भगवान आदिनाथ भाग २
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जैन चित्र कथाएँ
सुनो सुनाये सत्य कथाएं
आशीर्वाद
प्रज्ञा श्रमण मुनि श्री अमित सागर जी महाराज
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला
कृति : भगवान आदिनाथ
© : सर्वाधिकार सुरक्षित
लेखक : ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
पुष्प नं : 40
मूल्य : 20.00
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड
जिला गाजियाबाद (उ.प्र.)
: 914-600074
S.T.D. 0575-4600074
आदि देव
भाग द्वितीय
एक दिन राजा ऋषभदेव अपने सिंहासन पर शोभायमान हो रहे थे। उनके दाहिने बाएं, मंडलीक तथा अन्य अधिकारीगण बैठे थे। विभिन्न क्षेत्रों के गढ़पति भी वहां उपस्थित थे। अपने-अपने क्षेत्र की प्रगति और समस्याओं का विवरण वे राजा ऋषभदेव को सुना रहे थे। इसी समय देवलोक इन्द्र देव अपने गंधर्व, किन्नर, संगीतज्ञों और नर्तकियों के साथ वहां पधारे। ऋषभदेव ने उनका स्वागत किया। स्वयं इन्द्र ने भी ऋषभदेव को सम्मान दिया। फिर दोनों उप एक-दूसरे के निकट अपने-अपने आसनों पर विराजमान हुए।
इन्द्र ने कहा - ‘राजन् ! आज हमारी इच्छा हुई कि आपको वैभवशाली नगरी में, नृत्य-संगीत का कार्यक्रम आयोजित कर, उसकी शोभा को बढ़ावा जाय और आनंद की गंगा बहाई जाय। यदि आप आज्ञा दें तो कार्यक्रम आरंभ किया जाय।’
नीलंजना नृत्य
इन्द्र तो अतिथि थे। फिर नृत्य-संगीत तो आनंद देने वाली कलाएँ हैं। ऋषभदेव ने सहर्ष आज्ञा दे दी।
कुछ ही क्षणों पश्चात सभा मंडप संगीत की स्वर लहरियों और घुंघरूओं का झंकार से गूंज उठा। जैसे-जैसे नृत्य-संगीत में गति आती गयी - दर्शक भी मंत्र-मुग्ध होते गए। संगीत से आनंद देता है - फिर इस आनंद के प्रभाव से ऋषभदेव कैसे अछूते रह सकते थे। वह भी इस आनंद-गंगा में डूबकर संगीत-नृत्य का रस लेने लगे।
१
इन्द्र तो अवधि ज्ञान के देवता हैं। उन्होंने अपने इस ज्ञान से जान लिया कि अब शीघ्र ही ऋषभ देव वैराग्य लेने वाले हैं। अस्तु इन्द्र ने नीलांजना नाम की अप्सरा से नृत्य प्रदर्शित करने को कहा। नीलांजना का नृत्य तो अतीव होता था। उसका नृत्य आरम्भ हुआ तो दर्शक-श्रोता का मन भी उसके साथ थिरकने लगा, हिलोरें लेने लगा। नीलांजना की नृत्य कला के जादू ने सबको मोह लिया। किन्तु इसी बीच नीलांजना की आयु पूर्ण होने का समय आ गया। इन्द्र ने स्थिति भांप ली। इससे पहले कि नीलांजना का मृत-शरीर भू-पर गिरे, इन्द्र ने अपनी माया से नीलांजना का नृत्य जारी रखा। वहां बैठी किसी दर्शक को इसका आभास तक न हुआ कि यह नीलांजना का मृत शरीर नश्वर है। इसे माया जाल कुछ क्षणों तक भ्रम में डाल सकता है - किन्तु अंत तो इसकी नश्वरता ही है।
ऋषभदेव को वैराग्य
और ऋषभदेव के मन में एक नया चिंतन आरम्भ हो गया। इस संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है - सब नश्वर है। पेड़-पौधे, मानव, पशु-पक्षी, राजभवन, वैभव, धन-संपत्ति सब नष्ट होने वाले हैं। जैसे पानी का बुलबुला कुछ क्षणों के लिए दिखता है और फिर पानी में लीन हो जाता है। ऐसे ही यह शरीर क्षण भर में मिट जाता है। यह प्रकृति का अटल नियम है। जिसने यहां जन्म लिया है, उसको मृत्यु निश्चित है। तब फिर सुख-दुःख के लिए रोना कैसा ? मानव सुख के लिए
रोता है, दुःख में तो रोता ही है। पर ऐसा रोना किस काम का। सुख-दुःख की चाह में मानव अंतिम क्षण तक तड़पता है। पर वह किसके लिए ? यह शरीर तो उसे ले नहीं जाना। यह सब मन का खेल है। मन की चंचलता हमें एक जगह टिकने नहीं देती। इसीलिए तृष्णा बढ़ती है। हम तृष्णा लिए मृग की तरह भटकते रहते हैं। मन यदि कहीं टिक जाए, तो जीवन सफल हो जाता है। पर दुःख तो यही है कि मन कहीं टिकता नहीं। हमारा यही भटकाव हमें सही रास्ते से विमुख रखता है। लेकिन सत्य तो यही है कि मन की तृष्णा कब तक ? जब तक ये शरीर है। जिस दिन शरीर नहीं रहा, तृष्णा भी मर गयी। तो सब कुछ शरीर की नश्वरता से जुड़ा है। यह दुनिया का सुख झूठा है। जिसे लोग सुख मानते हैं, वह तो अज्ञान है। सत्य तो जीवन की नश्वरता है।
ऋषभदेव के मन में आए इन विचारों ने उन्हें विचलित कर दिया। वह समझ गए कि देवराज इन्द्र ने आकर क्यों यह नृत्य-संगीत का आयोजन किया। वह मुझे जीवन की नश्वरता का परिचय देना चाहते थे। उन्होंने इस नृत्य के बहाने शाश्वत यथार्थ के दर्शन कराए हैं। यह तो अच्छा हुआ कि इन्द्र देव ने समय रहते मुझे जगा दिया। मैं अब तक संसार की भौतिक उन्नति को लेकर ही उलझा रहा। मुझे तो अभी कुछ और करना है। मुझे सबसे पहले इस भौतिक जगत का त्याग करना होगा। तब मैं आत्म-शोध कर सकूंगा। आत्मशोध के बाद ही मैं सच्चा तप, सच्ची साधना कर सकूंगा।
उधर नृत्य-संगीत चल रहा था, इधर ऋषभदेव अपने इन विचारों में खोए हुए थे। इन्द्र देव समझ गए कि ऋषभ देव किन विचारों में खोए हैं। उन्हें नृत्य-संगीत बिल्कुल नहीं अनुभव हो रहा था। जैसे ही नृत्य-संगीत बंद हुआ, ऋषभदेव जैसे निद्रा से चौंक कर जाग उठे। तरुंतो नीलांजना का मृत-शरीर पड़ा हुआ था। राजसभा में सभी लोग इस मायावी चक्र को देखकर चकित रह गए। इधर ऋषभ देव का मन संसार से विरक्त होने लगा।
अगले दिन ऋषभदेव ने सबको यह बता दिया कि मैं वैराग्य लेना चाहता हूँ। वैभवशाली राजप्रासाद, भरापूरा परिवार, जीवन के सभी सुख सुलभ, सत्ता, अधिकार आदि को अचानक त्यागकर वैराग्य लेने का निर्णय किसी की समझ में नहीं आया। सहज रूप में ऐसे निर्णय पर विश्वास करना भी कठिन है। किन्तु ऋषभदेव ने विचार-मंथन के पश्चात यह निर्णय लिया था। इसलिए वे इस संबंध में सभी वर्गों एवं अधिकारियों को उत्तर देने के लिए तैयार हो चुके थे। वह सोच रहे थे कि अब मेरा भौतिक कार्य पूर्ण हो चुका है।
