्रसन्नता का वातावरण छा गया। सभी नगरवासी यह अनुभव करने लगे कि कुछ शुभ होने वाला है, किसी देव पुरुष का जन्म होने वाला है। स्वर्ग से राजा इन्द्र ने आकर राजा कुंभ और महारानी प्रभावती का पूजन किया। इन्द्र की आज्ञा से छप्पन देवकुमारियाँ महारानी की सेवा करने लगीं। वे देवांगनाएँ महारानी प्रभावती की हर प्रकार से सेवा करतीं, उनका मनोरंजन करतीं।
एक दिन देवांगनाओं ने महारानी प्रभावती से कुछ प्रश्न पूछे जिनके उत्तर महारानी ने बड़ी ही सूझबूझ से और संतोष प्रदान करने वाले उत्तर दिए।
प्रश्न- हे माता, इस संसार में तुम्हारे समान परम सौभाग्यवती स्त्री कौन हो सकती है?
उत्तर- जो स्त्री धर्म के स्वामी तीर्थंकरों को उत्पन्न करने वाली हो।
प्रश्न- संसार में अज्ञान को दूर करने वाला उत्तम गुरु कौन हो सकता है?
उत्तर- जो गुरु वास्तविक रूप से तत्त्वों का जानकार हो, परिग्रहों से मुक्त हो और संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए प्राणियों को पाप से मुक्त कराने वाला हो।
प्रश्न- संसार में मिथ्या या झूठा गुरु कौन है?
उत्तर- जो पाँचों इंद्रियों में डूबा हो, लोभी हो, क्रोधी हो, घमंडी हो।
प्रश्न- संसार में, समस्त पुरुषों में उत्तम पुरुष कौन है?
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उत्तर- जिसके अन्दर मोह-लोभ की भावना समाप्त हो चुकी हो, और वह मोक्ष पाने के लिए प्रयत्न कर रहा हो।
प्रश्न- संसार में सबसे नीच पुरुष किसे कहेंगे?
उत्तर- जो अनेक प्रकार से तपों का आचरण करने वाला होकर भी इंद्रिय रूपी शत्रुओं के वश में हो- अर्थात् लंपट और विषय-वासना में डूबा हो।
प्रश्न- संसार में विद्वान पुरुष किसे मानना चाहिए?
उत्तर- जिसमें हर एक पदार्थ का वास्तविक रूप से विचार करने का विवेक-ज्ञान हो। अर्थात् जो यह बता सके कि यह पदार्थ छोड़ने योग्य है और यह पदार्थ ग्रहण करने योग्य है। इस प्रकार वह विवेक-ज्ञानी हो और उसे शास्त्रों का भी अच्छा ज्ञान हो।
प्रश्न- संसार में मूर्ख किसे समझना चाहिए?
उत्तर- जो शास्त्रों को जानकर भी अत्यन्त अहंकारी हो और पाप कर्मों में लीन रहता हो।
प्रश्न- संसार में मनुष्यों को सबसे जल्दी कौन-सा कार्य करना चाहिए।
उत्तर- स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति के उपाय ग्रहण करना चाहिए, उनका पालन करना चाहिए।
प्रश्न- इस संसार में सबसे हितकारी उपाय कौन-कौन से हैं?
उत्तर- तप, दान, व्रतों का पालन और सम्यग्दर्शन आदि को स्वीकार करना।
प्रश्न- संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली उपाय या साधन कौन-सा है?
उत्तर- उत्तम तप, दान आदि के द्वारा प्राप्त किया हुआ धर्म। इस धर्म का पालन ही मनुष्य को स्वर्ग और मोक्ष दिलाता है।
प्रश्न- संसार में कैसे वचन बोलना अच्छा माना जाता है?
उत्तर- वह सत्य जो दूसरों का हित करे, उनके लिए शुभ हो!
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प्रश्न- संसार में जागने वाला कौन है?
उत्तर- जो महापुरुष सदा अपनी आत्मा के स्वरूप का चिन्तन करने वाला हो।
प्रश्न- संसार में मनुष्य के वैरी कौन है?
उत्तर- क्रोध, मान, माया, लोभ।
प्रश्न- संसार में सच्चा मित्र कौन है?
उत्तर- जो धर्म का पालन करने वाला हो, जिसका चारित्र शुद्ध हो और जो पूजा आदि उत्तम कार्य करता हो।
प्रश्न- संसार में शत्रु पुरुष कौन है?
उत्तर- जो न धर्म करता है, न तप करता है और न दान देता है।
प्रश्न- संसार में सबसे उत्तम पीने योग्य क्या है?
उत्तर- भगवान् जिनेन्द्र का वचन रूपी अमृत।
प्रश्न- संसार में सुखी व्यक्ति कौन है?
