उत्तम क्षमा धर्म (दसलक्षण Barasanupekkha) - जैन स्वाध्याय सामग्री | Uttam Kshama Dharm (Daslakshan Barasanupekkha)

उत्तम क्षमा धर्म (दसलक्षण Barasanupekkha)

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अनुक्रमणिका

उत्तम क्षमा धर्म

कोहेण जो ण तप्पदि सुर-णर-तिरिएहिं कीरमाणे वि।
उवसग्गे वि रुद्दे तस्स खमा णिम्मला होदि ॥३९४॥

जो (मुनि) देव मनुष्य तिर्यंच आदि से रौद्र (भयानक घोर) उपसर्ग करने पर भी क्रोध से तप्तायमान नहीं होता है उस मुनि के निर्मल क्षमा होती है।

वारसणुवेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम मार्दव धर्म

उत्तम-णाण-पहाणो उत्तम-तवयरण-करण-सीलो वि।
अप्पाणं जो हीलदि महव्व-रयणं भवे तस्स ॥३९५॥

जो मुनि उत्तम ज्ञान से तो प्रधान हो उत्तम तपश्चरण करने का जिसका स्वभाव हो जो अपने आत्मा को मद-रहित करे - अनादररूप करे उस मुनि के मार्दव नामक धर्मरत्न होता है।

वारसणुवेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम आर्जव धर्म

जो चित्तेइ ण वंकं ण कुणदि वंकं ण जंपदे वंकं।
ण य गोवेदि णिय-दोसं अज्जव-धम्मो हवे तस्स ॥३९६॥

जो मुनि मन में वक्रतारूप चिन्तवन नहीं करे काय से वक्रता नहीं करे वचन से वक्ररूप नहीं बोले और अपने दोषों को नहीं छिपावे उस मुनि के उत्तम आर्जव धर्म होता है।

वारसणुवेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम शौच धर्म

सम-संतोस-जलेणं जो धोवदि तिव्व -लोह-मल-पुंजं।
भोयण-गिद्धि-विहीणो तरस सउच्चं हवे विमलं ॥397॥

जो (मुनि) समभाव (रागद्वेष रहित परिणाम) और सन्तोष (सन्तुष्ट भाव) रूपी जल से तीव्र तृष्णा और लोभरूपी मल के समूह को धोवे (नाश करे) भोजन की गृद्धि (अति चाह) से रहित हो उस मुनि का चित्त निर्मल होता है अतः उसके उत्तम शौच धर्म होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम सत्य धर्म

जिण-वयणमेव भासदि तं पालेदुं असक्कमाणो वि।
ववहारेण वि अलियं ण वददि जो सच्च-वाई सो ॥398॥

जो मुनि जिनसूत्र ही के वचन को कहे उसमें जो आचार आदि कहा गया है उसका पालन करने में असमर्थ हो तो भी अन्यथा नहीं कहे और जो व्यवहार से भी अलीक (असत्य) नहीं कहे वह मुनि सत्यवादी है, उसके उत्तम सत्यधर्म होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम संयम धर्म

जो जीव-रक्खण परो गमणागमणणादि -सव्व-कज्जेसु।
तण-छेदं पि ण इच्छदि संजम-धम्मो हवे तरस्स ॥399॥

जो मुनि जीवों की रक्षा में तत्पर होता हुआ गमन आगमन आदि सब कार्यों में तृण का छेदमात्र भी नहीं चाहता है, नहीं करता है उस मुनि के संयमधर्म होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम तप धर्म

इह-पर-लोय-सुहाणं णिरवेक्खो जो करेदि सम-भावो।
विविहं काय-किलेसंतव-धम्मो णिम्मलो तस्स ॥400॥

जो (मुनि) इसलोक परलोक के सुख की
अपेक्षा से रहित होता हुआ (सुख-दुःख, शत्रु-
मित्र, तृण-कंचन, निन्दा-प्रशंसा आदि में
रागद्वेष रहित) समभावी होता हुआ अनेक
प्रकार कायक्लेश करता है उस मुनि के निर्मल
तपधर्म होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम त्याग धर्म

जो चयदि मिट्ठु-भोज्जं उवयरणं रय-दोस-संजणयं।
वसदिं मम्मत-हेदुं चाय-गुणो सो हवे तस्स ॥401॥

जो मुनि मिष्ट भोजन को छोड़ता है
रागद्वेष उत्पन्न करनेवाले उपकरण को
छोड़ता है ममत्व का कारण वसति का
को छोड़ता है उस मुनि के त्याग नाम का
धर्म होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम निर्ग्रन्थ (आकिंचन्य) धर्म

ति-विहेण जो विवज्जदि चेयणमियरं च सव्वहा संगं।
लोय-ववहार-विरदो णिग्गंथत्तं हवे तस्स ॥402॥

जो (मुनि) लोक व्यवहार से विरक्त
होकर चेतन अचेतन परिग्रह को सर्वथा
तीनों प्रकार से (मन-वचन-काय कृत-
कारित-अनुमोदना से) छोड़ता है उसे
(मुनि के) निर्ग्रन्थत्व होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

जो परिहरेदि संगं महिलाणं णेव पस्सदे रूवं।
काम-कहादि- णिरीहो णव-विह-बंभं हवे तस्स ॥403।।

जो मुनि स्त्रियों की संगति नहीं करता है उनके
रूप को नहीं देखता है काम की कथा आदि
(स्मरणादिक से) रहित हो ऐसा (नवधा कहिये
मन-वचन-काय कृत-कारित-अनुमोदना और
तीनों काल से) नव कोटि से करता है उसे (मुनि
के) ब्रह्मचर्य धर्म होता है।

वारसणुपेक्खा, आचार्य कुन्दकुन्द

अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3072.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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