धरती पर मानव-सभ्यता का विकास हो चला है और वह अब अनवरत चलेगा। इसका कारण है कि मानव के अंदर ज्ञान का दीप प्रकाशित हो चुका है। यही कारण है कि अब सर्वत्र प्रगति दिखाई देती है। मानव के आचार-व्यवहार में परिवर्तन आया है। वह विवेकशील, चिंतनशील बन रहा है। उसमें बल और पराक्रम भी आया है। उसमें अब पुरुषार्थ भी जाग गया है। कर्म का महत्व सबने जाना है। उसको अपना कर मानव ने अपनी प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया है। ऐसी स्थिति में मेरा वैराग्य लेना उचित ही है। इतने दिनों में मैंने जो अनुभव किया है, वह क्या है ? यह वैभव, यह धन-संपत्ति, यह राज्य-पद सब झूठे हैं, नश्वर हैं, यदि कोई धन, वैभव का गर्व करता है तो वह उसका भ्रम है। संपत्ति, सत्ता, पद और मान का गर्व - रेत के घर के समान है। मैं अब तक जिस मोह बंधन में फंसा रहा - वह जीवन एक रूप है। यह रूप मिथ्या है, भ्रम है। इससे निकलकर जीवन की नश्वरता को जानना ही श्रेयस्कर है। जन्म-मरण के इस बंधन से मुक्त होना है तो मुझे वैराग्य को स्वीकार करना होगा। सुख-दुःख तो संसार-चक्र की नियति है। वैराग्य का भाव उससे मुक्ति दिलाता है। वैराग्य को अपना कर तप करना ही, जीवन की सार्थक वंदना है। यदि मैं अपने तप से संसार को मुक्ति का मार्ग बता सका तो जीवन की यह महान् उपलब्धि होगी।
ऋषभदेव के मन के ये विचार, उनके निर्णय को अधिक सुदृढ़ और अर्थवान बना रहे थे। उनके मन के इन भावों को जानकर देवराज इन्द्र बहुत प्रसन्न हो रहे थे। किंतु परिवार के लोग और राज्य की जनता प्रसन्न न थी। उन सबकी यही इच्छा थी कि ऋषभदेव वैराग्य न लें।
तब ऋषभदेव ने उन्हें समझाया - "आप लोग मेरे वैराग्य लेने से चिंतित न हो। आपकी चिंता यही है न, कि मैं अगर यहां से चला गया तो आपकी समस्याओं के समाधान कौन बताएगा।
पाठ
कितु ऐसा नहीं है। आप लोग अब जिस मार्ग पर चल पड़े हैं, उसमें आने वाली कठिनाइयों के हल खोजने की शक्ति भी आप में स्वयं जाग्रत हो जाएगी। मनुष्य जब तक कर्म नहीं करता, उसे उसकी कठिनाइयों का भी पता नहीं चलता। जब हम किसी कठिनाई को जान जाते हैं तो उसे हल करने का उपाय खोज लेते हैं। किसी मार्ग पर चले बिना आप कैसे जानेंगे कि उस पर कितने पत्थर या कांटे हैं। मार्ग को जानकर ही तो उन पत्थरों या काँटों को हटाएँगे। इसलिए आपकी कोई समस्या हो - घर की या बाहर की, वह अवश्य हल हो जाएगी। मुझे विश्वास है कि आपने अब जैसा समाज तैयार किया है, अनुशासन के जिन नियमों का पालन कर रहे हैं, उनकी भविष्य में भी इसी प्रकार चलाते रहेंगे। आप अपने अंदर की क्षमता को पहचानिए। मैंने उसे ही जगाया है। कर्म की प्रेरणा उसी शक्ति से मिलती है।
‘एक बात और, आप लोग यह न सोचें कि मेरे चले जाने से आपका कोई रक्षक न होगा या इस व्यवस्था का कोई संचालक न होगा। मैं अपने पुत्र भरत को राजकाज सौंपकर जा रहा हूँ। वह हर तरह से योग्य है। मेरा दूसरा पुत्र बाहुबली युवराज कहलाएगा। वह पोदनपुर का शासक होगा। दोनों ही आपके सारे हितों का ध्यान रखेंगे। वे ही अब रक्षक और पालक की भूमिका पूरी करेंगे।’
एक व्यक्ति ने कहा - ‘प्रभु ! हम चाहते हैं, आप हमारे निकट ही रहें। हमें सहज सुलभ रहें। इसलिए आप यहीं रह कर तपस्या करें।’
ऋषभदेव ने कहा - 'यह सम्भव नहीं हो सकता। वैराग्य लेने के बाद इस माया जाल से दूर ही रहना उचित होता है। मेरे लिए तो अब पृथ्वी, आकाश, वन, नदी, पर्वत - यही मेरा संसार है। मैं कहीं भी रहूँ, वहाँ रहकर भी नहीं रहूँगा - क्योंकि उस स्थान के प्रति मेरे मन में कोई मोह न होगा। और फिर, आपके पास रहकर भी मैं कितने दिनों तक रह सकूँगा। यह शरीर तो नश्वर है। एक न एक दिन तो मृत्यु होगी ही। तब फिर उससे मोह कैसा ?
‘इसलिए आप सब प्रसन्न होकर अपना कर्म करें। सुखमय जीवन बिताएँ। अपने समाज को उन्नत बनाएँ और निर्भय होकर विकास मार्ग पर बढ़ते जाएँ। सफलता आपकी अवश्य मिलेगी। कोई बाधा आपको रोक न सकेगी।’
ऋषभदेव के इन विचारों से सभी की शंका और चिंता का समाधान हो गया। अगले दिन भरत को राजपद, बाहुबली को युवराज पद और शेष पुत्रों को भी भूमि-खंडों का स्वामी बनाकर ऋषभदेव ने वन-प्रस्थान की तैयारी की।
५
अयोध्या नगरी में उस दिन विचित्र भाव दिखाई दे रहे थे। एक ओर भरत का राज्याभिषेक हो रहा था - नये राजा का स्वागत हो रहा था, तो दूसरी ओर ऋषभदेव माया-मोह से मुक्त होकर वन जाने की तैयारी कर रहे थे।
जब नाभिराय को ऋषभदेव के इस निर्णय का पता चला तो वह मरुदेवी के साथ उनके पास आए। ऋषभदेव ने कहा - ‘पिताजी ! राज्य का कार्य तो मैंने पूरा कर दिया, पर विश्व-कल्याण और मानव-मुक्ति के लिए कुछ करना शेष है। मैं अब उसी के लिए वैराग्य ले रहा हूँ। आशा है आप मुझे रोकेंगे नहीं।’
‘नहीं पुत्र ! तुम सत्मार्ग पर जा रहे हो, इसलिए तुम्हें रोकना पाप होगा। मैं तुम्हें आशीर्वाद देने आया हूँ।’ इतना कहते-कहते पिता का हृदय भर आया और आँखें सजल हो गयीं। उधर मरुदेवी की आँखों से आँसू बह रहे थे। माँ का हृदय पुत्र का विछोह कैसे सह सकता है। उनका कंठ रुँधा हुआ था। कुछ बोल नहीं पा रहा था। ऋषभदेव ने उनके पास जाकर कहा ‘धीरज रखो माँ ! तुम्हारा बेटा पुण्य-कार्य के लिए जा रहा है। उसे शक्ति दो’ मरुदेवी विह्वल हो उठीं। केवल हाथ उठाकर आशीष दे सकीं। नाभिराय ने आगे बढ़कर उन्हें संभाल लिया।
वन-प्रस्थान की तैयारी पूरी हो चुकी थी। ऋषभदेव को ले जाने के लिए शिविका यानी पालकी आ चुकी थी। किंतु जनता और देवों में होड़ लगी थी कि पालकी पहले कौन उठाकर चलेगा।
६