उत्तर- जो संतोष रहने वाला हो।
प्रश्न- संसार में दुःखी पुरुष कौन है?
उत्तर- जो सांसारिक सुख भोगने में लीन है?
प्रश्न- संसार में अत्यन्त धनवान पुरुष कौन माना जाता है?
उत्तर- जिसके पास धन कम हो, पर वह खुले हाथों से दान देता हो।
प्रश्न- संसार में निर्धन कौन है?
उत्तर- जो धनवान होकर भी दान नहीं देता तथा अधिक धन की लालच में भटकता है।
प्रश्न- संसार में उत्तम कार्य क्या माना जाता है?
उत्तर- जिससे करने से सर्वत्र यश फैले, धर्म का लाभ हो और समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति हो।
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इस प्रकार महारानी प्रजावती ने, देवांगनाओं के प्रश्नों के उत्तर बड़े उत्तम ढंग से दिए, जिन्हें सुनकर वे परम संतुष्ट हुईं।
जब ठीक नवमा महीना पूरा हो आया तो अगहन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन अश्विनी नक्षत्र में माता प्रजावती ने भगवान् मल्लिनाथ को जन्म दिया।
भगवान् मल्लिनाथ के जन्म लेते ही पृथ्वी और स्वर्ग- दोनों में ही आनंद की लहर फैल गयी। सब ओर एक ही स्वर गूँज रहा था- हे स्तुति करने योग्य भगवान्! आप जयवंत रहें और जिएँ। हे पूज्य, आप फूलें और आपकी वृद्धि हो।
फिर स्वर्ग से इन्द्र तथा अन्य देवगण वहाँ आ गए। इन्द्राणी ने रनिवास में जाकर, महारानी प्रजावती को बधाई दी। फिर उनके पास लेते भगवान् मल्लिनाथ के दर्शन किए। उन्होंने उनकी तीन बार परिक्रमा की और फिर भक्ति पूर्वक नमस्कार किया। इन्द्राणी ने रानी प्रजावती से कहा।
इन्द्राणी हे माता! तुमने तीन लोकों के गुरु भगवान् मल्लिनाथ को जन्म दिया है। इसलिए तुम समस्त लोकों की माता हो। तुम्हारे समान कोई भाग्यवान् महिला नहीं है, अस्तु तुम्हीं तीन लोकों की शिरोमणि हो। तुम्हीं इस जगत् में श्रेष्ठ हो।
इस प्रकार इन्द्राणी ने महारानी प्रजावती की वंदना की और अपनी माया से उन्हें सुला दिया। फिर अपनी माया से ही एक और बालक को उनके पास लिटाकर भगवान् मल्लिनाथ को उठा लिया। इन्द्राणी शिशु मल्लिनाथ को लेकर इन्द्र के पास गयी।
देवलोक के राजा इन्द्र ने भगवान् मल्लिनाथ के शिशु रूप को देखा तो वह भक्ति पूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।
इन्द्र हे बालचंद्र! हम लोकों को परमानंद प्रदान करने के लिए संसार में तुम्हारा उदय हुआ है। हे प्रभु! संसार के समस्त प्राणी मोहकरूपी अंधकार में पड़े हैं। उन्हें धर्म का सहारा देकर आप ही उनका उद्धार करेंगे। हे स्वामी,
भगवान् मल्लिनाथ
इस स्वयं संसार में बंधु, पत्नी, माता सभी स्वार्थी हैं। किन्तु यदि कोई निः स्वार्थी बंधु है, तो वह आप है, इसलिए हे नाथ! आप समस्त लोकों को ज्ञानप्रद प्रदान करने वाले हैं। आप संसार को प्रसन्नता देने वाले बालचंद्र हैं। अस्तु, आपको नमस्कार है।
इस प्रकार भक्ति पूर्वक राजा इन्द्र देव ने भगवान् मल्लिनाथ की स्तुति की। फिर उन्हें गोद में लेकर ऐरावत हाथी पर बैठाकर उनका अभिषेक करने के लिए मेरु पर्वत की ओर चल दिया।
मेरु पर्वत पर पांडुक नाम की एक शिला है। उसी पर भगवान् मल्लिनाथ को एक सुन्दर सिंहासन पर विराजमान करके, तीर्थंकर मल्लिनाथ के अभिषेक की तैयारी की।
पांडुक शिला के बारे में कहा जाता है कि वह अत्यन्त शुद्ध स्फटिक पत्थर की बनी है। उस शिला पर अनेक तीर्थंकरों का अभिषेक किया जा चुका है। इसलिए कितनी ही बार उस शिला का भी अभिषेक हो चुका है। वह इसी कारण से अत्यन्त शुद्ध एवं पवित्र सिद्ध शिला मानी जाती है।
