भगवान बनने जन्में हम - धार्मिक बाल कविता संग्रह भाग २ — जैन स्वाध्याय सामग्री | Bhagwan Banne Janmen Hum - Dharmik Bal Kavita Sangrah Bhag 2

भगवान बनने जन्में हम - धार्मिक बाल कविता संग्रह भाग २

धार्मिक बाल कविता संग्रह भाग 2

भगवान बनने जन्मे हम

धार्मिक बाल कविताएँ - भाग २

भगवान बनने जन्मे हम

रचनाकार

विराग शास्त्री (जबलपुर), देवलाली

चित्रांकन

भूषण चौहान, औरंगाबाद एवं आमना खान, देवलाली नासिक

© सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रथम आवृत्ति - 2000
(29 अप्रैल 2011 - देवलाली बाल शिविर के समापन पर)

मूल्य - 60 रु. (सी.डी. सहित)

  1. अरहंत
  2. सिद्ध
  3. आचार्य
  4. उपाध्याय
  5. साधु
  6. सबसे प्यारा आतमराम
  7. आज रविवार है
  8. शहद अरे क्यों खाते हो
  9. मम्मी मेरा जन्म दिवस है
  10. बंदर मामा कहाँ चले
  11. पापा गये थे बाजार
  12. आलू जी जो कहते हैं
  13. मम्मी मम्मी आओ ना
  14. माँ छोटी सी पिठ्ठी दे दो
  15. जय जिनेंद्र सब मिलकर बोलो
  16. जैन धर्म है वेरी स्वीट

प्रकाशक एवं प्राप्ति स्थान

आचार्य कुन्दकुन्द सर्वोदय फाऊण्डेशन, (रजि.) जबलपुर (म.प्र.)
पता - सर्वोदय, 702, जैन टेलीकॉम, फूटाताल, जबलपुर 482002 (म.प्र.)
मो. 0937329464, 09423212084; Email - [email protected]

अरहंत परमेष्ठी

चार घातिया कर्म को नाशें, श्री अरहंत कहाते हैं,
राग-द्वेष से रहित निराले, सबके मन को भाते हैं।
तीन लोक और तीन काल के सब द्रव्यों को जानते,
सबके ज्ञाता दृष्टा रहते, निज में ही सुख मानते।।

सिद्ध परमेष्ठी

सिद्ध प्रभु को नम नम नम, अशरीरी सिद्धों को नम,
आठ कर्म को नाशो तुम, सिद्ध शिला पर रहते तुम।
जन्म - मरण से दूर हो तुम, आतम रस को पीते तुम,
देह रहित हो ज्ञायक तुम, सिद्ध परम परमेष्ठी तुम।।
सिद्ध प्रभु को नम नम नम, अशरीरी सिद्धों को नम।

आचार्य परमेष्ठी

परम दिगम्बर मुद्रा जिनकी, मुनि संघ के नायक हैं,
गुण छत्तीस के धारी गुरुवर, मुनि संघ संचालक हैं।
दीक्षा देते योग्य शिष्य को, हित मित प्रिय उपदेश करें।
भव्य जीव के हैं उद्धारक, सबका ही कल्याण करें।
आतम रस के भोगी गुरुवर, मेरा तुमको सदा प्रणाम,
जिनशासन की शान तुम्ही हो, इन्द्र करें तेरा गुणगान।।

उपाध्याय परमेष्ठी

जिनवाणी का अध्ययन करते,
अदभुत ज्ञान महान है।
पढ़ते स्वयं पढ़ाते सबको,
रत्नत्रय गुण खान है।।

गुण पच्चीस के धारी मुनिवर,
जिन शासन की शान है।
उपाध्याय को नमन हमारा,
जिनका जीवन महान है।।

साधु परमेष्ठी

चिदानंद का पान करें नित,
रहते जंगल धाम जो।
गुण अट्ठाईस सहज पालते,
जिन शासन के प्राण जो।
चलते फिरते सिद्धों जैसे,
हम सबके आदर्श जो।
नग्न अवस्था पिच्छी-कमण्डल,
बाहर से पहचान लो।

आत्मराम

सबसे प्यारा आत्मराम,
जानना देखना मेरा काम।
भूख प्यास नहीं मेरा काम।
जन्मे मरे देह का काम।
मैं भी तो हूँ सिद्ध समान।
मुझको जाना मुक्ति धाम।

आज रविवार है

आज रविवार है।
छुट्टी का त्यौहार है।
जिनमंदिर में जायेंगे।
पूजा - पाठ रचायेंगे।
पाठशाला में जाना है।
ज्ञान खजाना पाना है।।

शहद

अरे क्यों खाते हो?