परिवार के सभी लोगों से ऋषभदेव ने विदा ली। उनकी दोनों रानियों ने भी उन्हें विदा दी। फिर वह आकर पालकी में बैठ गए। इसी समय देवराज इन्द्र देवगणों के साथ वहाँ आए। पालकी उठाने के लिए जैसे ही देवगण आगे बढ़े कि जनता ने उन्हें रोक दिया। जन समूह का कहना था कि यह अधिकार हमारा है। जिसने हमें नया प्रकाश दिया, जिसने हमारे जीवन को सुखमय बनाया - वह सबसे पहले हमारा प्रिय है। इसलिए पहले पालकी उठाकर हम चलेंगे। वैसे भी यह काम सेवकों का होता है, न कि देवताओं का।
किंतु देवगणों ने जनता की बात नहीं मानी। उन्होंने कहा - ‘ऋषभदेव के साथ तो हमारा जन्मों से संबंध है। उनके हर कार्य में हम सहयोगी बने हैं। अस्तु यह अधिकार हमारा है।’
तब ऋषभदेव ने विवाद को बढ़ने से रोका और कहा - ‘हे देवगण ! इस धरती पर जन्म लेकर, मेरा संबंध जनता से हो जुड़ा है। मैंने इन्हें पिता जैसा प्यार दिया है, इनका पालन किया है। इसलिए ये मेरे हृदय से प्रिय हैं अतः पालकी इन्हें ही पहले उठाने दें। यद्यपि देवलोक के वासी होने के कारण आपकी महानता अक्षुण्ण है तथापि संगम धारण करने की योग्यता ये ही श्रेष्ठ हैं।’
ऋषभदेव के इन वचनों को सुनकर सब ओर जय-जयकार होने लगी। जन-प्रतिनिधियों ने आगे बढ़कर पालकी उठाई और धीरे-धीरे चलने लगे। पूरी अयोध्या नगरी उस दिन उमड़ पड़ी थी। अपने प्राणप्रिय राजा को विदाई देने में जैसे होड़ लगी हुई थी। जनसमूह इतना विशाल था कि मार्ग अवरुद्ध हो रहा था।
७
लोग आपस में तरह-तरह की चर्चाएँ कर रहे थे। कोई कह रहा था - ‘जिसके पास सब कुछ था, जो इस पूरे साम्राज्य का मालिक था - उसने आखिर क्यों यह सब छोड़ दिया ?’
दूसरे ने कहा - ‘जब यह बोध हो जाय कि इस संसार को हर वस्तु क्षणभंगुर है, तो इससे विरक्ति हो जाती है। हम वीतरागी बन जाते हैं।’
‘अगर संसार क्षणभंगुर है तो हम भी वीतरागी क्यों नहीं हो जाते ?’
‘इसलिए कि हम उसकी क्षणभंगुरता को मानते कहाँ हैं। हम तो उसके भोगने में इतना व्यस्त रहते हैं, कि इस बारे में कभी सोचते ही नहीं। लेकिन जो सोचते हैं और विचार करके उसे समझते हैं, वे वीतरागी हो जाते हैं।’
‘क्या इनके माता-पिता ने इन्हें रोका नहीं ?’
‘रोकने का प्रयास करते तो क्या ये रुक जाते ? एक बार वैराग्य जाग जाने पर मन यहाँ नहीं लगता। फिर माता-पिता जानते हैं कि ये जिस कार्य के लिए जा रहे हैं - वह कितना पवित्र है, कितना महान है, भगवान करे इनका तप सफल हो। उससे हम सबका ही नहीं, पूरे विश्व का कल्याण होने वाला है। ऐसे महापुरुष संसार में इसीलिए जन्म लेते हैं कि वे लोक कल्याण कर सकें। अगर वह आत्मोन्नति न लाए, होते तो क्या यह सारा वैभव हमें मिलता। आज हम जिस ज्ञान के सहारे जीवन को संवार सकें हैं, समाज में जैसी व्यवस्था हम देख रहे हैं, यह उन्हीं के कारण तो मिली है।’
जनता के लोग इस तरह की बातें करते जा रहे थे और ऋषभदेव के दर्शन करके अपने को धन्य बना रहे थे। पालकी धीरे-धीरे आगे बढ़ती जा रही थी।
कोई कहता - ‘राजभवन के सुख भोगने के बाद वन में रहकर वहाँ के कष्टों को कैसे सहन करेंगे ?’ उत्तर मिलता - ‘जब मन में दृढ़ संकल्प हो तो बड़े से बड़ा कष्ट भी झेलने की शक्ति आ जाती है।’
कोई कहता - ‘वन के भयंकर प्राणियों से कैसे बचाव करेंगे ?’
उत्तर मिलता - ‘वन में रहकर वन्य-प्राणियों से मित्रता हो जाती है। यदि उन्हें कोई न सताए तो वे भी किसी को नहीं सताते।’
उधर सिद्धार्थक वन में ऋषभदेव के तप के लिए उचित स्थान देखा जा चुका था। जब वहाँ पालकी पहुँची तो देवगणों ने ऋषभदेव का स्वागत किया। उन्हें पालकी से उतार कर वंदना की, पुष्प वर्षा की।
ऋषभदेव के मुखमंडल पर अद्भुत तेज दिखाई दे रहा था। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से कहा - ‘मैंने आज माया-मोह त्यागकर यहाँ आने का जो निर्णय लिया है, उसका अर्थ आप सब जान गए होंगे। वास्तव में इस संसार में जन्म-मृत्यु के आवागमन से मुक्त होने के लिए तप ही एक साधन है। संसार में जो कुछ है, वह नश्वर है। हम अपने चारों ओर जो भी धन-वैभव, राजमहल या बड़े-बड़े पद देखते हैं - वह सब भ्रम है हम इस भ्रम जाल में फँसकर, जीवन का सत्य भूल जाते हैं। और जीवन का सत्य है नश्वरता। मुझे इसका ज्ञान हुआ और मैंने भ्रम जाल से निकलकर तप त्याग का मार्ग अपना लिया है। अब आप लोग अपने घर लौट जाएँ। आपके राजा भरत हैं। वही आपके समस्त हितों की रक्षा करेंगे। आप धर्म का पालन करें, जीवन और समाज में सदैव अनुशासन का पालन करें। इसी से आपको सुख मिलेगा।’
ऋषभदेव का यह संबोधन सुनकर धीरे-धीरे लोग जाने लगे।
मुनि दीक्षा
चैत्रकृष्ण नवमी को सायंकाल जब उत्तराषाढ़ा नक्षत्र लगा हुआ था। ऋषभदेव ने जिन दीक्षा ली। दीक्षा से पहले उन्होंने वस्त्रों का त्याग किया। फिर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पद्मासन मुद्रा में बैठ गए। इसके बाद पंचमुष्टी केश लुंचन की क्रिया पूर्ण की। उनके द्वारा त्यागे गए वस्त्र, आभूषण आदि भी देवगणों ने रख लिए।
इस अवसर पर वहाँ अनेक राजा भी उपस्थित थे। उन्होंने भी जिन दीक्षा ले ली। कुछ अन्य लोग भी वहाँ प्रभु ऋषभदेव की दीक्षा देख रहे थे। उन्हें भी प्रेरणा हुई और उन्होंने जिन दीक्षा ले ली।
ऋषभदेव की दीक्षा का समारोह संपन्न हुआ
ऋषभदेव की दीक्षा का समारोह संपन्न हुआ तो उनके पुत्र भरत ने उनकी पूजा की और आशीर्वाद लेकर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया।
अब ऋषभदेव की साधना शुरू हुई। उन्होंने छह मास तक उपवास करने का संकल्प किया ताकि वह मन, वाणी और कर्म से शुद्ध-पवित्र हो सकें। इस व्रत को पूरा करने के लिए वे खड़े हो गए और पूरी अवधि तक उसी मुद्रा में साधना लीन रहने का निश्चय किया।
वहाँ उपस्थित जिन राजाओं और अन्य नागरिकों ने मुनि दीक्षा ली थी, उन्होंने भी ऋषभदेव के समान उपवास करने तथा खड़े होकर साधना करने का निश्चय किया।