भगवान् मल्लिनाथ का अभिषेक देखने के लिए अनेक देवगण पांडुक शिला पर बैठ गए। शिला पर एक सुन्दर मंडप बना दिया था। चारों ओर मधुर संगीत गूँज रहा था। अभिषेक के लिए क्षीर-सागर से निर्मल जल लाया गया था। भगवान् मल्लिनाथ की जय बोलते हुए इन्द्र तथा देवगणों ने बालचंद्र भगवान् मल्लिनाथ का विधि पूर्वक अभिषेक किया। फिर इन्द्राणी ने उन्हें सुन्दर कोमल वस्त्र पहनाए। तिलक लगाया और मुकुट पहनाया। हाथों में छोटे-छोटे कड़े पहनाए और कमर में करधनी बांधी, और पैरों में घुंघरू पहनाए। इस तरह उन्हें अच्छी तरह सजा दिया। उनका वह भव्य रूप देखकर इन्द्र आदि देवता मुग्ध हो गए और उनकी स्तुति करने लगे।
इन्द्र हे नाथ! संसार में न तो कोई आपके समान इस जगत का बंधु है। न आपके समान कोई समस्त जगत का गुरु है। अपना और पराया हित करने वाला भी
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आपके समान और कोई नहीं है। हे नाथ! आपके समान पवित्र आत्मा वाला, अन्य कोई इस संसार में नहीं है। इसलिए हे स्वामी, आपसे प्रार्थना है कि आप इस जगत के संसारी प्राणियों का उद्धार करने वाले हैं।
इस प्रकार अभिषेक के बाद राजा इन्द्र शिशु मल्लिनाथ को लेकर मिथिलापुरी लौट आए। वहां सब समय राजा कुंभ के आंगन में एक सुन्दर सिंहासन रखा था। इन्द्र ने शिशु मल्लिनाथ को उस पर विराजमान किया। इसके बाद इन्द्राणी उन्हें उठाकर ले गयी और महारानी प्रजावती को बगल में लिटाकर अपनी माया समाप्त कर दी।
भगवान् मल्लिनाथ के जन्म पर राजा कुंभ ने जिन मंदिर में महापूजा की। फिर अनेक प्रकार से दान देकर सबकी इच्छा पूरी कर दी।
इन्द्र देव ने स्वर्ग जाते हुए, कुछ देवों को भगवान् मल्लिनाथ की सेवा के लिए नियुक्त किया था। वे देव उनका हर प्रकार से ध्यान रखते थे। शिशु मल्लिनाथ दिनों दिन विकसित होने लगे। वे देव उनके साथ तरह-तरह के खेल रचाते। कोई हाथी का रूप बनाता, कोई घोड़े का और कोई बंदर का। तो कोई बालक का तो कोई छोटे देव का।
इस प्रकार भगवान् मल्लिनाथ का विकास बराबर होता जा रहा था। बाल्यावस्था बीतने पर भगवान् के अंदर बुद्धि और ज्ञान अपने आप विकसित होने लगा।
भगवान् मल्लिनाथ का शरीर जिस तरह विकसित हो रहा था- वह अत्यन्त मनोहारी था। वह अत्यन्त पुष्ट और पराक्रमी शरीर वाले थे। सुगठित और सुन्दर शरीर वाले युवक भगवान् मल्लिनाथ को देखते तो उन पर से दृष्टि हटाना कठिन हो जाता। जब तक वह रूप लोग हृदय में न उतार लेते, उसे देखते ही रहते।
भगवान् मल्लिनाथ की युवावस्था देखकर एक दिन राजा कुंभ ने कहा- प्रिय पुत्र! इस पृथ्वी पर ही एक पृथ्वीपुर राज्य है। उसका राजा है भूपाल। उसकी
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कन्या है- ‘जग्दूरी’। उसका रूप, गुण आदि सब अत्यन्त प्रशंसनीय है। यह कन्या तुम्हारे सर्वथा योग्य है। मैं चाहता हूँ कि तुम उससे विवाह कर लो। भगवान् मल्लिनाथ ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
शीघ्र ही विवाह की तैयारियाँ हुई। निश्चित दिन शुभ मुहूर्त में बारात चली। जब राजद्वार से निकल कर भगवान् मल्लिनाथ की सवारी पृथ्वीपुर की ओर चली तो मिथिलापुर की अद्वितीय शोभा देखकर भगवान् मल्लिनाथ को स्वर्गपुरी की याद हो आयी। उन्होंने सोचा- स्वर्गपुरी में तो मुझे सारे सुख थे। फिर भी जब यह जीव उनसे संतुष्ट नहीं हुआ तो क्या यहां हो सकेगा? ये भोग और सुख ही तो सारे दुखों का कारण है। इस संसार में किसी को भी तृप्ति नहीं होती। समुद्र में कितनी ही नदियों का पानी गिरे, पर उसे क्या तृप्ति हो सकती है, लोभी को कितना ही धन मिल जाय, पर क्या वह तृप्त हो सकता है? तब फिर ऐसे सुखों के पीछे क्यों भागें, जिन्हें पाकर भी तृप्ति न हो, बल्कि ‘और’ ।… ‘और’ की चाह हो। वास्तविक सुख तो मोक्ष प्राप्ति के बाद ही प्राप्त होता है। इसलिए मोक्ष प्राप्ति के लिए तो इन सांसारिक सुखों को त्यागना ही पड़ेगा।