शहद अरे क्यों खाते हो?
कितना पाप कमाते हो।
यह मक्खी का थूक है,
तुमको लगता जूस है।
अग्नि में वे जल जातीं,
कितनी मक्खी मर जातीं।
मत खाना मानो तुम सीख,
ताली बजाओ हो गई जीत।

जन्म दिवस

मम्मी मेरा जन्म-दिवस है,
केक मिठाई लाओ ना।
नये-नये कपड़े दिलवा दो,
सबको घर पर बुलाओ ना।

मम्मी चुन्नू तेरा जन्म - दिवस है,
पहले तू मंदिर जाना।
भगवान का अभिषेक तू करना,
मुनिवर की भक्ति गाना।

टॉफ़ी - बिस्किट नहीं बांटना,
घर का बना केक खाना।
जन्म मरण का अंत करे तू,
फिर न लौट न भव में आना।

बंदर मामा

बंदर मामा कहाँ चले?
पूंछ दबाकर भाग चले।
परम दिगम्बर मुनि पधारे।
दर्शन करके कर्म जले।

आचार

पापा गये थे बाजार।
वहाँ से लाये थे अचार।
अचार में दिख गई इल्ली।
हँस रही मौसी बिल्ली।
मम्मी गाती गाना।
अचार कभी ना खाना।

आलूजी की सुनो प्रार्थना

आलू जी जो कहते हैं सुन लो जी।
आलू जी जो कहते हैं सुन लो जी।
सुन लो भैया मुझको न खानाजी।
सुन लो बहना मुझको न खानाजी।
जिनवाणी की सीख न मानी।
बहुत की है मैंने मनमानी।
आलू में अनंत जीव होते हैं जी,
सुन लो भैया मुझको न खानाजी।
सुन लो बहना मुझको न खानाजी।
आलू जी जो कहते हैं सुन लो जी। १-२
सुन लो भैया मुझको न खानाजी।
आलू जो खाता है जीव,
कितना पाप कमाता है जीव।
अनंत पाप का फल पायेगा।
चार गति में घूम जायेगा।
तुमको अरहंत पद पाना है जी
तुमको सिद्ध पद पाना है जी
सुन लो भैया मुझको न खानाजी
सुन लो बहना मुझको न खानाजी।
आलू जी जो कहते हैं सुन लो जी। १-२
सुन लो भैया मुझको न खानाजी।

सच्चा जैनी

मम्मी मम्मी आओ ना।
मुझको भी बतलाओ ना।
आलू क्यों न खाते हैं?
प्याज कभी न खाते हैं?
न रात्रि भोजन करते हैं?
क्यों पानी छान के पीते हैं?
बेटा! सुनो ध्यान से बात।
कभी न करना इनका साथ।
आलू-प्याज में होते जीव।
रात्रि भोजन में मरते जीव।
बिना छना पानी मत पीना।
ये सब जिनवाणी कहना।
श्री सर्वज्ञ प्रभु की वाणी।।
जो माने वह ही जैनी।।

भावना

माँ छोटी सी पीठी दे दे,
मैं मुनिवर बन जाऊँगा।
फिर जंगल के बीच बैठकर,
आतम ध्यान लगाऊँगा।

ये वादा करता हूँ माता,
तुझको नहीं रुलाऊँगा।
रत्नत्रय के पथ पर चलकर,
मुक्ति महल में जाऊँगा।

जय जिनेन्द्र

जय जिनेन्द्र सब मिलकर बोलो।
हाय-बाय और हेलो छोड़ो।
दोनों हाथ जोड़कर बोलो।
मन में श्रद्धा रखकर बोलो।
पापा और मम्मी से बोलो।
भैया - दीदी से भी बोलो।
स्वागत में मेहमान के बोलो।
छोटे - बड़े सभी से बोलो।
जय जिनेन्द्र से मुख खोलो।
जय जिनेन्द्र …

जैन धर्म है वेरी स्वीट

जैन धर्म है Very Sweet।
ठीक तरह से करना Treet।
रहना सदा ही Clean और Neet।
बन जाना फिर तुम भी Very Sweet।
जैन धर्म है Very Sweet।।

स्रोत: Gyata संग्रह।

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