धीरे-धीरे ऋषभदेव साधना में लीन हो गए। उन्हें अपने आसपास ही नहीं अपने शरीर तक का ध्यान न रहा। किन्तु वहाँ जिन अन्य लोगों ने मुनि दीक्षा ली थी, उनके लिये इन कष्टों को सहना कठिन होने लगा। उनके विचारों में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा। उन्होंने सोचा तो यही था कि ऋषभदेव का अनुसरण करके, वे भी कुछ पुण्यलाभ कमायेंगे। किन्तु किसी संकल्प को, दूसरों की नकल करके पूरा नहीं किया जा सकता। संकल्प के लिये अंतः प्रेरणा की आवश्यकता होती है। वही शक्ति, संकल्प को पूर्ण करने में सहायक होती है और बाधाओं तथा कष्टों को सहने में मदद करती है। परन्तु वहाँ उपस्थित राजा तथा अन्य नागरिकों का मन, अपने संकल्प से डगमगाने लगा। उन्होंने सोचा कि इस तरह हम कब तक खड़े रहेंगे। और खड़े रहने से भला क्या मिलने वाला है। इसी प्रकार उन्होंने एक-दो दिन तो उपवास में काटे, लेकिन फिर भूख को सहन करना उनके लिये कठिन हो गया। आखिर उनलोगों का हृदय डगमगा गया। उन्होंने सोचा कि ऋषभदेव जो कुछ कर रहे हैं, आवश्यक नहीं है कि हम भी वही करें। और फिर एक-एक कर के वे सभी मुनि ऋषभदेव को प्रणाम करके वहाँ से लौट चले।
चित्र में ऋषभदेव खड़े हैं और उनके आसपास कुछ लोग बैठे हैं।
११
ऋषभदेव तो साधना में इतने लीन हो चुके थे कि उन्हें पता ही न चला कि उनके पास कौन बैठा है या कौन चला गया। उन्हें इसका भी आभास न था कि कौन उनके बारे में क्या कहता या सोचता है। वह तो अपने अन्तर्मन में केन्द्रित हो कर उसकी शक्ति जागृत कर रहे थे। धीरे-धीरे समय बीतने लगा। मुनि ऋषभदेव को न तो पता चलता कि कब सूर्य निकला और कब रात हुई। न उन्हें धूप का अनुभव होता और न ही छाया पता चलती। कब वर्षा हुई, कब आँधी चली - कुछ भी ज्ञान न था। वे वन में एकाकी खड़े अपनी साधना करते जा रहे थे। एकाकी हो कर भी उन्हें न तो वन्य-प्राणियों का भय था न ही उन्हें उनसे कोई कष्ट था।
छह मास तक निरंतर तप करने के पश्चात् ऋषभदेव समाधी से बाहर निकले। इस अवधि में उनका शरीर दमक उठा था। सिर के बाल बढ़कर लटों का रूप ले चुके थे। तप करने से उनके मुख मंडल पर अद्भुत आभा आ गई थी। उनका अन्तर्मन शुद्ध हो चुका था। वह तो केवल भगवान सिद्ध का ही ध्यान करते थे। अपने आसपास का कुछ भी उन्हें नहीं व्यापता था।
एक दिन की बात है, प्रभु ऋषभदेव आँखें बंद किए साधना में लीन थे। उसी समय ‘नमि’ एवं ‘विनमि’ नामक दो तरुण जो राजा कच्छ एवं महाकच्छ के पुत्र थे। वहाँ आए जहाँ ऋषभदेव साधना-मग्न थे बैठे हुए थे। ये दोनों भोगोपभोग विषयक तृष्णा से युक्त थे। उन दोनों ने कहा - ‘हे प्रभु ! आप तो दया के सागर हैं। दोनों हाथों से दान देते हैं। आपने राजपाट तो भरत को दे दिया। बाकी पुत्रों को भी भूमि दे दी, किंतु हमें कुछ भी न मिला। हम पर भी आपकी कृपा हो जाए तो हमारा जीवन सुधर जायेगा।’
कुछ प्रतीक्षा के बाद वे फिर बोले- ‘हे जगत् के स्वामी, अपने विशाल भंडार से थोड़ा सा हमें भी दे दो। आपके यहाँ कोई कमी न होगी।’
जिस समय नमि-विनमि प्रभु ऋषभदेव के समक्ष यह याचना कर रहे थे, सूर-नाम जाति का इंद्र ‘धरणेन्द्र’ प्रभु का ध्यान कर रहा था। वह ऋषभदेव का भक्त था। उसने अवधि ज्ञान से जान लिया कि नमि-विनमि याचक के रूप में खड़े हैं। प्रभु ऋषभदेव तो साधना में लीन हैं, इसलिए उन्हें तो किसी की वाणी भी सुनाई देती है। धरणेन्द्र ने सोचा कि इस समय मुझे चलकर याचकों को सँभालना चाहिए। उसने अपना रूप बदला और एक भद्र पुरुष के रूप में वहाँ उपस्थित हो गया। नमि-विनमि अभी भी अपनी याचना कर रहे थे।
धरणेन्द्र ने कहा- 'कैसे लोग हो तुम दोनों ? तुम्हें दिखाई नहीं देता कि प्रभु ध्यान में लीन हैं। वह भला कैसे तुम्हारी वाणी सुन सकते हैं। फिर इस तरह उनकी तपस्या में बाधा डालने का
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तुम्हें क्या अधिकार है। क्या तुम नहीं जानते कि प्रभु ऋषभदेव ने अपना सब कुछ त्याग दिया है, उनके पास अब कुछ भी नहीं है। फिर भला माँगने क्यों आए हो। तुम्हें अगर सचमुच कुछ चाहिए तो राजा भरत के पास जाओ इस समय वह धन, संपत्ति, भू आदि के स्वामी हैं।’
चित्र में ऋषभदेव खड़े हैं और उनके सामने धरणेन्द्र और नमि-विनमि बैठे हैं।
नमि-विनमि ने कहा- ‘हे भद्र पुरुष, आप कौन हैं, हम नहीं जानते। किंतु प्रभु और हमारे बीच आप क्यों आ गए ? आप कह रहे हैं कि हम इनसे याचना न करें, क्योंकि इनके पास देने को कुछ नहीं है। किंतु आप क्यों भूलते हैं ये तो तीन लोक के स्वामी हैं। ये चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं। हमारी निर्धनता को दूर करना तो इनके लिए छोटा सा काम है। जैसे समुद्र से थोड़ा जल ले लेने से उसमें कोई कमी नहीं आती है, उसी प्रकार प्रभु के कोष से हमें यदि कुछ मिल जायेगा तो उन्हें क्या कमी होने वाली है। जो विश्व के कल्याण के लिए तप कर रहे हैं, उन्हें आप संपत्ति हीन न कहें। उनके पास तो संसार की सबसे बड़ी संपत्ति है। वे चाहें तो सब कुछ ठीक से चलने लगे।’
प्रभु ऋषभदेव के प्रति ऐसी अटूट भक्ति देखकर धरणेन्द्र प्रसन्न हो उठे। उन्होंने भद्र पुरुष का वेष त्यागकर अपना असली रूप धारण कर लिया। फिर नमि-विनमि से कहा- 'मैं तुम दोनों की इच्छा-पूर्ति के लिए ही आया हूँ। 'आओ मेरे साथ चलो। प्रभु की भी यही आज्ञा है।
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आचार्य क्रभदेव का हेतु विहार