इन विचारों के आते ही भगवान् मल्लिनाथ ने विवाह न करने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा- ऐसा उत्सव मनाओ जो कभी समाप्त न हो। ऐसा ब्याह रचाओ जिसमें दोबारा ब्याह की आवश्यकता न हो। मैं तो ‘मुक्ति वधू’ से ही ब्याह रचाऊँगा। मोक्ष का ही उत्सव मनाऊँगा।’
भगवान् मल्लिनाथ का यह निश्चय सुनकर देवगण उनके निकट आए और बोले- हे देव! आप तीन लोक के स्वामी हैं। इस लोक में इस समय धर्म तीर्थों को चलाने वाले आप ही हैं। आप ही स्वयं मोक्ष वधू के स्वामी होने वाले हैं। हे देव! आपने जो विचार अपने मन में सोचे हैं, उससे आपका और इस जगत् का हित होने वाला है। मोक्ष-प्राप्ति के लिए आपने इस अवस्था में ही भोगों का त्याग कर दिया है। यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है। इसलिए आप महान् हैं। हे प्रभो आपके अन्दर केवल ज्ञान का उदय होगा। आपके द्वारा दिए गए धर्मोपदेश से, कोई भी व्यक्ति धर्मपालन करके मोक्ष प्राप्त कर सकेगा। इसलिए हे देव,
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हमारी प्रार्थना है कि आप एक पल भी नष्ट किए बिना शीघ्र ही संयम धारण करें।
भगवान् मल्लिनाथ ने वैराग्य धारण करने का निश्चय कर लिया था। वह वन के लिए प्रस्थान करने को तैयार हुए। उनके लिए जयन्ती नामकी सुन्दर पालकी लाई गई। उस पर वह विराजमान हुए। देवगणों ने वह पालकी उठाई और वन की ओर ले चले। उस समय भगवान् मल्लिनाथ अत्यन्त शांत मुद्रा में बैठे थे। कुछ देवगण उन पर सफेद चंवर डुला रहे थे।
जब भगवान् मल्लिनाथ वन की ओर दीक्षा के लिए चले गए तो उनकी माता प्रजावती को बड़ा दुःख हुआ। वह विलाप करती हुई, अन्य रानियों तथा परिवार के लोगों के साथ भगवान् मल्लिनाथ के पीछे-पीछे चलने लगी। रानी प्रजावती की हालत बड़ी दयनीय थी। वह रो-रो कर बेहाल हो रही थी। उनके बाल बिखर गए थे। शरीर की कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वह चीख-चीखकर यही कह रही थी- ‘हे प्यारे पुत्र! तू मुझ अभागिनी को क्यों छोड़कर दीक्षा के लिए चल दिया।’ वह रोते-रोते बेहोश हो गयी। तब पानी पिलाकर किसी तरह होश में लाया गया।
एक भद्रपुरुष ने उन्हें समझाया- हे देवि! आपका इस तरह रोना-पीटना शोभा नहीं देता। भगवान् मल्लिनाथ तीन लोकों के स्वामी हैं। वह हित-अहित को समझते हैं। क्या आप उनके हाल को बिल्कुल नहीं जानती? हे माता! जिस तरह जाल से छूटे हुए हिरन का हाल होता है, आपके पुत्र का है। वह संसार के जाल से छूट चुके हैं। उन्हें वैराग्य हो गया है और वह मोक्ष प्राप्ति के लिए जा रहे हैं। यह सुनकर माता प्रजावती शांत हुई और राजभवन की ओर लौट गयी।
भगवान् मल्लिनाथ जिस वन की ओर जा रहे थे, उसका नाम था- श्वेतवन। श्वेतवन का उद्यान बड़ा ही मनोहर था। तरह-तरह के सुन्दर पुष्प व फल वाले वृक्ष उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहां देवगण ने एक शिला का निर्माण कर दिया था। भगवान् मल्लिनाथ उसी शिला पर पूर्व की ओर मुख करके बैठ गए। उन्होंने कहा- ‘ॐ नमः सिद्धेभ्यः’ अर्थात् सिद्ध भगवान् को नमस्कार है। फिर सायंकाल