नमि-विनमि धर्मेन्द्र के साथ चल दिए। पहले विजयार्ध पर्वत पर आए। फिर वे रथ पर बैठ कर धर्मेन्द्र के साथ रत्नपुर पहुँचे। वहाँ के विद्याधर से धर्मेन्द्र ने कहा - ‘ये नमि-विनमि हैं। आज से रत्नपुर के लोग इन्हें ही अपना स्वामी समझें। इनकी हर प्रकार से सेवा की व्यवस्था करा दो। इन्हें कोई कष्ट न होने पाए।’ विद्याधर ने नमि-विनमि को प्रणाम किया और उन्हें अपने राजा के रूप में आदर देकर राजभवन की ओर ले गया। इस प्रकार प्रभु क्रभदेव के भक्त धर्मेन्द्र के माध्यम से उन दोनों याचकों निर्धनता दूर हुई वे राजपद पर आसीन हुए।
प्रभु क्रभदेव का तप चल रहा था। उनका तप, कोई साधारण क्रिया न थी। उनका तप अखंड रूप से निर्बाध चल रहा था। न उन्हें अन्न जल की चिंता थी, न सोने-जागने की चिंता। वह निश्चल होकर तप कर रहे थे। उनकी निश्चल मुद्रा देखकर कीट-पतंगे उनके शरीर पर चढ़ जाते। पर इससे वह विचलित न होते। उन्हें तो वस्तुतः अपने शरीर का ध्यान ही न था। इसलिए उसके ऊपर क्या कुछ हो रहा है - इसकी अनुभूति कहाँ से होती।
धीर-धीरे क्रभदेव का तप उत्कर्ष होता गया। उन्होंने तप त्याग का आदर्श प्रस्तुत कर दिया। जीवन में कुछ पाने के लिए त्याग करना ही पड़ता है। मन, वाणी और कर्म की एकाग्रता से किया गया तप त्याग निश्चय ही फलदायी होता है। जिसने भी त्याग तप का महत्व समझ लिया, वह अपने कर्म के प्रति निष्ठावान बन जाता है। फल की चिंता छोड़ कर, पूरी लगन और निष्ठा से कर्म को संपन्न करना भी तप है। शुद्ध आचरण, मधुर व्यवहार, अहिंसा-व्रत पालन आदि सभी तप के रूप हैं।
क्रभदेव का तप जब पूर्ण हुआ तो उन्होंने सोचा कि मैंने कितना कठिन तप किया है, क्या सामान्य मनुष्य उसे कर सकेगा। सामान्य मनुष्य को तो सबसे पहले अन्न चाहिए, तभी उसका शरीर गतिशील रहेगा। शरीर को यदि कृषकत्व बना दिया तो मनुष्य कर्म में अनुरक्त नहीं हो सकेगा। इसलिए यदि कोई मेरे तप से प्रेरणा लेकर, स्वयं तप करना चाहता है तो उसे सहज बनाना होगा। अस्तु क्रभदेव ने निश्चय किया कि वे आहार ग्रहण करेंगे। यह आहार भी तभी ग्रहण करेंगे, जब उन्हें कोई उस विधि से देगा, जिस विधि से मुनि को आहार दिया जाता है। इस प्रकार मानव-मात्र के लिए त्याग एवं तप को सुगम बना दिया।
अगले दिन मुनि क्रभदेव ने, अपनी साधना पूर्ण होने पर आहार के लिए निकट की बस्ती में जाने का निश्चय किया।
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गाँव में पहुँच कर क्रभदेव घूमते रहते पर कोई विधिवत आहार न देता। गाँव वालों को पता ही न था कि मुनि को आहार कैसे दिया जाता है। वे तो आदर देना जानते थे। भेंट-पुष्प अर्पित करना जानते थे। किंतु उनकी दी भेंट की वस्तुओं को क्रभदेव देखते तक न थे।
क्रभदेव रोज बस्ती में जाते और निराहार लौट आते। हालांकि ग्रामवासी उनके दर्शन पाकर धन्य हो जाते थे। भीड़ की भीड़ उमड़ पड़ती उनके दर्शनों को लोग उनकी चरण रज को माथे पर लगाकर अपने को पवित्र बनाते। उनके चरणों में फल-फूल, वस्त्र-रत्न आदि अर्पित करते। किंतु क्रभदेव उन्हें ग्रहण किए बिना ही लौट आते। इस प्रकार प्रभु ने ६ माह तक आहार के लिए अनेकों ग्रामों एवं नगरों में गये पर विधिपूर्वक किसी ने मुनि क्रभनाथ को आहार ना दे सके।
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आहारचर्या हेतु विहार
एक दिन क्रभदेव ने हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया। उस समय हस्तिनापुर में राजा सोम प्रभु शासन करते थे। श्रेयांस उनके अनुज थे। रात्रि के पिछले प्रहर में उन्होंने सात स्वप्न देखे।
प्रातःकाल जब वे उठे तो उन्होंने रात को देखे स्वप्न को याद किया। फिर जब वे राज सभा में पहुँचे तो उन्होंने उन स्वप्नों को सविस्तार कह सुनाया। उन्होंने कहा - ‘मैंने कल रात सपने में श्वेत चंद्र, इंद्र का ध्वज, सुमेरु पर्वत, विद्युत विमान, कल्पवृक्ष के दर्शन किए हैं। इनका क्या अर्थ हो सकता है।’
राज पुरोहित ने कहा - ‘युवराज ! ये लक्षण उस परम तपस्वी के लिए हैं - जिन्हें प्रभु क्रभदेव कहते हैं। आपके स्वप्न से ज्ञात होता है कि वे, शीघ्र ही यहां पधार कर दर्शन देने वाले हैं।’
उधर स्थान-स्थान रुकते हुए क्रभदेव ने जब हस्तिनापुर की सीमा में चरण रखे तो वहां जैसे प्रभु के तेज से अलौकिक प्रसन्नता छा गयी। मुनिवर के आगमन का समाचार जैसे-जैसे फैल रहा था, लोग उनके दर्शनों के लिए उमड़ रहे थे। मुनि क्रभदेव शांत भाव से राजभवन की ओर बढ़ते जा रहे थे।
उधर श्रेयांस को जैसे ही समाचार मिला, वह उनके स्वागत के लिए दौड़ चला। प्रभु के सामने पहुँचकर उसने उनके चरणों में शीश झुकाया और अपना परिचय दिया। किंतु इसी समय एक और बात हुई। श्रेयांस ने पूर्व जन्म में मुनि को आहार दिया था। उसे वह विधि ज्ञात थी। अस्तु उसने भक्ति पूर्वक विनय की। मुनिराज की नवधा भक्ति पूर्वक प्रतिग्रहण/पड़गाहन किया।
राजा श्रेयांस ने मुनिवर को आहार देने की तैयारी कर ली। श्रेयांस ने मुनिवर को ऊँचे आसन पर बैठाया। पहले उनके चरण धोए। फिर उनका पूजन किया इसके बाद उन्हें इक्षुरस का आहार दिया। वह अत्यंत पवित्र एवं भव्य अवसर था। इस दृश्य को जिसने भी देखा, उसने अपने को परम भाग्यशाली माना। वहां उपस्थित लोगों ने पहली बार उस विधि को देखा-जाना। इस तरह
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राजा श्रेयांस द्वारा आहार दान
भविष्य में मुनि को आहार देने की परंपरा चल पड़ी। मुनिवर के आगमन से राजभवन ही नहीं, संपूर्ण हस्तिनापुर नगरी अपने को पवित्र बना चुकी थी।
मुनिवर ऋषभदेव ने आहार ग्रहण किया और फिर हस्तिनापुर से लौट चले। उन्हें विदा करने के लिए राजा सोमप्रभ और श्रेयांस संग-संग चलने लगे। अंत में हस्तिनापुर की सीमा पर पहुँच कर वह रुक गए और मुनिवर को जाते हुए तब तक देखते रहे, जब तक वे दृष्टि से ओझल नहीं हो गए।
कुछ दिनों के बाद सम्राट भरत हस्तिनापुर आए। उन्हें जब मुनिवर ऋषभदेव के आगमन का समाचार मिला तो उन्होंने युवराज श्रेयांस से कहा- ‘तुम परम भाग्यशाली हो, जो तुम्हें उनके दर्शन तथा आहार देने का अवसर मिला।’ फिर उन्होंने पूछा- ‘तुमने उन्हें कैसे पहचान लिया?’ श्रेयांस ने तब स्वप्न वाली बात बताई। भरत ने पूछा, ‘किंतु मुनि को आहार देने की विधि तो किसी को नहीं मालूम। तुमने कैसे जान ली।’
श्रेयांस ने कहा- ‘उन्हें देखते ही मुझे पूर्व जन्म की घटना याद आ गयी, जब मैंने विधि पूर्वक आहार एक मुनि को दिया था।’
भरत ने कहा- ‘श्रेयांस! आज तुमने आहार दान की विधि बताकर मानव-जाति का बड़ा उपकार किया है। इस विधि के द्वारा वह भविष्य में भी मुनि को आहार देकर पुण्य कमाएगी। इस युग में आहारदान की परंपरा आरंभ करने का श्रेय तुम्हें ही दिया जाएगा।’
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धर्मोपदेश
प्रभु ऋषभदेव की साधना और तप बराबर चल रहे थे। वह पूर्ण ज्ञान पाना चाहते थे। इसलिए अपनी साधना और तप को निरंतर बढ़ाते जा रहे थे। अब वह भ्रमण करने लगे थे। किंतु कैवल्य-ज्ञान प्राप्त नहीं हो रहा था। वह अनेक स्थानों पर गए। प्रकृति के विविध रूपों को देखा। पर मन न लगा। अपनी शेष वृत्तियों को भी वह समेटते जा रहे थे शून्य की ओर ला रहे थे। रात में भी वह केवल उतना ही सोते और विश्राम करते, जितना शरीर के स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक था। शेष समय वह तप करने में ही लगाते। उन्हें न भूख प्यास सताती, न ही उनके मन में कोई इच्छा ही होती। इसी तरह वर्ष पर वर्ष बीतने लगे। कभी नहीं किनारे तप करते, कभी किसी निर्झर के पास। कभी समुद्र किनारे जाते और कभी ऊँचे पर्वत के शिखर पर। हर जगह, हर पल एक ही चाह थी- कैवल्य-ज्ञान प्राप्त हो जाय। वह अपने तप को उत्कर्ष की ओर ले जा रहे थे। फिर भी कैवल्य ज्ञान न मिलने पर उन्हें यही लगता कि अभी और तप करना होगा।
कैवल्य-ज्ञान की प्राप्ति के लिए तपस्या के क्रम में प्रभु ऋषभदेव परिमलताल नगर के एक उद्यान में पहुँचे। वहाँ नीरव शांति थी। ऋषभदेव एक विशाल वट वृक्ष के नीचे पद्मासन मुद्रा में बैठ गए। तप आरंभ हुआ और अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। तभी ऋषभदेव को कैवल्य-ज्ञान प्राप्त हो गया। उस आनंद को स्थिति में वह समाधि लगाए, बैठे रहे। उनका मन निर्मल हो गया। समस्त इंद्रियों पर उनका पूर्ण नियंत्रण हो गया। जब तप-साधना पूर्ण हो गई तो प्रभु ने नेत्र खोले। उनका अभिनन्दन करने हेतु इन्द्र आदि देवगण वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने प्रभु का पूजन किया और उन पर पुष्प वर्षा की।
उपर देवलोक में इस समाचार को सुनकर कुबेर को बड़ा हर्ष हुआ। कुबेर ने अनुभव किया कि तीनों लोकों में ऋषभदेव जैसा कोई तपस्वी नहीं है। जगत के विकास और प्रगति का ऐसा मार्ग बताया है कि उस पर चलने वाले मानव-प्राणी उन्नति ही करते आएँगे। उन्होंने अंधकार में भटके हुए जगत् को नया प्रकाश दिया है। युग-युग तक लोग उन्हें स्मरण करेंगे और अपने को धन्य समझेंगे। तब ऐसे महापुरुष के समवशरण की रचना अवश्य की जानी चाहिए। उनकी यह सेवा करके मैं भी कुछ पुण्य कमा लूँ।’
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कुबेर ने अपने मन में ऐसे विचार लाकर देवगणों के साथ परामर्श किया। समवशरण की रचना के प्रस्ताव से सभी देवगण अति प्रसन्न हुए।
अयोध्या में उस समय सम्राट भरत राजसभा में आए तो राजपुरोहित ने उन्हें बताया कि ऋषभदेव जी को कैवल्य-ज्ञान प्राप्त हुआ है और कुबेर तथा देवगणों ने उनके समवशरण महोत्सव का आयोजन किया है। अभी राज पुरोहित ने अपना बात पूरी की थी, सभी एक सेवक ने आकर अवशेष की सूचना दी कि आपकी पटरानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया है। ठीक उसी क्षण शस्त्रागार के प्रमुख ने आकर बताया कि हमारे शस्त्रागार में रत्न-चक्र प्रकट हुआ है।
एक साथ तीन शुभ-संवाद पाकर राजा अवधेश हर्षोल्लास से भाव-विह्वल हो उठे। वह बोले- 'जिन भगवान की कैसी कृपा है जो आज मुझे एक के बाद एक तीन शुभ समाचार मिल रहे हैं। ऐसा लगता है ‘जिन भगवान’ की मुझ पर विशेष कृपा हो रही है। आज मैं जो कुछ हूँ, उन्हीं की कृपा से हूँ। मेरा जन्म, मेरा राजपद, यश-वैभव आदि सब ‘जिन भगवान’ की कृपा से ही मिला है।
भरत हे राज पुरोहित जी, अब तो मुझे तत्काल जाकर प्रभु ऋषभनाथ के दर्शन करना चाहिए। यही वह अवसर है जब हम अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं। ये राजपद, यश-वैभव, सेना, घोड़े-हाथी आदि तो छलावा है। इनसे कुछ भी नहीं मिलने वाला। सत्य तो प्रभु के दर्शन और उनकी कृपा है। हम तो माया-मोह में फंसकर इस परम-सत्य को जान ही नहीं पाते। इस शरीर का क्या है। आज है, कल नहीं है। तो फिर सच्चा वैभव तो परम-सत्य को जान लेने में है। आज मुझे वह ज्ञान मिल गया है।
'हे राजपुरोहित! आप तत्काल व्यवस्था कीजिए। हम समवशरण में जाकर प्रभु ऋषभनाथ के दर्शन करके अपना जीवन-सफल बनाना चाहते हैं।’
महाराज! इस पुण्य लाभ को लेने की अनुमति मुझे भी दें।’
'हाँ-हाँ…अवश्य! और भी जो लोग चलना चाहें चलें। अयोध्या के नर-नारियों को यह शुभ-संवाद तुरंत सुना दें। प्रभु के दर्शन-लाभ के लिए जो भी चलना चाहें, चलें।’
फिर तो अयोध्या के अनेक नागरिक राजा अवधेश के साथ चल पड़े।
समवशरण में प्रभु ऋषभनाथ, समवशरण में विराजमान थे। उनका मुखमंडल सूर्य की भाँति प्रकाशमान हो रहा था। असंख्य नर-नारी, देवगण, सम्राट भरत-सभी उनके दर्शनों का पुण्य लाभ ले रहे थे। सबके हृदय श्रद्धा से भरे हुए थे। सब उनकी वंदना कर रहे थे।
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राजा अवधेश