भगवान मल्लिनाथ
के समय उन्होंने दीक्षा ली। उन्होंने जो केश उखाड़कर फेंके थे, इन्द्रदेव ने उन्हें बड़ी भक्ति और आदर से रत्नजड़ित पिटारी में रख लिया।
उस समय इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा- हे देव ! जिस प्रकार बाल अवस्था में भी संयम धारण के लिए आपके अन्दर शक्ति आयी, ऐसी ही शक्ति आपकी कृपा से हमें भी प्राप्त हो और हम लोग आप से प्रेरणा लें।
इसके बाद भगवान् मल्लिनाथ ने तप-साधना आरंभ की। वह अपने विचारों में इतना डूब चुके कि उन्होंने अन्दर व बाहर की सभी जरूरतों और इच्छाओं को त्याग दिया। जब उन्होंने साधना समाप्त की तो उन्होंने अनुभव किया कि शरीर को चलाने के लिए आहार तो लेना ही होगा। इस प्रकार भगवान् मल्लिनाथ अपने चिन्तन में डूब कर आहार के लिए चल दिए। वह सीधे अपने राज्य मिथिलापुरी में ही प्रवेश कर गए।
मिथिलापुरी में ही नन्दिषण नाम का एक राजा रहता था। आहार के लिए घूमते हुए भगवान् मल्लिनाथ को उसने देखा। यह तो परम सौभाग्य का अवसर था। उसने दोनों हाथ जोड़कर उनके चरणों को नमस्कार किया और उन्हें आहार-दान दिया।
इस प्रकार भगवान् मल्लिनाथ ने छह दिनों तक विहार किया। इन दिनों में वह सदा अपने ध्यान में लीन रहे। उन्होंने जंगल, खंडहर आदि अनेक निर्जन स्थानों में वास किया। छह दिनों के बाद वह श्वेतवन में वापस आ गए। वहां अशोक वृक्ष के नीचे उन्होंने अच्छी तरह ध्यान किया। उनका तप बढ़ता गया। साधना अपनी उच्चता को प्राप्त करती गयी।
पौष कृष्ण द्वितीया को पूर्वाहन में भगवान् मल्लिनाथ को केवल ज्ञान प्राप्त हो गया। इस समाचार से स्वर्ग में हलचल मच गयी। इन्द्रदेव ने तत्काल वहां पहुँचकर महोत्सव की तैयारी करने लगे। नामदत्त नामक एक देव ने, विशाल ऐरावत हाथी का निर्माण किया था। वलाहक नामक देव ने कामक नामक विमान की रचना की थी।
सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ
ऐरावत हाथी कुछ विचित्र प्रकार का, किन्तु अत्यन्त सुन्दर था। उसके बत्तीस मुख थे। हर एक मुख में आठ-आठ दाँत थे। हर दाँत पर कमल के फूल सुशोभित थे। इस प्रकार राजा इन्द्रदेव और स्वर्ग के देवगणों ने श्वेत वन में आकर भगवान् मल्लिनाथ की जय-जयकार की। उन्होंने भगवान् के समवशरण का आयोजन किया। समवशरण का आयोजन अत्यन्त भव्य था।
समवशरण में भगवान् मल्लिनाथ के अमृत वचन सुनने के लिए विशाल जनसमूह, राजा, इन्द्र देव तथा देवगण आदि सभी व्याकुल थे। गणधर विशाख ने भगवान् मल्लिनाथ से निवेदन किया कि हे स्वामी आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जनता व्याकुल है, तो वह बोले- 'हे इस संसार रूपी समुद्र का कोई अंत नहीं है। इस समुद्र की लहरों में मनुष्य दुख-सुख के बीच फँसा रहता है। इन लहरों से मनुष्य को जो निकाल कर स्वर्ग और मोक्ष दिला दे। वही धर्म है। धर्म अनंत सुखों का सागर है। यह धर्म दो तरह का होता है। सकल धर्म और विकल धर्म। सकल को मुनि लोग धारण करते है और विकल धर्म को गृहस्थ लोग अपनाते है। धर्म के मूल में सम्यग्दर्शन है जो मोक्ष दिलाने की शक्ति रखता है। जो गृहस्थ धर्म को धारण कर मोक्ष प्राप्त करना चाहते है, उन्हें सबसे पहले सम्यग्दर्शन ग्रहण करना चाहिए इसके अंतर्गत शराब, मांस, मधु का त्याग और पाँच उदम्बर अर्थात् उमर, कटूमर, कटहल, पीपल और पाकर का त्याग करना चाहिए। जो लोग महाव्रतों को धारण करना चाहते है, उन्हें जुआ, शराब, मांस, पर नारी, चोरी और शिकार आदि बुराइयों को त्यागना होगा। साथ ही हिंसा, चोरी, झूठ, कुशील और परिग्रह नामक पाँच पापों का त्याग करना अनुव्रत है।