राजा अवधेश, अपने साथ आए लोगों को लेकर जब समवशरण मंडप में उपस्थित हुए तो प्रभु के दर्शन करके गद्गद हो गए। जीवन में पहले कभी ऐसा भव्य दृश्य न देखा था। सामने प्रभु ऋषभनाथ ज्योति पुंज के समान बैठे थे। उन पर दृष्टि ही न टिकती थी। उनकी एक झलक देखकर लोग श्रद्धा से सिर झुका लेते थे और उनकी वंदना करने लगते थे।
सभी उपस्थित जनसमुदाय अब प्रभु ऋषभनाथ की अमृतवाणी सुनने के लिए लालायित था। और वह बहुप्रतीक्षित क्षण आ गया। प्रभु ने नेत्र खोले और होठों में कम्पन हुआ। ॐकार रूप में भगवान की दिव्य ध्वनि बिखरी पूरे समवशरण में सन्नाटा हो गया।
ऋषभनाथ ने कहा - 'आप अपने चारों ओर जो सृष्टि देख रहे है - वह स्वयंसिद्ध है। आप जो भी कर्म करते हैं, वही आपकी साधना है। जिसने कर्म की बाधाओं पर विजय पा ली, वही ‘जिन’ कहलाया। इसलिए कर्म के शत्रुओं पर विजय पाना, उसके लिए शक्ति जगाना ही जिनधर्म ‘वा’ जैन धर्म है। इसको ही अपनाने में सबका हित है, सबका कल्याण है।
'धर्म क्या है? चरित्र, ज्ञान और सम्यक दर्शन ये तीनों ही मिलकर ‘धर्म’ कहलाते हैं। जो व्यक्ति मोक्ष चाहता है, उसे मन, वाणी और कर्म से मिथ्या-पथ छोड़ना होगा और तप करना होगा। इन्हीं तीन धर्म-रत्नों के माध्यम से सच्ची साधना होती है।
उपदेश
‘इस शरीर का मोह व्यर्थ है। इसके कारण मोक्ष नहीं मिलता। मनुष्य जन्मों के चक्र में भटकता रहता है। इसलिए यदि निर्वाण प्राप्त करना है तो शरीर का मोह त्याग दो। इन्द्रियसुख त्याग दो। तब प्रभु जिनेन्द्र की साधना करो। निर्वाण अवश्य प्राप्त होगा।’
इस प्रकार प्रभु ऋषभदेव के वचनामृत से जनसमूह लाभान्वित हुआ। सर्वत्र प्रभु का जय-जयकार हुआ।
ऋषभदेव ने अब विहार किया। उनका धर्म-चक्र चल पड़ा। वह जहाँ विहार करते, वहाँ अपार जनसमूह उमड़ पड़ता। प्रभु ऋषभदेव उन्हें उपदेश देते सुनकर जनसमूह अपने कल्याण मार्ग पर चल पड़ता।
प्रभु ऋषभदेव उन्हें बताते कि लोभ आदि शत्रुओं से कैसे बचना संभव है। परिग्रह की भावना ही सारे कष्टों का कारण है। मुक्ति के लिए अपरिग्रह अपनाना पहली आवश्यकता है। यह तो भ्रम है। इसके मोह में फंसा प्राणी मुक्ति नहीं पा सकता। अहिंसा का व्रत जो नहीं अपनाता वह सम्यक् दर्शन को नहीं अपना सकता।’
इस प्रकार प्रभु ऋषभदेव अपना ज्ञान-आलोक फैलाते हुए चल रहे थे। अनेक प्रदेशों एवं स्थानों पर विहार करते हुए उन्होंने जनता के हृदय में नया धार्मिक चेतना जगाई। जनता को समझाया कि हमारे दुखों का मूल कारण क्या है। इससे जनता में अनुशासन की भावना जागी।
धर्म-चक्र का विस्तार करते हुए प्रभु ऋषभदेव अंत में कैलाश पर्वत पर पहुँच गए। वहाँ एक सिद्ध-शिला पर उन्होंने आसन जमाया। वही अपनी साधना करने लगे और समय-समय पर उपदेश देने लगे।
उन्होंने कहा- 'जब तक यह शरीर लौकिक कर्मों में फंसा रहता है तब तक मन में लालसा भी बनी रहती है। इस प्रकार मोह में बंधा मनुष्य, फिर कर्म में ही आसक्त हो जाता है। वह जब तक इन्द्रियों पर विजय नहीं पाता, तब तक इस कष्ट को भोगता रहता है। इस जगत में ज्ञानी जीव वही है जो नैतिक-व्यवहार करता है। इसलिए आत्मध्यान ही मोक्ष का सच्चा मार्ग है। इसी आत्मध्यान के द्वारा बड़े-बड़े मुनि मोक्ष प्राप्त करते हैं। ज्ञानी पुरुष का यही कर्तव्य है कि संसार में रहकर भी कमल जैसा रहे। इस प्रकार की साधना करने वाला प्राणी अवश्य मोक्ष प्राप्त करेगा।
‘जो सम्यक्-ज्ञानी होता है- उसका मन शुद्ध और पवित्र होता है, वह निष्काम कर्म करता है, विषय-वासनाओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह निस्वार्थी होता है, उसे अभिमान नहीं होता। वह निस्पृह होकर अपना कर्तव्य पूरा करता है। वास्तव में अनासक्त होकर जीवन जीना ही सम्यक्-ज्ञानी का परम धर्म है और वही जैन धर्म का आधार है।’
उपदेश
एक बार प्रभु ऋषभदेव ने गृहस्थों को अपना अमर संदेश दिया। उन्होंने कहा- ‘गृहस्थ व्यक्ति लौकिक सुखों को बटोर कर रखने का प्रयत्न करता है। ये सुख क्षण भंगुर होते हैं। गृहस्थ इन्हें पकड़ कर रखता है। उनके मिटते ही फिर उन्हें पाने के लिए दौड़ता है। वह इसी भ्रमजाल में फंसा रह कर जीवन गंवा देता है। इसलिए परिग्रह की भावना छोड़ो। परिग्रह की कोई सीमा नहीं है। जितना पाओगे, उससे अधिक पाने की लालसा बढ़ती रहेगी। यह क्रम निरंतर चलता रहता है। जबकि सच्चाई यह है कि चाहे जितना सुख बटोर कर रखो अंतिम समय में सब नहीं छूट जायेगा। कुछ भी साथ नहीं जाने वाला। हाँ, अपरिग्रह की सीमा है। वह लघु से लघु हो सकता है। यहाँ तक कि केवल जीने के लिए जितना चाहिए, उतना ही रह सकता है। उसी में सच्चा संतोष है। इसलिए गृहस्थ को अपरिग्रही होना चाहिए।’
फिर ऋषभदेव ने मुनियों की विशेषताएँ भी बताईं- ‘मुनि वही है जो वीतरागी हो और पाँचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ले। उन्हें रथ, रूप, गंध बिलकुल नहीं व्यापते। दिन में केवल एक बार आहार ग्रहण करते हैं। रात्रि के आखिरी प्रहर में कुछ देर के लिए सो लेते हैं। पशु, पक्षी, कीट-व्याधि से मुनियों को कोई भय नहीं लगता। मुनि की दृष्टि में सब समान होते हैं। उसका न कोई मित्र होता है, न शत्रु, न निन्दक होता है - न प्रशंसक। धन-वैभव की उन्हें कोई लालसा नहीं होती। मुनि निर्भय होकर घूमते हैं। बस्ती हो या जंगल कहीं भी जाने में उन्हें भय नहीं लगता।’
इस प्रकार समस्त जगत के स्वामी भगवान ऋषभदेव ने जगत को आनन्दमय करते हुए तथा अपने अमृतरुपी वचनों से सबको संतुष्ट करते हुए समस्त पृथ्वी पर विहार किया।
सम्राट भरत, बाहुबली