अहिंसा समस्त व्रतों की जननी है। अहिंसा के पालन से ही वास्तविक धर्म की उत्पत्ति होती है। मन, वचन और शरीर यहाँ तक कि दूसरों द्वारा भी करायी गयी हिंसा पाप है।
इसी प्रकार गृहस्थों को चाहिए कि जब भी बोलें, सत्य ही बोलें। दूसरों के हित की बात बोलें। और थोड़ा बोलें।
भगवान मल्लिनाथ
सोना चाँदी आदि बहुमूल्य वस्तुएँ चाहे भूमि के अन्दर गड़ी मिलें, मार्ग में गड़ी मिलें या कोई भूल गया हो, उन्हें कभी न ग्रहण करें। यह चौथा नामक तीसरा अणुव्रत है।
पर स्त्रियों को जो माता और बहन के समान समझता है, वह चौथा ब्रह्मचर्य (स्वदार संतोष) नामक अणुव्रत का पालन करता है।
संतोष को हृदय में धारण कर, अपनी जरूरत भर की वस्तु रखना ही अपरिग्रह पाँचवां अणुव्रत कहलाता है।
इसी प्रकार जीवों को दंड देना अनर्थ दंड कहा जाता है। उसका त्याग कर देना- ‘अनर्थ दंड व्रत’ नामक गुणव्रत कहलाता है। अनर्थ दंड के पाँच भेद है- पहला है- पापोपदेश। अर्थात् किसी को मारने, बांधने के लिए कहना, किसी पर बहुत बोझ लादना, छल-कपट आदि का उपदेश देना। दूसरा है- हिंसादान, अर्थात् किसी को फरसा, तलवार आदि हिंसा का कोई शस्त्र देना। तीसरा है आर्तध्यान- यानी किसी दूसरे के प्रति चाहे वह स्त्री पुरुष या बालक कोई हो- यह सोचना कि उसे हानि हो जाय, वह मर जाय। चौथा भेद है- दुःश्रुति- अर्थात् ऐसे शस्त्रों को सुनना जो हिंसा, तथा अहंकार जैसी अनेक बुराइयों को मन में जगाएँ। पांचवां भेद है- प्रमादचर्या- अर्थात् बिना किसी कारण पानी बहाना, आग लगाना, पेड़ काटना आदि।
इसी प्रकार अन्य गुणव्रत है जिनका धारण करने से गृहस्थों को स्वर्ग के दिव्य सुख प्राप्त होते है। इसलिए जो लोग धर्म के अभिलाषी है, उन्हें धर्म की वृद्धि के लिए बारह प्रकार का तप, ध्यान, अध्ययन, शुभ योग और आचार आदि का सदा ध्यान रखना चाहिए। इस परम पावन धर्म की कृपा से ही पुत्र, पौत्र आदि की प्राप्ति होती है। इष्ट भोगों का मिलना भी धर्म से ही होता है। सज्जन और मित्र के समान सेवक भी धर्म की कृपा से प्राप्त होते है। माता-पिता आदि बांधवों की प्राप्ति भी धर्म की ही कृपा से होती है। जो पुरुष धर्मात्मा है उनके घर लक्ष्मी को वास होता है।
• सुगों सुनाएँ सत्य कथाएँ •
इसलिए जो लोग धर्मात्मा हैं, उन्हें सदा ही यत्नपूर्वक धर्म का पालन करना चाहिए। जो लोग इस संसार में अपने पूर्व जन्मों के सुफल से सुखी हैं, उन्हें भी धर्मबुद्धि सुख वृद्धि और मोक्ष प्राप्ति के लिए धर्म का पालन नियमित रूप से करना चाहिए।
दूसरों के दुख हरने के लिए उत्तम धर्म का पालन करना चाहिए। संसार में मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है। इसलिए इसका एक-एक पल धर्म-पालन में बिताना चाहिए।
इस प्रकार भगवान् मल्लिनाथ ने जब धर्म के महत्त्व को समझाया तो समवशरण में बैठे सभी लोग का मन धर्म पालन में लीन हो गया। धर्मोपदेश के अतिरिक्त भगवान् मल्लिनाथ ने मोक्ष का मार्ग, मोक्ष के कारण और मोक्ष का फल भी बताया। फिर उन्होंने तीन प्रकार के लोकों का भी वर्णन किया।
भगवान् मल्लिनाथ का उपदेश सुनकर बहुत से लोगों को संसार से उदासीनता हो गई। उन्होंने वहां से आकर धर्म संबंधी कार्यों में मन लगाया। फिर वैराग्य अपनाकर तप धारण कर लिया।
समवशरण के अंत में स्वर्गलोक के स्वामी राजा इन्द्रदेव ने भगवान् मल्लिनाथ की स्तुति करते हुए कहा- हे भगवान् आपकी वचन रूपी किरणों से मोह और अज्ञान रूपी अंधकार आज सर्वथा नष्ट हो रहा है। इससे भव्य जीवों की वास्तविक मार्ग का ज्ञान प्राप्त हो रहा है। तीनों लोकों का भरण पोषण करने वाले आप ही हैं। आप ही समस्त जीवों के बंधु स्वरूप हैं। विशाल समुद्र में, जहाज के अन्दर बैठे लोग जिस तरह उसके सहारे समुद्र पार कर लेते हैं, उसी तरह आपके धर्मोपदेश रूपी जहाज में बैठकर वे इस संसार सागर को पार कर सकेंगे। हे स्वामी! आप गुणों के सागर हैं। आपके गुणों का वर्णन करना हमारे लिए संभव नहीं है।
इसलिए हे स्वामी! आपसे प्रार्थना है कि इस संसार के समस्त जीवों को आप धर्मोपदेश प्रदान करें। भव्य जीवों के लिए आप शरण बनें। उन्हें वास्तविक मार्ग
• भगवान् मल्लिनाथ •
का उपदेश दें। यह कहकर इन्द्र देव ने उन्हें प्रणाम किया।
इन्द्रदेव की प्रार्थना सुनकर भगवान् मल्लिनाथ अपने आसन से उठ खड़े हुए और किसी चक्रवर्ती सम्राट की भांति धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए चल पड़े।
इस प्रकार समस्त जीवों में धर्म का भाव जगाते हुए, अपने वचन रूपी अमृत से सबको आनंद देते हुए भगवान् मल्लिनाथ समस्त पृथ्वी पर विहार करने लगे। वह सूर्य के समान, अपने वचन रूपी किरणों से मिथ्या-मोह के अंधकार को नष्ट करते जा रहे थे। उनके साथ विभिन्न विद्याओं के ज्ञाता चालीस हजार मुनि साथ थे। ये मुनिगण भी मोह के अंधकार को नष्ट करने वाले थे। संसार की शोभा थे।
भगवान् मल्लिनाथ की सभा में पचपन हजार आर्यिकाएं थीं। जो सम्यक्दृष्टि और मूलगुणों को धारण करने वाली थीं। एक लाख श्रावक थे। तीन लाख श्राविकाएं थीं। ये सब भगवान् की पूजा और भक्ति करते थे। इस प्रकार भगवान् मल्लिनाथ समस्त जीवों को मोक्ष का मार्ग बताते रहे, उन्हें धर्म का प्रकाश देते रहे।
जब भगवान् मल्लिनाथ की आयु का एक मास शेष रह गया, उस समय वह सम्मेद शिखर पर जाकर विराजमान हो गए। वहां आपने अन्य मुनियों के साथ ध्यान में लीन हो गए। और फिर फाल्गुन शुक्ल पंचमी के दिन उनकी आयु का अंतिम समय आया। जिस समय उन्होंने अपना नश्वर शरीर छोड़कर सम्मेद शिखर से मुक्ति प्राप्त की, स्वर्ग के देवों को पता लग गया। इन्द्र आदि देव तत्काल सम्मेद शिखर पर आ गए। उन्होंने भगवान् मल्लिनाथ के शरीर को प्रणाम किया और फिर बड़ी ही भव्य रीति से उनका अंतिम संस्कार किया।
बाल अवस्था में ही जिन भगवान् मल्लिनाथ ने मोह आदि का त्याग कर मोक्ष को प्राप्त किया, ऐसे प्रभु को जो वर्णन मैंने इस ग्रन्थ में किया है, वह भगवान् शीघ्र मुझे अपने समस्त गुण प्रदान करें यही प्रार्थना है।
आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थमाला से प्रकाशित साहित्य
आपके परिवार के लिए अति ही उपयोगी साहित्य एवं जैन चित्र कथा।
| क्र० | ग्रन्थ का नाम | मूल्य | क्र० | ग्रन्थ का नाम | मूल्य |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | तीन दिन में | 20.00 | 33. | मंत्र महाविज्ञान | 60.00 |
| 2. | भाग्य की परीक्षा | 20.00 | 34. | ज्योतिष विज्ञान | 60.00 |
| 3. | आटे का मुर्ग़ा | 20.00 | 35. | कर विज्ञान | 30.00 |
| 4. | जो करो सो भरो | 20.00 | 36. | वास्तु परिचय | 50.00 |
| 5. | ऋषि चमत्कार | 20.00 | 37. | योग परिचय | 50.00 |
| 6. | चमत्कार | 20.00 | 38. | बोधनी वार्ता | 20.00 |