सम्राट भरत का वर्चस्व चारों ओर फैला था। उनके शौर्य एवं कुशल नेतृत्व के गुणों से सभी परिचित थे। उनकी मनगढंत दूर-दूर तक फैली हुई थी। सम्राट भरत ने सोचा कि इस देश में जो अनेक राज्य हैं, वे आपसी संघर्ष में उलझे रहे हैं। इससे वे कमजोर हो रहे हैं, यह संपूर्ण भारतवर्ष यदि इस तरह टुकड़ों में रहकर असंगठित रहा तो इसकी शक्ति कुछ भी न होगी। राष्ट्र वही है जो अखंड हो, संगठित हो। तभी वह शक्तिवान बनता है। उसकी शक्ति तो उसकी एकता में निहित है। इस एकता को स्थापित करना चाहिए। इसका उपाय यही है कि सभी राज्यों को एक केन्द्रीय सत्ता के अंतर्गत संगठित कर दिया जाय। भारत एक चक्रवर्ती देश बन जाय।
सम्राट भरत ने एक दिन अपने यहाँ विचार सभा में रखी। उन्होंने कहा- 'यह देश, यह संपूर्ण आर्यावर्त इन दिनों खंड-खंड बंटा हुआ है। हर खंड, हर प्रदेश अपने को स्वतंत्र मान रहा है। किंतु इसमें उसे हानि हो रही है। छोटे-छोटे प्रदेश अपना उन्नति करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि उनकी उतनी आय नहीं है, उनके पास साधन नहीं है। यदि यह संपूर्ण आर्यावर्त संगठित हो जाय तो इसकी शक्ति, आय और साधन-सभी में वृद्धि हो जाएगी। तब इस देश के हर भू-भाग को उन्नति के अवसर और पर्याप्त साधन मिलेंगे। यदि वह स्वयं साधन जुटाने में समर्थ नहीं है, तो उसे केन्द्रीय-सत्ता से साधन मिलेंगे। ऐसे भी प्रदेश हो सकते हैं, जिनके पास अपनी आवश्यकता से अधिक साधन हों। उन अधिक साधनों को तब केन्द्रीय सत्ता लेकर, उन्हें दे सकती है, जिनके पास साधन कम हों।
मैं देख रहा हूँ कि हमारे विभिन्न राज्यों में उनके राजा या गढ़पति या माण्डलीक राजा-जो जहाँ हैं, वहाँ सत्ता का दुरुपयोग कर रहे हैं। उसे अपने राज्य की चिंता नहीं है। उसे कोई कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि उस पर अंकुश लगाने के लिए कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं है। इसका एक दुष्परिणाम यह हो रहा है राज्य-शासन ढीला पड़ रहा है। व्यवस्था और नियम-पालन शिथिल पड़ गए हैं। समाज में भ्रष्टाचार और उच्छृंखलता बढ़ रही है। आपसी द्वेष, कलह और अशांति बढ़ रही है। कपटद्वेष जी ने जो व्यवस्था दी थी, उसे भूलकर लोग निरंकुश हो रहे हैं। यह विनाश
के लक्षण हैं। इससे समाज और जनता दोनों की शक्ति क्षीण होती है। और जब ये दोनों क्षीण होंगे, दुर्बल होंगे-तो राज्य की शक्ति स्वतः क्षीण हो जायेगी। तब विकास रुक जाता है।
आज अधिकांश राज्यों में यही हो रहा है। शासक विलासी और स्वार्थी हो रहे हैं। हर जगह संघर्ष और कलह के दर्शन हो रहे हैं। शक्तिशाली व्यक्ति दुर्बल पर अत्याचार कर रहा है। अब कहीं भी उन्नति या प्रगति के लक्षण नहीं दिख रहे हैं। यदि यह स्थिति कुछ और समय तक बनी रही तो मानव-सभ्यता विकास के जिस पर बढ़ी थी, उसको जो स्वरूप निर्मित हुआ था, वह छिन्न-भिन्न हो जायेगा।
आज न कहीं कला, साहित्य या संगीत की चर्चा होती है। व्यक्ति-व्यक्ति के बीच अनिर्वास जाग रहा है। ऊंच-नीच, जाति-संघर्ष, वर्ग-संघर्ष का सर्वत्र बोल-बाला है। क्या यह सब होना चाहिए? क्या यह सब होने देना चाहिए? क्या इसे नहीं रोकना चाहिए? मैं क्या यह सब होते हुए देखता रहूँ और कुछ न करूँ। आज मैं राजसभा से अपने इन प्रश्नों के उत्तर और इस समस्या का समाधान जानना चाहता हूँ।
सम्राट भरत ने देश की वर्तमान स्थिति का जो चित्र उपस्थित किया था, वह सत्य है-इसे सभी जानते थे। यह भी जानते थे कि यदि इसे बिगड़ने से रोका न गया तो भारत की संस्कृति और सभ्यता का विनाश हो जाएगा। इसलिए सम्राट भरत के उद्बोधन को सुनकर राज सभा में सन्नाटा छा गया सम्राट भरत ने राजसभा में बैठे लोगों की ओर देखा। सब के चेहरों पर चिंता की रेखाएं थी। सब गंभीर चिंतन में डूबे थे। और सम्राट भरत अपने प्रश्नों के उत्तर सुनने के लिए आकुलित थे।
कुछ देर के बाद एक मंत्री उठे और उन्होंने विनम्रता पूर्वक कहा- 'हे सम्राट! हमें इस आर्यावर्त की रक्षा हर स्थिति में करनी है। इसके लिए कितना ही मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। यह आर्यावर्त नहीं रहेगा, तो हमारा भी अस्तित्व न होगा। व्यक्ति से बड़ा राष्ट्र होता है। किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्र की अखंडता और प्रभु सत्ता को विनाश की ओर भेज दे। ऐसा करने के व्यक्ति का अस्तित्व ही समाप्त कर देना होगा।
दूसरे मंत्री ने कहा, 'महामहिम! आपके विचार सुनकर हम यह अनुभव करने लगे हैं कि हमारे देश की अखंडता और एकता के लिए गंभीर संकट उपस्थित हो गया है। यदि किसी शत्रु ने इसका लाभ उठाने का प्रयत्न किया तो वह सफल हो जायेगा। अस्तु हमें इस दिशा में तत्काल सक्रिय होना चाहिए।
तीसरे मंत्री ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा- 'हे सम्राट! किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी एकता में निहित होती है। यह एकता का पाठ हमें प्रभु ऋषभदेव ने पढ़ाया था। एकता का अर्थ केवल शारीरिक या सैनिक शक्ति की एकता नहीं है। एकता का अर्थ हमारी वैचारिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक एकता से भी है। किसी भी राष्ट्र के बलशाली या दुर्बल बनने में इनकी भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अस्तु हमें अपनी एकता को किसी भी मूल्य पर छिन्न-भिन्न नहीं होने देना है-चाहे इसके लिए कितना ही कठोर कदम न उठाना पड़े।
चौथे व्यक्ति का विचार था- 'हमें बल, नीति, संयम, तप आदि किसी का भी प्रयोग करना पड़े तो करें। किंतु देश की समृद्धि और प्रगति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को हटाना ही आपका धर्म है। आप भी कदम उठाएंगे, उसे हमारा पूर्ण समर्थन है।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3057.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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