| 7. | प्रभु का हरण | 20.00 | 39. | आत्म देखी आत्मा | 60.00 |
| 8. | सत्यघोष | 20.00 | 40. | जैन ज्योतिष महाविज्ञान | 160.00 |
| 9. | सात कौड़ियों में | 20.00 | 41. | महाश्रम सचित्र हिन्दी | |
| 10. | टीले बाबा की | 20.00 | अंग्रेजी, गुजराती | 750.00 | |
| 11. | चम्पावाला | 20.00 | 42. | अभय कुमार | 20.00 |
| 12. | खाली हाथ से बजती रही | 20.00 | 43. | भवन रत्नाकर | 35.00 |
| 13. | सिकन्दर और कल्याण मुनि | 20.00 | 44. | रत्नाकर की लहरें | 250.00 |
| 14. | चारित्र चक्रवर्ति | 20.00 | 45. | दान विधि | 5.00 |
| 15. | रूप जो बदलता नहीं जाता | 20.00 | 46. | जिन पूजा | 10.00 |
| 16. | राजुल-हिन्दी-अंग्रेजी | 20.00 | 47. | विमल भक्ति | 10.00 |
| 17. | स्वर्ग की सीढ़ी | 20.00 | 48. | आचार्य धर्मसागर पूजाञ्जलि | 31.00 |
| 18. | मुक्ति रेखा | 20.00 | 49. | सज्जन चित्त बल्लभ | 10.00 |
| 19. | मुक्ति का राही | 20.00 | 50. | कमल श्री नाटक | 10.00 |
| 20. | कल्याणी रामशाद | 20.00 | 51. | पंचकल्याणक | 20.00 |
| 21. | प्रतिशोध | 20.00 | 52. | समशरण विधान | 35.00 |
| 22. | अभय कुमार | 20.00 | 53. | अनामिका रानी | 30.00 |
| 23. | चेतना की विजय | 20.00 | 54. | गदहे जैसा जन्म-मरण | 30.00 |
| 24. | पद्मावती देवी | 20.00 | 55. | बाल भाग 1-2-3-4-5 | 25.00 |
| 25. | गाये जा गीत अमन के | 20.00 | 56. | अनोखी कथाएँ 1 से 10 तक | 20.00 |
| 26. | कठपुतली | 20.00 | 57. | छह ढाला | 10.00 |
| 27. | परोपकार | 20.00 | 58. | शान्ति विधान | 25.00 |
| 28. | श्रद्धा का फल | 25.00 | 59. | नवग्रह विधान | 20.00 |
| 29. | भगवान राम | 20.00 | 60. | वास्तु विधान | 20.00 |
| 30. | आओ बच्चों गाये गीत | 20.00 | 61. | मृत्युंजय विधान | 20.00 |
| 31. | साधना और सिद्धि | 70.00 | 62. | दश लक्षण विधान | 20.00 |
| 32. | ज्ञान विज्ञान | 30.00 | |||
| प्राप्ति स्थान - जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड, दिल्ली फोन - 0575-4600074 |
प्रकाशन सहयोगी
श्री धनपाल जैन
धर्मपत्नी श्रीमति रेशम जैन
दरियागंज दिल्ली जोहड़ी वाले
प्रकाशन सहयोगी
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धर्मपत्नी श्री पूनम जैन
पुत्र शुभम् जैन
विश्वास नगर दिल्ली
प्रकाशन सहयोगी
श्रीमती कमला जैन
सतघरा जैन मंदिर आदिनाथ
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा निविघ्न
समाप्ति के अवसर पर सहयोग
श्रीमति उमा देवी स्० श्री सुरेश चंद जैन
गली गुलयान दिल्ली ।
पुत्र अशोक जैन, राजेश जैन
प्रकाशन सहयोगी
श्री ओमप्रकाश जी जैन
धर्म प० श्री मति त्रिसला जैन
टोरन्टो (कनाडा)
आप से कुछ कहूं
जैन आगम साहित्य प्रथमानुयोग में, संसार की श्रेष्ठ कहानियाँ का
अक्षय भंडार भरा है। चारित्रता, नीति, उपदेश, वैराग्य, बुद्धिचातुर्य,
वीरता, साहस, विनयगुण, धैर्य, मैत्री, सरलता, क्षमाशीलता, व्रत उपवास
तपस्या आदि विषयों पर लिखी गई हजारों सुन्दर शिक्षाप्रद रोचक
कहानियों में से चुन चुन कर सरल भाषा शैली में भावपूर्ण रंगीन चित्रों
के माध्यम से प्रस्तुत करने का सर्व प्रथम प्रयास हमने किया था जो काफी
प्रगृति पर है।
जैन चित्र कथाओं के माध्यम से आपका मनोरंजन तो होगा ही साथ
ही इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और जीवन मूल्यों से आपका सीधा
सम्पर्क होगा।
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है